शनिवार, 4 सितंबर 2021

शिक्षा नीति और शिक्षक की भूमिका

 शिक्षा नीति और शिक्षक की भूमिका

प्रति वर्ष सितंबर की पांच तारीख़ को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। इस साल भी इसे मनाया जाएगा या कहें कि केवल औपचारिकता निभाई जाएगी। प्रश्न यह है कि शिक्षक दिवस से अध्यापन का काम और अध्यापक का कर्तव्य उस महान व्यक्तित्व से कितना मेल खाता है जिनके नाम पर यह मनाया जाता है।

गुरु की परिभाषा

डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ऐसे शिक्षक थे जो मानते थे कि गुरु ऐसा होना चाहिए जिसकी सोच सब से अलग हो और वह अपने विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करने में सक्षम हो। इसी के साथ वे हिंदुत्व के कट्टर समर्थक थे और उनका विश्वास था कि यही वह कड़ी है जिससे पूर्व और पश्चिम को जोड़ा जा सकता है। वे भारतीय संस्कृति के प्रबल समर्थक थे।  हिंदुत्व को एक ऐसी जीवन शैली मानते और प्रचारित करते थे जिसमें मनुष्य को मानवता, सहिष्णुता और वसुधैव कुटुंबकम् का पाठ पढ़ाया जाना शिक्षक का पहला कर्तव्य माना गया है।

शिक्षक के रूप में भारत और विदेशों के प्रसिद्ध और उच्च संस्थान उनकी कर्मस्थली रहे और उन्हें एक विद्वान ही नहीं बल्कि अपने शिष्यों के साथ जीवन भर मधुर तथा आत्मीय संबंध बनाए रखने के लिए जाना जाता है।

डॉक्टर राधाकृष्णन की सोच की समीक्षा करना तब और जरूरी हो जाता है जब हम वर्तमान समय में सरकार द्वारा बनाई गई शिक्षा नीति की चर्चा करते हैं।  शिक्षकों की भूमिका को लेकर विशेष रूप से बहस की जानी चाहिए क्योंकि नीति की सफलता उन्हीं पर निर्भर है। देश में शिक्षक वर्ग तैयार करने, उन्हें प्रशिक्षण देकर इस काबिल बनाना कि वे अपने  विद्यार्थियों को ग्लोबल सिटीजन बनने के लिए तैयार कर सकें, इसका भार शिक्षक पर ही है।

इस सब के लिए वर्षों से अनेकों संस्थान कार्य कर रहे हैं। यदि इन उच्च शिक्षा संस्थानों से निकले विद्यार्थियों और वहां उपलब्ध सुविधाओं के इस्तेमाल में कुशलता हासिल करने के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो घोर निराशा का सामना करना पड़ेगा। कुछ संस्थान तो सफेद हाथी बन गए हैं, उनमें भविष्य के शिक्षक तैयार करने की सामग्री का उपयोग ही नहीं किया जाता और वह वर्षों से जंग खा रही है।

बहुत खोज करने पर एकाध संस्थान ही ऐसा मिला जहां सरकार द्वारा जनता से कर के रूप में प्राप्त धन का सही इस्तेमाल हो रहा हो। हालांकि निजी तौर पर संचालित कुछ इंस्टीट्यूट शानदार काम कर रहे हैं लेकिन वहां पढ़ने के बाद विद्यार्थियों में से अधिकतर का लक्ष्य संपन्न देशों में मोटे वेतन वाली नौकरी हासिल करना होता है।

लक्ष्य की पूर्ति

नई शिक्षा नीति में 2030 तक यानी अगले दस वर्षों में योग्य शिक्षक तैयार करने का निर्धारित  लक्ष्य पूरा हो पाएगा, इसमें भारी संदेह है। यहां इस बात का उल्लेख करना ज़रूरी है कि साठ के दशक से अब तक सभी सरकारें वोकेशनल एजुकेशन, स्किल डेवलपमेंट, गांव देहात में कारीगरों को तैयार करने से लेकर आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्थानीय तौर पर मौजूद विशाल सामग्री के उपयोग से कौशल विकास करने जैसे राग अलाप रहीं हैं।

इन चीजों पर जितना धन खर्च हो चुका है, उसके अनुसार देश में बहुत बड़े पैमाने पर रोज़गार पैदा हो चुका होता, बेरोज़गारी मिट जाती और देश आत्मनिर्भर हो जाता लेकिन ऐसा कुछ देखने को नहीं मिलता।

इसकी पुष्टि के लिए यह बताना आवश्यक है कि भारत में केवल पांच प्रतिशत विद्यार्थियों ने वोकेशनल ट्रेनिंग ली है जबकि अमरीका में 52, जर्मनी में 75 और दक्षिण कोरिया में 86 प्रतिशत लोग किसी न किसी कार्य में पूरी तरह से काबिल और सक्षम हैं और यही कारण है कि उनका औद्योगिक विकास हमारे देश से बहुत अधिक हुआ है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि शिक्षा पर हम कुल आमदनी का लगभग आधा प्रतिशत ही खर्च करते हैं जबकि विकसित देशों में चार प्रतिशत से भी अधिक होता है।

हमारे देश में योग्य, सक्षम, प्रतिभाशाली और पढ़ाने को ही अपना धर्म तथा कर्म मानने वाले शिक्षक तैयार करने की कोई मज़बूत व्यवस्था आज तक नहीं बन पाई।

अध्यापक बनने के लिए जिन रास्तों का इस्तेमाल होता है, उनमें सब से पहले वे सरकारी संस्थान आते हैं जो दशकों पूर्व बनाए गए घिसेपिटे पाठ्यक्रमों के अनुसार शिक्षक बनाते हैं। इसके बाद वे संस्थान आते हैं जो केवल पैसा लेकर बिना कोई ट्रेनिंग दिए पढ़ाने की डिग्री देते हैं जिसे दुर्भाग्य से सरकारी मान्यता भी मिली हुई होती है। तीसरे क्रम में वे लोग आते हैं जो अपने रसूख, दबदबे और पहुंच के बल पर बिना किसी व्यावसायिक शिक्षा के टीचर की नौकरी पा जाते हैं। इसके बाद वे लोग अध्यापक बन जाते हैं जिन्हें कोई दूसरी नौकरी नहीं मिलती और वे पढ़ाने का काम  दुकान चलाने की तरह करते हैं। चैथे क्रम में वे लोग हैं जो शिक्षा की दुकान खोलकर लोगों को भ्रमित करने के लिए चांसलर, प्रोफेसर, डीन जैसे पद बिना किसी योग्यता के स्वयं ग्रहण कर लेते हैं। ये लोग शिक्षा को सेवा का साधन न मानकर केवल मेवा प्राप्त करने का ज़रिया मानते हैं।

सिस्टम को तोड़ना ज़रूरी

शिक्षक तैयार करने के वर्तमान दोषपूर्ण सिस्टम को तोड़े बिना नई शिक्षा नीति पर सुचारू रूप से अमल कर पाना नितांत असंभव है। सन 2025 तक ऐसे लोग तैयार करने का लक्ष्य पूरा होना नामुमकिन है जिनके लिए रिसर्च और नॉलेज ही शिक्षक बनने की पहली सीढ़ी है। नेशनल रिसर्च फाउंडेशन का गठन इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है लेकिन इसकी सफलता तब ही संभव है जब इसका संचालन करने वाले इस योग्य हों कि वे विद्यार्थियों की जिज्ञासा को शांत कर सकें।

शिक्षा नीति के मुताबिक शिक्षक तैयार करने के लिए जब तक रिश्वतखोरी, भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगेगी तब तक न तो शिक्षक के प्रति सम्मान लोगों के मन में होगा और न ही गुरु और शिष्य की पवित्र परंपरा बन पाएगी। हालांकि शिक्षा नीति में व्यावसाय, कृषि, विधि, स्वास्थ्य, तकनीकी शिक्षा से लेकर प्रौढ़ शिक्षा तक का खाका खींचा गया है लेकिन इस सवाल का कहीं जवाब नहीं दिया गया है कि इन विषयों को पढ़ाने वाले शिक्षक कैसे और कहां तैयार होंगे ? उनके अंदर विद्यार्थियों तथा स्वयं अपना सम्मान अर्जित करने की इच्छा कितनी होगी और वह ज्ञान देने के लिए स्वयं ज्ञानी कैसे हो पाएंगे ?

पारदर्शी सिस्टम बनाया जाना आवश्यक है ताकि क्वालिटी एजुकेशन का महत्व भविष्य के शिक्षक समझ पाएं और अपने विद्यार्थियों में ऐसे गुण भर सकें जिनसे वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें, निराशा के स्थान पर आत्मविश्वास से भरे रहें और किसी भी हालत में अनैतिक कार्यों से दूर रहें। जिस दिन ऐसे शिक्षक तैयार होने शुरू हो जाएंगे तो समझिए कि भारत को विश्व का सिरमौर बनने से कोई नहीं रोक सकता।