शुक्रवार, 29 मई 2020

चलो गांव की ओर को सार्थक करने का समय











जब यह तय हो ही गया है कि कोविड महामारी के साथ तब तक जीना होगा जब तक इसका कोई उपचार नहीं निकल जाता तो फिर अपनी जीवन शैली और रहना सहना बदल लेने में क्या हर्ज है, बजाय इसके कि बीमारी से पहले जिस तरह जीते थे, उसे याद कर अपना मन दुखी किया जाए।

सरकार ने इस बीमारी के दौरान बहुत से राहत पैकेज ऑफर किए हैं जो एक तरह से उन वायदों को पूरा करने की ओर पहला कदम है जो इस साल बजट में किए गए थे । इसलिए यह समझना कि ये पैकेज इस बीमारी से उपजी समस्याओं का कोई निराकरण है तो यह गलतफमियों को अपने साथ लेकर चलने जैसा होगा।

कृषि और ग्रामीण उद्योग

जिन क्षेत्रों में राहत पैकेज की घोषणा की गई है उनमें प्रमुख रूप से कृषि तथा छोटे और मझौले उद्यमियों को विशेष लाभ पहुंचाना है, बशर्ते इन योजनाओं को लागू करने के लिए  सरकारी विभाग, संस्थान और विशेष रूप से बैंक सहयोग करें जो केवल तब ही हो सकता है जब सरकार अपने डंडे यानी दंड का इस्तेमाल करने मै कोताही न करे और लाभार्थी अपने अधिकार के छीने जाने की कोशिश को नाकामयाब कर दें और इसके लिए आवेदन, शिकायत, धरना, प्रदर्शन या जो भी विधिसम्मत तरीका हो उसे अपनाएं।

सरकार ने बजट में कृषि और कृषकों की उन्नति के लिए जो प्रावधान किए थे, उनमें किसानों को अपनी उपज के निर्यात का लक्ष्य बनाकर काम करना, खेतीबाड़ी में नए औजार, तकनीक और कृषि टेक्नोलॉजी का भरपूर इस्तेमाल तथा सिंचाई के लिए पानी की एहतियात बरतने के उपाय, पशुपालन, डेयरी उद्योग तथा मत्स्य पालन को आमदनी का प्रमुख स्रोत बनाना था।


इन सब घोषणाओं का एक ही मकसद था कि जब तक किसान का परंपरागत खेती से ध्यान हटाकर उसे खेतीबाड़ी से जुड़ी  गैर कृषि गतिविधियों से नहीं जोड़ा जाएगा तब तक किसान की आय को 2022-23 तक दुगुना करने के वायदे को पूरा करना असम्भव है।

एक तीर अनेक निशाने

जहां तक इस महामारी का संबंध है तो इसे एक ऐसे मौके की तरह सरकार ने इस्तेमाल किया है जिससे वो एक तीर से कई निशाने लगा सकती है।

सबसे पहले तो विपक्ष खास तौर से कांग्रेस के इस मंसूबे पर पानी फिर गया कि उसकी यह बात कि गरीबों, किसानों के खातों में पहले 7500 और अब दस हजार रुपए डालने की बात अगर सरकार मान लेती है तो उसका खजाना इस एक ही झटके से काफी हद तक खाली हो जाएगा और तब सरकार के प्रति जनता का अविश्वास बढ़ाना आसान हो जाएगा।

दूसरा निशाना यह लगा कि जब शहरों में इस महामारी ने काम धंधे चैपट कर दिए हैं तो लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों में लौटने और वहां या तो अपनी जमीन में खेतीबाड़ी करने और अगर जमीन नहीं है तो कोई गैर कृषि उद्योग शुरू कर दें जिसके लिए सरकार ने बैंकों से यहां तक कह दिया है कि वे उसे भी ऋण दें जिसकी चुकाने की हैसियत न हो, मतलब बिना किसी गारंटी के पैसा दें और अगर वह आगे चलकर सभी सुविधाओं का लाभ उठाने के बाद भी कर्जा नहीं उतार पाता है तो सरकार उसकी भरपाई करेगी।

यह जो अब बीमारी के दौरान मजदूरों का शहरों से मोहभंग होने के कारण पलायन हुआ है, भाजपा शासित सरकारों ने उन्हें अपने ही प्रदेशों में रोक रखने के लिए प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया है। गैर भाजपा सरकारों के लिए भी यह सुनहरा अवसर है कि वे अपने प्रदेशों में अपने लोगों के वापिस लौटने के बाद उन्हें अपने यहां रोके रखने के उपाय करें और उन्हें इतनी सहूलियत प्रदान कर दें कि वे शहरों की तरफ रोजी रोटी कमाने के लिए अपना रुख न करें।

तीसरा निशाना यह लगा कि अब जिन लोगों ने ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी जमीन की दुर्दशा की हुई थी, वे सभी और जिन्होंने किसी भी लालच जैसे कि अधिग्रहण होने पर मुआवजा लेने या कभी वहां कोई रोजगार शुरू करने की संभावना की उम्मीद  में आकर गांव देहात में जमीन खरीद ली थी, वे भी अब उस जमीन पर अब खेतीबाड़ी करने या खेती से जुड़ा कोई उद्योग जैसे प्रोसेसिंग यूनिट, वेयरहाउस, पोलिफार्म, अनाज का गोदाम  या ऐसा ही कुछ खोल सकते हैं।

अगर यह सब करने में रुचि नहीं है और जमीन का इस्तेमाल भी करना है तो इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता कि वहां पशुपालन, डेयरी फार्म या मत्स्य पालन शुरू कर दें। और अगर कुछ न कर सकें तो ऐसी दुकान, सर्विस सेंटर खोल लें जो किसानों और दूसरे उद्यमियों को वाजिब दाम पर आधुनिक यंत्र और टेक्नोलॉजी से लेकर उन्हें अपनी जरूरत की सलाह दे सकें।

यह भी एक व्यवसाय ही होगा कि शिक्षित युवा इस तरह के सम्मेलन, आयोजन या सर्वेक्षण जैसे काम कर सकते हैं जिनमें  बैंकों के अधिकारी, कृषि वैज्ञानिक या सरकारी अधिकारी गांव वालों का मार्गदर्शन करने के लिए बुलाए जा सकते हों।

ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इस जानकारी का अभाव रहता है कि सिंचाई, फसल, बीज, मंडी तथा बाजार से संबंधित सवालों के जवाब किसके पास होंगे। अगर कोई युवा इन प्रश्नों के उत्तर देने का ही काम शुरू कर दे तो यह अपने आप में ही अच्छा खासा उद्यम है। अभी भी इंटरनेट सामान्य ग्रामवासी की समझ में कम ही आता है, अगर कोई युवा इसे ही समझाने का कार्यालय खोल ले और साथ ही ग्रामवासियों को चाहे उत्पादन से संबंधित जानकारी हो या फिर किसी योजना से लेकर कानून तक की जानकारी देनी हो तो उससे ही उसकी कमाई हो सकती है।

ऐसा नहीं है कि पहले इन सब चीजों की जरूरत नहीं थी लेकिन तब इनकी आवश्यकता  नहीं थी क्योंकि इनका उपयोग करने वाले गिने चुने थे लेकिन अब स्थिति विपरीत है। अब जरूरतमंद भी हैं और इंटरनेट तथा मोबाइल टेक्नोलॉजी भी बहुत आसान, बेहतर और सस्ती हो गई है।

सरकार ने यह जो एमएसएमई की परिभाषा बदली है तो यह कदम देर से ही सही लेकिन दुरुस्त है। इसमें सर्विस यानी सेवा प्रदाताओं को भी शामिल कर एक सही और सार्थक कदम उठाया गया है जिसके अच्छे नतीजे निकलेंगे, बशर्ते कि इनका रुख केवल शहरों की ओर न हो बल्कि गांव की ओर भी हो।

मुजतबा हुसैन

जब कोई ऐसा लेख, खाका या निबंध पढ़ने को मिले जिसे पढ़ते पढ़ते मन में गुदगुदी और चेहरे पर मुस्कान दिखाई देने लगे तो इसे लिखने वाले की खूबी कहा जाएगा। ऐसे ही एक लेखक, व्यंग्य विधा में कमाल के व्यंग्यकार और हास्य को फूहड़पन के बजाय शालीनता से प्रस्तुत कर सकने में महारत रखने वाले जनाब मुजतबा हुसैन अब हमारे बीच नहीं हैं। वे हालांकि उर्दू में लिखते थे लेकिन हिंदी में भी बेहद लोकप्रिय थे।
देश के मूर्धन्य साहित्यकारों में उनका अग्रणी स्थान था और सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी नवाजा था।

लगभग 25-30 साल पहले उनसे मेरे सहपाठी, अभिन्न मित्र और आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से जुड़े शरद दत्त ने मिलवाया था और उसके बाद से  अपने बड़े भाई और मार्गदर्शक के रूप में ही उनकी छवि  हमेशा के लिए मन में अंकित हो गई। उनके लेखन से कुछ मोती निकालकर मैंने सन 2001 में अजब मिर्जा गजब मिर्जा शीर्षक से ई टी वी उर्दू के लिए 52 एपिसोड का धारावाहिक बनाया था जिसकी लोकप्रियता उन दिनों इतनी थी कि कथानक की नकल दूसरे चैनलों पर भी नजर आने लगी थी। इसी तरह उनके मार्गदर्शन में दूरदर्शन उर्दू के लिए 2013 में हंसी के हसीन लम्हे शीर्षक से 13 एपिसोड का धारावाहिक बनाया था जिसमें उनकी कहानी डायरेक्टर का कुत्ता भी शामिल थी। इसमें विभिन्न हास्य व्यंग्य के फनकारों की कहानियां शामिल की गई थीं जिनका चयन करने में मुजतबा हुसैन का बहुत योगदान था।

वे जो लिखते थे, वह एक बार पढ़ने के बाद भूलता नहीं था, यही उनके लेखन की विशेषता थी। उनके निधन से इस विधा की अपूरणीय क्षति हुई है।



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भारत 

शुक्रवार, 22 मई 2020

मजदूर को भिखारी समझना मेहनतकश इंसान का अपमान और सामाजिक कलंक है











कोविड 19 की महामारी ने भारत के आम नागरिक को जहां एक ओर सेहत के मायने, पढ़ाई लिखाई की अहमियत और रोजगार न रहने और भूख लगने की मजबूरी होने पर भिखारी की तरह हाथ फैलाने की बेबसी को उजागर किया है, वहां दूसरी ओर सरकारों की उदासीनता से लेकर उनकी नीतियों की खामियां, नेताओं के ढकोसले और साधन संपन्न अर्थात पैसे वाले कारखाना मालिकों, ठेकेदारों और उद्योगपतियों की उन लोगों के दर्द को न समझकर मुंह फेर लेने की हकीकत दिखाई है। यहां तक कि उन लोगों की मानसिकता का भी पर्दाफाश किया है जो इनसे काम लेते वक्त वे उन्हें अपने परिवार का सदस्य तक कहने में कोई हिचकिचाहट महसूस नहीं करते थे और उन्हें बरगलाने से लेकर उनका शोषण तक करते रहते थे तथा सही मजदूरी तक न देने का कोई न कोई बहाना ढूंढते रहते थे।

इनकी पहचान क्या है ?

आखिर ये कौन लोग हैं, इनका जन्म किन परिस्थितियों में हुआ और कैसे इनके परिश्रम से फलने फूलने वालों के लिए ये अचानक प्रवासी मजदूर बन गए जिनका कोई संरक्षक नहीं।  कानून तक खामोश है और ये पैदल ही या जैसे तैसे किसी भी सवारी का जुगाड कर अपने उस आशियाने की तरफ लौट रहे हैं जिसे वे बरसों पहले किसी के अच्छी जिन्दगी की उम्मीद दिलाने या स्वयं ही फैसला करने पर कि शायद उनका जीवन बेहतर हो जाएगा, छोड़ आए थे। लेकिन वहां उनके लिए कुछ करने को बचा भी है या नहीं और क्या उन्हें वहां स्वीकार किया जाएगा या वे वास्तविकता को मंजूर करेंगे, कहना न केवल कठिन है बल्कि हृदय विदारक भी है।

श्रमिक कानूनों का खोखलापन

आजादी मिलने की प्रक्रिया के दौरान ही हमारे देश में आज जो भी मजदूरों, कामगारों को लेकर कानून दिखाई पड़ते है, उनके बनने की शुरुआत हो चुकी थी। इसका मतलब यह है कि सरकार से लेकर मिल मालिकों, उद्योगपतियों तक को यह पता था कि इन लोगों को किसी भी तरह अपने पास रखना न केवल असलियत है बल्कि यदि इनका ख्याल न रखा तो ये अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा।

इसी के साथ सच यह भी था कि सरकार और देश के सभी संसाधनों पर इनका कब्जा था और ये ऐसे कानून बनवाने में सफल हो गए जिससे सरकार भी खुश हो जाए और इनके लिए काम करने वाले मजदूर भी अपने मालिकों के एहसानमंद हो जाएं।

ये अमीर लोग और सरकार इन मेहनतकश, ईमानदार और वफादारी को अपना ईमान मानने वालों को दो टुकड़ों में बांटने में कामयाब हो गए जिन्हें हम संगठित और असंगठित क्षेत्र के नाम से जानते हैं।

यह कैसा भेदभाव ?

इसका मतलब यह हुआ कि सरकार और उसके उद्यमों में काम करने वाले, बैंकों और निजी क्षेत्र के बड़े उद्योगों के कामगार और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चलने वाले व्यापार के लिए बनाई गई कंपनियों के कर्मचारी तो सभी प्रकार से कानून की सुरक्षा के दायरे में आ गए जो केवल लगभग एक चैथाई थे लेकिन बाकी बचे लोग असंगठित क्षेत्र के मान लिए गए जिनमें दिहाड़ी मजदूर, ठेके पर काम करने वाले, निजी दफ्तरों के बाबू, चपरासी, सफाईकर्मी, ड्राइवर, घरेलू नौकर, रसोइए, प्लम्बर, इलेक्ट्रीशियन, कुली, माल ढोने वाले, दुकानों के सेल्समैन, छोटा मोटा कोई भी काम धंधा जैसे सब्जी या किराने का ठेला लगाने वाले और इसी तरह के काम जिन्हें अक्सर छोटा या मामूली समझा जाता है, उन्हें करने वाले कुल श्रमिक आबादी के तीन चैथाई लोग थे।

इनके लिए छुट्टी का मतलब वेतन न मिलना, बीमार होने पर भी या तो ड्यूटी पर जाना वरना दिहाड़ी कटना और किसी भी तरह की कानूनी सुरक्षा न होना है। मजे की बात यह है कि ये ही लोग नोटबंदी के दौरान अपने मालिकों को नए नोट लाकर देते रहे, उनके सभी गैर कानूनी कामों के जानकार होने पर भी मुंह बंद किए रहे और यहां तक वफादारी निभाते रहे कि मालिक के गंभीर अपराधों तक को अपने सिर लेते रहे और वक््त पड़ने पर इन्हें ही सबसे अधिक पीड़ा का शिकार होना पड़ा।

शर्मनाक अमानवीयता

विडम्बना यह है कि चाहे औद्योगिक मंदी का दौर हो या आज की तरह महामारी का सामना हो, सबसे पहले वेतन में कटौती से लेकर छटनी तक इन्हीं लोगों की होती है।

यह न केवल किसी भी सरकार और समाज के लिए लज्जा की बात है बल्कि शर्मनाक भी है कि इन परिश्रमी और खुद्दार लोगों को इस आपदा के समय दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज होना पड़ा, लाइन में लगकर दाल रोटी लेनी पड़ी और जब सब्र का बांध टूट गया तो अपना डोली डंडा, कनस्तर, बिस्तर उठाकर पैदल ही सैकड़ों हजारों मील अपने उस घर की तरफ निकल पड़े जिसे बरसों पहले वीरान कर आए थे।
अभी तो क्या, आजादी से लेकर आज तक किसी भी प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, श्रम मंत्री और मुख्यमंत्री, राज्यपाल से लेकर राष्ट्रपति ने असंगठित क्षेत्र की इतनी विशाल आबादी के लिए न तो कोई कानून बनाने की पहल की और न ही श्रमिक मजदूरों की नेतागिरी के बल पर अपनी रोटियां सेंकने वाले नेताओं ने कोई ऐसा आंदोलन किया जिससे इन्हें अपनी नौकरी, रोजगार या व्यवसाय की कानूनन सुरक्षा मिल सके।

अकेलेपन का एहसास

जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि ये लोग असंगठित हैं अर्थात लड़ाई में अकेले हैं और इस कहावत को सिद्ध करते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता तो फिर क्या सरकार का यह कर्तव्य नहीं हो जाता कि इनके लिए इस तरह के कानून बनाए और प्रशासन तथा व्यवस्था को उनके लागू करने के लिए तैयार करे जिससे किसी भी मुसीबत, प्राकृतिक आपदा और महामारी के समय उनका मान सम्मान और जीवन सुरक्षित रह सके।

किसी भी समाजसेवक, नेता और यूनियन लीडर के लिए वर्तमान समय से बेहतर और कौन सा वक््त आएगा जिसमें वे अपनी नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन कर सकें और इस विशाल आबादी की भलाई के लिए सरकारी हो या निजी क्षेत्र, सब को इस वर्ग की कभी भी अपेक्षा न करने के लिए न केवल कानूनन मजबूर कर सकें बल्कि इनकी कीमत का अंदाजा भी करा दें कि अगर इनके साथ कोई छेड़छाड़ या अमानवीय हरकत हुई तो उसकी जिम्मेदारी तथाकथित सभ्य और संपन्न समाज की होगी और जिसका खामियाजा और दंड उन्हें ही भुगतना होगा।

यह कोई मजदूर, वर्ग या सर्वहारा आंदोलन नहीं होगा बल्कि मानवीयता का संरक्षण और मनुष्य के जीने के अधिकार का ही प्रतिपादन होगा जिसमें सब के साथ न्याय और समानता के सिद्धांत पर चलने का संकल्प होगा।


भारत 

शुक्रवार, 15 मई 2020

ऊंघती सरकार, जागती जनता और महामारी का हाहाकार










यह सत्य कि समय पर न्याय न मिलना अन्याय का ही दूसरा रूप है, इसी प्रकार जब घोर संकट हो और राजा अर्थात सरकार समय पर मदद न करे तो वह उसके अकर्मण्य होने का ही सबूत है। यह वैसा ही है जैसा कि एक मरणासन्न व्यक्ति के मुंह पर घी लगते ही वह प्राण त्याग दे और कहा जाए कि हम तो उसे पौष्टिक भोजन दे रहे थे, फिर भी उसकी मृत्यु हो गई तो इसमें हमारा क्या दोष? कुछ ऐसा ही हमारी सरकार महामारी के दौर में अपना रवैया दिखा रही है।


सरकारी लापरवाही की सजा

जब इस बीमारी का शुरुआती दौर था तो प्रशासन ने हल्के में लिया और जब इसने सुरसा की तरह अपना आकार बढ़ाना शुरू किया तो, बिना यह सोचे कि जिस देश का इतिहास रोटी रोजी, शिक्षा और किराए के घरों में रहने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों में पलायन का रहा हो, वहां इतनी बड़ी आबादी के खाने पीने की व्यवस्था और उनके अपने मूल स्थान पर लौटने का उचित प्रबंध किए बिना तालाबंदी कर दी जाए, उसका परिणाम भयावह होना ही था।

सरकार इतनी भोली तो न थी कि यह न जानती हो कि इस बीमारी को बढ़ने से रोका तो जा सकता है लेकिन निकट भविष्य में इसका अंत असंभव है, मतलब यह कि इसे साथ लेकर ही जीना होगा तो फिर आधे अधूरे उपाय करना किसी प्रकार से तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता।

सम्पूर्ण तालाबंदी करते समय ही यदि शहरों और महानगरों से अपने जन्मस्थान या घर जाने की मजबूरी को समझकर यदि इन लाखों लोगों को सुरक्षित तरीके और स्वास्थ्य की जांच पड़ताल और बीमारी से बचाते हुए उन्हें पहुंचाने का इंतजाम कर दिया होता तो आज यह दृश्य देखने को न मिलते जिसमें लोग पैदल या जो भी सवारी मिले, अपने बीबी बच्चों के साथ लौटते दिखाई दे रहे हैं।

सरकार यह समझने में भी चूक गई कि शहरों में रहने वाले प्रवासियों का राशन कार्ड, जनधन खाता और स्थाई पता उनके गांव देहात का ही है और अधिकतर लोगों का परिवार वहीं रहता है इसलिए जब उन्हें मजदूरी मिलना बंद हो गया, घरों, दफ्तरों, कारखानों में नौकरी न रही, वेतन न मिलने से भुखमरी की नौबत आने लगी और इन मेहनतकश लोगों को मुफ्त की पंगत या लंगर में भोजन अपमानजनक लगा तो जैसे भी हो, अपने घर लौटने में ही भलाई समझी।

मजदूरों और गरीबों की मदद के नाम पर उनके खातों में पांच सौ रुपए जरूर आए, मुफ्त का राशन भी मिल गया लेकिन यह उनके स्थाई पते पर मिला न कि वहां जहां वे मजदूरी और रोजगार करते थे। उनके पास अपने को जिंदा रखने के लिए लौटने के सिवाय कोई विकल्प ही नहीं था क्योंकि शहर में रहने का किराया देने और खाने पीने का खर्च जुटाने का कोई साधन नहीं था। अगर एक देश एक राशन कार्ड का नियम पहले दिन ही बना दिया होता तब भी कुछ गनीमत होती, लेकिन सरकार ने इसके बजाय उन्हें मुफ्तखोरी की शिक्षा दी जो इनके स्वाभिमान पर ठोकर मारने जैसा था।

सरकार के ऊंघते हुए और चिड़ियों के खेत चुग जाने के बाद पछतावे के तौर पर जो श्रमिक स्पेशल ट्रेन और बसों के इंतजाम अब किए गए, अगर मार्च में तालाबंदी की घोषणा के साथ कर दिए जाते तो अनजाने और बेरहम शहरों का क्रूर चेहरा इन भाग्यहीन लोगों को देखना न पड़ता। अब वे दोबारा इन शहरों का रुख करने से पहले वे सौ बार सोचेंगे।

स्वदेशी बनने का ढोल पीटना

कांग्रेस सरकार के जमाने से लेकर वर्तमान भाजपा सरकार तक समय समय पर न जाने किस नशे की पीनक में यह घोषणा की जाती रही है कि चाहे सामर्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर न हो पर देश में ही सब कुछ बनाओ और यहीं पर बनी चीजें खरीदो, अब उनकी क्वालिटी घटिया हो, स्तरहीन हो, हानिकारक हो, इससे क्या फर्क पड़ता है क्योंकि घोषणाएं करने वालों के इस्तेमाल के लिए तो यह उत्पाद होते ही नहीं है, बल्कि आम जनता के लिए होते हैं !

कुटीर उद्योग, ग्रामोद्योग, छोटे और मंझोले उद्योगों की परिभाषा और उन्हें मिलने वाली छूट और सुविधाओं की व्याख्या अब तक इतनी जटिल, दोषपूर्ण और भ्रष्टाचार को पनपने देने वाली रही है कि पढ़े लिखे, कुशल कारीगर और सीमित साधन वाले उद्यमी के लिए यह आग में अपने हाथ जलाने वाली ही सिद्ध होती है, इसलिए समझदार तो इनका लाभ लेने से कतराते ही हैं और अगर कोई सूरमा बनने की कोशिश करता भी है तो यह उसके लिए घर फूंक तमाशा देखने जैसा होता है।

मिसाल के तौर अपनी उद्यमशीलता के बल पर कोई लघु उद्योग या स्टार्ट अप खोल भले ही लिया जाए, कुछ ही समय में दम तोड़ता नजर आता है। जो सफल हुए भी हैं, उनके संचालक या तो कुंए के मेंढ़क की तरह एक दायरे में बंधकर रह गए या इस दायरे से बाहर निकलने के लिए उन्होंने विदेशों में शिक्षा प्राप्त की अथवा विकसित देशों की कार्य शैली को अपनाया। उनकी सफलता में सरकार का कोई विशेष योगदान है, यह समझना नादानी है।

अगर इतिहास से कुछ सीख मिलती हो तो एक उदाहरण पर गौर कीजिए। अठाहरवीं सदी में भारत पर अंग्रेजों का पूरी तरह कब्जा जम जाने से पहले भारत के टेक्सटाइल यानी वस्त्र उद्योग विशेषकर कॉटन और सिल्क का विश्व के चैथाई व्यापार पर कब्जा था। अंग्रेज समझ गया कि जब तक इस व्यापार की कमर नहीं तोड़ी जाएगी तब तक भारत पर राज करना असंभव है। अंग्रेजों ने कच्चा माल अपने देश में भेजना और वहां उनसे वस्त्र बनाकर महंगे दामों पर भारत में बेचने का काम शुरू कर दिया। यहीं नहीं स्वदेशी कारीगरों को अपने क्रूर व्यवहार से दाने दाने को मोहताज कर दिया और उनके आत्म सम्मान को रौंदने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

इसका परिणाम यह हुआ कि स्वदेशी आंदोलन जो स्वतंत्रता संग्राम में शुरू हुआ था और बापू गांधी द्वारा आजादी के बाद ग्रामीण इलाकों को औद्योगिक बाजारों में परिवर्तित करने की सलाह पर अमल न करने के कारण आज भी जब तब राजनीति के खिलाड़ी अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए चलाते रहते हैं।

स्वतंत्र भारत में यही हुआ है। यहां सुविधाएं न होने से पढ़े लिखे और कुशल लोगों ने विदेशों का रुख कर लिया जिसे ब्रेन ड्रेन कहा गया। यह सिलसिला थमा नहीं है, बल्कि लगातार बढ़ रहा है क्योंकि देश में कल कारखाने खोलना और तकनीक एवं विज्ञान की उपलब्धियों का लाभ उठाना सरकारी अड़चनों के कारण आसान नहीं है। सरकार को अपने गिरेबान में झांकना होगा।

इस महामारी के हाहाकार में सरकार ने इन उद्योगों की परिभाषा बदली है और सर्विस सेक्टर को भी शामिल किया है तो उससे यह उम्मीद करना कि देश के मजदूरों, कारीगरों और सरकार के भरोसे अपना उद्यम खड़ा करने के लिए शिक्षित और कौशल से संपन्न लोग आगे आएंगे तो यह मृग मरीचिका ही सिद्ध होगी।

इसकी वजह यह है कि इन घोषित सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए जरूरी प्रमाण पत्र, कागजात जुटाने और अपनी योग्यता तथा पात्रता साबित करने में ही निर्धारित समय सीमा पार हो जाएगी। इस स्थिति में इन योजनाओं की पोल खुलना शुरू होने से पहले ही बहुत से उद्यमी अपनी गांठ की पूंजी भी गवां चुके होंगे।

स्वदेशी चीजें बनाओ, स्वदेशी खरीदो और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करो, यह सब बातें अब वैश्विक बाजार और ओपन इकोनॉमी में संभव नहीं, इतनी सी बात सरकार समझ ले तो यह देश पर बहुत बड़ा उपकार होगा।

लगभग तीन महीने का मूल्यवान समय गवांए बिना अगर सरकार यह सब कदम जो देश की अर्थव्यवस्था और उसकी गति को बनाए रखने के लिए जरूरी थे, अगर तब उठा लिए जाते तो आज हालात कितने काबू में होते, यह समझना कोई रॉकेट विज्ञान नहीं, बल्कि साधारण समझदारी की बात है।

अगर कुछ करना ही है तो मुक्त व्यापार, पारदर्शी नियम और आयात निर्यात में देश और देशवासियों की सहभागिता सुनिश्चित कर दीजिए, बाकी तो जनमानस स्वयं निर्णय कर ही लेगा कि उसके हित में क्या है और क्या नहीं, मतलब यह कि सरकार अपने काम से काम रखे और उद्यमियों के रास्ते में रोड़े अटकाए बिना उन्हें वे सब सुविधाएं और आर्थिक सहायता दे जिसके वे अधिकारी हैं।

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भारत

शनिवार, 9 मई 2020

एन आर आई विवाह और लड़की की विवशता









विवाह हालांकि दो व्यक्तियों और उनके परिवारों के बीच होने वाला घनिष्ठ, प्रेममय  और सामाजिक संबंध है लेकिन फिर भी कुछ ऐसे विवाह होते हैं जो किए तो इन्हीं भावनाओं के आधार पर जाते हैं लेकिन उनका परिणाम कभी कभी बहुत दुखदाई निकलता है और विशेष रूप से लड़कियों का जीवन अक्सर नर्क की तरह हो जाता है।

ऐसी ही घटना पंजाब के एक छोटे से कस्बे से लगे एक गांव में हुई जो कहने को तो एक व्यक्ति के साथ घटी कही जा सकती  है लेकिन उसके दायरे में पूरा समाज आ जाता है। इसका जिक्र स्वयं भुक्तभोगी ने किया है और कुछ ऐसे प्रश्न उठाएं हैं  जिनका जवाब देने की जिम्मेदारी परिवार और समाज दोनों की है।

सोच बदलने की कहानी

होता यह है कि गांव की एक लड़की जो अभी कॉलेज में कृषि से संबंधित कोर्स कर रही है तथा जिसने अपनी जिन्दगी के सुनहरे सपने बुनने ही शुरू किए हैं, उसकी मर्जी के खिलाफ मातापिता शादी के लिए जोर जबरदस्ती करते हैं और एक एन आर आई लड़के से फेरे करवा देते हैं।

लड़का इस लड़की के साथ मौज मस्ती कर वापिस अमरीका चला जाता है और लड़की, इस उम्मीद में कि लड़के और उसके घरवालों के वायदे के मुताबिक अमरीका चली जाएगी, अपनी पढ़ाई पूरी करने लग जाती है।

लड़का अमरीका में ट्रक चलाता है और उसकी आमदनी उनसे भी ज्यादा है जो बड़ी बड़ी डिग्रियां लेकर वहां जाते हैं जैसे डॉक्टर, इंजिनियर, वैज्ञानिक आदि।  उन्हें  जो भी नौकरी मिले, उसका वेतन भारत से बहुत अधिक होता है, करने लगते हैं, लेकिन लेबर क्लास की आमदनी से उनका कोई मुकाबला नहीं। इसका मतलब यह भी है लेबर का  काम करने वालों को बिगड़ने में देर नहीं लगती और वे अक्सर अय्याशी, नशा, स्मगलिंग जैसे काम करने लगते हैं और वहां शादी न होने के कारण भारत में अपने पैसे के बल पर किसी भी सुन्दर, शिक्षित और आर्थिक दृष्टि से कमजोर परिवार की लड़की से शादी कर लेते हैं।

अब होता यह है कि शादी के बाद अय्याशी के लिए लड़का भारत में पत्नी के पास आता है और चला जाता है। अमरीका में भी उसे लड़कियों की कोई कमी नहीं और वह तथाकथित गोरी मेमों के साथ वक्त तो बिताता ही है, उसे ड्रग्स लेने का चस्का भी लग जाता है।

इधर लड़की का पिता अपनी बेटी की पढ़ाई और दूसरा जरूरी खर्चा भी उठाने से इंकार कर देता है और लड़का या उसके घरवाले पैसे नहीं भेजते तो लड़की को डिप्रेशन होने लगता है और  आत्महत्या करने के बारे में सोचने लगती है।

मुक्ति का रास्ता

वह एक दूसरा रास्ता खोजती है और अपनी बात अपने साथ पढ़ने वालों और अपने शुभचिंतकों तथा दोस्तों से शेयर करती है जिससे उसे काफी सहारा मिलता है और वह तनाव से बाहर आने लगती है, साथ ही अपने चारों ओर बुने गए चक्रव्यहू से बाहर निकलने की कोशिश करती है।

लड़की पढ़ी लिखी, समझदार है और अपने भविष्य के सपनों को समेटने का प्रयत्न करती है। शादी के बाद दो साल से वह अपने घर पर है। उसका मायका और ससुराल आसपास है जहां से उसे कोई मदद नहीं मिलती।

लड़के के घरवाले उसे अमरीका बुलाने को यह सोचकर राजी हो जाते हैं कि उसके आने से लड़का सुधर जाएगा और उनका वंश चलाने के लिए संतान भी हो जाएगी। लड़की भी यह सोचकर कि एक मार्ग तो मिला, जाने को तैयार हो जाती है।

अब विडम्बना यह है कि अमरीका में कानून सख्त होने के कारण लड़का और उसके घरवाले सोचते है कि अगर यह वहां आ गई और कानून को दस्तक दे दी या लड़के को तलाक देकर किसी और से शादी कर ली तो उनकी जिंदगी बर्बाद हो सकती है। इसलिए वे डर के कारण आनाकानी करने लगते हैं और यहां गांव में लड़की के घरवाले समाज के डर से कि उनकी बदनामी होगी, लड़की को न तो  तलाक लेने की कार्यवाही करने देते हैं और न ही उसका खर्चा उठाने को तैयार होते हैं।

कानून का सहारा

यहां यह बताना जरूरी है कि कुछ साल पहले इस तरह की घटनाओं को देखते हुए भारत की संसद ने कानून बनाया था कि एन आर आई से शादी को तीस दिन में रजिस्टर कराना होता है वरना लड़के का पासपोर्ट, वीजा रद्द हो सकता है और उसके लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती है।

कानून तो बन गया लेकिन सामाजिक जंजीरों के कारण इसके पालन पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता और इस तरह लड़कियों का जीवन बर्बाद होता रहता है, खास तौर से उनका जो न तो ज्यादा पढ़ी लिखी हैं और न ही उनके पास कोई हुनर है जिससे वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें।

कानून यह भी है कि यदि विदेश में कोई एन आर आई अपनी भारतीय पत्नी के साथ दुर्व्यवहार करता है तो उस देश का कानून तो अपना शिकंजा कसता ही है, साथ में भारतीय दूतावास में शिकायत करने पर पीड़ित महिला को विकसित देशों में तीन हजार और विकासशील देशों में दो हजार डॉलर की मदद मिलती है जिससे वे अपने पति और उसके घरवालों के खिलाफ कार्यवाही कर सकती है। इसके साथ ही अगर लड़का अमरीका में कोई अपराध करता है तो भारत में उसकी पत्नी उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकती है।

प्रश्न जिनका उत्तर जरूरी है

इस निर्दोष लड़की की कहानी से अनेक सवाल निकलते हैं जो हालांकि नए नहीं लेकिन आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि उनका हल तब तक नहीं हो सकता जब तक पैसे, रुतबे और शान शौकत देखकर तथा पैसों के लालच में आकर अपनी बेटी की शादी करने को लेकर समाज की सोच नहीं बदलती। जिस तरह हर पीली धातु सोना नहीं होती उसी तरह हर रिश्ते की गारंटी केवल पैसा नहीं हुआ करती।

विदेश में बसने का सपना, डॉलर में कमाई का लालच और अपने दोस्तों रिश्तेदारों के बीच अपना स्टेटस अचानक बढ़ जाने का ख्वाब न केवल गांव देहात, कस्बों, छोटे शहरों में देखा जाता है बल्कि बड़े महानगरों में निम्न वर्ग हो या मध्यम या फिर उच्च वर्ग ही क्यों न हो, समान रूप से देखा जाता है। इसमें चाहे लड़की का जीवन बर्बाद हो जाए, उसका कैरियर चैपट हो जाए, वह युवावस्था में ही बूढ़ी लगने लगे या फिर आर्थिक तंगी से परेशान होकर कोई अनैतिक काम करने लगे तो इसमें पुरुष हो या महिला, उनका भ्रम तो बना ही रहता है, जिसका टूटना उतना ही जरूरी है जितना यह कि अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया में बसना ही जीवन का उद्देश्य नहीं है। जरा सोचिए !


भारत


शनिवार, 2 मई 2020

वक्त बदलता है तो उसमें संभालने की शक्ति भी है










कहते हैं कि वक्त की धार इतनी पैनी, तेज और नुकीली होती है कि अगर किसी को इसकी मार झेलनी पड़ जाए तो जन्म जन्मांतर ही नहीं कभी कभी तो युग बीत जाने पर भी इसके घाव रिस्ते रहते हैं और जरा सी भी ठेस लगने पर उनमें असहनीय टीस या दर्द होने लगता है। इसीलिए कहते हैं कि वक्त से डर कर रहना चाहिए और इसके साथ ही समय सबसे बड़ा शिक्षक या गुरु भी है जिसका पढ़ाया पाठ जीवन भर याद रहता है।


 अंधेरे के बाद उजाले का नियम



दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप के अनेक देश बर्बाद हो गए थे और वे फिर से अपने पुराने गौरव को पाने में लगे थे। उन्हीं में से एक जर्मनी भी था जो दिन रात वैज्ञानिक और औद्योगिक उपलब्धियों को हासिल करने में जुटा था।

वहां कर्मचारियों के पास इतना काम रहता था कि उनके घर के काम अक्सर छूट जाते थे जिन्हें करने के लिए वे अपने दफ्तर या कारखाने से किसी न किसी बहाने गायब हो जाते थे। सरकार का जब इस ओर ध्यान गया और उत्पादन में कमी के नए आंकड़े आने लगे तो उसने यह आदेश दिया कि कोई भी कर्मचारी अपने काम पर अपनी शिफ्ट पूरी करने के लिए कभी भी आ और जा सकता है लेकिन उसे केवल कुछ घंटे जैसे कि दो से चार घंटों तक एक निश्चित समय पर अपने कार्यालय या कारखाने में रहना होगा और बाकी की शिफ्ट वह जब चाहे तब पूरी कर सकता है।

इसका असर यह हुआ कि कर्मचारियों द्वारा किए जाने वाले उत्पादन में  न केवल भारी बढ़ौतरी हो गई बल्कि वे पहले से ज्यादा खुश भी रहने लगे जिसकी वजह यह थी कि उन्हें घर के जरूरी काम करने की कोई टेंशन नहीं थी क्योंकि इसके लिए उनके पास उनकी मर्जी के मुताबिक पूरा वक्त था।

यह सत्य घटना इसलिए विचार करने योग्य हो जाती है क्योंकि आज एक लाइलाज बीमारी से लडने में हम इतना पस्त होते जा रहे हैं कि हर समय अगले पल की चिंता के साथ साथ नौकरी, व्यवसाय, रोजगार, आमदनी, बचत और पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने में शुरू हो चुकी मुसीबतों का सामना भी करना पड़ रहा है।




बीमारी का तो अंत हो ही जायेगा लेकिन इसका जो दूरगामी असर पड़ने वाला है वह लोगों को भीख और गरीबी के दलदल में डालने के साथ सामूहिक विरोध, आंदोलन से लेकर आत्महत्या तक ले जा सकता है।

बचाव के रास्ते

आज से लगभग सौ साल पहले और पिछले दस बीस सालों में भी अनेक ऐसी बीमारियों का सामना समाज को विश्व स्तर पर करना पड़ा है जो एकबार आ गईं तो फिर कभी गई नहीं, हालांकि उनका इलाज करने में हमें सफलता भी मिली और उनसे बचने के उपाय भी खोज लिए गए।

उदाहरण के लिए 1980 के दशक में एड्स रोग जब आया तो उसका कोई इलाज आज तक नहीं निकाल पाया तो लोगों ने उससे बचाव के रास्ते अपनाने शुरू कर दिए जैसे कि कंडोम के इस्तेमाल की अनिवार्यता, सर्जरी से पहले एड्स का टेस्ट, संक्रमित खून की पहचान और रक्तदान से लेकर मरीज को खून चढ़ाने में सावधानी जैसे उपाय करने लगे।

इसलिए सब से पहले तो यह मान और समझ लेना होगा कि कोरोना की बीमारी हमेशा के लिए आई है, इसलिए इसका चाहे इलाज हो या इससे बचाव, उसके रास्ते खोजना हमारी नियति बन चुकी है। इसके अतरिक्त भविष्य में यदि फिर कोई ऐसी महामारी आती है तो उसके मुकाबले के लिए तैयारी भी अभी से करनी जरूरी है।

जब सामाजिक या शारीरिक दूरी का रास्ता अपनाने की बात की जाती है तो यह क्यों भूल जाते हैं कि देश की लगभग आधी आबादी एक ही कमरे में चार पांच से लेकर दस या उससे भी अधिक लोगों के साथ रहने के लिए मजबूर है जिसका खाना पीना, रसोई से लेकर शौच तक उसी में होता है।

शायद सरकारों की समझ में यह बात आ जाए कि जितनी भी झुग्गी झोपड़ियां या स्लम बस्तियां हैं, उनके स्थान पर वहां रहने वालों के लिए उसी जमीन पर उनके लिए बहुमंजिला इमारतों का निर्माण बिना राजनीतिक स्वार्थ को ध्यान में रखकर तुरंत किए जाने की शुरुआत करना वक्त की जरूरत है ताकि भविष्य में फिर कोई ऐसी ही बीमारी आ जाए तो हम असावधान रहने के कारण उसका शिकार न हो जाएं।

यह अब हमारी सुरक्षा जरूरतों में शामिल हो गया है कि फेस मास्क, हाथ धोना, सफाई से रहना और तपाक से मिलने के बजाय दूर से नमस्ते करना जैसे उपाय हमारी आदत बन जाएं।






कहते हैं कि कोई भी महामारी या मुसीबत हमारी अपनी ही गलतियों का नतीजा होती है। आपस के लड़ाई झगड़े हों या प्राकृतिक आपदाएं हों, इनका मूल कारण हमारा अपना व्यवहार और सोच तथा काम करने का तरीका ही होता है।

सभी तरह के प्रदूषण, वन विनाश का कारण कुदरती साधनों का अंधाधुंध शोषण ही है।


झटकों का फायदा


कुदरत का कहर हो या बीमारी से ग्रस्त होना, उनसे लगने वाला झटका एक जैसा ही होता है और उसका असर सब कुछ बर्बाद करने जैसा ही होता है।

इस बीमारी ने एक अवसर दिया है कि हम अपने काम करने के तरीकों में बदलाव करें, आने जाने के साधनों का जरूरत पड़ने पर ही इस्तेमाल करें और वैज्ञानिक सोच को अपनाते हुए नई तकनीक और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना सीखें और उसे अपनाएं।

मिसाल के तौर पर कई वर्षों से इस बात पर बहस होती थी कि स्वास्थ्य की देखभाल और बीमारियों की रोकथाम और उनकी चिकित्सा के लिए टेली मेडिसिन और टेली काउंसलिंग को अपनाया जाए और लोगों को बीमार पड़ने पर डॉक्टर से लेकर अस्पताल तक सिवाय विशेष परिस्थितियों को छोड़कर, न जाना पड़े।

अब एक झटके में ही यह बात समझ में आ गई है कि घर बैठकर भी फोन, वीडियो, इंटरनेट के जरिए डॉक्टर से इलाज करवाया जा सकता है।

इसी तरह पढ़ाई लिखाई को लेकर चाहे सामान्य शिक्षा हो या उच्च शिक्षा, अब ऑनलाइन और वर्चुअल क्लासरूम की शुरुआत भी इसी बीमारी का जोरदार झटका लगने से हो चुकी है।

घर की तालाबंदी ने जो झटका दिया है उसने लोगों को अपने घर से ही अपना काम धंधा करने और व्यवसाय चलाने से लेकर नौकरी तक करने को इतना आसान और सुविधाजनक बना दिया है कि आगे आने वाले समय में इसे एक क्रांति की तरह लिया जाय तो आश्चर्य नहीं होगा।

केवल भारी उद्योगों, कल कारखानों, ढुलाई उतराई और खेती बाड़ी के कामों में ही कारीगर और मजदूर की जरूरत रह जाने वाली है, बाकी के कर्मचारी घर से ही बैठकर काम करें, इसके लिए नए नियम और कानून बनाने की बारी अब आ ही गई है जिसे जितनी जल्दी अंजाम दिया जाएगा, उतना ही बेहतर होगा।



इसका सबसे बड़ा लाभ सवारी ढोने के वाहनों और साधनों का कम से कम इस्तेमाल करने के रूप में होगा जिससे सड़कों पर धूल कम उड़ेगी, उनके रखरखाव और निर्माण पर कम खर्च होगा। इस तरह वायु प्रदूषण कम होगा, जल प्रदूषण से बचा जा सकेगा और शोर शराबे में भी कमी आयेगी।

आज जिस तरह बिजली और पानी हमारी घरेलू जरूरतों के लिए मुहैया कराया जाता है, उसी तरह इंटरनेट भी हरेक की जरूरत बन चुका है, उसकी स्पीड और उपलब्धता को जरूरत के हिसाब से बढ़ाया जाना न केवल सरकार की प्राथमिकता बल्कि प्रत्येक उपभोक्ता के लिए भी उसका अधिक से अधिक इस्तेमाल करना जरूरी हो रहा है। अगर दुनिया में अपना स्थान या वर्चस्व बनाए रखना है तो अब उसका पैमाना किसी देश की सैन्य शक्ति न होकर संवाद और  संचार साधनों का इस्तेमाल करने की योग्यता होना होगा।

कहावत है कि चिंता चिता के समान होती है जो अगर शरीर या व्यवसाय को लेकर लग जाए तो मनुष्य के खोखला होने में देर नहीं लगती लेकिन अगर यही चिंता एक स्वस्थ चिंतन का रूप धारण कर ले तो उसके परिणाम सुख देने वाले ही नहीं, चमत्कारी भी होते हैं। आज हम एक व्यक्ति, समाज और देश के रूप में जिस मोड़ पर खड़े हैं, उसमें एक ओर नव निर्माण की संभावनाएं हैं तो दूसरी ओर विनाश की खाई है। अब यह हम पर है कि हम किसे अपनाते हैं।

सलाम ...जांबाज सेनानी
कोरोना की इस दहशत में, 
अब हम हैं बंद दरवाजों में,
वे खुले आसमां के नीचे,
बिना किसी दीवारों के।

सड़कों के बैरियर पर ड्यूटी, 

भरी दोपहरी धूप के नीचे,
आंधी या तूफां आए,
बारिश की बूंदों से भीगें।
डटें रहें अपने मकसद पर
ये जाबांज सेनानी।

घर-घर जाकर जांच ये करते,

पीड़ित को सैन्टर पहुंचाते,
गली कूचों में गश्त लगाते,
खुद से पहले हमें बचाते,
हम सब तुम्हें सलाम बजात
ओ जांबाज सेनानी
सलाम, जांबाज सेनानी
यह ओजस्वी पंक्तियां इस स्तंभ की नियमित पाठिका रीना वाधवा ने भेजी हैं। 



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