शुक्रवार, 20 मई 2022

धर्म, धार्मिक स्थल और आस्था के बीच संघर्ष बेबुनियाद और काल्पनिक है

 

धर्म वही जो जन्म से मिले या मन को अच्छा लगे और उसे मानने, पूजने से चित्त शांत हो, दूसरों के प्रति कटुता और कड़वाहट न हो। 

यह एक आदर्श स्थिति हो सकती है लेकिन यदि वह लड़ाई झगडे, बहस और विवाद से लेकर जीने मरने का कारण बन जाए और उसके लिए नफरत, मारपीट, हिंसा होने लगे तो समझना चाहिए कि इस तरह का वातावरण तैयार करने में किसी का निजी स्वार्थ है, अपने को बेहतर सिद्ध कर दूसरे को नीचा दिखाकर अपना उल्लू सीधा करने की साजिश है !

धार्मिक आस्था
जब धर्म है तो उसके प्रति आस्था और विश्वास होना भी अनिवार्य है। इसी तरह अपने धर्म के लिए बनी पूजा का विधि विधान भी है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भिन्न भिन्न स्थानों पर यह अलग अलग है क्योंकि इसमें स्थानीय भाषा, परंपरा, रीति रिवाज और तौर तरीके मिल जाते हैं।

यही कारण है कि पूजा के लिए कहीं मानवीय आकृति दिखाई देती है तो कहीं कोई शिलाखंड ही पूजा जाने लगता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ईश्वर का कोई रूप नहीं, वह निराकार है और साधक या पूजा करने वाले के मन में अपने आराध्य की बनी छवि के अनुसार निरंतर बदलता रहता है।

दूसरा कारण है कि जब किसी मनुष्य का आचरण, व्यवहार और उसके कार्य मन में निर्मित ईश्वर के स्वरूप के अनुसार होते दिखाई देते हैं या जिनके बारे में पढ़ा और सुना होता है तो वह हमारे लिए पूज्य हो जाता है।

राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, गुरु नानक से लेकर हजरत मुहम्मद और ईसा मसीह तक और इसी तरह विश्व के अनेक धर्मों के महापुरुष हमारे आराध्य पुरुष और इसी कड़ी में अपने शौर्य, पराक्रम से शत्रु विनाशक स्त्री पात्र हमारे लिए क्रमशः भगवान और देवी का स्वरूप बन जाते हैं।

ये हमारे आदर्श हो जाते हैं और हमें उनके कार्य अलौकिक, आश्चर्यजनक और अद्भुत लगते हैं। हम अपने मन में उनकी ऐसी छवि का निर्माण कर लेते हैं जिसके विरोध में या उसके प्रति किसी प्रकार का अनादर करने या उसकी छवि वाले धूमिल करने के किसी भी प्रयास को अपना स्वयं का अपमान समझकर उस व्यक्ति से बदला लेने से लेकर उसकी हैसियत को नेस्तनाबूद करने तक के बारे में सोचने लगते हैं। मौका मिला नहीं कि बिना सोचे समझे कोई न कोई ऐसा काम कर बैठते हैं जिसका परिणाम अच्छा या बुरा कुछ भी हो सकता है।

शासक की चाल
इतिहास गवाह हैं कि मनुष्य की इसी आस्था और उसके विश्वास को चोट पहुंचाने के उद्देश्य से शासक वर्ग ऐसे काम करता रहा है जिनका असर शताब्दियों तक कायम रहता है। वरना क्या कारण है कि किसी अन्य धर्म के पूजास्थल को तोड़कर या उसके बगल में कोई शासक अपने धर्म के प्रतीक धार्मिक स्थल का निर्माण वहीं करता।

उसके मन में दोनों धर्मों के बीच सौहार्द और भाईचारा कायम रखने की बात रही हो या फिर अपने धर्म को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ हो अथवा उसका कोई ऐसा मंसूबा रहा हो जिसका असर पीढ़ी दर पीढ़ी पड़ने वाला हो।

यह एक वास्तविकता है चाहे किसी भी धर्म के धार्मिक स्थल हों, वे या तो ऐसी जमीन पर बने होंगे जो समतल और कभी किसी भी उपयोग में न लाई गई हो अथवा ऐसे स्थान पर जहां आने जाने की सुविधाएं उपलब्ध हों, नदी आसपास हो और खाने पीने की वस्तुएं आसानी से मिल जाती हों, साथ में वहां विश्राम करने या कुछ समय रहने की व्यवस्था हो। यह वैसा ही है जैसा किसी नए शहर के निर्माण करने से पहले यह सुनिश्चित कर लिया जाता है कि वह स्थल बसाए जाने योग्य है अथवा नहीं । इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि वहां कभी कोई ढांचा रहा होगा या कुछ ऐसा बना होगा जो उस जगह के अतीत की गवाही देता हो जिसे समझकर उस स्थान के इतिहास का बोध होता हो।

विचार करने वाली बात यह है कि क्या प्राचीन काल में घटी किसी घटना की जिम्मेदारी वर्तमान समय में किसी समाज पर डाली जा सकती है ?

हमारे देश में मुगल साम्राज्य का विस्तार हमलावर मानसिकता के साथ हुआ था लेकिन जब मुगलों को लगा होगा कि अब यही हमारा वतन है तो उन्होंने हिंदुओं के साथ मेल मिलाप करने और उनके साथ रोटी बेटी का संबंध स्थापित करने तथा संघर्ष के स्थान पर मिलजुलकर रहने की बात सोची होगी। यही कारण है कि जब अंग्रेज आए तो हिंदू और मुसलमान दोनों ही ने उनका मुकाबला किया।

यह बात सोचने वाली है कि ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत में धार्मिक स्थलों से अधिक यहां ऐसे निर्माण करने को प्राथमिकता दी जो देश पर उनके शासन को अधिक सुविधाजनक बना सकें। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और दूसरे नगरों में अंग्रेजों के बनाए भवनों को देखने से यही लगता है कि उनकी प्रवृत्ति अपने धर्म का विस्तार कम और शासन करने की अधिक थी। इसके विपरीत मुस्लिम और हिंदू शासक अपने धर्म के प्रतीकों और धार्मिक स्थलों के निर्माण को प्राथमिकता देते थे। यही क्रम आज भी जारी है और प्रशासन इसी भावना का लाभ उठाते हुए नागरिकों को धर्म में उलझाकर ऐसा माहौल बनाने में सफल हो जाता है जिससे उनकी प्राथमिकताएं बदल जाएं। इससे जरूरी समस्याओं से उसका ध्यान भटकाया जा सकता है, यह एक बार नहीं अनेक बार प्रमाणित हो चुका है।

क्या कभी ऐसा भी समय आ सकता है जब सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध तथा अन्य धर्मों के प्रतीक धार्मिक स्थलों के निर्माण के बारे में यह जानकारी मिलते ही कि उनका निर्माण किसी अन्य धर्म के प्रतीक स्थल, किसी प्राचीन ढांचे के ऊपर या उसका विध्वंस करने पर हुआ है तो क्या उसकी भी खुदाई कराई जाएगी ? ऐसा समय आया तो यह वास्तव में देश के लिए और अधिक दुर्भाग्यपूर्ण होगा।


शुक्रवार, 13 मई 2022

राजद्रोह और देशद्रोह या अराजकता, स्पष्ट कानून बनने ही चाहिएं


हमारे देश में अक्सर इस तरह के हालात बनने आम हो गए हैं जिनकी व्याख्या ही विवाद पैदा कर देती है।


मिसाल के तौर पर सरकार के किसी काम का विरोध करने को देशद्रोह और देश के खिलाफ किसी साजिश दोनों को एक ही श्रेणी में डाल दिया जाना। विडंबना यह है कि समाज में दुश्मनी फैलाने, दंगा फसाद, आगजनी जैसे कामों को भी इसी खाते में दर्ज कर दिया जाता है।

असल में अंग्रेजी में इस सब के लिए एक ही शब्द है और वह है सेडिशन जिसे लेकर एक कानून उस अंग्रेज मैकाले ने बनाया था जिसने भारत में बाबू बनाने वाले शिक्षा नीति बनाई थी। हमारी राजभाषा हिंदी में इसके लिए दो अलग शब्द राजद्रोह और देशद्रोह हैं लेकिन अंग्रेजी परस्त सरकारों ने पुरानी नीति यानि सेडिशन कानून पर चलने में अपना कल्याण समझा। इसलिए जरूरी हो जाता है कि इसे विस्तार से समझा जाए।


राजद्रोह क्या है
जब राज्य हो या केंद्र की सत्तारूढ़ सरकार हो, उस के किसी काम से जनता में असंतोष हो, उसकी नीति जनविरोधी हो, सामान्य व्यक्ति के लिए जीवन के लिए आवश्यक चीजों का मिलना दूभर हो जाए, पीने का पानी गढ़े खोदकर निकालना पड़े, मीलों दूर जाना हो, साफ सफाई न हो, नालों की गंदगी ने नर्क बना दिया हो, हवा इतनी जहरीली हो कि सांस लेते ही बीमारियां घेर लें, सड़क ऊबडखाबड़ होने से दुर्घटना होना मामूली बात हो और इसी तरह की सभी चीजें जिनसे मानव जीवन प्रभावित होता हो।

कहने का मतलब यह कि एक नागरिक अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाए तो उसे सरकार के खिलाफ बोलने, लिखने, इंसाफ की गुहार लगाने और जरूरी हो जाए तो आंदोलन करने का अधिकार हो और उसे देशद्रोह या अराजक मानकर सजा देने के बजाए उसकी परेशानियों को दूर करने वाले कदम उठाए जाएं।
इस बारे में कोई स्पष्ट नीति या कानून अथवा विधिसम्मत तरीका न होने से सरकार जिसकी लाठी उसकी भैंस पर चलती है जिसे मनमानी कहा जाता है।

उदाहरण के लिए जब सरकार अतिक्रमण करने पर बुलडोजर का इस्तेमाल करती है तो उन लोगों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करती जिनकी शह पर या मिलीभगत से यह स्थिति हुई। राजद्रोह का पहला कानून यह बनना चाहिए कि जिस भी व्यक्ति, चाहे अधिकारी हो या नेता, के कार्यकाल में यह सब हुआ उस पर और अतिक्रमण करने वाले पर एक साथ दंडात्मक कार्रवाई हो।

इसी प्रकार मनुष्य के सामान्य जीवन जीने की राह में कांटे बिछाने वाले व्यक्ति के लिए कानून में स्पष्ट प्रावधान हों और किसी के भी इससे बचने की गुंजाइश न हो।

जिस दल के शासन में रिश्वत दिए बिना काम न होता हो, भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में कोताही बरती जा रही हो, कुव्यवस्था का बोलबाला हो और अस्तव्यस्त्त हालात हों, यह राजद्रोह माना जाना चाहिए और इसके लिए सत्ता में बैठे लोगों और अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया जाए और कानून इस तरह बनाए जाएं कि दिमाग में यह भय समाया रहे कि इस तरह के किसी भी आचरण जिससे अपने पद का गलत इस्तेमाल सिद्ध होता हो, सख़्त सजा का प्रावधान हो, यहां तक कि मृत्यु दण्ड भी दिया जा सकता है।

इसमें मिलावट करने वाले, जमाखोरी और कालाबाजारी करने वाले शामिल हों और उनके किसी भी गैर कानूनी काम या कानून की धाराओं में किसी प्रकार की विसंगति होने से उसका फायदा उठाने और इससे आम नागरिक का जीवन प्रभावित हो तो यह राजद्रोह के दायरे में लाया जाए।

इसी तरह धर्म और जाति, परंपरा और रीति रिवाज तथा संस्कृति और भाषा के आधार पर बंटवारा करने की नीयत से किए गए किसी भी काम को राजद्रोह माना जाए। इसके लिए कड़े फैसले लेने में यदि सरकार संकोच करती है तो उसके विरुद्ध जनमत तैयार करने को राजद्रोह के दायरे से बाहर रखा जाए।

देशद्रोह क्या है
ऐसा कोई भी काम जिससे देश की अखंडता, संप्रभुता और राष्ट्र के गौरव पर चोट लगती हो, वे सब देशद्रोह माना जाए। इसमें भारत से अलग होने की मांग या उसे तोड़ने के प्रयास अथवा विदेशी भूमि से देश को चुनौती देने और भारतीय नागरिकों की एकता को खंडित करने वाले किसी भी काम को इसके दायरे में रखा जाए।

इसी तरह देश का धन, संपत्ति और संसाधन किसी अन्य देश को सौंपने या ले जाने की साजिश हो या कोशिश, यह देशद्रोह है। इसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति और उसकी मदद करने वाले दोनों ही पर देशद्रोह कानून के अंतर्गत कार्यवाही हो। इसमें किसी व्यक्ति का रुतबा, ताकत या उसके छल कपट से अर्जित सम्मान या धन दौलत को जब्त किए जाने का प्रावधान हो।

आधुनिक काल में मीडिया की भूमिका में टेक्नोलॉजी का महत्व बहुत बढ़ रहा है, इसका दुरुपयोग भी राष्ट्रद्रोह है। इस तरह की संभावनाओं को रोकने के लिए कानून में स्पष्ट धाराएं हों और जिस किसी पर भी देशद्रोह का आरोप लगाकर उसके खिलाफ कार्रवाई करने पर रोक लगाने की धारा हो, जब तक कि यह साबित न हो जाए। केवल संदेह और कानून की आड़ लेकर डराने धमकाने से लेकर गिरफ्तारी तक करने को देशद्रोह माना जाए और ऐसा करने वाले पर सख्त कार्रवाई हो।

देशद्रोह यह नहीं है कि किसी धार्मिक स्थल की असलीयत को चुनौती देने वाले के खिलाफ यह कानून लागू करने की छूट मिल जाए। राज सत्ता और धर्म सत्ता दो अलग अलग विचार धाराएं हैं। इन दोनों को मिलाने से ही ज्यादातर दंगे हुए हैं। यह किसी भी भारतीय के अस्तित्व को चुनौती देने के समान हैं और यही विवाद का कारण बनती है। यदि कोई व्यक्ति धर्म और राजनीति की मिलावट कर समाज में द्वेष और शत्रुता का वातावरण बनाता है तो यह देशद्रोह है।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि फिर अराजकता क्या है तो इसकी भी व्याख्या राजद्रोह और देशद्रोह दोनों ही कानूनों में होनी चाहिए।

एक सवाल यह भी है कि क्या चुनाव के समय अपना वोट न डालना भी एक अपराध है ?  जी हां, यह अपराध है क्योंकि इससे एक सही सरकार बनने में रुकावट आती है। इसके साथ यह भी सच है कि प्रत्येक वोटर के लिए वोट डालना कई बार संभव नहीं होता जैसे कि वोटर सूची में नाम दर्ज न होना, वोटर कार्ड की मान्यता वोट डालने के लिए न होना अथवा वोटर के निर्धारित तिथि पर अपने क्षेत्र में न होना।

ऐसी स्थिति में यह उस विभाग, अधिकारी या प्रशासन द्वारा किया गया देशद्रोह है जिसके कारण कोई वोटर अपना वोट डालने से वंचित रह गया। सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह सुनिश्चित करे कोई भी वोटर जहां भी हो, अपनी पहचान के आधार पर कहीं से भी अपना वोट डालने के अधिकार का इस्तेमाल कर सके। अब क्योंकि मतदान करते समय नोटा बटन दबाकर भी वोट दिया जा सकता है तो यह प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है कि वह उसका इस्तेमाल करे और फिर भी न करे तो यह भी देशद्रोह है।

सरकार क्योंकि अब देशद्रोह कानून को लेकर फिर से एक कवायद करने जा रही है तो बेहतर होगा कि इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर लोगों की राय सार्वजनिक तौर पर ली जाए और गंभीर चर्चा चाहे वह सदन में हो या बाहर, की जाय और तब ही कोई निर्णय हो। जिस तरह देश में संविधान समिति बनी थी उसी तरह की व्यवस्था राजद्रोह और देशद्रोह कानून बनाने में की जाए।

किसी एक व्यक्ति या राजनीतिक दल, चाहे वह कितना भी पुराना या विशाल हो, की सोच, विचारधारा या धारणा के आधार पर यह कानून नहीं बनाया जा सकता, यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाए, उतना ही बेहतर होगा।


शनिवार, 7 मई 2022

कुरीतियों और परंपराओं का बोझ ढोते रहना कतई ज़रूरी नहीं है

 

अख़बार में एक खबर पढ़कर मन तो विचलित हुआ ही, साथ में एक तरह की निराशा, अवसाद और झुंझलाहट भी हुई कि क्या वास्तव में हम आधुनिक युग में जी रहे हैं जिसमें विज्ञान और टेक्नोलॉजी का बोलबाला है, ढोंग, अंधविश्वास को मान्यता न दी जाती हो और मनुष्यता को अहमियत दी जाती हो।

कथनी और करनी

खबर यह थी कि अल्मोड़ा जिले में एक अच्छी खासी नौकरी कर रहे सत्ताईस साल के युवक को अपनी बारात निकालने से रोक दिया गया जिसमें लगभग पचास बाराती थे।

लड़का दूल्हा बनकर घोड़ी पर सवार था। तब ही अपने को तथाकथित ऊंची जाति का बताने वाला एक समूह जिसमें महिलाएं अधिक थीं, दूल्हे को नीचे उतरने का हुक्म इस धमकी के साथ देता है कि यदि वह घोड़ी पर चढ़कर गया तो उसका और सभी बारातियों का वही हश्र होगा जो कुछ वर्ष पहले पास के ही एक गांव में हुआ था। उस समय घटी यह घटना बहुत ही ह्रदय विदारक थी और काफी चर्चित भी हुई थी। इसमें चैदह लोगों की लिंचिंग हुई थी, जिनमें से पांच को जिंदा जला दिया गया था।

इन दोनों घटनाओं में एक बात समान थी कि दूल्हे और बाराती दलित समाज के थे। वर्तमान घटना में दूल्हे के कुछ दोस्त जो दलित समुदाय के नहीं थे, इस तरह विवाह में अड़चन डाले जाने के खिलाफ़ थे। वर के पिता ने तय किया कि अब यह सहन नहीं होगा और अल्मोड़ा के डीएम और एससीएसटी कमीशन में शिकायत की। पुलिस आई और पांच स्त्रियों और एक पुरुष के विरुद्ध एफआईआर दर्ज़ की। ज़िला प्रशासन की एक टीम ने आकर इस घटना के बारे में अधिक विवरण जुटाए और आश्वासन दिया कि यदि सरकार से आदेश मिला तो पीड़ित पक्ष को पुलिस सुरक्षा प्रदान की जाएगी।

उल्लेखनीय यह है कि पहली घटना बीस साल से ज्यादा पहले हुई थी और दूसरी अब हुई है, मतलब यह कि इतने वर्ष बीत जाने पर भी उच्च जाति और निम्न जाति के बीच खाई पैदा करने वाली सोच में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

इसका क्या कारण है ?  केवल कानून से इसका हल न निकला है, न निकलेगा, दण्ड देना बेकार साबित हुआ, शिक्षित होना भी काम न आया बल्कि समाज में एक प्रकार का डर बढ़ गया कि जिन लोगों को कानूनी संरक्षण मिला है, अगर वह न रहा तो क्या सामाजिक व्यवस्था में यह दोनों वर्ग एक दूसरे के साथ सामान्य रूप से एक ही छत के नीचे रह पाएंगे?

दोष कहां है ?

चलिए इस बात पर गौर करते हैं कि समाज में कुरीतियां कैसे पनपती हैं, गलत परंपराएं किस प्रकार पड़ती हैं और किसी का सामान्य व्यवहार क्योंकर दूसरों के लिए आपत्तिजनक ही नहीं, असहनीय भी हो जाता है।

इन दिनों देश के अनेक स्थानों से हनुमान चालीसा का पाठ करने बनाम मस्जिदों में लाउडस्पीकरों से अज़ान का मुद्दा जोरशोर से चर्चा में है।  यह पूजा, प्रार्थना, अर्चना या इबादत करने का एक तरीका भर न रहकर धार्मिक संघर्ष से लेकर दुश्मनी मोल लेने का साधन और कुछ लोगों की मतलबपरस्ती यानि अपनी स्वार्थसिद्धि का मौका बन गया है।

ज़रा सोचिए कि क्या यह व्यापक स्तर पर अशांति फैलाने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की पृष्ठभूमि तो नहीं है ?

एक दूसरा उदाहरण है कि आज भी हिंदुओं की कुछ जातियों, महिलाओं और अन्य धर्म के लोगों के प्रवेश पर अनेक मंदिरों में रोक लगी हुई है। इसका पालन न करने पर आपसी मनमुटाव, तिरस्कार, हीन भाव का व्यवहार करने से लेकर हिंसक घटनाएं तक घटती रहती हैं और विडंबना यह कि यह वर्तमान भारत में हो रहा है।

कोई परंपरा कब पड़ी होगी या किसी कुरीति का जन्म कैसे हुआ होगा, इस पर सोचने से ज्यादा ज़रूरी यह है कि आज तक यह चल क्यों रही है ? लोग इस व्यवस्था से चिपके हुए क्यों हैं ? इसमें परिवर्तन करने या इसे समाप्त करने के बारे में सामाजिक पहल क्यों नहीं होती ?  सबसे बड़ी बात यह कि सरकार क्यों नहीं भेदभाव करने की परंपरा से जुड़े धार्मिक स्थलों की व्यवस्था को अपने हाथ में लेकर समस्या की जड़ को ही नष्ट करने के लिए कदम क्यों नहीं उठाती ?

इस बात पर विश्वास करने से भय लगता है और वो आज की युवा पीढ़ी के लिए किसी अजूबे से कम नहीं है कि अब भी कुएं, हैंडपंप या तालाब से पानी लेने के लिए जातियों के बीच झगड़े, मारपीट और हिंसक वारदातें हो जाती हैं। लेकिन सच यही है !

छुआछूत कानूनन तो जुर्म है लेकिन यह आज भी समाज के लगभग प्रत्येक वर्ग में व्याप्त है चाहे वह पढ़ा लिखा हो या अनपढ़, गरीब हो या अमीर, साधन संपन्न हो या कमज़ोर और यही नहीं अपने विभिन्न रूपों में हरेक व्यक्ति इसका पालन करता दिखाई देता है। उदाहरण के लिए घर में काम करने वाले घरेलू नौकरों के खाने पीने के बर्तन अलग रखना, कितनी मामूली बात है लेकिन कितनी गंभीर है क्योंकि इसी एक व्यवहार ने एक कभी न भरी जा सकने वाली खाई को जन्म दे दिया है।

शादी ब्याह, त्यौहार, उत्सव या सामूहिक भोज के दौरान अक्सर इस परंपरा का पालन किया जाता है कि जो अपनी जाति से कम है, उसके खाने पीने से लेकर रहने तक का इंतजाम अलग हो और गलती से अगर कहीं बड़ी जाति जिसके यहां यह आयोजन हो रहा है, किसी वस्तु या खाद्य पदार्थ की अदला बदली हो जाए तो समझिए कि कयामत ही आ जाएगी।  ऐसा बवंडर मचेगा कि समारोह का मज़ा ही जाता रहेगा।

पढ़े लिखे तथा प्रबुद्ध वर्ग और विशेषकर उच्च शिक्षा प्राप्त युवा वर्ग के लिए इन बातों का कोई मतलब न होने पर भी वे कुछ अपवादों को छोड़कर यह सब मानते और करते हैं क्योंकि उनके सामने परिवार या खानदान की इज़्ज़त बनाए रखने का डर इस हद तक भरा होता है कि वह इस सब को ढोंग मानते हुए भी अपनी सहमति और स्वीकृति ही नहीं देते बल्कि यह सब करने में अपनी भागीदारी का निर्वाह करते हैं।

कहने का अर्थ यह कि जब शिक्षा ही सोच नहीं बदल पाई तो फ़िर कानून या उसके अंतर्गत मिलने वाला दंड उसे कैसे बदल सकता है ?

असल में इस सब का सबसे बड़ा कारण हमारे राजनीतिक दलों, उनके नेताओं द्वारा इन भेदभाव की बातों का अपने मतलब के लिए इस्तेमाल करने की कला है।

क्या यह देखकर अज़ीब नहीं लगता कि कोई स्थानीय नेता हो, मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधान मंत्री ही क्यों न हो, किसी दलित या गरीब के यहां भोजन करने को इतना महत्व देते हैं कि यह सामान्य सी घटना देश भर में चर्चा का विषय बन जाती है।

किसी धर्म या जाति अथवा संप्रदाय के एक तबके को इस ढोंग से अपनी तरफ करने का यह प्रयास उन्हें कुछ वोट तो दिला सकता है लेकिन उनके इस अकेले व्यवहार ने किस गलत परम्परा को जन्म दे दिया इसका पता नेताओं को तो होता है लेकिन इसका आभास सामान्य नागरिक को होने तक बहुत देर हो चुकती है। तब तक यह एक सामान्य व्यवहार बन जाता है और दो तबकों के बीच दुश्मनी का बीज पड़ चुका होता है।

परंपरा अपने आप में गलत नहीं होती लेकिन वह कुरीति तब बन जाती है जब उसका इस्तेमाल व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए किया जाता है या फिर अपना दबदबा कायम रखने और कमज़ोर व्यक्ति को सताने के लिए किया जाता हैं।

इसी के साथ सच यह भी है कि जब सरकार ऐसे लोगों को प्रश्रय देती है, उन्हें बढ़ावा देती है और यही नहीं, इस तरह के काम करने पर ईनाम भी देती है तो समझना चाहिए कि समाज को धर्म और जाति के नाम पर बांटा जा रहा है। इसका परिणाम आज न दिखाई दे लेकिन भविष्य में कितना घातक सिद्ध होगा, यह समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है बल्कि बहुत साधारण सी बात है।

भारत विभाजन से लेकर समय समय पर होने वाले जातीय संघर्ष और धर्म के नाम पर फैलाई जाने वाली हिंसा से भी अगर हम न सीख पाएं हों तो इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है ? क्या इससे विश्व में हमारी छवि धूमिल नहीं होती और हम चाहे कितनी भी उपलब्धियां हासिल कर लें, जब तक देश में धर्म और जाति को भूलकर एकजुटता नहीं है, हम अपने पर गर्व कैसे कर सकते हैं ?



शुक्रवार, 29 अप्रैल 2022

हिंदी का आम लोगों की भाषा बनना ही उसके विरोध का कारण है


एक बार फिर भाषा को लेकर आधुनिक संवाद के एक तरीके ट्विटर के जरिए मुंह जबानी लड़ाई छिड़ गई है जिसकी शुरूआत हिंदी अभिनेता अजय देवगन और कन्नड़ सुपरस्टार सुदीप ने जाने अनजाने में कर दी। अब यह राजनीतिज्ञों की दखलंदाजी से बहस का मुद्दा बन गया है। हिंदी को थोपने की पुरानी पड़ चुकी चाल को फिर से आजमाया जा रहा है ताकि विभिन्न भाषाभाषी आपस में लड़ें और नेता अपनी रोटियां सेंकने में सफल हों।

हिंदी का जलवा

हिंदी है कि सब भाषाओं को अपने में समाने या कहें कि कहीं से भी मिले किसी भी शब्द को अपनाने की अपनी सहज प्रवृत्ति के कारण इतनी आगे निकल चुकी है कि पुस्तक, नाटक, फिल्म या किसी भी विधा की कोई भी रचना जब तक हिंदी में देखने, सुनने, पढ़ने को न मिले तब तक उसे लोकप्रियता के पैमाने पर खरा नहीं माना जाता।

ऐसा होने की वजह यह है कि चाहे कोई कितना भी विरोध करे, हिंदी बोलने, समझने वाली आबादी हमारे देश में लगभग आधी है और बाकी में सब भाषाएं आती हैं। इसका मतलब यह नहीं कि अन्य भाषाएं कहीं से भी और किसी भी तरह से हिंदी से कम हैं, बल्कि देखा जाए तो उनमें रचा जा रहा साहित्य अपने अनूठेपन के कारण लोगों की पसंद बन रहा है। उदाहरण के लिए कन्नड़ लेखक भैरप्पा का उपन्यास पर्व और उड़िया की प्रतिभा राय की रचना द्रौपदी, महाभारत की पृष्ठभूमि पर लिखी अद्वितीय रचनाएं हैं।

इसी तरह और भी पुस्तकें हैं जो हिंदी में छपने के बाद ही देश भर में अपना लोहा मनवा सकीं। यह असमिया के जोगेश दास की पृथ्वी की पीड़ा हो, गुजराती के पन्ना लाल पटेल का जीवन एक नाटक हो। यह सूची बहुत लंबी है जो हमारी भाषाओं की विविधता और उनके लेखकों में कमाल की सृजन क्षमता दर्शाती है।

अब यह हिंदी की विशेषता है कि अन्य भाषाओं में बनी फिल्में और उनमें काम करने वाले कलाकार जब तक हिंदी पाठकों और दर्शकों को अपनी कला से रिझा नहीं लेते तब तक उनकी देशव्यापी पहचान अधूरी ही रहती है।

अपने साथ घटी एक घटना बताने का मन है। जैसा कि सब जानते हैं कि मैं अंग्रेजी लेखक खुशवंत सिंह के अंग्रेजी कॉलम का रूपांतर हिंदी में करता रहा हूं जो हिंदी के अनेक समाचार पत्रों में प्रकाशित होता था। हुआ यह कि पंजाब रत्न पुरस्कार देते समय तत्कालीन मुख्य मंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि वे सरदार खुशवंत सिंह को पंजाब केसरी में पढ़ते हैं और उनके प्रशंसक हैं। सरदार साहब बोले कि वे तो अंग्रेजी में लिखते हैं और उनका कॉलम हिंदी में मेरे द्वारा लिखा जाता है।

एक और घटना है। वर्तमान मुख्य मंत्री सरदार भगवंत सिंह मान का सीरियल जुगनू मस्त मस्त मैं प्रोड्यूस करता था जो हिंदी में इतना लोकप्रिय था कि दर्शक उसे देखने के लिए अपनी दिनचर्या इस प्रकार बनाते थे कि इसकी कोई भी कड़ी देखने से वे रह न जाएं।

कहने का मतलब यह है कि कोई भी भाषा राष्ट्र भाषा तब बनती है जब वह आम आदमी की बोलचाल की भाषा बन जाए और यह बात किसी भी भाषा के पाठक या रचनाकार मानते हैं कि यह हिंदी ही है जिसने अपने लचीलेपन के कारण यह मुकाम हासिल किया है। संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है तो उसे राष्ट्र भाषा लोगों ने बनाया है। यह स्वीकार कर लेने से किसी भी भाषा का महत्व कम नहीं होता बल्कि सभी भाषाएं एक दूसरे की सहचरी बनकर एक ही गुलदस्ते में सज कर रह सकती हैं।

आज जो मीडिया का विस्तार हो रहा है और टीवी, फिल्म, ओटीटी प्लेटफॉर्म तथा अन्य साधनों पर कॉन्टेंट की बाढ़ आई हुई है, उसे यदि हिंदी में न परोसा जाए तो वह न केवल सीमित दायरे में सिमट जायेगा बल्कि अच्छी कमाई भी न कर पायेगा। विदेशी कॉन्टेंट, फिल्मों और वेब सीरीज के लिए हिंदी में दिखाया जाना उनके लिए अनिवार्य है क्योंकि हिंदी मार्केट बहुत बड़ी है। इसी तरह भारतीय भाषाओं में बनी सामग्री का रूपांतर हिंदी में होने से वह लोगों की पसंद बन रहा है और कमाई की गारंटी है।

नेतागीरी से बचना होगा

हिंदी का जलवा इसी तरह तब तक बढ़ता रहेगा जब तक यह नेताओं और राजनीतिक दलों के हस्तक्षेप से मुक्त रहता है। सभी भाषा भाषियों को यह भी समझना होगा कि जब भाषा, संस्कृति, बोलचाल, पहनावे, रीति रिवाज से लेकर हमारी सोच तक का राजनीतिकरण होने लगता है तो नफरत, मनमुटाव, लड़ाई झगड़े और भेदभाव की मानसिकता बनने में समय नहीं लगता।

यह बात इस लोक कथा से समझी जा सकती है। एक बार जंगल के राजा ने घोषणा कर दी कि सभी जानवरों को पेड़ पर चढ़ना सीखना होगा ताकि वे अपनी रक्षा स्वयं कर सकें। जो नहीं सीख पाएगा, उसे फेल होने पर दण्ड मिलेगा। अब हुआ यह कि हाथी, ऊंट, जिराफ जैसे जीव कोशिश करने पर भी सफल न हुए और सजा के डर से जंगल छोड़कर जाने लगे जबकि बंदर पेड़ की चोटी तक पहुंचने लगा। वास्तविकता यह है कि हाथी अपनी सूंड से, ऊंट और जिराफ अपनी गर्दन से किसी भी पेड़ की चोटी तक पहुंच सकते हैं। यह बात जंगल के राजा ने समझी और अपना उटपटांग हुक्म वापिस लिया वरना जंगल खाली होने में देर नहीं लगती।

यही बात भाषाओं के मामले में भी सच है। प्रत्येक भाषा अपनी प्रकृति के अनुसार बढती रहती है, इसलिए नेताओं की बयानबाजी का विरोध कीजिए, उनकी चाल समझिए कि वे हिंदी को अहिंदी भाषियों पर थोपने की बात फैलाकर अपना कौन सा मतलब साध रहे हैं।

एक बात और है कि भारतीय भाषाओं को एक दूसरे का प्रतिद्वंदी बनाकर अंग्रेजी का प्रभुत्व हमेशा के लिए बनाए रखना नेताओं की गहरी चाल है जिसे समझना होगा। यह दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदरबांट जैसा है।

भाषा विवाद के कारण देश का बहुत नुकसान हो चुका, हिंसात्मक आंदोलन भी हुए हैं जिनमें जानमाल का बहुत नुकसान हुआ, डर लगता है कि कहीं फिर से कोई ऐसा उपद्रव न हो जाए कि देश एक बार फिर बहुत पीछे चला जाए। छोटी सी चिंगारी भाषाई एकता को लील सकती है, इसलिए समाज और सरकार दोनों ही की जिम्मेदारी है कि भाषा के नाम पर कोई भी विवाद बढ़ने से पहले उसे बुझा दिया जाए।

भाषा क्या है, केवल अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र है और हमारे देश में तो उन्नीस हजार से ज्यादा हैं और कुछ के बोलने, समझने वाले कुछ सैंकड़ों में है लेकिन अगर कोई यह कहे कि उनकी क्या गिनती करनी तो यह ऐसी भूल है जो भाषाई आधार पर उस क्षेत्र की विरासत को खत्म कर सकती है या किसी अंधेरे कोने में डाल सकती है।

हिंदी भारतीय साहित्य की अग्रणी है और हिंदुस्तानी विश्व में व्यापार की भाषा बनती जा रही है। तमिल और संस्कृत दुनिया की सबसे पुरानी भाषाएं हैं तो कन्नड़ भाषाओं की रानी है, तेलुगु सबसे लोकप्रिय है, इसी तरह बाकी भाषाएं भी किसी न किसी रूप में भारतीयता से दुनिया को परिचित कराती हैं। इस स्थिति में भाषा के नाम पर लड़ना राजनीतिज्ञों के अलावा किसी को शोभा नहीं देता। उन्हें आपस में लड़ने दीजिए और जब आम आदमी उनका साथ साथ नहीं देगा तो वे अपनी ओछी राजनीति से ऊपर उठकर सोचेंगे।

अलग अलग भाषाओं की सामग्री हिंदी में और हिंदी की सामग्री उन भाषाओं में प्रस्तुत करने से ही हमारी सभी भाषाएं समृद्ध होंगी। हो सकता है इस क्रम में कोई ऐसी नई भाषा ही पनपने लगे जिसमें सभी भाषाओं के शब्द समाहित हों। हो सकता है कि इसे लिखने के लिए उसी तरह रोमन लिपि का इस्तेमाल हो जैसे आज देवनागरी के स्थान पर रोमन लिपि का प्रयोग किया जाता है। उम्मीद है कि भाषाई उन्माद न बढ़े और भाषाई एकता के सामने कोई चाल कामयाब न हो।


शनिवार, 23 अप्रैल 2022

रचनाकार को समर्पित विश्व पुस्तक और कॉपीराइट दिवस


पुस्तकें किसी भी व्यक्ति की सबसे अच्छी साथी होती हैं । मन उदास हो, किसी बात को लेकर गहन चिंतन चल रहा हो, समय न कट रहा हो या मान लीजिए सोते सोते नींद उचट गई हो तो किताब से बढ़िया कोई साथी नहीं है। हालांकि मोबाइल, कंप्यूटर और दूसरे आधुनिक साधनों ने पढ़ने के तरीकों को बदल दिया है लेकिन इससे पुस्तक और उसके रचनाकार का महत्व कम नहीं होता।

लेखकों को समर्पित

यूनेस्को द्वारा प्रतिवर्ष तेईस अप्रैल को विश्व पुस्तक और कॉपीराइट दिवस मनाए जाने की शुरुआत विलियम शेक्सपियर की पुण्य तिथि की स्मृति से  की गई थी। संयोगवश उनका जन्म भी अप्रैल में हुआ था।  क्या ही अच्छा हो कि भारत के किसी महान लेखक जैसे, गुरुदेव टैगोर, मुंशी प्रेमचन्द या भारत के किसी भी भाषा के सर्वमान्य साहित्यकार के जन्मदिन या पुण्य तिथि पर विश्व पुस्तक दिवस मनाया जाए। इसका स्वरूप भारतीय भाषाओं के लेखकों के सम्मेलन, साहित्यिक चर्चा तथा अनेक विषयों जैसे पर्यावरण, वानिकी, नदियों की शुद्धता, प्रदूषण विहीन वातावरण जैसे विषयों से जोड़कर तैयार किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए इस माह 11 तारीख को अपनी लेखनी से भारतीय साहित्य को समृद्ध करने वाले विष्णु प्रभाकर की पुण्य तिथि पड़ती  है। उनकी स्मृति से ही भारतीय साहित्य दिवस मनाए जाने की शुरुआत की जा सकती है ।

अपने जीवन के 97 वर्ष देख चुके विष्णु प्रभाकर द्वारा हिंदी भाषा की सेवा करने की गौरवशाली जीवन यात्रा रही है। वे राष्ट्रीय सम्मान पद्मभूषण के अतिरिक्त बहुत से अन्य साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित थे। उनकी रचना आवारा मसीहा जो शरत चंद्र की सबसे अधिक प्रमाणित जीवनी है, एक ऐसा ग्रंथ है जो एक बार पढ़ना शुरू करने पर समाप्त किए बिना मन नहीं मानता, बल्कि कुछ प्रसंग तो ऐसे हैं जिन्हें फिर से पढ़ने को मन करता है। शरत बाबू की रचनाओं पर फिल्में भी बन चुकी हैं और देवदास तो अनेक फिल्मकारों द्वारा अपने अपने ढंग से बनाई गई है।

लेखक की लोकप्रियता की पहली शर्त यह है कि उसका लेखन मन को छू सके। देवदास हो या आवारा मसीहा दोनों में यह शक्ति है कि वे पाठक को बांधकर रखने और एक अलग ही दुनिया में ले जाने में सक्षम हैं। उल्लेखनीय है कि बांग्ला भाषा के लेखक की जीवनी एक हिंदी लेखक लिख रहा है और लगभग चैदह वर्ष इसकी सामग्री जुटाने के लिए देश विदेश का भ्रमण करने और फिर पूर्णतया तथ्यों पर आधारित एक अभूतपूर्व रचना पाठकों को दे रहा है, ऐसे उदाहरण भारतीय साहित्य में बहुत कम हैं। शरत और उनकी रचनाओं  को समझने के लिए आवारा मसीहा को पढ़ना अनिवार्य है।

विष्णु प्रभाकर की रचनाओं में नारी मन का अद्भुत चित्रण है। उनकी कृतियों में स्त्री अपने लगभग सभी रूपों में साकार होती है, चाहे बंदिनी में देवी के प्रकट होने का अंधविश्वास हो, तट के बंधन की नीलम हो, अर्धनारीश्वर की सुमिता और विभा हो, निशिकांत की कमला हो या फिर किसी अन्य रचना का कोई स्त्री पात्र हो।

पुरुष और स्त्री के सभी प्रकार के संबंधों पर कहानी, उपन्यास, नाटक सहित सभी विधाओं में विष्णु प्रभाकर ने अपने पात्रों के माध्यम से व्यक्तिगत, सामाजिक, राष्ट्रीय और राजनीतिक विषयों को बड़ी ही सरलता, सादगी और दिल को छू लेने वाली भाषा में लिखा है।

विश्व पुस्तक दिवस पर मुंशी प्रेमचंद का स्मरण होना स्वाभाविक है। उनकी कहानियां पढ़ते हुए लगता है कि जैसे वे वर्तमान की घटनाओं का ही चरित्र चित्रण हैं। उनके पात्र, समय की अवधि कितनी ही बीत जाए, लगता है कि आज भी हमारे आसपास घूम रहे हैं, केवल उस समय के परिवेश को आज के वातावरण से बदलना है।

भारतीय साहित्य विश्व के किसी भी देश की तुलना में कहीं से भी कम नहीं ठहरता लेकिन अभी उसकी वैश्विक पहचान नहीं बन पाई है। इसका कारण जो भी हो, उम्मीद तो यही है कि एक दिन ऐसा अवश्य आयेगा जब भारतीय साहित्यकार होने का गौरव और एहसास विश्व में महसूस किया जा सकेगा।

साहित्य और फिल्म

साहित्यिक रचनाओं पर दुनिया भर के विभिन्न भाषाओं के लेखकों की रचनाओं पर हॉलीवुड और अन्य देशों में फिल्में बनती रही हैं और बहुत पॉपुलर भी हुई हैं। हमारे यहां भी साहित्यिक रचनाओं और साहित्यकारों के जीवन पर आधारित फिल्में बनती रही हैं लेकिन हमारे यहां सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि लेखक अपनी रचनाओं के पात्रों को वैसा ही फिल्म  में देखना चाहता है, जैसा कहानी या उपन्यास में दिखाया गया है। इसी कारण बहुत सी रचनाओं पर फिल्म निर्माता की इच्छा के बावजूद उस रचना पर काम नहीं हो पाता और फिल्म बनती भी है तो उसकी ज्यादा चर्चा नहीं होती । बेहतर यही होगा कि लेखक यह मानकर चले कि फिल्म एक अलग ही विधा है जिसमें उसका कोई दख़ल नहीं है। इसलिए उसे फिल्म का आनंद लेना चाहिए न कि यह देखकर दुःख अनुभव करे कि उसकी रचना के साथ न्याय नहीं हुआ । फिल्म पर टिप्पणी करने का अधिकार केवल दर्शकों का है।

रचना और उसका संसार

अक्सर ऐसा होता है कि जब किसी बात की तुलना करनी हो तो ऐसे में लेखकों की कभी लिखी गई किसी रचना या पुस्तक के किसी अंश का उदाहरण दिया जाता है। सदियों पुरानी लिखी किसी बात की मिसाल आज के समय में देना उस कृति को कालजयी बना देता है। कुछ की भाषा, वर्णन और कहने की कला इतनी आकर्षक और असरदार होती है कि उसके लिए वह भाषा भी पढ़ना जरूरी लगता है। इसी तरह की कुछ  किताबों में देवकीनंदन खत्री की चंद्रकांता संतति और भूतनाथ हैं जिन्हें पढ़ने के लिए हिंदी सीखना अनिवार्य हो गया। इसी तरह मिर्ज़ा ग़ालिब और उनके समकालीन लेखकों को पढ़ने के लिए उर्दू सीखने की चाह बढ़ी। भाषाओं को सीखने की परंपरा को आगे बढ़ाते जाना भारतीय साहित्य की विशेषता है।

विभिन्न भाषाओं में लिखी जाने वाली पुस्तकें एक प्रकार से देश को एकसूत्र में बांधने का काम करती हैं। जिन प्रदेशों में इनकी रचना होती है, वहां के रहन सहन, रीति रिवाज, सोच का दायरा, कला और संस्कृति तथा ऐतिहासिक तथ्यों की जानकारी वहां रचे जाने वाले साहित्य से होती है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपने जीवन में इतनी सारी भाषाएं पढ़ लिख सकना संभव नहीं है, फ़िर भी अनेक भाषी होना फायदेमंद है।

यहां इस बात का भी ज़िक्र किया जा सकता है कि भारतीय कॉपीराइट कानून लेखकों को उनकी कृति के अनधिकृत इस्तेमाल के विरुद्ध सुरक्षा देता है। इसमें पिछले कुछ वर्षों में अनेक बदलाव भी किए गए हैं जो लेखक की स्थिति मजबूत करते हैं परंतु अभी भी कॉपीराइट का उल्लंघन सामान्य बात है क्योंकि सब जानते हैं कि मामला अदालत में जाने पर फ़ैसला होने में पीढियां गुजर सकती हैं। इस मामले में भी यदि कोई ऐसी व्यवस्था हो जाए जो एक निश्चित अवधि में न्याय दिला सके तो यह साहित्य के क्षेत्र में एक उपलब्धि होगी।


शुक्रवार, 25 मार्च 2022

जल, वायु और पर्यावरण संरक्षण की शिक्षा स्कूल से अनिवार्य हो

 

हर साल दुनिया भर में जल, वायु, मौसम, वातावरण के संरक्षण के नाम पर बहुत से दिन मनाए जाते हैं और उन्हें अगले ही दिन भुला दिया जाता है। हम भी लीपापोती करने के बाद भूल जाते हैं।

सच का सामना

वास्तविकता यह है कि भारत जल संकट के मुहाने पर खड़ा है जो कभी भी विस्फोटक हो सकता है, वायु प्रदूषण जानलेवा हो रहा है, जंगल कट रहे हैं, पहाड़ खिसक रहे हैं, धरती बंजर और मरुस्थली इलाके बढ़ रहे हैं।  शहर हो या देहात, यह सभी के लिए एक जैसा है, कोई इससे अछूता नहीं है।

सरकार जनता का सहयोग न मिलने की बात कर अपना पल्ला झाड़ लेती है। प्रश्न उठता है कि जनता सहयोग क्यों नहीं करती तो उसका जवाब यह है  कि उसे न तो पता है और न ही सिखाया गया कि इन सब चीजों को कैसे बचाकर रखा जाए और उसके लिए क्या वैज्ञानिक तरीके हैं ?

एक उदाहरण है: पानी सभी के लिए जरूरी है ; पीने और घरेलू इस्तेमाल के लिए, खेतीबाड़ी और उद्योग के लिए, सफाई और शौचालय के लिए, खेल कूद, स्विमिंग प्रतियोगिताओं और मनोरंजन के लिए तथा और भी न जाने किन किन बातों के लिए, मतलब यह कि खाने के बिना कुछ समय तक जिया जा सकता है लेकिन पानी न हो तो तत्काल मृत्यु निश्चित है।

अभी हाल ही में मुंबई में घटी एक घटना से बात आसानी से समझी जा सकती है। हुआ यह कि उपनगर अंधेरी में लोखंडवाला और उसके आसपास रहने वालों को अपने बाथरूम के पानी से बदबू आती महसूस हुई जो तेजी से बढ़ रही थी और फिर पूरे शहर से खबरें आने लगीं कि सभी सोसायटियों में यह समस्या है और साथ ही लोगों के बीमार होने की खबरें आने लगीं। पता चला कि सड़कों की मरम्मत कर रहे लोगों की लापरवाही से पीने के पानी और सीवेज के पानी की लाइनों में तोड़फोड़ होने से पाईप मिल गए और पूरे इलाके को दूषित पानी मिलने लगा। निवासी गंदे पानी से होने वाली बीमारियों की चपेट में आने लगे । लोगों ने एहतियात बरतनी शुरू की और पीने और खाना बनाने के लिए बाजार से बोतलबंद पानी ख़रीद कर इस्तेमाल करने लगे। जो लापरवाह रहे, उनकी जिंदगी संकट में पड़ गई। जो शहर स्वच्छ जल मुहैया कराने का दावा कर रहा था, उसकी पोल खुल गई।

यह समस्या एक शहर की नहीं बल्कि देश भर के शहरी क्षेत्रों की है जहां आए दिन लोगों की जिंदगी किसी न किसी खतरे में पड़ी रहती है, चाहे दूषित पानी हो, ज़हरीली हवा हो, बेमौसम बरसात हो या फ़िर टूटी फूटी सड़क, बेतरतीब परिवहन और जगह जगह फैलती गंदगी हो ।

अब हम देहाती इलाकों की बात करते हैं। वहां भी पानी के दूषित होने, वायु मंडल के प्रदूषित होने और अकाल, भुखमरी जैसे हालात बनते ही रहते हैं। यह एक सामाजिक समस्या भी बन जाती है और अनेक कुप्रथाओं का जन्म हो जाता है। उदाहरण के लिए पीने और घरेलू इस्तेमाल के लिए पानी लाने में महिलाओं का आधा दिन खराब हो जाता है तो कुछ इलाकों में लोगों ने पानी भरकर लाने के लिए एक शादी और करनी शुरू कर दी और इस तरह जल पत्नी रखने की शुरुआत हो गई।

व्यावहारिक बनना होगा

हमारे देश में पिछले कुछ वर्षों में काफ़ी चीजें बदली हैं और ऐसे दावे भी किए जाते हैं जो केवल कागजों पर ही पूरे कर लिए जाते हैं। उदाहरण के लिए देश भर में पाईप लाईन के जरिए पानी उपलब्ध कराना ताकि लोग इसे भरकर लाने में वक्त लगाने के बजाए  दूसरे काम करें जिससे उनकी आमदनी बढ़े। यह कितना खोखला है, इसका पता सरकार की इस घोषणा से चल जाता है कि इस काम में दस से ज्यादा वर्ष लगने वाले हैं। समझा जा सकता है कि यह टालमटोल है और वह इसलिए कि कोई ठोस नीति नहीं है जिसके बल पर यह संभव हो सके।

शौचालय बना दिए लेकिन पुरानी तकनीक से बने थे, उनमें पानी का इस्तेमाल बहुत होने से बेकार हो गए, इसके साथ ही गंदगी की समस्या और खड़ी हो गई। आंकड़े बताते हैं कि बहुत तेज़ी से लोग फिर से खुले में शौच की आदत पर लौट रहे हैं जो एक खतरनाक संकेत है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि सीवर और सीवेज डिस्पोजल का इंतजाम जहां हरेक गांव में होना चाहिए, वह जिलों तक में पर्याप्त मात्रा में नहीं है। जब देश में सड़कों का जाल बिछाया जा सकता है और उसके लिए नीति बन सकती है तो क्या इसी तर्ज़ पर ग्रामीण इलाकों और शहरों के स्लम क्षेत्रों में सीवरेज सिस्टम का जाल बिछाने के लिए नीति बनाकर काम नहीं किया जा सकता ?

विकसित और बहुत से विकासशील देशों में जाएं तो वहां बाथरूम तक का पानी पिया जा सकता है। क्या इसकी कल्पना भारत में की जा सकती है ? अभी तो फिलहाल नहीं क्योंकि हम जल प्रदूषण को रोकने का ही इंतजाम नहीं कर पा रहे हैं, पीने का साफ पानी देने की बात केवल गप है।

जन भागीदारी और शिक्षा

अब हम इस बात पर आते हैं कि सामान्य व्यक्ति कैसे इन सब चीजों से जुड़ सकता है और वह बिना सरकार का मुंह देखे किस प्रकार स्वयं हवा, पानी, मौसम और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को हल कर सकता है। जब हम अपनी बुनियादी जरूरतों को कुछ हद तक स्वयं पूरा करने की बात करते हैं तो यह भूल जाते हैं कि जब हमें यह जानकारी नहीं है कि उसका तरीका क्या है तो सरकार को दोष देने के अतिरिक्त और क्या कर सकते हैं ?

सरकार ने नई शिक्षा नीति बनाई है और उसका प्रचार भी बहुत हुआ है लेकिन उस पर सही ढंग से चर्चा न होने से भ्रम की स्थिति बनी हुई है। जब तक यह तय न हो जाए कि विद्यार्थियों को क्या पढ़ाया जाए और उसकी रूपरेखा तैयार न हो, पाठ्यक्रम और पढ़ाने वाले न हों तो कैसे कोई शिक्षा नीति सफल हो सकती है और प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित हो सकता है।

हम केवल अक्षर ज्ञान या भाषा की पढ़ाई की बात नहीं कर रहे बल्कि आधुनिक ज्ञान विज्ञान का सहारा लेकर अपनी परेशानियों का हल स्वयं निकाल सकने की योग्यता होने की बात कर रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि बहुत से गैर ज़रूरी और केवल अंक हासिल करने की दृष्टि से पढ़ाए जा रहे विषयों को जब तक रद्दी की टोकरी में नहीं फेंक दिया जाता और जो विषय रोज़ाना की जिंदगी से जुड़े हैं उन्हें पढ़ाने का प्रबंध नहीं किया जाता तब तक किसी भी शिक्षा नीति का कोई मतलब ही नहीं है।

स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय तक की पढ़ाई में अगर हवा, पानी, मौसम परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण, वनों के महत्व, धरती, पहाड़, वर्षा, बाढ़ जैसे विषयों को प्राथमिक स्कूली शिक्षा से ही पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया जाए तो फिर बचपन से इन सभी बातों की जानकारी होगी और विद्यार्थी बड़े होने पर इन्हें अपनी सूझबूझ से हल कर लेगा। उसे पता होगा कि रेन हार्वेसिं्टग क्या होती है, कुएं, बावड़ी, झरने, तालाब का क्या मतलब है, ग्राउंड वाटर का स्तर कैसे बनाए रखा जा सकता है, प्राकृतिक रूप से कैसे शुद्ध पानी मिल सकता है और यही नहीं कल कारखानों से निकलने वाला पानी किस तरह के ट्रीटमेंट से उपयोगी बन सकता है। अगर वह उद्योग लगाता है या व्यापार करता है तो उसे किसी भी तरह का प्रदूषण न करने के उपायों को अमल में लाने से परहेज़ नहीं होगा।

इसी तरह वन संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण जैसे विषयों को पाठक्रम में शामिल कर उनकी बुनियादी शिक्षा दी जा सकती है। ये सभी विषय ऐसे हैं जिनसे रोज़गार तो मिल ही सकता है, साथ में व्यक्ति इनकी जानकारी होने से स्वयं अपनी समस्याओं का हल निकाल सकता है।

जब प्रत्येक व्यक्ति को इन सब बातों का ज्ञान स्कूल से ही हो जायेगा तो फ़िर सरकार और उसके अधिकारी न तो उसे बहका सकेंगे और न ही कोई बहाना बना सकेंगे। जो जन प्रतिनिधि हैं, विधायक, सांसद हैं, उन्हें विवश किया जा सकता है कि वे नीतियां बनाते और उन पर अमल करते समय  जनता की अनदेखी न करें क्योंकि वह उन्हें अपने ज्ञान की बदौलत कटघरे में खड़ा कर सकती है। तब यह कथन सही अर्थों में कहा जा सकेगा कि जनता सब कुछ जानती है।


शनिवार, 19 मार्च 2022

काश्मीर पर लगे ज़ख्म के नासूर बनने से पहले इलाज़ जरूरी था

 

कहते हैं कि शरीर पर लगे घाव पर समय रहते मरहम न लगे तो नासूर बन जाता है और मन पर लगी चोट जिंदगी भर सालती रहती है। यही कश्मीर का सच है।

एक सच्चाई यह भी है कि  अनुपम सौंदर्य, अपार प्राकृतिक वैभव से पूर्ण प्रदेश, निवासी ज्ञान, बुद्धि तथा मानवीय संवेदनाओं से भरे पूरे हों तो वहां तीनों लोकों की सभी शक्तियां विद्यमान हों तो आश्चर्य कैसा ? यह हमारा  वर्तमान कश्मीर है।

देर से सही लेकिन सही हुआ

यह कहने या दोहराते रहने का अब कोई मतलब नहीं रह गया कि आज़ादी के बाद भारत में इस प्रदेश का संपूर्ण विलय होने पर भी पाकिस्तान की नज़र लगी होने के कारण हमेशा यह प्रदेश तनाव, परेशानी और युद्ध जैसे माहौल से ग्रस्त रहा। इसका केवल एक ही हल था जो धारा 370 हटाकर और इसे भारत का वास्तविक रूप से अभिन्न अंग बनाकर 2019 में किया गया।

जिन लोगों को सन 1980 से पहले कश्मीर जाने का अवसर मिला होगा तो वह इस बात की गवाही देंगे कि चाहे राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर कैसा भी वातावरण रहा हो लेकिन वहां जाने पर डर नहीं लगता था। उसके बाद जो हुआ वह एक दर्दनाक दास्तां है।

जिस तरह सन 1984 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से जुड़ी हिंदू सिख को अलग कर देने की साजिश रची गई, उसी प्रकार 1990 में कश्मीर से हिंदुओं का नामोनिशान मिटाने की हरकत को अंजाम दिया गया और इन दोनों के पीछे  भारत के दुश्मनों की मिलीभगत थी कि भारत के टुकड़े हो जाएं जिसके नारे भी लगाए जाने लगे । क्या यह दोनों घटनाएं एक ही कड़ी के दो सिरे नहीं हैं ?

आतंक की परिभाषा

आतंक क्या होता है ? जब घर से बाहर निकलते ही मौत का अंदेशा हो, खुलकर न किसी से बात कर सकते हों, न मिल सकते हों, साथ चल रहे अनजान व्यक्ति पर हमलावर होने का शक हो, भरोसा करना तो दूर, हरेक को संदेह की नज़र से देखने की आदत बन जाए, डर इस सीमा तक हो कि खुलकर जीने, अपनी मर्ज़ी से कहीं भी जाने से पहले सौ बार सोचना पड़े, यह आतंक की परिभाषा है !

कारगिल युद्ध से ठीक पहले कश्मीर में दूरदर्शन के लिए एक सीरियल बनाते समय आतंक महसूस किया था। जिस जगह शूटिंग कर रहे थे, वहां पुलिस की तरफ से हिदायत थी कि कहीं जाना हो तो पहले से सूचित करना होगा और सुरक्षा कर्मी का साथ नहीं छोड़ना होगा, अगर ऐसा किया तो हमारे साथ हुई किसी भी वारदात की जिम्मेदारी हमारी होगी। वजह यह बताई गई कि क्योंकि सुरक्षा के लिए पुलिस हमारे साथ थी तो हम आतंकवादियों के रडार पर आ गए हैं।

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के घर जाने पर देखा कि जहां एक ओर वे हमसे बात कर रहे थे तो उनकी निगाहें चारों तरफ चैकसी करती हुई लग रहीं थीं। पूछने पर बताया कि सामने की हरियाली से कभी भी गोली आ सकती है क्योंकि पुलिस हमारी हिफाज़त कर रही है और यह उन्हें मंजूर नहीं।

धारा 370 हटने से पहले जब भी कश्मीर जाना हुआ तो पहले की तरह डर बना रहा कि कभी भी कुछ भी हो सकता है। किसी सरकारी अधिकारी के साथ हैं तो निश्चित रूप से आतंकवादियों की नज़र में आ गए हैं।  ऐसा माहौल हो तो कोई कैसे कुदरती नजारों का मज़ा ले सकता है ? बस, जैसे तैसे काम समाप्त कर वापिस लौटने की फिक्र रहती थी।

हालांकि अभी भी पूरी तरह कश्मीर जाने पर भय से मुक्ति नहीं मिल पाई है लेकिन फिर भी उसमें काफी हद तक कमी ज़रूर हो गई है।

वर्तमान दौर में आई फिल्म कश्मीर फाइल्स ज़िहादी जुनून और दुश्मन के मंसूबों पर बनी एक ऐसी फिल्म है जिसमें कट्टरपन की सभी हदें पार होती हुई दिखाई गई हैं।

उल्लेखनीय है कि कश्मीर से आकर देश के विभिन्न भागों में बसे कश्मीरियों ने अपने साथ हुए अन्याय को अपने साथ ढोया नहीं बल्कि अपनी टीस को दिल के एक कोने में दफ़न कर तरक्की के रास्ते पर चल पड़े। उस दौर में आए लोगों से मिलने, बात करने और उनके साथ वक्त बिताने पर कभी यह अनुभव नहीं होता कि उनके अंदर कितना आक्रोश और बेचैनी छिपी हुई है। इस फिल्म ने उनकी तकलीफ़ समझने की एक कोशिश की है।

गलती किसी भी समय हुई हो और किसी ने भी की हो, उसका दंश हमेशा चुभता रहता है, राजनीति करने वाले इस बात को समझ लें तो शायद बहुत सी अमानुषिक घटनाएं न होने पाएं और जिन्होंने यह दुःख झेला है, उन्हें कुछ सांत्वना मिले !

आज कश्मीर अपना नया इतिहास रच रहा है, बदलाव दिख रहा है और संभल कर चल रहा है। पुरानी स्मृतियां मिटती नहीं हैं लेकिन उन्हें बार बार याद करने से कोई लाभ भी नहीं है।


शुक्रवार, 11 मार्च 2022

चुनाव आयोग का कर्तव्य है कि हरेक मतदाता वोट डालने जाए


चुनाव भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने वाली ऐसी प्रक्रिया है जो यह तय करती है कि देश की जरूरतें क्या हैं और उन्हें कैसे पूरा किया जा सकता है। इस हकीकत को जानते हुए भी अगर वोटर अपने  अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाता तो समझना चाहिए कि चुनाव आयोग ने अपने कर्तव्य का सही ढंग से पालन नहीं किया।

चुनाव परिणाम पर असर

यह जानना या कल्पना करना बहुत दिलचस्प होगा कि यदि चुनावों में शत प्रतिशत या उसके आसपास मतदान हो तो क्या परिणाम होंगे ? जो उम्मीदवार जीता, क्या वह नहीं जीतता या फिर कोई और विजयी होता ? उल्लेखनीय है कि वोट प्रतिशत चालीस से साठ सत्तर तक रहता है और अपवाद स्वरूप एकाध बार कहीं किसी निर्वाचन क्षेत्र में नब्बे फीसदी तक पहुंचा हो ! यह बताता है कि जनता की सही भागीदारी नहीं हुई और यह राजशाही जैसा ही है जिसमें धन, शक्ति और बाहुबल को ही सत्ता पाने और शासन करने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझा जाता है।
इसका मतलब यह है कि राजनीतिक रूप से हमारा देश अभी उतना जागरूक नहीं जितना होना चाहिए। कई बार ऐसा होता है कि वोटर की इसी उदासीनता या लापरवाही के कारण अयोग्य, अपराधी और जेल में सजा भुगत रहा उम्मीदवार जीत  जाता है और जिसे जीतना चाहिए, वह बुरी तरह हार जाता है।

वोट डालने से परहेज़ करने या न डाल सकने के अनेक कारण हो सकते हैं जैसे कि यह सोच कि मैं कोई सरकार पर निर्भर थोड़े ही हूं, कोई भी जीते, मुझे अपना काम निकालना आता है। कुछ लोगों को किसी विशेष राजनीतिक दल से लगाव होता है और वे उसके जीतने के बारे में सोचते हैं लेकिन उसका उम्मीदवार उन्हें पसंद नहीं तो वे वोट डालने नहीं जाते। इसके विपरीत कुछ को राजनीतिक दल पसंद नहीं लेकिन उसका उम्मीदवार सही लगता है तो वे यह सोचकर वोट नहीं देते कि इसकी कौन सुनेगा, इसलिए क्यों वोट देने जाएं !

कुछ वोटर इस मज़बूरी में वोट नहीं डाल पाते कि वे नौकरी, व्यवसाय या किसी अन्य कारण से अपने मतदान केंद्र पर वोट डालने पहुंच पाने में असमर्थ हैं  और इस तरह अपनी पसंद के उम्मीदवार को चुनने में अपना योगदान नहीं कर सकते। मतदान की तारीख को अपने क्षेत्र में न होने से वे अपने अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाते। ऐसे मतदाताओं की संख्या बहुत अधिक है।

चुनाव आयोग का कर्तव्य है कि वह कुछ ऐसा प्रबंध करे कि इन लोगों को अपने अधिकार का प्रयोग करने का अवसर मिले और वे इससे वंचित न रहें।

जिस तरह पोस्टल बैलेट से कुछ विशेष परिस्थितियों में रह रहे व्यक्तियों को वोट डालने की सुविधा मिलती है, उसी तरह उन लोगों के लिए भी ऐसी व्यवस्था चुनाव आयोग द्वारा की जानी चाहिए जो किसी कारणवश अपने मतदान केंद्र पर नहीं पहुंच सकते।

किसी के लिए भी यह व्यावहारिक नहीं है कि वह अपनी नौकरी या व्यापार या किसी प्रोफेशनल दायित्व को छोड़कर वोट डालने जायेगा और फिर वापिस आकर अपना काम करेगा। उसके लिए यदि वोट डालना संभव कर दिया जाए तो चुनाव परिणामों पर दूरगामी प्रभाव पड़ना निश्चित है। डिजीटल क्रांति के वर्तमान युग में टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से यह करना नितांत संभव है, केवल इच्छाशक्ति चाहिए।

अक्सर देखने में आता है कि वोट न डालने वालों में उनकी संख्या बहुत अधिक हैं जो शिक्षित हैं, उच्च पदों पर काम कर रहे हैं और जिनके पास सभी तरह के आने जाने के साधन हैं। ये वे लोग हैं जो सोच समझकर और किसी दल या उम्मीदवार के लुभावने वायदों में आए बिना अपना वोट डालेंगे लेकिन इनकी बेरुखी गलत उम्मीदवार के जीतने का कारण बन जाती है। कहावत है कि भेडचाल में डाले गए वोट के मुकाबले अक्लमंदी से डाला गया एक वोट अधिक कारगर होता है।

मुद्दे बदल जाते हैं

राजनीतिक दलों और उनके उम्मीदवारों को यह अनुमान रहता है कि उनके क्षेत्र में कोई भी विकास कार्य हुए बिना चुनाव जीतना है तो वे इस तरह का प्रपंच रचते हैं कि मतदाता भ्रमित हो और न चाहते हुए भी उनके पक्ष में वोट डाले। ऐसे में सड़क, बिजली, पानी, रोज़गार, व्यवसाय और अन्य ज़रूरी मुद्दों को भुलाकर धर्म और जाति से लेकर राष्ट्रवाद तथा देशभक्ति जैसे विषयों को प्रमुखता से भुनाया जाने लगता है।

सरकार और सत्तारूढ़ राजनीतिक दल हमेशा इस जोड़तोड़ में लगे रहते हैं कि किसी भी कीमत पर चुनाव जीतना है।  इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे  वास्तविक मुद्दों को भुलाकर उन चीजों पर वोट मांगते हैं जिनका वोटर से कोई सरोकार नहीं होता। यहीं से शुरू होने लगता है वोट डालने के प्रति उदासीनता का भाव और इच्छा होते हुए भी लोग मतदान केंद्र नहीं जाते।

वोट न डालने देने के पीछे एक वास्तविकता यह भी है कि वोटर लिस्ट से अपना नाम गायब पाया जाना और कितनी भी दुहाई दी जाए कि पिछली बार तो नाम था और वोट भी दिया था, कोई परिवर्तन भी नहीं हुआ तो फिर नाम क्यों नहीं है, इसका कोई असर नहीं होता। इसकी कोई सुनवाई नहीं और एक बड़ी तादाद अपना मताधिकार इस्तेमाल नहीं कर पाती।

चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि किसी भी वोटर का वोट पड़ने से रहने न पाए। यदि ऐसा हो गया और चुनाव में नब्बे प्रतिशत से अधिक वोट पड़ने लगें तो वह दिन देश के लोकतंत्र के लिए स्वर्णिम होगा।


शनिवार, 5 मार्च 2022

बाहर युद्ध हो तो अपनी सामथ्र्य का आकलन ज़रूरी है

 

रूस और यूक्रेन का युद्ध एक सबक तो यह सिखाता है कि, चाहे कोई देश तटस्थ होकर रहे, उसे अपनी सीमाओं की सुरक्षा के बारे में और अपनी तैयारियों को लेकर मंथन अवश्य करना चाहिए।

भारत ने अब तक चार बड़ी लड़ाईयां भुगती हैं और छोटी छोटी अनेक जब तब होती रही हैं। ये आंतरिक यानी अपने ही राज्यों में लड़ी जाती रहीं हों, उत्तर पूर्वी राज्यों में सैनिक कार्यवाही हो, कश्मीर में आतंकियों के साथ मुठभेड़ हो, अलगाववादियों और नक्सली इलाकों में संघर्ष हो या फ़िर सामान्य हालात में अपने नागरिकों की रक्षा के लिए उठाए गए कदम हों, कुछ भी हो सकता है।


वास्तविकता क्या है

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि हमारे सैनिकों ने अपने अदम्य साहस और वीरता से विदेशी हमलावरों को खदेड़कर देश की कीर्ति में चार चांद लगाए हैं। दूसरी वास्तविकता यह है कि युद्ध विराम  होने के बाद चाहे पाकिस्तान हो या चीन, दोनों पक्ष जब शांति कायम करने के लिए समझौते के लिए बैठते हैं तो अक्सर युद्ध में विजय हासिल करने के बावजूद हमारा पलड़ा कमज़ोर रहता है।

पाकिस्तान के साथ पहले युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद जिस बात पर अर्थात कश्मीर को लेकर जब हम लड़े तो यह समस्या हल हो जानी चाहिए थी लेकिन हुआ यह कि इसे संयुक्त राष्ट्र की दखलंदाजी के लिए छोड़ दिया गया जिसका परिणाम आज तक भुगत रहे हैं।  हमेशा पाकिस्तान के साथ युद्ध की संभावना बनी रहती है।

इसी प्रकार भारत चीन युद्ध के बाद हमें लद्दाख के बहुत बड़े भूभाग से हाथ धोना पड़ा। 1965 की लड़ाई में मिली जीत का लाभ उठाने से चूक गए और 1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े करने पर भी हम अधिक लाभ में नहीं रहे बल्कि बांग्लादेश के रूप में एक नया प्रतिद्वंदी खड़ा कर लिया।

जहां तक चीन का संबध है उसके साथ भारत के संबंधों को झटका तब लगा जब तिब्बत पर हमला कर उसने उसे अपने राज्य में मिला लिया और वह हमारा निकट पड़ोसी बन गया। चीन की विस्तारवादी नीति के कारण इसका परिणाम भारत चीन सीमा विवाद और 1962 में युद्ध के रूप में सामने आया।


दोस्त और दुश्मन

भारत और पाकिस्तान के बारे में कहा जा सकता है कि शायद ही दुनिया में ऐसे दो देश हों जो इतने समान हों लेकिन दोनों के बीच मैत्री न होकर शत्रुता हो। इसी तरह चीन ने दोस्ती की आड़ लेकर दुश्मनी निभाई। इस तरह दो विकट पड़ोसी मिल गए और दोनों ही मित्रता के आवरण में शत्रुओं की भूमिका निभाते रहते हैं। 

अक्सर कहा जाता है कि भारत को पाकिस्तान अथवा चीन में से किसी एक को अपना मित्र बना लेना चाहिए ताकि हर समय रहने वाले तनाव और युद्ध की आशंका को कुछ तो कम किया जा सके। मित्रता के लिए इन दोनों में से किसी एक को चुनना हो तो जहां तक सामथ्र्य की बात है चीन ने व्यापार हो या सामाजिक और आर्थिक विकास, अपना सिक्का दुनिया में जमा लिया है। पाकिस्तान इसमें कहीं नहीं ठहरता।  मेड इन चाइना की धूम का डंका सब ओर बज रहा है।  पाकिस्तान इसके मुकाबले कहीं नहीं है।

भारत की यदि प्रतियोगिता है तो वह चीन से है, इसलिए क्या यह समझदारी नहीं होगी कि भारत चीन से हाथ मिलाकर बराबरी का रिश्ता कायम करे ताकि दुश्मनी कुछ तो कम हो!


युद्ध की शिक्षा

रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए भारत के लिए ज़रूरी हो जाता है कि वह अपने नागरिकों के लिए ऐसी शिक्षा की व्यवस्था करे जिसमें स्कूल से ही सेना से संबंधित विषयों की जानकारी विद्यार्थियों को होती रहे। इसका मतलब यह नहीं कि सैनिक प्रशिक्षण दिया जाए बल्कि यह है कि सिलेबस में युद्ध और उससे संबंधित नीतियों की समझ शामिल हो और विद्यार्थी एक विषय की तरह इसका अध्ययन करें। 

भारत के इतिहास पर दृष्टि डालें तो वैदिक काल से, विशेषकर गुरुकुल परंपरा में और उसके बाद भी विद्यार्थियों को युद्ध करने, चक्रव्यूह की रचना और उसका विध्वंस करने, विभिन्न अस्त्र शस्त्रों के बारे में शिक्षित करने, लड़ाई में किस तरह के व्यवहार की अपेक्षा होती है जैसी बातों को एक विषय की तरह पढ़ाया जाता था।

इसमें यह भी शामिल होता था कि युद्ध के दौरान घायल सैनिकों की चिकित्सा और मृत्यु होने पर उनके शवों की अंतिम क्रिया किस प्रकार हो। इसी के साथ युद्ध में सैनिकों के लिए पर्याप्त भोजन, युद्ध बंदियों के रखने की व्यवस्था और यदि विजय होती न दिखाई दे तो शत्रु के हाथ लगने से बचने की विधि तथा उन सभी वस्तुओं का ज्ञान देना शामिल था  जिनकी सफल युद्ध संचालन में प्रमुख भूमिका रहती है।

जब युद्ध शिक्षा को व्यापार, वाणिज्य, विज्ञान, अर्थशास्त्र, इतिहास तथा अन्य विषयों की भांति एक अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाएगा तो विद्यार्थी के सामने एक और विकल्प होगा, वह भारतीय सेनाओं में भी अपना भविष्य देख सकता है ! सैनिक स्कूल उसके लिए उसी प्रकार उच्च शिक्षा के केंद्र होंगे जिस प्रकार अन्य विषयों की पढ़ाई के लिए वह उनसे संबंधित केंद्रों का चुनाव करता है और उनमें दाखिले के लिए कोचिंग और ट्रेनिंग हासिल करता है।

युद्ध को शिक्षा का विषय बनाने का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि लड़ाई होने पर कोई भी व्यक्ति अपने को असहाय महसूस नहीं करेगा बल्कि युद्ध क्षेत्र में न रहते हुए भी अपनी और अपने परिवार की रक्षा करने में समर्थ होगा। उसे पता होगा कि उसे क्या करना है जैसे कि शत्रु की चाल को समझना, उसके जासूसों की पहचान करना, युद्ध लड़ रहे सैनिकों की ज़रूरत के अनुसार जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति बनाए रखना आदि ।

परिवारों तथा सामान्य व्यक्तियों की रक्षा के लिए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने के प्रबंध करने जैसी बातों को जब एक विषय की तरह पढ़ाया जाएगा तब युद्ध काल में सरकार का पूरा ध्यान विजय प्राप्त करने में लगेगा क्योंकि तब उसे अपने नागरिकों की सुरक्षा की व्यवस्था करने में अपनी ऊर्जा कम से कम लगानी होगी।

विद्यार्थी जीवन में ही यह पता होगा कि हमारे देश की सैन्य क्षमता क्या है । हथियारों के निर्माण और उन्हें खरीदने की प्रक्रिया और उनकी सर्विसिंग जैसी बारीकियों का ज्ञान उसके पास होने से एक सामान्य व्यक्ति युद्ध में भाग न लेते हुए भी अपना महत्वपूर्ण योगदान कर सकता है।

युद्ध शिक्षा के पाठ्यक्रम में यह भी बताया जाए कि युद्ध विराम होने पर किस तरह से नेगोशिएशन करना है, उसकी प्रक्रिया शुरू करने से पहले किन बातों को ध्यान में रखते हुए बातचीत करनी है। गोपनीयता का क्या महत्व है और अपनी शर्तों पर कायम रहने के लिए वार्ता का रुख किस प्रकार अपने पक्ष में किया जा सकता है।

इसी प्रकार युद्ध नीति बनाते समय शत्रु को परास्त करने का लक्ष्य कैसे प्राप्त करना है, उसकी कमियों को उसके किस व्यवहार से जाना जा सकता है, उसकी ताकत का अंदाज़ लगाने और उसके अनुरूप कार्यवाही करने के लिए क्या जरूरी संसाधन हैं, इन सब बातों का आकलन करने की प्रक्रिया सिलेबस में शामिल हो।

युद्ध शिक्षा को हमारे स्कूल कालेजों और उच्च शिक्षा संस्थानों में एक विषय के रूप में शामिल करने और उसमें डिग्री हासिल करने से हमारी सेना के आर्थिक, प्रशासनिक और सामरिक महत्व के प्रतिष्ठानों के लिए योग्य व्यक्ति सुगमता से मिलने लगेंगे। इसी प्रकार डॉक्टर, इंजीनियर, आर्किटेक्ट तथा अन्य व्यवसायों से जुड़े विषयों में पारंगत व्यक्ति भी सेना की ओर जुड़ेंगे।

युद्ध शिक्षा को शिक्षण व्यवस्था का अंग बनाए जाने के बारे में गंभीरता से सोचने का यही समय है


शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2022

सब कुछ ठीक या कुछ भी सही नहीं का द्वंद सोच बदल सकता है

अक्सर स्वयं हम यह कहते सुनाई देते हैं और अपने आसपास के लोगों से भी अक्सर सुनने को मिलता है कि जीवन में कुछ नहीं हो पा रहा, जीने का कोई मतलब नहीं रहा, कैसा होगा कल, परेशानियां ख़त्म नहीं होतीं, समस्याएं बहुत हैं, उनका हल दिखता नहीं, क्या करें और क्या न करें ? इसी उधेड़बुन में दिन समाप्त हो जाता है और अगला दिन भी इन्हीं बातों में निकल जाता है।

इसके विपरीत कुछ लोग और हम स्वयं भी यह सोचते और कहते सुनाई देते हैं कि सब कुछ ठीक है, कोई दिक्कत है ही नहीं, किसी तरह की उलझन नहीं, जो हुआ, वह ठीक, जो हो रहा है, बेहतर है और जो होगा, सब से बढ़िया होगा।

 सरोकार

संसार में जितने भी ऐसे व्यक्ति हुए हैं जिनके काम याद आते रहते हैं, उनके अविष्कार, अनुसंधान, प्रयोग और उपलब्धियों से निरंतर लाभ उठाते रहते हैं, उनके प्रति आभार मानते हुए यह कहते नहीं थकते कि उन्होंने यह न किया होता तो हमारा जीवन कैसा होता !

इनमें वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यों से जुड़े लोग और राजनेता सभी शामिल हैं । यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। आज भी कुछ लोग बिना किसी बात से विचलित हुए अपनी धुन में लगे, कुछ न कुछ नया करने की कोशिश करते रहते हैं। 

उनके लिए सफल होने या अपने काम में कामयाब न होने का अर्थ एक जैसा ही है और उनकी सेहत पर, चाहे मानसिक हो या शारीरिक, सफलता या असफलता से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। असल में इन दोनों शब्दों का उनके लिए कोई अर्थ नहीं, उनका लक्ष्य या उद्देश्य ही प्रमुख है। ऐसा इसलिए है कि उनकी दुनिया केवल स्वयं से सरोकार रखने की है, बाहर की कोई चीज़ उन्हें प्रभावित नहीं कर पाती। इनमें नायक भी हो सकते हैं, खलनायक और अधिनायक भी जो अपने मिशन को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते है।

विचार का सिद्धांत

दुनिया की कोई भी चीज हो, उसकी शुरुआत एक विचार से होती है और जैसे जैसे वह वस्तु बढ़ने लगती है, दूसरे लोगों की सोच उसमें शामिल होती जाती है और एक दिन उसका आकार इतना बड़ा हो जाता है कि वह व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है। उसके बिना रहने की कल्पना से भी डर लगता है। ज़रा सोचिए कि अगर हम अपने मन से उस वस्तु को हटा देते, उस पर ध्यान नहीं देते तो क्या उसका ऐसा अस्तित्व होता कि जिसके बिना जीवन की कल्पना भी आसान नहीं होती ।

इसके पीछे और कुछ नहीं, बस एक छोटा सा सिद्धांत है कि जब हम किसी वस्तु, व्यक्ति या वातावरण के प्रति खिंचाव महसूस करते हैं तो उसके हमारे जीवन का अंग बन जाने से यह अनुभव होता है कि वह साथ में ही तो है, चिंता की क्या बात है, सब कुछ ठीक होगा, बस अपने काम से काम रखिए।

मान लीजिए कि आपको धन का आकर्षण है और धनी बनना चाहते हैं तो क्या मन में यह बात नहीं बस जाती कि धन दौलत जमा करने के लिए किसी भी उपाय का सहारा लेने में कोई हर्ज नहीं है । वह सही है या गलत, इसका विचार किए बिना सम्पत्ति, वैभव और उसका विस्तार करते जाना ही एकमात्र लक्ष्य होता है। यह सोच जितनी ताकतवर होती है उतना ही व्यक्ति अमीर होता जाता है।

यही कारण है कि केवल एक प्रतिशत लोगों का कब्ज़ा पूरी दुनिया के छियानवे प्रतिशत संसाधनों पर है जिसकी बदौलत उनके पास अकूत संपत्ति है। बाकी निन्यानवे प्रतिशत लोग उनसे ईष्र्या करते रहते हैं, नकारात्मक ढंग से सोचते रहने से हमेशा अपने लिए बुरे विचारों की कल्पना करते रहते हैं और उनकी यही सोच उनके अपने लिए सत्य होती दिखाई देती है।

आग में घी डालने की तरह संपन्न और ताकतवर लोग आपको गरीब होने, बेरोजगार रहने और कभी भी संपन्न न होने देने के लिए लगातार आपका मनोबल गिराते रहते हैं और वही बात मानने पर ज़ोर डालते रहते हैं जो असल में आप नहीं हैं। इस तरह वे हतोत्साहित करते रहते हैं और आपको स्वयं अपना और एक दूसरे का प्रतिद्वंदी बनाने से लेकर दुश्मन तक बना देते हैं।

हकीकत यह है कि न आप निर्धन हैं, न निकम्मे और प्रतिभाहीन हैं । आप सभी तरह से सक्षम हैं, बस आपकी सोच पर धनीमानी, अभिमानी और सत्ताधीशों का कब्ज़ा हो जाने से अपने को कमज़ोर और अयोग्य मान लेते हैं।

आभार और आकार

असल में होता यह है कि व्यक्ति आपनी परिस्थितियों के वश में आकर स्वयं के बारे में इस तरह का एक आकार या डिज़ाइन बना लेता है जिसमें वह अपने बारे में बुरा सोचता है, अपनी कमियों को हावी होने देता है और पूर्ण रूप से ईश्वर अर्थात भाग्य पर निर्भर हो जाता है।

इस स्थिति में उसके मन और विचार पर उसका अधिकार नहीं रहता तथा वह सरल शब्दों में कहें तो दूसरों के हाथों की कठपुतली बन जाता है।  उनके इशारों पर चलने लगता है और अपना स्वाभिमान तक खो बैठता है। होता यह है कि वह अपने प्रति आभार मानने और अपनी बुद्धि के अनुसार चलने को अहमियत न देते हुए दूसरों की कुटिलता का शिकार होता जाता है। वह जैसी स्थिति है उसी में रहने को ही अपनी किस्मत मान लेता है और पीछे रह जाता है।

इसे समझने के लिए क्या इतना ही काफ़ी नहीं है कि आज भी हमारे देश में एक बड़ी आबादी को अब से पचास साल पहले की स्थिति में रहना पड़ रहा है। इसका एक ही कारण है कि हम अपना धन्यवाद करने, अपने प्रति आभार मानने और अपने को समर्थ समझने के स्थान पर उन लोगों की बातों को पत्थर की लकीर मान लेते हैं जिनका उद्देश्य हमें कभी भी अपने बराबर न होने देना है।

अपने से सरोकार

जीवन में सफल होने, परिवार हो या समाज या फिर देश हो, अपनी जगह पाने तथा किसी भी कीमत पर स्वयं का निरादर न तो करने और न ही होने देने का एक ही मंत्र है कि आपके पास जो भी है, उसके प्रति आभार मानिए क्योंकि वही आपकी समृद्धि का बीज है। उसमें अंकुर फूटने दीजिए और फिर देखिए कि किस प्रकार यह एक मज़बूत पेड़ बनता है जिस पर किसी और का नहीं, केवल आपका अधिकार है।

आपके अपने पास जो है और जो आसपास है, वह अमूल्य है, उसकी प्रशंसा करने से उसका आशीर्वाद मिलेगा और तब व्यक्ति किसी अन्य पर निर्भर रहने के स्थान पर स्वयं अपने पर ही भरोसा करेगा। खुशहाली का मूल तत्व यही है। ऐसा होने पर  आसानी से समझा जा सकता है कि कोई दूसरा उस पर क्यों मेहरबान हो रहा है, मुफ्त में कुछ देने या मिलने का वायदा कर अपना कौन सा स्वार्थ पूरा कर रहा है ? क्या इसके बदले में वह आपका स्वाभिमान तथा स्वतंत्रता तो नहीं छीन रहा ?

आत्मविश्वास, आत्मनिर्भर, आत्मसम्मान जैसे भारी भरकम शब्दों के फेर में पड़ने से अच्छा है कि जैसे आप हैं, जो कुछ अपने पास है, उस पर भरोसा रखिए, उसके बाद कुछ भी करने की हिम्मत तो अपने आप आ ही जायेगी।


शनिवार, 19 फ़रवरी 2022

धार्मिक चिन्ह/पढ़ाई से बेहतर है ऐसी शिक्षा जो वैज्ञानिक सोच बढ़ाए

 

संसार में जितने भी धर्म हैं, प्रत्येक का एक न एक प्रतीक अवश्य है जिसके आधार पर उसके मानने वालों की पहचान से लेकर उनके जीवन जीने के तरीकों का ज्ञान होता है।


धर्म और जीवन शैली

धार्मिक प्रतीकों के अतिरिक्त सभी धर्मो में इस बात का वर्णन है कि जीवन जीने के लिए किन सिद्धांतों, मान्यताओं, परंपराओं, रीति रिवाजों और अन्य धर्मों के साथ तालमेल बिठाए रखने के लिए किन नियमों का पालन करना चाहिए। इसका उद्देश्य यही है कि धार्मिक आधार पर कोई लड़ाई झगड़ा, तनाव, संघर्ष और वैमनस्य न हो और सभी शांति और सद्भाव से एक दूसरे से प्रेमपूर्वक व्यवहार करते हुए मिलजुलकर रहें।

यहां तक तो ठीक था लेकिन जब इस धार्मिक समझदारी में अपने धर्म को दूसरों से श्रेष्ठ समझने की मानसिकता बढ़ने लगी तो उसमें एक तरह का जिद्दीपन शामिल होता गया।

इसका खतरनाक नतीज़ा यह निकला कि धार्मिकता का स्थान धर्मांध कट्टरता ने ले लिया और लोग इसे ही वास्तविक धर्म समझने लगे। यहीं से असहिष्णुता यानी टॉलरेंस न होने की शुरुआत हुई और समाज विरोधी तत्वों को मौका मिल गया कि वे धार्मिक आधार पर समाज को बांट सकें।

संयोग देखिए कि दुनिया के लगभग एक तिहाई देशों के राष्ट्रीय ध्वजों में धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल हुआ है और इनमें भारत का तिरंगा भी है।

जहां एक ओर धर्म का आधार मन और शरीर की पवित्रता, विचारों की पावनता, अध्यात्म की ओर ले जाने वाली मानसिकता, दैवीय शक्तियों की अनुकंपा है, वहां दूसरी ओर जीवन जीने की अपनी विशिष्ट शैली भी है। ज़िंदगी और मौत के बीच का सफर किस तरह से तय किया जाए, यह प्रत्येक धर्म में अलग अलग भले ही हो लेकिन उसका लक्ष्य केवल एक ही है कि धार्मिक भावनाओं को कभी भी आपसी मतभेद का आधार न बनने दिया जाए।


धर्म और शिक्षा

धर्म का काम है लोगों को जोड़कर रखना और शिक्षा का उद्देश्य है कि बिना धार्मिक भेदभाव किए व्यक्ति का बौद्धिक विकास कैसे हो, इसकी रूपरेखा बनाकर व्यक्ति को इतना सक्षम कर देना कि वह अपनी रोज़ी रोटी कमा सके और स्वतंत्र होकर जीवन यापन कर सकने योग्य हो जाए।

किसी भी शिक्षण संस्थान द्वारा धार्मिक प्रतीक चिन्हों का इस्तेमाल उचित तो नहीं है लेकिन यह किया जाता है। हो सकता है कि अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए ऐसा किया जाता हो लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वहां पढ़ने वालों के लिए यह ज़रूरी कर दिया जाए कि वे उस धर्म के अनुयायी भी बन जाएं।

शिक्षा का आधार किसी धर्म की मान्यताओं के अनुसार शिक्षा नहीं बल्कि आधुनिक और वैज्ञानिक सोच का विकास होना चाहिए। यही कारण है कि शिक्षण संस्थानों से यह उम्मीद की जाती है कि वे उनमें पढ़ने वाले विद्यार्थियों को धर्म का महत्व तो बताएं लेकिन किसी एक धर्म को बेहतर और दूसरों को कमतर न दिखाएं। इसके साथ एक ही धर्म क्यों, देश में प्रचलित सभी धर्मों के बारे में इस प्रकार बताया जाए कि उनमें आपस में तुलना, प्रतिस्पर्धा और प्रतियोगिता की भावना विद्यार्थियों में न पनपे।

अब हम इस बात पर आते हैं कि क्या धर्म के आधार पर विद्यार्थियों का पहनावा अर्थात उनकी ड्रेस को तय किया जा सकता है ? इस बारे में अनेक मत हो सकते हैं लेकिन व्यावहारिकता यही है कि इसमें धर्म, उसके प्रतीक चिन्ह और धार्मिक आधार पर तय किए गए लिबास का कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

एक दूसरा मत यह है कि जब विभिन्न धर्मों के विद्यार्थी अपनी धार्मिक पहचान दर्शाने वाले वस्त्र पहनकर स्कूलों में जायेंगे तो उनमें बचपन से ही एक दूसरे के धर्म को समझने और उसका आदर करने की भावना विकसित होगी। वे बड़े होकर अपने धर्म का पालन करते हुए अन्य धर्मों के मानने वालों का सम्मान करेंगे और इस तरह धार्मिक एकता की नींव पड़ना आसान होगा।

एक तीसरा मत यह भी है कि जिस प्रकार फ्रांस ने अपने यहां शिक्षा को धार्मिक प्रतीकों और धार्मिक आचरण से अलग रखा है और किसी भी प्रकार का दखल न होने देने की व्यवस्था की है, उसी प्रकार हमारे देश में भी किया जा सकता है !

यह व्यवस्था हमारे यहां लागू होना संभव नहीं लगती क्योंकि सिख धर्म के विद्यार्थियों द्वारा अपने केश बांधने के लिए पगड़ी धारण करने की परम्परा है और इसी आधार पर इस्लाम को मानने वाले मुस्लिम छात्राओं के लिए भी हिजाब और बुर्का पहनने की अपनी मांग को उचित बता रहे हैं।

विवाद का हल चाहे जो हो लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि विद्यार्थियों की शिक्षा किसी भी कीमत पर नहीं रुकनी चाहिए। इसके लिए  यदि उन्हें नियमों में कुछ ढील भी देनी पड़े तो यह ठीक होगा क्योंकि ज़िद्दी रुख अपनाने से अच्छा लचीला बर्ताव करना है।

इस संदर्भ में इकबाल का यह अमर गीत आज एक बार फिर गुनगुनाना जरूरी हो गया है।


तराना. ए. हिन्दी

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा,

हम बुलबुले हैं इसकी यह गुलिस्तां हमारा।

गुबर्त में हों अगर हम रहता है दिल वतन में,

समझो वहीं हमें भी दिल हो जहां हमारा।

पर्वत वह सबसे उंचा हमसाया आसमां का,

वह संतरी हमारा वह पासबां हमारा।

गोदी में खेलती हैं इसकी हजारों नदियां,

गुलशन है जिसके दम से रश्के-जिनां हमारा।

ऐ आबे-रूदे-गंगा वह दिन है तुझ को,

उतरा तिरे किनारे जब कारवां हमारा।

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,

हिंदी हैं  हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा।

यूनानो-मिस्त्रो-रोमा, सब मिट गए जहां से,

अब तक मगर है बाकी नामो--निशां हमारा।

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,

सदियों रहा दुश्मन दौरे-ज़मां हमारा।

इक़बाल, कोई महरम अपना नहीं जहां में।

मालूम क्या किसी को दर्दे-निहां हमारा।


शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

भोलापन, सादगी और भलमनसाहत कब बेईमान बना देती है ?


मानव का स्वभाव है कि वह जैसे वातावरण और जिन लोगों के बीच रहता है, उसी के अनुसार अपने को ढाल लेता है। अगर वह न भी ढलना चाहे तो उसके साथी, संघाती और परिवार के लोग दूसरों के उदाहरण देकर ढलने के लिए विवश कर देते हैं।

अगर कहीं इसमें सरकार के नियम, उसके कर्मचारी और ओहदेदार शामिल हों तब तो व्यक्ति के पास कोई विकल्प ही नहीं रहता कि वो अपने को यथा राजा तथा प्रजा की कहावत के अनुसार पूरी तरह से समय रहते न बदल ले।

गरीब से गरीबदास

हमारे देश के उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की  कहानी का एक पात्र है जिसका नाम उन्होंने गरीब रखा जो बाद में अपने सहयोगियों की कृपा से गरीबदास हो गया।

गरीब एक गांव से शहर आकर चपरासी की नौकरी कर लेता है। यहां उसके साथी उसके भोलेपन और सादगी तथा भलमनसाहत का पूरा फ़ायदा उठाते हैं। वह मेहनत से काम करता है और उसके साथी अपना काम भी किसी न किसी बहाने से उससे कराते रहते हैं और यह बिना किसी विरोध के उनके काम करता रहता है। इस सब के बावजूद उसके साथी उसका अपमान करते रहते हैं और तनिक सी भी भूल होने पर गाली देने से लेकर पिटाई तक कर देते हैं।

एक दिन बड़े बाबू की मेज साफ करते हुए दवात के उलट जाने से स्याही फैल गई और इस बात पर बहुत डांट पड़ी। एक व्यक्ति ने बीच बचाव करते हुए कहा कि इसे माफ कर दें लेकिन तब ही दूसरा साथी बोला कि इसके गांव में इसके खेतों में अनाज, सब्जी, फल खूब होते हैं, पशुधन भी है लेकिन क्या मजाल कि इसके मन में कभी विचार भी आया हो कि यहां अपने साथियों को कुछ लाकर दे, कंजूस ही नहीं मक्खीचूस है।

गरीब अब तक सोचता था कि उसके खेत में जो उगता है, पशु जो दूध देते हैं, वह सब इन शहर में रहने वालों को क्योंकर अच्छा लगेगा बल्कि उसे गंवार कहा जायेगा। उसके पास पुश्तैनी ज़मीन है जिस पर खेतीबाड़ी होती है, दुधारू पशु हैं जिनसे अच्छी खासी आमदनी होती है । गांव में उसके लिए करने को कुछ काम नहीं था तो वह शहर आ गया और यहां चपरासी की नौकरी कर ली ।

यहां तक तो ठीक था लेकिन वह अपने साथ अपनी सादगी और ईमानदारी को भी गांव से ले आया था जिसके कारण उसे हिकारत से देखा जाता था।  घर आते समय उसके ही गांव का एक व्यक्ति मिला और उसे अपनी परेशानी बताई।  उसने सलाह दी कि एक बार वह अपने घर से कुछ समान लाकर इन्हें देकर देख ले कि शायद फिर उसका अपमान न हो।

गरीब ने ऐसा ही किया । दूध, गन्ने का रस और मटर तथा कुछ दूसरी चीजें लेकर दफ्तर पहुंचा लेकिन अंदर जाकर किसी को देने की हिम्मत न हुई। इतने में बड़े बाबू आए और उन्होंने इन चीजों को देखकर डांटा कि यह सब क्या है ? गरीब ने कहा कि आपके लिए लाया हूं। बड़े बाबू ने नकली मुस्कान से उस पर एहसान करते हुए आधी चीजें अपने घर भिजवा दीं और बाकी अन्य साथियों में बांट दी।

इसके बाद उसका नाम गरीबदास हो गया, सब साथी खुश दिखाई दिए और उससे इज्जत से पेश आने लगे। उसे अपने प्रति व्यवहार में हुए बदलाव का मंत्र मिल गया था । वह अब अक्सर जो चीजें बेकार समझकर या उपयोग में न आने से फेंक दी जाती थीं, वह दफ्तर में अपने साथियों और अधिकारियों को देने लगा। जब मन करता छुट्टी कर लेता, देर से पहुंचता और बिना दफ्तर जाए हाज़िरी लगवा लेता।

ऊपरी कमाई का अवसर

एक दिन उसे रेलवे स्टेशन से कुछ पार्सल लाने का काम दिया गया। उसने ठेला किया और बारह आने मजदूरी तय की। दफ्तर पहुंचकर खजांची से पैसे लिए और ठेले वाले को देने से पहले अपने लिए चार  आने मांगे। मजदूरों ने मना किया तो धमकी दी कि अब एक भी पैसा नहीं देगा, जो चाहो कर लो। मज़बूरी में मज़दूरों ने आठ आने लेकर बारह आने की रसीद दी और चले गए।

यह कहानी बहुत साधारण है और आज़ादी के बाद अब से साठ साल पहले लिखी गई थी लेकिन सोच में डालने के लिए काफी है कि तब से लेकर आज तक हमारी सामाजिक व्यवस्था, सोच और कार्यप्रणाली में कोई फर्क ही नहीं पड़ा ।  मनुष्य काईयां, बेईमान, रिश्वतखोर क्यों बनता है और ऊपर की आमदनी को क्यों अपनी प्रमुख आय समझता है, इस सोच में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता । जमाखोरी, कालाबाजारी, मिलावट करने से लेकर टैक्स चोरी के नए तरीकों की खोज तथा कर्ज़ लेकर उसे न चुकाने की मानसिकता बनने और आर्थिक घोटालों पर जाकर भी नहीं थमता।

यह एक सच्चाई है कि जिस व्यवस्था में ईमानदारी को मूर्खता समझा जाए और दंड से अनैतिक आधार पर बच जाने को चतुराई तो वहां के निवासियों के सामने विकल्प ही नहीं रहता कि वह नियमों का उल्लंघन और कानून का निरादर न करें।

किसी भी देश, समाज या परिवार का आधार उसकी वर्तमान पीढ़ी होती है, अगर वह चाहे तो समय की विपरीत धारा को भी मोड़ सकती है और न चाहे तो बहती धारा में गोते लगाकर अपने स्वार्थ की पूर्ति कर सकती है।

आज जो आपाधापी और कोई भी मार्ग अपनाकर दूसरों से आगे निकलने की होड़ है, उसके सामने नैतिक मूल्यों, आदर्शों का कोई मोल नहीं है। गरीबी इतना बड़ा अभिशाप नहीं है जितना कि गरीबदास बनकर छल कपट से अपने लिए सुख साधन और संपत्ति अर्जित करना।


शनिवार, 29 जनवरी 2022

महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस और जवाहर लाल नेहरु की कल्पना का भारत कैसा था ?

 

जनवरी का तीसरा सप्ताह यानी तेईस से तीस तारीख का समय, देश भर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जन्मतिथि, गांधी जी की पुण्य स्मृति और गणतंत्र दिवस समारोह तथा अपनी सैनिक क्षमता पर गर्व करने का अवसर बन जाता है। इसी के साथ बापू के उपदेशों या उनके सिद्धांतों का उल्लेख करने और उन पर अपनी राय जाहिर करने का मौका भी मिल जाता है। इस बात पर बहुत कम लोगों का ध्यान जाता है कि इन दोनों महापुरुषों ने देश के स्वतंत्र होने के बाद उसका संचालन किस प्रकार हो, इसकी क्या रूपरेखा बनाई थी ?

गांधी बनाम बोस

इस पृष्ठभूमि में यह आकलन करना ज़रूरी हो जाता है कि उनमें से कौन सही या गलत था और यदि कोई अन्य विकल्प अपनाया जाता तो क्या देश का वही स्वरूप होता जो आज है ?

इन दोनों के संबंधों, सोच और कार्य प्रणाली पर विचार करते हुए तीसरे महानायक पंडित नेहरू का ध्यान आना स्वाभाविक है। कह सकते हैं कि ये भारत की त्रिमूर्ति थे और यदि सरदार पटेल को इसमें मिला दिया जाए तो चार मुख वाले साक्षात ब्रह्मा की आकृति बनकर उभरती है। ये चारों नायक देशभक्ति, कर्तव्य परायणता और समर्पण की अद्भुत शक्ति धारण किए हुए थे और इसी कारण जनता उन पर भरोसा करते हुए अपनी जान तक न्यौछावर करने के लिए तैयार रहती थी।

आज क्योंकि इंटरनेट और गूगल की कृपा से इतिहास की प्रकट और गोपनीय सामग्री उपलब्ध है इसलिए बहुत सी घटनाओं की सत्यता की पुष्टि कर लेने के बाद उन पर विचार और मंथन वर्तमान स्थिति को सामने रखकर किया जा सकता है। इससे यह निष्कर्ष निकालने में सुविधा है कि कौन सा मत या विचारधारा अधिक उपयुक्त थी।

क्या आज देश के संचालन में उनका महत्व स्वीकार कर भविष्य की योजनाएं बनाई जा सकती हैं ताकि देश अधिक गति से प्रगति कर सके ?

सबसे पहले सुभाष चंद्र बोस के उस भाषण को सामने रखते हैं जो उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में दिया था। उनका कहना था कि स्वतंत्र भारत की पहली प्राथमिकता गरीबी मिटाने, बेरोज़गारी दूर करने और देश को शिक्षित करने की है। इसके लिए उन्होंने प्लानिंग अर्थात योजना बनाकर काम करने की राह दिखाई। एक समिति बनाई जिसका अध्यक्ष पंडित नेहरू को बनाया ताकि वे स्पष्ट रूप से दिशा निर्धारण कर सकें। आज के योजना आयोग की यह नींव थी।

उनका मानना था कि देश में वर्ग हीन समाज का निर्माण समाजवाद को आधार बनाकर हो। इसकी पूर्ति के लिए औद्योगिकीकरण का विस्तार हो और  कृषि विकास दूसरे नंबर पर हो। वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आधुनिक मशीनरी का आयात तथा उसका अपने हिसाब से इस्तेमाल करने की दृष्टि हो।

शिक्षा सबके लिए एक समान हो और उस पर सबका अधिकार हो तथा यह सबके लिए एक जैसी और आसानी से सुलभ हो। उनका मानना था कि भेदभाव रहित शिक्षा से ही समाज से बेरोज़गारी और गरीबी को ख़त्म किया जा सकता है।

उन्होंने अपने विशाल अनुभव और अनेक देशों में इस्तेमाल की गई व्यवस्थाओं का अध्ययन करने के बाद ही यह बातें कही थीं। यहां यह ध्यान दिलाना ज़रूरी है कि सुभाष चन्द्र बोस के पास नगर निगम के प्रशासक के रूप में व्यावहारिक अनुभव था और वे जनता की समस्याओं को समझने और उनके समाधान निकालने के लिए प्रसिद्ध थे।

बोस बनाम गांधी

अब हम महात्मा गांधी की बात करते हैं जो वर्ग हीन समाज के स्थान पर पिछड़े, दलित, हरिजन और अनेक जातियों में बंटे समाज के विकास के लिए उनके अधिकारों को सुरक्षित रखने की बात करते हैं। इसके लिए वे उन्हें मिलाकर एक विशाल समाज तैयार करने के स्थान पर अलग अलग रखने को ही उनकी उन्नति का आधार बनाते हैं।

आज हमारा देश वर्ग संघर्ष, जातिवाद और अल्पसंख्यक समुदाय के उत्पीड़न और इसके साथ ही अपने स्वार्थों के कारण उनके तुष्टिकरण के जिस दौर से गुजर रहा है, उसकी नींव आज़ादी के तुरंत बाद पड़ गई थी। यदि हम बोस की वर्ग हीन समाज की नीति पर चलते तो क्या बेहतर नहीं होता ?

देश को कृषि प्रधान बनाने के प्रयास गांधी जी की देन हैं और उसमें भी परंपरागत साधनों जैसे कि हल बैल से खेती करने को ही प्राथमिकता देने और वैज्ञानिक तरीकों को न अपनाने का परिणाम क्या आज तक हम नहीं भुगत रहे हैं ?

गांधी जी मशीनों के इस्तेमाल और यहां तक कि रेल, अस्पताल की ज़रूरत नहीं समझते थे । अंग्रेजी दवाइयों का इस्तेमाल न करने पर ज़ोर देते थे और यहां तक कि परिवार नियोजन के लिए गर्भ निरोधक सामग्री के इस्तेमाल को बुरा समझते थे। इसके लिए आत्मसंयम रखने को प्रोत्साहित करते थे। उनके लिए नवीन टेक्नोलॉजी पर आधारित औद्योगिक भारत के स्थान पर ग्रामीण और कुटीर उद्योग का विकास प्राथमिकता थी।

गांधी जी आध्यात्मिक राजनीतिज्ञ थे जबकि सुभाष आधुनिक राजनेता थे। नेहरू भी चाहते थे कि हम स्वदेशी संसाधनों के बल पर ही विकास करें जबकि बोस विदेशों से अपनी आवश्यकतानुसार सभी चीजों का आयात करने के हिमायती थे। नेहरू द्वारा आयात और विदेशी पूंजी निवेश पर कड़े नियम बनाने से हम विदेशी तकनीक और पूंजी निवेश से वंचित हो गए। इस नीति को जब पूरी तरह से बदल दिया गया तब ही देश आत्मनिर्भर होना आरंभ हुआ, क्या यह गंभीरता से सोचने का विषय नहीं है ?

नेहरू और बोस दोनों गांधी जी को अपने पुत्रों की भांति प्रिय थे लेकिन जब उत्तराधिकारी की बात आई तो उन्होंने भारतीय सामंती व्यवस्था के अनुसार बड़े पुत्र को चुना, यदि योग्यता का आधार होता तो सुभाष हर प्रकार से अधिक काबिल थे और लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनकी दावेदारी प्रबल थी।

जहां तक नेहरू और बोस की शिक्षा का संबंध है, दोनों ही ने समृद्ध परिवारों से होने के कारण विदेशों में शिक्षा प्राप्त की। उन्हें दुनिया देखने और उनके तरक्की करने के उपायों को जानने समझने का अवसर मिला और वे अपने देश को अपने अनुभवों से समृद्ध करना चाहते थे। इसके लिए सबसे पहले ज़रूरी था कि आज़ादी और वह भी सम्पूर्ण रूप से हासिल की जाए।

सुभाष चंद्र बोस आज़ादी हासिल करने के लिए किसी भी साधन का इस्तेमाल करने और किसी की भी सहायता अपनी शर्तों पर लेने के लिए कोई भी हद पार कर सकते थे। इसके लिए वे विदेशी धरती पर भारत की आज़ादी की घोषणा कर सकते थे, अंग्रेजों की नाक में दम कर सकते थे। आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना, दिल्ली चलो का नारा और जय हिन्द का उदघोष उनकी राजनीतिक सूझबूझ का परिचायक है।

पता नहीं यह कितना सत्य है कि जब लॉर्ड ऐटली के भारत प्रवास के समय यह पूछा गया कि भारत को आजाद कराने में गांधी और सुभाष में से किसका योगदान अधिक है तो उनका जवाब था कि अंग्रेजी हुकूमत के लिए बोस अधिक खतरनाक थे और उनके कारण ही अंग्रेज भारत से अपना बोरिया बिस्तर समेटने के लिए मजबूर हुए। इसके विपरीत गांधी जी का भय उन्हें ज्यादा नहीं था और उन्होंने अपने जवाब में कहा कि स्वतंत्रता हासिल करने में उनका योगदान बहुत कम था।

उद्योग बनाम कृषि

वर्तमान भारत के संदर्भ में देखा जाए तो औद्योगिक भारत का निर्माण प्रथम स्थान पर और कृषि क्षेत्र को दूसरे स्थान पर रखने से ही देश समृद्ध राष्ट्रों की पंक्ति में आ सकता है। खेतीबाड़ी उतनी हो जिससे खाने पीने की जरूरतें पूरी हो जाएं और उसमें भी  आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल हो जिससे कम से कम लोगों की जरूरत हो। आज किसानों की बढ़ती संख्या और खेतीबाड़ी को लाभदायक व्यवसाय न बनने देने के लिए क्या कृषि को पहले स्थान पर रखना जिम्मेदार नहीं है ?

आज के हालात में वर्ग, जाति, वर्ण, समुदाय के बिना देश को एकसूत्र में बांधने की कल्पना करना असम्भव जैसा लगता है। काश यह संभव हो सके कि एक दिन ये सब निरर्थक हो जाएं ! क्या ऐसा हो सकता है, ज़रा सोचिए?