शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

सृष्टि के अनुसार मनुष्य और पशु पक्षी एक दूसरे पर निर्भर तथा पूरक हैं


अक्सर इंसान और जानवर के बीच संघर्ष होने, एक दूसरे पर हमला करने की वारदात होती रहती हैं। मनुष्य क्योंकि सोच सकता है इसलिए वह अपने लाभ के लिए उनकी नस्ल मिटाने में भी संकोच नहीं करता जबकि प्रकृति की अनूठी व्यवस्था है कि दोनों अपनी अपनी हदों में एक साथ रह सकते हैं।


प्राकृतिक संतुलन

देश में चीते समाप्त हो गए थे और जानकारों के मुताबिक उससे प्राकृतिक संतुलन में विघ्न पड़ रहा था, इसलिए उन्हें फिर से यहां बसाया जा रहा है। कुछ तो महत्वपूर्ण होगा कि यह कवायद की गई। चीता सबसे तेज दौड़ने वाला जीव है, अपनी हदें पार न करने के लिए जाना जाता है, जैव विविधता और इकोसिस्टम बनाए रखने में सहायक है। वन संरक्षण के लिए जरूरी जानवरों की श्रेणी में आता है जैसे शेर, बाघ, तेंदुआ, हाथी, गैंडा जैसे बलशाली, भारी भरकम और बहुउपयोगी पशु हैं।

सभी पशु पक्षी मनुष्य के सहायक हैं लेकिन यदि उनके व्यवहार को समझे बिना उनके रहने की जगह उजाड़ने की कोशिश की जाती है तो वे हिंसक होकर  विनाश कर सकते हैं। उदाहरण के लिए हाथी जमीन को उपजाऊ बना सकता है लेकिन उसे क्रोध दिला दिया तो पूरी फसल चैपट कर सकता है। इसी तरह गैंडा कीचड़ में रहकर मिट्टी की अदलाबदली का काम करता है, प्रतिदिन पचास किलो वनस्पति की खुराक होने से जंगल में कूड़ा करकट नहीं होने देता और उसके शरीर पर फसल के लिए हानिकारक कीड़े जमा हो जाते हैं, वे पक्षियों का भोजन बनते हैं और इस तरह संतुलन बनाए रखते हैं। लेकिन यदि वह विनाश पर उतर आए तो बहुत कुछ नष्ट कर सकता है।

हाथी के दांत और गैंडे के सींग के लिए मनुष्य इनकी हत्या कर देता है जबकि ये दोनों पदार्थ उसकी कुदरती मौत होने पर मिल ही जाने हैं। इन पशुओं के सभी अंग और उनके मलमूत्र दवाइयां बनाने से लेकर खेतीबाड़ी के काम आते हैं और कंकाल उर्वरक का काम करते हैं। ये दोनों पशु कीचड़ में रहकर दूसरे जानवरों के पीने के लिए किनारे पर पानी का इंतजाम करते हैं और सूखा नहीं पड़ने देते, सोचिए अगर ये न हों तो जंगल में प्यास, गर्मी और सूखे से क्या हाल होगा?

मांसाहारी पशु शाकाहारियों का शिकार करते हैं और उनकी आबादी को नियंत्रित करने का काम करते हैं। जो घास फूस खाते हैं, वे वनस्पतियों को जरूरत से ज्यादा नहीं बढ़ने देते और इस तरह जंगल में अनुशासन बना रहता है। इसका प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है और वह प्राकृतिक संतुलन होने से मौसम का मिजाज बिगड़ने से होने वाले नुकसान से बचा रहता है। यदि हम वन विनाश करते हैं, अंधाधुंध जंगलों को नष्ट करते हैं तो उसका सीधा असर हम पर पड़ता है।


निर्भरता

बहुत से पशु पक्षी ऐसे हैं जो न हों तो मनुष्य का जीना मुश्किल हो जाएगा। चमगादड़ जैसा जीव कुदरती कीटनाशक है। यह एक घंटे में खेतीबाड़ी के लिए हानिकारक एक हजार से अधिक कीड़े मकोड़े खा जाता है। मच्छरों को पनपने नहीं देता और इस तरह कृषि और उसमें इस्तेमाल होने वाले जानवरों और दुधारू पशुओं की बहुत सी बीमारियों से रक्षा करता है। उदाबिलाव जैसा जीव बांधों और तालाबों में जमीन की नमी और हरियाली बनाए रखता है। इससे सूखा पड़ने पर आग नहीं लग पाती। वेटलैंड का निर्माण भी करते हैं और जरूरी कार्बन डाइऑक्साइड का भंडार देते हैं।

मधुमक्खी, तितली और चिड़ियों की प्रजाति के पक्षी अन्न उगाने में किसान की भरपूर सहायता करते हैं। परागण में कितने मददगार हैं, यह किसान जानता है। पेस्ट कंट्रोल का काम करते हैं। गिलहरी को तो कुदरती माली कहा गया है। केंचुआ जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए कितना जरूरी है, यह किसान जानता है।

हमारे जितने भी पाले जा सकने योग्य जानवर और दूध देने वाले पशु हैं, उनकी उपयोगिता इतनी है कि अगर वे न हों या उनकी संख्या में भारी कमी हो जाए तो मनुष्य की क्या दशा होगी, इसकी कल्पना की जा सकती है। गाय, भैंस, गधे, घोड़े, बैल, सांड से  लेकर कुत्ते बिल्ली तक किसी न किसी रूप में मनुष्य के सहायक हैं। इसीलिए कहा जाता है कि पशु पक्षी आर्थिक संपन्नता के प्रतीक हैं।

हमारी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने वाले घटकों में पर्यावरण संतुलन, वन संरक्षण, जैव विविधता और मजबूत इकोसिस्टम आता है। हमारा औद्योगिक विकास इन्हीं पर निर्भर है। इसके साथ ही पर्यटन, मनोरंजन, खेलकूद और जीवन के लिए आवश्यक वस्तुएं जुटाने के लिए वन विकास और वन्य जीव संरक्षण जरूरी है। यह समझना सामान्य व्यक्ति के लिए आवश्यक है।

आज विश्व में इस बात की होड़ है कि गंभीर बीमारियों की चिकित्सा के लिए औषधियों की खोज और निर्माण के लिए भारतीय जड़ी बूटियों और पारंपरिक नुस्खों को प्राप्त किया जाए। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय षडयंत्र हो रहे हैं और इस बहुमूल्य संपदा की तस्करी करने वाले बढ़ रहे हैं। यह एक तरह से अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है क्योंकि लालच में आकर हम जो कर रहे हैं वह विनाश का निमंत्रण है।

इस स्थिति में सुधार तब ही संभव है जब सामान्य व्यक्ति यह समझ सके कि मनुष्य और पशु एक दूसरे पर न केवल निर्भर हैं बल्कि पूरक भी हैं। दोनों का अस्तित्व ही खुशहाली का प्रतीक है। यदि जंगल से एक जीव लुप्त हो जाता है तो उसका असर सम्पूर्ण पर्यावरण पर पड़ना स्वाभाविक है। चीता इसका उदाहरण है। इस लुप्त हो गए जीव को फिर से स्थापित करने का प्रयास यही बताता है कि किसी भी भारतीय पशु के लुप्त होने का क्या अर्थ है। इसलिए आवश्यक है कि यह समझा जाए कि इसके क्या कारण हैं?

यदि हम गैर कानूनी शिकार, जानवरों की बस्तियों में इंसान के दखल और थोड़े से पैसों के लाभ को छोड़ने का मन बना लें तो कोई कारण नहीं कि इनकी उपयोगिता समझ में न आए।

औद्योगिक विकास देश की अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है लेकिन यदि इससे जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक असंतुलन पैदा होता है तो दोबारा सोचना होगा। आधुनिक विज्ञान ने इतनी प्रगति कर ली है कि बिना वन विनाश किए उद्योग स्थापित किए जा सकते हैं। यह प्राकृतिक असंतुलन का ही परिणाम है कि हमें प्रति वर्ष अतिवृष्टि या अत्यधिक सूखे का सामना करना पड़ता है। इससे बचना है तो प्रकृति के साथ टकराव नहीं, सहयोग करने की आदत डालनी होगी।


शुक्रवार, 16 सितंबर 2022

प्रसन्न रहने की आदत या दुःख को स्वीकार करना अपने हाथ में है


इस बात का कोई निश्चित पैमाना नहीं है कि एक व्यक्ति क्यों खुश रहता है और लगभग वैसी ही परिस्थितियों में दूसरा क्यों दुःख का अनुभव करता है ? असल में हमारा दिमाग किसी भी घटना चाहे वह कैसी भी हो, उसके बारे में दो तरह से प्रतिक्रिया करता है। एक तो यह कि जो हुआ उस पर वश नहीं इसलिए उसे सहज भाव से स्वीकार कर लेने में ही भलाई है और दूसरा यह कि आखिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ जो यह दिन देखना पड़ा, इसे खु़द पर हावी होने देना।

सब कुछ वश में नहीं होता

अक्सर जीवन में ऐसा कुछ होता रहता है, ऐसे मोड़ आते हैं और इस तरह के हालात बन जाते हैं जिनसे  व्यक्ति स्वयं को किसी मुसीबत में घिरा हुआ और असहाय महसूस करता है। बाहर निकलने के लिए  कोई उपाय नहीं सूझता, उम्मीद लगाता है कि एक तिनके की तरह किसी का सहारा मिल जाए या अचानक कोई रास्ता निकल आए ।

दूसरा विकल्प यह रहता है कि निराशा के भंवर में डूबने के बजाए अपने को उस वक्त तक के लिए तैयार कर लिया जाए जब तक परिस्थितियां सामान्य न हो जाएं। कहने का अर्थ यह कि हर किसी को अपनी समस्या का हल स्वयं ही निकालने के लिए अपने को तैयार करना होता है और जो करना है उसकी भूमिका से लेकर अंतिम प्रयास तक की रूपरेखा बनाने और उस पर अमल करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेनी पड़ती है।

उदाहरण के लिए मान लीजिए कि आपके साथ कोई व्यक्तिगत या पारिवारिक त्रासदी हुई है, कुछ ऐसा हुआ है कि वह हर समय मन पर छाया रहता है, उस घटना ने मानसिक रूप से डावांडोल और विचलित कर दिया है, उसका असर शरीर यानी सेहत पर पड़ने लगा है,  अनमनेपन का भाव और अकेले रहने की आदत बनती जा रही हो तो समझिए कि मामला गंभीर है।

किसी दुर्घटना या जो हुआ उसे बदलना आम तौर से संभव नहीं होता, इसलिए इस तथ्य को स्वीकार करना ही पड़ता है कि जिस चीज के होने पर हमारा वश नहीं तो उसे लेकर हमारी दिनचर्या क्यों प्रभावित हो। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वह घटना हम पर हावी न हो और हम पहले की तरह अपना काम करते रहें। व्यवहार में बदलाव न आने दें और सहज भाव से जो हुआ या हो रहा है, स्वीकार करते हुए आगे जो होगा, उसे भी इसी रूप में लेने के लिए अपने को तैयार कर लें। ऐसा करने का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि शरीर और मन एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण करने के लिए स्वतंत्र होकर तत्पर हो जायेगा।

सुख या दुःख का हावी होना

दुःख हो या सुख, उसे अपने मन पर अधिकार कर लेने देने का कोई औचित्य नहीं क्योंकि दोनों ही हमेशा अपने साथ रहने वाली चीजें नहीं हैं । बेहतर तो यही है कि दोनों को ही कपड़ों पर पड़ी धूल की तरह छिटक देने का प्रयास ही उन्हें हावी न होने देने के लिए काफी है।

दुःख के बेअसर करने की प्रक्रिया यह है कि आप जो काम करते हैं, नौकरी या किसी व्यवसाय का संचालन करते हैं, उसमें पहले से ज्यादा जुट जाएं ताकि जिस चीज ने आपको विचलित किया हुआ है और जिसकी वजह से सुख चैन छिन गया लगता है, उसका ध्यान ही न रहे। अधिक श्रम चाहे मानसिक हो या शारीरिक, थकाने के लिए काफी है और इससे आप को आराम करने, सोने और जो हुआ, उसे याद न करने अर्थात भुलाने में मदद मिलेगी। इससे जल्दी ही वह क्षण आ सकता है जिसमें वह बात याद ही न रहे जिसने आपके खुश रहने में रुकावट डाली है।

यही प्रक्रिया तब भी अपनाई जा सकती है जब हमें कोई अपार सफलता प्राप्त हुई हो और जिसके परिणामस्वरूप प्रसन्नता स्वाभाविक रूप से मिल गई हो और आप उससे फूले न समा रहे हों। मान कर चलिए कि जिस तरह दुःख की सीमा तय है, उसी तरह सुख की अवधि भी सीमित है। इसलिए उसे भी अगर धूल समझकर छिटकना न चाहें तो कम से कम उसे अपने से लिप्त न होने दें क्योंकि न जाने कब वह आपसे दूर चली जाए और आप उसकी याद से ही बाहर न निकल सकने के कारण अपना वर्तमान स्वीकार न कर सकें और हमेशा उसकी याद से अपने भूतकाल से ही जूझते रहें।

एक बात और है और वह यह कि प्रसन्नता या खुशी और दुःख ऐसी वस्तुएं नहीं हैं जो बस हो जाएं या अचानक मिल जाएं। यह प्रत्येक व्यक्ति के अंतर में पहले से ही विद्यमान हैं। इसका मतलब यह कि उन्हें समझने के लिए अपने साथ दोस्ती करनी पड़ेगी, अपने मन को लेकर स्वार्थी बनना होगा। वास्तविकता यह है कि किसी अच्छी बुरी घटना का प्रभाव गरम तवे पर पड़े पानी के छीटों की तरह अधिक समय तक नहीं रहेगा।

यह कुछ ऐसा है जैसे कि अपनी कहानी आप स्वयं लिख रहे हैं, इससे किसी दूसरे का कोई लेना देना नहीं है।  आपकी भावनाओं पर केवल आपका अपना अधिकार है, इसमें किसी दूसरे की दखलंदाजी नहीं है। मतलब यह कि इस मानसिक कसरत के बाद यदि आपने इस बात के लिए अपने को तैयार कर लिया है कि कोई क्या कहता है, उसका असर अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया तो खुश रहने से वंचित नहीं रहा जा सकता। कैसे भी हालात हों, उनके अनुसार अपने मन को तैयार कर लेना ही किसी भी अच्छी बुरी घटना को स्वीकार करते हुए जीवन जीने की कला है।

इससे होगा यह कि किसी होनी या अनहोनी के लिए आप न तो स्वयं को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार मानेंगे और न ही बिना भली भांति विचार किए किसी अन्य को दोषी मानेंगे। इससे होगा यह कि मन बेकार में तनाव से ग्रस्त नहीं होगा और जो भी परिस्थिति है उस पर सकारात्मक सोच से निर्णय लेने में सक्षम होगा। नकारात्मक विचारों से प्रभावित न होकर किसी भी समस्या का हल निकालने में सक्षम हुआ जा सकता है। इसका एक सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि जीतना या हारना महत्वपूर्ण न होकर सही फैसला लेना ही उद्देश्य होगा और तब जो हासिल होगा, वही अपने को खुशी प्रदान करेगा।

तालमेल जरूरी है

वर्तमान समय कुछ ऐसा है कि बड़े शहरों की आपाधापी और दौड़भाग और सब कुछ जल्दी से जल्दी प्राप्त कर लेने की प्रवृत्ति ग्रामीण क्षेत्रों में भी बहुत तेजी से बढ़ रही है। देखा जाए तो यह समाज का एक स्वाभाविक स्वरूप है क्योंकि जब माह, सप्ताह, दिन और घंटों की दूरियां कुछ पलों में सिमट जाएं तो नगरों और गांवों को एक दूसरे के प्रभाव में आकर होने वाले बदलाव से रोकना संभव नहीं है।

जब व्यक्तिगत हो या पारिवारिक, खुश रहना अपनी आदत बन जाए तो फिर सकारात्मक परिणाम हों या नकारात्मक, कोई अंतर नहीं पड़ता। असल में होता यह है कि जब समाज को हर हाल में खुश रहने की आदत पड़ जाती है तो वह अधिक तेजी से आगे बढ़ता है क्योंकि उसकी प्रतियोगिता किसी दूसरे से नहीं बल्कि अपने आप से होती है। उसका कोई भी शत्रु उस पर विजयी नहीं हो पाता क्योंकि उसे प्रसन्न होकर अपना काम करना आता है।

निष्कर्ष यही है कि प्रसन्न रहना है तो स्वयं को केंद्र में रखकर व्यवहार करना सीखना होगा, इसे निजी स्वार्थ न कहकर प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीना कहना ठीक होगा।  


शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

शिक्षा या साक्षरता में कमी होगी तो देश का पिछड़ना तय है

 

विश्व साक्षरता दिवस हर साल आठ सितंबर को मनाया जाता है। हमारे देश में भी इसकी खानापूर्ति की जाती है। इस साल तो अध्यापक दिवस पर यह घोषणा भी सुनी कि देश में साढ़े चैदह हजार स्कूलों का कायाकल्प किए जाने का इंतजाम किया गया है जो अगले पांच सात साल में पूरा होगा।

बेशक हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं लेकिन शिक्षा के मामले में इतने पीछे हैं कि हमारे देश की गिनती सबसे कम साक्षर देशों में नीचे से कुछ ही ऊपर है। साक्षरता दर लगभग सत्तर प्रतिशत है, मतलब यह कि बाकी आबादी पढ़ना लिखना नहीं जानती जिनमें महिलाएं तो आधी से ज्यादा अनपढ़ हंै। यह शर्म की बात तो है ही, साथ में सरकारी शिक्षा और साक्षर बनाने वाली नीतियों का खोखलापन भी है।

विज्ञान की अनदेखी

अगर उन कारणों पर गौर करें जिनकी वजह से पढ़ाई लिखाई और अक्षर ज्ञान को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई देती तो वह यह है कि अब तक शिक्षा देने का जो तरीका या ढांचा रहा है, उसमें बचपन से ही बेमतलब के विषयों को पढ़ना जरूरी बना दिया गया। जिन विषयों से जिंदगी जीने की राह निकलती हो, उनकी अनदेखी की जाती रही । पढ़ने वाले के मन में जब यह बात गहरी होने लगती है कि जो पढ़ाया जा रहा है, उससे व्यापार, रोजगार, नौकरी तो आसानी से मिलनी नहीं, केवल डिग्री मिलेगी तो वह पढ़ कर क्या करे? देहाती इलाकों में माता पिता भी सोचते हैं कि इससे तो अच्छा है कि बालक खेतीबाड़ी या घरेलू कामधंधा कर उनका सहारा बने तो वे भी स्कूल जाने पर जोर नहीं देते।

इसका कारण यह है कि विज्ञान की पढ़ाई को लेकर एक तरह का हौवा बना दिया गया कि यह बहुत खर्चीली है, इसमें पास होना मुश्किल है, हमारी औकात से बाहर है और यह पैसे वालों के लिए है या जिन्हें अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर बनाना है, जबकि ऐसा कतई नहीं है। यदि बचपन से यह शिक्षा दी जाए कि आसपास का वातावरण, पशु पक्षी का साथ, प्रकृति के साथ तालमेल और जीवन यापन के लिए आवश्यक वस्तुएं हमारे चारों ओर बिखरी हुई हैं तो चाहे लड़का हो या लड़की, पढ़ाई के प्रति उसकी रुचि न हो, तो यह हो नहीं सकता।  मां बाप भी ऐसी शिक्षा प्राप्त करने के बारे में उसे स्वयं ही प्रोत्साहित करेंगे क्योंकि ऐसा न करने का उनके पास कोई कारण नहीं होगा। वे अपने बच्चों को राजी खुशी या जबरदस्ती पढ़ने भेजेंगे।

जीवन से जुड़ी पढ़ाई

अगर यह समझाया जाए कि बुलेट ट्रेन के आगे का हिस्सा नुकीला होने की प्रेरणा किंगफिशर पक्षी से मिली, हवाई जहाज और हेलीकॉप्टर बाज की तर्ज पर बने हैं, एक प्रजाति के जंगली चूहे सौ मील दूर तक सूंघ सकते हैं या फिर मेढ़क के फुदकने को समझने से आरामदायक जूते बनाए जा सकते हैं तो फिर कौन इन सब बातों पर ध्यान देना नहीं चाहेगा?  इसी तरह कमल के फूल की पंखुड़ियों पर धूल या गंदगी का असर नहीं होता और उससे पहनने लायक कपड़े बनाए जा सकते हंै। नारियल के पेड़ों के तने और भिंडी जैसी सब्जी से वस्त्र बनाए जा सकते हैं तो विद्यार्थी में इसके बारे में जानने की उत्सुकता अवश्य होगी।

अगर उसे स्कूल में यह पढ़ाया जाए कि खेती में इस्तेमाल होने वाले हल, ट्रैक्टर ट्रॉली, अन्य औजार कैसे आधुनिक बनते हैं या फिर बताया जाए कि कचरे, वेस्ट डिस्पोजल से कैसे ऊर्जा बनती है, बरसाती पानी को बचा कर कैसे रखा जाए, बाढ़ और सूखे से कैसे निपटा जाए और प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल विभिन्न आपदाओं से बचाने में किस प्रकार मदद कर सकता है, साधारण बीमारियों को आदिवासी क्षेत्रों में मिलने वाली औषधियों से ठीक किया जा सकता है और इसी तरह की सामान्य जीवन से जुड़े विषयों को सिलेबस में रखा जाएगा तो किसे पढ़ने से ऐतराज होगा !


शिक्षा नीति और विज्ञान

नई शिक्षा नीति में विज्ञान की शिक्षा को लेकर बहुत कुछ कहा गया है। उस पर अमल हो जाए तो निरक्षरता दूर करने और शिक्षा को जन जन तक पहुंचने में मदद मिलेगी। इसमें स्कूलों का समूह बनाकर उन्हें विज्ञान शिक्षा के केंद्र तैयार करने की महत्वाकांक्षी योजना है। इसी तरह चलती फिरती प्रयोगशालाओं को बनाने का लक्ष्य है। ये सभी स्कूलों, शिक्षा संस्थानों से जुड़कर विद्यार्थियों को कुदरत की प्रक्रिया समझने में सहायक होंगी।

एक सीमित संख्या में विद्यालयों को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने, सीखने के नवीनतम तरीकों का इस्तेमाल करने से लेकर विद्यार्थियों में प्रदूषण नियंत्रण करने की विधि जानने, ऊर्जा स्रोतों, जल, जंगल जमीन से जुड़ी बातों को समझने, पौष्टिक भोजन, स्वस्थ रहने और खेलकूद को भी पढ़ाई जितना महत्व देने की बात कही गई है। इनमें प्रकृति से तालमेल रखना सिखाया जाएगा क्योंकि कुदरत की प्रक्रिया को समझना ही विज्ञान है।

यदि ये स्कूल स्थापित हो जाते हैं, लालफीताशाही और नेताओं की नेतागिरी का शिकार नहीं बनते तो शिक्षा के क्षेत्र में आमूल चूल परिवर्तन होने की उम्मीद की जा सकती है।

अशिक्षा और निरक्षरता का एक और बड़ा कारण  जनसंख्या का बेरोकटोक बढ़ते जाना है। विज्ञान की शिक्षा इस पर भी लगाम लगा सकती है। शिक्षित होने और साक्षर होने का अंतर यही है कि एक से हमें जीवन जीने के सही तरीके पता चलते हैं और दूसरे से अपना भला बुरा और नफा नुकसान समझने की तमीज आती है।

यूनेस्को ने जब अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाए जाने की घोषणा की तो तब मकसद यही था कि दुनिया भर के लोग इतना तो अक्षर ज्ञान हासिल कर ही लें कि अनपढ़ न कहलाएं ताकि कोई उन्हें मूर्ख न बना सके। दुर्भाग्य से भारत में लगभग एक तिहाई आबादी निरक्षर है, पढ़ लिख नहीं सकती और मामूली बातों के लिए दूसरों पर निर्भर रहती है।

यदि देश को शत प्रतिशत शिक्षित और साक्षर बनाना है तो सबसे पहले पढ़ने लिखने की सामग्री, विषयों का चयन करने में सावधानी और शिक्षा देने में आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल करना होगा। हमारे देश में शिक्षकों की भारी कमी है और उन्हें तैयार करने में वक्त भी बहुत लगता है। कोरोना महामारी ने इतना सबक तो सिखा ही दिया है कि बिना संपर्क में आए या आमने सामने न होने पर किस प्रकार पढ़ाई की जा सकती है। आज सैटेलाइट द्वार शिक्षा को दूर दराज के क्षेत्रों तक सुगमता से पहुंचाया जा सकता है। वर्चुअल क्लासरूम और मोबाईल टेक्नोलॉजी तथा रोबोट तकनीक का इस्तेमाल एक सामान्य बात है। जरूरत इस बात की है कि इसे सस्ता और सुलभ कर दिया जाए। इससे पूरे देश को एक ही समय में एक शिक्षक द्वारा अपनी बात समझाई जा सकती है।

किसी भी समाज के पतन के सबसे बड़े चार कारण गरीबी, निरक्षरता, जनसंख्या और बेरोजगारी हैं। इनसे मुकाबला करने का एक ही रामबाण उपाय है और वह है सही शिक्षा। क्या यह जरूरी है कि हम देशी, विदेशी शासकों की जीवनियां, प्राचीन इतिहास के विवरण, जो भूतकाल है उस की खोजबीन, यहां तक कि सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं के चलन जैसे विषयों को पढ़ने पढ़ाने पर जोर दें और जो जिंदगी को जीने लायक बनाने में मदद करें, उससे विद्यार्थियों को दूर रखें। ये विषय केवल वे पढ़ें जिनकी इनमें रुचि हो, उनके कैरियर की संभावना हो लेकिन हर कोई तारीखों को याद रखने, शासकों के कारनामों, युद्धों के विवरणों और अत्याचारों या सुशासन को लेकर पूछे जाने वाले सवालों के जवाब रटने में अपना समय और धन क्यों नष्ट करे ?

शिक्षा हो या साक्षरता, वही सही है जो जीवन की दशा और दिशा निर्धारित करने में सहायक हो। यह काम स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से ही शुरू हो जाना चाहिए था। अगर तब हो जाता तो हम आज यह नहीं सोच रहे होते कि पूरी आबादी शिक्षित या साक्षर क्यों नहीं हैं?

यहां एक बात और स्पष्ट करनी होगी कि शिक्षा नीति तब ही सफल हो सकती है जब वह बिना आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक भेदभाव के प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान रूप से सुलभ हो, उसमें स्वस्थ प्रतियोगिता करने की भावना हो और निराशा का कोई स्थान न हो। यह काम केवल विज्ञान, वैज्ञानिक ढंग से की गई पढ़ाई और आधुनिक सोच बनाने से ही हो सकता है, इसके अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं है जो हमारी एक बड़ी आबादी पर लगे अशिक्षित और निरक्षर होने का कलंक दूर कर सके। 


शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

साहित्य, विज्ञान तथा फिल्म सामाजिक बदलाव की कड़ियां हैं


यह हमेशा से विवाद का विषय रहा है कि साहित्य ने समाज पर असर डाला है या फिल्मों से सामाजिक परिवर्तन हुआ। इसी कड़ी में यह भी जोड़ा जा सकता है कि वैज्ञानिकों को कुछ नया अविष्कार करने में साहित्यिक लेखन ने प्रेरित किया या किसी गूढ़ रहस्य की कल्पना को साकार करने के लिए की गई खोज को वैज्ञानिक उपलब्धि का नाम दिया गया। 


साहित्य और विज्ञान का संबंध

एक उदाहरण है। मैरी शैली ने फ्रैंकेंस्टेन की रचना की जिसमें मनुष्य के अंग प्रत्यारोपण यानि ऑर्गन ट्रांसप्लांटेशन का जिक्र किया। वैज्ञानिकों द्वारा एक साहित्यकार की रचना से प्रेरित होकर ही यह संभव हुआ, इसे स्वीकार करना होगा। इसी प्रकार साहित्यिक रचनाओं में यह बात बहुत मजेदार और रहस्य की तरह से की गई कि हमारे सभी काम हमारी ही तरह कोई और बिना हाड़ मांस का पुतला कर रहा है। यह मानने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए कि इससे आधुनिक रोबोट का अविष्कार हुआ। जासूसी साहित्य में बहुत से ऐसे चरित्र मिलते हैं जो अपनी सूरत बदलते रहते हैं, ऐयारी से इस प्रकार अपना मेकअप करते हैं कि एकदम बदल जाते हैं तो इसे भी विज्ञान ने वास्तविकता बना दिया।

साहित्य में संचार साधनों की कल्पना बहुत पहले कर ली गई थी। तेज गति से चलने वाले आने जाने के संसाधनों के बारे में भी काल्पनिक उड़ान लेखक भर चुके थे।  धरती, समुद्र और आकाश में होने वाले परिवर्तनों को साहित्य में उकेरा जा चुका था। आज इन क्षेत्रों में जो अविष्कार हो रहे हैं, उन पर साहित्य के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता।

साहित्य लेखन चाहे किसी भी विधा में हो, कविता, कहानी, उपन्यास या कुछ भी हो सकता है, उनमें जो श्रेष्ठ और ऐसी रचनाएं हैं जिन पर समय भी अपना असर नहीं दिखा पाया और जिन्हें शाश्वत कहा गया, उनके हमेशा ही प्रासंगिक बने रहने का एकमात्र कारण यह है कि उनमें भविष्य में झांकने का प्रयास था। विज्ञान भी तो यही करता है, वह भी इसी आधार पर चलता है कि आगे क्या होगा या क्या ऐसा भी हो सकता है ?


यह एक सच्चाई है कि सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन की नींव साहित्य से ही पड़ती है। सामान्य व्यक्ति जो सोचता है, लेखक उसे शब्दों में व्यक्त करता है। आपने देखा होगा कि कैसा भी अवसर या मंच हो, वह चाहे राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या फिर खेल कूद का ही क्यों न हो, अक्सर उनकी शुरुआत किसी लेखक की लिखी हुई बात से की जाती है। इसका मतलब यही है कि अपनी बात को सिद्ध करने में भी साहित्यिक रचनाओं की शरण में जाना पड़ता है।

साहित्य केवल कल्पना नहीं है बल्कि ऐसा दर्पण है जिसमें झांका जाए तो पाठक को उसमें अपनी छवि दिखाई देने लगती है। यही कारण है कि कोई रचना पढ़ते समय मन में गुदगुदी, चेहरे पर हंसी या आंखों से आंसू निकल पड़ते हैं। लेखन की कसौटी भी यही है कि उससे आप अपने को अलग न कर पा रहे हों और उसका प्रभाव स्थाई रूप से मन में बैठ गया हो।


साहित्य और फिल्म

हमारे देश में साहित्यिक रचनाओं पर फिल्म बनाने का काम बहुत कम हुआ है लेकिन जितना भी हुआ, वह निर्माता के लिए घाटे का सौदा नहीं रहा। एक चादर मैली सी, पिंजर, तीसरी कसम, आंधी, ट्रेन टु पाकिस्तान तथा और भी बहुत से उदाहरण हैं। साहित्यकारों के जीवन पर फिल्म या बायोपिक बनाने का काम तो लगभग न के बराबर ही हुआ है।

इसका कारण यह है कि फिल्म बनाना और उससे कमाई करना मुहावरे की भाषा में कहा जाए तो बच्चों का खेल नहीं है। यह सब जानते हुए भी यदि कोई निर्माता निर्देशक किसी साहित्यिक रचना पर फिल्म बनाने के बारे में आगे आता भी है तो हमारे यहां लेखक चाहता है कि उसकी रचना के साथ न्याय हो, मतलब यह कि जो उसने लिखा वह वैसा ही पर्दे पर नजर आए। यह प्रैक्टिकल नहीं होता क्योंकि फिल्म बनाते समय सिनेमेटिक लिबर्टी लेना अनिवार्य है वरना दर्शक उसे देखने नहीं आयेंगे।

इसका एक ही उपाय है कि फिल्म बनाने की सहमति देने के बाद लेखक को यह मानकर अलग हो जाना चाहिए कि अब यह उसकी नहीं निर्माता की रचना होगी और इसमें उसकी दखलंदाजी नहीं हो सकती। जिस प्रकार उसकी कृति को पाठकों की प्रतिक्रिया मिली, उसी प्रकार फिल्म के दर्शकों की राय और नजरिया उसके निर्देशक के बारे में होगा न कि उस साहित्यकार के बारे में जिसकी पुस्तक पर उसका निर्माण हुआ है।

इसका कारण यह है कि पूरे उपन्यास या कहानी के सभी पात्रों और विवरणों को फिल्म में शामिल करना संभव नहीं है और केवल कुछेक पक्षों और किरदारों को लेकर ही फिल्म बनाई जाती है। इसलिए क्या छोड़ा, क्या शामिल किया, इसके पचड़े में न पड़कर फिल्म को एक नई रचना की तरह उसका आनंद लेने की मनस्थिति उसके लेखक को रखनी होगी। ऐसा होने पर ही हमारे देश में वह दौर आ सकता है जिसमें साहित्य पर बनने वाली फिल्म की कद्र उन फिल्मों से अधिक होने लगेगी जो बिना किसी थीम के, बस मनोरंजन और वक्त बिताने के लिए बनाई जाती हैं।

इसी प्रकार विज्ञान और उसकी उपलब्धियों तथा वैज्ञानिकों पर फिल्म निर्माण काफी चर्चित और सफल रहा है। रा वन, कोई मिल गया, कृष, मिस्टर इंडिया जैसी फिल्मों से लेकर मिशन मंगल और रॉकेट्री तक विज्ञान फिल्में अपना जलवा दिखा चुकी हैं।


विज्ञान प्रसार

यहां भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के संस्थान विज्ञान प्रसार का जिक्र करना आवश्यक है जो प्रति वर्ष देश के विभिन्न भागों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विज्ञान फिल्म महोत्सव आयोजित करता रहा है। इसी के साथ इंडिया साइंस चैनल एक ऐसी उपलब्धि है जो देश में ओटीटी प्लेटफॉर्म को एक नई दिशा देने में सफल रही है। इस फेस्टीवल में विज्ञान और तकनीक से संबंधित वे सभी फिल्म प्रदर्शित और पुरस्कृत की जाती हैं जिनका संबंध सामान्य नागरिक पर पड़ने वाले व्यापक प्रभाव से है। वैज्ञानिक उपलब्धियों को हासिल करने में जो समय, धन, परिश्रम और ऊर्जा लगी, अक्सर उसका जिक्र नहीं होता, इसलिए इस तरह की फिल्मों का प्रदर्शन जरूरी है जिनमें किसी ख़ोज या अनुसंधान का प्रोसेस विस्तार से बताया गया हो।

विज्ञान महोत्सव इस बात को दर्शकों तक ले जाने का प्रयास है जिससे साधारण व्यक्ति समझ सके कि उसके व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में जो बदलाव आ रहे हैं, उनका आधार विज्ञान और टेक्नोलॉजी है। ये सभी फिल्में इंडिया साइंस चैनल पर देखी जा सकती हैं। अंधविश्वास, दकियानूसी विचारों और सड़ी गली परंपराओं से मुक्ति पानी है तो उसके लिए अपनी सोच को बदलना ही होगा। इस चैनल पर दिखाई जाने वाली फिल्में दर्शक के सामने एक नई दुनिया का निर्माण करते हुए दिखाई देती हैं।

उम्मीद की जानी चाहिए कि साहित्य और विज्ञान का स्थान फिल्म निर्माण में महत्वपूर्ण समझा जायेगा। इसका कारण यह है कि अब पुस्तकों के पाठक हों या फिल्मों के दर्शक, उनकी रुचि तेजी से बदल रही है। उन्हें मनोरंजन के साथ कुछ ऐसा चाहिए जिसे वह पुस्तक पढ़ने या फिल्म देखने के बाद अपने मन के किसी कोने में संजो कर रख सकें।


शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

समुद्र मंथन से लेकर आजादी के अमृत महोत्सव तक

 

हमारी पौराणिक कथाओं में समुद्र या क्षीरसागर मंथन की महिमा सबसे सबसे अधिक है। देवताओं और असुरों के बीच निरंतर संघर्ष होते रहने के कारण यह उपाय निकाला गया कि समुद्र को मथा जाए और उससे जो कुछ निकले, आपस में बांटकर बिना एक दूसरे के साथ लड़ाई झगड़ा किए शांति से रहा जाए। देखा जाए तो यह मंथन तब की ही नहीं आज की भी सच्चाई है और आपसी द्वेष समाप्त करने का एक स्वयंसिद्ध उपाय है।


टीमवर्क की महिमा

समुद्र मंथन के लिए दोनों पक्षों के बीच बनी सहमति का संदर्भ लेकर यह कहा जाए कि अंग्रेजी दासता से मुक्ति पाने के लिए भारत के सभी धर्मों और वर्गों के लोग स्वतंत्रता रूपी अमृत प्राप्त करने के लिए एकजुट हुए और आजादी हासिल की।  जिस प्रकार तब देवताओं और असुरों ने अपना बलिदान दिया था, उसी प्रकार सभी धर्मों विशेषकर हिंदू और मुसलमान दोनों ने अपनी आहुतियां देकर सिद्ध कर दिया कि वे अपने लक्ष्य की प्राप्ति के प्रति समर्पित हैं। यहां तक कि इसके लिए देश का दो टुकड़ों में बांट दिया जाना भी स्वीकार करना पड़ा।

आजादी मिली, साथ में विभाजन की त्रासदी भी और समुद्र मंथन की तरह स्वतंत्रता संग्राम से निकला सांप्रदायिक विष दंगों के रूप में अपना असर दिखाने लगा। इसका पान करने के लिए शिव की भांति आचरण करने के प्रयत्न भी हुए लेकिन सफलता नहीं मिली।

समुद्र मंथन से महालक्ष्मी अर्थात धन, वैभव, सौभाग्य और संपन्नता प्राप्त हुई, उसी प्रकार आजादी के बाद सभी प्राकृतिक संसाधन हमारे लिए उपलब्ध थे। इन पर कब्जा करने की होड़ लगी और जो ताकतवर थे, इसमें सफल हुए और इसी के साथ हलाहल विष अपने दूसरे रूपों भ्रष्टाचार, शोषण, अनैतिकता, बेईमानी और रिश्वतखोरी के पांच फन लेकर प्रकट हुआ। इसका परिणाम गरीबी, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता और वर्ग संघर्ष के रूप में सामने आया।

समुद्र मंथन से जो मिला, उसमें कामधेनु, ऐरावत, सभी मनोकामनाएं पूरी करने वाला कल्पवृक्ष, परिजात वृक्ष अर्थात हमारी वन्य संपदा और साथ में धनवंतरी वैद्य जो जीवन को बीमारियों से बचा सकें तथा अन्य बहुत सी वस्तुएं मिलीं। यहां तक कि भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर अमृत को देवताओं यानी मानवीय मूल्यों पर चलने वालों के लिए सुगमता से प्राप्त किए जाने का प्रबंध भी कर दिया। दैत्य राहु द्वारा भेष बदलकर अमृत प्राप्त करने की कोशिश को भी उसके दो टुकड़े कर आंशिक रूप से विफल कर दिया। सम्पूर्ण नाश संभव न होने के कारण जब तब मनुष्य में आसुरी शक्तियों के रूप में धार्मिक, सांप्रदायिक और अन्य विनाशकारी रूपों में यह प्रकट होता ही रहता है।

इसके नाश के लिए संविधान और विधि विधान के अनुसार कार्यवाही होती है लेकिन फिर भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता क्योंकि कुछ लोग राहु की भांति अमृत पान कर चुके हैं। इसलिए लगता है कि देश को इन बुराईयों को साथ लेकर ही चलना होगा और इन पर नियंत्रण रख कर आगे बढ़ना होगा।


एक विवेचना

वर्तमान समय में समुद्र मंथन को समझना जरूरी है। समुद्र क्या है, और कुछ नहीं, मानवीय मूल्यों का महासागर है जिसमें लहरें और तरंगें उठती गिरती रहती हैं। यह हमारी पीड़ा, प्रसन्नता, भावुकता, स्नेह और सौहार्द का प्रतीक हैं। इसी प्रकार मंदारगिरी ऐसा पर्वत है जो जीवन को स्थिरता प्रदान करता है और समुद्र में उसके हिलने डुलने से होने वाली हलचल को रोकने के लिए कछुए को आधार बनाना मनुष्य की सूक्ष्म प्रवृत्तियों को मजबूत बनाने की भांति है। वासुकी नाग रस्सी अर्थात मथानी के रूप में यही तो प्रकट करते हैं कि मनुष्य का अपनी इच्छाओं पर काबू पाना बहुत कठिन है और केवल साधना अर्थात जन कल्याण के काम करने की इच्छा रखने से ही सफलता प्राप्त की जा सकती है। सर्पराज का मुंह पकड़ना है या उसकी दुम, यह निर्णय करने का काम हमारे अंदर विद्यमान विवेक और बुद्धि का है। गलती होने से विनाश और सही कदम उठाने से निर्माण होता है, यही इसका मतलब है।

यह देव और दानव क्या हैं, हमारे अंदर व्याप्त सत्य और असत्य की प्रवृत्तियां ही तो है जो प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान रहती हैं। यह हम और हमारे परिवेश, संस्कार और वातावरण पर निर्भर है कि हम किन्हें कम या अधिक के रूप में अपनाते हैं। सफलता प्राप्त करने के लिए सकारात्मक ऊर्जा और नकारात्मक सोच का संतुलन होना आवश्यक है। कोई भी व्यक्ति केवल अच्छा या बुरा नहीं हो सकता, वह दोनों का मिश्रण है, यह स्वयं पर है कि हम किसे अहमियत देते हैं क्योंकि सुर और असुर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

जीवन को एक झटके में समाप्त कर सकने वाला हलाहल विष और अमरता प्रदान करने वाला अमृत कलश, प्रत्येक क्षण होने वाले क्रियाकलाप, मनुष्य की दिनचर्या और सही या गलत निर्णय का परिणाम ही तो हैं। इसे अपने कर्मों का लेखा जोखा या जैसा करोगे, वैसा भरोगे कहा जा सकता है।

कथा है कि भगवान विष्णु ने देवताओं से कहा था कि वे समुद्र से निकलने वाले विभिन्न रत्नों को हासिल करने के स्थान पर अमृत कलश प्राप्त करने के लिए एकाग्रचित्त होकर प्रयत्न करें। इसका अर्थ यही है कि जीवन में आए विभिन्न प्रलोभनों और बेईमानी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार के अवसरों पर ध्यान न देकर अंतरात्मा की आवाज सुनकर निर्णय करना ही श्रेष्ठ है।


निष्कर्ष यही है

आजादी का अमृत महोत्सव मनाने का अर्थ है कि धर्म और संप्रदाय के आधार पर मनमुटाव, नफरत और हिंसा के स्थान पर मानवीय सरोकार और संवेदनाओं को अपनाया जाए वरना तो जो बिखराव की ताकतें हैं, वे हमारा सुखचैन छीनने को तैयार ही हैं। समुद्र मंथन की प्रक्रिया का इस्तेमाल आज शोध, प्रबंधन, प्रशिक्षण और अलग अलग मत या विचार रखने वाली टीमों द्वारा अपने लक्ष्य अर्थात अमृत प्राप्त करने की दिशा में किए जाने वाले प्रयत्न ही हैं।

आज हम कृषि उत्पादन में अभाव की सीमा पार कर आत्मनिर्भर हो गए हैं, विज्ञान और तकनीक में विश्व भर में नाम दर्ज कर चुके हैं, व्यापार और उद्योग में बहुत आगे हैं, अपनी जरूरतें स्वयं पूरा करने में सक्षम हैं, आधुनिक संचार साधनों का इस्तेमाल करने में अग्रणी हैं तो फिर सामाजिक और आर्थिक भेदभाव का क्या कारण है ? इस पर कोई सार्थक बहस इस अमृत महोत्सव में शुरू हो तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी।

अमृत महोत्सव में हमारे स्वतंत्रता संग्राम के भुला दिए गए नायक और नायिकाओं का स्मरण, आजादी के बाद अब तक विभिन्न क्षेत्रों में हुए परिवर्तन, प्रगति, विकास और संसाधनों के इस्तेमाल के बारे में जानना आवश्यक है। इसके साथ ही इस बात पर मंथन जरूरी है कि आज तक हर बच्चे को शिक्षा और हर हाथ को रोजगार देना क्यों संभव नहीं हो सका ? कुछ लोगों के पास अकूत धन कैसे पहुंच गया और आगे संपत्ति का सही बंटवारा कैसे हो ताकि हरेक को उसका हक मिल सके? यह कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर प्रत्येक भारतवासी को मिलना चाहिए।


शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

अभियान शुरू तब हों जब उनके पूरे होने का प्रबंध हो

 

कह सकते हैं कि हमारी सरकार घोषणाएं करने में महारथी और संकल्प लेने और तरह तरह के अभियान शुरू करने के मामले में सब से आगे है। अब यह और बात है कि इनके पूरे होने का जिम्मा कोई नहीं लेता, इसलिए ये सभी वक्त की धूल पड़ने से कुछ समय बाद दिखाई भी नहीं देते और न केवल भुला दिए जाते हैं बल्कि अगर कोई याद दिलाए तो एक नया अभियान आगे कर दिया जाता है।

हम अपनी आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं जो गर्व करने और राष्ट्र प्रेम की ज्वाला हृदय में धधकते रहने की भांति है। प्रत्येक देशवासी अपने घर में अपनी राष्ट्रीय पहचान स्वरूप राष्ट्र ध्वज तिरंगा फहराए, यह इस स्वतंत्रता दिवस का संकल्प है। याद आता है कि कभी केवल सरकारी भवनों और राष्ट्रीय समारोहों में अपना झंडा फहराने की परंपरा या इजाजत थी, भला हो कि अदालती कार्यवाही के बाद अब हर भारतवासी कभी भी कहीं भी तिरंगा फहरा सकता है। हालांकि इसके बनाने से लेकर इस्तेमाल, रखरखाव और सुरक्षित रखने के लिए नियम हैं लेकिन अधिकतर लोग जानकारी के अभाव में इसके उपयोग के बाद इसकी तरफ से लापरवाह हो जाते हैं। उम्मीद है कि इस बारे में भी हर घर तिरंगा अभियान में सरल भाषा में जो नियम हैं उनका बड़े पैमाने पर प्रचार प्रसार किया जाएगा।


अभियानों की बाढ़

चार फरवरी 1916 की बात है जब महात्मा गांधी वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर और उसके आसपास फैली गंदगी, कीचड़, पान की पीक देखकर बहुत विचलित हुए और वहां रहने वालों की जबरदस्त भर्त्सना की थी। विडंबना यह है कि लगभग एक सदी तक हम कमोबेश पूरे देश में इसी तरह रहते रहे , यद्यपि गाहे बगाहे सफाई व्यवस्था में सुधार के लिए कोशिशें चलती रहीं लेकिन देशव्यापी अभियान के रूप में भारत के गांवों, कस्बों और शहरों को स्वच्छता का पाठ पढ़ाने की शुरुआत 2014 में बापू के जन्मदिन से हुई।

इसमें कोई संदेह नहीं कि यह खुले में शौच करने के खिलाफ और हर घर में टॉयलेट के इस्तेमाल, रास्तों पर जन सुविधाओं के निर्माण और नागरिकों के मन में सफाई से रहने और इस बारे में अपनी सोच बदलने के बारे में एक ऐसा अभियान था जिसका पूरा होना देश के प्रत्येक नागरिक के भले के लिए आवश्यक था।

कह सकते हैं कि इस दिशा में काफी हद तक सफलता मिली है लेकिन पिछले कुछ समय से इस तरह की खबरें मिल रही हैं कि लोग अपने पुराने ढर्रे पर लौट रहे हैं। इसकी वजह यह नहीं कि सफाई से रहने के प्रति आकर्षण कम हो गया है बल्कि यह है कि सीवर लाईन बिछाने, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट न लगने और देहात हो या शहर, गंदगी भरे नालों से मुक्ति न मिलने तथा सबसे बड़ी बात यह कि वैज्ञानिक ढंग और देश में ही विकसित टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल में कोताही के कारण लोगों में निराशा बढ़ रही है।

हमारा मतलब व्यर्थ की आलोचना करना नहीं बल्कि यह है कि अटल जी की सरकार में जो निर्मल भारत अभियान शुरू हुआ था, उसकी खामियों और असफल रहने के कारणों को नजरंदाज न करते हुए स्वच्छ भारत अभियान चलाया जाता तो उसके नतीजे कुछ और ही होते। सीवेज डिस्पोजल की सही व्यवस्था न तब थी और न अब है। टॉयलेट में पानी की जरूरत के बारे में पहले भी ध्यान नहीं दिया गया और न अब, केवल शौचालय बनाना ही काफी नहीं, उसके लिए घर के बाहर गंदगी जमा न होने देने के लिए नालियों का इंतजाम और उनकी निरंतर सफाई होने और गंदगी का ट्रीटमेंट प्लांट तक पहुंचने की व्यवस्था भी आवश्यक है।

कुछ साल पहले बड़े जोरशोर से स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम शुरू किया गया था, उसकी नियति क्या हुई, किसी से छिपा नहीं और यह सरकार की विफलता का एक बदनुमा प्रमाण बन गया। अब तो इसकी कोई बात ही नहीं करता जबकि बेरोजगारी दूर करने में यह गेमचेंजर बन सकता था।

इसी तरह स्वस्थ भारत अभियान चलाया गया जो बिना इस बारे में कोई प्रबंध किए शुरू हो गया जिसमें हमारे देश में ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की खराब हालत को पहले सुधारना और व्यवस्थित करना आवश्यक था। अभी भी यहां डॉक्टर नहीं जाते, गर्भावस्था और प्रसव के बाद देखभाल नहीं होती, पौष्टिक खुराक का मिलना तो दूर, तुरंत मजदूरी करने जाने की मजबूरी है, बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर ही इन इलाकों में नहीं है तो ग्रामीण भारत कैसे स्वस्थ रह सकता है।

इसी कड़ी में जन आरोग्य और जन स्वास्थ्य अभियान चलाए गए जिनका कोई अतापता नहीं है। केवल मुफ्त इलाज की सुविधा से सेहतमंद नहीं रहा जा सकता, उसके लिए बड़े पैमाने पर अस्पताल, डिस्पेंसरी, डॉक्टर, नर्स और अन्य स्टाफ चाहिए जिसकी कितनी कमी है, यह बताने की न तो जरूरत है और न ही कोई आंकड़े देने की क्योंकि सरकारी खानापूर्ति के लिए जाली और भ्रामक दस्तावेज तैयार करने में सभी सरकारों को महारत हासिल है।

देश में शिक्षा को लेकर अक्सर चिंता प्रकट की जाती है लेकिन इसके लिए बजट में इजाफा करने के बजाय हर साल कटौती कर दी जाती है। स्कूलों की दशा सुधारने का काम शहरों में होता है, देहात में उनके बनने, खुलने और विद्यार्थियों के पढ़ने जाने का निर्णय सरपंच, मास्टर और दबंग नेता करते हैं। इसका प्रमाण यह है कि विषय कोई भी हो, विद्यार्थी के लिए उसकी जानकारी होना जरूरी न होकर केवल पास होकर अगली कक्षा में पढ़ने जाना है। अध्यापकों और पढ़ने वालों के ज्ञान के नमूने अक्सर सुर्खियों में रहते हैं।

अक्सर आपसी बातचीत और नेताओं के भाषणों में पर्यावरण संरक्षण मतलब प्राकृतिक साधनों जैसे वायु, जल, जंगल, जमीन, नदी, पर्वत, पशु, जीव जंतुओं और जीवन के लिए आवश्यक सामग्री को बचाए रखने के महत्व का जिक्र सुनने में आता रहता है। इसमें गंभीरता इसलिए नहीं होती क्योंकि यदि इन सभी चीजों के अनावश्यक इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई तो इससे सरकार, नेता और अधिकारियों के व्यक्तिगत स्वार्थ पूरे होने के रास्ते में रूकावट आ जायेगी।

प्रति वर्ष जो यह देश भर में नदियों में उफान, बाढ़ का तांडव और जन तथा धन की हानि होती है या फिर सूखे के कारण भयंकर बर्बादी होती है, रेगिस्तान का फैलाव होता है, तो क्या इसे रोकने के लिए सरकार के पास संसाधनों का अभाव है, नहीं ऐसा कतई नहीं है, बल्कि सच यह है कि यह सब जिन्हें हम अक्सर प्राकृतिक आपदा या कुदरत का कहर कह कर बचने की कोशिश करते हैं, यह एक साजिश की तरह है जिसमें अधिकारी, स्थानीय नेता से लेकर राज्य और केंद्र सरकार के मंत्री, सभी शामिल हैं।

अगर यह सब हर साल न हो तो फिर बाढ़, सूखा, अतिवृष्टि और संपत्ति के नष्ट होने के ऐवज में राहत के नाम पर धन की हेराफेरी करने पर अंकुश लग सकता है जो किसी को मंजूर नहीं है।

यह सब समझना कि ज्यादातर अभियान जनता के हित के लिए नहीं, कुछ मुठ्ठी भर लोगों की स्वार्थपूर्ति के लिए चलाए जाते हैं, कोई टेढ़ी खीर नहीं है बल्कि आसानी से समझ में आ जाने वाली साधारण सी बात है। इसलिए क्या यह जरूरी नहीं लगता कि जब भी कोई अभियान शुरू करने की घोषणा हो, जनता की तरफ से तर्क के आधार पर उसकी समीक्षा के बाद उसका समर्थन या विरोध करने की आदत डालना देशवासियों के लिए आवश्यक है?


शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

वैज्ञानिक सोच नास्तिक होना या धर्म को न मानना नहीं है

 

अक्सर यह बात सुनने को मिलती है कि हमारी सोचने समझने की योग्यता का आधार विज्ञान के अनुसार अर्थात वैज्ञानिक होना चाहिए। परंतु यह कोई नहीं जानता कि यह आधार क्या है? क्या यह कोई ऐसी वस्तु हैं जो कहीं बाजार में मिलती है, मोलभाव कर उसे हासिल किया जा सकता है या फिर इसका संबंध परंपराओं, धर्म के अनुसार की गई व्याख्याओं और पूर्वजों द्वारा निर्धारित कर दिए गए जीवन के मानदंडों से है ?


विज्ञान के सरोकार

विज्ञान का अर्थ यह लगाया जा सकता है कि ऐसा ज्ञान जो विशेष हो, उसे प्राप्त करने के लिए तथ्यों और तर्कों की कसौटियों से गुजरना पड़ा हो, वह इतना लचीला हो कि उसमें चर्चा, वादविवाद, शोध के जरिए परिवर्तन और संशोधन किया जा सके।

एक छोटा सा उदाहरण है। तेज़ हवा चलने से घर के खिड़की दरवाजे कई बार बजने, आवाज करने लगते हैं। कुछ लोग कह सकते हैं कि यह कोई भूत है जो खड़कड़ कर रहा है लेकिन दूसरा सोचता है कि कहीं इसकी चैखट तो ढीली नहीं पड़ गई और वह जाकर उसे कस देता है। आवाज़ आनी बंद हो जाती है।

यही वह ज्ञान है जो सामान्य से अलग है इसलिए यह विज्ञान कहा जाता है। हमारे संविधान में भी इस बात की व्यवस्था है जिसके अनुसार हमारे फंडामेंटल कर्तव्यों का पालन वैज्ञानिक ढंग से सोच विचार कर किया जाना चाहिए। इससे ही लोकतंत्र सुरक्षित और मानवीय गुणों का विकास हो सकता है।

जब हमें किसी बात पर उसके सही होने के बारे में संदेह होता है, उसे जांचने परखने के लिए उत्सुकता होती है तो यहीं से वैज्ञानिक सोच की शुरुआत होती है। इसके विपरीत जब किसी बात को केवल इसलिए माना जाए कि उसे पूर्वजों ने कहा है, उनकी परंपरा का निर्वाह कर्तव्य बन जाए, उसमें कतई बदलाव स्वीकार न हो तब यह कट्टरपन बन जाता है और यही लड़ाई झगडे, मनमुटाव और शत्रुता का कारण बन जाता है।

जो लोग यह कहते हैं कि विज्ञान में ईश्वर या परम सत्ता या किसी भी नाम से कहें, उसका कोई महत्व नहीं है तो यह अपने आप को भुलावे में रखने और वास्तविकता को स्वीकार न करने के बराबर है। हमारी सभी वैज्ञानिक प्रयोगशालायें और उनमें शोध और एक्सपेरिमेंट कर रहे सभी लोग चाहे सामने होकर यह न मानें कि परमेश्वर जैसी कोई चीज़ है लेकिन वे भी अपने अंतःकरण में मानते हैं कि कुछ तो है जो उनकी कल्पना से परे है, समय समय पर किसी अदृश्य शक्ति का नियंत्रण महसूस होता है।

कुछ लोग धर्म और धार्मिक विधि विधान को मानना अवैज्ञानिक कहते हैं और उनमें आस्था रखना और हवन, पूजन और कर्मकांड जैसी चीजों का उपहास करते हैं। इस बारे में केवल इतना कहा जा सकता है कि जब यह सब करने के लिए चढ़ावा, दिखावा धन की मांग और न देने पर ईश्वर का प्रकोप, दंड मिलने और अहित होने जैसी बातों के बल पर लूटखसोट, जबरदस्ती और शोषण किया जाए तो यह अपराध की श्रेणी में आता है। इसका विज्ञान से कोई संबंध नहीं है वरना तो इन सब चीजों के करने से वातावरण शुद्ध होता है, मानसिक और भावनात्मक तनाव कम होता है, मन केंद्रित होता है और शरीर में नवीन ऊर्जा का संचार होता है।

हमारे जीव, प्राणी और वन विज्ञान ने अनेक ऐसी संभावनाओं को हकीकत में बदला है जिन पर आश्चर्य हो सकता है। औषधियों के तैयार करने में जीवों से प्राप्त किए गए अनेक प्रकार के ठोस और तरल पदार्थ, जड़ी बूटियों के सत्व और प्राकृतिक तत्वों के मिश्रण का इस्तेमाल होता है और बाकायदा बने एक सिस्टम से गुजरने के बाद उनके प्रयोग की इज़ाजत दी जाती है। इसके स्थान पर यदि कोई व्यक्ति झाड़फूंक, गंडे ताबीज़, भभूत जैसी चीजों से ईलाज करने की बात करता है तो यह अपराध है क्योंकि विज्ञान इन्हें मान्यता नहीं देता। कोरोना जैसी महामारी से लेकर किसी भी दूसरे रोग की चिकित्सा दवाई, वैक्सीन, इंजेक्शन से होती है न कि किसी पाखंडी और झोलाछाप लोगों के इलाज़ से, इसलिए यह लोग भी अपराधी हैं।

विज्ञान का आधार हमेशा से तर्क यानी जो है उस पर शक या संदेह करना है। इसका मतलब यह है कि जो चाहे सदियों से चला आ रहा है लेकिन जिसकी सत्यता का कोई प्रमाण नहीं है और जो केवल परंपरा निबाहने के लिए होता रहा है, उसे न मानकर नई शुरुआत करना वैज्ञानिक है ।

यहां इस बात का ज़िक्र करना आवश्यक है कि जो लोग गणेश जी को प्लास्टिक सर्जरी का उदाहरण मानते हैं और इसी तरह की निराधार बातों का समर्थन करते हुए आधुनिक विज्ञान और टेक्नोलॉजी को चुनौती देते हैं, वे समाज का अहित कर रहे हैं और देश को आगे बढ़ाने के स्थान पर पीछे ले जाने का काम कर रहे हैं।


विज्ञान और धर्म

कोई भी धर्म किसी कुरीति या मानवता विरोधी काम का न तो समर्थन करता है और न ही मान्यता देता है, इसलिए धर्म अवैज्ञानिक नहीं है। इसी प्रकार चाहे कोई भी धर्म अपनी निष्ठा किसी भी अवतार, गुरु, पैगंबर, यीशु, तीर्थंकर, बुद्ध आदि महापुरुषों में रखे तो यह विज्ञानसम्मत है। इसलिए विज्ञान और धर्म का गठजोड़ तर्कसंगत है।

भारत तो अपनी प्राचीन संस्कृति, वैज्ञानिक उपलब्धियों और उनकी वर्तमान समय में उपयोगिता के बारे में विश्व भर में जाना जाता है जिसके कारण हम अनेक क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। तब फ़िर उन सब बुराइयों को ढोते हुए चलना कतई समझदारी नहीं है जो हमें दूसरों की नज़रों में हंसी का पात्र बनाती हैं।

वैज्ञानिक सोच और उसके आधार पर जब हमारे देश में सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक निर्णय लेने की शुरुआत एक अनिवार्य प्रक्रिया के रूप में हो जाएगी, तब ही हम गरीबी, बेरोज़गारी और विदेशों में प्रतिभा के पलायन को समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठा पाएंगे।  


शनिवार, 23 जुलाई 2022

आदिवासी राष्ट्रपति होने का अर्थ जनजातियों, वनवासियों की उन्नति है

 

राष्ट्रपति के रूप में आदिवासी महिला द्रौपदी मुर्मू का चुनाव क्या हमारे ट्राइबल क्षेत्रों की समस्याओं का समाधान कर पाएगा, निवासियों को शोषण से मुक्ति दिला पाएगा और उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ पाएगा ? यह एक ऐसा यक्ष प्रश्न है जिसका उत्तर केवल भविष्य के गर्भ में छिपा है।

इतिहास से सीख

ब्रिटिश शासन में आदिवासियों को जन्मजात गुनहगार और अपराधी मानकर सभी तरह के अत्याचार करने की खुली छूट का कानून बनाया गया था जिसका पालन आजादी के बहुत बाद तक होता रहा। जब यह बात बहुत अधिक जुल्म होने के बाद किसी तरह पहले प्रधानमंत्री नेहरू जी के पास पहुंची तो वे बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने आदिवासियों को विमुक्त जनजाति का नाम देकर और इस संबंध में कानून बनाकर इस काम की इतिश्री अपनी ओर से कर दी। परंतु स्थिति पहले जैसी ही रही।

जो लोग आदिवासी बहुल इलाकों में गए हैं या उन्हें वहां काम करने और व्यवसाय करने का मौका मिला है, वे इस बात को अगर सच्चे मन से स्वीकार करेंगे तो अवश्य ही यह कहेंगे कि चाहे कानून हो लेकिन वहां के मूल निवासियों का शोषण बंद नहीं हुआ है, वे स्वयं भी यह करते रहे हैं और पुलिस तथा प्रशासन द्वारा किए जाने पर भी चुप रहे हैं। नतीजा बाहरी लोगों द्वारा अपना मतलब निकलने तक का विकास, सरकारी योजनाओं की बंदरबांट और प्राकृतिक संसाधनों विशेषकर जल, जंगल और जमीन पर कब्जा कर स्थानीय लोगों को अपना गुलाम समझने के रूप में हुआ है।

व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कुछ उदाहरण इस कथन की पुष्टि के लिए काफी हैं। दूरदर्शन, पैरामिलिट्री फोर्स और कुछ अन्य संस्थानों के लिए नॉर्थ ईस्ट के इलाकों में फिल्में बनाते समय सरकारी नियमों और कानूनों की धज्जियां उड़ते देखकर समझ में आ गया कि जब तक स्थानीय स्तर पर लोग शिक्षित नहीं होंगे, बड़े शहरों में पढ़ने लिखने के बाद यहां वापिस नहीं आयेंगे और सरकारी नीतियों को लागू करने का काम स्वयं नहीं करेंगे तब तक इन इलाकों की तस्वीर बदल पाना संभव नहीं है।

विश्वास और भरोसा

ग्रामीण मंत्रालय के लिए रेडियो कार्यक्रम चलो गांव की ओर का प्रसारण उत्तर पूर्व की प्रमुख आठ भाषाओं या बोलियों में करने का आदेश मिला तो सबसे पहली समस्या दिल्ली में इन प्रदेशों से आकर रहने वालों में से ऐसे व्यक्तियों से संपर्क करने की थी जो हिंदी में बनने वाले मूल प्रोग्राम का अपनी भाषा में रूपांतर कर सकें। किसी तरह इन तक पहुंच बनाई तो पाया कि उन्हें हम पर तनिक भी विश्वास नहीं है। कारण यह था कि दिल्ली सहित सभी बड़े शहरों में रहने वाले लोगों ने उन्हें अपना नहीं माना, अनेक अपमानजनक शब्द उनके लिए इस्तेमाल किए, किराए पर घर देते समय ऐसी बंदिशें लगाईं कि वे अपने तीज त्यौहार भी न मना सकें, अपनी पसंद का खानपान भी न कर सकें और यही नहीं उनकी पोशाक, चलने फिरने और रहने सहने की आदतों पर भी अंकुश लगाने लगे।

बहुत समझाने पर वे यह प्रोग्राम करने को तैयार हुए, शुरू में हाथ के हाथ तय फीस मिलने पर राजी हुए। एक बार जब विश्वास हो गया कि उनका शोषण नहीं होगा, कोई उनसे अभद्र भाषा में बोलने या व्यवहार करने की हिम्मत नहीं करेगा और उनकी व्यक्तिगत और पारिवारिक उलझनों को सुलझाने का प्रयास होगा, तब कहीं जाकर उनका पूर्ण सहयोग मिल सका। भरोसे की यह कड़ी आज तक कायम है।

नॉर्थ ईस्ट के लगभग सभी प्रदेशों में जाने पर यह समझने में देर नहीं लगी कि आदिवासियों की जीवन शैली समझने और उनके रस्मों रिवाज को जानने तथा उन्हें उनके पारंपरिक तरीके अपनाने में कोई रुकावट न डालने से ही उनका भला हो सकता है।  उनकी अपनी न्याय और पंचायत व्यवस्था है, वन संरक्षण की अपनी विधियां हैं, खेतीबाड़ी के अपने तरीके हैं, रोजगार की अपनी अलग पहचान है, जरूरत केवल उन तक आधुनिक टेक्नोलॉजी और उसका इस्तेमाल करने के तरीके पहुंचाने की है।

एक दूसरा उदाहरण ओड़ीसा के झारसुगुड़ा जिले में दर्लीपली गांव का है जहां एनटीपीसी का प्लांट है। इस आदिवासी इलाके में गरीबी के कारण ये लोग अपने मृतकों का दाह संस्कार और उनकी अस्थियों का नदी में विसर्जन न कर पाने से शव को जमीन में गाड़ देते थे। वे अपनी जमीन समुचित मुआवजा मिलने पर भी नहीं दे रहे थे क्योंकि इससे उनके पूर्वज बिना विधिवत संस्कार के उखड़ जाते। अनेक प्रयासों के बाद अधिग्रहण करने वाले अधिकारी हकीकत समझ पाए और उन्हें  समझा पाए कि यह काम वे सरकारी अनुदान से अपनी इच्छानुसार कर सकते हैं और सभी पूजा पाठ, अस्थि विसर्जन में लगने वाली राशि उन्हें अलग से मिलेगी, तब कहीं जाकर वे अपनी जमीन देने पर सहमत हुए। अनुमान लगाएं कि यदि यह समझदारी न बरती जाती तो विद्रोह, मारपीट से लेकर खून खराबा तक हो सकता था और प्लांट कभी भी न लग पाता।

ओडिसा सहित अनेक आदिवासी क्षेत्रों के घने जंगलों, वनस्थलियों के पार, नदी, नालों के उफान और कुदरती कहर से त्रस्त तथा घोर समस्याओं से जूझ रहे आदिवासियों तक पहुंच कर अपनी आंखों से उनकी जरूरत समझने और पूरा करने का काम पिछले कुछ वर्षों में होते हुए देखा है। इसी प्रकार मध्य प्रदेश में पहली बार आदिवासी बहुल इलाकों में ग्राम पंचायतों में आदिवासी सदस्यों के बैठने के लिए सुविधाजनक कुर्सी मेज और कॉन्फ्रेंस रूम जैसी सुविधाएं देखकर लगा कि इनके प्रति सम्मान का भाव पैदा हो रहा है। वरना तो चाहे कितना भी समृद्ध आदिवासी हो, उसे जमीन पर झुक कर बैठ कर ही अपनी बात कहनी होती थी।

आदिवासी समाज और आत्मनिर्भरता

जब तक आदिवासी समाज और संस्कृति को गणतंत्र दिवस तथा अन्य आयोजनों में उन्हें एक दिखावटी वस्तु समझने की मानसिकता से ऊपर नहीं उठेंगे, उनका शोषण नहीं रुकेगा। वास्तविकता यह है कि यह समाज अपने भरण पोषण की जरूरतें पूरा करने और आत्मनिर्भर होने में शहर वालों से कहीं अधिक सक्षम है। उन्हें दिखावा करना नहीं आता, छल कपट से दूर रहते हैं, मानव धर्म का निर्वाह करने और वन्य जीवों के साथ तालमेल बिठा कर उनका संरक्षण और संवर्धन करने में उनका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। यही नहीं वे अपने पारंपरिक अस्त्र शस्त्रों से शत्रुओं का सामना करने में समर्थ हैं। उनकी मर्जी के बिना उनके इलाकों में प्रवेश कर पाना नामुमकिन है।

जब तक आदिवासियों, वनवासियों और जनजातियों के स्वाभाविक गुणों को समझकर उन्हें अपने साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए हमारी ओर से पहल नहीं होगी, उनका विश्वास अर्जित करने के प्रयत्न नहीं होंगे, उनकी सोच के अनुसार नीतियां और योजनाएं नहीं बनेंगी, तब तक उनका सहयोग मिलने की बात बेकार है।

हमारा हाल यह है कि उनकी संस्कृति, पहनावे, खानपान से लेकर लोक संगीत, नृत्य, कला में उनकी परंपराओं का सस्ते दामों में सौदा करने में निपुण हैं और इस सब को महंगे दामों में बेचकर मुनाफा कमाने में माहिर हैं। अगर कोई इंकार करे तो पुलिस और प्रशासन अपनी मनमानी से लेकर इन सीधे लोगों पर अमानुषिक अत्याचार करने से नहीं चूकता।

महामहिम राष्ट्रपति से उम्मीद की जा सकती है कि वे अपने कार्यकाल में आदिवासियों को राजनीतिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने में सफल होंगी। उनकी प्रकृति को बदले बिना उनके रक्षक प्राकृतिक स्रोतों के गैरजरूरी दोहन को रोकने में समर्थ होंगी। यह समाज आबादी के हिसाब से चाहे ग्यारह करोड़ के आसपास हो लेकिन इसकी क्षमता, ताकत और हिम्मत इतनी है कि समस्त भारत का गौरव बन सकता है। यह तब ही हो सकता है जब इनके साथ दुर्व्यवहार न हो, इनका शोषण न होने दिया जाए और इनके अधिकारों को किसी दूसरे के द्वारा हड़प लिए जाने की आशंका न हो।  


शनिवार, 2 जुलाई 2022

प्लास्टिक कानून व्यावहारिक न होने से उन्हें लागू करना अनुचित है

 

इसे परंपरा कहें या अपना बड़प्पन दिखाने की कोशिश या फिर अपनी धाक से लेकर धौंस जमाने की मानसिकता और हठधर्मी कि जो सरकार करे वही ठीक, चाहे वास्तविकता कुछ भी हो !

यही प्रवृत्ति सरकार के उस आदेश में दिखाई देती है जिसके अनुसार जुलाई से सिंगल यूज प्लास्टिक पर बैन लगा दिया गया है।


प्लास्टिक कथा

उन्नीसवीं सदी के मध्य में प्लास्टिक के रूप में एक ऐसी खोज हुई जिसने तेजी से पूरी दुनिया में अपनी धूम मचा दी। उसके बाद प्लास्टिक के इस्तेमाल से होने वाले नुकसान जैसे जैसे सामने आते गए, इस पदार्थ का विकल्प खोजा जाने लगा लेकिन अभी तक इसमें बहुत कम सफलता मिली है लेकिन भविष्य में कुछ भी हो सकता है।

प्लास्टिक के आने से पहले कागज से बनी चीजों का इस्तेमाल होता था जो महंगा भी था और उसके लिए पेड़ों को काटना पड़ता था। इसके साथ ही न तो यह वस्तुएं ज्यादा देर तक टिकती थीं और न ही इनमें रखकर लाई जाने वाली चीजें।  इसके अतिरिक्त  उनके निपटान यानी डिस्पोजल की समस्या भी थी।

यह दौर उद्योग धंधों के पनपने और उपभोक्ताओं के लिए प्रतिदिन नई चीजों के आने का था जिन्हें रखने के लिए प्लास्टिक से बनी टिकाऊ और सस्ती थैलियों का इस्तेमाल होने लगा। इसी तरह खाने पीने में प्लास्टिक के कप, ग्लास, प्लेट, नली, क्रॉकरी, कटलरी और बहुत सी दूसरी सामग्री ने घर घर में अपनी जगह बना ली। इस तरह प्लास्टिक हमारे जीवन का अनिवार्य अंग बन गया जिसके बिना कुछ भी करना संभव नहीं रहा।

अब इसी प्लास्टिक पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए हैं जिन्हें लागू करना न तो आसान है और न ही प्रैक्टिकल क्योंकि इसके विकल्प के रूप में केवल यही है कि हम कागज से बनी चीजों का इस्तेमाल फिर से शुरू कर दें।

कानून का पालन न करने और पकड़े जाने पर पांच साल की कैद और एक लाख तक का जुर्माना हो सकता है। कुछ राज्यों ने तो ऐसे दिशा निर्देश जारी किए हैं कि यदि कोई प्लास्टिक की थैली में घर का सामान लाते हुए पकड़ा गया तो उस पर कड़ी कार्यवाही होगी। ऐसे आदेशों से समाज में अफरातफरी और उसके बाद वसूली का धंधा ही बढ़ेगा।

सच यह भी है कि लगभग एक लाख छोटे, मध्यम उद्योग इस कारोबार में हैं और लाखों नहीं करोड़ों लोग इसके व्यापार से जुड़े हैं। प्लास्टिक बंदी से क्या अंधेर नगरी चैपट राजा की कहावत सिद्ध नहीं होती और समाज में अव्यवस्था फैलने का खतरा नहीं है ? यह भी हो सकता है कि इस कानूनन बंदी का कोई असर ही न हो और उद्योगपति, व्यापारी तथा उपभोक्ता कुछ ले दे कर इसके उल्लंघन होने पर बचने का रास्ता निकाल लें।


प्लास्टिक प्रदूषण

इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्लास्टिक के इस्तेमाल में अनेक दोष हैं, जैसे कि इसके डिस्पोजल का कोई सही प्रबंध न होने से यह बहुत घातक हो सकता है । मनुष्य से लेकर पशुओं तथा जलचरों के लिए नुकसानदायक है। अक्सर सड़कों, नदी के किनारों और समुद्र तट पर प्लास्टिक की बोतलें और कचरा बिखरा हुआ दिखाई देता है। अब क्योंकि इसके डिस्पोजल का कोई उचित प्रबंध सरकार से हुआ नहीं तो फिर इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने का कोई औचित्य नहीं बनता।

इसके विपरीत प्लास्टिक अपने गुणों के कारण, उसमें रखी वस्तुओं के देर तक तरोताजा रहने और पूरी तरह से कीटाणु रहित होने अर्थात हाइजीनिक होने से इसका इस्तेमाल न करना संभव नहीं है।

जब ऐसा है तो प्लास्टिक के दोषों का निराकरण करने का कानून बनाया जाता, उसका ऐसा विकल्प दिया जाता जो अपनी उपयोगिता में प्लास्टिक के बराबर होता और इसके साथ ही उसके निपटान के लिए वेस्ट मैनेजमेंट के जरिए उपकरण और प्लांट्स लगाए जाते, तब तो बात समझ में आती। 


टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल

ऐसा नहीं है कि इस दिशा में कोई काम नहीं हुआ। देश के कुछ राज्यों में प्लास्टिक प्रदूषण से बचने के लिए प्लांट्स लगे हैं लेकिन वे अपनी सीमित क्षमता के कारण बेअसर साबित हो रहे हैं। अपने देश के आकार और आबादी के सामने ये ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं। नतीजा यही है कि नदियों से लेकर समुद्र तक प्लास्टिक प्रदूषण फैलता जा रहा है।

ऐसा भी नहीं है कि यह समस्या केवल हमारे देश की हो, यह विश्वव्यापी है। जिन देशों ने इस समस्या के विकराल रूप लेने से पहले कदम उठा लिए, वे आज प्लास्टिक के फायदों का लाभ उठा रहे हैं और साथ ही उसके प्रदूषण से बच भी रहे हैं। प्रतिबंध लगाना तब ही सही हो सकता है कि जब उसका कोई समान विकल्प हो। सिंगल यूज प्लास्टिक जैसी कोई वस्तु जब तक खोज नहीं ली जाती, तब तक के लिए इस पर रोक लगाने के बारे में सरकार को व्यवहारिक दृष्टिकोण से विचार करना होगा। ऐसी नीति और कानून व्यवस्था लागू करनी होगी कि प्लास्टिक के लाभ मिलते रहें और स्वास्थ्य की रक्षा भी हो जाए।

एक बार इस्तेमाल कर फेंक दिए जाने वाले प्लास्टिक को रीसाइकल कर बहुत से उपयोगी पदार्थों में बदला जा सकता है। ऐसा नहीं है कि हमारा उद्योग जगत यह बात नहीं जानता लेकिन उसके सामने रीसाइक्लिंग प्लांट लगाने की पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं, इसकी लागत बहुत ज्यादा होने और मुनाफा कम होने और इसके साथ ही टैक्स और दूसरी सुविधाओं का आकर्षण न होने से इसमें बहुत कम निवेश हो रहा है।

ऐसा भी नहीं है कि हमारे देश में इस दिशा में अनुसंधान नहीं हो रहा या प्लास्टिक डिस्पोजल के लिए टेक्नोलॉजी का अभाव है। हमारी वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं, विशेषकर वे जो पर्यावरण प्रदूषण रोकने के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं, उन्होंने सस्ती और टिकाऊ टेक्नोलॉजी विकसित की हुई हैं। अफसोस की बात यह है कि जब सरकारी संस्थान ही उनका इस्तेमाल नहीं करते तो फिर प्राइवेट सेक्टर से इसकी उम्मीद रखना व्यर्थ है।

सिंगल यूज प्लास्टिक के इधर उधर फेंकने से हमारे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में नाले और नालियां भरे पड़े हैं जो गंदगी और बदबू के अतिरिक्त कुछ नहीं देते, स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हैं और अनेक बीमारियों का कारण हैं। यदि सरकार चाहे केंद्र की हो राज्य की, इन गंदे नालों से ही अपने देश में विकसित टेक्नोलॉजी से सफाई कराने की जिम्मेदारी ले ले तो फिर किसी तरह का प्रतिबंध लगाने की जरूरत नहीं रहेगी।

उदाहरण के लिए नागपुर स्थित नीरी प्रयोगशाला ने ऐसी टेक्नोलॉजी बहुत वर्ष पहले विकसित कर ली थी जिसके इस्तेमाल से इन नालों को प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्त किया जा सकता है। उसके पानी को साफ करके नाले के आसपास हरियाली के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी तरह निजी क्षेत्र में पीरामल समूह की वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं बहुत सराहनीय कार्य कर रही हैं।

एक उदाहरण अमेरिका का है। वहां एक ऐसा सिस्टम है कि प्रदूषण होते ही या उसकी संभावना होने पर तत्काल टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को अनिवार्य बना दिया गया है।


सरकार पुनर्विचार करे

यदि सरकार में इच्छाशक्ति है और वह वास्तव में प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्ति दिलाकर देशवासियों का भला करना चाहती है तो उसे अपने वर्तमान आदेश को रद्दी में डालकर नए सिरे से सोचना होगा। यहां यह बताना कि सरकार को इन सब अनुसंधानों और खोजपूर्ण तथ्यों की जानकारी नहीं है तो यह एक भ्रम है। सरकार सब कुछ जानती है लेकिन हो सकता है कि अपने राजनीतिक स्वार्थ या फिर किसी अन्य कारण से कम से कम इस मामले में तो सही कदम नहीं उठा रही।


शनिवार, 25 जून 2022

समय के साथ सिद्धांत, मूल्य, नैतिकता का बदलना आवश्यक नहीं है।

 एक कहावत है, जहां देखी तवा परात, वहां गंवाई सारी रात। इसका सीधा सा अर्थ है कि जिस स्थान पर पेट भरने का साधन हो, जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं का अभाव न हो, रहने की व्यवस्था हो और अपना अंत समय आने तक आराम से रहा जा सके, वह सर्वश्रेष्ठ है।


जीवन की राह

जन्म से लेकर मृत्यु तक की यात्रा में अनेक पड़ाव आना निश्चित है, जिन्हें व्यक्ति अपनी सामथ्र्य और इच्छा के अनुसार पार भी करता है। अपने स्वभाव के अनुसार सिद्धांत और मूल्य बनाता है।  यही नहीं, अपनी जरूरतों को पूरा करने के साथ साथ स्वयं अपने और दूसरों के लिए नैतिकता, ईमानदारी, भलमनसाहत तथा व्यवहार के मापदंड तैयार कर लेता है और अपेक्षा करता है कि वर्तमान और भविष्य की पीढियां उनका पालन करें। बहुतों ने अपना वर्चस्व यानि कि यह मनवाने के लिए कि वह औरों से श्रेष्ठ है, अपने नाम से उन्हें प्रसिद्ध और नैतिकता परखने की कसौटी के रूप में प्रचारित भी किया है। 

प्राचीन काल के हमारे ग्रंथों में कहा गया है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की धुरियों पर हमारा जीवन टिका है। इनकी व्याख्या करने के लिए सत्य, अहिंसा, आस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य के पांच सूत्र भी बनाए। इन पर चलने के लिए दूसरों के प्रति आदर, सहानुभूति, प्रेम और मानवीयता का व्यवहार करने की परंपरा बनाई ताकि सुख शांति से और मिलजुलकर जीवन का मार्ग तय हो जाए।

यह एक आदर्श स्थिति हो सकती है लेकिन इसके विपरीत जीवन में ईष्र्या, द्वेष, अहंकार जैसी प्रवृत्तियां कहां से आ गईं, यही नहीं वे मनुष्य पर हावी भी हो गईं और बेईमानी, छल कपट और धोखाधड़ी एक सामान्य व्यवहार बन गया।

इसका अर्थ यही है कि जीवन में चाहे सहनशीलता, संवेदना, परस्पर आत्मीयता और एक दूसरे के प्रति सद्भावना का कोई स्थान हो या न हो पर सफल होने के लिए किसी भी साधन को अपनाने में कोई बुराई नहीं है चाहे उसका स्वरूप अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार और नैतिक पतन ही क्यों न हो?


आधुनिकता और नैतिकता

क्या कभी इस बात पर गंभीरता से विचार किया गया है कि हमारे देश में चैदह पन्द्रह वर्ष से पैंतीस से चालीस वर्ष के युवा वर्ग के लिए अपराधों में हिस्सा लेना, हिंसक व्यवहार करना, नशे और ड्रग्स का सेवन और किसी भी कीमत पर अपनी धाक जमाए रखना जीवन शैली बन गया है ?

इसे आधुनिकीकरण, शहरीकरण या वैश्वीकरण कहकर किनारे नहीं किया जा सकता क्योंकि यह एक वास्तविकता है कि जिन देशों में इस तरह के व्यवहार पनपे, उनका पतन होने में अधिक समय नहीं लगा और निश्चित रूप से वहां की अर्थव्यवस्था बिगड़ी ही नहीं बल्कि बेकाबू होकर उस देश को ले डूबी।

इन देशों में निरंकुश शासक अपनी शोषण करने की आदत के बल पर अपनी प्रजा को विदेशी दासता से बचा नहीं पाए, अब चाहे यह राजनीतिक हो, आर्थिक हो, सामाजिक हो या फिर उन पर कब्ज़ा हो। और जब दुनिया इतनी छोटी हो गई है कि कुछ भी छिपाना आसान नहीं है तो फिर यह सोचने का यही सही वक्त है कि हम अपने देश में ऐसी परिपाटी को अपनी जड़ न मजबूत होने दें जिससे अनैतिक आचरण करना मामूली बात समझी जाने लगे।

ऐसी शिक्षा व्यवस्था को क्या कहेंगे जिसमें पढ़ाया तो यह जाता हो कि जीवन में ईमानदारी का होना आवश्यक है लेकिन घर, परिवार और समाज में यह देखने को मिले कि बेईमानी, रिश्वतखोरी, अत्याचार और कदम कदम पर भेदभाव करना एक सामान्य व्यवहार माने जाने की परंपरा है और उसका पालन करना अनिवार्य है ?

शिक्षा का उद्देश्य केवल जब इतना रह जाए कि जीवन में सुख सुविधाओं का अंबार लगाया जाए, उसके लिए कोई भी रास्ता अपनाने पर रोक न हो, कुछ भी करने की छूट हो और इसके साथ ही अगर किसी की नज़र में आ गए तो बच निकलने के अनेक रास्ते हों, तब समझना चाहिए कि देश का पतन होना निश्चित है।

इसे और स्पष्ट रूप से कहना हो तो कह सकते हैं कि अपने व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति के लिए सत्ता का दुरुपयोग करना सामान्य घटना बन जाए और किसी का उत्पीड़न और शोषण समाज को विचलित न कर सके। ऐसी स्थिति होने पर यदि पीड़ित शस्त्र उठा लें, आंदोलन का रास्ता अपना लें और किसी भी प्रकार से अपने साथ हुई ज्यादती का बदला लेने निकल पड़ें तो इसमें आश्चर्य क्यों होना चाहिए ?

डार्विन का सिद्धांत सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट का यह अर्थ तो कदापि नहीं है कि जो समर्थ है, ताकतवर है, वह कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र है। उस पर न कोई दोष लग सकता है और उसे यदि अपराधी ठहरा भी दिया गया हो तो उस पर कोई कार्यवाही तब तक नहीं की जा सकती जब तक वह कानून और संविधान में दिए गए सभी विकल्प न आजमा ले।

कोई भी व्यक्ति हो, उसका परिवार या जहां रहता है, वहां का समाज हो, सत्ताधारियों और उनके राजनैतिक प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता। यही कारण है कि यह जानते हुए भी कि उनके नेता का रास्ता गलत है, उसकी हिमायत करने और साथ देने के लिए वे विवश हैं।

इसका कारण यही है कि जीवन में नैतिक मूल्यों, सिद्धांतों और सही तथा सत्य का साथ देने की परिभाषा बदल गई है। यह बदलाव केवल गिरावट का संकेत है और आशंका इस बात की है कि जब साधारण नागरिक के सब्र का घड़ा भर जाएगा, तब क्या होगा ? सत्ता पाने और उस पर अधिकार जमाए रखने के लिए किसी भी साधन का इस्तेमाल सही लगने लगे, तो समझिए कि अशांति और विद्रोह होना तय है।

जब तक सत्ता, शासन और उसके कर्णधार अपने जीवन में नैतिक आचरण करने और भेदभाव न करने की नीति का पालन नहीं करेंगे, तब तक सामान्य नागरिक से यह उम्मीद करना कि वह केवल हाथ जोड़कर सब कुछ स्वीकार करता रहेगा, एक ऐसी गलतफहमी है जिसका शिकार बनने में देर नहीं लगती। यह जितनी जल्दी समझ में आ जाए कि शासक नहीं बल्कि जनता कर्णधार है, उतना बेहतर होगा।


शुक्रवार, 17 जून 2022

अनुशासनहीन होने का अर्थ अराजकता के रास्ते देशद्रोह तक जाना है

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शुक्रवार, 10 जून 2022

ब्रिटिश राज की मानसिकता भारत के विकास में रुकावट

 

यह कहावत, बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध ले, अपने आप में सही है लेकिन सत्य यह है कि भूतकाल हमेशा वर्तमान पर हावी होता आया है। यह कैसे भुलाया जा सकता है कि आज जो हम हैं, उस पर हमारे कल की छाया की बहुत बड़ी भूमिका है।

गुलामी की विरासत

सांसद और कांग्रेस नेता शशि थरूर ने अंग्रेज युग के बारे में एक शोधपूर्ण और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर ‘एन ईरा ऑफ डार्कनेस, द ब्रिटिश अंपायर इन इंडिया‘ लिखी है। इसे पढ़कर यह लगता ही नहीं बल्कि सिद्ध होता है कि स्वतंत्रता के बाद से अब तक भारतीयों के मन से अंग्रेजी राज की छाप या असर मिटा नहीं है।

यहां इस बात का जिक्र करना जरूरी है कि अंग्रेजों और मुगलों से भी पहले भारत की पहचान सोने की चिड़िया के रूप में थी। इसका कारण यह था कि हम संसार में अनेक क्षेत्रों में अद्वितीय थे, हमारे मुकाबले बहुत कम साम्राज्य थे। कोई भी विषय हो, हमारी राय का सबसे अधिक महत्व होता था। यह बात नोबल पुरस्कार से सम्मानित अमृत्य सेन से लेकर, रविंद्रनाथ टैगोर और अन्य विश्व प्रसिद्ध लेखकों और इतिहासकारों ने कही है। उदाहरण के लिए दर्शन, कृषि, शिक्षा, विज्ञान, कला, साहित्य, वास्तुकला, संगीत, व्यापार, उद्योग, निर्यात चिकित्सा, खगोल शास्त्र से लेकर ब्रह्माण्ड की अनेक गुत्थियों को सुलझाने में भारत सब से आगे था।

जब अंग्रेज आए तो सबसे पहले उन्होंने हमारी बुद्धि, कौशल, विरासत और सबसे आगे रहने के गर्व को चकनाचूर करने की नीतियां बनाईं ताकि हम मानसिक रूप से उनके गुलाम बन कर रह जाएं। इसके साथ यह भी कि अंग्रेज हमारी शारीरिक ताकत का अपने ही लोगों का दमन करने में इस्तेमाल कर सके।

जहां तक मुगल शासन का संबंध है, हालांकि वह क्रूरता के मामले में बहुत निर्मम थे और इसी के बल पर हमारे शासक बने लेकिन उन्होंने हमारी बहुत सी विरासत को नष्ट न कर उसमें वृद्धि करने का काम भी किया। वे दिखाना चाहते थे कि मुगल साम्राज्य की विरासत हमसे कम नहीं है और इसीलिए उन्होंने हमारे मंदिरों, भवनों और गढ़ तथा किलों से मुकाबला करने वाली बहुत सी मस्जिदों और इमारतों का निर्माण किया। इनमें से आज बहुत सी हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच विवाद का कारण बनी हुई हैं।

शशि थरूर की पुस्तक पढ़कर यह समझा जा सकता है कि अंग्रेजों ने जो भी कानून बनाए या नीतियों को लागू किया, वे सब अंग्रेजी साम्राज्य के लाभ और उसके विस्तार के लिए थे। इसमें से किसी भी काम में भारतीयों का हित नहीं होता था।

दुःख की बात यह है कि आजादी के बाद से अब तक बहुत से ऐसे कानून और नीतियां लागू हैं जो भारत में लूट खसोट के लिए अंग्रेजों ने बनाई थीं। विडंबना यह है कि हमारे संविधान में इन कानूनों को मान्यता मिली हुई है।


जुल्म पर आधारित कानून अब तक

एक उदाहरण है। जलियांवाला बाग में हत्याकांड के दोषी डायर को अंग्रेज सरकार ने इंग्लैंड में न केवल सम्मानित किया बल्कि उसे भारतीयों की कीमत पर बेशकीमती उपहार भी दिए। मतलब यह कि जुल्म करने वाले को सजा के बजाए पुरस्कार। इसी तरह बहुत से ब्रिटिश अधिकारियों को भारतीयों पर अत्याचार करने के लिए ईनाम दिए जाते थे। इस कड़ी में भ्रष्टाचार में लिप्त, बलात्कारी और कुशासन के लिए जाने जाने वाले अंग्रेज शामिल थे।

अब हम अपने देश की बात करते हैं। आज हमारी सरकारों में, चाहे केंद्र हो या राज्य सरकारें, अत्याचार के लिए मशहूर लोगों, भ्रष्ट नेताओं, रिश्वतखोर अधिकारियों और छल कपट से अपार संपत्ति हासिल करने वाले लोगों का बोलबाला उनसे कहीं ज्यादा है जो ईमानदार, मेहनती और अपने बल पर विभिन्न क्षेत्रों में भारत का नाम रौशन कर रहे हैं।

अगर ऐसा न होता तो किसी भी दोषी व्यक्ति और जेल में बंद अपराधी का दबंगई, गुंडागर्दी और धन के बल पर कोई भी चुनाव लडना संभव और सुविधाजनक न होता। अगर संविधान का संरक्षण न मिला होता तो ये चुनाव लड़कर मंत्री न बन पाते और यह भी न होता कि जिस पुलिस अधिकारी ने जिस गुंडे को गिरफ्तार किया हो, उसी की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी उसे दे दी जाए।

यह हमारे ही देश में हो सकता है क्योंकि हमने अनेक दावों के बावजूद ऐसे कानून नहीं बदले हैं जो अंग्रेजों ने हमारा दमन करने के लिए बनाए थे।

शशि थरूर ने बहुत ही साफगोई से वर्णन किया है कि किस तरह हमारी कॉटन और दूसरे कृषि उत्पादों का अंग्रेज अपने मुनाफे के लिए निर्यात करते थे। आज भी यह हो रहा है कि किसान केवल उगाएं, व्यापारी तथा उद्योगपति उत्पादन करें लेकिन उसका सबसे अधिक फायदा सरकार और उसके अमीर साथियों को मिले।

एक दूसरा उदाहरण है । अक्सर कहा जाता है कि अंग्रेज ने भारत की यातायात व्यवस्था को सुधारने के लिए रेल चलाकर बहुत बड़ा काम किया। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि अगर अंग्रेज रेल न लाए होते तो हम कितना और अधिक पिछड़े हुए होते। वास्तविकता यह है कि रेल का फायदा अंग्रेज के अपने लिए था क्योंकि उसे एक सस्ता साधन आने जाने और चीजों को लाने ले जाने के लिए चाहिए था। जब भी किसी भारतीय को इससे लाभ लेने की बात आती तो उसे नकार दिया जाता। यहां तक कि थर्ड क्लास डिब्बे में ही कोई हिंदुस्तानी जा सकता था और अंग्रेज जब चाहे तब वहां से उसे बाहर फिंकवा सकता था। सामान्य भारतीय को थर्ड क्लास का मानते हुए हमने भी इस व्यवस्था को बहुत समय तक कायम रखा।

अब हम शिक्षा की बात करते हैं । यह तर्क दिया जाता है कि भारत में अंग्रेजी भाषा नहीं पढ़ाई जाती और आज भी अगर न पढ़ाई जाए तो भारतवासी दुनिया में तरक्की नहीं कर सकते। हकीकत यह है कि अंग्रेज ने अंग्रेजी पढ़ाने का इंतजाम इसलिए किया ताकि वह ऐसे लोग तैयार हों जो शासन चलाने में मदद कर सकें। यह पढ़ाई भी बस इतनी कि कहीं बाबू जैसे कर्मचारी की जरूरत पूरी हो।

आज भी अंग्रेजी इसलिए पढ़ी जाती है ताकि उसके बलबूते बड़ी नौकरी, अधिकार संपन्न पद और अपनी एक अलग पहचान हासिल की जा सके। हमारी जो शिक्षा है वो रट्टा मारकर सफल तो कर देती है लेकिन उससे मानसिक विकास या अपनी अलग सोच पैदा नहीं होती। परीक्षा परिणाम तो सौ फीसदी आ सकते हैं लेकिन उसके आधार पर, केवल कुछेक अपवादों को छोड़कर जीवन में कोई कीर्तिमान स्थापित नहीं किया जा सकता। 

अगर हम अपनी प्राचीन शिक्षा पद्धति को देखें तो उस समय ओरल यानी मुंहजुबानी शिक्षा देने का प्रचलन अधिक था। पढ़ने के लिए वेद, उपनिषद और दूसरे ग्रंथ थे लेकिन उनका पढ़ना उनके लिए ही अनिवार्य था जो उनके पठन पाठन से कोई नया शोध करना चाहें, वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल करना हो या भविष्य की कोई नीति बनाने के लिए आवश्यक हो और  इसके लिए विशेष रूप से विश्वविद्यालयों में पढ़ाई की व्यवस्था होती थी।

सामान्य व्यक्ति को ग्रंथों से अधिक व्यावहारिक ज्ञान के विषयों की शिक्षा दी जाती थी ताकि वह नौकरी या व्यवसाय अपनाकर अपनी गृहस्थी का पालन कर सके। इसके साथ ही गुरुकुल और बाद में पाठशाला या मदरसा उसकी शिक्षा का केंद्र होता था और सीमित सब्जेक्ट होते थे । अंग्रेजों ने इतने विषय सिखाने शुरू कर दिए जिनका जीवन में कोई महत्व नहीं था । ऐसा इसलिए किया गया ताकि विद्यार्थी के मन में अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझने की मानसिकता बन सके । मतलब यह कि देसी अंग्रेज बन कर वे हुकूमत करने में मददगार हो सकें।

यह परंपरा या परिपाटी आज तक बदस्तूर जारी है। सरकार को वैज्ञानिक, शोधकर्ता, प्रोफेशनल और अपनी अलग सोच रखने वाले भारतीय नहीं चाहिएं बल्कि ऐसे कर्मचारी चाहिएं जो बाबूगिरी कर सकें और किसी भी गलत आदेश का पालन बिना किसी विरोध के कर सकें। इसीलिए शिक्षा, विशेषकर उच्च शिक्षा को इतना मुश्किल और महंगा कर दिया गया है कि कुछ ही के लिए यह संभव है। इसके साथ ही विद्यार्थी को ज्यादातर वे सब विषय पढ़ने पड़ते हैं जिनका उसके जीवन में कभी कोई उपयोग होने वाला ही नहीं होता।


दासता की सोच

आज हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। न जाने कितने समारोह अपनी आजादी को सुरक्षित रखने और स्वयं पर गर्व अनुभव करने के लिए मनाते रहे हैं। क्या यह वास्तविकता नहीं कि चाहे शासक हो या प्रजा, हम सब की सोच और मानसिकता अंग्रेजी शासन की गुलामी से अपने को मुक्त नहीं कर पाई है। बात बात पर अंग्रेजी शासन का उदाहरण देना क्या इसका प्रतीक नहीं है कि अभी तक ऐसी सोच रखने वाले इस देश में हैं कि अंग्रेजों के बनाए कानूनों और उनकी भाषा से ही हम उन्नति कर सकते हैं।े

यहां यह कहना जरूरी है कि सामान्य नागरिक द्वारा अपनी सोच का दायरा व्यापक और भारतीयता से ओतप्रोत करने का कोई अर्थ नहीं है जब तक कि शासन अर्थात सत्ताधारी व्यक्ति और राजनीतिक दल अपनी मानसिकता में आमूल चूल परिवर्तन नहीं करते। यथा राजा तथा प्रजा की उक्ति पूरी तरह लागू होती है।

ऐसा करने के लिए हिम्मत चाहिए, संविधान में संशोधन करने की तैयारी करनी होगी, सभी कानून जो गुलामी के दौर में बनाए गए थे, उन्हें रद्दी की टोकरी में फेंकना होगा।


एक उम्मीद

क्या इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि किसी अपराधी को चुनाव लड़ने न दिया जाए, रिश्वतखोरी के बिना सरकारी काम करवाए जा सकें, भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों को राजनीतिक संरक्षण न मिल सके, बेसिक जरूरतों को पूरा करने के लिए सत्ता में बैठे लोगों का मुंह न ताकना पड़े और यदि किसी के साथ अन्याय हुआ है तो उसे वर्षों तक न्याय पाने के लिए लड़ना न पड़े । वर्तमान सरकार, क्योंकि पूर्ण बहुमत में है, इसलिए उसके लिए यह करना कतई मुश्किल नहीं, केवल इच्छाशक्ति चाहिए।  


शुक्रवार, 3 जून 2022

युद्ध या आपदा से हुए अनाथ बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी


प्रतिवर्ष चार जून को एक ऐसा विश्व दिवस मनाया जाता है जो ऐसे बच्चों के भविष्य को लेकर है जिनके माता पिता, संरक्षक युद्ध में मारे गए हों। इसकी शुरुआत चालीस साल पहले हुई थी।  इसका संदर्भ फिलिस्तीन और लेबनान पर इजरायल के हमले के कारण अनाथ हो गए बच्चों के पालन पोषण की समस्या पर दुनिया का ध्यान दिलाना था।  संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा इस दशक के अंत तक ऐसे बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए कदम उठाए जाने की बात कही गई है और सभी देशों से इस बारे में ठोस कार्रवाई करने की अपेक्षा है।


बच्चों पर असर

वर्तमान संदर्भ में इस समस्या को रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध के कारण अपने माता पिता और अभिवावकों की लड़ाई में मृत्यु हो जाने पर बच्चों को हो रही परेशानियों को सामने रखकर  समझा जा सकता है। युद्ध में बच्चों की फौज में भर्ती, स्कूल और अस्पताल पर हमले, यौन हिंसा से लेकर अपहरण और किसी भी मानवीय सहायता के मिलने में रूकावट के कारण होने वाली स्थिति बहुत गंभीर हो जाती है। इसका बच्चों की मानसिक और शारीरिक स्थिति पर बुरा प्रभाव पड़ना निश्चित है।

युद्ध या आपदा का शारीरिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव समझने के लिए एक घटना का जिक्र है। एक दिन एक परिचित अपने साथ लगभग अठारह वर्ष के युवक को लेकर आए। कहने लगे कि जब यह दस साल का था तो इसके सामने इसके माता पिता की कुछ गुंडों ने बेरहमी से हत्या कर दी थी। अपने रिश्तेदारों के बीच यह बड़ा होने लगा लेकिन इसे वह घटना भुलाए नहीं भूलती और यह अक्सर हिंसक रूप धारण कर लेता है। जब तब इसे एक दौरा सा पड़ता है और जो भी इसके हाथ में आता है, तोड़ने फोड़ने लगता है। इसी के साथ यह पढ़ने लिखने में होशियार है लेकिन शिक्षक इसकी हिंसक प्रवृत्ति के कारण बहुत डरते हैं। शरीर से भी यह काफी मजबूत है और अगर किसी का हाथ पकड़ ले तो छुड़ाना मुश्किल हो जाता है।

आम तौर पर यह एक नॉर्मल व्यक्ति की तरह रहता है लेकिन कभी इतना बेकाबू हो जाता है कि संभाले नहीं संभलता। अब रिश्तेदारों ने भी इसे अपने साथ रखने से मना कर दिया है इसलिए इसमें चोरी की आदत भी आ गई है। इसके भविष्य के बारे में मेरे मित्र की चिंता कुछ इसलिए भी है क्योंकि यह उनके पडौस में रहता है और जो कुछ इसके साथ हुआ वह सब जानते हैं।

एक मनोचिकित्सक से मिलवाने के बाद उसकी समस्या का हल निकलने की उम्मीद हुई लेकिन मन में यह बात आई कि हमारे यहां ऐसे बच्चों को लेकर कोई ऐसी नीति या व्यवस्था क्यों नहीं है जिससे कोई स्थाई समाधान निकल सके ?

यह सोचकर कि युद्ध के कारण तो ऐसे हजारों लाखों बच्चों का न केवल बचपन ही समाप्त हो जाता होगा बल्कि उनके सामने जीवन जीने की भी कठिन चुनौती रहेगी, चिंतित होना स्वाभाविक है।

अगर इतिहास पर नजर डालें तो भारत विभाजन के समय जिन लोगों ने बचपन में हिंसा, बलात्कार के दृश्य देखे, वे जिंदगी भर उन्हें नहीं भूल पाए हैं। इसके अलावा जितने भी अब तक युद्ध हुए हैं, उनके कारण कितने बच्चों का बचपन खो चुका होगा, इसकी संख्या तो हो सकता है सरकार के पास हो लेकिन उनके साथ जीवन में क्या हुआ होगा, इसका लेखा जोखा किसी के पास नहीं है।


कानून और सुरक्षा

इस परिस्थिति में बाल अधिकार को लेकर बने कानून भी ऐसे बच्चों को सुरक्षा नहीं दे पाते। हालांकि कानूनन देश में बहुत से बाल सुधार गृह या ऐसी ही बहुत सी संस्थाएं हैं जिन पर इनका भविष्य संवारने की जिम्मेदारी है। वास्तविकता यह है कि एक सर्वेक्षण के अनुसार इन सभी जगहों की हालत ज्यादातर एक कारागार की तरह है जहां इन बच्चों के साथ एक अपराधी जैसा व्यवहार होता है। मासूमियत के स्थान पर उनके चेहरे पर कठोरता दिखाई देती है। बचपन की चपलता या शरारत की जगह आक्रोश और क्रोध देखने को मिलता है।

ऐसे बच्चे जब किसी अनाथालय या सुधार गृह से वयस्क होकर निकलते हैं तो उन्हें सम्मानपूर्वक जीवन जीने की राह में रोड़े बिछे हुए लगते हैं। उनका नाम स्ट्रीट चिल्ड्रन पड़ जाता है और वे चाहे कितने भी मेघावी हों, उनके साथ पढ़ाई लिखाई से लेकर नौकरी तक के मामले में भेदभाव किया जाता है। असल में होता यह है कि बचपन और युवा होने के बीच उनकी स्वयं अपने आप से लगातार होने वाली लड़ाई उन्हें कहीं सफल नहीं होने देती।

ऐसे बच्चों की स्थिति भी कम दुखदाई नहीं है जिनके माता पिता में से कोई एक या दोनों किसी आपदा, बीमारी या दुर्घटना के कारण न रहे हों और उनके सामने दूसरों की दया पर रहने के अतिरिक्त कोई विकल्प न हो। वर्तमान में कोरोना के कारण ऐसे बच्चों की संख्या काफी अधिक है जो अनाथ हो गए हैं और किसी सरकारी या गैर सरकारी व्यवस्था के न होने से नारकीय जीवन जीने को विवश हैं।

हमारे संविधान में जीने का अधिकार है और बाल अधिकारों को लेकर पॉक्सो जैसे कानून भी हैं। प्रश्न यह है कि क्या यह किसी बच्चे को उसके जीने के अधिकार के साथ उसके विकास करने का अधिकार भी दिलाते हैं। उसकी पढ़ाई लिखाई, शिक्षा और रोजगार उपलब्ध कराने के बारे में भी कुछ कहते हैं ? व्यवहार में ऐसा कुछ नहीं होने से ये बच्चे अपने सर्वाइवल यानी जीवित रहने और वह भी सम्मान सहित जीवन यापन करने के अधिकार से वंचित रहते हैं।

उल्लेखनीय है कि युद्ध या आपदा के कारण बेसहारा हुए बच्चों की संख्या हजारों में नहीं बल्कि लाखों में है। अभी तक इतनी बड़ी जनसंख्या जैसे तैसे बड़ी होती रही है और किसी संरक्षण या सरपरस्ती के न होने से एक तरह से दिशाहीन होकर उम्र का फासला तय करती रही है। इनमें से कुछ का स्वभाव इतना उग्र होता है कि सब कुछ तहस नहस करने की सोच बनने लगती है, कुछ की फितरत इतनी दबी कुचली हो जाती है कि हमेशा एक बेचारगी रहती है और वे जीवन को बस ढोते रहने को ही अपना भाग्य समझते हैं।

क्या कभी इस बात पर किसी का ध्यान गया है कि समाज में एक युवा पीढ़ी क्यों इतनी असहनशील हो रही है कि उसे किसी बात पर विश्वास नहीं होता, उसे लगता है कि हर कोई उससे कुछ न कुछ छीनने के लिए तैयार है। इसका मूल कारण उनमें से अधिकांश के जीवन में उनके बचपन में भोगी गई असामान्य घटनाएं हैं जिनका समय रहते कोई हल नहीं निकला और ऐसे व्यक्तियों को उपचार के स्थान पर प्रताड़ित किया गया।

क्या यह सही समय नहीं है कि सरकार कोई ऐसी नीति बनाए, उसे कानूनी जामा पहनाए और लागू करने का पुख्ता इंतजाम करे जिसमें किसी भी कारण से बेसहारा हर बच्चे को सुरक्षा और संरक्षण मिलने की तुरंत व्यवस्था हो। यह ध्यान रखना जरूरी है कि ऐसे बच्चे का हरेक पल कीमती है और उसे यदि तुरंत सही तरीके से उसके अधिकार मिलने में देरी हुई ती वह जीवन भर अपने साथ हुई त्रासदी से उबर नहीं सकता।

सरकार के पास अपना तंत्र है, अपनी व्यवस्था है और अपनी ताकत भी और वह अगर निश्चय कर ले कि एक पूरी पीढ़ी को अंधकार में खोने से बचाना है तो यह काम कतई मुश्किल नहीं है। जरूरत केवल संवेदनशीलता के साथ समस्या को समझने और उसका हल निकालने की है। बच्चों को केवल देश का भविष्य कहने भर से काम नहीं चलेगा बल्कि उनके लिए ठोस और कारगर नीति तथा कानून बनाकर उन्हें लागू करने की व्यवस्था करनी होगी, जरा सोचिए?


शुक्रवार, 20 मई 2022

धर्म, धार्मिक स्थल और आस्था के बीच संघर्ष बेबुनियाद और काल्पनिक है

 

धर्म वही जो जन्म से मिले या मन को अच्छा लगे और उसे मानने, पूजने से चित्त शांत हो, दूसरों के प्रति कटुता और कड़वाहट न हो। 

यह एक आदर्श स्थिति हो सकती है लेकिन यदि वह लड़ाई झगडे, बहस और विवाद से लेकर जीने मरने का कारण बन जाए और उसके लिए नफरत, मारपीट, हिंसा होने लगे तो समझना चाहिए कि इस तरह का वातावरण तैयार करने में किसी का निजी स्वार्थ है, अपने को बेहतर सिद्ध कर दूसरे को नीचा दिखाकर अपना उल्लू सीधा करने की साजिश है !

धार्मिक आस्था
जब धर्म है तो उसके प्रति आस्था और विश्वास होना भी अनिवार्य है। इसी तरह अपने धर्म के लिए बनी पूजा का विधि विधान भी है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भिन्न भिन्न स्थानों पर यह अलग अलग है क्योंकि इसमें स्थानीय भाषा, परंपरा, रीति रिवाज और तौर तरीके मिल जाते हैं।

यही कारण है कि पूजा के लिए कहीं मानवीय आकृति दिखाई देती है तो कहीं कोई शिलाखंड ही पूजा जाने लगता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ईश्वर का कोई रूप नहीं, वह निराकार है और साधक या पूजा करने वाले के मन में अपने आराध्य की बनी छवि के अनुसार निरंतर बदलता रहता है।

दूसरा कारण है कि जब किसी मनुष्य का आचरण, व्यवहार और उसके कार्य मन में निर्मित ईश्वर के स्वरूप के अनुसार होते दिखाई देते हैं या जिनके बारे में पढ़ा और सुना होता है तो वह हमारे लिए पूज्य हो जाता है।

राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, गुरु नानक से लेकर हजरत मुहम्मद और ईसा मसीह तक और इसी तरह विश्व के अनेक धर्मों के महापुरुष हमारे आराध्य पुरुष और इसी कड़ी में अपने शौर्य, पराक्रम से शत्रु विनाशक स्त्री पात्र हमारे लिए क्रमशः भगवान और देवी का स्वरूप बन जाते हैं।

ये हमारे आदर्श हो जाते हैं और हमें उनके कार्य अलौकिक, आश्चर्यजनक और अद्भुत लगते हैं। हम अपने मन में उनकी ऐसी छवि का निर्माण कर लेते हैं जिसके विरोध में या उसके प्रति किसी प्रकार का अनादर करने या उसकी छवि वाले धूमिल करने के किसी भी प्रयास को अपना स्वयं का अपमान समझकर उस व्यक्ति से बदला लेने से लेकर उसकी हैसियत को नेस्तनाबूद करने तक के बारे में सोचने लगते हैं। मौका मिला नहीं कि बिना सोचे समझे कोई न कोई ऐसा काम कर बैठते हैं जिसका परिणाम अच्छा या बुरा कुछ भी हो सकता है।

शासक की चाल
इतिहास गवाह हैं कि मनुष्य की इसी आस्था और उसके विश्वास को चोट पहुंचाने के उद्देश्य से शासक वर्ग ऐसे काम करता रहा है जिनका असर शताब्दियों तक कायम रहता है। वरना क्या कारण है कि किसी अन्य धर्म के पूजास्थल को तोड़कर या उसके बगल में कोई शासक अपने धर्म के प्रतीक धार्मिक स्थल का निर्माण वहीं करता।

उसके मन में दोनों धर्मों के बीच सौहार्द और भाईचारा कायम रखने की बात रही हो या फिर अपने धर्म को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ हो अथवा उसका कोई ऐसा मंसूबा रहा हो जिसका असर पीढ़ी दर पीढ़ी पड़ने वाला हो।

यह एक वास्तविकता है चाहे किसी भी धर्म के धार्मिक स्थल हों, वे या तो ऐसी जमीन पर बने होंगे जो समतल और कभी किसी भी उपयोग में न लाई गई हो अथवा ऐसे स्थान पर जहां आने जाने की सुविधाएं उपलब्ध हों, नदी आसपास हो और खाने पीने की वस्तुएं आसानी से मिल जाती हों, साथ में वहां विश्राम करने या कुछ समय रहने की व्यवस्था हो। यह वैसा ही है जैसा किसी नए शहर के निर्माण करने से पहले यह सुनिश्चित कर लिया जाता है कि वह स्थल बसाए जाने योग्य है अथवा नहीं । इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि वहां कभी कोई ढांचा रहा होगा या कुछ ऐसा बना होगा जो उस जगह के अतीत की गवाही देता हो जिसे समझकर उस स्थान के इतिहास का बोध होता हो।

विचार करने वाली बात यह है कि क्या प्राचीन काल में घटी किसी घटना की जिम्मेदारी वर्तमान समय में किसी समाज पर डाली जा सकती है ?

हमारे देश में मुगल साम्राज्य का विस्तार हमलावर मानसिकता के साथ हुआ था लेकिन जब मुगलों को लगा होगा कि अब यही हमारा वतन है तो उन्होंने हिंदुओं के साथ मेल मिलाप करने और उनके साथ रोटी बेटी का संबंध स्थापित करने तथा संघर्ष के स्थान पर मिलजुलकर रहने की बात सोची होगी। यही कारण है कि जब अंग्रेज आए तो हिंदू और मुसलमान दोनों ही ने उनका मुकाबला किया।

यह बात सोचने वाली है कि ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत में धार्मिक स्थलों से अधिक यहां ऐसे निर्माण करने को प्राथमिकता दी जो देश पर उनके शासन को अधिक सुविधाजनक बना सकें। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और दूसरे नगरों में अंग्रेजों के बनाए भवनों को देखने से यही लगता है कि उनकी प्रवृत्ति अपने धर्म का विस्तार कम और शासन करने की अधिक थी। इसके विपरीत मुस्लिम और हिंदू शासक अपने धर्म के प्रतीकों और धार्मिक स्थलों के निर्माण को प्राथमिकता देते थे। यही क्रम आज भी जारी है और प्रशासन इसी भावना का लाभ उठाते हुए नागरिकों को धर्म में उलझाकर ऐसा माहौल बनाने में सफल हो जाता है जिससे उनकी प्राथमिकताएं बदल जाएं। इससे जरूरी समस्याओं से उसका ध्यान भटकाया जा सकता है, यह एक बार नहीं अनेक बार प्रमाणित हो चुका है।

क्या कभी ऐसा भी समय आ सकता है जब सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध तथा अन्य धर्मों के प्रतीक धार्मिक स्थलों के निर्माण के बारे में यह जानकारी मिलते ही कि उनका निर्माण किसी अन्य धर्म के प्रतीक स्थल, किसी प्राचीन ढांचे के ऊपर या उसका विध्वंस करने पर हुआ है तो क्या उसकी भी खुदाई कराई जाएगी ? ऐसा समय आया तो यह वास्तव में देश के लिए और अधिक दुर्भाग्यपूर्ण होगा।


शुक्रवार, 13 मई 2022

राजद्रोह और देशद्रोह या अराजकता, स्पष्ट कानून बनने ही चाहिएं


हमारे देश में अक्सर इस तरह के हालात बनने आम हो गए हैं जिनकी व्याख्या ही विवाद पैदा कर देती है।


मिसाल के तौर पर सरकार के किसी काम का विरोध करने को देशद्रोह और देश के खिलाफ किसी साजिश दोनों को एक ही श्रेणी में डाल दिया जाना। विडंबना यह है कि समाज में दुश्मनी फैलाने, दंगा फसाद, आगजनी जैसे कामों को भी इसी खाते में दर्ज कर दिया जाता है।

असल में अंग्रेजी में इस सब के लिए एक ही शब्द है और वह है सेडिशन जिसे लेकर एक कानून उस अंग्रेज मैकाले ने बनाया था जिसने भारत में बाबू बनाने वाले शिक्षा नीति बनाई थी। हमारी राजभाषा हिंदी में इसके लिए दो अलग शब्द राजद्रोह और देशद्रोह हैं लेकिन अंग्रेजी परस्त सरकारों ने पुरानी नीति यानि सेडिशन कानून पर चलने में अपना कल्याण समझा। इसलिए जरूरी हो जाता है कि इसे विस्तार से समझा जाए।


राजद्रोह क्या है
जब राज्य हो या केंद्र की सत्तारूढ़ सरकार हो, उस के किसी काम से जनता में असंतोष हो, उसकी नीति जनविरोधी हो, सामान्य व्यक्ति के लिए जीवन के लिए आवश्यक चीजों का मिलना दूभर हो जाए, पीने का पानी गढ़े खोदकर निकालना पड़े, मीलों दूर जाना हो, साफ सफाई न हो, नालों की गंदगी ने नर्क बना दिया हो, हवा इतनी जहरीली हो कि सांस लेते ही बीमारियां घेर लें, सड़क ऊबडखाबड़ होने से दुर्घटना होना मामूली बात हो और इसी तरह की सभी चीजें जिनसे मानव जीवन प्रभावित होता हो।

कहने का मतलब यह कि एक नागरिक अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाए तो उसे सरकार के खिलाफ बोलने, लिखने, इंसाफ की गुहार लगाने और जरूरी हो जाए तो आंदोलन करने का अधिकार हो और उसे देशद्रोह या अराजक मानकर सजा देने के बजाए उसकी परेशानियों को दूर करने वाले कदम उठाए जाएं।
इस बारे में कोई स्पष्ट नीति या कानून अथवा विधिसम्मत तरीका न होने से सरकार जिसकी लाठी उसकी भैंस पर चलती है जिसे मनमानी कहा जाता है।

उदाहरण के लिए जब सरकार अतिक्रमण करने पर बुलडोजर का इस्तेमाल करती है तो उन लोगों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करती जिनकी शह पर या मिलीभगत से यह स्थिति हुई। राजद्रोह का पहला कानून यह बनना चाहिए कि जिस भी व्यक्ति, चाहे अधिकारी हो या नेता, के कार्यकाल में यह सब हुआ उस पर और अतिक्रमण करने वाले पर एक साथ दंडात्मक कार्रवाई हो।

इसी प्रकार मनुष्य के सामान्य जीवन जीने की राह में कांटे बिछाने वाले व्यक्ति के लिए कानून में स्पष्ट प्रावधान हों और किसी के भी इससे बचने की गुंजाइश न हो।

जिस दल के शासन में रिश्वत दिए बिना काम न होता हो, भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में कोताही बरती जा रही हो, कुव्यवस्था का बोलबाला हो और अस्तव्यस्त्त हालात हों, यह राजद्रोह माना जाना चाहिए और इसके लिए सत्ता में बैठे लोगों और अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया जाए और कानून इस तरह बनाए जाएं कि दिमाग में यह भय समाया रहे कि इस तरह के किसी भी आचरण जिससे अपने पद का गलत इस्तेमाल सिद्ध होता हो, सख़्त सजा का प्रावधान हो, यहां तक कि मृत्यु दण्ड भी दिया जा सकता है।

इसमें मिलावट करने वाले, जमाखोरी और कालाबाजारी करने वाले शामिल हों और उनके किसी भी गैर कानूनी काम या कानून की धाराओं में किसी प्रकार की विसंगति होने से उसका फायदा उठाने और इससे आम नागरिक का जीवन प्रभावित हो तो यह राजद्रोह के दायरे में लाया जाए।

इसी तरह धर्म और जाति, परंपरा और रीति रिवाज तथा संस्कृति और भाषा के आधार पर बंटवारा करने की नीयत से किए गए किसी भी काम को राजद्रोह माना जाए। इसके लिए कड़े फैसले लेने में यदि सरकार संकोच करती है तो उसके विरुद्ध जनमत तैयार करने को राजद्रोह के दायरे से बाहर रखा जाए।

देशद्रोह क्या है
ऐसा कोई भी काम जिससे देश की अखंडता, संप्रभुता और राष्ट्र के गौरव पर चोट लगती हो, वे सब देशद्रोह माना जाए। इसमें भारत से अलग होने की मांग या उसे तोड़ने के प्रयास अथवा विदेशी भूमि से देश को चुनौती देने और भारतीय नागरिकों की एकता को खंडित करने वाले किसी भी काम को इसके दायरे में रखा जाए।

इसी तरह देश का धन, संपत्ति और संसाधन किसी अन्य देश को सौंपने या ले जाने की साजिश हो या कोशिश, यह देशद्रोह है। इसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति और उसकी मदद करने वाले दोनों ही पर देशद्रोह कानून के अंतर्गत कार्यवाही हो। इसमें किसी व्यक्ति का रुतबा, ताकत या उसके छल कपट से अर्जित सम्मान या धन दौलत को जब्त किए जाने का प्रावधान हो।

आधुनिक काल में मीडिया की भूमिका में टेक्नोलॉजी का महत्व बहुत बढ़ रहा है, इसका दुरुपयोग भी राष्ट्रद्रोह है। इस तरह की संभावनाओं को रोकने के लिए कानून में स्पष्ट धाराएं हों और जिस किसी पर भी देशद्रोह का आरोप लगाकर उसके खिलाफ कार्रवाई करने पर रोक लगाने की धारा हो, जब तक कि यह साबित न हो जाए। केवल संदेह और कानून की आड़ लेकर डराने धमकाने से लेकर गिरफ्तारी तक करने को देशद्रोह माना जाए और ऐसा करने वाले पर सख्त कार्रवाई हो।

देशद्रोह यह नहीं है कि किसी धार्मिक स्थल की असलीयत को चुनौती देने वाले के खिलाफ यह कानून लागू करने की छूट मिल जाए। राज सत्ता और धर्म सत्ता दो अलग अलग विचार धाराएं हैं। इन दोनों को मिलाने से ही ज्यादातर दंगे हुए हैं। यह किसी भी भारतीय के अस्तित्व को चुनौती देने के समान हैं और यही विवाद का कारण बनती है। यदि कोई व्यक्ति धर्म और राजनीति की मिलावट कर समाज में द्वेष और शत्रुता का वातावरण बनाता है तो यह देशद्रोह है।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि फिर अराजकता क्या है तो इसकी भी व्याख्या राजद्रोह और देशद्रोह दोनों ही कानूनों में होनी चाहिए।

एक सवाल यह भी है कि क्या चुनाव के समय अपना वोट न डालना भी एक अपराध है ?  जी हां, यह अपराध है क्योंकि इससे एक सही सरकार बनने में रुकावट आती है। इसके साथ यह भी सच है कि प्रत्येक वोटर के लिए वोट डालना कई बार संभव नहीं होता जैसे कि वोटर सूची में नाम दर्ज न होना, वोटर कार्ड की मान्यता वोट डालने के लिए न होना अथवा वोटर के निर्धारित तिथि पर अपने क्षेत्र में न होना।

ऐसी स्थिति में यह उस विभाग, अधिकारी या प्रशासन द्वारा किया गया देशद्रोह है जिसके कारण कोई वोटर अपना वोट डालने से वंचित रह गया। सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह सुनिश्चित करे कोई भी वोटर जहां भी हो, अपनी पहचान के आधार पर कहीं से भी अपना वोट डालने के अधिकार का इस्तेमाल कर सके। अब क्योंकि मतदान करते समय नोटा बटन दबाकर भी वोट दिया जा सकता है तो यह प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है कि वह उसका इस्तेमाल करे और फिर भी न करे तो यह भी देशद्रोह है।

सरकार क्योंकि अब देशद्रोह कानून को लेकर फिर से एक कवायद करने जा रही है तो बेहतर होगा कि इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर लोगों की राय सार्वजनिक तौर पर ली जाए और गंभीर चर्चा चाहे वह सदन में हो या बाहर, की जाय और तब ही कोई निर्णय हो। जिस तरह देश में संविधान समिति बनी थी उसी तरह की व्यवस्था राजद्रोह और देशद्रोह कानून बनाने में की जाए।

किसी एक व्यक्ति या राजनीतिक दल, चाहे वह कितना भी पुराना या विशाल हो, की सोच, विचारधारा या धारणा के आधार पर यह कानून नहीं बनाया जा सकता, यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाए, उतना ही बेहतर होगा।