शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

नई शिक्षा नीति असरदार तो है पर खामियां भी बहुत हैं।


संसार में शायद ही किसी देश की शिक्षा का आधार ऐसा हो जिसमें यह न कहा जाता हो कि विद्यार्थियों को सत्य, शांति, प्रेम, अहिंसा, धर्म, सदाचार और सेवा का पाठ पढ़ाया जाना जरूरी है। हम भी इसी पर जोर देते हैं लेकिन व्यवहार में इनका पालन करना कितना कठिन है, यह भी जानते हैं। नई शिक्षा नीति का सैद्धांतिक आधार भी यही है। अपनी सोच को रचनात्मक बनाने की बात कही गई है और भली भांति सोच विचार किए बिना कुछ भी करने, मानने और र्नि ाय लेने की कोशिश को नकारा गया है। अच्छी बात है!

युवा पीढ़ी का भविष्य

अनुमान है कि अगले दस वर्षों में भारत में युवा पीढ़ी की आबादी विश्व में सबसे अधिक होगी। नई शिक्षा नीति में इस बात को ध्यान में रखकर काफी कुछ कहा गया है। देश के विकास में इनकी भूमिका को लेकर कोई संदेह भी नहीं है।  इस नीति में अनेक स्थानों पर तक्षशिला और नालंदा जैसी प्राचीन भारत की गौरवशाली शिक्षा पद्धति और परंपराओं का जिक्र किया गया है। प्रश्न यह है कि क्या हम अपने अतीत से कभी बाहर निकलेंगे भी या नहीं ?

इंटरनेट, आधुनिक संचार साधन और टेक्नोलॉजी ही देश, समाज और दुनिया का वर्तमान है। उस जमाने में जो कुछ था, वह हमारी धरोहर तो हो सकता है लेकिन मार्गदर्शक नहीं, इसलिए वर्तमान की बात करना ही बेहतर होगा।


यह कल्पना कि भारत शिक्षा के मामले में विश्व गुरु होगा और विदेशों से यहां विद्यार्थी पढ़ने आयेंगे और संसार भर के प्रसिद्ध शिक्षा संस्थान यहां अपनी शाखाएं खोलेंगे, हकीकत से दूर है और अगर ऐसा हो भी गया तो इनमें पढ़ने वाले केवल वे होंगे जो साधन संपन्न, अमीर और समृद्ध हैं जिनके लिए आज भी कहीं भी जाकर पढ़ना बहुत आसान है। भारतीय शिक्षा संस्थानों को हमारी जरूरत के अनुसार, हमारे संसाधनों से निर्मित और हमारे ही विद्वानों द्वारा
 
स्थापित किया जाना होगा तब ही हम ऐसे विद्यार्थियों की श्रृंखला बना सकते हैं जो देश को विकास के उच्चतम शिखर पर ले जा सकें।


विदेशों से टेक्नोलॉजी तो ले सकते हैं लेकिन उनकी काम करने की प्र ााली नहीं, उसे तो भारतीय ही होना होगा। नई शिक्षा नीति का आधार विदेशी शिक्षा जगत से उठाई गई बहुत सी धार ााएं हैं जिनका भारतीयता से कोई लेना देना नहीं है।


साठ पन्नों की इस शिक्षा नीति में परीक्षा प्र ााली में आमूल चूल परिवर्तन स्वागत योग्य है लेकिन यह समझ से परे है कि जब दुनिया भर में बोर्ड की परीक्षाओं को हटाया जा रहा है तो हम ही क्यों उससे चिपके हुए रहना चाहते हैं। पूरे साल विद्यार्थी ने जो पढ़ा और उसके आधार पर उसका जो आकलन हुआ वही उसके अगली कक्षा में जाने का आधार होना चाहिए। यह एक अच्छा कदम है कि अब अगर कोई विद्यार्थी किसी कार ा बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ देता है तो वह न केवल दोबारा उससे आगे की पढ़ाई जारी रख सकता है बल्कि उसने जितने वर्ष की पढ़ाई की है उसके प्रमा ा पत्र भी मिलेंगे जो नौकरी और रोजगार दिलाने में मददगार हो सकते हैं।

शिक्षा और रोजगार


अच्छी शिक्षा वही जो नौकरी या व्यवसाय करने के काबिल बना सके। नई नीति में स्कूली पढ़ाई के दौरान ही कोई कौशल सीखने और उसके लिए ट्रेनिंग करने या अप्रेंटिस बनाने की बात कहीं गई है लेकिन क्या स्कूल के बच्चों को कोई उद्योग या कारखाना अपने किसी फायदे के बिना यह अवसर देगा, इसमें संदेह है।

इसके साथ ही पहले इसका तो सर्वे करा लीजिए कि स्कूल में पढ़ने वाले क्या सीखना चाहते हैं और पढ़ाई लिखाई के बाद क्या करना चाहते हैं और यह कि क्या वे जो पढ़ रहे हैं, वह उनके किसी काम आयेगा भी या नहीं। ध्यान रहे कि हमारे ग्रामी ा और शहरी इलाकों की जरूरतें बिल्कुल अलग अलग हैं, सब के लिए एक जैसी पढ़ाई कारगर नहीं हो सकती।


यह सही है कि अब परीक्षाओं में प्राप्त अंकों से अधिक महत्व इस बात का होगा कि विद्यार्थी  में कुछ नया करने, आधुनिक सोच रखने और किसी भी काम को करने से पहले  आलोचनात्मक टिप्प ाी करने की काबिलियत है या नहीं। यह भी देखा जाएगा कि उसने   केवल रटकर तो अंक प्राप्त नहीं किए। यह जो आज सौ में से सौ अंक होने को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए जरूरी समझा जाता है उस पर ज्यादा ध्यान न देकर उसकी बहुमुखी प्रतिभा को जांचने परखने की व्यवस्था होगी।


सिलेबस और शिक्षक

 
नई शिक्षा नीति के अनुसार अब तक जो किताबें पढ़ाई जाती हैं, उनकी जगह नए सिलेबस, पुस्तकें तैयार होंगी और उन्हें पढ़ाने के तरीके इजाद किए जाएंगे। यह जिक्र कहीं नहीं है कि यह सब कब तक होगा जबकि अगले एकेडमिक वर्ष से नई शिक्षा नीति के तहत पढ़ाई शुरू हो जाने की बात कही है। कहीं ऐसा न हो कि कक्षाएं शुरू हो जाएं और पाठ्यक्रम तथा पठन पाठन सामग्री का पता ही न हो।


इस नीति में इस बात को अच्छा खासा नजरअंदाज किया गया है कि अब ऑनलाइन पढ़ाई और इंटरनेट का युग है। इस बात की पूरी संभावना है कि जब तक सामग्री तैयार हो और वह आए, उससे पहले ही पुरानी पड़ जाए। इस नीति को बनाते समय वर्तमान महामारी नहीं थी जिसने अब बहुत कुछ बदल और दिखा तथा सिखा दिया है।
विकसित देशों में पढ़ाई का यह तरीका बहुत पहले से था। इस मामले में यह बीमारी हमारे लिए वरदान कही जा सकती है कि अब हम भी शिक्षा के क्षेत्र में मॉडर्न हो गए हैं। इसलिए जरूरी यह है कि जो भी पाठ्यक्रम बने, वह केवल किताबी न होकर व्यावहारिक हो और वह इतना लचीला हो कि उसमें बदलाव करना आसान हो क्योंकि जब हर रोज नई टेकनीक सामने आ रही हैं तो पुरानी लकीर पीटने रहने से विद्यार्थियों में निराशा और डिप्रेशन तक होने से इंकार नहीं किया जा सकता।


राष्ट्रीय शिक्षा आयोग



यह पहली बार होने जा रहा है कि अब भारतीय शिक्षा की कमान उनके हाथों में होगी जो शिक्षा से जुड़े हैं और शिक्षा आयोग बनने से यह उम्मीद पैदा हुई है कि वह दिन भी आ सकता है जब किसी आई ए एस की जगह कोई शिक्षाविद् सभी तरह के र्नि ाय ले सकेगा।

यह एक सच्चाई है कि अब तक चाहे शिक्षा मंत्री हो या शिक्षा सचिव अथवा सचिवालय , उनका ताल्लुक राजनीति से लेकर ब्यूरोक्रेसी तक से कितना भी बढ़िया हो लेकिन शिक्षा, पढ़ाई लिखाई और इसके तौर तरीकों से कतई नहीं होता और न वे यह जानने की कोशिश करते हैं कि हमारे देश के गांव देहात और दूरदराज के इलाकों में रहने वालों को कौन सी शिक्षा चाहिए।

उन्हें यह सोचने का   वक़्त ही नहीं कि ग्रामी ा क्षेत्रों में स्कूल केवल तब ही क्यों भरे रहते हैं जब दोपहर का भोजन और स्कॉलरशिप के पैसे दिए जाते हैं। इसी तरह वे नहीं जानते कि अक्सर स्कूलों में ताला क्यों लगा रहता है और विद्यार्थी पढ़ने क्यों नहीं आते तथा उनके घरवाले भी उन पर स्कूल जाने के लिए जोर क्यों नहीं देते ?

 
नई शिक्षा नीति से शायद यह संभव हो सके कि ग्रामवासी और विशेषकर किसान और महिलाएं अपने बच्चों को पढ़ने भेजने में संकोच न करें क्योंकि उन्हें वही पढ़ाया जाएगा जो जरूरी है जैसे कि उन्नत खेती के तरीके, ग्रामी ा कौशल आधारित उद्योग लगाने की पढ़ाई , जरूरी पूंजी जुटाने के नियम, बैंकों और सहकारी संस्थाओं की कार्यप्र ााली तथा यह कि किस तरह जल, जंगल और जमीन का संरक्ष ा किया जा सकता है।


अभी तक उन्हें भी वही पढ़ाया जाता रहा है जो शहरों और महानगरों में पढ़ने वालों के हिसाब से होता है और इसीलिए उनका अपने गांव, अपनी धरती के प्रति लगाव कम होता जाता है और वे शहर भागते हैं। नई शिक्षा नीति में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को शिक्षक की भी भूमिका अदा करने की बात कही गई है लेकिन क्या किसी ने सोचा है कि उनकी दशा कितनी दयनीय है। उनके वेतन और नौकरी की शर्तों में बदलाव कर उन्हें अन्य शिक्षकों के अनुसार ही, यदि वे योग्य है, वेतन और अन्य भत्ते दिए जाएं और उनका एक कैडर बना दिया जाए जिसमें उन्नति करने के प्रावधान हों।



यह एक अच्छी सोच है कि अब पांच से दस किलोमीटर के क्षेत्र में ही हॉयर सेकेंडरी और प्राइमरी तथा माध्यमिक स्कूल स्थापित किए जाएंगे जिससे आने जाने की दिक्कत न हो, विशेषकर लड़कियों के लिए जो अक्सर दूरी के कार ा ही पढ़ाई छोड़ देती हैं।


शिक्षा के बारे में इस पुरानी सोच से बाहर निकलने की भी जरूरत है कि शिक्षा संस्थान चाहे किसी भी स्तर पर हों, उनके लिए धर्मार्थ यानी न लाभ न हानि के सिद्धांत पर ही चलना होगा। अब समय आ गया है कि शिक्षा का व्यवसायीकर ा हो और शिक्षा को समर्पित औद्योगिक इकाइयों को प्रतियोगिता में बने रहने के लिए इन्वेस्टमेंट प्लान के तहत चलाया जाए।  इसे शिक्षा का व्यापार न कहकर शिक्षा का आधुनिकीकर ा माना जाए और उसी के अनुरूप नियम बनें ताकि अभी जो इस्पेक्टर राज चलता है, वह समाप्त हो सके।


शिक्षकों के वेतन, रिहायशी सुविधाओं और समाज में उनके लिए सम्मान की कल्पना इस शिक्षा नीति में की गई है। इसी के साथ शिक्षा के नाम पर इस समय जो हर कोई इसमेें होने वाले मुनाफे को देखकर अपनी दुकान चलाने लगता है, उस पर भी अंकुश लग सकेगा   क्योंकि अब जो नियम बनाए जा रहे हैं उनमें इनका खोलना घाटे का सौदा ही होगा।

उम्मीद है कि नई शिक्षा नीति और शिक्षा मंत्रालय भारतीय विद्यार्थियों के सपने साकार करने में सक्षम होंगे।


(भारत)
 

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

उपभोक्ता के लिए नया कानून लागू होने के अर्थ










पिछले वर्ष संसद द्वारा पारित नए उपभोक्ता संरक्षण कानून को इस महीने की बीस तारीख से लागू कर दिया गया है। जरूरी है कि इसके बारे में सामान्य उपभोक्ता को जानकारी हो ताकि उसके साथ धोखाधड़ी या फरेब या गुमराह किए जाने पर वह सही कदम उठा सके और अपने अधिकारों की रक्षा करने के लिए उचित कार्रवाई करने की दिशा में आगे बढ़ सके।



कानून का विस्तार

नए कानून में बाजार में बिकने के लिए आई सभी वस्तुओं और सेवाओं को शामिल किया गया है जिसमें अब टेलीकॉम, हाउसिंग कंस्ट्रक्शन, ऑनलाइन और टेली शॉपिंग के जरिए खरीदी जाने वाली वस्तुएं और सेवाएं भी शामिल कर ली गई हैं।


अनुचित व्यापार के दायरे में अब बिल या रसीद न देना, तीस दिन में वापिस की गई वस्तु को स्वीकार न करना, और व्यक्तिगत जानकारी जो खरीददारी करते हुए दी गई उसे उजागर करना भी शामिल कर लिया गया है।
आम तौर से कोई खरीद करने पर दुकानदार नाम, पता, फोन नंबर, ईमेल जैसी जानकारी लेता है जिसमें कुछ गलत नहीं लगता लेकिन अगर उसकी यह जानकारी दुकानदार किसी और को देता है तो अब उसके खिलाफ कार्यवाही की जा सकती है।



उत्पाद की जिम्मेदारी कोई भी विक्रेता नहीं लेता था, वह उसके खराब निकलने पर निर्माता कंपनी के पास जाने को कहता था और उपभोक्ता उसके चक्कर काटता रहता था। वस्तु के वापिस लेने की कोई व्यवस्था नहीं थी। अब निर्माता, विक्रेता या सर्विस देने वाले पर इस बात की कानूनन जिम्मेदारी है कि वह जो बेच रहा है, वह ठीक न निकलने पर उसकी  शिकायत का निपटारा करने के लिए कदम उठाए।



इसका अर्थ यह हुआ कि अब कोई दुकानदार यह कहकर नहीं बच सकता कि उसे जैसा माल निर्माता कंपनी ने दिया, वह वैसा ही दे रहा है। मतलब यह कि अब विक्रेता को निर्माता से बेचने के लिए उत्पाद लेते समय यह निश्चित करना होगा कि वह वस्तु सभी मानदंडों पर खरी है। अगर कोई गड़बड़ है और वस्तु की जो क्वालिटी  बताई गई है, वह नहीं पाई जाती तो इसकी जिम्मेदारी दुकानदार की भी उतनी ही है जितनी उसे बनाने वाली निर्माता कंपनी की।



इसी के साथ अब यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि खरीदी गई वस्तु से चोट लगती है या शारीरिक नुकसान होता है तो पहले  केवल वस्तु की कीमत का ही मुआवजा मिल सकता था, अब निर्माता को उस वस्तु से हुए सभी तरह के जान माल के नुकसान का भी भुगतान करना होगा। पहले इसके लिए सिविल कोर्ट जाना पड़ता था, अब उपाभोता अदालत में ही इसका फैसला किया जा सकेगा।


कहीं से भी शिकायत करें


अब कहीं से भी उपभोक्ता शिकायत कर सकता है, पहले विक्रेता या सेवा देने वाले के इलाके में शिकायत करने जाना होता था। अब देश में कहीं से भी खरीदी वस्तु के खराब निकलने पर निर्माता, विक्रेता के खिलाफ किसी भी जगह से शिकायत  की जा सकती है। इससे बड़ी राहत मिलेगी। पहले होता यह था कि मान लीजिए आप दिल्ली किसी काम से आए और कुछ खरीददारी कर वापिस अपने शहर चले गए। सामान खराब था तो शिकायत करने दिल्ली आना पड़ता था। अब जहां रहते हैं या काम करते हैं, वहीं पर उपभोक्ता अदालत में शिकायत कर सकते हैं। इसके साथ ही अब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से भी अपनी शिकायत की सुनवाई की जा सकती है, उसके लिए कहीं जाने की जरूरत न रह जाने से समय और पैसे दोनों की बचत होगी।



अभी तक कोई अलग से रेगुलेटर अथॉरिटी नहीं थी। अब सेंट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन अथॉरिटी का गठन होने से उपभोक्ताओं को बहुत बड़ी राहत मिलेगी। अक्सर दुकानदार और निर्माता अपनी मिलीभगत से उपभोक्ताओं के साथ धोखाधड़ी करने से चूकते नहीं थे। इसका कारण उन पर कोई वैधानिक नियंत्रण का न होना था। अब यह अथॉरिटी बनने से वे अपनी मनमानी नहीं कर पाएंगे। इसका असर वस्तुओं की जरूरत से ज्यादा रखी और वसूली जा रही कीमतों पर भी पड़ेगा। इसके गठन से उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा के लिए बनी संस्थाओं को बेहतर ढंग से काम करने का अधिकार मिलेगा और वे ऐसे मामलों में ठोस कार्रवाई करने के लिए मुकदमा कर सकती हैं जिनका व्यापक असर होता है।

अब एक करोड़ तक के लिए जिला, दस करोड़ तक राज्य और उससे अधिक के लिए राष्ट्रीय आयोग में शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।


पहले यह सीमा क्रमशः बीस लाख, एक करोड़ और एक करोड़ से अधिक की थी।
अब निचली अदालत के फैसले पर उससे ऊपर की अदालत में अपील की जा सकेगी। राष्ट्रीय आयोग तक में मामला नहीं सुलझता है तो सुप्रीम कोर्ट में जाया जा सकता है।


ब्रांड एंबेसडर सावधान


गुमराह करने वाले विज्ञापनों के लिए दो साल की कैद और दस लाख तक का जुर्माना हो सकता है। अगर दोबारा ऐसा किया तो पांच साल की कैद और पचास लाख का जुर्माना हो सकता है।
अगर कोई ऐसे विज्ञापनों को एंडोर्स करता है तो उसके खिलाफ भी कार्यवाही की जा सकती है। अब ब्रांड एंबेसडर बनने से पहले किसी भी सेलेब्रिटी को उस वस्तु या सेवा के सही और बताई गई क्वालिटी के मुताबिक होने के बारे में पूरी जांच कर लेनी होगी वरना उन पर भी कार्यवाही हो सकती है।



इस नए कानून से उपभोक्ताओं को मुकदमा लड़ने में सहूलियत तो दी गई है लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस कानून को लागू करने के लिए क्या इंतजाम किए गए हैं। हमारी जो जिला उपभोक्ता अदालत हैं, उनकी हालत देखकर नहीं लगता कि इस नए कानून के प्रावधानों को पूरी तरह लागू किए जाने के लिए वे सक्षम हैं।
इस कानून से सबसे बड़ी राहत उन उपभोक्ताओं को मिलेगी जो घर बैठकर खरीददारी करते हैं। पहले उनके अधिकारों की रक्षा की ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने पर  कोई व्यवस्था नहीं थी।  अब जैसे आमने सामने बिक्री होती है, उसी तरह इसे भी माना जाएगा और कानून के दायरे में रखा गया है।


अमेजन, फ्लिप्कार्ट, स्नैपडील, मेक माई ट्रिप, स्विगी जैसी कंपनियों से सामान खरीदने पर उन्हें ये वस्तुएं बेचने वाली या सर्विस देने वाली कंपनियों की भी जानकारी देनी होगी। इसके साथ ही रिफंड, एक्सचेंज, वारंटी जैसी शर्तों का खुलासा करना होगा। अब सामान की डिलीवरी करने के बाद उन्हें माल के सही क्वालिटी का होने और जो ऑर्डर दिया गया था उसी के अनुसार सामान देने की जिम्मेदारी भी लेनी होगी।


इसे इस तरह से समझें पहले नकली सामान मिलने पर यह ई कॉमर्स कंपनियां अपना पल्ला यह कहकर झाड़ लेती थीं कि वे इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। अब नकली सामान बेचने वाली ऐसी  ई कॉमर्स कंपनियों पर कार्यवाही की जा सकेगी।


किसी भी ई कॉमर्स कंपनी को 48 घंटों में किसी भी शिकायत के प्राप्त होने की रसीद देनी होगी और उसके एक महीने के भीतर उस शिकायत का निपटारा करना होगा।
पहले मेडिएशन यानी मध्यस्थता का कोई कानूनी प्रावधान नहीं था, अब अदालत इसके जरिए सेटलमेंट करा सकती है।
उपभोक्ता के अधिकारों में बढ़ौतरी तो हुई है लेकिन इस प्रश्न का जवाब तो समय के साथ ही मिलेगा कि ये उसे राहत देने में कितने सक्षम हैं। 


Email:pooranchandsarin@gmail.com

(भारत)


शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

क्या पढ़ें और क्या नहीं, इसका निर्णय स्वयं करना होगा








दसवीं और बारहवीं के नतीजे निकलने के बाद सबसे पहला प्रश्न पास होने वाले छात्र छात्राओं के लिए यह होता है कि आगे अगर पढ़ना है तो कौन से विषय लिए जाएं और आगे पढ़ाई जारी नहीं रखनी है तो क्या किया जाए। आज उनके पास विकल्प सीमित नहीं हैं क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में दुनिया भर में असीमित प्रयोग हुए हैं और लगातार हो रहे हैं ताकि तरक्की की दौड़ में किसी से पीछे न रह जाएं।

देखा जाए तो पिछले एक से दो दशकों के दौरान हमारे देश में भी स्कूली शिक्षा के बाद की पढ़ाई को लेकर अनेक नीतियां बनाई गईं, परिवर्तन भी हुए और युवाओं में बेरोजगारी बढ़ती देखकर स्किल इंडिया जैसे प्रयास भी शुरू हुए ताकि किसी न किसी कौशल या कारीगरी का विकास कर आजीविका का साधन जुटा लिया जाए।


उच्च शिक्षा का पैमाना

अनेक विकसित देशों ने स्कूल के बाद की पढ़ाई को लेकर किसी कॉलेज या शिक्षा संस्थान में दाखिले की इच्छा रखने वालों की योग्यता का आकलन करने के लिए उनके लिए विशेष परीक्षा आयोजित करने की पहल की ताकि पता चल सके कि वह विद्यार्थी  अपने हिसाब से चुने गए विषय को पढ़ने की काबिलियत भी रखता है या नहीं। जो इस परीक्षा में पास हो जाते उन्हें इन उच्च तकनीकी और व्यावसायिक संस्थानों में प्रवेश मिल जाता और जो नहीं पास होते उनके लिए रोजगार दे सकने वाले दूसरे विषय लेने के विकल्प खुले रहते ।


हमारे यहां इस तरह की कोई व्यवस्था न के बराबर होने के कारण माता पिता या अभिभावक जो विषय आपस में मिलकर तय कर लेते हैं, उसमें दाखिला लेे लेते हैं । अब क्योंकि बिना किसी कसौटी के आगे की पढ़ाई करने लगे और उसके पूरा करने के बाद रोजगार या नौकरी करने की बारी आई तो पता चलता है कि उन्होंने जो पढ़ा उसके मुताबिक कुछ है ही नहीं और फिर या तो जो काम मिल गया, कर लिया, वरना बेरोजगारी का आंकड़ा बढ़ाने में योगदान कर दिया।


तरक्की का रास्ता


औद्योगिक और आर्थिक रूप से समृद्ध देशों के कुछेक उदाहरण देखें तो बात आसानी से समझी जा सकती है। हमारे सबसे निकट प्रतिद्वंदी चीन में बारह से चैदह साल की उम्र में विद्यार्थियों को कोई न कोई वोकेशनल कोर्स करना होता है।


जापान ने इस हकीकत को समझकर कि उसके यहां प्राकृतिक स्रोतों का भंडार बहुत कम है उसने स्कूल से ही पढ़ाई का पैमाना उद्योग को बना कर वही पढ़ने की व्यवस्था की जिससे औद्योगिक क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा सके।


इसी तरह जर्मनी ने तय किया कि पढ़ाई के दौरान विद्यार्थियों का अस्सी प्रतिशत समय स्कूल में होगा तो बीस प्रतिशत किसी कारखाने या उद्योग में अपने हुनर को तलाशने और सुधारने में बिताना होगा। पढ़ाई के बाद यह प्रतिशत उलट जाएगा मतलब अस्सी प्रतिशत कारखाने में और बीस प्रतिशत समय जो काम कर रहे हैं उसमें और अधिक पारंगत होने के लिए उसकी पढ़ाई में बिताना।


इस व्यवस्था के जो लाभ हुए उनमें सब से पहले तो यह कि वे जो पढ़ रहे हैं, उसके बारे में स्वयं ही अपनी आलोचना करने की आदत पड़ती गई और उससे किसी भी समस्या का हल निकालना आसान हो गया। इसका एक फायदा यह भी हुआ कि उनके अंदर किसी भी चीज को जानने और फिर उसे करने की भावना आती गई और इस तरह उनके अंदर कल्पना शक्ति बढ़ती गई और वे किसी भी तरह के नए नए प्रयोग करने में सक्षम होते गए। इससे  अनुसंधान के जरिए  आविष्कारों का जन्म होता गया और दुनिया भर में इनके उद्योगों का डंका बजना शुरू हो गया।


हमारी वास्तविकता

अगर हम अपने देश की बात करें तो आज भी हमारे स्कूलों में ज्यादातर विषय वही पुराने, घिसे पिटे होते हैं जिनका नौकरी या रोजगार से कोई संबंध न होकर बस अंक प्राप्त करना होता है। यही कारण है कि शत प्रतिशत या उसके आसपास अंक प्राप्त करने वालों की संख्या हर साल बढ़ती जाती है और उसके बल पर नामी गिरामी कॉलेजों में प्रवेश भी मिल जाता है लेकिन अगर इस बात पर गौर करें कि उनमें से कितने पढ़ाई पूरी करने के बाद अपनी इच्छा के अनुसार नौकरी या व्यवसाय करने के काबिल हुए तो निराशा ही हाथ लगेगी। पढ़े लिखे ज्यादातर बेरोजगारों की यही कहानी है।


हमारे देश में हालांकि अब ऐसे संस्थान काफी संख्या में खुल गए हैं जहां औद्योगिक कौशल का विकास करने के कोर्स उपलब्ध हैं लेकिन उनके बारे  में अधिक प्रचार न होने के कारण जानकारी नहीं होती या फिर वे इतने आकर्षक और लुभावने नहीं होते कि उनमें दाखिला लेने के लिए विद्यार्थियों में होड़ लग जाए।
व्यवसाय की दृष्टि से उनका मूल्य बहुत अधिक है और वहां से पढ़कर निकले विद्यार्थियों को नौकरी या रोजगार के लिए भटकना नहीं पड़ता बल्कि पढ़ाई के दौरान ही औद्योगिक और व्यावसायिक इकाइयां उन्हें अपने यहां  नौकरी की पेशकश करने लगते हैं।



इसके विपरीत अधिकतर संख्या में विद्यार्थी ऐसे कोर्स करने लगते हैं जिनका आधार नौकरी, व्यवसाय या कौशल विकसित करना न होकर केवल डिग्री लेना होता है।


इतिहास की एक घटना का जिक्र करते हैं। जब अंग्रेज भारत आए तो उन्होंने देखा कि यहां के लोगों का अपने हुनर, कारीगरी और कौशल में कोई मुकाबला ही नहीं है तो उन्होंने व्यापार करने की नीयत से ईस्ट इंडिया कम्पनी स्थापित की। उसके बाद जो हुआ वो सब जानते हैं। उन्होंने हमारा शोषण किया और गुलाम बना लिया जिससे बाहर निकलने में दो सौ साल लग गए।


दुर्भाग्य से अंग्रेज ने जो शिक्षा व्यवस्था हमें गुलाम बनाए रखने के लिए जारी की, वह अब भी कायम है जिसका नतीजा यह है कि युवाओं को सफेदपोश कहलाना अर्थात बाबूगिरी करना ज्यादा पसंद आता है, बजाय नीली वर्दी पहनकर औद्योगिक विकास का अंग बनना।


अपना आकलन स्वयं करें 

किसी भी कॉलेज या शिक्षा संस्थान में प्रवेश लेने से पहले विद्यार्थियों और उनके माता पिता के लिए यह सोचना अनिवार्य है कि वे इस बात की तुलना करें कि कौन से विषय की पढ़ाई उन्हें रोजगार दिला सकती है, अपना व्यवसाय खड़ा करने के काबिल बना सकती है या फिर केवल डिग्रीधारी बनाकर बेरोजगारों या अपने अनुकूल काम न मिल सकने वालों की कतार में खड़ा कर सकती है।


एक बात और है और वह यह कि स्कूल की परीक्षाओं में अपनी मातृ भाषा में उत्तर देने की व्यवस्था से अधिक अंक प्राप्त करना आसान हो जाता है लेकिन उसके बाद कॉलेज या संस्थानों में पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी होता है जिसमें ये विद्यार्थी पिछड़ जाते हैं और अधिकतर या तो कम अंकों से पास होते हैं या पढ़ाई ही छोड़ देते हैं क्योंकि अंग्रेजी में दिए लेक्चर उनकी समझ में नहीं आते। इस वास्तविकता से आंख मूंदकर कॉलेज में दाखिला लेने का परिणाम निराशाजनक ही होता है।


इस तरह की पढ़ाई से तो बेहतर यही रहता है कि अपनी रुचि के अनुसार किसी औद्योगिक या व्यावसायिक संस्थान में अप्रेंटिस ही बन जाया जाए जिससे रोजगार की गारंटी तो हो जाए।

इसी के साथ सत्य यह भी है कि प्रोफेशनल शिक्षा के नाम पर पैसा बनाने की अनेक दुकानें भी कुकुरमुत्तों की तरह हर छोटे बड़े शहर या कसबे में खुल गईं हैं जिन पर कोई सरकारी या प्रशासनिक नियंत्रण नहीं होने से वे आर्थिक शोषण तो करती ही हैं, साथ में विद्यार्थियों का दोबारा लौटकर न आने वाला समय भी बर्बाद कर देती हैं।



कहीं भी दाखिला लेने से पहले जरूरी हो जाता है कि सबसे पहले यह तय करना कि जिन्दगी से हम क्या चाहते हैं और जब तय कर लें तो आगे का रास्ता साफ नजर आने लगता है।


अब वह जमाना नहीं कि किसी की नकल करते हुए या अपनी हैसियत और बुद्धि का गलत अंदाजा लगाकर काल्पनिक संसार में छलांग लगा ली जाय जिसका परिणाम हमेशा दुखदाई ही होता है। वक्त की नब्ज टटोलने यानि टाइम मैनेजमेंट की कला विद्यार्थी जीवन में ही पड़ जाए तो बेहतर रहता है।

वर्तमान हालात में विदेशों में जाकर उच्च तथा व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने के अवसर कुछ अरसे के लिए लगभग न के बराबर होने से जो कुछ अपने देश में है उसी का उपयोगिता की दृष्टि से विचार कर कोई निर्णय लेना ही श्रेयस्कर होगा।


Email: pooranchandsarin@gmail.com

(भारत)

शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

नेताओं और पुलिस द्वारा बुना गया अपराध का ताना बाना







सामान्य व्यक्ति जो ईमानदारी, मेहनत और अपनी चादर के अनुसार अपने पांव फैलाने के लिए जाना जाता है, उसे यह जानकर, सुनकर या देखकर बहुत ही अजीब लगना स्वाभाविक है कि एक अपराधी द्वारा पुलिस के लोगों की हत्या कर छिपते छिपाते अनेक राज्यों की कानून व्यवस्था को धता बताते हुए मौका ए वारदात से सैंकड़ों किलोमीटर दूर एक मंदिर में दर्शन के बाद बाहर निकलकर घोषणा करना कि मैं ही वोह हूं जिसकी तलाश है, आओ मुझे पकड़ लो।


उसके बाद नाटकीय घटनाक्रम से उसकी गिरफ्तारी होती है। जिस राज्य में उसने अपराध किया, वहां की पुलिस को सौंप दिया जाता है और इससे पहले कि लोग यह कयास लगाएं कि अब इसका मुकदमा बरसों चलेगा, उसका एनकाउंटर कर  दिया जाता है ताकि सनद तो रहे लेकिन वे सब सबूत मिट जाएं जिनकी बिना पर बहुत से सफेदपोश खादी और पुलिसिया खाकी पहने लोगों की सच्चाई उजागर हो सकती है।


यह घटना भी इसी तरह की पहले भी अनेक घटनाओं की भांति कुछ समय के शोर शराबे के बाद भुला दी जाएगी और अनेक प्रश्न साधारण व्यक्ति के मन में छोड़ जाएगी जिनका संबंध कानून का राज और व्यवस्था की लाज बचाने से है।


इसलिए आम आदमी के लिए यह समझना जरूरी हो जाता है कि वास्तविकता क्या है और कानून की खामी और व्यवस्था की मजबूरी को दूर करने में उसका क्या योगदान हो सकता है?


सिस्टम को बदलने की जरूरत


सबसे पहले यह समझ लीजिए कि हमारा जो कानून है वह अपराधियों द्वारा व्यक्तिगत तौर पर किए गए अपराधों से निबटने और सजा देने के लिए बना था अर्थात घरेलू किस्म के अपराध, आपसी रंजिश, मारपीट, पुश्तैनी जायदाद या ऐसे ही मुकदमे जो एक दो साल से लेकर पीढ़ियों तक चलते रहते हैं। इनके कारण समाज पर कोई गंभीर संकट नहीं होता और न ही कोई राजनीतिक या सामाजिक उथल पुथल होने का अंदेशा रहता है। यदि जरूरत पड़ी  और कोई अलग तरह की वारदात हुई या मुकदमा आया तो उसमें थोड़ी बहुत रद्दोबदल की जाती रही ताकि काम चलता रहे।

कह सकते हैं कि ये सब स्थानीय किस्म के अपराधों से निबटने के लिए काफी था।  जब ऐसे अपराध होने लगे जिनकी व्यापकता राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की थी तो इन्हीं कानूनों में लीपापोती कर काम चलाने की कोशिश की गई जोकि नाकाफी था।


सख्त नए कानून की जरूरत


जरूरत यह थी कि स्थानीय जैसे कानूनों और उनकी सामान्य सी व्यवस्था के समानांतर ऐसे  कानून बनाए जाते जो इक्का दुक्का अपराधियों के लिए न होकर छोटे बड़े गिरोह, माफिया या क्राइम सिंडिकेट से निबटने में सक्षम होते।  इस तरह के संगठित अपराधियों के किए सभी जुर्मों के लिए अलग अदालत यानी ज्यूडिशियरी गठित होती और अभी जो इस तरह के अपराधों से निबटने के लिए अलग संगठन प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर पर काम कर रहे हैं उन सब को एकसूत्र में बांधकर इस केंद्रीय संगठन को सभी तरह के कानूनी और प्रशासनिक अधिकार दिए जाते ।


अगर अभी भी इस बारे में गंभीरता से विचार हो तो इस नयी व्यवस्था से अपराधियों के नेता बनकर पुलिस और ब्यूरोक्रेसी को अपने इशारों पर नचाने से मुक्ति मिल सकती है और यह भी संभव है कि अभी जो हम विधान सभा से लेकर संसद तक में अपराधियों की घुसपैठ देखते हैं और जो घोषित अपराधी हैं, वे विधायक, सांसद और मंत्री बन जाते हैं, उस परंपरा को नेस्तनाबूद किया जा सकता है ।


किसी भी अपराधी का मुकदमे के दौरान या सजा होने पर जेल से ही चुनाव लडने पर संवैधानिक रोक लग जाने से न केवल उनके नेता बनने पर अंकुश लग जाएगा बल्कि वे सजा होने पर जेल से ही अपनी आपराधिक गतिविधियों को चलाने में असमर्थ हो जाएंगे।


वर्तमान व्यवस्था में साधारण अपराध हो या जघन्य, सामान्य कैदी हो या राजनीतिक बंदी, सब  को एक साथ रखा जाता है और उनके आपस में मिलते रहने से माफिया या सिंडिकेट का जेल से ही विस्तार होता रहता है।


सिस्टम की उदासीनता

सभी अपराधियों को एक ही लकड़ी से हांकने की परिपाटी के कारण भ्रष्ट नेताओं, रिश्वतखोर पुलिस वालों, बेईमान अधिकारियों से लेकर तस्करी, कालाबाजारी, नशीले पदार्थों की बिक्री करने वाले व्यापारियों का एक मजबूत संगठन बन गया है और जब भी इनमें से किसी एक पर कोई कार्यवाही होती है तो ये सब मिलकर न्याय और व्ययस्था पर ऐसा प्रहार करते हैं कि उसे चुप रहने में ही अपनी भलाई दिखाई देती है।


जब प्रशासन चुप हो जाए या हकीकत से मुंह मोड़ ले तो चाहे अपराधी कैसा भी हो, उसने आर्थिक अपराध किया हो या हत्या, अपहरण, फिरौती से लेकर बम विस्फोट करने में लिप्त पाया जाए, उसकी हिम्मत बढ़ जाती है, कानून का डर नहीं रहता, किसी भी पद पर बैठे व्यक्ति को वह अपना मोहरा बनाने से नहीं चूकता और  बिना किसी रोक टोक के दूसरे देशों में पहुंचकर वहां से अपनी गतिविधियों को चलाता रहता है।


अगर सरकार और प्रशासन उदासीन न हो तो अपराधी की हिम्मत शुरू में ही टूटने में देर नहीं लगती, उसकी दबंगई साथ नहीं देती और उसे आत्मसमर्पण कर अपने को कानून के हवाले करना ही पड़ता है।


यह कानून व्यवस्था की कमजोरी और राजनीतिक सत्ताधारियों में इच्छाशक्ति का अभाव ही तो है या फिर उनके निजी स्वार्थ हैं जो जघन्य और सामूहिक तौर पर किए गए अपराधों के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठा पाते जिससे ऐसे अपराधियों के मन में डर हो। अभी यह जो अपराधी सोचता है कि वह जो कर रहा है, वह नेता बनने के बाद जायज हो जाएगा और यह कि राजनीति में आने से प्रशासन हो या पुलिस, उसकी चाकरी करने को तैयार रहेंगे, इस पर लगाम लगाना अनिवार्य है।


पुलिस हो या प्रशासनिक अधिकारी, वे कुछेक अपवादों को छोड़कर भ्रष्ट नहीं होते लेकिन जब निरंकुश अपराधी नेता बन जाते हैं तो वे उनके लिए ऐसा माहौल बना देते हैं कि उन्हें अपने सिद्धांतों का त्याग करने को विवश होना या फिर मृत्यु को गले लगाना ही पड़ता है।

सामान्य नागरिक इसमें इतना योगदान कर सकता है कि वह संचार साधनों, सोशल मीडिया के जरिए इस तरह का वातावरण बना सकता है जिससे वह अपनी बात सरकार और नीति बनाने वाले अधिकारियों तक पहुंचा सके ताकि उसे अपराधियों और उनकी कारगुजारियों से सुरक्षा मिल सके।


भारत

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शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

कोरोना और चीन से लड़ाई के लिए आत्मनिर्भरता ही एकमात्र उपाय है








अब यह स्पष्ट नजर आ रहा है कि संसार के सभी देशों को कोरोना से बचकर रहने के लिए अपने देशवासियों को तैयार करते रहना होगा। चाहे इसकी कोई दवा निकले या न निकले पर यह रोग दूसरे अनेक भयंकर रोगों की तरह हमेशा के लिए दुनिया के गले पड़ गया है।

भारत पर दोहरा दवाब है, एक तरफ चीन से ही आई महामारी से बचना है और दूसरी तरफ चीन से कभी भी किसी भी तरह के युद्ध के लिए तैयार रहना है।



युवा शक्ति का विस्तार

यह जानकर चैन की सांस ली जा सकती है कि भारत की आधी से भी अधिक आबादी पच्चीस वर्ष की आयु से ऊपर की है और कुछ ही राज्यों जैसे बिहार और उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा थोड़ा कम है। कुछ राज्यों में तो पच्चीस से कम उम्र की जनसंख्या उनकी चौथाई आबादी से भी नीचे है।

हालांकि इस बारे में बहस हो सकती है कि यह आधी युवा आबादी शिक्षा, ज्ञान और वैज्ञानिक सोच रखने के मामले में किस स्तर की है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यदि सम्पूर्ण आबादी की शक्ति को आंका जाए तो देश की विशालकाय छवि उभरती है, मतलब यह कि अगर सरकार चाहे तो अपनी नीतियों से इन्हें मजबूत बना सकती है और न चाहे तो हर बात में अड़ंगा डालते रहने की आदत से उसे बेड़ियों में जकड़ भी सकती है।



कोरोना के कारण लॉकडाउन होने से और वह भी महीनों के लिए घर में ही रहने का एक सुखद परिणाम यह निकला है कि इस दौरान युवा पीढ़ी जो हमेशा वक्त की कमी का रोना रोती रहती थी, उसे अब घर के बुजुर्गों के साथ रहने के कारण आपस में जो संवाद न होने से कम्युनिकेशन गैप आ गया था, उसकी भरपूर भरपाई हो गई है।


जहां युवावर्ग ने अधेड़ और वृद्ध पीढ़ी की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक जरूरतों को समझा है वहां अब युवा अपने मन की बात भी बुजुर्गों के साथ बांटने में हिचकिचा नहीं रहे। कुछ ऐसा माहौल बन गया था कि पहले ये दोनों वर्ग कभी पास आते ही नहीं थे और कभी सामना हो गया तो एक दूसरे के साथ अजनबियों जैसा व्यवहार करते थे। इन दिनों उम्रदराज पीढ़ी को लगता है कि वे दिन लौट आए हैं जब भरापूरा परिवार एक साथ बैठा करता था, सब एक दूसरे की सुनते थे, शिकायत भी करते थे और मिलकर समस्यायों का समाधान भी निकालते थे।


कदाचित यही कारण है कि चाहे कोरोना हो या चीन दोनों का मुकाबला करने की एकजुट शक्ति का संकल्प साकार हो रहा है।




चीन की चाल क्या है?


चीन की विस्तारवादी और दूसरों को अशक्त बनाने की नीति को समझने के लिए हमें अपनी गुलामी के दौर की घटनाओं को सामने रखकर सोचना होगा। ब्रिटिश हुकूमत ने देशवासियों के मनोबल को तोड़ने और अंग्रेज के आगे आत्मसमर्पण करने के लिए भारत से कच्चा माल  लगभग मुफ्त ब्रिटेन ले जाकर वहां उससे विभिन्न उत्पाद बनाकर भारत में महंगे दाम पर बेचने का रास्ता अपनाया। हमारी खेतीबाड़ी पर कब्जा करने के लिए ऐसे नियम बनाए कि किसान भरपूर फसल होने के बावजूद भूखा रहे, उद्योग धंधों के कारीगरों को बेकार बनाकर अपने दफ्तरों में चपरासी बना दिया और अंग्रेजों के भारी वेतन से लेकर उनकी अय्याशी तथा ब्रिटेन लौटने पर उनकी पेंशन तक को भारत के संसाधनों और जनता से वसूला जाने लगा।


भारत में अंग्रेजों ने जो भी विकास कार्य किए या कानून लागू किए वे उन्होंने अपनी सहूलियत, विलासिता और भारतीयों को अछूत मानते हुए ही किए थे। हमारी दासता का यही सबसे बड़ा कारण था, परिणास्वरूप हम असहाय, कमजोर और आश्रित होते गए और अंग्रेजी हुकूमत काबिज होती गई।


अब चीन ने भी यही नीति बनाई। उसने भारत से ज्यादातर वह सामान खरीदा जो विभिन्न वस्तुओं के बनाने में कच्चे माल की तरह इस्तेमाल होता है और जो सस्ता भी मिल जाता है। चीन ने इससे अपने यहां सस्ते और घटिया क्वालिटी के अधिकतर वह सामान भारत को बेचना शुरू कर दिए जिससे हमारा घरेलू उद्योग धंदा ठप्प पड़ जाए। चीन ने हमारी रसोई, ड्रॉइंग रूम, बेडरूम से लेकर रोजाना काम आने वाली चीजों को इतने सस्ते दाम पर हमें सुलभ करा दिया कि हम स्वदेशी उत्पाद बनाने से लेकर उनका उपभोग करना तक भूलने लगे।


इससे लघु उद्योग बंद होते गए और उद्योगपति अब ट्रेडर बन गए, मतलब उत्पादन करना छोड़कर चीन से सभी तरह का सामान लाने लग गए और बाजार में हर जगह चीनी वस्तुओं का अंबार लग गया।


चीन ने इलेक्ट्रिक, इलेक्ट्रॉनिक, मोबाईल और कंस्ट्रक्शन तथा सभी तरह की सवारियों के आधे से भी अधिक बाजार पर कब्जा कर लिया। इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में भी उसने हमें बहुत पीछे छोड़ दिया।


इस तरह हम फिजिकल रूप से न सही, प्रैक्टिकल रूप से चीन और उसकी बनाई वस्तुओं पर निर्भर होते चले गए।  यह सब कुछ इतने व्यवस्थित ढंग से चीन ने किया जैसे कि मानो उसने हमें अफीम चटा दी हो।


चीन में एक कहावत है कि वह आर्थिक हो या सैन्य, किसी भी तरह का युद्ध  करने के लिए कैसा भी दुस्साहस कर सकता है और जीतने के लिए किसी भी तरह का जोखिम उठा सकता है।

चीन ने बहुत सोच समझ कर ही आक्रमण करने की कोशिश के लिए लद्दाख को चुना। वह अपने सीमावर्ती क्षेत्रों में बहुत पहले से सैन्य अभ्यास और युद्ध सामग्री को जुटाने में लगा हुआ था। हमारी सीमा के भीतर पिछले कुछ वर्षों में की गई तैयारी को छोड़कर कभी वहां का विकास करने और सामान्य जीवन जीने की सुविधाओं को जुटाने का गंभीर प्रयास नहीं किया गया।


दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों की अपनी कठिनाइयां होती है और बर्फीले तूफान से घिरे प्रदेश की मुसीबतों को झेलना आसान नहीं होता। हमारे सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय दिया है और जीतने के संकल्प से ही वहां मुकाबला कर रहे हैं। उनके सम्मान, इच्छाशक्ति और शौर्य तथा वीरता के सामने शत्रु का परास्त होना निश्चित है।


अगर हमें चीन से बाजी मारनी है तो उसके नहले पर दहला चलना होगा। इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के तहत चीनी ऐप्स बंद करने से शुरुआत हो चुकी है, रूस तथा अन्य मित्र देशों से अस्त्र शस्त्र जुटाना शुरू हो चुका है, अब आर्थिक और व्यापारिक क्षेत्र में उसे मात देने के लिए स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देने वाली नीतियों का इंतजार है।



इतिहास से सीखना होगा


अगर विश्व इतिहास पर नजर डालें तो अमेरिका चार जुलाई 1776 को आजाद हुआ था और चीन एक अक्टूबर 1949 को तथा भारत पंद्रह अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ था। अमेरिका अनेक शताब्दियों के बाद विश्व शक्ति बन पाया जबकि चीन सत्तर वर्षों में ही उससे टक्कर लेने लगा। भारत भी इसमें पीछे नहीं रहा और हम भी अब विश्व शक्ति हैं, इसका प्रमाण यह कि अब कोई भी देश हमें हल्के में लेने की गलती नहीं कर सकता और चीन तो बिल्कुल नहीं क्योंकि उसके आर्थिक, औद्योगिक और व्यापारिक तंत्र को ध्वस्त करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।



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