शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2022

विश्व इंटरनेट दिवस


प्रति वर्ष 29 अक्टूबर को विश्व इंटरनेट दिवस मनाने की परंपरा सन 1969 में पड़ी जब दो व्यक्तियों ने पहली बार एक कंप्यूटर से दूसरे कंप्यूटर तक दो शब्द एल और ओ भेजने में सफलता पाई। ये थे चार्ली क्लाइन जो अपने सहयोगी बिल दुवेल को लॉगिन शब्द भेजना चाहते थे लेकिन केवल दो अक्षर ही भेज पाए और सिस्टम क्रैश हो गया। इसी के साथ दुनिया को एक ऐसी खोज मिल गई जो आज जीवन की एक महत्वपूर्ण गतिविधि या कहें कि आपस में संवाद करने की जबरदस्त ताकत बन गई है। यह अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग के चंद्रमा पर कदम रखने के दो माह बाद हुआ था। उसके बाद सन 2005 से इंटरनेट का आकार बढ़ते बढ़ते पूरी दुनिया पर इस तरह छा गया कि इसने काम करने के तरीके, सोचने की दिशा और अपनी बात पलक झपकते ही दूसरों तक पहुंचाने की क्रिया को एक नया रूप दे दिया।

देखा जाए तो इंटरनेट क्या है, बस डाकखाने का परिवर्तित रूप है। जैसे पहले हम पत्र लिखकर डाक के डिब्बे में डालकर उसके अपने गंतव्य तक पहुंच जाने की व्यवस्था करते थे, वही इंटरनेट करता है। जिस तरह डाकघर में पत्रों को छांट कर अलग अलग खानों में रखकर और फिर वहां से जहां पहुंचाना है, सुनिश्चित किया जाता था, उसी तरह इंटरनेट से हमारा संदेश एक से दूसरे कंप्यूटर तक पहुंचता है। अंतर केवल इतना है कि जिस काम में पहले दिन से लेकर सप्ताह तक लग जाते थे, अब वह पलक झपकते ही हो जाता है।

आज पोस्ट ऑफिस की जगह सर्च इंजन हैं जो हुक्म मेरे आका की तर्ज़ पर अलादीन के चिराग की तरह तुरंत आपकी मनचाही सूचना हाज़िर कर देते हैं। मिसाल के तौर पर किसी शब्द का अर्थ जानना हो तो डिक्शनरी की ज़रूरत नहीं, बस टाईप कीजिए और जितने भी संभव अर्थ हैं, वे सामने स्क्रीन पर दिखाई दे जायेंगे। उनमें जो आपके मतलब का है, वह उठा लीजिए और अपना काम कीजिए।

इंटरनेट का काम है कि आपने जो जानकारी मांगी है, वह सबसे पहले, सबसे तेज़ और अनेक विकल्पों के साथ आप तक पहुंचाए।

इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग

इसके बाद मार्क जुकरबर्ग ने फेसबुक पकड़ा दी और उसके साथ व्हाट्सअप, ट्विटर, इंस्टाग्राम से लेकर कितने ही ऐसे प्लेटफॉर्म आते गए कि इंसान उन्हीं में इतना व्यस्त हो गया या कहें कि उलझ गया कि लगा कि कुछ और करने के लिए वक्त निकलना मुश्किल है।

अमेजन ने तो जैसे चमत्कार ही कर दिया। कहीं जाने की ज़रूरत नहीं, घर पर ही जो चाहो मिल जाएगा।

इंटरनेट केवल संदेश यानि मेल भेजने का साधन ही नहीं रहा, उसने शॉपिंग, बैंकिंग और लेनदेन को इतना सुगम और हरेक की पहुंच में ला दिया कि उसके लिए न पहले से कुछ इंतजाम करना है और न कहीं जाना है, बस कंप्यूटर हो या मोबाईल, उस पर उंगलियां चलानी हैं, जो चाहते हैं,वह हो सकता है। न लाईन में लगकर धक्कामुक्की करना, न कर्मचारी से बहस में उलझना और न ही किसी पर निर्भर रहकर इंतजार करना।

दुरुपयोग की असीमित संभावना

यहां तक तो ठीक लेकिन जब भारत जैसे देश में जहां सरकारी तंत्र हो या निजी व्यवस्था, समय पर काम न करने, चीज़ों को लटकाने और अपने किसी  स्वार्थ के लिए किसी काम को करने में टालमटोल करने की आदत वर्षों पुरानी हो, उसे बदलने में इंटरनेट कोई मदद नहीं कर सकता।

इसके अलावा जिस प्रकार किसी अविष्कार या अनुसंधान अथवा खोज के गुणों के बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है और उनसे लाभ उठाया जा सकता है लेकिन यदि कोई उसका गलत इस्तेमाल करना चाहे तो उसकी एक सीमित हद तक रोकथाम तो की जा सकती है, परंतु उसे फुलप्रूफ करना असम्भव है। ऐसा ही इंटरनेट के साथ है। इसका दुरुपयोग करना भी उतना ही आसान है, जितना इसका सदुपयोग।

आज इंटरनेट के ज़रिए साईबर क्राईम हो रहे हैं। लोगों को ठगने की इसमें बहुत आसानी है क्योंकि ठग तक पहुंचना मुश्किल है। इसके साथ ही ब्लैकमेल करने की कला जिसे आती है, उसके लिए यह एक अचूक साधन हैं। गलत संदेश देकर, बहका फुसलाकर अपने मनमुताबिक शिकार के अज्ञान या जानकारी के अभाव का पूरा फायदा उठाते हुए लूटपाट करना बहुत आसान है। अपराधी को पकड़ना मुश्किल होने से केवल हाथ मलने के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं है।

इंटरनेट व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से इस तरह वंचित करता है कि पता ही नही चलता कि कब वह इसका आदी हो गया है। दिन रात कंप्यूटर, मोबाईल या किसी अन्य उपकरण के ज़रिए वह इसमें इतना लिप्त रह सकता है कि उसे समय का भी अंदाज़ नहीं रहता।

इंटरनेट के ज़रिए लोगों की भावनाओं को भड़काना बहुत आसान है, इससे दंगे कराए जा सकते हैं, आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सकता है और समाज में उथलपुथल से लेकर युद्ध जैसे हालात पैदा किए जा सकते हैं। मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता और पोर्नोग्राफी के ज़रिए बहुत कुछ ऐसा दिखाया जा सकता है जो सामान्य रूप से निंदा की परिधि में आता है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि इंटरनेट कामकाजी दुनिया के लिए एक वरदान है, महामारी के समय यही सबसे बड़ा साथी रहा है, घर बैठकर पढ़ाई करने से लेकर अपनी नौकरी या व्यवसाय करने की सुविधा और अपार संभावनाएं इसकी बदौलत प्राप्त हुई हैं।

इसी के साथ कुछ देशों में अब इंटरनेट के बिना न रहने की आदत अर्थात इसकी लत छुड़ाने के लिए अनेक कार्यक्रम या कहें कि ईलाज के तरीक़े अपनाने की पहल होने लगी है। 

इंटरनेट आपके अकेलेपन का साथी भी है और बाकी दुनिया से अलग रखने का साधन भी लेकिन यह एक तरह के मानसिक तनाव को भी जन्म दे रहा है। एक अनुमान के अनुसार हमारे देश की आधी आबादी इंटरनेट का इस्तेमाल करती है। उसकी निर्भरता अब ऑनलाइन रहने तक सिमट गई है। इससे उसके व्यक्तिगत जीवन से लेकर स्वास्थ्य तक पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। यह स्थिति चिंताजनक है। इसका हल भी स्वयं व्यक्ति के पास है, उसे ही सोचना है कि वह इसकी आदत पड़ने से पहले किस तरह ऐसा व्यवहार करे जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।



शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2022

ब्रिटेन की ताकत शिक्षा व्यवस्था और रोजगार तथा कम आबादी है

 

यह सही है कि हम अंग्रेजों की हुकूमत सह रहे थे और कितने ही संकल्पों और बलिदानों के बाद स्वतंत्र हुए लेकिन उतना ही बड़ा सच यह है कि आज भी ब्रिटेन एक आम भारतीय को यहां आकर रहने, नागरिकता प्राप्त करने के लिए लालायित करता रहता है।

यात्रा वृत्तांत

इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड के संयुक्त रूप ग्रेट ब्रिटेन की यात्रा एक सैलानी के रूप में करने पर अनेक बातें मन में उमड़ती घुमड़ती रहीं। इनमें सबसे अधिक यह था कि आखिर कुछ तो होगा जो अंग्रेज हम पर सदियों तक शासन कर पाए !

इसका जवाब यह हो सकता है कि इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि यहां शताब्दियों से शिक्षा की ऐसी व्यवस्था स्थापित होती रही थी जो विद्यार्थी हो या जिज्ञासु, उसे किसी भी विषय के मूल तत्वों को समझने और फिर जो उलझन है, समस्या है, उसका हल निकालने का सामथ्र्य प्रदान करती है।

पूरे देश में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का जाल फैला हुआ है और दुनिया का कोई भी विषय हो, यहां उसे पढ़ने का प्रबंध है और यही नहीं उसमें पारंगत होना लक्ष्य है। उद्देश्य यह नहीं कि इसका गुणगान किया जाए लेकिन वास्तविकता आज भी यही है और तब भी थी जब हमारे देश के गुलामी की जंजीरों को काटना सीखने से पहले भारतीय यहां पढ़ने आते थे। इनमें बापू गांधी, नेहरू, बोस भी थे तो वर्तमान दौर के अमृत्य सेन भी है।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय को देखने से लगता है कि जैसे एक पूरा शहर ही शिक्षा का केंद्र हो। यहां के भवन, क्लासरूम, पुस्तकालय इतने भव्य और विशाल हैं कि भारत में उनकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। विद्यार्थियों की लगन भी कमाल की है। सदियों से यहां शोध के लिए संसार के सभी देशों से लोग पढ़ने आते रहे हैं। हमारी गाईड ने एक किस्सा बताया कि जब बिजली नहीं थी तो दोपहर तीन बजे अंधेरा होने से पहले लाइब्रेरी बंद हो जाती थी। एक बार कुछ विद्यार्थी यहां पढ़ते पढ़ते सो गए और दरवाजे बंद होने का उन्हें पता नहीं चला। रात भर में उनके शरीर ठंड से अकड़ गए और सुबह मृत मिले। तब न बिजली थी, न हीटर और न आज की तरह एयरकंडीशन।

जहां तक यहां की शिक्षा प्रणाली है, उसके बारे में इतना कहना काफी है कि यह विद्यार्थियों को ब्रिटेन के तौर तरीके सिखाती है और जो कुछ पढ़ा है उसका पूरा लाभ केवल इसी देश में मिल सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि जो पढ़ने आयेगा, वह शिक्षित होकर यहीं का होकर रहने और अंग्रेजों की प्रशासन व्यवस्था का एक अंग बन जाने को प्राथमिकता देते हुए यहीं बस जायेगा। उसकी पढ़ाई लिखाई की पूछ या उपयोगिता उसके अपने देश में बहुत कम होने से वह लौटने के बारे में नहीं सोचता। यहीं नौकरी, फ़िर शादी भी किसी अपने देश की यहां पढ़ने वाली या स्थानीय लड़की से कर गृहस्थी बसा लेगा। अपने मातापिता को, अगर यह चाहे और वे भी आना चाहें, तो बुला लेगा वरना ख़ुद मुख्तार तो वह हो ही जाता है।

कोई भी भारतीय अपने बच्चों को यहां पढ़ने भेजने से पहले यह सोच कर रखे कि काबिल बनने के बाद वे भारत लौटकर आने वाले नहीं हैं। इसका कारण यह कि उसे पढ़ाई के दौरान पार्ट टाइम जॉब करने की सुविधा होती है, स्कॉलरशिप हो तो और भी बेहतर और सबसे बड़ी बात यह कि नौकरी के अवसर बहुत मिलने लगते हैं। अपने देश में न इतनी जल्दी नौकरी मिलेगी और न ही यहां जितना वेतन और सुविधाएं।

यहां भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश से आए लोग बहत अधिक हैं। जहां हमारे देश से पढ़ने के लिए आते हैं, वहां दूसरे देशों से कोई भी काम, जैसे टैक्सी ड्राइवर, खानसामा, वेटर या जो भी मिल जाए, करने वाले आते हैं।


ब्रेन ड्रेन रुक सकता है

यह सोचना काफ़ी हद तक सही है कि यदि यहां पढ़ने के बाद भारतवासी लौट आएं और नौकरी, व्यवसाय करें तो देश की अर्थव्यवस्था में कितना फर्क पड़ेगा। इसके विपरीत भारत सरकार ने अभी हाल ही में समझौता किया है जिसमें भारत से आने वालों को यहां की नागरिकता प्राप्त करने को बहुत आसान बना दिया गया है। होना तो यह चाहिए कि शिक्षा पूरी होने के बाद उसका अपने देश लौटना अनिवार्य हो ताकि भारत का जो उस पर धन लगा है, उसकी भरपाई हो सके।

यहां शिक्षित व्यक्ति को नौकरी या व्यवसाय करने के लिए सरकार को विशेष योजना बनानी होगी ताकि ब्रिटेन में नौकरी करने का उसके लिए विशेष आकर्षण न हो। यहां गोवा, गुजरात, पंजाब से आए लोग बहुत बड़ी संख्या में हैं। लंदन, ब्रिस्टल, मैनचेस्टर, कार्डिफ, एडिनबरा, ग्लासगो जैसे शहरों में दूसरे देशों से आए लोग सभी जगहों पर मिल जायेंगे। भारतीय खाने के शौकीन अंग्रेज़ इंडियन रेस्टोरेंट में अक्सर देखने को मिल जायेंगे। हाथ से खाने की आदत नहीं तो रोटी का टुकड़ा दाल या सब्जी में डुबोकर खाते देखना मनोरंजक है, ठीक उसी तरह जैसे कांटे छुरी से खाने का अभ्यास।

लंदन में मैडम टुसाद के संग्रहालय में विश्व के नामचीन लोगों के मोम से बने पुतले आपनी तरह की कारीगरी की बढ़िया मिसाल है। धोखा होता है कि कोई जीवित व्यक्ति तो नहीं खड़ा, उसका चेहरा जैसे कि बस अभी बात करने लगेगा। पुतले बनाने की विधि भी बताई जाती है।

यहां का एक दूसरा आकर्षण हैरी पॉटर म्यूज़ियम है जो बच्चों से लेकर बड़ों तक को आकर्षित करता है। सिरीज़ बनाने में कितनी मेहनत और कितनी तैयारी करनी पड़ती है, उसका सूक्ष्म विवरण यहां देखने और समझने को मिलता है।

लंदन से कुछ दूरी पर बाथ स्पा शहर है। यहां रोमन स्नानागार अपने प्राचीन रूप में देखने को मिल जायेंगे। उस समय की संस्कृति की झलक दिखाई देती है।

ब्रिटेन में जहां एक ओर विशाल और भव्य गिरिजाघर या कैथेड्रल हैं, जिन्हें देखकर इसकी प्राचीन संस्कृति और सभ्यता का पता चलता है, दूसरी ओर प्राकृतिक सौंदर्य के बेशुमार स्थल हैं। रोची नदी का विशाल पाट अपनी गंगा या नर्मदा जैसा लगता है। निर्मल जल, कभी शांत तो कभी अपने उग्र रूप में बहता हुआ, नाव या क्रूज की सैर को रोमांचक बना देता है।

स्कॉटलैंड को व्हिस्की का देश भी कहा जाता है। सत्रहवीं सदी की डिस्टलरीज आज भी शराब बना रहीं हैं जो पूरी दुनिया में अपने शौकीनों की प्यास बुझा रहीं हैं। मदिरा पीने का अपना अलग अंदाज़ है, उसके स्वाद, महक और रंग रूप का विवरण मोहक है। जौ, पानी और यीस्ट का इस्तेमाल कर बनाई जा रही मदिरा को बनते हुए देखना अपने आप में एक अनुभव है।

यहां के हरे भरे वन, बर्फ से ढकी चोटियां और नंगे पर्वत तथा मैदानी इलाकों का सौंदर्य देखते ही बनता है। दूर तक फैली हरियाली, हल्की बारिश और तेज हवा के झोंके ठंडक का एहसास कराते हैं। सारांश यह कि ग्रेट ब्रिटेन की सैर रोमांचक, शिक्षाप्रद और शानदार रही, यह तो कहा ही जा सकता है।

सच यह भी है कि अंग्रेज़ हमारे बौद्धिक, अद्योगिक और व्यापारिक संसाधनों का तब भी शोषण करते थे, जब यहां शासन करते थे। आज भी हमारे युवाओं को अपनी समृद्धि के लिए इस्तेमाल करते हैं। पहले यहां से कृषि और उद्योग के लिए रॉ मेटीरियल मुफ्त ले जाते थे और उनसे बने उत्पाद हमें ही बेचते थे, आज उच्च शिक्षा के नाम पर हमारे कुशाग्र और परिश्रमी युवाओं को लुभाते हैं। आश्चर्य होगा यदि जैसे तब विदेशी वस्तुओं के खिलाफ़ आंदोलन हुआ था, आज भी ब्रिटेन में शिक्षा प्राप्त कर वहीं न बस जाने को लेकर कोई मुहिम शुरू हो।


शनिवार, 8 अक्तूबर 2022

लंदन की सैर का मतलब भारत से तुलना करना भी है

 

प्रत्येक भारतवासी के मन में कभी तो यह बात आती ही होगी कि आखिर अंग्रेज़ी सल्तनत में ऐसा क्या था कि उनका सूरज कभी डूबता नहीं था ? काफी समय से यह बात  मन में थी कि अगर मौका मिले तो एक बार इंग्लैंड ज़रूर जाया जाए और अपने पाठकों को इस मुल्क की सैर कराई जाए । मन में इच्छा थी और वह पूरी भी हो गई और सत्ताईस सितंबर को मुंबई से लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर कदम रख दिए।

सुबह साढ़े सात बजे प्लेन ने लैंड किया और औपचारिकताएं निभाते हुए बाहर आने में दो घंटे लग गए। यह हवाई अड्डा बहुत विशाल है लेकिन भारत के दिल्ली और मुंबई के हमारे भी इसके सामने कुछ कम नहीं लगे। टैक्सी से केंसिंगटन में होटल तक की दूरी तय करने के दौरान इस आधुनिक शहर की झलक मिलने लगी। साफ़ सुथरी सड़कें, यातायात एकदम व्यवस्थित और उससे भी अधिक अनुशासित ढंग से अपने आप चल रहा था। अपनी लेन में चलना है, क्रॉसिंग पर सिग्नल का पालन ज़रूरी है और अगर जल्दबाजी या लापरवाही हुई तो कैमरे की निगाहें आप पर हैं। इसीलिए दुर्घटनाएं न के बराबर होती हैं।

हमारे यहां अभी केवल कुछ ही शहरों में और वह भी खास जगहों पर चालान कटने का डर होने से ट्रैफिक ठीकठाक तरीके से चलता है। वरना तो ज्यादातर जगहों पर नियम पालन करना अपनी हेठी समझी जाती है । कानून के डर के बिना जब तक ट्रैफिक नियम मानने की आदत नहीं बनती और सब कुछ चलता है जैसी मानसिकता रहती है तो सुधार होना ज़रा कठिन है।


यातायात

लंदन में आने जाने के लिए अंडरग्राउंड ट्यूब रेल है जो यहां की लाइफलाइन है, कहीं से कहीं भी जाना बहुत आसान है और वह भी निश्चित समय में। कई स्टेशनों पर नीचे से ऊपर पंद्रह बीस मंजिल तक रेल चलती है । इन स्टेशनों पर लिफ्ट की व्यवस्था है और पैदल इतना ऊपर चढ़ना उतरना परेशानी का कारण बन सकता है, इसकी चेतावनी दी जाती है।

दुनिया की पहली अंडरग्राउंड रेल की शुरुआत लंदन में सन 1863 में सड़कों पर भीड़भाड़ कम करने के लिए हुई थी । तब स्टीम इंजन का जमाना था। उसके बाद इलेक्ट्रिक पावर और लिफ्ट्स का इस्तेमाल शुरू हुआ और 1908 से 1930 तक इसका काफी विस्तार हो गया। इस रेल को चलते हुए 160 वर्ष हो जायेंगे। अब इसकी 11 लाईन हैं और 402 किलोमीटर तक 270 स्टेशनों के बीच फैलाव है। प्रतिदिन पचास लाख यात्री इनमें सफर करते हैं।


दर्शनीय स्थल

लंदन में वेस्टमिंस्टर एक तरह से शहर का केंद्र है। यहां विशाल और अद्भुत कारीगरी, अनोखी वास्तु कला तथा प्राचीन इतिहास की गवाह एक शानदार इमारत के रूप में बना चर्च वेस्टमिंस्टर एबे है। यह सन 1066 से राजशाही और राजतिलक की परंपरा निभा रहा है। अब तक यहां 17 मोनार्क अंतिम विश्राम कर चुके हैं। इनके अतिरिक्त बहुत से गणमान्य और प्रभावशाली और बड़ी हैसियत रखने वाले भी यहां मरने के बाद शान से अपने अपने रुतबे के मुताबिक आराम फरमा रहे हैं । यह पहले काफी छोटी जगह थी । हेनरी तृतीय ने सन 1245 में वर्तमान निर्माण शुरू कराया जो सोलहवीं शताब्दी तक चला। यहां शाही घराने के विवाह भी संपन्न हुए हैं । यहां का प्रशासन किसी आर्चबिशप या बिशप के पास नहीं बल्कि यह सीधे राजसिंहासन के अधिकार क्षेत्र में है।

इस इलाके में यहां की संसद है। इस के साथ थेम्स नदी की सैर भी क्रूज से की जा सकती है। क्रूज से यात्रा के दौरान लंदन ब्रिज, लंदन आई और आसपास की सामान्य ऊंचाई से लेकर बहुमंजिली शानदार इमारतों को देखते हुए वापिस आया जा सकता है।

यहां पार्लियामेंट स्क्वायर में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मूर्ति स्थापित है। यहीं पर सबसे आगे विंस्टन चर्चिल का विशालकाय बुत भी है जिसे देखकर याद हो आया कि यही वह शख्स था जिसने भारत विभाजन की रूपरेखा तैयार की थी और लॉर्ड माउंटबेटन को अपनी योजना को अमल में लाने के लिए भेजा था। पीछे खड़े गांधी जी भी उसके इरादों को भांप नहीं पाए। वह तो नेहरू और सबसे अधिक सरदार पटेल थे जिन्होंने चर्चिल के मंसूबों को कामयाब नही होने दिया।  एक बार फिर वह घटनाक्रम घूमने लगा जिसमें स्वतंत्र कहलाकर भी अंग्रेजों की गुलामी करने की गंदी राजनीतिक चाल चली गई थी जो सफल न हो सकी, बेशक उसके लिए बहुत कुछ कुर्बान करना पड़ा।

हमारे नेताओं की समझदारी से देश एक कुचक्र से तो बच गया लेकिन दो टुकड़ों में बांट दिया गया। यह भी चर्चिल की ही सनक थी कि दो अलग देश होकर भी एक दूसरे के विरोधी बने रहें।

सहूलियत वाला शहर

लंदन में भी कभी वायु और जल प्रदूषण हुआ करता था। अब यह बीते दिनों की बात हो गई है। यहां की हवा साफ और सांस लेने पर ताज़गी का अहसास कराती है। थोड़े थोड़े अंतराल पर बहुत से पार्क हैं, उनमें घने पेड़ हैं, रंग बिरंगे फूलों की छटा देखते ही बनती है। नल से साफ पीने का पानी मिलता है।

बकिंघम पैलेस के आसपास और सामने के पार्क में रानी एलिजाबेथ को श्रद्धांजलि देते हुए लोग एक निश्चित स्थान पर फूलों के गुलदस्ते रख जाते हैं। यहां सामने जेम्स पार्क में एक नहर है जिसमें जलपक्षी तैरते रहते हैं। बहुत ही सुन्दर और मनोहारी दृश्य है। पैदल सैर करने वाले लोग बढ़ते जा रहे हैं, हल्की सी ठंडक अनुभव होने से मौसम के बदलाव का संकेत मिल रहा है।

यह शहर प्राचीन वैभव, संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक होने के साथ आधुनिक शिक्षा, विज्ञान और साहित्य का भी केंद्र है। वास्तुकला की दृष्टि से यहां के घर अपनी विशिष्ट पुरातन शैली के हैं। उन्हीं के साथ जब बाजार का रुख करते हैं तो वर्तमान शैली के भवन दिखाई देते हैं। प्राचीन और नवीन का संगम अपनी अनोखी अदा से इठलाता नज़र आता है जैसे दोनों एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हों।

असल में यही अंग्रेजी शासन का मुख्य आधार रहा है। वे जहां भी गए और शासन की बागडोर अपने हाथ में ली तो उन्होंने उन सब चीजों के साथ तालमेल बिठाने को प्राथमिकता दी जिससे उनके लिए लोगों में विश्वास पैदा हो और वे उन्हें आक्रांता समझने के बजाय मित्र समझें।

भारत पर उनके शासन की जड़ें जमाए रखने में अंग्रेजों की यही तरकीब कामयाब हुई और बहुत से भारतीयों  ने उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में भलाई समझी। अंग्रेज़ तो मुट्ठी भर थे लेकिन साथ हमारे ही लोगों ने दिया।  इसका लाभ हुकूमत ने यहां लोगों को आपस में फूट डालकर राज करने की नीति अपनाकर लिया।

लंदन एक खूबसूरत शहर है, इसमें दो राय नहीं लेकिन इसके साथ साथ यह अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां के लोग दूसरों के साथ व्यवहार करते समय एक हो जाते हैं और अपने मतभेद भुला देते हैं। यहीं से इनकी असली मंशा शुरू होती है।  यह एक ओर अपने व्यवहार से अपना बनाए रखते हैं और दूसरी ओर अपनी होशियारी से उनका सब कुछ कब्जाने में सफल हो जाते हैं। इसका प्रमाण यह है कि लंदन में जितने भी म्यूजियम, संग्रहालय और गैलरी हैं उनमें दुनिया भर

से लाई गई नायाब चीजें हैं जिनमें भारत का कोहिनूर हीरा भी है।

कहना होगा कि लंदन समावेशी शहर है। यहां कई जगह पर स्थानीय आबादी से ज्यादा दूसरे देशों से पढ़ने, नौकरी, व्यवसाय या व्यापार करने के लिए आए लोग बस गए हैं। अचानक कोई अपनी भाषा में बात करने लगे तो सुखद आश्चर्य होता है। उसके बाद तो बातों बातों में भारत के किसी भी प्रदेश से यहां आकर बसे हों, अपनेपन के साथ बातचीत का सिलसिला शुरू हो जाता है जो एक यादगार क्षण रहता है।