शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

पराक्रमी योद्धा सुभाष चन्द्र बोस और स्वतंत्रता संग्राम


भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में जहां समस्त देशवासियों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार योगदान किया, वहां इसका नेतृत्व करने में लगी एक पूरी पीढ़ी की एकजुटता और देश के प्रति समर्पण की यह भावना भी थी कि चाहे रास्ता कोई भी हो, मंजिल राष्ट्र को अंग्रेजों से मुक्त कराने की है।

इसके लिए गांधी ने सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह की राह दिखाई तो सुभाष ने सशस्त्र क्रांति का मार्ग अपनाया। इसी तरह अन्य सेनानियों ने भी अपने व्यवहार से मुक्ति संग्राम में शामिल होकर अपनी श्रेष्ठ भूमिका निभाई।सा

त्रिमूर्ति

महात्मा गांधी को बापू और राष्ट्रपिता कहकर सुभाष ने अपनी देशभक्ति का परिचय दिया तो गांधी जी ने उन्हें देशभक्तों का देशभक्त कहा और वैचारिक मतभेद होते हुए भी उन्हें अपने पुत्र की भांति स्नेह दिया।

जवाहर लाल नेहरू तो सुभाष के बड़े भैया थे ही। जब एक बार अपनी भतीजी द्वारा गुलाब का फूल डंडी समेत नेहरू को दिये जाने से पहले सुभाष ने डंडी साफ कर गुलाब का फूल उनके कोट में टांक दिया और कांटा चुभ जाने से जो रक्त निकला तो नेहरू ने उसकी ओर ध्यान दिलाया ही था कि सुभाष ने यह कहकर अपना कर्तव्य पूरा किया कि गुलाब तुम्हारे और कांटे मेरे हिस्से के हैं।

इसमें कोई विवाद नहीं है कि नेहरू और सुभाष दो भाइयों की तरह थे और गांधी जी दोनों ही के लिए पितातुल्य थे। इसका प्रमाण गांधी जी की इच्छा के विरुद्ध सुभाष का कांग्रेस का अध्यक्ष पद जीतने पर अपने को अलग कर दूसरी राह पकड़ लेना और गांधी जी का बिना किसी वैमनस्य के सुभाष को पुत्रवत स्नेह देना है।

यह कोई साधारण बात नहीं है बल्कि वर्तमान पीढ़ी के लिए संदेश है कि राजनीतिक दल आपस में विचारधारा को लेकर चाहे कितने भी अलग हों, आपसी व्यवहार में वे एक परिवार की तरह ही होने चाहिएं।

इसके विपरीत आज देखने में आता है कि एक दूसरे के विरोध में नेता एक दूसरे पर व्यक्तिगत आरोप लगाते हुए शिष्टता की सभी हदें पार कर जाते हैं। गालियां ही नहीं देते, मरने की कामना करते हैं और इसके लिए साजिश तक करते हैं।

जो लोग सोचते और कहते हैं कि गांधी, नेहरू एक तरफ और सुभाष दूसरी तरफ, तराजू के दो पलड़ों की तरह हैं तो इसमें अतिशयोक्ति नहीं है।  हालांकि यह उनकी विचारधारा तक ही सीमित था, असल में उनके व्यवहार में एक दूसरे के प्रति इतना आदर और सम्मान था कि इस त्रिमूर्ति को अलग अलग रखकर आजादी की लड़ाई में उनके योगदान को समझा ही नहीं जा सकता।

इसका एक उदाहरण यह है कि जब सुभाष विदेशों में हथियार जमा कर रहे थे तो भारत में गांधी जी भारत छोड़ो आंदोलन शुरू कर रहे थे। अगर इन दोनों में कोई मतभेद होता तो सुभाष बधाई न देते और गांधी जी उनकी सफलता की कामना नहीं करते।

महात्मा गांधी जानते थे कि भारतवासी गुलामी की जंजीरों में इतने जकड़ चुके हैं कि ताकतवर अंग्रेज से हथियारों के बल पर नहीं जीत सकते तो उन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह का मार्ग दिखाया।

सुभाष समझते थे कि दुश्मन को उसी की भाषा में जवाब दिया जाना सही है। वे गांधी जी की इस बात से सहमत थे कि भारतवासी सशस्त्र संघर्ष नहीं कर पाएंगे तो इसका हल उन्होंने दूसरे देशों से हथियार जुटाने और अपना ही सैन्य बल तैयार करने से निकाला। इसमें उन्होंने अधिनायकवादी  हिटलर और मुसोलिनी जैसे डिक्टेटर से भी मदद लेने में संकोच नहीं किया।

यह संगत का ही परिणाम कहा जा सकता है कि गांधी प्रजातंत्र के हिमायती थे तो सुभाष देश के लिए बीस वर्ष तक डिक्टेटरशिप को सही मानते थे। जहां तक इस बात को उछाला जाता रहा है कि आजादी गांधी और नेहरू के कारण मिली या सुभाष के कारण तो बाबा साहेब आंबेडकर ने भी सुभाष को महानायक माना।

सुभाष और उनकी आजाद हिन्द फौज ने जिस बहादुरी और जोखिम से स्वतंत्रता संग्राम लड़ा, उसकी मिसाल दुनिया में शायद ही किसी दूसरे देश में मिले। कदाचित यही कारण है कि जय हिन्द का नारा और कदम कदम बढ़ाए जा गीत आज तक हरेक की जुबान पर है।

क्या सीख सकते हैं

आज के दौर में इस बात पर बहस या आपस में तुलना करना बेमानी है कि अगर गांधी या सुभाष जीवित होते तो भारत कैसा होता ?  आजादी की लड़ाई एक अलग मानसिकता से लड़ी गई थी और स्वतंत्र भारत को विश्व में अग्रणी बनाने के लिए संघर्ष करना बिल्कुल अलग सोच है।

हक़ीकत यही है कि न आज गांधी जी की विचारधारा पर चला जा सकता है और न ही सुभाष की कार्यशैली को अपनाया जा सकता है।  गांधी और सुभाष का नाम लेकर अपनी स्वार्थ सिद्धि अवश्य की जा सकती है।


शनिवार, 16 जनवरी 2021

महामारी का टीका तो आ गया, पर चुनौतियां बहुत हैं

 

यह देश के लिए गर्व, वैज्ञानिकों के लिए उपलब्धि और राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा नागरिकों के संयम की जीत है कि एक ओर अनदेखी, अंजान बीमारी धीरे धीरे कम हो रही है और दूसरी ओर राहत मिल रही है कि अब सब कुछ पटरी पर लौट रहा है। परन्तु इससे यह समझना भूल होगी कि बीमारी खत्म हो जाएगी, इसका फैलाव रुक जाएगा और हम पहले की तरह रहने लगेंगे।

पहली बात तो यह है कि कोई भी टीका हो, वह कभी किसी बीमारी का इलाज नहीं होता क्योंकि ज्यादातर बीमारियों के बारे में यह संशय रहता है कि वह होती कैसे हैं, संक्रमण कैसे होता है और जब इस बारे में पक्की जानकारी नहीं है तो उन्हें न होने देने के लिए सौ प्रतिशत गारंटी कैसे दी जा सकती है ?

केवल बचाव ही उपाय है

इस बीमारी से बचाव के लिए टीकाकरण की प्रक्रिया और प्रभाव वैसा ही है जैसा कि जन्म लेने से पहले माता और उसके बाद शिशु का टीकाकरण होता है ताकि जीवन भर अनेक बीमारियों के हमले से बच कर रहा जा सके।

महामारी की तरह आई यह बीमारी भी टीका लगने से रुक जाएगी लेकिन अगर कोई समझे या कहे कि यह समाप्त हो जाएगी तो यह गलत होगा, इसलिए इससे बचे रहने के उपाय जो अभी तक किए जा रहे हैं और हम उनके अभ्यस्त हो गए हैं तो उन्हें जारी रखने में ही भलाई है।

टीकाकरण की शुरुआत पूरे विश्व में हो चुकी है और अब हमारे देश में भी हो रही है तो यह एक सकारात्मक कदम तो है ही, साथ में विश्वास भी है कि अब इसके संक्रमण से बचाव हो जाएगा।

यहां यह समझना भी जरूरी हो जाता है कि अब तक जितने भी टीकाकरण हुए हैं उनका लक्ष्य सीमित आबादी वाला रहा है लेकिन इस बीमारी का टीका तो सबको लगवाना ही होगा क्योंकि इसका शिकार बाल, युवा, अधेड़, वृद्ध में से कोई भी हो सकता है।

टीकाकरण से इतना होता है कि इसके लगने के बाद शरीर इस काबिल हो जाता है कि बीमारी का आक्रमण झेल सके और उसे दूर से ही नमस्ते कर भगाने में सफल हो जाया जाए। इसका मतलब यह है कि हमारी प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी इतनी अधिक हो कि हम उससे बचे रहने में सफल हों और बीमार न पड़ें। इसका एक अर्थ यह भी है कि जो भी वायरस है वह मनुष्य के शरीर में घुसने से पहले ही अपना शिकार न मिलने से इतना कमजोर हो जाय कि अपनी मौत खुद मर जाए।

अभी केवल स्वास्थ्य कर्मियों, जरूरी सेवाओं को प्रदान करने वाले व्यक्तियों को टीका लगेगा और उसके बाद पचास से अधिक उम्र वालों की बारी आएगी। इस काम में कितना समय लगेगा, इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है, निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता, फिर भी छह माह से एक वर्ष की अवधि तो अपने देश की जनसंख्या के आकार को देखकर लग ही सकती है। उसके बाद अन्य लोगों की बारी आएगी।

इस अवधि में यह भी पता चल जाएगा कि टीकाकरण की सफलता की औसत दर क्या है और यह भी कि इस दौरान हो सकता है कि वैज्ञानिक कोई नई खोज करने में भी सफल हो जाएं जिससे अधिक असरदार चिकित्सा पद्धति निकल सके।

चुनौतियां क्या हैं

इस टीकाकरण के असर के बारे में शोधकर्ताओं की ओर से दो बातें कही गई हैं, एक तो यह कि इसके लगने पर व्यक्ति स्वयं तो बच जाएगा लेकिन अगर उसके शरीर में वायरस है तो वह उससे दूसरों यानी अपने संपर्क में आने वालों को संक्रमित कर सकता है और दूसरी बात यह कि अगर वह अभी तक संक्रमण से बचा हुआ है तो अपने साथ दूसरों को भी इस बीमारी से बचाने के लिए कवच बन सकता है।

ऐसा इसलिए है कि अभी तक यह बीमारी लक्षण और बिना किसी लक्षण के बढ़ती हुई देखी जाती रही है। इसका अर्थ यह हुआ कि हमें यह नहीं समझना चाहिए कि जिनका टीकाकरण हो गया है उनसे संक्रमण नहीं हो सकता और उनके संपर्क में आने वाले पूरी तरह सुरक्षित हैं।

यह स्थिति केवल तब आ सकती है जब प्रत्येक व्यक्ति का टीकाकरण हो जाए जो कि वर्तमान परिस्थितियों में तुरंत संभव नहीं है। इसमें महीनों से लेकर कई वर्ष तक लगने वाले हैं, इसलिए प्रत्येक नागरिक को इसके लिए मानसिक तौर पर तैयार रहना होगा कि अभी इस बीमारी से बचकर रहने के उपाय करते हुए ही जीना होगा।

इसका अर्थ यही है कि हमने अपनी जिस जीवन शैली को इन दिनों अपनी दिनचर्या का अंग बना लिया है, उसे आगे भी अपनाए रखना होगा और कुछ चीजें तो ऐसी हैं कि वे जीवन भर साथ रहें तो अच्छा ही है।

इनमें बार बार हाथ धोने, घर, दफ्तर और काम करने की जगहों को सैनिटाइजर से रोगाणुमुक्त करते रहने, मास्क और दस्ताने पहनने की आदत को बरकरार रखने जैसी आदतों को हमेशा के लिए अपनाया जा सकता है। जहां तक दो गज की दूरी और भीड़भाड़ से बचकर रहने की बात है तो अभी कुछ समय तक तो इन्हें अपनाते रहना ही अच्छा होगा क्योंकि न जाने किस भेष में वायरस हमलावर हो जाए।

इस बीमारी के कारण हमारी जीवनशैली में बहुत से परिवर्तन हो गए हैं जिनमें से कुछ को कायम रखा जा सकता है और कुछ को छोड़ने के बारे में सोचा जा सकता है। इनमें बातचीत, मीटिंग, काम धंधे, रोजगार,  प्रेजेंटेशन आदि के लिए आधुनिक संचार और संवाद साधनों का इस्तेमाल सदा के लिए अपनाया जा सकता है।

जहां तक घर से ही दफ्तर का काम करने का चलन है तो यह कुछेक क्षेत्रों में तो जारी रह सकता है लेकिन अधिकतर मामलों में पुरानी परिपाटी अर्थात दफ्तर से ही काम शुरू करना ठीक रहेगा। जो लोग घर से काम कर रहे थे उनका कहना है कि कुछ समय के लिए तो यह ठीक है लेकिन हमेशा के लिए नहीं क्योंकि आमने सामने बैठकर चर्चा करने, वाद विवाद करने की बात ही कुछ और है। इसमें कुछ समय के लिए इतना ही ध्यान रखना काफी है कि बैठने की दूरी बनाए रखी जाए।

हमारे देश में संक्रमण की दर घटते जाने का एक कारण यह है कि इस बीमारी के दौरान अधिकांश लोगों ने अपनी इम्युनिटी बनाए रखने के लिए अपने खानपान में काफी बदलाव किए हैं। इन्हें भी इसी तरह जारी रखा जा सकता है क्योंकि पौष्टिकता हमेशा ही बनी रहनी चाहिए।

इन दिनों जिस भोजन को जंक फूड कहा जाता है उसकी तरफ से लोगों की जो रुचि कम हुई है, उसे वैसा ही रखा जा सकता है और ताजा, पौष्टिक भोजन करते रहना ही बेहतर है। योग क्रियाएं, व्यायाम तो वैसे ही स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक हैं, इसलिए ये भी जीवनचर्या का अंग बने रहें तो कोई बुराई नहीं।

यही सब चुनौतियां या अवसर हैं जिनके साथ हमें जीने की प्रैक्टिस हो ही गई है तो फिर इन्हें अपनाए रखने में ही समझदारी है।  


शनिवार, 9 जनवरी 2021

आत्मनिर्भर भारत महात्मा गांधी से लेकर वर्तमान सरकार तक

 


कोरोना महामारी जब अपने प्रचंड रूप में देश और दुनिया में हाहाकार मचा रही थी, उस समय भारत सरकार देश को आत्मनिर्भर बनाने की योजनाओं की घोषणा कर रही थी। लगभग  प्रतिदिन वित्त मंत्री तथा उनके सहयोगी आर्थिक मोर्चे पर जनता की भलाई और उसके मनोबल को बनाए रखने के लिए बनाई गई नीतियों की व्याख्या टीवी के माध्यम से कर रहे थे।

इसी दौरान बीस लाख करोड़ का पैकेज भी घोषित हुआ जो किसान, व्यापारी, उद्योगपति से लेकर सामान्य नौकरीपेशा या अपना छोटा मोटा कारोबार करने वाले तक के लिए लाभकारी बताया जा रहा था।

उस समय सभी लोग घरों में बंद थे, बाहर निकलने का मतलब अदृश्य वायरस की चपेट  में आकर अपना जीवन खतरे में डालना था। टीवी ही एकमात्र साधन था जिससे संसार भर में हो रही हलचल के बारे में पता चल जाता था। केवल बहुत जरूरी कामकाज हो रहे थे, ऐसे में लगता था कि सरकार जनता की भलाई के लिए कितनी चिंतित है और उसे सुकून पहुंचाने के लिए दिन रात मेहनत कर रही है।

तोहफा या गले की हड्डी

आत्मनिर्भर पैकेज भी सरकार की तरफ से दिया गया ऐसा ही तोहफा था और आश्चर्य होता था कि सरकार ने जन कल्याण के लिए कैसे आनन फानन में इतनी सारी योजनाएं बना डालीं। आत्मनिर्भर पैकेज तो एक तरह से पूरा बजट ही था जिसके दूरगामी परिणाम होने वाले थे।

उसी दौरान किसान बिल भी बन गया जो जल्दबाजी में या जानबूझकर तुरंत लागू भी कर दिया गया। इसे लेकर आज सरकार की जितनी फजीहत हो रही है, उससे लगता है कि या तो सरकार के मन में कुछ और था या फिर किसान ही समझ से इतना पैदल है कि उसे अपना अच्छा बुरा समझने की तमीज नहीं है।

एक और उदाहरण है। सरकार ने व्यापारियों को राहत देते हुए घोषणा की कि पुराने भुगतान 45 दिन में लेनदार के खाते में आ जाने चाहिएं। हकीकत यह है कि जब किसी ने अपने पुराने बिलों के भुगतान की बाबत इस नए आदेश के अनुसार कार्यवाही करने की बात कही तो जवाब मिलता था कि हमारे पास कोई आदेश नहीं आया और यह कि कोरोना के चलते कोई काम नहीं हो सकता। इस तरह के और भी बहुत से उदाहरण दिए जा सकते हैं और लगभग हर कोई सरकारी अधिकारियों से लेकर नेताओं तक से उनकी टालमटोल की आदत का शिकार हो रहा था।

जिस तरह किसान बिल पर चर्चा और पुनर्विचार की मांग उठ रही है, उसी तरह इस पूरे पैकेज पर जनता के बीच और संसद में बहस होनी चाहिए ताकि इन योजनाओं को तर्क और व्यावहारिकता की कसौटी पर खरा उतरने के बाद ही लागू करने का काम शुरू किया जाए।

परिवहन सुविधाएं, सड़क निर्माण, फ्रेट कॉरिडोर, यातायात व्यवस्था, व्यापार और उद्योग के लिए दी जाने वाली सुविधाएं आदि तो सरकार के सामान्य कार्यों में आते हैं तो फिर बीस लाख करोड़ के पैकेज से आम आदमी को गुमराह क्यों किया जा रहा है ?

प्रवासी महात्मा गांधी

नौ जनवरी को देश में प्रवासी दिवस मनाने का चलन है जिसमें विदेशों में बसे भारतीयों को अपने देश में बुलाने, उनसे चर्चा करने ताकि वे  अपनी कमाई में से कुछ यहां खर्च करें या मोटी रकम निवेश करें, उन्हें अलग से सुविधाएं देने और यह विनती करने कि अब बहुत रह लिए विदेश में, अपने वतन में लौट आइए, हम आपका स्वागत करने को तैयार बैठे हैं।

कुछ प्रवासी सरकार की बातों में आकर यहां आ भी जाते हैं लेकिन यहां जो लेट लतीफी और भ्रष्टाचार का तंत्र है, उससे परेशान होकर वापिस लौटने में ही अपनी भलाई समझते हैं। अभी वे जिन देशों में रहकर अपनी बुद्धि और कौशल के बल पर अपना विशेष स्थान बनाए हुए हैं और वहां की सरकारें उनकी पूरी मदद करती हैं, भारत आते ही यहां उन्हें नियम, कानून की बेड़ियों में जकड़ा जाने जैसी फीलिंग होती है और वे अपने वतन की खिदमत करना भूलकर वापिसी का टिकट कटा लेते हैं।

यह जो प्रवासी दिवस है, इसे मनाने की तारीख नौ जनवरी इसलिए रखी गई थी क्योंकि इसी दिन सन 1915 में मोहन दास करमचंद  गांधी सबसे पहले भारतीय प्रवासी के रूप में अपने गुरु गोपाल कृष्ण गोखले के आह्वान पर भारत आए थे और देश की सेवा करने का संकल्प लिया था।

उन्होंने सबसे पहला काम यह किया कि देश को जानने, समझने के लिए भारत भ्रमण पर निकल गए। उस दौर में आने जाने की सुविधाएं आज की तरह न होने से जितना भी घूम फिर सके, उनके लिए काफी था। जिस प्रकार खिचड़ी के एक चावल की जांच करना ही काफी है कि वह पक चुकी है या अभी कच्ची है, उन्हें समझने में देर नहीं लगी कि भारत को गुलाम बनाए रखने की अंग्रेज की चाल क्या है और इस गुलामी से बाहर निकालने के लिए क्या करना जरूरी है ?

अंग्रेज ने केवल इतना किया था कि हमें मानसिक रूप से इतना कुंद कर दिया था कि हमें उसकी बुराइयों में भी अच्छाईयां दिखाई देती थीं। शारीरिक क्षमता में मजबूत होते हुए भी हम उसके पतले दुबले पहलवान से भी हार जाते थे, उसके पुचकारने पर दुम हिलाने जैसा और मारने पर हाथ जोड़ कर माफी मांगने जैसा व्यवहार करने के आदी हो गए थे।

आत्म निर्भर होने का पाठ

बापू गांधी के सामने चुनौती थी कि कैसे देशवासियों को मानसिक दासता से मुक्त किया जाए ताकि वे अपनी हीनभावना और कुंठा से अलग हटकर अपने को सक्षम मानना शुरू करें।

यह मुश्किल काम था लेकिन गांधी ने चरखा देकर और खादी धारण करने और गांव में ही जो कुछ काम धंधा, रोजगार हो सकता था, उसके लिए आसपास उपलब्ध साधनों से अपनी रोजी रोटी कमाने और खेतीबाड़ी को प्राथमिकता देकर पेट भरने लायक अनाज उगाने का ऐसा मंत्र दिया कि देशवासी आत्मनिर्भर होने की तरफ चल पड़े।

अंग्रेज इस चरखे का मजाक उड़ाता रह गया और पूरा देश अंदर से इतना शक्तिशाली होता गया कि अंग्रेज को भगाने की तैयारी करने लगा। इसमें उन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह को शामिल कर दिया जिससे अंग्रेज कुछ न समझने के कारण बौखला गया और नतीजा यह हुआ कि उसके दमन चक्र से भी भारतीयों की हिम्मत नहीं टूटी और वे दिन पर दिन मजबूत होते गए।

गांधी ने ग्रामीण उद्योग, खादी व कुटीर उद्योग और अपने ही संसाधनों का ठीक से इस्तेमाल करने की ऐसी परंपरा शुरू कर दी जो हमें अपने पैरों पर खड़ा होने में रामबाण औषधि सिद्ध हुई।

इसे कहते हैं आत्मनिर्भरता अर्थात एक संकल्प कि हम किसी से कम नहीं और किसी को पछाड़ने की हमारी नीयत नहीं लेकिन आगे निकलने की दौड़ में सबसे आगे।

प्रथम प्रधान मंत्री नेहरू ने देश में वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं, औद्योगिक प्रतिष्ठानों से उन्हें जोड़ने और आधुनिक सुविधाओं से देश को संपन्न करने का काम शुरू किया अर्थात मजबूत नीव डालनी शुरू की। उनसे एक गलती यह हुई कि वे गांव देहात को कम और शहरों को ज्यादा प्राथमिकता देने लगे जबकि इसका उल्टा होना चाहिए था क्योंकि हम  कृषि प्रधान देश रहे हैं।

ग्रामीण क्षेत्र वीरान होते गए और शहरों के नाम पर कंक्रीट जंगल अस्तित्व में आते गए। यही गलती अब तक होती रही है और अब जाकर सरकार का ध्यान ग्रामीण क्षेत्रों की तरफ जाना शुरू हुआ है।

मिसाल के तौर पर हमारा जो मैनुफैक्चरिंग सेक्टर है वह इंपोर्टेड साज सामान हो या मशीनरी, उस पर निर्भर हो गया जबकि होना यह चाहिए था कि हम अपने ही संसाधनों से और स्वदेशी तकनीक से अपने कल कारखाने और उद्योग चलाते और उन्हें ग्रामीण इलाकों में स्थापित कर गांव देहात को समृद्ध करते और शहरों के साथ संतुलन बिठाकर काम करते।

आत्म निर्भर भारत को लेकर सरकार की सोच चाहे कितनी अच्छी हो लेकिन बेहतर होगा कि उसके सिपहसालार महात्मा गांधी की तरह देश के भीतरी हिस्से में जाकर अध्ययन करें, स्थानीय लोगों से बातचीत करें और अपनी योजनाओं पर आम आदमी की राय लें और उससे पूछें कि अगर उन्हें लागू किया जाए तो क्या ये उसे मंजूर होंगी और क्या इनसे उसका जीवन बदल सकता है और वह खुशहाल हो सकता है।

अगर उत्तर हां में मिलता है तो आगे बढ़ें और ना में मिलता है तो इस पूरे आत्म निर्भर पैकेज पर फिर से विचार कर नए सिरे से बनाएं वरना होगा यह कि जैसे आज किसान यह कह रहा है कि जब उसे यह बिल चाहिए ही नहीं तो क्यों उस पर लादने की कोशिश हो रही है, उसी तरह अन्य क्षेत्रों में भी विरोध होना शुरू हो जाएगा।

कहीं ऐसा न हो कि जनता उसके अन्य सुधारों को भी रद्द कर दे और देश को आत्म निर्भर बनाने का संकल्प अधूरा रह जाए।