शनिवार, 31 जुलाई 2021

देश को उद्योग प्रधान बनाए बिना आर्थिक विकास संभव नहीं है।

 

खेतीबाड़ी को लेकर देशवासी अपने को कृषि प्रधान कहते हुए इतने भावुक हो जाते हैं कि धरती को मां और किसान को अन्नदाता कहते नहीं थकते। अब यह बात और है कि ज़मीन जब बंजर, सूखाग्रस्त और रेतीली हो जाती है तो उसका इलाज़ कर खेती के काबिल बनाने के बजाए या तो बेच देते हैं या सरकार द्वारा अधिग्रहण करने का इंतज़ार करते हैं। 

कृषि प्रधान होने के बावजूद किसानी में कम आमदनी होती है, खर्चे ज्यादा होने से किसान अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करता है, सरकारी सहायता पर निर्भर रहता है और हमेशा कर्जे में डूबा रहता है। फिर भी कृषि को हमारी अर्थव्यवस्था का पहला स्तंभ माना जाता है।

उद्योग प्रधान बनना नियति है

कृषि के बाद उद्योग को आर्थिक विकास का दूसरा स्तंभ कहा गया है लेकिन उसकी हालत ऐसी है कि सब्सिडी और छूट पर निर्भर रहता है और हमेशा ऐसी सरकारी घोषणाओं और योजनाओं की तलाश में रहता है जिनसे कुछ आर्थिक लाभ होता हो। यही कारण है कि जो देश हमारे आसपास के वर्षों में ही स्वतंत्र हुए वे आज हमसे बहुत अधिक समृद्ध हैं और औद्योगिक देशों की पहली पंक्ति में खड़े दिखाई देते हैं।

यह कैसा संयोग है कि पंडित नेहरू ने भारत को औद्योगिक राष्ट्र बनाने की अपनी सोच की व्याख्या करते हुए कहा था कि हम जो उत्पादन करते हैं, वह हमारे उपभोग के लिए पर्याप्त हो, मतलब हम अपनी जरूरतों को स्वयं ही पूरा करने के योग्य हों। वर्तमान समय में नरेंद्र मोदी का भी यही कहना है कि भारत आत्मनिर्भर बने और हम अपने पैरों पर खड़े हों ।

रुकावट कहां है ?

अगर इतिहास में झांके तो देखेंगे कि भारत में औद्योगिक विकास का अर्थ ऐसे नियम कायदे बनाना था कि उद्यमी सरकार के चंगुल में फंसे रहकर ही उत्पादन करे और तनिक भी इधर उधर होने पर कानून का शिकंजा उसे कस सके।

उद्योगपति को  हमेशा शक की नज़र से देखा गया, उस पर सख्त  पाबंदियां लगती रहीं।  देश में इंस्पेक्टर राज पनपने से नौकरशाहों यानी ब्यूरोक्रेसी और ऐसे उद्योगपतियों का गठजोड़ बन गया जो एक दूसरे को आर्थिक लाभ पहुंचाते रहे और इस तरह पैरलल यानी समानांतर इकोनॉमी की शुरुआत हो गई जिसे काला धन कहा गया। देश की संपदा, रुपया पैसा, प्राकृतिक स्रोत सब कुछ मुठ्ठी भर लोगों के गैर कानूनी कब्जे में आता गया और अधिकांश जनता पर गरीबी, बेरोजगारी हावी होती गई जो अब तक बरकरार है।

जब देश का सोना गिरवी रखने की नौबत आई तो पी वी नरसिम्हा राव की सरकार ने अपने वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के जरिए देश में आर्थिक सुधार और उदारीकरण के नाम पर प्रतिबंधों में ढील देनी शुरू की और परमिट राज खत्म होता दिखाई दिया। परंतु सरकारी अफसरों के मुंह खून लग चुका था तो उन्होंने ऐसे नियम बनाने शुरू कर दिए, अनावश्यक फॉर्म जमा करने और बेतुकी मांग पूरी करने के फ़रमान जारी कर दिए और उद्योग लगाने की इच्छा रखने वाले उद्यमियों के सामने इतनी जटिल प्रक्रिया रख दी जिसे केवल अफसरशाही ही सुलझा सकती थी। नतीज़ा यह हुआ कि रिश्वतखोरी और भाई भतीजावाद का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जो भ्रष्ट  राजनीतिज्ञों, उद्योगपतियों और नौकरशाहों के लिए अकूत संपत्ति जमा करने का अवसर बन गया।

मिसाल के तौर पर मान लीजिए आपने सरकार या निजी मालिकों से ज़मीन खरीदी तो उद्योग लगाने से पहले आपको अपनी पुश्तों तक का ब्योरा देना, लैंड यूज बदलने से लेकर पहले से ही सभी तरह के सर्टिफिकेट लाना, कितने लोगों को रोज़गार मिलेगा, उन्हें कितना वेतन दिया जायेगा, कौन सी मशीनरी लगेगी, कहां से आयेगी, अगर विदेश से आनी है तो इंपोर्ट करने की परमीशन, कंप्लीशन सर्टिफिकेट लेने और उत्पादन शुरू करने से पहले मिनीमम कंस्ट्रक्शन, वर्क परमिट, पूरी बिल्डिंग बनने और भविष्य की जरूरत का काल्पनिक अनुमान लगाकर आज ही पार्किग की व्यवस्था करना और बहुत सी बेसिरपैर की बातों को पूरा करना जरूरी कर दिया।

यह सिलसिला रुका नहीं बल्कि आज भी लगातार बढ़ता जा रहा है चाहे वर्तमान सरकार कितने भी दावे कर ले कि उसने गली सड़ी व्यवस्था को बदल दिया है पर हकीकत यही है कि आज भी देश में सरकारी नियम पालन करना तब तक असम्भव है जब तक कि नेताओं की सिफारिश और अफसरों की मुट्ठी गरम करने के लिए ढेर सारा पैसा न हो। ऐसी हालत में कोई उद्योग सफल कैसे होगा ?

उद्योगों की बंदरबांट

उद्योगों को ग्राम, कुटीर, स्मॉल, मीडियम, बड़े उद्योगों में बांट दिया और उनके लिए इन्वेस्टमेंट, संचालन, उत्पादन, मूल्य तय करने आदि  पर इतने नियंत्रण लगा दिए कि उद्योग शुरू करने से पहले ही उद्योगपति निराश हो जाए । इसके साथ ही  उद्योगों के लिए अलग अलग संरक्षण और आरक्षण की नीति अपनाई जाने लगी।

इस तरह की नीति, बदन पर होने वाली खुजली की तरह सिद्ध हुई जो एक अंग पर अगर शांत हो जाती तो दूसरे अंग पर होने लगती । मतलब यह कि आज अगर किसी  श्रेणी को छूट मिल रही है तो दूसरा उद्योग भी उसकी मांग करने लगता है। यह ऐसा ही है कि जैसे कोई मोमबत्ती बनाने वाला कहे कि उसकी प्रतियोगिता सूर्य से है क्योंकि दिन भर वो इतनी रोशनी करता है कि उसकी मोमबत्ती को खरीददार नहीं मिलते, इसलिए उसे भी छूट चाहिए।

होना यह चाहिए था कि सभी उद्योगों के लिए समान नियम, सुविधाएं और आसान प्रक्रिया बनती जिससे सभी का ध्यान स्वतंत्र होकर केवल उत्पादन बढ़ाने पर होता न कि भेदभाव होने से छूट हासिल करने की प्रतियोगिता करना।

दिशाहीन होने के परिणाम

औद्योगिक विकास को सही दिशा न मिलने का परिणाम नौकरियां पैदा करने में असफलता, विकास दर में गिरावट, प्रति व्यक्ति आय में कमी, देसी और विदेशी निवेश में रुकावट और बेरोज़गारी बढ़ते जाने के रूप में हुआ जिसका भविष्य में भारी मुसीबत का  कारण बनना तय है, यदि समय रहते ठोस कदम न उठाए गए।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि रिसर्च और ज़मीनी हकीकत को दरकिनार कर ट्रेनिंग और सुविधाएं तैयार किए बिना स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया, लोकल से ग्लोबल जैसी घोषणाएं कर दी गईं जो केवल कागज़ी बन कर रह गई हैं और उनमें लगने वाला धन नाले में बह जाने की तरह हो गया है ।

एक अनुमान के अनुसार अगले दस साल में यदि आर्थिक विकास की दर छः प्रतिशत रहती है तो १७५ मिलियन लोग रोजगार मांगने वालों की कतार में लगे होंगे जबकि केवल १२५ मिलियन को ही रोज़गार मिल सकेगा और बाकी ५० मिलियन निठल्ले और निकम्मे साबित होने से या तो भूख और गरीबी में पिसेंगे या आपराधिक गतिविधियों तथा गैर कानूनी कामों में शामिल हो जायेंगे। यहां यह बताना भी ज़रूरी है कि सन २०१५ में भारत सबसे तेज विकसित होने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक था और २०२० तक वह सबसे धीमी गति से बढ़ने वालों में शामिल हो गया ।

उद्योग प्रधान बनने का संकल्प

यदि वक्त रहते औद्योगिक उत्पादन को बढ़ावा देने वाली नीतियों को लागू नहीं किया गया तो स्थिति बहुत ख़राब हो जाने में कोई शंका नहीं है। देश को उद्योग प्रधान बनाने के लिए नियमों में आमूल चूल परिवर्तन, विनिवेश में तेज़ी, उद्योग लगाने वालों को बंधनों से मुक्त कर अपना निर्णय स्वयं लेने की छूट देनी होगी विशेषकर उनमें जिनमें कामगार, श्रमिक, मज़दूर और स्किल्ड लोग चाहिएं।

ऐसे उद्योग जिनमें बहुत अधिक पूंजी लगती है उन्हें छोड़कर मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर को युवा, साहसी और कुछ नया कर दिखाने की चाहत रखने वाले उद्यमियों  तथा अनुभवी उद्योगपतियों के हवाले करना होगा । उनके लिए पूंजी उपलब्ध करने के साथ साथ मूलभूत सुविधाओं का पूरे देश में जाल बिछाना होगा जिनमें ट्रांसपोर्टेशन, ज़मीन की उपलब्धता, बिजली, पानी, सीवर, सड़क और औद्योगिक तथा रिहायशी बस्तियों का निर्माण प्रमुख है।

इस बात को स्वीकार करना होगा कि कृषि से अधिक उद्योगों में आर्थिक विकास करने की क्षमता और संभावना है। भावुकता और राजनीतिक फायदों को ताक पर रखकर असलीयत का सामना करने से ही देश विकसित देशों की पंक्ति में स्थान सुनिश्चित कर सकता है, यह बात जितनी जल्दी समझ ली जाय, उतना ही देशवासियों के लिए बेहतर होगा।


देश को उद्योग प्रधान बनाए बिना आर्थिक विकास संभव नहीं है।


खेतीबाड़ी को लेकर देशवासी अपने को कृषि प्रधान कहते हुए इतने भावुक हो जाते हैं कि धरती को मां और किसान को अन्नदाता कहते नहीं थकते। अब यह बात और है कि ज़मीन जब बंजर, सूखाग्रस्त और रेतीली हो जाती है तो उसका इलाज़ कर खेती के काबिल बनाने के बजाए या तो बेच देते हैं या सरकार द्वारा अधिग्रहण करने का इंतज़ार करते हैं। 

कृषि प्रधान होने के बावजूद किसानी में कम आमदनी होती है, खर्चे ज्यादा होने से किसान अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करता है, सरकारी सहायता पर निर्भर रहता है और हमेशा कर्जे में डूबा रहता है। फिर भी कृषि को हमारी अर्थव्यवस्था का पहला स्तंभ माना जाता है।

उद्योग प्रधान बनना नियति है

कृषि के बाद उद्योग को आर्थिक विकास का दूसरा स्तंभ कहा गया है लेकिन उसकी हालत ऐसी है कि सब्सिडी और छूट पर निर्भर रहता है और हमेशा ऐसी सरकारी घोषणाओं और योजनाओं की तलाश में रहता है जिनसे कुछ आर्थिक लाभ होता हो। यही कारण है कि जो देश हमारे आसपास के वर्षों में ही स्वतंत्र हुए वे आज हमसे बहुत अधिक समृद्ध हैं और औद्योगिक देशों की पहली पंक्ति में खड़े दिखाई देते हैं।

यह कैसा संयोग है कि पंडित नेहरू ने भारत को औद्योगिक राष्ट्र बनाने की अपनी सोच की व्याख्या करते हुए कहा था कि हम जो उत्पादन करते हैं, वह हमारे उपभोग के लिए पर्याप्त हो, मतलब हम अपनी जरूरतों को स्वयं ही पूरा करने के योग्य हों। वर्तमान समय में नरेंद्र मोदी का भी यही कहना है कि भारत आत्मनिर्भर बने और हम अपने पैरों पर खड़े हों ।

रुकावट कहां है ?

अगर इतिहास में झांके तो देखेंगे कि भारत में औद्योगिक विकास का अर्थ ऐसे नियम कायदे बनाना था कि उद्यमी सरकार के चंगुल में फंसे रहकर ही उत्पादन करे और तनिक भी इधर उधर होने पर कानून का शिकंजा उसे कस सके।

उद्योगपति को  हमेशा शक की नज़र से देखा गया, उस पर सख्त  पाबंदियां लगती रहीं।  देश में इंस्पेक्टर राज पनपने से नौकरशाहों यानी ब्यूरोक्रेसी और ऐसे उद्योगपतियों का गठजोड़ बन गया जो एक दूसरे को आर्थिक लाभ पहुंचाते रहे और इस तरह पैरलल यानी समानांतर इकोनॉमी की शुरुआत हो गई जिसे काला धन कहा गया। देश की संपदा, रुपया पैसा, प्राकृतिक स्रोत सब कुछ मुठ्ठी भर लोगों के गैर कानूनी कब्जे में आता गया और अधिकांश जनता पर गरीबी, बेरोजगारी हावी होती गई जो अब तक बरकरार है।

जब देश का सोना गिरवी रखने की नौबत आई तो पी वी नरसिम्हा राव की सरकार ने अपने वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के जरिए देश में आर्थिक सुधार और उदारीकरण के नाम पर प्रतिबंधों में ढील देनी शुरू की और परमिट राज खत्म होता दिखाई दिया। परंतु सरकारी अफसरों के मुंह खून लग चुका था तो उन्होंने ऐसे नियम बनाने शुरू कर दिए, अनावश्यक फॉर्म जमा करने और बेतुकी मांग पूरी करने के फ़रमान जारी कर दिए और उद्योग लगाने की इच्छा रखने वाले उद्यमियों के सामने इतनी जटिल प्रक्रिया रख दी जिसे केवल अफसरशाही ही सुलझा सकती थी। नतीज़ा यह हुआ कि रिश्वतखोरी और भाई भतीजावाद का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जो भ्रष्ट  राजनीतिज्ञों, उद्योगपतियों और नौकरशाहों के लिए अकूत संपत्ति जमा करने का अवसर बन गया।

मिसाल के तौर पर मान लीजिए आपने सरकार या निजी मालिकों से ज़मीन खरीदी तो उद्योग लगाने से पहले आपको अपनी पुश्तों तक का ब्योरा देना, लैंड यूज बदलने से लेकर पहले से ही सभी तरह के सर्टिफिकेट लाना, कितने लोगों को रोज़गार मिलेगा, उन्हें कितना वेतन दिया जायेगा, कौन सी मशीनरी लगेगी, कहां से आयेगी, अगर विदेश से आनी है तो इंपोर्ट करने की परमीशन, कंप्लीशन सर्टिफिकेट लेने और उत्पादन शुरू करने से पहले मिनीमम कंस्ट्रक्शन, वर्क परमिट, पूरी बिल्डिंग बनने और भविष्य की जरूरत का काल्पनिक अनुमान लगाकर आज ही पार्किग की व्यवस्था करना और बहुत सी बेसिरपैर की बातों को पूरा करना जरूरी कर दिया।

यह सिलसिला रुका नहीं बल्कि आज भी लगातार बढ़ता जा रहा है चाहे वर्तमान सरकार कितने भी दावे कर ले कि उसने गली सड़ी व्यवस्था को बदल दिया है पर हकीकत यही है कि आज भी देश में सरकारी नियम पालन करना तब तक असम्भव है जब तक कि नेताओं की सिफारिश और अफसरों की मुट्ठी गरम करने के लिए ढेर सारा पैसा न हो। ऐसी हालत में कोई उद्योग सफल कैसे होगा ?

उद्योगों की बंदरबांट

उद्योगों को ग्राम, कुटीर, स्मॉल, मीडियम, बड़े उद्योगों में बांट दिया और उनके लिए इन्वेस्टमेंट, संचालन, उत्पादन, मूल्य तय करने आदि  पर इतने नियंत्रण लगा दिए कि उद्योग शुरू करने से पहले ही उद्योगपति निराश हो जाए । इसके साथ ही  उद्योगों के लिए अलग अलग संरक्षण और आरक्षण की नीति अपनाई जाने लगी।

इस तरह की नीति, बदन पर होने वाली खुजली की तरह सिद्ध हुई जो एक अंग पर अगर शांत हो जाती तो दूसरे अंग पर होने लगती । मतलब यह कि आज अगर किसी  श्रेणी को छूट मिल रही है तो दूसरा उद्योग भी उसकी मांग करने लगता है। यह ऐसा ही है कि जैसे कोई मोमबत्ती बनाने वाला कहे कि उसकी प्रतियोगिता सूर्य से है क्योंकि दिन भर वो इतनी रोशनी करता है कि उसकी मोमबत्ती को खरीददार नहीं मिलते, इसलिए उसे भी छूट चाहिए।

होना यह चाहिए था कि सभी उद्योगों के लिए समान नियम, सुविधाएं और आसान प्रक्रिया बनती जिससे सभी का ध्यान स्वतंत्र होकर केवल उत्पादन बढ़ाने पर होता न कि भेदभाव होने से छूट हासिल करने की प्रतियोगिता करना।

दिशाहीन होने के परिणाम

औद्योगिक विकास को सही दिशा न मिलने का परिणाम नौकरियां पैदा करने में असफलता, विकास दर में गिरावट, प्रति व्यक्ति आय में कमी, देसी और विदेशी निवेश में रुकावट और बेरोज़गारी बढ़ते जाने के रूप में हुआ जिसका भविष्य में भारी मुसीबत का  कारण बनना तय है, यदि समय रहते ठोस कदम न उठाए गए।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि रिसर्च और ज़मीनी हकीकत को दरकिनार कर ट्रेनिंग और सुविधाएं तैयार किए बिना स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया, लोकल से ग्लोबल जैसी घोषणाएं कर दी गईं जो केवल कागज़ी बन कर रह गई हैं और उनमें लगने वाला धन नाले में बह जाने की तरह हो गया है ।

एक अनुमान के अनुसार अगले दस साल में यदि आर्थिक विकास की दर छः प्रतिशत रहती है तो १७५ मिलियन लोग रोजगार मांगने वालों की कतार में लगे होंगे जबकि केवल १२५ मिलियन को ही रोज़गार मिल सकेगा और बाकी ५० मिलियन निठल्ले और निकम्मे साबित होने से या तो भूख और गरीबी में पिसेंगे या आपराधिक गतिविधियों तथा गैर कानूनी कामों में शामिल हो जायेंगे। यहां यह बताना भी ज़रूरी है कि सन २०१५ में भारत सबसे तेज विकसित होने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक था और २०२० तक वह सबसे धीमी गति से बढ़ने वालों में शामिल हो गया ।

उद्योग प्रधान बनने का संकल्प

यदि वक्त रहते औद्योगिक उत्पादन को बढ़ावा देने वाली नीतियों को लागू नहीं किया गया तो स्थिति बहुत ख़राब हो जाने में कोई शंका नहीं है। देश को उद्योग प्रधान बनाने के लिए नियमों में आमूल चूल परिवर्तन, विनिवेश में तेज़ी, उद्योग लगाने वालों को बंधनों से मुक्त कर अपना निर्णय स्वयं लेने की छूट देनी होगी विशेषकर उनमें जिनमें कामगार, श्रमिक, मज़दूर और स्किल्ड लोग चाहिएं।

ऐसे उद्योग जिनमें बहुत अधिक पूंजी लगती है उन्हें छोड़कर मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर को युवा, साहसी और कुछ नया कर दिखाने की चाहत रखने वाले उद्यमियों  तथा अनुभवी उद्योगपतियों के हवाले करना होगा । उनके लिए पूंजी उपलब्ध करने के साथ साथ मूलभूत सुविधाओं का पूरे देश में जाल बिछाना होगा जिनमें ट्रांसपोर्टेशन, ज़मीन की उपलब्धता, बिजली, पानी, सीवर, सड़क और औद्योगिक तथा रिहायशी बस्तियों का निर्माण प्रमुख है।

इस बात को स्वीकार करना होगा कि कृषि से अधिक उद्योगों में आर्थिक विकास करने की क्षमता और संभावना है। भावुकता और राजनीतिक फायदों को ताक पर रखकर असलीयत का सामना करने से ही देश विकसित देशों की पंक्ति में स्थान सुनिश्चित कर सकता है, यह बात जितनी जल्दी समझ ली जाय, उतना ही देशवासियों के लिए बेहतर होगा।


शनिवार, 24 जुलाई 2021

सरकार और किसान ज़िद छोड़ें वरना सबका नुकसान होना तय है

 

जब परिवार, समाज या देश के संदर्भ में कोई विवाद इतना खिंच जाए कि असली मुद्दा ही गायब हो जाए और बात इतनी बढ़ जाए कि शालीनता की जगह अभद्रता और शिष्टाचार के स्थान पर गाली गलौज का इस्तेमाल हो तो समझना चाहिए कि अराजकता की शुरुआत हो चुकी है और बातचीत से कोई हल निकलने की बात सोचना बेमानी है।

समस्या आमदनी से जुड़ी है।   

हमारे देश के तीन चैथाई लोग खेतीबाड़ी से जुड़े हैं लेकिन सच यह है कि किसानी करने वाले आधे लोग कर्ज़दार हैं और वह इसलिए कि कृषि कर्म से उन्हें इतना नहीं मिल पाता कि उधार लेने की ज़रूरत न हो, अपने बच्चों की फीस जमा करने और दूसरी जरूरतों के लिए खेत न बेचने पड़ते हों और मुख्य बात यह कि बीज, खाद, रसायन और सिंचाई के लिए साहूकार के पास अपनी होने वाली उपज को गिरवी रखने की मज़बूरी तो है ही।

यहां हम उन मुठ्ठी भर किसानों की चर्चा नहीं कर रहे जो पंजाब, हरियाणा या दूसरे उन इलाकों में हल चलाते हैं जहां की धरती उपजाऊ है, खेती के आधुनिक साधन हैं और इतने खुशहाल हैं कि बड़े जमींदार, संपन्न परिवार कहलाते हैं और उनके नाते रिश्तेदार देश के अमीर ही नहीं, इंग्लैंड, कनाडा और दूसरी जगहों पर शानदार जीवन व्यतीत करने वाले लोग हैं।

कृषि कानून और वास्तविकता

सरकार अपने बनाए कृषि कानूनों की वकालत करते हुए और उन्हें कृषकों के लिए लाभकारी बताते समय यह भूल कर जाती है कि ऐसे किसान जिनके खेतों का आकार बहुत छोटा है और जिनकी संख्या बहुत अधिक है, वे गरीबी के दलदल से जितना बाहर निकलने की कोशिश करते हैं, उतना ही और इसमें धंसते जाते हैं । उनके लिए सरकार का यह कहना बेमानी हो जाता है कि ऐसे ही किसानों की आय बढ़ाने के लिए यह कानून बनाए गए हैं और विडंबना यह कि उसे अन्नदाता कहा जाता है जबकि उसके लिए दो वक्त की रोटी जुटाना ही मुश्किल है।

जब यही हकीकत है तो सोचना यह होगा कि क्या किसान  इन कानूनों का लाभ उठाने में सक्षम हैं  ?

उदाहरण के लिए यह प्रवचन देना कि इन कानूनों के लागू होने पर किसान अपनी फ़सल कहीं भी किसी को भी अपने तय किए दाम पर बेच सकता है तो उस किसान के लिए यह दूर के ढोल सुहावने होने जैसा है क्योंकि उसके पास अपनी फसल को दूसरे स्थान पर बेचने के लिए न तो ले जाने की सुविधा है और न ही इतने पैसे कि वह ढुलाई तथा आने जाने का खर्च उठा सके ।

जो लोग यह कहते हैं कि वह अपनी उपज़ का भंडारण कर ले और जब अच्छे दाम मिलें तो बेचे, वे यह भूल जाते हैं कि इन छोटी जोतों वाले किसानों की स्टोरेज का किराया चुकाने की हैसियत होती तो वह साहुकार के यहां पैदावार पहले से गिरवी ही क्यों रखते ?

अब बात आती है कि किसान का कॉरपोरेट जगत और ऐसे व्यापारी के साथ कॉन्ट्रैक्ट करना जो खेतीबाड़ी में पैसा लगाकर एक रुपए के दस बनाने की नीयत रखते हों और जिनका कृषि से दूर दूर तक न कभी वास्ता रहा हो और न उनका इस व्यवसाय को अपनाने का इरादा हो।  वे ज़ाहिर है कि किसान के अनपढ़ या कम पढ़ा लिखा होने का फ़ायदा उठाकर इस तरह का कॉन्ट्रैक्ट करने का यत्न करेंगे जिससे उनका तो भरपूर फ़ायदा हो और किसान जिसकी ज़मीन है उसे इतना भी न मिले जो फसल उगाने में लगने वाली उसकी मेहनत की भरपाई तक कर सके ! मतलब यह कि ऐसे छोटे और मझौले किसान  के लिए कॉन्ट्रैक्ट की खेती करना अपनी बर्बादी को न्यौता देना है।

जब सरकार यह कहती है कि किसान के पास अमीर लोगों के साथ हुए एग्रीमेंट की कॉपी है और वह उसकी शर्तों का उल्लंघन होने पर ज़िला मजिस्ट्रेट या अदालत में मुक़दमा दायर कर सकता है और न्याय पा सकता है तो यह बात क्या किसी से छिपी है कि हमारे देश में न्याय पाने के लिए पीढ़ियां दांव पर लग जाती है लेकिन न्याय की बस उम्मीद ही रहती है, वह आसानी से मिलता नहीं है ?

यह कानून देखने में चाहे कितने अच्छे लगते हों, कागज़ पर कितने ही आकर्षक और लुभावने हों और सरकार की मंशा चाहे कितनी भी किसान का भला करने की रही हो लेकिन वास्तविकता यह है कि इन कानूनों के ज्यादातर हिस्से प्रैक्टिकल या व्यावहारिक नहीं हैं। यही कारण है कि सरकार और किसानों के बीच हुई बहुत बार की बातचीत का कोई नतीज़ा नहीं निकला।

किसान इन कानूनों को पूरी तरह वापिस लेने की बात ऐसे ही नहीं कर रहे बल्कि उसमें कुछ तथ्य ज़रूर है। सरकार का यह कहना कि वह इनमें संशोधन करने को तो राज़ी है लेकिन पूरी तरह रद्द करने के लिए तैयार नहीं है, उससे लगता है कि यह लड़ाई दोनों पक्षों की नाक का सवाल बन गई है।  दोनों ही अपनी अपनी ज़िद छोड़ने के बारे में सोचना तक नहीं चाहते, चाहे इससे देश की आर्थिक स्थिति पर कितना भी विपरीत प्रभाव क्यों न पड़े !

अब हम इस बात पर आते हैं कि जो कानून वास्तव में बहुत लाभकारी हैं और जिनमें थोड़ा बहुत फेरबदल कर उन्हें और भी उपयोगी बनाया जा सकता है तो फिर बुराई कहां है ?  इन कानूनों के बेहतर होने के बावजूद ये किसानों के लिए हितकारी क्यों नहीं हैं और वह इन्हें मानने से संकोच क्यों कर रहा है, जब तक इसका विश्लेषण नहीं होगा तब तक इस समस्या का कोई ऐसा समाधान निकलना असंभव है जो सबको मंजूर हो !

कानून नहीं, मूलभूत ढांचा चाहिए

इन कानूनों की सबसे बड़ी कमी यह है कि यह वक्त के मुताबिक नहीं हैं अर्थात अभी इनके अमल में लाए जाने का सही समय नहीं है। इसका अर्थ यह है कि जब तक कृषि क्षेत्र में ऐसा इन्फ्रास्ट्रक्चर यानी कि सुविधाएं नहीं होंगी जिनके भरोसे किसान यह सोच सके कि अगर कल कोई खतरा आ जाए, कुछ ऊंच नीच हो जाए तो उसकी कमर न टूट जाए, वह बर्बाद न हो जाए और ज़रा सा भी नुकसान न सह पाने की दशा में उसे आत्महत्या जैसा कदम न उठाना पड़ जाए।

यदि सरकार चाहती है कि किसान इन कानूनों को स्वीकार करें तो सबसे पहले उसे पूरे कृषि क्षेत्र में उन ज़रूरी सुविधाओं का प्रबंध करने की दूरदर्शी योजना बनानी होगी जिससे किसानों का आत्मविश्वास बढ़े और वे आर्थिक रूप से अपने को इतना सक्षम बना लें कि किसी भी अनहोनी का मुकाबला कर सकें।

इन उपायों में सबसे पहले उसके लिए सिंचाई, बिजली, बीज, उर्वरक और कीटनाशक का प्रबंध सुलभ और सस्ते दाम पर करने की ऐसी व्यवस्था करनी होगी जिसमें उसे इन चीजों के लिए किसी से ऋण न लेना पड़े।

इसके बाद उसकी उपज के भंडारण का इंतज़ाम निशुल्क करना होगा और उसके घर या खेत के आसपास ही फ़सल की बिक्री होने की व्यवस्था करनी होगी, चाहे इसके लिए मंडी को ही उसके घर तक क्यों न ले जाना पड़े। इससे उन कुछ लोगों का नुकसान हो सकता है जिनका वर्तमान मंडी व्यवस्था पर दबदबा है और जिनके पास अपने वेयरहाउस हैं तथा उनके निहित स्वार्थ इससे जुड़े हैं।  यह उनकी आमदनी का एक प्रमुख साधन भी है और मंडी के संचालन में हिस्सेदार होने से राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक लाभ मिलते हैं। उनके लिए नई व्यवस्था का विरोध करना स्वाभाविक है लेकिन यदि सरकार ठान ले और इन धनवान तथा ताकतवर किसानों का सहयोग हासिल कर ले  तो यह संभव है।

ध्यान रहे मूलभूत ढांचा अर्थात इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का काम सरकार को सरकारी उपक्रमों और विभागों के माध्यम से करना होगा जो कि सरकार के पास अपने एक विशाल तंत्र के रूप में मौजूद है। अगर यह निजी क्षेत्र को दे दिया तो किसान का शोषण होना निश्चित है क्योंकि पैसे वाला व्यापारी बिना मुनाफे के कोई काम नहीं करता।

इसके बाद सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य के स्थान पर ऊपज के लाभकारी मूल्य तय करने की नीति बनाए जिससे ज्यादा भाव पर बिक्री तो हो सके लेकिन उससे कम पर नहीं चाहे खरीददार सरकार हो या अन्य कोई भी हो।

वक्त के मुताबिक क्या सही है

देखा जाए तो वैसे भी इस समय कानून लागू करने की बाध्यता नहीं है क्योंकि अदालत की रोक है, इसलिए इन्हें निरस्त करने में ही समझदारी है ।

किसान नेताओं और सरकार को एक बार फ़िर नए सिरे से बातचीत की तैयारी करनी होगी जिसमें केवल इस विषय पर चर्चा और निर्णय हो कि देश भर के किसानों के लिए उनकी ज़रूरत के मुताबिक पूरा मूलभूत ढांचा किस तरह तैयार हो और इसके तैयार होने की समय सीमा तय कर दी जाए।  जब यह हो जायेगा तो किसान का आत्मबल और विश्वास मज़बूत होगा। उसके बाद यही कानून लागू कर दिए जाएं, तब किसी के लिए भी इनका विरोध करने की गुंजाइश नहीं होगी।

शनिवार, 12 जून 2021

लक्षद्वीप का कायाकल्प और प्राकृतिक सौंदर्य को खतरा

 


हमारे देश में जितने भी पर्यटन स्थल हैं, वे अधिकतर ऐतिहासिक, पौराणिक और सांस्कृतिक हैं। इनमें विशाल किले, राजा महाराजा, नबाब, बादशाह और शहंशाओं द्वारा बनवाए गए अनेक स्थल सदियों से आकर्षण का केंद्र रहे हैं। इसी तरह धार्मिक स्थल हैं जो पूरे देश में आस्था के प्रतीक और प्राचीन वास्तुकला के अद्वितीय भंडार हैं। इनका सौंदर्य अनूठा, अलौकिक और अद्भुत है।

इसके अतिरिक्त प्राकृतिक सौंदर्य के प्रतीक अनेक स्थल हैं जो अपनी विविधता के लिए प्रसिद्ध हैं।

ऐसे ही स्थलों में अरब सागर में स्थित लक्षद्वीप है जो अपनी प्राकृतिक संपदा के लिए विख्यात है। अभी तक यह क्षेत्र सैलानियों के लिए एक तरह से प्रतिबंधित रहा है। सरकार अब इसे भी देसी और विदेशी पर्यटकों के लिए खोलना चाहती है। इसका विरोध भी हो रहा है और इसे पर्यावरण संरक्षण में बाधक कहकर अनेक राजनीतिक और सामाजिक कार्यों से जुड़े लोगों द्वारा अनावश्यक बताया जा रहा है।

लक्षद्वीप अनूठा द्वीप समूह

फरवरी 2019 में विज्ञान प्रसार के लिए एक फिल्म बनाने के लिए लक्षद्वीप जाना हुआ। इस फिल्म का विषय था कि समुद्र के पानी से ऊर्जा अर्थात बिजली का उत्पादन करने में हमारी विज्ञान प्रयोगशालाओं ने जो प्रयास किए हैं और उनके फलस्वरूप जो उपलब्धियां हासिल की हैं उन्हें इंडिया साइंस चैनल के माध्यम से दर्शकों को अवगत कराना। फिल्म निर्माण के समय इस क्षेत्र के सौंदर्य को निहारने और इसकी विशेषताओं से परिचित होने का भी यह अवसर था।

सबसे पहले इस अनूठे क्षेत्र के प्राकृतिक सौंदर्य की बात करते हैं। 32 वर्ग किलोमीटर में फैले लक्षद्वीप में 36 स्थल हैं। इनमें 27 द्वीप हैं जिनमें से दस में आबादी है और 17 में कोई नहीं रहता। तीन रीफ हैं जो पर्यावरण की दृष्टि से अनमोल धरोहर हैं छः सैंड बैंक हैं जिनका भी इकोसिस्टम की दृष्टि से बहुत महत्व है।

लगभग 70 हजार की जनसंख्या वाले इस केंद्रशासित प्रदेश में कुछ इलाके ऐसे हैं जहां केवल दस लोग रहते हैं। यह पूरा अनुसूचित जनजाति क्षेत्र है और यहां की आबादी 9प्रतिशत मुस्लिम है। शेष तीन प्रतिशत में अधिकतर प्रशासनिक, सैन्य तथा अन्य सरकारी सेवाओं के लोग हैं।

स्थानीय आबादी हालांकि एक ही धर्म से संबंधित है लेकिन उनका व्यवहार इतना धर्म निर्पेक्ष है कि वहां बाहर से आने वाले व्यक्ति को लगता है कि उसमें और इनमें कोई अंतर नहीं है। स्वागत सत्कार, बातचीत से उनके मिलनसार होने का आभास इस धरती पर कदम रखते ही हो जाता है। हर तरह से मदद करने और किसी भी प्रकार की अपेक्षा न रखने की प्रवृति यहां स्थानीय आबादी में इतनी है कि अगर किसी को कहीं रहने की सुविधा न मिले तो उसे यह अपने घर ठहराने तक में कोई असुविधा महसूस नहीं करते और उसकी सुख सुविधा का  ध्यान रखने में कोई कमी नहीं रखते।

राजधानी कवारत्ती में अधिकतर सरकारी कार्यालय हैं और पूरे क्षेत्र का प्रशासन यहीं से चलता है। रहने के लिए जो भी होटल या गेस्ट हाउस हैं वे सरकारी हैं और यहां आने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना होता है कि इनमें रहने के लिए जगह उपलब्ध है और बुकिंग करा ली गई है। कई बार तो इसके लिए कई सप्ताह इंतजार करना पड़ सकता है क्योंकि बहुत सीमित मात्रा में निवास की सुविधाएं हैं।

बिजली और पानी

यह पूरा क्षेत्र जेनरेटर द्वारा उत्पन्न बिजली से चैबीसों घंटे प्रकाश प्राप्त करता है। इसके लिए डीजल समुद्र के रास्ते आता है और काफी खर्चीला है। सोलर एनर्जी से भी बिजली की आपूर्ति होती है लेकिन अभी इस दिशा में ज्यादा प्रगति नहीं हुई। हालांकि सौर ऊर्जा से डीजल से होने वाले प्रदूषण से बचा जा सकता है लेकिन इस दिशा में ज्यादा प्रगति न होने से आश्चर्य होता है कि सूरज महाराज की कृपा का लाभ उठाने से यह क्षेत्र वंचित क्यों है जबकि उनकी तरफ से धूप प्रदान करने में कोई कमी नहीं है ?

समुद्र के पानी से ऊर्जा प्राप्त करने का काम अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में है और उसमें बहुत समय लगने वाला है इसलिए सोलर एनर्जी ही वर्तमान में एकमात्र विकल्प है। यदि इस क्षेत्र का विकास करना है और पर्यटन की सुविधाएं प्रदान करनी हैं तो सबसे पहने ऊर्जा का प्रबंध करना होगा और सोलर तथा पवन ऊर्जा पर आधारित योजनाओं को लागू करना होगा।

यह प्लांट सन 2004 में चेन्नई स्थित एन आई ओ टी नामक वैज्ञानिक संस्थान द्वारा लगाया गया था। इस प्लांट से समुद्र के खारे पानी को मीठे पानी में बदला जाता है। आधुनिक विज्ञान और भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा इस तरह के प्लांट अधिक मात्रा में स्थापित किए जाने से ही पीने के पानी की व्यवस्था हो सकती है।

जहां तक पानी का संबंध है तो अभी भी यहां सब जगह खारा पानी ही उपलब्ध है। पीने का पानी बहुत सीमित मात्रा में उपलब्ध है। यह या तो बोतलबंद बाहर से आता है या फिर डीसैलिनेशन प्लांट से नलों के जरिए प्राप्त होता है। यह नल जगह जगह लगे हुए हैं जहां से पानी भरकर घरों तक लाया जाता है।

अगर इस क्षेत्र का विकास करना है और उसे पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करना है तो सब से पहले बिजली और पानी की समुचित व्यवस्था करनी होगी। वैसे भी यह दोनों स्थानीय आबादी की भी मूलभूत आवश्यकताएं हैं जिनकी पूर्ति किए बिना लक्षद्वीप के शहर कवारत्ती को स्मार्ट सिटी का आकार देना संभव नहीं है।

लक्षद्वीप के पर्यटन की दृष्टि से जो द्वीप विकसित किए जा सकते हैं उनमें बंगाराम पहले से ही सैलानियों का पसंदीदा स्थल है। जिन अन्य द्वीपों पर आबादी है उनका विकास जीवन के लिए आवश्यक सुविधाओं का प्रबंध करने से ही होगा। इनमें स्कूल, शौचालय, अस्पताल प्रमुख हैं।

नई प्रशासनिक घोषणा से बीफ को प्रतिबंधित करने और उसके स्थान पर मछली और अंडों का सेवन करने पर जोर देना कहीं से भी उचित नहीं है। बीफ का प्रचलन रोकने से स्थानीय आबादी के रोष का कारण बनना ठीक नहीं। यदि गौ रक्षा ही उद्देश्य है तो उसके लिए अलग से व्यवस्था की जानी चाहिए न कि ऐसा काम किया जाए जिससे विरोध की लहर पैदा हो।

अल्कोहल की अनुमति देना भी तर्कसंगत नहीं क्योंकि अभी तक यह क्षेत्र इस व्यसन से अपरिचित रहा है। पर्यटकों का स्वागत अल्कोहल के स्थान पर किसी अन्य भारतीय पेय पदार्थ से किया जा सकता है। इससे न केवल विदेशियों को एक भारतीय पेय का स्वाद मिलेगा बल्कि वे उसे अपने साथ भी ले जाना पसंद करेंगे।

जहां तक कानून व्यवस्था की बात है, यह प्रदेश अभी तक अपराध से लगभग अछूता है। यहां चोरी, डकैती, लूटपाट जैसी घटनाएं लगभग न के बराबर होती हैं। जनसंख्या एक दूसरे के साथ सहयोग करने और आपसी विश्वास को जीवनचर्या का अंग मानती है।

पंचायत चुनावों में भाग लेने के लिए दो बच्चों की सीमा बना देना न केवल हास्यास्पद है बल्कि गैरकानूनी भी है क्योंकि अभी तक संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।

लक्षद्वीप के प्राकृतिक सौंदर्य की बात ही निराली है। यहां समुद्र तट पर टहलना, बीच पर बैठकर पुरुषों और महिलाओं का ग्रुप बनाकर समय बिताना और अठखेलियां करती लहरों के उठने गिरने का आनंद लेना सुखद अनुभव है।

रीफ, कोरल और समुद्री वनस्पति तथा जीव अपनी प्राकृतिक छटा से मन मोह लेते हैं। समुद्र तट साफ सुथरे, स्वच्छ हैं और कूड़े कचरे से गंदे नहीं होते क्योंकि इस मामले में प्रशासन बहुत सख्त है। वैसे भी खाने पीने की दुकानें इन जगहों पर कम ही हैं इसलिए गंदगी भी नहीं है।

विकास की राजनीति

लक्षद्वीप का विकास करने के नाम पर कहीं कोई राजनीतिक एजेंडा तो नहीं, यह संशय उठना स्वाभाविक है। यहां जरूरत इस बात की है कि आवागमन के साधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कराए जाएं। इनमे सड़क बनाना प्रमुख है। एक द्वीप से दूसरे द्वीप तक जाने की अभी कोई बढ़िया व्यवस्था नहीं है। इसका भी पर्याप्त प्रबंध करना होगा।

यहां बरसात का पानी जमा करने का कोई साधन नहीं है और वह जितना जमीन में समा सकता है, ग्राउंड वाटर के रूप में जमा हो जाता है, बाकी बहकर समुद्र में चला जाता है। पहले जब आबादी कम थी तो इस ग्राउंड वाटर का इस्तेमाल पीने के पानी के रूप में हो जाता था। यहां का सीवेज सिस्टम बहुत पुराना होने से जंग खा कर बेकार हो जाने से ग्राउंड वाटर के साथ मिल गया। नतीजा प्रदूषित जल के रूप में हुआ और उसके पीने से अनेक बीमारियों को न्योता मिल गया। अब ग्राउंड वाटर का इस्तेमाल केवल धुलाई सफाई करने जैसे कामों के लिए होता है।

विकास करना ही अगर उद्देश्य है तो सबसे पहले इस क्षेत्र की मूलभूत आवश्यकताओं को ही पूरा कर लें तो काफी होगा। यह क्षेत्र पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने के लिए बहुत अधिक उपयुक्त नहीं है, इस बात को समझकर नए सिरे से यहीं रहकर स्थानीय लोगों को साथ लेकर विकास योजनाओं को बनाकर अमल में लाने से ही इस क्षेत्र का भला हो सकता है।

भारत

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

पांच तत्व और नौ रस जीवन का आधार और मूलमंत्र है।


मनोरंजन और ज्ञान के अनेक साधनों में साहित्य, संगीत, नृत्य, नाटक, रेडियो तथा सिनेमा और अब ओटीटी प्लेटफॉर्म अपनी भूमिका निभा रहे हैं। इसी कड़ी में एक नया और अनूठा प्रयोग नाट्य शास्त्र के आधार नौ रसों को लेकर किया गया है जिसमें नाटक की विधा को केंद्र में रखते हुए दर्शकों को वह सब कुछ दिखाया जायेगा जिसके लिए उन्हें किसी थिएटर में जाना पड़ता था। सिनेमा और नाटक संसार में अपनी विशिष्ट अदायगी के लिए प्रसिद्ध श्रेयस तलपडे ने इसकी शुरुआत की है। उनका प्रयास है कि इस प्लेटफार्म के माध्यम से देखने वालों को वही एहसास कराया जाए जो किसी नाटक को ऑडिटोरियम में देखने से होता है।

नौ रसों को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि सृष्टि का निर्माण करते समय किन चीजों का प्रयोग हुआ ताकि बिना किसी रुकावट के जीवन का चक्का चलता रहे और जितना भी समय किसी भी जीव को इस संसार में विचरण करने के लिए मिला, वह व्यतीत होकर जब समय समाप्त होने की घोषणा सुनाई दे तो निर्विकार भाव से इस संसार से अलविदा कह दिया जाए।

पांच तत्व से बुनी चदरिया

हमारा यह ब्रह्मांड और शरीर पांच तत्वों अर्थात पृथ्वी, आकाश, जल, वायु और अग्नि पर आधारित माना गया है। इन्हीं से दुनिया चलती है और आत्मा के जरिए विभिन्न प्राणियों या योनियों के रूप में जीव संसार में घूमता फिरता रहता है। मानव देह के अतिरिक्त धरती, आसमान और नदियों तथा समुद्रों में अपनी प्रकृति और उपयोगिता के अनुसार सभी प्रकार के जीव जंतु, पक्षी आदि सृष्टि के आरंभ से कुदरत के साथ तालमेल बिठाते हुए जिंदगी को जीने लायक बनाते आए हैं। वसुधैव कुटुंबकम् की नींव भी यही है।

यह तो हुई भौतिक या शारीरिक गतिविधियों को संचालित करने की प्रक्रिया लेकिन शरीर में एक और तत्व है जो किसी दूसरे जीव को उपलब्ध नहीं है, वह है हमारा मन या दिमाग जिससे हमारी  मानसिक गतिविधियों का संचालन होता है। हम क्या सोचते हैं, क्या और कैसे करते हैं, यह सब पहले हमारे मस्तिष्क में जन्म लेता है और हमारे शरीर के विभिन्न अंग उसी के अनुरूप आचरण करने लगते हैं।

सबसे पहले पृथ्वी को ही लें जिसे ठोस माना गया गया है। विधाता ने हमारे शरीर की बनावट भी उसी की भांति ठोस या मजबूत रखी ताकि पृथ्वी की तरह वह सभी प्रकार के प्रहार और तनाव  सब कुछ झेल सके। इसके बाद जल को जीवन का स्रोत अर्थात जीवनदायी माना गया है और इसीलिए इसे संभाल कर रखने तथा इसका संरक्षण करने पर जोर दिया जाता है। वायु हमारे जागरूक रहने और हमेशा चलते रहने का संकेत है। हवा अदृश्य होकर भी जीवन में खुशियां और मन में उल्लास भरने का काम करती है। ठंडक और ताजगी का एहसास होता है और सांस के जरिए शरीर को शक्ति मिलती रहती है। अग्नि को ऊर्जा और प्रकाश का स्रोत माना गया है जिसका असर सीधा हमारी बुद्धि पर पड़ता है। हमारे शरीर को  जितनी ऊर्जा मिलती रहेगी वह उतना ही क्रियाशील और प्रकाश से भरा रहता है ।

आकाश तो है ही सब से ऊपर और सभी तत्वों को एक छत्र की तरह छाया प्रदान करता है। जब भी शरीर विचलित होता है और मन में कोई कुंठा होती है तो आकाश को ही अपना दुःख दर्द सुनाने का मन करता है। दिन में नीला आसमान और रात में चांद सितारों से भरा यह तत्व हमें सुकून देने के साथ साथ हालात में बदलाव होने का भरोसा भी देता है। कभी रात का अंधकार और फिर दिन का उजाला यही कहता है कि परिवर्तन ही संसार का प्रमुख नियम है और इससे कोई अछूता नहीं इसलिए बदलाव को स्वीकार करते रहने में ही जीवन का सुख है।

पांच तत्वों से बने शरीर का निर्माण करते समय निर्माता ने आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा के रूप में हमें इंद्रियों का ऐसा अनमोल खजाना दिया जिससे हम सभी तरह की अनुभूति प्राप्त करते हैं और इनके जरिए स्वाद तथा गंध का अनुभव करते हैं। इसके भी अनेक रूप हैं जैसे कि कड़वा, खट्टा, मीठा, नमकीन, तीखा और कसैला। इनसे ही शास्त्रों में बताए गए नौ रसों का निर्माण होता है। ये रस जीवन में संतुलन बनाए रखने का काम करते हैं। गड़बड़ तब ही होती है जब अपने मन के वश में आकर इन रसों का बैलेंस बिगड़ जाता है।

रस बिना जीवन नहीं

श्रृंगार को रसराज कहा गया है। यह मनुष्य की कोमल भावनाओं को सहलाने का काम करता है, उसे प्रेम करने के लिए प्रेरित करता है और सौंदर्य को सराहने की योग्यता प्रदान करता है।

श्रृंगार रस जहां सुंदरता का प्रतीक है, वहां यदि इसमें क्रोध का समावेश हो जाए तो यह वीभत्स बन जाता है और हमारे मन में नफरत पैदा करने का काम करता है। जब नफरत बढ़ जाती है तो फिर मनुष्य के अंदर जो भाव पैदा होता है वह रौद्र रुप धारण कर लेता है जिसके वश में हो जाने से अच्छे बुरे का भेद करना कठिन हो जाता है।

रौद्र रस के समानांतर वीर रस को रखा गया है जो इस बात का प्रतीक है कि अगर हमें अपनी शक्ति  अर्थात वीरता का प्रदर्शन करना है तो उसे किसी अन्य के साथ हो रहे अन्याय और अत्याचार के खिलाफ दिखाया जाए। यह रस बताता है कि वीर होने का अर्थ यह नहीं कि किसी को अपने अधीन किया जाय बल्कि यह है कि यदि कोई दबा, कुचला, दीन हीन है तो उसकी रक्षा इस प्रकार की जाए कि जो निर्मम, कठोर और अत्याचारी है वह अपने आतंक से भयभीत न कर सके।

इन चार प्रमुख रसों, श्रृंगार, वीर, रौद्र और वीभत्स के अतिरिक्त अन्य पांच रस भी जीवन में सही मात्रा में होने जरूरी हैं। उदाहरण के लिए करुणा का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति हरदम रोता रहे, उदासी को अपने से अलग होने ही न दे और हमेशा दूसरों की दया का पात्र होने में ही अपना भला समझे। इसके विपरीत करुण रस का मतलब किसी के प्रति अपने लगाव के समाप्त होने पर जीवन को फिर से समान भाव से ग्रहण करना है न कि उसके बिछड़ने को जीवन का अंत मान लेना है।

हंसना हंसाना, डरना डराना और किसी अनोखी वस्तु या घटना को देखकर आश्चर्य प्रकट करना भी हमारे मन के भावों के अनेक प्रतीक हैं।

पुस्तक पढ़ते, नाटक देखते, संगीत सुनते हुए हमारे मन में जो भाव आते हैं, वही अक्सर हम बाहर प्रकट करते हैं। यही भाव किसी भी कृति के अच्छे लगने या खराब महसूस करने के कारण हैं । निष्कर्ष यही है कि जो मन को भाए वही सुहाता है और जो अच्छा न लगे उसे त्याग देने से ही मन को शांति मिलती  है। यही शांत रस जीवन का अंतिम सत्य है।

उम्मीद है कि मनोरंजन के नाम पर सिनेमा, थियेटर, वेब सिरीज आदि के माध्यम से जो कुछ भी दर्शकों को परोसा जा रहा है, उससे अलग हटकर नौ रसों को प्रस्तुत करने का यह प्रयास कुछ नयापन लिए होगा और शायद उस कमी को पूरा करने में कामयाब हो जिसकी तलाश हमेशा दर्शकों को रहती है।  


शनिवार, 27 मार्च 2021

पुलिस और पब्लिक का रिश्ता क्या कहता है

यह देख और सुन कर अब कोई हैरानी नहीं होती कि जिन्हें हम अपना रक्षक समझते रहे, वे क्या से क्या हो गए, भक्षक बन गए और जनता उनके आगे हमेशा की तरह मूक बनी रही क्योंकि उसके पास नतमस्तक होने के अतिरिक्त और कोई विकल्प ही नहीं है। कहते हैं कि समरथ को न दोष गुसाईं तो जिसके हाथ में डंडे की ताकत है, वह कुछ भी कर सकता है, उसका न कोई कसूर पहले माना जाता था और न अब उसे कुसुरवार ठहराया जा सकता है।

इसमें आश्चर्यचकित होने जैसा कुछ नहीं है कि एक पुलिस अधिकारी सरेआम यह कहे कि राज्य के गृह मंत्री चाहते हैं कि उनके लिए सौ करोड़ की उगाही का लक्ष्य पूरा किया जाय वरना कहीं उन्हें अपनी शक्ति का इस्तेमाल न करना पड़ जाए ?

असल में क्या होता है कि कोई जब जड़ की बजाय पत्तों और टहनियों को साफ कर देने से समाज में बदलाव लाने की डींग हांकता है तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था में जहर घुल चुका है। इसे इस तरह से समझें कि कानून, संविधान और नियम जब अपनी मर्जी से तोड़े मरोड़े जाने लगें तब प्रजातांत्रिक मूल्यों का कोई मतलब नहीं रह जाता।

उगाही क्यों होती है ?

इसे समझने के लिए इतना ही काफी है कि अंग्रेजों के सन् 1861 के पुलिस कानून को रद्दी की टोकरी में फेंककर नया कानून बनाने के स्थान पर उसकी ही लीपा पोती कर दी गई क्योंकि उसमें पुलिस की भूमिका सेवक की नहीं मालिक की थी।  जनता उनकी गुलाम जिससे केवल वसूली ही की जा सकती थी और उस पर दबाव से लेकर सभी तरह के जुल्म कर सकने की आजादी होती थी ।

आजादी के बाद इसी व्यवस्था को अपनाने और इसका विस्तार करने का एक लाभ यह था कि  अपने राजनीतिक आकाओं को प्रसन्न रखा जा सकता था। उन्हें खुश रखना इसलिए जरूरी था क्योंकि पुलिस वालों के ट्रांसफर और पोस्टिंग का नियमों के खिलाफ होने पर भी उनका एकमात्र अधिकार नेताओं का था । उन के इस अधिकार को न तो चुनौती दी जा सकती थी और न ही उनके हुक्म को टालने की हिम्मत हो सकती थी। अगर किसी अधिकारी ने ऐसा करने का साहस दिखाया तो उसके बुरे दिनों की शुरुआत होने में कोई देर नहीं लगती।

आज भी अगर कोई थाने में जाता या बाहर आता दिख जाए या किसी के घर पुलिस वाला चाहे किसी व्यक्तिगत काम से ही क्यों न आया हो, उस व्यक्ति को शक की नजरों से देखा जाने लगता है कि कुछ तो गड़बड़ है तब ही थाने के चक्कर लग रहे हैं। इसका कारण केवल यह मानना है कि पुलिस की दोस्ती अच्छी नहीं और दुश्मनी हो जाए तो इज्जत, घर बार सब कुछ दांव पर लग सकता है।

जब इतना भय हो तो कौन सा दुकानदार, व्यापारी, उद्योगपति पुलिस की हफ्ता वसूली का विरोध कर बैठे बिठाए अपनी शामत बुलाने की गलती करेगा। कोई भी काम धंधा, रोजगार, व्यवसाय हो, यहां तक कि रेहड़ी पटरी से लेकर आटो रिक्शा, टैक्सी वाले हों, पुलिस का हिस्सा अपनी कमाई में से उसी तरह अलग रखते हैं जैसे कोई अपनी आमदनी का कुछ भाग ईश्वर के निमित्त अलग रखता हो !

सुधार का कारगर न होना

जहां तक पुलिस की कार्यशैली में सुधार करने की बात है तो एक रिटायर्ड पुलिस कमिश्नर का ही यह कहना है कि ये सब सुधार डस्टबिन में फेंक दिए जाने चाहिएं क्योंकि जब तक राजनीतिज्ञों के हाथ में ट्रांसफर और पोस्टिंग का अधिकार रहेगा तब तक पुलिस को कोई नहीं सुधार सकता। इसीलिए न्यायाधीशों तक ने अपनी अनेक टिप्पणियों में पुलिस को संगठित अपराधियों का गिरोह तक कहने में संकोच नहीं किया। एक बड़े प्रदेश के सत्ताधारी दल के मुखिया के परिवार से मंत्री बने एक नेताजी के मुंह से यह सुनकर कोई अचंभा नहीं हुआ कि जब तक एक करोड़ रुपया हर रोज उनकी तिजोरी में न पहुंचे उन्हें ठीक से नींद नहीं आती।

एक रिटायर्ड महिला पुलिस कमिश्नर ने एक मुलाकात में जब अपने मनोभाव को छिपाए बिना यह कहा कि नेताओं द्वारा उन्हें किसी खास मामले की जांच का काम अक्सर यह कहकर दिया जाता था कि आप एक ईमानदार अफसर हैं इसलिए आपको ही सौंप रहा हूं। उन्होंने आगे कहा कि नेताजी के इस वाक्य का अर्थ यह होता था कि यदि अपनी छवि को बरकरार रखना है तो मेरे हिसाब से रिपोर्ट बना दीजिएगा, कोई उंगली नहीं उठाएगा। यह कहते हुए इन महिला के चेहरे पर के भावों से साफ पता चल रहा था कि उन्हें छवि बनाए रखने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़े होंगे।

यदि कानून में खामियां नहीं होती तो देश की जेलों में बंद लोगों में दो तिहाई से ज्यादा अंडर ट्रायल नहीं होते। दशकों तक बिना किसी अपराध के जेलों में सड़ने वालों के आंकड़े कम नहीं हैं। बीसियों वर्ष जेल में बंद रहने के बाद अदालत द्वारा निर्दोष घोषित कर दिए जाने वालों की दास्तान कानून के माथे पर कलंक के सिवाय और क्या है, यही नहीं उनके भरे पूरे परिवार को नारकीय यातनाएं भोगने के लिए बेसहारा कर देने के पीछे व्यवस्था का षड्यंत्र ही तो है ?

ऐसा नहीं है कि पुलिस का केवल विद्रूप चेहरा ही ही है, सच्चाई यह भी है कि यदि पुलिस अधिकारी अपना संवेदनशील स्वरूप न दिखाते तो बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों का इस समाज में रहना ही दूभर हो जाता। यह एक तरह का विरोधाभास ही है कि पुलिस और जनता का रिश्ता कभी खुलकर सामने नहीं आ पाता क्योंकि उसमें बहुत से किंतु परंतु जुड़े रहते हैं। यह रिश्ता इतना नाजुक है कि जरा सी ठेस लगने पर टूटने के कगार पर पहुंच जाता है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि पुलिस में भर्ती का अर्थ अपनी ताकत का एहसास कराने से लेकर अतिरिक्त आमदनी का जरिया हाथ लगना मान लिया जाता है।

यही कारण है कि अधिकतर झगड़ों के सुलझने की शुरुआत आपस में ही सुलह करने से हो जाती है। यदि यही काम पुलिस अधिकारी कर ले अर्थात दोनों पक्षों को यह बताने की कोशिश करे कि उनका विवाद उतना बड़ा नहीं है जिसके लिए थाने कचहरी की जरूरत पड़े तो बहुत से झगड़े आगे बढ़ने से पहले ही सुलझ जाएं। अनेक रिटायर्ड पुलिस अधिकारियों से बातचीत का निष्कर्ष यही निकला कि उनकी भूमिका में यदि  राजनीतिक दखलंदाजी और ब्यूरोक्रेसी की अकड़ से मुक्ति मिल जाए तो हमारे देश की पुलिस व्यवस्था दुनिया में सब से बेहतरीन हो सकती है।

अगर इस बात को समझना है कि कोई पुलिस वाला उगाही क्यों करता है, रिश्वत क्यों लेता है और गैर कानूनी गतिविधियों की तरफ से नजर क्यों फेर लेता है तो इसका कारण उसकी कम तनख्वाह या नौकरी के घंटों का कोई हिसाब न होना नहीं है बल्कि यह है कि बड़े अफसरों की जी हुजूरी करना और अपनी ड्यूटी से अलग ऐसे सभी काम करना है जिसका उसके काम से कोई संबंध ही नहीं है। यह पूरी श्रृंखला है जिसकी पहली कड़ी सिपाही है और अंतिम सिरा नेताजी के हाथ में होता है।

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

तरक्की का उम्मीद सरकार से नहीं, अपने से होनी चाहिए

 

आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, अपनी सहायता स्वयं करना जैसे शब्द आज से नहीं सैंकड़ों वर्षों में जनमानस के कानों में पड़ते रहे हैं।  नेताओं का तो यह एक तरह से तकिया कलाम ही है जिसका इस्तेमाल वे अक्सर करते हैं, विशेषकर तब जब उन्हें किसी की मदद करने से बचना होता है। परिवार हो या समाज जब सब ओर से निराशा होने लगती है तब एक ही वाक्य काम आता है कि खुद ही कुछ करना होगा क्योंकि अपने मरे बिना स्वर्ग नहीं पहुंचा जा सकता

बहकावे का खेल

सामान्य नागरिक को बहकाए रखने, उसे छलने, उसके साथ कपट करने से लेकर आसमान के तारे तोड़कर उसकी झोली में डाल देने के वायदे तक करना नेताओं और उनसे बनी सरकारों का  प्रतिदिन का काम है। स्पष्ट नीतियों और दृढ़ तथा सुनिश्चित  विचारधारा के अभाव और योजनाओं पर अमल करने की अयोग्यता के कारण जब किसी सरकार  के काम की आलोचना होती है तो उसका नतीजा एक से एक शानदार बहाने बना कर लोगों को भरमाए रखने के अंतहीन सिलसिले के रूप में शुरू हो जाता है।

उदाहरण के लिए जब मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक गरीबी न मिटने के लिए यह कहते हैं कि ये जो रोहिंग्या आबादी हमारे देश में घुस आई है, वह इसके लिए जिम्मेदार है, जबकि हकीकत यह है कि वे केवल कुछेक लाख होंगे और देश एक सौ तीस करोड़ का है जिसमें वे समुद्र की एक बूंद की तरह हैं। लोगों के मन में यह बात भी भरी जाती है कि  पिछली सरकारों के निकम्मे होने के कारण  अब हमें ही सब कुछ शुरू से करना पड़ रहा है, इसलिए वक्त तो लगेगा ही। विपक्ष भी यह दोहराता रहता है कि ये सरकार तो बस दो चार पूंजीपतियों को ही मालामाल करने में लगी है और हमारे हाथ में सत्ता आते ही सारी परेशानियां चुटकी भर में दूर हो जाएंगी।

इस तरह के छलावे करना राजनीतिज्ञों  के लिए ती सही हो सकता है लेकिन जब यही नजरिया  समाज और परिवार में अपनी जड़ें जमाने लगता है तो अपने पर से विश्वास उठने लगता है, व्यक्ति असहाय महसूस करते हुए अपनी सोच को कुंद कर लेता है, अपने पौरुष पर शंका करने लगता है और हालात से समझौता करने के अलावा उसे कोई रास्ता नहीं सूझता ।

अपने पर विश्वास कैसे हो

इसे समझने के लिए एक घटना का जिक्र करता हूं। बहुत साल पहले चलो गांव की ओर कार्यक्रम का निर्माण करता था जो देश की सभी भाषाओं में आकाशवाणी से प्रसारित होता था। एक तेलुगु महिला का पत्र आया कि वह अपने चार बच्चों के साथ आत्महत्या करने जा रही थी और एक दुकान के पास  कुछ देर आराम करने के लिए रुक गई। दुकान में रेडियो से यह प्रोग्राम सुनने लगी जिसका असर यह हुआ कि सोचने लगी कि मैं आत्महत्या क्यों कर रही हूं ?

इस कार्यक्रम में मुख्य भूमिका में नट और नटी अपने अभिनय से औरतों द्वारा अपनी मदद खुद करने की बात कहते हुए गांव के सरपंच या ब्लॉक डेवलपमेंट अधिकारी के पास जाने को कह रहे थे। इस महिला ने पत्र में इसका जिक्र करते हुए लिखा कि वह पंचायत में गई जिसकी सरपंच महिला थी और अपनी आपबीती सुनाई तो सरपंच ने डांट कर कहा कि मरने से तुझे और तेरे बच्चों को क्या मिलेगा ?

उसके बाद उसे गांव में सरपंच के बनाए महिला स्वयं सहायता समूह से बिना ब्याज कुछ रुपए मिले जिससे भूख मिटी और जो काम उसे आता था उसे करने के साधन मिले जिससे वह आज अपने पैरों पर खड़ी है और यह चिट्ठी लिख रही है।

अगर इस घटना को बड़ा कर के देखा जाए तो यह देश के हरेक उस नागरिक का भला कर सकती है जो भूख, गरीबी, बेरोजगारी से जूझ रहा है। इसका मतलब यह है कि अगर सामान्य नागरिक के मन में अपने सहयोगी, कर्मचारी, सेवक या फिर पड़ौसी के किसी दुःख का पता चलने पर उसकी दिक्कत दूर करने का भाव पैदा हो जाए और वह अपनी हैसियत के अनुसार मदद कर दे तो यह किसी क्रांति से कम नहीं होगा।

ऐसी ही एक और घटना है जो बाल मजदूरों और बेसहारा भीख मांगते बच्चों और मजबूरी में किसी के आगे हाथ फैलाते लोगों से जुड़ी है। आम तौर से सरकार का व्यवहार इन्हें पकड़कर किसी आश्रम या अनाथालय या जेल जैसे सुधार घर में डाल दिए जाने का होता है।

कुछेक संवेदनशील लोगों जैसे कि बचपन बचाओ आंदोलन के प्रवर्तक कहे जाने वाले कैलाश सत्यार्थी ने बाल मजदूरों और भीख मांगते बच्चों को बिना किसी सरकारी सहायता या हस्तक्षेप के उनकी प्रतिभा के अनुसार उन्हें शिक्षित करने और उनके हुनर को पहचान कर प्रशिक्षित करने का इंतजाम किया तो अनेक परिवारों की पीढ़ियों तक का भला हो गया।

इसी तरह दुनिया की सबसे धनी महिलाओं में से एक मेलिंडा गेट्स ने भारत में उन दूर दराज के इलाकों की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का काम करना शुरू किया जिन तक पहुंचना किसी भी सरकार की प्राथमिकता नहीं थी।

परिवार सीमित रखने के लिए गर्भ निरोधक, गर्भवती महिलाओं के सुरक्षित प्रसव और शिशुओं को बाल मृत्यु से बचाने के लिए उनके पोषण का प्रबंध और प्रसव के बाद माता की सेहत बनाए रखने की व्यवस्था की। इसी के साथ उन्हें अपने परिवार का खर्चा चलाने के लिए आर्थिक मदद और उससे भी अधिक उनमें स्वाभिमान तथा आत्मविश्वास की पूर्ति की ताकि वे अपने आसपास ही अपना कुछ रोजगार कर सकें।

हमारे देश में ऐसे बहुत से व्यक्ति हैं जो बिना किसी उम्मीद के आसपास रहने वालों की यथा संभव मदद करते रहते हैं जिसे न वे याद रखते हैं और न ही उस व्यक्ति को जताते हैं जिसके प्रति उन्होंने कुछ किया था।

आदत सी बन जाए

असल में यह एक ऐसी प्रवृत्ति है जो जीना सिखाती है और अगर धार्मिक अंदाज में कहें तो इसे पुण्य कमाना या अपना परलोक सुधारना कह सकते हैं। बिना किसी प्रकार की अपेक्षा रखते हुए अपनी संतान और पूरे परिवार के लिए यदि कोई व्यक्ति कुछ करता है तो यह अनजाने में अपनी ही मदद हो जाती है जिसका परिणाम मानसिक तनाव से मुक्ति और एक प्रकार का सुखद अहसास होने जैसा होता है। इसे न तो शब्दों में कहा जा सकता है और न ही इसकी व्याख्या की जा सकती है।

व्यापार की दुनिया, विशेषकर विज्ञापन के व्यवसाय में यह कहा जाता है कि यदि आप अपने क्लाइंट अर्थात उपभोक्ता की भलाई को सबसे प्रमुख रखकर काम करेंगे तो आपका अपना भला स्वयं हो जाएगा। मतलब आपको इस मानसिक द्वंद का सामना नहीं करना पड़ेगा कि अगर मुझे घाटा हो गया तो मैं बर्बाद हो जाऊंगा !

इसके विपरीत सोच यह बनेगी कि मैंने अपनी ओर से ईमानदारी से पूरी कोशिश की लेकिन अगर परिणाम अपने मन के मुताबिक नहीं निकले तो इसका मतलब यह है कि कहीं कुछ कमी थी जिसे दूर कर फिर से कोशिश की जाय तो कामयाबी मिलना कोई बड़ी बात नहीं है। इसके मूल में केवल यही भावना रहती है कि मैं जो कर रहा हूं उससे किसी का नुकसान न होकर उसका फायदा ही होगा। अगर यह सोच बन जाए तो व्यक्ति बहुत से ऐसे काम करने से बच सकता है जो समाज के लिए नुकसानदायक हैं जैसे कि कम तोलना, खाने पीने की चीजों में मिलावट करना या किसी दूसरे के घायल होने पर  सहायता करने की जगह बच कर निकल जाना अथवा किसी को दुःखी देखकर उसमें अपने लिए खुशी ढूंढना।

इस सब का निष्कर्ष यही है कि जब तक व्यक्ति को अपनी मदद स्वयं करना नहीं आयेगा तब तक वह दूसरों का मुंह ताकता रहेगा और आत्मनिर्भर बनना दूर, अपना आत्मविश्वास भी खो बैठेगा। 

शुक्रवार, 12 मार्च 2021

अहंकार से जन्मा क्रोध जीवन के सभी रसों का नाश कर देता है

 


जहां एक ओर शरीर पंच तत्वों से बना है वहां हमारा मन और हृदय अनेक भावों के वशीभूत होकर संचालित होता है। बुद्धि और विवेक से जुड़े ये भाव हमसे अपने स्वरूप के अनुसार निर्णय कराते हैं और शरीर को उनके अच्छे या बुरे परिणाम झेलने पड़ते हैं।

ये सभी भाव विभिन्न रसों के रूप में हमारे मस्तिष्क, विचार और व्यवहार को नियंत्रित करते हैं और प्रेरक भी बनते हैं। हमारे शास्त्रों में इनका वर्णन श्रृंगार, करुणा, हास्य, वीर, अद्भुत, रौद्र, भय, वीभत्स और शांत के रूप में किया गया है।  जिस प्रकार रक्त का प्रवाह मनुष्य को जीवित रखता है, उसी प्रकार इन रसों का संचरण हमारे चित्त को प्रसन्न, सुखी या दुखमय बनाता है।

जीवन के रस और रंग

हमारा जीवन जब तक अनेक रसों से सराबोर रहता है तब तक हमें उनका आनंद मिलता है। सबसे श्रेष्ठ कहे गए रस श्रृंगार में सुंदरता की झलक तन और मन को प्रफुल्लित बनाए रखती है लेकिन जब इसका अभिमान हो जाय तो नतीजा कुरूपता में भी निकल सकता है।

जीवन में जब तक अपने और दूसरों के प्रति करुणा का भाव रहता है तब तक मन में सेवा का भाव बना रहता है लेकिन जैसे ही दया का भाव उसमें मिल जाता है, उससे उत्पन्न घमंड सभी किए कराए पर पानी फेर देता है।

हास्य रस अर्थात स्वयं को हंसी खुशी रखने और दूसरों को अपनी उपस्थिति से आनंद का अनुभव कराने का नाम है। लेकिन जब इसका स्वरूप किसी की पीड़ा पर मुस्कराने और मजा लेने का हो जाए तो इसका असर दूसरों का अपने प्रति नफरत का हो जाता है। जो व्यक्ति हंसता नहीं, वह हीन भावना का शिकार होकर अपने आप को ही दंड देता रहता है और उसकी हालत इतनी खराब हो जाती है कि उसके इलाज के लिए किसी मनोचिकित्सक की जरूरत पड़ सकती है।

वीरता अपने आप में श्रेष्ठ और सम्मान योग्य है और कहा भी गया है कि वीर ही पृथ्वी के सभी सुखों का उपभोग करते हैं। लेकिन यही वीरता जब किसी कमजोर को दबाने में इस्तेमाल की जाती है तो इसका स्वरूप आताताई का हो जाता है। ऐसे व्यक्ति अपने लिए केवल घृणा का ही वातावरण छोड़ जाते हैं और कोई भी उन्हें आदरपूर्वक याद नहीं करता।

संसार में बहुत सी अदभुत वस्तुएं हैं और बहुत सी चीजों के अस्तित्व की प्रक्रिया तक समझ नहीं आती। इन्हें कुदरत का करिश्मा कहकर संतोष कर लेते हैं। मनुष्य का स्वभाव इनसे छेड़छाड़ करने का हो तो इनका प्रकोप किसी विनाश लीला से कम नहीं होता। पर्वत, वन, नदी जल प्रवाह और इनसे निर्मित अनेक आश्चर्य हमारा मन मुग्ध करने के लिए पर्याप्त हैं लेकिन जैसे ही मानव अपने स्वभाव के अनुसार इन पर अपना नियंत्रण करने की कोशिश करता है तो विनाश को ही जन्म देता है।

इसी प्रकार रौद्र रस है जो क्रोध में बदल जाय तो सब कुछ भस्म करने के लिए पर्याप्त है। भय का संचार जहां संसार में निर्भय होकर जीने का संकेत देता है, वहां इसका विकृत रूप आतंक का पर्याय बन जाता है।

सब से अंत में शांत रस आता है जो अगर मिल जाए तो जीवन धन्य हो जाता है। मनुष्य को जीवन का अर्थ और इसका मूल्य समझ में आ जाता है। अपने से किसी का अहित न हो और कोई मेरा नुकसान न कर सके, यह जब समझ में आने लगता है तब ही व्यक्ति, परिवार, समाज,  देश और संसार जीवंत हो पाता है, जीने लायक बन पाता है । अहंकार के स्थान पर गर्व की अनुभूति होती है तथा वसुधैव कुटुंबकम् की भावना का जन्म होता है। 

मार्च का महीना वसंत ऋतु के आने का प्रतीक है जिसे ऋतुराज भी कहा जाता है । यह मनुष्य की कोमल भावनाओं का प्रतीक है। प्रकृति भी इन दिनों करवट लेती है और हरियाली तथा खुशहाली अपनी निराली छटा बिखेरती है जिससे मन और शरीर को सुकून और आराम का एहसास होता है। इसी कारण वर्ष में इस माह का सबसे अधिक महत्व माना गया है।

हमारे जीवन में सभी रस तरह तरह के रंग भरते हैं और हम उनसे सराबोर होकर अपनी दिनचर्या तय करते हैं। जिंदगी जीने लायक बनती है और अकेले अपनी राह चलते हुए भी अकेलेपन का एहसास नहीं होता । लगता है कि आप भीड़ में अकेले नहीं हैं बल्कि सब के साथ चल रहे हैं ।

जीव और जीवन के शत्रु

जब अहंकार की यह भावना घर कर जाए कि मैं चाहे व्यक्तिगत हो या सामूहिक, किसी भी रूप में सर्वश्रेष्ठ, सर्वगुणसंपन्न, शक्तिशाली और कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हूं तब जो सात गुण जीवन की डोर थामने के लिए बनाए गए हैं उनका अस्तित्व समाप्त होने लगता है । पवित्रता, शांति, स्नेह, प्रसन्नता, ज्ञान, शक्ति और गंभीरता के रूप में कहे गए ये सभी गुण समाप्त हो जाते हैं और अहंकार से जन्मा क्रोध जंगल की आग की भांति सब कुछ नष्ट करने हेतु अपने विकराल रूप में दिखाई देता है।

क्रोध की आयु पानी में खींची गई एक लकीर से अधिक नहीं होती लेकिन इससे उत्पन्न हठ या जिद इतनी ताकतवर होती है कि एक क्षण में हमसे  हिंसा, हत्या, आत्महत्या जैसे भयानक अपराधों से लेकर वह सब कुछ करा देती है जिसका परिणाम जीवन भर भुगतना पड़ सकता है।

अचानक जैसे आंधी तूफान जैसा कुछ हो जाए, सब कुछ बिखरता हुआ सा लगे तो समझ लेना चाहिए कि केवल एक तत्व अहंकार और उससे जन्मा क्रोध तांडव कर रहा है  यह  एक पल में वह सब नष्ट करने की शक्ति रखता है जिसे हमने वर्षों की मेहनत से संजो कर रखा था और अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था । इसका स्वरूप इतना भयंकर हो सकता है कि जैसे मानो व्यक्ति, परिवार, समाज और देश तक नष्ट होने जा रहा हो। ऐसा लगता है कि मन के पांच विकार काम, क्रोध, मद मोह, लोभ और अहंकार मनुष्य को अपनी चपेट में लेते जा रहे हैं और उसकी हालत अजगर की कुंडली की गिरफ्त में होने जैसी होती जा रही है जिससे बाहर निकलने की कोशिश का परिणाम अक्सर अपने अंत के रुप में ही निकलता है।