शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

नई शिक्षा नीति असरदार तो है पर खामियां भी बहुत हैं।


संसार में शायद ही किसी देश की शिक्षा का आधार ऐसा हो जिसमें यह न कहा जाता हो कि विद्यार्थियों को सत्य, शांति, प्रेम, अहिंसा, धर्म, सदाचार और सेवा का पाठ पढ़ाया जाना जरूरी है। हम भी इसी पर जोर देते हैं लेकिन व्यवहार में इनका पालन करना कितना कठिन है, यह भी जानते हैं। नई शिक्षा नीति का सैद्धांतिक आधार भी यही है। अपनी सोच को रचनात्मक बनाने की बात कही गई है और भली भांति सोच विचार किए बिना कुछ भी करने, मानने और र्नि ाय लेने की कोशिश को नकारा गया है। अच्छी बात है!

युवा पीढ़ी का भविष्य

अनुमान है कि अगले दस वर्षों में भारत में युवा पीढ़ी की आबादी विश्व में सबसे अधिक होगी। नई शिक्षा नीति में इस बात को ध्यान में रखकर काफी कुछ कहा गया है। देश के विकास में इनकी भूमिका को लेकर कोई संदेह भी नहीं है।  इस नीति में अनेक स्थानों पर तक्षशिला और नालंदा जैसी प्राचीन भारत की गौरवशाली शिक्षा पद्धति और परंपराओं का जिक्र किया गया है। प्रश्न यह है कि क्या हम अपने अतीत से कभी बाहर निकलेंगे भी या नहीं ?

इंटरनेट, आधुनिक संचार साधन और टेक्नोलॉजी ही देश, समाज और दुनिया का वर्तमान है। उस जमाने में जो कुछ था, वह हमारी धरोहर तो हो सकता है लेकिन मार्गदर्शक नहीं, इसलिए वर्तमान की बात करना ही बेहतर होगा।


यह कल्पना कि भारत शिक्षा के मामले में विश्व गुरु होगा और विदेशों से यहां विद्यार्थी पढ़ने आयेंगे और संसार भर के प्रसिद्ध शिक्षा संस्थान यहां अपनी शाखाएं खोलेंगे, हकीकत से दूर है और अगर ऐसा हो भी गया तो इनमें पढ़ने वाले केवल वे होंगे जो साधन संपन्न, अमीर और समृद्ध हैं जिनके लिए आज भी कहीं भी जाकर पढ़ना बहुत आसान है। भारतीय शिक्षा संस्थानों को हमारी जरूरत के अनुसार, हमारे संसाधनों से निर्मित और हमारे ही विद्वानों द्वारा
 
स्थापित किया जाना होगा तब ही हम ऐसे विद्यार्थियों की श्रृंखला बना सकते हैं जो देश को विकास के उच्चतम शिखर पर ले जा सकें।


विदेशों से टेक्नोलॉजी तो ले सकते हैं लेकिन उनकी काम करने की प्र ााली नहीं, उसे तो भारतीय ही होना होगा। नई शिक्षा नीति का आधार विदेशी शिक्षा जगत से उठाई गई बहुत सी धार ााएं हैं जिनका भारतीयता से कोई लेना देना नहीं है।


साठ पन्नों की इस शिक्षा नीति में परीक्षा प्र ााली में आमूल चूल परिवर्तन स्वागत योग्य है लेकिन यह समझ से परे है कि जब दुनिया भर में बोर्ड की परीक्षाओं को हटाया जा रहा है तो हम ही क्यों उससे चिपके हुए रहना चाहते हैं। पूरे साल विद्यार्थी ने जो पढ़ा और उसके आधार पर उसका जो आकलन हुआ वही उसके अगली कक्षा में जाने का आधार होना चाहिए। यह एक अच्छा कदम है कि अब अगर कोई विद्यार्थी किसी कार ा बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ देता है तो वह न केवल दोबारा उससे आगे की पढ़ाई जारी रख सकता है बल्कि उसने जितने वर्ष की पढ़ाई की है उसके प्रमा ा पत्र भी मिलेंगे जो नौकरी और रोजगार दिलाने में मददगार हो सकते हैं।

शिक्षा और रोजगार


अच्छी शिक्षा वही जो नौकरी या व्यवसाय करने के काबिल बना सके। नई नीति में स्कूली पढ़ाई के दौरान ही कोई कौशल सीखने और उसके लिए ट्रेनिंग करने या अप्रेंटिस बनाने की बात कहीं गई है लेकिन क्या स्कूल के बच्चों को कोई उद्योग या कारखाना अपने किसी फायदे के बिना यह अवसर देगा, इसमें संदेह है।

इसके साथ ही पहले इसका तो सर्वे करा लीजिए कि स्कूल में पढ़ने वाले क्या सीखना चाहते हैं और पढ़ाई लिखाई के बाद क्या करना चाहते हैं और यह कि क्या वे जो पढ़ रहे हैं, वह उनके किसी काम आयेगा भी या नहीं। ध्यान रहे कि हमारे ग्रामी ा और शहरी इलाकों की जरूरतें बिल्कुल अलग अलग हैं, सब के लिए एक जैसी पढ़ाई कारगर नहीं हो सकती।


यह सही है कि अब परीक्षाओं में प्राप्त अंकों से अधिक महत्व इस बात का होगा कि विद्यार्थी  में कुछ नया करने, आधुनिक सोच रखने और किसी भी काम को करने से पहले  आलोचनात्मक टिप्प ाी करने की काबिलियत है या नहीं। यह भी देखा जाएगा कि उसने   केवल रटकर तो अंक प्राप्त नहीं किए। यह जो आज सौ में से सौ अंक होने को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए जरूरी समझा जाता है उस पर ज्यादा ध्यान न देकर उसकी बहुमुखी प्रतिभा को जांचने परखने की व्यवस्था होगी।


सिलेबस और शिक्षक

 
नई शिक्षा नीति के अनुसार अब तक जो किताबें पढ़ाई जाती हैं, उनकी जगह नए सिलेबस, पुस्तकें तैयार होंगी और उन्हें पढ़ाने के तरीके इजाद किए जाएंगे। यह जिक्र कहीं नहीं है कि यह सब कब तक होगा जबकि अगले एकेडमिक वर्ष से नई शिक्षा नीति के तहत पढ़ाई शुरू हो जाने की बात कही है। कहीं ऐसा न हो कि कक्षाएं शुरू हो जाएं और पाठ्यक्रम तथा पठन पाठन सामग्री का पता ही न हो।


इस नीति में इस बात को अच्छा खासा नजरअंदाज किया गया है कि अब ऑनलाइन पढ़ाई और इंटरनेट का युग है। इस बात की पूरी संभावना है कि जब तक सामग्री तैयार हो और वह आए, उससे पहले ही पुरानी पड़ जाए। इस नीति को बनाते समय वर्तमान महामारी नहीं थी जिसने अब बहुत कुछ बदल और दिखा तथा सिखा दिया है।
विकसित देशों में पढ़ाई का यह तरीका बहुत पहले से था। इस मामले में यह बीमारी हमारे लिए वरदान कही जा सकती है कि अब हम भी शिक्षा के क्षेत्र में मॉडर्न हो गए हैं। इसलिए जरूरी यह है कि जो भी पाठ्यक्रम बने, वह केवल किताबी न होकर व्यावहारिक हो और वह इतना लचीला हो कि उसमें बदलाव करना आसान हो क्योंकि जब हर रोज नई टेकनीक सामने आ रही हैं तो पुरानी लकीर पीटने रहने से विद्यार्थियों में निराशा और डिप्रेशन तक होने से इंकार नहीं किया जा सकता।


राष्ट्रीय शिक्षा आयोग



यह पहली बार होने जा रहा है कि अब भारतीय शिक्षा की कमान उनके हाथों में होगी जो शिक्षा से जुड़े हैं और शिक्षा आयोग बनने से यह उम्मीद पैदा हुई है कि वह दिन भी आ सकता है जब किसी आई ए एस की जगह कोई शिक्षाविद् सभी तरह के र्नि ाय ले सकेगा।

यह एक सच्चाई है कि अब तक चाहे शिक्षा मंत्री हो या शिक्षा सचिव अथवा सचिवालय , उनका ताल्लुक राजनीति से लेकर ब्यूरोक्रेसी तक से कितना भी बढ़िया हो लेकिन शिक्षा, पढ़ाई लिखाई और इसके तौर तरीकों से कतई नहीं होता और न वे यह जानने की कोशिश करते हैं कि हमारे देश के गांव देहात और दूरदराज के इलाकों में रहने वालों को कौन सी शिक्षा चाहिए।

उन्हें यह सोचने का   वक़्त ही नहीं कि ग्रामी ा क्षेत्रों में स्कूल केवल तब ही क्यों भरे रहते हैं जब दोपहर का भोजन और स्कॉलरशिप के पैसे दिए जाते हैं। इसी तरह वे नहीं जानते कि अक्सर स्कूलों में ताला क्यों लगा रहता है और विद्यार्थी पढ़ने क्यों नहीं आते तथा उनके घरवाले भी उन पर स्कूल जाने के लिए जोर क्यों नहीं देते ?

 
नई शिक्षा नीति से शायद यह संभव हो सके कि ग्रामवासी और विशेषकर किसान और महिलाएं अपने बच्चों को पढ़ने भेजने में संकोच न करें क्योंकि उन्हें वही पढ़ाया जाएगा जो जरूरी है जैसे कि उन्नत खेती के तरीके, ग्रामी ा कौशल आधारित उद्योग लगाने की पढ़ाई , जरूरी पूंजी जुटाने के नियम, बैंकों और सहकारी संस्थाओं की कार्यप्र ााली तथा यह कि किस तरह जल, जंगल और जमीन का संरक्ष ा किया जा सकता है।


अभी तक उन्हें भी वही पढ़ाया जाता रहा है जो शहरों और महानगरों में पढ़ने वालों के हिसाब से होता है और इसीलिए उनका अपने गांव, अपनी धरती के प्रति लगाव कम होता जाता है और वे शहर भागते हैं। नई शिक्षा नीति में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को शिक्षक की भी भूमिका अदा करने की बात कही गई है लेकिन क्या किसी ने सोचा है कि उनकी दशा कितनी दयनीय है। उनके वेतन और नौकरी की शर्तों में बदलाव कर उन्हें अन्य शिक्षकों के अनुसार ही, यदि वे योग्य है, वेतन और अन्य भत्ते दिए जाएं और उनका एक कैडर बना दिया जाए जिसमें उन्नति करने के प्रावधान हों।



यह एक अच्छी सोच है कि अब पांच से दस किलोमीटर के क्षेत्र में ही हॉयर सेकेंडरी और प्राइमरी तथा माध्यमिक स्कूल स्थापित किए जाएंगे जिससे आने जाने की दिक्कत न हो, विशेषकर लड़कियों के लिए जो अक्सर दूरी के कार ा ही पढ़ाई छोड़ देती हैं।


शिक्षा के बारे में इस पुरानी सोच से बाहर निकलने की भी जरूरत है कि शिक्षा संस्थान चाहे किसी भी स्तर पर हों, उनके लिए धर्मार्थ यानी न लाभ न हानि के सिद्धांत पर ही चलना होगा। अब समय आ गया है कि शिक्षा का व्यवसायीकर ा हो और शिक्षा को समर्पित औद्योगिक इकाइयों को प्रतियोगिता में बने रहने के लिए इन्वेस्टमेंट प्लान के तहत चलाया जाए।  इसे शिक्षा का व्यापार न कहकर शिक्षा का आधुनिकीकर ा माना जाए और उसी के अनुरूप नियम बनें ताकि अभी जो इस्पेक्टर राज चलता है, वह समाप्त हो सके।


शिक्षकों के वेतन, रिहायशी सुविधाओं और समाज में उनके लिए सम्मान की कल्पना इस शिक्षा नीति में की गई है। इसी के साथ शिक्षा के नाम पर इस समय जो हर कोई इसमेें होने वाले मुनाफे को देखकर अपनी दुकान चलाने लगता है, उस पर भी अंकुश लग सकेगा   क्योंकि अब जो नियम बनाए जा रहे हैं उनमें इनका खोलना घाटे का सौदा ही होगा।

उम्मीद है कि नई शिक्षा नीति और शिक्षा मंत्रालय भारतीय विद्यार्थियों के सपने साकार करने में सक्षम होंगे।


(भारत)
 

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

उपभोक्ता के लिए नया कानून लागू होने के अर्थ










पिछले वर्ष संसद द्वारा पारित नए उपभोक्ता संरक्षण कानून को इस महीने की बीस तारीख से लागू कर दिया गया है। जरूरी है कि इसके बारे में सामान्य उपभोक्ता को जानकारी हो ताकि उसके साथ धोखाधड़ी या फरेब या गुमराह किए जाने पर वह सही कदम उठा सके और अपने अधिकारों की रक्षा करने के लिए उचित कार्रवाई करने की दिशा में आगे बढ़ सके।



कानून का विस्तार

नए कानून में बाजार में बिकने के लिए आई सभी वस्तुओं और सेवाओं को शामिल किया गया है जिसमें अब टेलीकॉम, हाउसिंग कंस्ट्रक्शन, ऑनलाइन और टेली शॉपिंग के जरिए खरीदी जाने वाली वस्तुएं और सेवाएं भी शामिल कर ली गई हैं।


अनुचित व्यापार के दायरे में अब बिल या रसीद न देना, तीस दिन में वापिस की गई वस्तु को स्वीकार न करना, और व्यक्तिगत जानकारी जो खरीददारी करते हुए दी गई उसे उजागर करना भी शामिल कर लिया गया है।
आम तौर से कोई खरीद करने पर दुकानदार नाम, पता, फोन नंबर, ईमेल जैसी जानकारी लेता है जिसमें कुछ गलत नहीं लगता लेकिन अगर उसकी यह जानकारी दुकानदार किसी और को देता है तो अब उसके खिलाफ कार्यवाही की जा सकती है।



उत्पाद की जिम्मेदारी कोई भी विक्रेता नहीं लेता था, वह उसके खराब निकलने पर निर्माता कंपनी के पास जाने को कहता था और उपभोक्ता उसके चक्कर काटता रहता था। वस्तु के वापिस लेने की कोई व्यवस्था नहीं थी। अब निर्माता, विक्रेता या सर्विस देने वाले पर इस बात की कानूनन जिम्मेदारी है कि वह जो बेच रहा है, वह ठीक न निकलने पर उसकी  शिकायत का निपटारा करने के लिए कदम उठाए।



इसका अर्थ यह हुआ कि अब कोई दुकानदार यह कहकर नहीं बच सकता कि उसे जैसा माल निर्माता कंपनी ने दिया, वह वैसा ही दे रहा है। मतलब यह कि अब विक्रेता को निर्माता से बेचने के लिए उत्पाद लेते समय यह निश्चित करना होगा कि वह वस्तु सभी मानदंडों पर खरी है। अगर कोई गड़बड़ है और वस्तु की जो क्वालिटी  बताई गई है, वह नहीं पाई जाती तो इसकी जिम्मेदारी दुकानदार की भी उतनी ही है जितनी उसे बनाने वाली निर्माता कंपनी की।



इसी के साथ अब यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि खरीदी गई वस्तु से चोट लगती है या शारीरिक नुकसान होता है तो पहले  केवल वस्तु की कीमत का ही मुआवजा मिल सकता था, अब निर्माता को उस वस्तु से हुए सभी तरह के जान माल के नुकसान का भी भुगतान करना होगा। पहले इसके लिए सिविल कोर्ट जाना पड़ता था, अब उपाभोता अदालत में ही इसका फैसला किया जा सकेगा।


कहीं से भी शिकायत करें


अब कहीं से भी उपभोक्ता शिकायत कर सकता है, पहले विक्रेता या सेवा देने वाले के इलाके में शिकायत करने जाना होता था। अब देश में कहीं से भी खरीदी वस्तु के खराब निकलने पर निर्माता, विक्रेता के खिलाफ किसी भी जगह से शिकायत  की जा सकती है। इससे बड़ी राहत मिलेगी। पहले होता यह था कि मान लीजिए आप दिल्ली किसी काम से आए और कुछ खरीददारी कर वापिस अपने शहर चले गए। सामान खराब था तो शिकायत करने दिल्ली आना पड़ता था। अब जहां रहते हैं या काम करते हैं, वहीं पर उपभोक्ता अदालत में शिकायत कर सकते हैं। इसके साथ ही अब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से भी अपनी शिकायत की सुनवाई की जा सकती है, उसके लिए कहीं जाने की जरूरत न रह जाने से समय और पैसे दोनों की बचत होगी।



अभी तक कोई अलग से रेगुलेटर अथॉरिटी नहीं थी। अब सेंट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन अथॉरिटी का गठन होने से उपभोक्ताओं को बहुत बड़ी राहत मिलेगी। अक्सर दुकानदार और निर्माता अपनी मिलीभगत से उपभोक्ताओं के साथ धोखाधड़ी करने से चूकते नहीं थे। इसका कारण उन पर कोई वैधानिक नियंत्रण का न होना था। अब यह अथॉरिटी बनने से वे अपनी मनमानी नहीं कर पाएंगे। इसका असर वस्तुओं की जरूरत से ज्यादा रखी और वसूली जा रही कीमतों पर भी पड़ेगा। इसके गठन से उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा के लिए बनी संस्थाओं को बेहतर ढंग से काम करने का अधिकार मिलेगा और वे ऐसे मामलों में ठोस कार्रवाई करने के लिए मुकदमा कर सकती हैं जिनका व्यापक असर होता है।

अब एक करोड़ तक के लिए जिला, दस करोड़ तक राज्य और उससे अधिक के लिए राष्ट्रीय आयोग में शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।


पहले यह सीमा क्रमशः बीस लाख, एक करोड़ और एक करोड़ से अधिक की थी।
अब निचली अदालत के फैसले पर उससे ऊपर की अदालत में अपील की जा सकेगी। राष्ट्रीय आयोग तक में मामला नहीं सुलझता है तो सुप्रीम कोर्ट में जाया जा सकता है।


ब्रांड एंबेसडर सावधान


गुमराह करने वाले विज्ञापनों के लिए दो साल की कैद और दस लाख तक का जुर्माना हो सकता है। अगर दोबारा ऐसा किया तो पांच साल की कैद और पचास लाख का जुर्माना हो सकता है।
अगर कोई ऐसे विज्ञापनों को एंडोर्स करता है तो उसके खिलाफ भी कार्यवाही की जा सकती है। अब ब्रांड एंबेसडर बनने से पहले किसी भी सेलेब्रिटी को उस वस्तु या सेवा के सही और बताई गई क्वालिटी के मुताबिक होने के बारे में पूरी जांच कर लेनी होगी वरना उन पर भी कार्यवाही हो सकती है।



इस नए कानून से उपभोक्ताओं को मुकदमा लड़ने में सहूलियत तो दी गई है लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस कानून को लागू करने के लिए क्या इंतजाम किए गए हैं। हमारी जो जिला उपभोक्ता अदालत हैं, उनकी हालत देखकर नहीं लगता कि इस नए कानून के प्रावधानों को पूरी तरह लागू किए जाने के लिए वे सक्षम हैं।
इस कानून से सबसे बड़ी राहत उन उपभोक्ताओं को मिलेगी जो घर बैठकर खरीददारी करते हैं। पहले उनके अधिकारों की रक्षा की ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने पर  कोई व्यवस्था नहीं थी।  अब जैसे आमने सामने बिक्री होती है, उसी तरह इसे भी माना जाएगा और कानून के दायरे में रखा गया है।


अमेजन, फ्लिप्कार्ट, स्नैपडील, मेक माई ट्रिप, स्विगी जैसी कंपनियों से सामान खरीदने पर उन्हें ये वस्तुएं बेचने वाली या सर्विस देने वाली कंपनियों की भी जानकारी देनी होगी। इसके साथ ही रिफंड, एक्सचेंज, वारंटी जैसी शर्तों का खुलासा करना होगा। अब सामान की डिलीवरी करने के बाद उन्हें माल के सही क्वालिटी का होने और जो ऑर्डर दिया गया था उसी के अनुसार सामान देने की जिम्मेदारी भी लेनी होगी।


इसे इस तरह से समझें पहले नकली सामान मिलने पर यह ई कॉमर्स कंपनियां अपना पल्ला यह कहकर झाड़ लेती थीं कि वे इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। अब नकली सामान बेचने वाली ऐसी  ई कॉमर्स कंपनियों पर कार्यवाही की जा सकेगी।


किसी भी ई कॉमर्स कंपनी को 48 घंटों में किसी भी शिकायत के प्राप्त होने की रसीद देनी होगी और उसके एक महीने के भीतर उस शिकायत का निपटारा करना होगा।
पहले मेडिएशन यानी मध्यस्थता का कोई कानूनी प्रावधान नहीं था, अब अदालत इसके जरिए सेटलमेंट करा सकती है।
उपभोक्ता के अधिकारों में बढ़ौतरी तो हुई है लेकिन इस प्रश्न का जवाब तो समय के साथ ही मिलेगा कि ये उसे राहत देने में कितने सक्षम हैं। 


Email:pooranchandsarin@gmail.com

(भारत)


शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

क्या पढ़ें और क्या नहीं, इसका निर्णय स्वयं करना होगा








दसवीं और बारहवीं के नतीजे निकलने के बाद सबसे पहला प्रश्न पास होने वाले छात्र छात्राओं के लिए यह होता है कि आगे अगर पढ़ना है तो कौन से विषय लिए जाएं और आगे पढ़ाई जारी नहीं रखनी है तो क्या किया जाए। आज उनके पास विकल्प सीमित नहीं हैं क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में दुनिया भर में असीमित प्रयोग हुए हैं और लगातार हो रहे हैं ताकि तरक्की की दौड़ में किसी से पीछे न रह जाएं।

देखा जाए तो पिछले एक से दो दशकों के दौरान हमारे देश में भी स्कूली शिक्षा के बाद की पढ़ाई को लेकर अनेक नीतियां बनाई गईं, परिवर्तन भी हुए और युवाओं में बेरोजगारी बढ़ती देखकर स्किल इंडिया जैसे प्रयास भी शुरू हुए ताकि किसी न किसी कौशल या कारीगरी का विकास कर आजीविका का साधन जुटा लिया जाए।


उच्च शिक्षा का पैमाना

अनेक विकसित देशों ने स्कूल के बाद की पढ़ाई को लेकर किसी कॉलेज या शिक्षा संस्थान में दाखिले की इच्छा रखने वालों की योग्यता का आकलन करने के लिए उनके लिए विशेष परीक्षा आयोजित करने की पहल की ताकि पता चल सके कि वह विद्यार्थी  अपने हिसाब से चुने गए विषय को पढ़ने की काबिलियत भी रखता है या नहीं। जो इस परीक्षा में पास हो जाते उन्हें इन उच्च तकनीकी और व्यावसायिक संस्थानों में प्रवेश मिल जाता और जो नहीं पास होते उनके लिए रोजगार दे सकने वाले दूसरे विषय लेने के विकल्प खुले रहते ।


हमारे यहां इस तरह की कोई व्यवस्था न के बराबर होने के कारण माता पिता या अभिभावक जो विषय आपस में मिलकर तय कर लेते हैं, उसमें दाखिला लेे लेते हैं । अब क्योंकि बिना किसी कसौटी के आगे की पढ़ाई करने लगे और उसके पूरा करने के बाद रोजगार या नौकरी करने की बारी आई तो पता चलता है कि उन्होंने जो पढ़ा उसके मुताबिक कुछ है ही नहीं और फिर या तो जो काम मिल गया, कर लिया, वरना बेरोजगारी का आंकड़ा बढ़ाने में योगदान कर दिया।


तरक्की का रास्ता


औद्योगिक और आर्थिक रूप से समृद्ध देशों के कुछेक उदाहरण देखें तो बात आसानी से समझी जा सकती है। हमारे सबसे निकट प्रतिद्वंदी चीन में बारह से चैदह साल की उम्र में विद्यार्थियों को कोई न कोई वोकेशनल कोर्स करना होता है।


जापान ने इस हकीकत को समझकर कि उसके यहां प्राकृतिक स्रोतों का भंडार बहुत कम है उसने स्कूल से ही पढ़ाई का पैमाना उद्योग को बना कर वही पढ़ने की व्यवस्था की जिससे औद्योगिक क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा सके।


इसी तरह जर्मनी ने तय किया कि पढ़ाई के दौरान विद्यार्थियों का अस्सी प्रतिशत समय स्कूल में होगा तो बीस प्रतिशत किसी कारखाने या उद्योग में अपने हुनर को तलाशने और सुधारने में बिताना होगा। पढ़ाई के बाद यह प्रतिशत उलट जाएगा मतलब अस्सी प्रतिशत कारखाने में और बीस प्रतिशत समय जो काम कर रहे हैं उसमें और अधिक पारंगत होने के लिए उसकी पढ़ाई में बिताना।


इस व्यवस्था के जो लाभ हुए उनमें सब से पहले तो यह कि वे जो पढ़ रहे हैं, उसके बारे में स्वयं ही अपनी आलोचना करने की आदत पड़ती गई और उससे किसी भी समस्या का हल निकालना आसान हो गया। इसका एक फायदा यह भी हुआ कि उनके अंदर किसी भी चीज को जानने और फिर उसे करने की भावना आती गई और इस तरह उनके अंदर कल्पना शक्ति बढ़ती गई और वे किसी भी तरह के नए नए प्रयोग करने में सक्षम होते गए। इससे  अनुसंधान के जरिए  आविष्कारों का जन्म होता गया और दुनिया भर में इनके उद्योगों का डंका बजना शुरू हो गया।


हमारी वास्तविकता

अगर हम अपने देश की बात करें तो आज भी हमारे स्कूलों में ज्यादातर विषय वही पुराने, घिसे पिटे होते हैं जिनका नौकरी या रोजगार से कोई संबंध न होकर बस अंक प्राप्त करना होता है। यही कारण है कि शत प्रतिशत या उसके आसपास अंक प्राप्त करने वालों की संख्या हर साल बढ़ती जाती है और उसके बल पर नामी गिरामी कॉलेजों में प्रवेश भी मिल जाता है लेकिन अगर इस बात पर गौर करें कि उनमें से कितने पढ़ाई पूरी करने के बाद अपनी इच्छा के अनुसार नौकरी या व्यवसाय करने के काबिल हुए तो निराशा ही हाथ लगेगी। पढ़े लिखे ज्यादातर बेरोजगारों की यही कहानी है।


हमारे देश में हालांकि अब ऐसे संस्थान काफी संख्या में खुल गए हैं जहां औद्योगिक कौशल का विकास करने के कोर्स उपलब्ध हैं लेकिन उनके बारे  में अधिक प्रचार न होने के कारण जानकारी नहीं होती या फिर वे इतने आकर्षक और लुभावने नहीं होते कि उनमें दाखिला लेने के लिए विद्यार्थियों में होड़ लग जाए।
व्यवसाय की दृष्टि से उनका मूल्य बहुत अधिक है और वहां से पढ़कर निकले विद्यार्थियों को नौकरी या रोजगार के लिए भटकना नहीं पड़ता बल्कि पढ़ाई के दौरान ही औद्योगिक और व्यावसायिक इकाइयां उन्हें अपने यहां  नौकरी की पेशकश करने लगते हैं।



इसके विपरीत अधिकतर संख्या में विद्यार्थी ऐसे कोर्स करने लगते हैं जिनका आधार नौकरी, व्यवसाय या कौशल विकसित करना न होकर केवल डिग्री लेना होता है।


इतिहास की एक घटना का जिक्र करते हैं। जब अंग्रेज भारत आए तो उन्होंने देखा कि यहां के लोगों का अपने हुनर, कारीगरी और कौशल में कोई मुकाबला ही नहीं है तो उन्होंने व्यापार करने की नीयत से ईस्ट इंडिया कम्पनी स्थापित की। उसके बाद जो हुआ वो सब जानते हैं। उन्होंने हमारा शोषण किया और गुलाम बना लिया जिससे बाहर निकलने में दो सौ साल लग गए।


दुर्भाग्य से अंग्रेज ने जो शिक्षा व्यवस्था हमें गुलाम बनाए रखने के लिए जारी की, वह अब भी कायम है जिसका नतीजा यह है कि युवाओं को सफेदपोश कहलाना अर्थात बाबूगिरी करना ज्यादा पसंद आता है, बजाय नीली वर्दी पहनकर औद्योगिक विकास का अंग बनना।


अपना आकलन स्वयं करें 

किसी भी कॉलेज या शिक्षा संस्थान में प्रवेश लेने से पहले विद्यार्थियों और उनके माता पिता के लिए यह सोचना अनिवार्य है कि वे इस बात की तुलना करें कि कौन से विषय की पढ़ाई उन्हें रोजगार दिला सकती है, अपना व्यवसाय खड़ा करने के काबिल बना सकती है या फिर केवल डिग्रीधारी बनाकर बेरोजगारों या अपने अनुकूल काम न मिल सकने वालों की कतार में खड़ा कर सकती है।


एक बात और है और वह यह कि स्कूल की परीक्षाओं में अपनी मातृ भाषा में उत्तर देने की व्यवस्था से अधिक अंक प्राप्त करना आसान हो जाता है लेकिन उसके बाद कॉलेज या संस्थानों में पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी होता है जिसमें ये विद्यार्थी पिछड़ जाते हैं और अधिकतर या तो कम अंकों से पास होते हैं या पढ़ाई ही छोड़ देते हैं क्योंकि अंग्रेजी में दिए लेक्चर उनकी समझ में नहीं आते। इस वास्तविकता से आंख मूंदकर कॉलेज में दाखिला लेने का परिणाम निराशाजनक ही होता है।


इस तरह की पढ़ाई से तो बेहतर यही रहता है कि अपनी रुचि के अनुसार किसी औद्योगिक या व्यावसायिक संस्थान में अप्रेंटिस ही बन जाया जाए जिससे रोजगार की गारंटी तो हो जाए।

इसी के साथ सत्य यह भी है कि प्रोफेशनल शिक्षा के नाम पर पैसा बनाने की अनेक दुकानें भी कुकुरमुत्तों की तरह हर छोटे बड़े शहर या कसबे में खुल गईं हैं जिन पर कोई सरकारी या प्रशासनिक नियंत्रण नहीं होने से वे आर्थिक शोषण तो करती ही हैं, साथ में विद्यार्थियों का दोबारा लौटकर न आने वाला समय भी बर्बाद कर देती हैं।



कहीं भी दाखिला लेने से पहले जरूरी हो जाता है कि सबसे पहले यह तय करना कि जिन्दगी से हम क्या चाहते हैं और जब तय कर लें तो आगे का रास्ता साफ नजर आने लगता है।


अब वह जमाना नहीं कि किसी की नकल करते हुए या अपनी हैसियत और बुद्धि का गलत अंदाजा लगाकर काल्पनिक संसार में छलांग लगा ली जाय जिसका परिणाम हमेशा दुखदाई ही होता है। वक्त की नब्ज टटोलने यानि टाइम मैनेजमेंट की कला विद्यार्थी जीवन में ही पड़ जाए तो बेहतर रहता है।

वर्तमान हालात में विदेशों में जाकर उच्च तथा व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने के अवसर कुछ अरसे के लिए लगभग न के बराबर होने से जो कुछ अपने देश में है उसी का उपयोगिता की दृष्टि से विचार कर कोई निर्णय लेना ही श्रेयस्कर होगा।


Email: pooranchandsarin@gmail.com

(भारत)

शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

नेताओं और पुलिस द्वारा बुना गया अपराध का ताना बाना







सामान्य व्यक्ति जो ईमानदारी, मेहनत और अपनी चादर के अनुसार अपने पांव फैलाने के लिए जाना जाता है, उसे यह जानकर, सुनकर या देखकर बहुत ही अजीब लगना स्वाभाविक है कि एक अपराधी द्वारा पुलिस के लोगों की हत्या कर छिपते छिपाते अनेक राज्यों की कानून व्यवस्था को धता बताते हुए मौका ए वारदात से सैंकड़ों किलोमीटर दूर एक मंदिर में दर्शन के बाद बाहर निकलकर घोषणा करना कि मैं ही वोह हूं जिसकी तलाश है, आओ मुझे पकड़ लो।


उसके बाद नाटकीय घटनाक्रम से उसकी गिरफ्तारी होती है। जिस राज्य में उसने अपराध किया, वहां की पुलिस को सौंप दिया जाता है और इससे पहले कि लोग यह कयास लगाएं कि अब इसका मुकदमा बरसों चलेगा, उसका एनकाउंटर कर  दिया जाता है ताकि सनद तो रहे लेकिन वे सब सबूत मिट जाएं जिनकी बिना पर बहुत से सफेदपोश खादी और पुलिसिया खाकी पहने लोगों की सच्चाई उजागर हो सकती है।


यह घटना भी इसी तरह की पहले भी अनेक घटनाओं की भांति कुछ समय के शोर शराबे के बाद भुला दी जाएगी और अनेक प्रश्न साधारण व्यक्ति के मन में छोड़ जाएगी जिनका संबंध कानून का राज और व्यवस्था की लाज बचाने से है।


इसलिए आम आदमी के लिए यह समझना जरूरी हो जाता है कि वास्तविकता क्या है और कानून की खामी और व्यवस्था की मजबूरी को दूर करने में उसका क्या योगदान हो सकता है?


सिस्टम को बदलने की जरूरत


सबसे पहले यह समझ लीजिए कि हमारा जो कानून है वह अपराधियों द्वारा व्यक्तिगत तौर पर किए गए अपराधों से निबटने और सजा देने के लिए बना था अर्थात घरेलू किस्म के अपराध, आपसी रंजिश, मारपीट, पुश्तैनी जायदाद या ऐसे ही मुकदमे जो एक दो साल से लेकर पीढ़ियों तक चलते रहते हैं। इनके कारण समाज पर कोई गंभीर संकट नहीं होता और न ही कोई राजनीतिक या सामाजिक उथल पुथल होने का अंदेशा रहता है। यदि जरूरत पड़ी  और कोई अलग तरह की वारदात हुई या मुकदमा आया तो उसमें थोड़ी बहुत रद्दोबदल की जाती रही ताकि काम चलता रहे।

कह सकते हैं कि ये सब स्थानीय किस्म के अपराधों से निबटने के लिए काफी था।  जब ऐसे अपराध होने लगे जिनकी व्यापकता राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की थी तो इन्हीं कानूनों में लीपापोती कर काम चलाने की कोशिश की गई जोकि नाकाफी था।


सख्त नए कानून की जरूरत


जरूरत यह थी कि स्थानीय जैसे कानूनों और उनकी सामान्य सी व्यवस्था के समानांतर ऐसे  कानून बनाए जाते जो इक्का दुक्का अपराधियों के लिए न होकर छोटे बड़े गिरोह, माफिया या क्राइम सिंडिकेट से निबटने में सक्षम होते।  इस तरह के संगठित अपराधियों के किए सभी जुर्मों के लिए अलग अदालत यानी ज्यूडिशियरी गठित होती और अभी जो इस तरह के अपराधों से निबटने के लिए अलग संगठन प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर पर काम कर रहे हैं उन सब को एकसूत्र में बांधकर इस केंद्रीय संगठन को सभी तरह के कानूनी और प्रशासनिक अधिकार दिए जाते ।


अगर अभी भी इस बारे में गंभीरता से विचार हो तो इस नयी व्यवस्था से अपराधियों के नेता बनकर पुलिस और ब्यूरोक्रेसी को अपने इशारों पर नचाने से मुक्ति मिल सकती है और यह भी संभव है कि अभी जो हम विधान सभा से लेकर संसद तक में अपराधियों की घुसपैठ देखते हैं और जो घोषित अपराधी हैं, वे विधायक, सांसद और मंत्री बन जाते हैं, उस परंपरा को नेस्तनाबूद किया जा सकता है ।


किसी भी अपराधी का मुकदमे के दौरान या सजा होने पर जेल से ही चुनाव लडने पर संवैधानिक रोक लग जाने से न केवल उनके नेता बनने पर अंकुश लग जाएगा बल्कि वे सजा होने पर जेल से ही अपनी आपराधिक गतिविधियों को चलाने में असमर्थ हो जाएंगे।


वर्तमान व्यवस्था में साधारण अपराध हो या जघन्य, सामान्य कैदी हो या राजनीतिक बंदी, सब  को एक साथ रखा जाता है और उनके आपस में मिलते रहने से माफिया या सिंडिकेट का जेल से ही विस्तार होता रहता है।


सिस्टम की उदासीनता

सभी अपराधियों को एक ही लकड़ी से हांकने की परिपाटी के कारण भ्रष्ट नेताओं, रिश्वतखोर पुलिस वालों, बेईमान अधिकारियों से लेकर तस्करी, कालाबाजारी, नशीले पदार्थों की बिक्री करने वाले व्यापारियों का एक मजबूत संगठन बन गया है और जब भी इनमें से किसी एक पर कोई कार्यवाही होती है तो ये सब मिलकर न्याय और व्ययस्था पर ऐसा प्रहार करते हैं कि उसे चुप रहने में ही अपनी भलाई दिखाई देती है।


जब प्रशासन चुप हो जाए या हकीकत से मुंह मोड़ ले तो चाहे अपराधी कैसा भी हो, उसने आर्थिक अपराध किया हो या हत्या, अपहरण, फिरौती से लेकर बम विस्फोट करने में लिप्त पाया जाए, उसकी हिम्मत बढ़ जाती है, कानून का डर नहीं रहता, किसी भी पद पर बैठे व्यक्ति को वह अपना मोहरा बनाने से नहीं चूकता और  बिना किसी रोक टोक के दूसरे देशों में पहुंचकर वहां से अपनी गतिविधियों को चलाता रहता है।


अगर सरकार और प्रशासन उदासीन न हो तो अपराधी की हिम्मत शुरू में ही टूटने में देर नहीं लगती, उसकी दबंगई साथ नहीं देती और उसे आत्मसमर्पण कर अपने को कानून के हवाले करना ही पड़ता है।


यह कानून व्यवस्था की कमजोरी और राजनीतिक सत्ताधारियों में इच्छाशक्ति का अभाव ही तो है या फिर उनके निजी स्वार्थ हैं जो जघन्य और सामूहिक तौर पर किए गए अपराधों के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठा पाते जिससे ऐसे अपराधियों के मन में डर हो। अभी यह जो अपराधी सोचता है कि वह जो कर रहा है, वह नेता बनने के बाद जायज हो जाएगा और यह कि राजनीति में आने से प्रशासन हो या पुलिस, उसकी चाकरी करने को तैयार रहेंगे, इस पर लगाम लगाना अनिवार्य है।


पुलिस हो या प्रशासनिक अधिकारी, वे कुछेक अपवादों को छोड़कर भ्रष्ट नहीं होते लेकिन जब निरंकुश अपराधी नेता बन जाते हैं तो वे उनके लिए ऐसा माहौल बना देते हैं कि उन्हें अपने सिद्धांतों का त्याग करने को विवश होना या फिर मृत्यु को गले लगाना ही पड़ता है।

सामान्य नागरिक इसमें इतना योगदान कर सकता है कि वह संचार साधनों, सोशल मीडिया के जरिए इस तरह का वातावरण बना सकता है जिससे वह अपनी बात सरकार और नीति बनाने वाले अधिकारियों तक पहुंचा सके ताकि उसे अपराधियों और उनकी कारगुजारियों से सुरक्षा मिल सके।


भारत

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शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

कोरोना और चीन से लड़ाई के लिए आत्मनिर्भरता ही एकमात्र उपाय है








अब यह स्पष्ट नजर आ रहा है कि संसार के सभी देशों को कोरोना से बचकर रहने के लिए अपने देशवासियों को तैयार करते रहना होगा। चाहे इसकी कोई दवा निकले या न निकले पर यह रोग दूसरे अनेक भयंकर रोगों की तरह हमेशा के लिए दुनिया के गले पड़ गया है।

भारत पर दोहरा दवाब है, एक तरफ चीन से ही आई महामारी से बचना है और दूसरी तरफ चीन से कभी भी किसी भी तरह के युद्ध के लिए तैयार रहना है।



युवा शक्ति का विस्तार

यह जानकर चैन की सांस ली जा सकती है कि भारत की आधी से भी अधिक आबादी पच्चीस वर्ष की आयु से ऊपर की है और कुछ ही राज्यों जैसे बिहार और उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा थोड़ा कम है। कुछ राज्यों में तो पच्चीस से कम उम्र की जनसंख्या उनकी चौथाई आबादी से भी नीचे है।

हालांकि इस बारे में बहस हो सकती है कि यह आधी युवा आबादी शिक्षा, ज्ञान और वैज्ञानिक सोच रखने के मामले में किस स्तर की है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यदि सम्पूर्ण आबादी की शक्ति को आंका जाए तो देश की विशालकाय छवि उभरती है, मतलब यह कि अगर सरकार चाहे तो अपनी नीतियों से इन्हें मजबूत बना सकती है और न चाहे तो हर बात में अड़ंगा डालते रहने की आदत से उसे बेड़ियों में जकड़ भी सकती है।



कोरोना के कारण लॉकडाउन होने से और वह भी महीनों के लिए घर में ही रहने का एक सुखद परिणाम यह निकला है कि इस दौरान युवा पीढ़ी जो हमेशा वक्त की कमी का रोना रोती रहती थी, उसे अब घर के बुजुर्गों के साथ रहने के कारण आपस में जो संवाद न होने से कम्युनिकेशन गैप आ गया था, उसकी भरपूर भरपाई हो गई है।


जहां युवावर्ग ने अधेड़ और वृद्ध पीढ़ी की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक जरूरतों को समझा है वहां अब युवा अपने मन की बात भी बुजुर्गों के साथ बांटने में हिचकिचा नहीं रहे। कुछ ऐसा माहौल बन गया था कि पहले ये दोनों वर्ग कभी पास आते ही नहीं थे और कभी सामना हो गया तो एक दूसरे के साथ अजनबियों जैसा व्यवहार करते थे। इन दिनों उम्रदराज पीढ़ी को लगता है कि वे दिन लौट आए हैं जब भरापूरा परिवार एक साथ बैठा करता था, सब एक दूसरे की सुनते थे, शिकायत भी करते थे और मिलकर समस्यायों का समाधान भी निकालते थे।


कदाचित यही कारण है कि चाहे कोरोना हो या चीन दोनों का मुकाबला करने की एकजुट शक्ति का संकल्प साकार हो रहा है।




चीन की चाल क्या है?


चीन की विस्तारवादी और दूसरों को अशक्त बनाने की नीति को समझने के लिए हमें अपनी गुलामी के दौर की घटनाओं को सामने रखकर सोचना होगा। ब्रिटिश हुकूमत ने देशवासियों के मनोबल को तोड़ने और अंग्रेज के आगे आत्मसमर्पण करने के लिए भारत से कच्चा माल  लगभग मुफ्त ब्रिटेन ले जाकर वहां उससे विभिन्न उत्पाद बनाकर भारत में महंगे दाम पर बेचने का रास्ता अपनाया। हमारी खेतीबाड़ी पर कब्जा करने के लिए ऐसे नियम बनाए कि किसान भरपूर फसल होने के बावजूद भूखा रहे, उद्योग धंधों के कारीगरों को बेकार बनाकर अपने दफ्तरों में चपरासी बना दिया और अंग्रेजों के भारी वेतन से लेकर उनकी अय्याशी तथा ब्रिटेन लौटने पर उनकी पेंशन तक को भारत के संसाधनों और जनता से वसूला जाने लगा।


भारत में अंग्रेजों ने जो भी विकास कार्य किए या कानून लागू किए वे उन्होंने अपनी सहूलियत, विलासिता और भारतीयों को अछूत मानते हुए ही किए थे। हमारी दासता का यही सबसे बड़ा कारण था, परिणास्वरूप हम असहाय, कमजोर और आश्रित होते गए और अंग्रेजी हुकूमत काबिज होती गई।


अब चीन ने भी यही नीति बनाई। उसने भारत से ज्यादातर वह सामान खरीदा जो विभिन्न वस्तुओं के बनाने में कच्चे माल की तरह इस्तेमाल होता है और जो सस्ता भी मिल जाता है। चीन ने इससे अपने यहां सस्ते और घटिया क्वालिटी के अधिकतर वह सामान भारत को बेचना शुरू कर दिए जिससे हमारा घरेलू उद्योग धंदा ठप्प पड़ जाए। चीन ने हमारी रसोई, ड्रॉइंग रूम, बेडरूम से लेकर रोजाना काम आने वाली चीजों को इतने सस्ते दाम पर हमें सुलभ करा दिया कि हम स्वदेशी उत्पाद बनाने से लेकर उनका उपभोग करना तक भूलने लगे।


इससे लघु उद्योग बंद होते गए और उद्योगपति अब ट्रेडर बन गए, मतलब उत्पादन करना छोड़कर चीन से सभी तरह का सामान लाने लग गए और बाजार में हर जगह चीनी वस्तुओं का अंबार लग गया।


चीन ने इलेक्ट्रिक, इलेक्ट्रॉनिक, मोबाईल और कंस्ट्रक्शन तथा सभी तरह की सवारियों के आधे से भी अधिक बाजार पर कब्जा कर लिया। इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में भी उसने हमें बहुत पीछे छोड़ दिया।


इस तरह हम फिजिकल रूप से न सही, प्रैक्टिकल रूप से चीन और उसकी बनाई वस्तुओं पर निर्भर होते चले गए।  यह सब कुछ इतने व्यवस्थित ढंग से चीन ने किया जैसे कि मानो उसने हमें अफीम चटा दी हो।


चीन में एक कहावत है कि वह आर्थिक हो या सैन्य, किसी भी तरह का युद्ध  करने के लिए कैसा भी दुस्साहस कर सकता है और जीतने के लिए किसी भी तरह का जोखिम उठा सकता है।

चीन ने बहुत सोच समझ कर ही आक्रमण करने की कोशिश के लिए लद्दाख को चुना। वह अपने सीमावर्ती क्षेत्रों में बहुत पहले से सैन्य अभ्यास और युद्ध सामग्री को जुटाने में लगा हुआ था। हमारी सीमा के भीतर पिछले कुछ वर्षों में की गई तैयारी को छोड़कर कभी वहां का विकास करने और सामान्य जीवन जीने की सुविधाओं को जुटाने का गंभीर प्रयास नहीं किया गया।


दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों की अपनी कठिनाइयां होती है और बर्फीले तूफान से घिरे प्रदेश की मुसीबतों को झेलना आसान नहीं होता। हमारे सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय दिया है और जीतने के संकल्प से ही वहां मुकाबला कर रहे हैं। उनके सम्मान, इच्छाशक्ति और शौर्य तथा वीरता के सामने शत्रु का परास्त होना निश्चित है।


अगर हमें चीन से बाजी मारनी है तो उसके नहले पर दहला चलना होगा। इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के तहत चीनी ऐप्स बंद करने से शुरुआत हो चुकी है, रूस तथा अन्य मित्र देशों से अस्त्र शस्त्र जुटाना शुरू हो चुका है, अब आर्थिक और व्यापारिक क्षेत्र में उसे मात देने के लिए स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देने वाली नीतियों का इंतजार है।



इतिहास से सीखना होगा


अगर विश्व इतिहास पर नजर डालें तो अमेरिका चार जुलाई 1776 को आजाद हुआ था और चीन एक अक्टूबर 1949 को तथा भारत पंद्रह अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ था। अमेरिका अनेक शताब्दियों के बाद विश्व शक्ति बन पाया जबकि चीन सत्तर वर्षों में ही उससे टक्कर लेने लगा। भारत भी इसमें पीछे नहीं रहा और हम भी अब विश्व शक्ति हैं, इसका प्रमाण यह कि अब कोई भी देश हमें हल्के में लेने की गलती नहीं कर सकता और चीन तो बिल्कुल नहीं क्योंकि उसके आर्थिक, औद्योगिक और व्यापारिक तंत्र को ध्वस्त करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।



भारत

शुक्रवार, 26 जून 2020

भारत चीन विवाद गलवान घाटी और लद्दाख









यह सब ही जानते हैं कि भारत और चीन के बीच 1962 के युद्ध से दोनों शक्तियों के संबंध मित्रता के स्थान पर शत्रुता के हो गए थे। चीन ने इसकी शुरुआत उससे काफी पहले तिब्बत को हड़पने से कर दी थी और तिब्बतियों तथा दलाई लामा के साथ भारत के सहयोग ने चीन को हमारे साथ दुश्मनी करने की नींव डालने का काम किया था।

अक्टूबर 1962 में अपनी सीमा की रक्षा के लिए भारत तिब्बत सीमा पुलिस आईटीबीपी का गठन इसी प्रथम उद्देश्य को लेकर किया गया कि चीन की विस्तारवादी चालों को रोककर भारतीय क्षेत्र की सुरक्षा की जाय।

अद्भुत क्षमता का प्रदेश

लद्दाख को समझना हो तो यह प्रदेश देखने जाना होगा लेकिन यह प्रत्येक के लिए संभव नहीं है क्योंकि खतरनाक मौसम, ऑक्सीजन की कमी और दुर्गम रास्ते तथा बर्फ की ऐसी किस्म जो छूने भर से शरीर में सुराख कर दे, किसी के भी उत्साह पर पानी फेर सकते हैं।

इसी के साथ यह भारत का अकेला ऐसा प्रदेश है जो अगर ढंग से विकसित हो जाय तो स्विट्जरलैंड के बर्फीले प्रदेशों को भी मात दे सकता है जहां इसी सौंदर्य को देखने के लिए दुनिया भर से सैलानी आते हैं।

मुझे लद्दाख में लेह से लेकर चुशूल सीमा तक जाने का अवसर मिला है। उसके वर्णन से इस क्षेत्र को समझना आसान होगा।

आईटीबीपी के लिए इस क्षेत्र में उसकी कार्यविधि पर एक फिल्म बनानी थी। चलिए यहां की सैर के लिए आगे बढ़ते हैं।

लेह हवाई अड्डे पर अपनी टीम के साथ उतरने से पहले वायुयान से ही जो इस क्षेत्र का विहंगम दृश्य देखा तो अभूतपूर्व आश्चर्य और सौंदर्य का अनुभव हुआ। क्या  प्रकृति इतनी
कृपालु हो सकती है, यह सोचते हुए नीचे उतरना हुआ और वहां जो दिख रहा था उस पर से नजरें हट ही नहीं रहीं थीं।

आईटीबीपी के गेस्ट हाउस में आए तो हिदायत दी गई कि कुछ समय के लिए बाहर नहीं निकलना है क्योंकि शरीर को वहां के मौसम के अनुकूल बनाने के लिए यह जरूरी है। टीम के दो सदस्य चुपचाप अपनी उम्र के जोश में बाहर निकल गए तो तुरंत अधिकारियों ने चेतावनी दी कि इसका परिणाम उनके गंभीर रूप से बीमार होने से निकल सकता है। उन्हें तुरंत लौटने को कहा गया। लापरवाही के कारण बीमार होने का उदाहरण अगले दिन एक पूजा स्थल पर मिल गया जिसमें एक सैलानी दंपति को निर्देशों का उल्लघंन करने पर अपने 8-10 साल के बेटे और स्वयं अपनी जान जोखिम में आ जाने की घटना का सामना करना पड़ा।

शूटिंग पर जाने से पहले हम लोगों को मौसम से रक्षा के लिए भारी भरकम जैकेट दी गईं और कपड़ों की कई परतें पहननी पड़ीं,  फिर भी जो भी अंग जरा सा खुला रहा वह ठंड से ठिठुराने का अहसास दिलाता रहा।

आईटीबीपी के वाहन टाटा 407 पर सवार होकर लेह से चले।  जगह जगह रुकते हुए बॉर्डर तक जाना था। कुछ ही दूर जाने पर ही बर्फ के दर्शन होने लगे जिसे छूने से मना किया गया क्योंकि यह बर्फ एक तरह से ठोस सिल्ली की तरह न होकर भुरभुरी जैसी थी। इसे नंगे हाथ से छूने पर घाव हो सकते हैं जो खतरनाक है।

आज जो हम टीवी पर लद्दाख की सड़कें देखते हैं, तब उनका अस्तित्व न के बराबर था। सड़क तो थीं लेकिन पथरीली, बंजर और बहुत ही कष्ट दायक। जरा सोचिए, एक तरफ लटकती बर्फ से ढकी पहाड़ियां और दूसरी तरफ ज्यादातर इलाके में गहरी खाई जिसमें अगर फिसल गए तो किसी को पता भी न चले। इसके विपरीत ये दुर्गम ढलान इतने सुन्दर कि उन्हें गहराई तक देखने के लोभ से बचना कठिन। कभी दूर तक सपाट इलाका आ जाता तो लगता कि विशाल प्याले जैसी उसकी बनावट इतनी मनभावन कि जैसे प्रकृति ने कोई मनोरम चित्र बनाकर हमारे सामने रख दिया हो।

हमें हिदायतों के मुताबिक शूट करते हुए चुशूल सीमा तक पहुंचना था। यह कठिन रास्ता प्राकृतिक सौंदर्य का रसपान करने और दृश्यों को कैमरे में समेटने की लालसा से काफी आसान हो गया।

उस समय यह प्रदेश तो क्या पूरा लेह लद्दाख का अधिकतर क्षेत्र पेड़ पौधों और हरियाली से वंचित था। इसकी कमी वहां के विभिन्न रंगों की पर्वत श्रृंखलाएं पूरा कर रहीं थीं। ऐसे पहाड़ देश में तो क्या विदेशों में भी नहीं देखने को मिलेंगे जो इतने आकर्षक हों जैसे इस इलाके में हैं।

चीन की तैयारियां

चुशूल क्षेत्र में एक पहाड़ी पर तैनात आइटीबीपी की चैकी तक पहुंचे तो वहां से चीनी क्षेत्र साफ नजर आ रहा था। अपनी तैयारी के सामने उनकी जो तैयारियां देखीं तो लगा कि चीन जैसे किसी युद्ध के लिए साज और समान वहां जुटा रहा है जिसके सामने हम कहीं नहीं ठहरते। आधुनिक दूरबीन से देखने पर उनकी सड़कें और सैनिक टुकड़ियां तथा वहां किए गए विशाल निर्माण हमारा मुंह चिढ़ाते हुए से लगे।

यहां जो सीमा थी वह नदी की एक पतली धारा के दोनों ओर कांटेदार तारों से बनी थी।

चैकी से नीचे आए तो सीमा पर जैसे ही शूटिंग के लिए कैमरा लगाया कि लाउडस्पीकर से आवाज आई ‘नो शूटिंग, नो शूटिग, हिंदी चीनी भाई भाई।‘ इस क्षेत्र में दोनों देशों के बीच संधि के मुताबिक किसी भी तरह के शस्त्र ले जाने की मनाही थी लेकिन कैमरे तक पर पाबंदी है, यह जानकर आश्चर्य हुआ। कैमरा टीम को वापिस भेज दिया तब कहीं शांति हुई वरना अधिकारियों के मुताबिक किसी भी क्षण चीन की तरफ से गोलीबारी होने का अंदेशा था।

दुर्गम क्षेत्र के दुर्लभ क्षण

लौटते हुए शाम होने लगी थी और हमें वापिस पहुंचना था लेकिन तब ही हमारे वाहन में कुछ ऐसी खराबी आ गई कि वहां रात भर रुकने के अतिरिक्त कोई चारा न था। अंधेरे की चादर पसरने लगी थी और चारों ओर सुनसान में किसी और चीज का तो नहीं पर खराब मौसम का डर जरूर लग रहा था। अचानक कहीं दूर एक टिमटिमाती रोशनी दिखी तो हमारे साथ आए आईटीबीपी के अधिकारी ने भरोसा दिलाया कि अब डरने की कोई बात नहीं।

यह एक छोटी चैकी थी जिसमें सैनिक इस समय खाना आदि बना रहे थे। हम ऊंची पहाड़ी से अंधेरे में टॉर्च के सहारे किसी तरह उस चैकी तक पहुंचे और वहां उन सैनिकों को अपनी परेशानी बताई तो न केवल उन्होंने रात गुजारने का इंतजाम किया बल्कि हमारी टीम के खाने का बंदोबस्त भी और इसी के साथ उनकी और हमारी कहानियां सुनने और सुनाने का दौर देर रात तक चलता रहा। सोने से पहले वे कहने लगे कि अब वे हमारी कहानियों को आपस में ही दोहराते हुए अपना समय गुजारा करेंगे।

जरा सोचिए उस सैनिक की व्यथा जो एकांत में महीनों तक अकेलेपन के दौर से गुजरता है फिर भी चेहरे पर शिकन नहीं लाता। उसे अपने घर से अपनी ड्यूटी तक पहुंचने में उस समय कई कई दिन तक पैदल चलकर आना होता था। न अच्छी सड़क, न कोई वाहन या साधन, बस अपना सामान लादकर कैंप तक पहुंचना और वहां दिन रात अपने शरीर को मौसम की मार सहने के काबिल बनाए रखना होता था ताकि शत्रु पर निगाह रखने में हल्की सी भी चूक न होने पाए।


विडम्बना यह भी कि सैनिकों को जो जैकेट और जूते मिलते थे, वे बढ़िया क्वालिटी के न होने पर सैनिकों की रक्षा करने में असमर्थ थे। बहुत कोशिशों के बाद उन्हें अच्छी क्वालिटी की इंपोर्ट की गई सामग्री मिलनी शुरू हुई। हालांकि बड़े अधिकारियों और अतिथियों के लिए यह सामग्री पहले से इंपोर्ट की जाती रही थी।

एक सैनिक ने इसके लिए आईटीबीपी के एक महा निदेशक जोगिंदर सिंह का आभार प्रकट किया जिनके आदेश से उन्हें यह जीवनरक्षक सामग्री मिलनी शुरू हुई। जब दिल्ली में उनसे इस घटना की चर्चा हुई तो उनका अपने सैनिकों के प्रति आदर और सरकारी लालफीताशाही के लिए क्रोध साफ दिख रहा था। कदाचित  आज ऐसे ही अधिकारियों के प्रयासों से लद्दाख में तैनात सैनिक शत्रु को सबक सिखाने के योग्य हुए हैं।

इस चैकी से सैनिकों से विदाई लेने से पहले एक और घटना का जिक्र जरूरी है जो सरकार की उदासीनता का उदाहरण है। प्रातः काल जब शौच के लिए बाहर आए तो सामने एक बांस की खपच्ची को टाट से लपेटकर बने शौचालय में निवृत्त होना पड़ा। यह न केवल अमानवीय था बल्कि एक सैनिक का अपमान भी था। आज की स्थिति क्या है, इसके बारे में तो ज्ञात नहीं पर उस समय यह देखकर दुःख बहुत हुआ। यह दुःख तब और ज्यादा लगा जब अधिकारियों के कैंप के बढ़िया शौचालय देखने को मिले।

लौटते हुए रास्ते में घोड़े, गधे और यहां पाए जाने वाले पशु कियांग के झुंड देखने को मिले। सपाट मैदान और इन पशुओं को हांकते यहां के निवासी। आसपास के गांव और उनमें रहने वाले लद्दाखी वास्तव में प्रशंसनीय हैं क्योंकि ये हर हाल में खुश रहने वाले लोगों में आते हैं। यहां तक सरकारी योजनाओं का लाभ आसानी से नहीं पहुंच पाता लेकिन इस समय जो सांसद है, वे इस क्षेत्र का सुनियोजित और पूर्ण विकास करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

यह वृतांत प्रस्तुत करने का मकसद पाठकों को इस क्षेत्र की महत्ता, यहां का प्राकृतिक सौंदर्य और हमारी तैयारियों से रूबरू कराना है। इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्तमान में हम भली भांति तैयार हैं और सैन्य दृष्टि से शत्रु से किसी भी प्रकार से कम नहीं है लेकिन फिर भी इतना तो कहना ही होगा कि यदि इस क्षेत्र का विकास सुनियोजित तरीके से किया जाता तो न केवल शत्रु का भय नहीं रहता बल्कि पर्यटन और आवागमन का यह अंतरराष्ट्रीय केंद्र होता।

पिछले कुछ वर्षों में इसकी जितनी कायापलट हुई है, अगर उससे पहले भी इस तरह के प्रयास होते तो किसी की हमारी जमीन की तरफ टेढ़ी नजर से देखने की कतई हिम्मत नहीं होती।

इस कहानी को अगले स्तंभ में भी जारी रखा जाएगा और कुछ ऐसे रहस्यों तथा जानकारियों से परिचित कराया जाएगा जो पाठकों के लिए ज्ञान और मनोरंजन का साधन होंगी।


भारत

शुक्रवार, 19 जून 2020

तनाव में शरीर की नहीं, उलझनों की हत्या कीजिए








हमारे देश में ही क्यों, दुनिया भर में ऐसा व्यक्ति शायद ही मिले जिसने जीवन के किसी मोड़ पर तनाव, अवसाद, निराशा की अवस्था में आत्मघात यानी अपनी हत्या करने के बारे में कभी न सोचा हो। हो सकता है किसी की कहानी या उसकी परेशानी सामने न आई हो पर यह सच है कि अगर जीवन है तो उसमें उतार चढ़ाव भी आयेंगे, हल्के, मंदे और अच्छे दिन भी देखने को मिलेंगे, अपने मन की न होने की घटनाएं भी होंगी और कभी कोई ऐसी बात भी होगी कि लगे कि अब और नहीं जीना!

हिटलर से हार बर्दाश्त नहीं हुई तो उसने अपने को गोली मार ली। चर्चिल, लिंकन, मार्टिन लूथर किंग से लेकर और भी न जाने विश्व की कितनी हस्तियां आत्महत्या के दरवाजे तक जाकर लौट आईं होंगी और उन्होंने खुद को मारने के बजाय अपनी उलझनों को खत्म करने या कहें कि अपने अतीत की हत्या करने को बेहतर समझा होगा।

शायद इसीलिए अदालतें भी जीने के अधिकार की तरह मरने की ख्वाहिश या अधिकार को मानने लगी हैं। अगर कोई जीना नहीं चाहता तो उसे मरने देने में क्या हर्ज है? लेकिन यहीं यह भी सच है कि मरना हो या जीना, दोनों में से एक भी आसान बात नहीं है, जहां जीने के लिए हिम्मत और साधन चाहिए वहीं मरने के लिए भी ये ही दोनों चीजें चाहिएं, और कुछ नहीं !

भावनाओं का खेल

अक्सर देखा गया है कि जो लोग भावुक होते हैं या ऐसे पेशे से जुड़े होते हैं जिनमें अपनी या किसी दूसरे की भावनाओं को व्यक्त करना होता है तो उनके लिए कभी कभी यह भेद समझना कठिन हो जाता है कि जो वे कर रहे हैं, कहीं वह ही तो सच नहीं और जो वे स्वयं हैं, उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है।

इन लोगों में अधिकतर वे लोग आते हैं जो अपने अभिनय, पेंटिंग, शिल्प या मूर्तियां गढ़ने के लिए विख्यात हैं। जब तक वे अपने काम को एक असाइनमेंट की तरह लेते हैं, तब तक तो ठीक रहता है, लेकिन जैसे ही उन्होंने उससे अपने स्वयं के व्यक्तित्व को जोड़ लिया तो वे अपने पात्र या अपनी बनाई कलाकृति की तरह सोचने लगते हैं, मतलब कि उसे अपने ऊपर सवारी करने देते हैं और तब वह इस तरह का व्यवहार करते हैं जो उनका खुद का नहीं उस रचना का होता है, जिसका निर्माण करने में उन्होंने अग्रणी और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

अगर यह मनस्थिति लंबे समय तक रही तो उसके परिणाम दोहरे व्यक्तित्व को ढोने की तरह निकलते हैं और अगर ध्यान न दिया तो इसका नतीजा आत्मघाती हो जाता है।

ऐसे लोग जिन्हें हम कलाकार, लेखक, गायक, नर्तक, शिल्पी आदि के नाम से जानते हैं, उनकी नियति यही है कि जो करो, उसमे लिप्त न होकर उसे केवल एक असाइनमेंट की तरह लें और ऐसा होने पर वे उन लोगों की लीला को भी समझ लेंगे जो उनका शोषण या उनकी भावुकता का फायदा उठाते हुए या उनकी हैसियत के कम होने की हालत में उन पर अपने दबदबे के कारण हावी होना चाहते हैं। इन्हें हम मगरमच्छ की संज्ञा दे सकते हैं जो किसी की जरा सी कमजोरी का फायदा उठाने में कभी पीछे नहीं रहते।

समझौता या सामना

जिन्दगी की दौड़ में न चाहते हुए भी ऐसी स्थितियां आती ही हैं जिनमें या तो यह चुनना होता है कि जो भी काम हम कर रहे हैं, चाहे नौकरी हो या अपना व्यवसाय, उसमें किसी तरह का दबाव, धमकी या नुकसान होता दीख रहा हो तो अपने सामने सिर्फ दो विकल्प होने पर किसे चुनें एक या तो हालात से या उनके लिए जिम्मेदार व्यक्ति से समझौता कर लिया जाय  या दूसरा यह कि ताल ठोककर सामना करने के लिए तैयार हो जाया जाए।

इसे एक कहानी के जरिए समझते हैं। एक व्यक्ति है जिसका नाम मान लीजिए कि श्याम लाल है। वह एक सरकारी अथवा प्राइवेट, एक ऐसे दफ्तर में काम करता है जिसमें बाहरी लोगों यानी पब्लिक से संपर्क करना पड़ता है यानी अधिकारी और जनता का रिश्ता है।

श्याम लाल अपने काम में माहिर है, वह नियमानुसार काम करता है और फैसला लेता है ताकि उसकी तरफ से न तो किसी को कोई परेशानी हो और न ही किसी के साथ ढील या नरमी बरतने का आक्षेप उस पर लगाया जा सके।

श्याम लाल का बॉस रामसिंह है जो एक तरफ अपनी सख्त मिजाजी के लिए जाना जाता है तो दूसरी तरफ वह अपने से ऊपर के अधिकारियों को खुश करने या अपनी कुछ अतिरिक्त कमाई के लिए मौकों की तलाश में रहता है। मतलब वह शातिर दिमाग है और इस जुगत में रहता है कि वह अगर कुछ गड़बड़ी भी करे तो उस पर दोष न आए और जरूरत पड़ने पर वह इसके लिए अपने किसी मातहत पर इस सब का ठीकरा फोड़ सके, अर्थात वह तो साफ बच जाए और कोई दूसरा फैंस जाए।

राम सिंह अपने फायदे के लिए श्याम लाल पर दबाव डालता है कि वह उसके कहे अनुसार काम करे और नियमों की परवाह न करते हुए उसके मुंह जबानी आदेशों का पालन करे।

राम सिंह के सामने दो रास्ते हैं, एक यह कि वह अपने दिल और दिमाग को गलत काम करने के लिए मना कर अपने बॉस के कहे अनुसार कार्यवाही करे और दूसरा यह कि बॉस  का कोपभजन बने। वह यह देखता है कि उसके साथ काम करने वाले भी बॉस की सख्ती और दबदबे के कारण उसकी बात मान लेने में ही अपनी भलाई समझते हैं। उसके सामने सांप छछूंदर जैसी स्थिति हो जाती है कि न निगलते बने और न ही उगलते ही बने।

वह घर आता है और अपनी विवशता पर चीख चीख कर रोता है, निराशा और तनाव इतना है कि जिंदगी बोझ लगने लगती है, वह परिवार वाला है, अपनी जिम्मेदारियों को भी समझता है लेकिन साथ ही गलत काम कर जीवन भर डरते हुए जीना भी नहीं चाहता। कशमकश इतनी है कि मन में उलझन का कोई तोड़ नहीं मिलता और उसकी हालत शरीर और दिमाग दोनों ही तरफ से टूटने जैसी हो जाती है।

वह पार्क में बैठता है, बाजार में बेमतलब घूमता रहता है और फिर बिना कुछ सोचे नदी की तरफ निकल जाता है। नदी को बहते देखता है तो सोचता है कि इसके साथ ही बह जाए लेकिन तब ही उसकी उलझन के सुलझने जैसा एक झटका उसे लगता है। वह सोचता है कि इस तरह तो रामसिंह जीत जाएगा और वह हार जाएगा। वह निर्णय करता है कि हारेगा नहीं बल्कि रामसिंह का सामना करेगा।

निर्णायक कदम

अगले दिन श्याम लाल अपने बॉस राम सिंह का सामना करते हुए उसके कहे मुताबिक और नियमों के विरुद्ध कुछ भी करने से इंकार कर देता है। परिणाम उसकी गोपनीय रिपोर्ट के खराब कर दिए जाने, पब्लिक से रिश्वत लेने, अपने पद का दुरुपयोग करने और आगे बढ़ने के सभी रास्ते बंद हो जाने के रूप मै निकलता है।

राम सिंह यहीं नहीं रुका, वह उसे सबके सामने अपमानित करने से नहीं चूकता और उसका मानसिक संतुलन बिगाड़ने का कोई मौका नहीं जाने देता। ऐसी ही एक अवस्था में श्याम लाल सब कुछ भूलकर राम सिंह का गला पकड़कर ऐसा दांव लगाता है कि वह जमीन पर धराशाई हो जाता है।

इसके बाद श्याम लाल अपने विभागाध्यक्ष के पास जाकर रामसिंह को पटकने की बात और उसका कारण भी विस्तार से बता देता है। वह वहां से वापिस आ रहा होता है तो उसे रामसिंह अंदर कमरे में जाता दिखाई देता है।

विभागीय जांच में श्याम लाल निर्दोष और रामसिंह के काले कारनामों का पर्दाफाश हो जाता है। श्याम लाल को एक नसीहत मिलती है  और राम सिंह को जेल हो जाती है।
यह कहानी यहीं तक है लेकिन इसे अन्याय के सामने न झुकने की मिसाल और अपनी उलझन के सुलझने और आत्महत्या की प्रवृत्ति के खिलाफ एक उदाहरण के रूप में तो रखा ही जा सकता है !


अब प्रश्न यह है कि श्याम लाल क्या अपने वर्तमान पद पर रहे, कोई दूसरी नौकरी या व्यवसाय कर ले या इतनी बड़ी दुनिया में अपने लिए कोई नई जगह तलाश करे जहां शोषण न होता हो, ईमानदारी से सब काम होता हो और मेहनत का पूरा मुआवजा मिलता हो ? जरा सोचिए और चिंतन कीजिए कि यदि किसी के सामने समझौता करने और सामना करने में से एक को चुनना हो तो किसे चुना जाएगा ! जरा सोचिए ?

अंत में

विश्व योग दिवस के अवसर पर कुछ ऐसे आसन या क्रियाएं सीख कर उन की प्रैक्टिस करना शुरू कर सकते हैं, जिनसे तनाव, नकारात्मक विचार, निराशा और आत्मघाती सोच का इलाज हो सकता है। इसके अतिरिक्त अतीत को ढोते रहना या भविष्य के बारे में सोच कर अपना वर्तमान खराब कर लेने में कोई समझदारी नहीं है।


भारत

शुक्रवार, 12 जून 2020

कृषि सुधार या किसान के लिए दूर के ढोल सुहावने










कोरोना की महामारी के दौरान सरकार द्वारा खेतीबाड़ी के क्षेत्र में जो अध्यादेश के माध्यम से नए कानून लाए गए हैं उनके बारे में यह शंका करना नितांत गलत भी नहीं है कि इनसे अन्नदाता की पहले से खराब आर्थिक सेहत का कोई उपचार नहीं  होने वाला है बल्कि यह उन्हें और अधिक असहाय और कमजोर करने वाला है और इसका फायदा केवल उन्हें मिल सकेगा जो पहले से ही अमीर किसान हैं तथा सभी प्रकार से साधन सम्पन्न हैं।

जिनके  पास पैसे और डंडे दोनों की ताकत है जिसके बल पर वे छोटे और मझौले किसान तक को अपनी शर्तो पर खेती करने और उपज बेचने के लिए विवश कर सकते हैं, यह कानून उनके लिए ही फायदेमंद है, यह शंका निर्मूल नहीं है।


बंधुआ खेती की शुरुआत

अभी तक बंधुआ मजदूर और खेतिहर कामगार की बात कही सुनी जाती थी लेकिन अब इस कानून से यह डर पैदा हो गया है कि कहीं पूरी की पूरी खेतीबाड़ी ही  बंधुआ तो नहीं हो जाएगी।

इस शंका के अनेक कारण हैं जिन पर सरकार और किसान संगठनों को मिलकर कोई नीति बनानी होगी जिससे यह डर किसान के मन से निकल सके कि खेती तो वह करे लेकिन उसकी कीमत का फैसला कोई और करे जो अपनी ताकत और दबंगई से किसान को सदियों से घुटने टेकने के लिए मजबूर करता रहा है।


सबसे पहला डर तो यह है कि हमारे तीन चैथाई के लगभग किसान अनपढ़ या मामूली पढ़े लिखे हैं, उनके बच्चों को भी वह सब तो पढ़ने को मिला जो उन्हें शहर तक पहुंचा सके लेकिन उन्नत खेतीबाड़ी कैसे हो, विज्ञान और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल खेती करने के काम में कैसे होता है,  वह अपनी फसल की सुरक्षा कैसे कर सकते हैं या फिर उपज के अच्छे दाम कहां मिल सकते हैं, यह सब उन्हें पढ़ाया ही नहीं गया और वे क्या पढ़ते या क्या नहीं पढ़ते और कौन पढ़ाता, जबकि गांव के विद्यार्थियों के लिए कोई खेतीबाड़ी से जुड़ा सिलेबस ही आज तक नहीं बन पाया तो फिर पढ़ाने वाले भी कहां से आते। जो कुछेक कोर्स हैं भी तो वे इतने उबाऊ हैं कि कोई पढ़ना नहीं चाहता, हां केवल डिग्री मिल जाए और किसी कृषि संस्थान में नौकर हो जाएं, उससे अधिक इन पाठ्यक्रमों का कोई महत्व ही नहीं है।


दूसरा डर यह है कि सरकार की तरफ से गांव देहात में कोई ऐसी मशीनरी यानी इंफ्रास्ट्रक्चर या ढांचा ही बना कर किसान को नहीं दिया गया जो सटीक और लाभकारी जानकारी तथा वास्तविकता का ज्ञान उसे करा सके। केवल हाथ में मोबाइल और इंटरनेट से मनोरंजन की सुविधा देने से ही कुछ नहीं होता।


कृषि सूचना केंद्र या ऐसे ही नाम के लिए बनाई गई इकाइयों की दुर्दशा की बात न ही की जाय तो बेहतर है। ये सब निकम्मों को रोजगार देने और निठल्लों की आवारागर्दी की जगहें हैं, किसी भी केंद्र में जाकर देख लीजिए, हकीकत यही मिलेगी।


तीसरा डर यह है कि अब कॉरपोरेट घरानों और मंडियों के दलालों द्वारा  मिलकर किसान के अज्ञान और उसके पास बाजार की सही जानकारी का अभाव होने का फायदा उठाने का दौर शुरू हो सकता है।


किसान की गरीबी, उसकी कमजोर आर्थिक स्थिति तथा परिवार के सदस्यों के बीच बिखराव होने का लाभ ये कंपनियां पूरी तरह उठाएंगी क्योंकि यह शुद्ध मुनाफे के सिद्धांत पर काम करती है, उनका किसान की भलाई से न कोई लेना देना होता है और न वे उसके प्रति कोई सहानुभूति रखती हैं, इसलिए अपने ही नियम कायदों के अनुसार किसान को बंधुआ खेती करने के कॉन्ट्रैक्ट, एग्रीमेंट या समझौते पर अंगूठा लगाने या दस्तखत करने के लिए मना ही लेंगी।


इस बंधुआ खेती में पसीना तो किसान का बहेगा और हालांकि उसका मुआवजा उसे मिलेगा  लेकिन खेत की पैदावार और उसके मुनाफे पर उसका कोई अधिकार नहीं होगा। इस तरह के समझौते कुछ महीनों के न होकर दसियों वर्ष के होंगे, उसे बस एकमुश्त रकम मिल जाएगी जिससे बेशक वह परिवार के पालन पोषण की चिंता से मुक्त हो जाएगा लेकिन तरक्की करने, अधिक पैसा कमाने या कोई बड़ा सपना देखने की हिम्मत वह कभी नहीं जुटा पाएगा।


इसका एक बड़ा कारण यह है कि किसान के लिए बिजली, बीज, कीटनाशक, खाद और जरूरी उपकरण बहुत महंगे साबित होते हैं जिनके लिए वह कर्जा लेता है और ब्याज की किश्त तो भर देता है लेकिन कभी मूलधन नहीं चुका पाता और फिर कर्ज के माफ कर दिए जाने का इंतजार करता है। ऐसे में वह यही बेहतर समझेगा कि इन घरानों के हाथ ही अपने को गिरवी रख दिया जाय।


कृषि उद्यमियों के लिए अवसर

अपने आप में यह नए कानून कोई ज्यादा खराब नहीं हैं बल्कि एक तरह से
कृषि सुधारों को ध्यान में रखते हुए साहसिक कदम हैं। इनसे मंडियों का वर्चस्व और उनके जरिए नेतागिरी और राजनीतिक दलों की दखलंदाजी पर लगाम लग सकेगी। अभी तो यह मंडियां यानी एपीएमसी नेताओं का अखाड़ा और किसान की मजबूरी का कारण  बनी हुई हैं।

इन कानूनों से जहां कॉरपोरेट घरानों का प्रवेश कृषि क्षेत्र में होने से धन और साधनों की कमी नहीं रहेगी, वहां खेतीबाड़ी और उससे जुड़े व्यवसायों में नए उद्यमियों को अपनी किस्मत आजमाने का मौका भी मिल सकेगा।

शहरों के पढ़े लिखे युवा और जिनकी जड़े गांव देहात में हैं, वे कृषि और ग्रामीण उद्योग के क्षेत्र में अपनी योग्यता के बल पर ऐसी इकाईयां खोल सकते हैं जिनकी सबसे ज्यादा जरूरत हमारे किसानों और ग्रामवासियों को है।

इनमें हॉर्टिकलचर, हर्बल, ऑर्गेनिक खेती और थोड़ी जमीन और कम समय में पैदा होनेवाली मुनाफे वाली फसलों का उत्पादन किया जा सकता है जिनकी मार्केट बहुत तेजी से बढ़ रही है और उनकी कमी होने से विदेशों से आयात करना पड़ता है।

नए उद्यमियों के लिए कोल्ड स्टोरेज, भंडारण के आधुनिक तकनीक पर आधारित उपकरण और प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की भारी संभावनाएं हैं। एक जिला, एक उपज के आधार पर प्रोसेसिंग इकाइयों का वर्गीकरण किया जा सकता है।

सरकार ने यह सोचकर ही तय किया होगा कि ऋण लेने से लेकर खरीद और मार्केटिंग का इंतजाम करने से और कृषि क्षेत्र में युवाशक्ति की रुचि बढ़ाकर ही खेतीबाड़ी और उससे जुड़े काम धंधों में देश विश्व में एक अग्रणी ताकत बन सकता है।

यह समय अपने व्यवसाय बदलने का भी है क्योंकि इस महामारी ने जिन काम धंधों को चैपट कर दिया है, उन्हें छोड़कर कोई नया काम अर्थात उद्यम शुरू करने में ही समझदारी है क्योंकि उद्यमशील व्यक्ति के लिए किसी भी मुसीबत से बाहर निकलना हमेशा संभव है। 

(भारत)


शुक्रवार, 5 जून 2020

पर्यावरण सुरक्षा के लिए जरूरी जनसंख्या नियंत्रण







सन् 1974 से प्रत्येक वर्ष पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है और इसके लिए बहुत सोच समझ कर एक थीम चुना जाता है जिस पर पूरे साल काम किया जाता है। इस साल का थीम है कि हमारी जो बायो डायवर्सिटी यानी जैव विविधता है, उसकी रक्षा की जाए ताकि प्रकृति के साथ मेल मिलाप रखते हुए और संतुलन बिठाकर मानव की सुरक्षा निश्चित की जा सके।

यह जैव विविधता क्या है, और कुछ नहीं कुदरत ने जो हमारी सुविधा और जीवन यापन करने के लिए प्राकृतिक खजानों का भंडार विभिन्न रूपों में दिया है, बस वही है। यह अनमोल वस्तुएं हमारे चारों ओर जल, जंगल, जमीन, पर्वत के रूप में बिखरी पड़ी हैं। अब यह मनुष्य की सोच है कि वह इनका उपयोग कैसे करता है। वह सोने का अंडा देने वाली मुर्गी से हर रोज एक अंडा लेना चाहता है या एक साथ सारे अंडे लेने के लालच में मुर्गी को ही हलाल कर देता है। इसे अपने पैरों पर स्वयं कुल्हाड़ी मारना भी कह सकते हैं।

महामारी का प्रसाद

जहां एक ओर कोविड की विश्व व्यापी बीमारी ने प्रत्येक व्यक्ति का जीवन जोखिम में डाल दिया है, उसे घर में ही रहने को मजबूर कर दिया है और वह भी दो चार दिन नहीं, महीनों तक के लिए, क्या दफ्तर, क्या उद्योग और कल कारखाने, सब कुछ बंद कर दिए, वहां दूसरी ओर इसका एक फायदा यह भी हुआ है कि जिन कुदरती संसाधनों के साथ हम खिलवाड़ करते रहे उन्हें फिर से अपने मौलिक स्वरूप में लौटने का अवसर भी मिला है।

साफ आसमान, सांस लेने को शुद्ध वायु, नदियों में शीतल, स्वच्छ जल की धारा, पर्वतों पर हरियाली और जंगलों में पेड़ पौधों और वनस्पतियों का पोषण इन दिनों बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप या दोहन के हो रहा है।

इसी के साथ यह चेतावनी भी कि यदि जरूरत से ज्यादा प्राकृतिक संसाधनों का दोहन फिर से करना शुरू कर दिया तो उसके परिणाम  भयंकर होंगे। कोलकाता में डॉल्फिन तीस साल बाद दिखाई दी, हरिद्वार में गंगा का जल निर्मल हो गया, कांगड़ा से हिमालय पर्वत अपनी धौलाधार श्रृंखला से साफ नजर आने लगा, समुद्र में जीव स्पष्टता से दिखाई देने लगे। एक तरह से भारत ही नहीं, पूरी दुनिया का  कायाकल्प हो गया।

दुरुपयोग करना मजबूरी है

यह कहना न केवल बहुत आसान है बल्कि एक तरह से प्रवचन या उपदेश देने जैसा है कि मनुष्य जल हो या जंगल उनका संरक्षण करे, नदियों में औद्योगिक रसायन प्रवाहित कर उन्हें प्रदूषित और जहरीला न बनाए, वन विनाश न करे और वनस्पतियों का संरक्षण करते हुए जैव विविधता को बनाए रखे।

अब क्योंकि यह संभव नहीं है, इसलिए चाहे जितने कानून बन जाएं, कितनी भी पाबंदियां लगा दी जाएं, प्राकृतिक संसाधनों का गलत इस्तेमाल करना जारी रहता है जो खुलकर न सही, चोरी छिपे होता है और इसमें किसी के लिए भी कुछ करना असंभव है।

आबादी की जरूरतें और समस्या

अगर हमें अपनी आबादी का भरण पोषण करना है तो जल, जंगल, जमीन और पर्वतों का शोषण किए बिना यह मुमकिन नहीं है क्योंकि जिस गति से हमारी जनसंख्या बढ़ रही है उसकी जरूरतों को पूरा करने के लिए यह आवश्यक है कि इन प्राकृतिक संसाधनों का जितना भी संभव हो, उतना ही नहीं बल्कि उससे अधिक ही हम उनका दोहन करें। अब इससे हमारा इको सिस्टम बिगड़ता है, संतुलन गड़बड़ा जाता है तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हमारी आबादी इतनी अधिक है कि उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यह जरूरी है।

अगर रहने को घर चाहिए तो लकड़ी के लिए जंगल काटेंगे ही, भवन निर्माण सामग्री के लिए उद्योग भी लगेंगे  और प्रदूषण न हो, यह संभव नहीं। आवागमन के साधन तैयार करने के लिए भी प्राकृतिक साधन चाहिएं। खाने पीने की चीजें हों या पहनने ओढ़ने के लिए वस्त्र, इन सब के लिए कृषि उत्पाद और प्रोसेसिंग कारखाने भी जरूरी हो जाते हैं।

आधुनिक जीवन शैली के लिए जो भी जरूरी है वह सब प्राप्त करना है तो औद्योगिक क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित करने वाले उद्योग लगाने होंगे, अब इनसे प्रदूषण बढ़ता है तो उसे टेक्नोलॉजी के  इस्तेमाल से नियंत्रित तो किया जा सकता है लेकिन रोका नहीं जा सकता।

आज संसार में जितने भी विकसित देश हैं उन्होंने यह समझ लिया था कि अगर आबादी की रोकथाम नहीं की गई तो विकास की ऊंचाइयां हासिल करना असम्भव है। सबसे बड़ी आबादी वाले चीन ने भी इस बात को समझ लिया था और उसने भी जनसंख्या को नियंत्रित करने के उपाय कर लिए थे।

भारत के लिए अपनी विकास यात्रा को किसी मुकाम पर पहुंचने के लिए जरूरी है कि आबादी को बेलगाम बढ़ने से रोकने के तरीके अपनाए जाएं और इसके लिए कानून का सहारा भी लिया जाए तो कोई बुराई नहीं है।

पर्यावरण सुरक्षा

इस बार पर्यावरण वर्ष मनाने के लिए जर्मनी के सहयोग से कोलंबिया क्षेत्र को चुना गया है। यह स्थान अपने वनों, वनसंपदा और वन्य जीवों के लिए प्रसिद्ध है। आधुनिक साधनों जैसे कि मानव रहित यान, ड्रोन और आधुनिक संयंत्रों के इस्तेमाल से इस इलाके की जैव विविधता का अध्ययन किया जाएगा ताकि उससे मानव को किस प्रकार लाभान्वित किया जा सके।

जहां तक हमारी बात है,  देश में प्राकृतिक रूप से वे सब संसाधन उपलब्ध हैं जो हमें विश्व का सिरमौर बना सकते हैं। हमारी जड़ी बूटियां, वनस्पतियां, औषधीय गुणों से युक्त पेड़ पौधे और हिमालय पर्वत की विभिन्न श्रृंखलाओं में समाई वनसम्पदा दुनिया में और किसी स्थान पर नहीं है।

यह विडम्बना ही नहीं दुर्भाग्य भी है कि हम अपने अनमोल खजाने का या तो अंधाधुंध दोहन कर रहे है या फिर उसकी स्मगलिंग करा रहे हैं। यदि इसे रोका जा सके तो इस पर्यावरण वर्ष में देश पर यह उपकार होगा और देशवासियों का जीवन समृद्ध होगा। इसी के साथ वन्य जीवों के संरक्षण और संवर्धन के लिए उचित उपाय किए जा सकें तो यह सोने पर सुहागा होगा।

(भारत)


शुक्रवार, 29 मई 2020

चलो गांव की ओर को सार्थक करने का समय











जब यह तय हो ही गया है कि कोविड महामारी के साथ तब तक जीना होगा जब तक इसका कोई उपचार नहीं निकल जाता तो फिर अपनी जीवन शैली और रहना सहना बदल लेने में क्या हर्ज है, बजाय इसके कि बीमारी से पहले जिस तरह जीते थे, उसे याद कर अपना मन दुखी किया जाए।

सरकार ने इस बीमारी के दौरान बहुत से राहत पैकेज ऑफर किए हैं जो एक तरह से उन वायदों को पूरा करने की ओर पहला कदम है जो इस साल बजट में किए गए थे । इसलिए यह समझना कि ये पैकेज इस बीमारी से उपजी समस्याओं का कोई निराकरण है तो यह गलतफमियों को अपने साथ लेकर चलने जैसा होगा।

कृषि और ग्रामीण उद्योग

जिन क्षेत्रों में राहत पैकेज की घोषणा की गई है उनमें प्रमुख रूप से कृषि तथा छोटे और मझौले उद्यमियों को विशेष लाभ पहुंचाना है, बशर्ते इन योजनाओं को लागू करने के लिए  सरकारी विभाग, संस्थान और विशेष रूप से बैंक सहयोग करें जो केवल तब ही हो सकता है जब सरकार अपने डंडे यानी दंड का इस्तेमाल करने मै कोताही न करे और लाभार्थी अपने अधिकार के छीने जाने की कोशिश को नाकामयाब कर दें और इसके लिए आवेदन, शिकायत, धरना, प्रदर्शन या जो भी विधिसम्मत तरीका हो उसे अपनाएं।

सरकार ने बजट में कृषि और कृषकों की उन्नति के लिए जो प्रावधान किए थे, उनमें किसानों को अपनी उपज के निर्यात का लक्ष्य बनाकर काम करना, खेतीबाड़ी में नए औजार, तकनीक और कृषि टेक्नोलॉजी का भरपूर इस्तेमाल तथा सिंचाई के लिए पानी की एहतियात बरतने के उपाय, पशुपालन, डेयरी उद्योग तथा मत्स्य पालन को आमदनी का प्रमुख स्रोत बनाना था।


इन सब घोषणाओं का एक ही मकसद था कि जब तक किसान का परंपरागत खेती से ध्यान हटाकर उसे खेतीबाड़ी से जुड़ी  गैर कृषि गतिविधियों से नहीं जोड़ा जाएगा तब तक किसान की आय को 2022-23 तक दुगुना करने के वायदे को पूरा करना असम्भव है।

एक तीर अनेक निशाने

जहां तक इस महामारी का संबंध है तो इसे एक ऐसे मौके की तरह सरकार ने इस्तेमाल किया है जिससे वो एक तीर से कई निशाने लगा सकती है।

सबसे पहले तो विपक्ष खास तौर से कांग्रेस के इस मंसूबे पर पानी फिर गया कि उसकी यह बात कि गरीबों, किसानों के खातों में पहले 7500 और अब दस हजार रुपए डालने की बात अगर सरकार मान लेती है तो उसका खजाना इस एक ही झटके से काफी हद तक खाली हो जाएगा और तब सरकार के प्रति जनता का अविश्वास बढ़ाना आसान हो जाएगा।

दूसरा निशाना यह लगा कि जब शहरों में इस महामारी ने काम धंधे चैपट कर दिए हैं तो लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों में लौटने और वहां या तो अपनी जमीन में खेतीबाड़ी करने और अगर जमीन नहीं है तो कोई गैर कृषि उद्योग शुरू कर दें जिसके लिए सरकार ने बैंकों से यहां तक कह दिया है कि वे उसे भी ऋण दें जिसकी चुकाने की हैसियत न हो, मतलब बिना किसी गारंटी के पैसा दें और अगर वह आगे चलकर सभी सुविधाओं का लाभ उठाने के बाद भी कर्जा नहीं उतार पाता है तो सरकार उसकी भरपाई करेगी।

यह जो अब बीमारी के दौरान मजदूरों का शहरों से मोहभंग होने के कारण पलायन हुआ है, भाजपा शासित सरकारों ने उन्हें अपने ही प्रदेशों में रोक रखने के लिए प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया है। गैर भाजपा सरकारों के लिए भी यह सुनहरा अवसर है कि वे अपने प्रदेशों में अपने लोगों के वापिस लौटने के बाद उन्हें अपने यहां रोके रखने के उपाय करें और उन्हें इतनी सहूलियत प्रदान कर दें कि वे शहरों की तरफ रोजी रोटी कमाने के लिए अपना रुख न करें।

तीसरा निशाना यह लगा कि अब जिन लोगों ने ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी जमीन की दुर्दशा की हुई थी, वे सभी और जिन्होंने किसी भी लालच जैसे कि अधिग्रहण होने पर मुआवजा लेने या कभी वहां कोई रोजगार शुरू करने की संभावना की उम्मीद  में आकर गांव देहात में जमीन खरीद ली थी, वे भी अब उस जमीन पर अब खेतीबाड़ी करने या खेती से जुड़ा कोई उद्योग जैसे प्रोसेसिंग यूनिट, वेयरहाउस, पोलिफार्म, अनाज का गोदाम  या ऐसा ही कुछ खोल सकते हैं।

अगर यह सब करने में रुचि नहीं है और जमीन का इस्तेमाल भी करना है तो इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता कि वहां पशुपालन, डेयरी फार्म या मत्स्य पालन शुरू कर दें। और अगर कुछ न कर सकें तो ऐसी दुकान, सर्विस सेंटर खोल लें जो किसानों और दूसरे उद्यमियों को वाजिब दाम पर आधुनिक यंत्र और टेक्नोलॉजी से लेकर उन्हें अपनी जरूरत की सलाह दे सकें।

यह भी एक व्यवसाय ही होगा कि शिक्षित युवा इस तरह के सम्मेलन, आयोजन या सर्वेक्षण जैसे काम कर सकते हैं जिनमें  बैंकों के अधिकारी, कृषि वैज्ञानिक या सरकारी अधिकारी गांव वालों का मार्गदर्शन करने के लिए बुलाए जा सकते हों।

ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इस जानकारी का अभाव रहता है कि सिंचाई, फसल, बीज, मंडी तथा बाजार से संबंधित सवालों के जवाब किसके पास होंगे। अगर कोई युवा इन प्रश्नों के उत्तर देने का ही काम शुरू कर दे तो यह अपने आप में ही अच्छा खासा उद्यम है। अभी भी इंटरनेट सामान्य ग्रामवासी की समझ में कम ही आता है, अगर कोई युवा इसे ही समझाने का कार्यालय खोल ले और साथ ही ग्रामवासियों को चाहे उत्पादन से संबंधित जानकारी हो या फिर किसी योजना से लेकर कानून तक की जानकारी देनी हो तो उससे ही उसकी कमाई हो सकती है।

ऐसा नहीं है कि पहले इन सब चीजों की जरूरत नहीं थी लेकिन तब इनकी आवश्यकता  नहीं थी क्योंकि इनका उपयोग करने वाले गिने चुने थे लेकिन अब स्थिति विपरीत है। अब जरूरतमंद भी हैं और इंटरनेट तथा मोबाइल टेक्नोलॉजी भी बहुत आसान, बेहतर और सस्ती हो गई है।

सरकार ने यह जो एमएसएमई की परिभाषा बदली है तो यह कदम देर से ही सही लेकिन दुरुस्त है। इसमें सर्विस यानी सेवा प्रदाताओं को भी शामिल कर एक सही और सार्थक कदम उठाया गया है जिसके अच्छे नतीजे निकलेंगे, बशर्ते कि इनका रुख केवल शहरों की ओर न हो बल्कि गांव की ओर भी हो।

मुजतबा हुसैन

जब कोई ऐसा लेख, खाका या निबंध पढ़ने को मिले जिसे पढ़ते पढ़ते मन में गुदगुदी और चेहरे पर मुस्कान दिखाई देने लगे तो इसे लिखने वाले की खूबी कहा जाएगा। ऐसे ही एक लेखक, व्यंग्य विधा में कमाल के व्यंग्यकार और हास्य को फूहड़पन के बजाय शालीनता से प्रस्तुत कर सकने में महारत रखने वाले जनाब मुजतबा हुसैन अब हमारे बीच नहीं हैं। वे हालांकि उर्दू में लिखते थे लेकिन हिंदी में भी बेहद लोकप्रिय थे।
देश के मूर्धन्य साहित्यकारों में उनका अग्रणी स्थान था और सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी नवाजा था।

लगभग 25-30 साल पहले उनसे मेरे सहपाठी, अभिन्न मित्र और आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से जुड़े शरद दत्त ने मिलवाया था और उसके बाद से  अपने बड़े भाई और मार्गदर्शक के रूप में ही उनकी छवि  हमेशा के लिए मन में अंकित हो गई। उनके लेखन से कुछ मोती निकालकर मैंने सन 2001 में अजब मिर्जा गजब मिर्जा शीर्षक से ई टी वी उर्दू के लिए 52 एपिसोड का धारावाहिक बनाया था जिसकी लोकप्रियता उन दिनों इतनी थी कि कथानक की नकल दूसरे चैनलों पर भी नजर आने लगी थी। इसी तरह उनके मार्गदर्शन में दूरदर्शन उर्दू के लिए 2013 में हंसी के हसीन लम्हे शीर्षक से 13 एपिसोड का धारावाहिक बनाया था जिसमें उनकी कहानी डायरेक्टर का कुत्ता भी शामिल थी। इसमें विभिन्न हास्य व्यंग्य के फनकारों की कहानियां शामिल की गई थीं जिनका चयन करने में मुजतबा हुसैन का बहुत योगदान था।

वे जो लिखते थे, वह एक बार पढ़ने के बाद भूलता नहीं था, यही उनके लेखन की विशेषता थी। उनके निधन से इस विधा की अपूरणीय क्षति हुई है।



Email – pooranchandsarin@gmail.com

भारत 

शुक्रवार, 22 मई 2020

मजदूर को भिखारी समझना मेहनतकश इंसान का अपमान और सामाजिक कलंक है











कोविड 19 की महामारी ने भारत के आम नागरिक को जहां एक ओर सेहत के मायने, पढ़ाई लिखाई की अहमियत और रोजगार न रहने और भूख लगने की मजबूरी होने पर भिखारी की तरह हाथ फैलाने की बेबसी को उजागर किया है, वहां दूसरी ओर सरकारों की उदासीनता से लेकर उनकी नीतियों की खामियां, नेताओं के ढकोसले और साधन संपन्न अर्थात पैसे वाले कारखाना मालिकों, ठेकेदारों और उद्योगपतियों की उन लोगों के दर्द को न समझकर मुंह फेर लेने की हकीकत दिखाई है। यहां तक कि उन लोगों की मानसिकता का भी पर्दाफाश किया है जो इनसे काम लेते वक्त वे उन्हें अपने परिवार का सदस्य तक कहने में कोई हिचकिचाहट महसूस नहीं करते थे और उन्हें बरगलाने से लेकर उनका शोषण तक करते रहते थे तथा सही मजदूरी तक न देने का कोई न कोई बहाना ढूंढते रहते थे।

इनकी पहचान क्या है ?

आखिर ये कौन लोग हैं, इनका जन्म किन परिस्थितियों में हुआ और कैसे इनके परिश्रम से फलने फूलने वालों के लिए ये अचानक प्रवासी मजदूर बन गए जिनका कोई संरक्षक नहीं।  कानून तक खामोश है और ये पैदल ही या जैसे तैसे किसी भी सवारी का जुगाड कर अपने उस आशियाने की तरफ लौट रहे हैं जिसे वे बरसों पहले किसी के अच्छी जिन्दगी की उम्मीद दिलाने या स्वयं ही फैसला करने पर कि शायद उनका जीवन बेहतर हो जाएगा, छोड़ आए थे। लेकिन वहां उनके लिए कुछ करने को बचा भी है या नहीं और क्या उन्हें वहां स्वीकार किया जाएगा या वे वास्तविकता को मंजूर करेंगे, कहना न केवल कठिन है बल्कि हृदय विदारक भी है।

श्रमिक कानूनों का खोखलापन

आजादी मिलने की प्रक्रिया के दौरान ही हमारे देश में आज जो भी मजदूरों, कामगारों को लेकर कानून दिखाई पड़ते है, उनके बनने की शुरुआत हो चुकी थी। इसका मतलब यह है कि सरकार से लेकर मिल मालिकों, उद्योगपतियों तक को यह पता था कि इन लोगों को किसी भी तरह अपने पास रखना न केवल असलियत है बल्कि यदि इनका ख्याल न रखा तो ये अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा।

इसी के साथ सच यह भी था कि सरकार और देश के सभी संसाधनों पर इनका कब्जा था और ये ऐसे कानून बनवाने में सफल हो गए जिससे सरकार भी खुश हो जाए और इनके लिए काम करने वाले मजदूर भी अपने मालिकों के एहसानमंद हो जाएं।

ये अमीर लोग और सरकार इन मेहनतकश, ईमानदार और वफादारी को अपना ईमान मानने वालों को दो टुकड़ों में बांटने में कामयाब हो गए जिन्हें हम संगठित और असंगठित क्षेत्र के नाम से जानते हैं।

यह कैसा भेदभाव ?

इसका मतलब यह हुआ कि सरकार और उसके उद्यमों में काम करने वाले, बैंकों और निजी क्षेत्र के बड़े उद्योगों के कामगार और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चलने वाले व्यापार के लिए बनाई गई कंपनियों के कर्मचारी तो सभी प्रकार से कानून की सुरक्षा के दायरे में आ गए जो केवल लगभग एक चैथाई थे लेकिन बाकी बचे लोग असंगठित क्षेत्र के मान लिए गए जिनमें दिहाड़ी मजदूर, ठेके पर काम करने वाले, निजी दफ्तरों के बाबू, चपरासी, सफाईकर्मी, ड्राइवर, घरेलू नौकर, रसोइए, प्लम्बर, इलेक्ट्रीशियन, कुली, माल ढोने वाले, दुकानों के सेल्समैन, छोटा मोटा कोई भी काम धंधा जैसे सब्जी या किराने का ठेला लगाने वाले और इसी तरह के काम जिन्हें अक्सर छोटा या मामूली समझा जाता है, उन्हें करने वाले कुल श्रमिक आबादी के तीन चैथाई लोग थे।

इनके लिए छुट्टी का मतलब वेतन न मिलना, बीमार होने पर भी या तो ड्यूटी पर जाना वरना दिहाड़ी कटना और किसी भी तरह की कानूनी सुरक्षा न होना है। मजे की बात यह है कि ये ही लोग नोटबंदी के दौरान अपने मालिकों को नए नोट लाकर देते रहे, उनके सभी गैर कानूनी कामों के जानकार होने पर भी मुंह बंद किए रहे और यहां तक वफादारी निभाते रहे कि मालिक के गंभीर अपराधों तक को अपने सिर लेते रहे और वक््त पड़ने पर इन्हें ही सबसे अधिक पीड़ा का शिकार होना पड़ा।

शर्मनाक अमानवीयता

विडम्बना यह है कि चाहे औद्योगिक मंदी का दौर हो या आज की तरह महामारी का सामना हो, सबसे पहले वेतन में कटौती से लेकर छटनी तक इन्हीं लोगों की होती है।

यह न केवल किसी भी सरकार और समाज के लिए लज्जा की बात है बल्कि शर्मनाक भी है कि इन परिश्रमी और खुद्दार लोगों को इस आपदा के समय दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज होना पड़ा, लाइन में लगकर दाल रोटी लेनी पड़ी और जब सब्र का बांध टूट गया तो अपना डोली डंडा, कनस्तर, बिस्तर उठाकर पैदल ही सैकड़ों हजारों मील अपने उस घर की तरफ निकल पड़े जिसे बरसों पहले वीरान कर आए थे।
अभी तो क्या, आजादी से लेकर आज तक किसी भी प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, श्रम मंत्री और मुख्यमंत्री, राज्यपाल से लेकर राष्ट्रपति ने असंगठित क्षेत्र की इतनी विशाल आबादी के लिए न तो कोई कानून बनाने की पहल की और न ही श्रमिक मजदूरों की नेतागिरी के बल पर अपनी रोटियां सेंकने वाले नेताओं ने कोई ऐसा आंदोलन किया जिससे इन्हें अपनी नौकरी, रोजगार या व्यवसाय की कानूनन सुरक्षा मिल सके।

अकेलेपन का एहसास

जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि ये लोग असंगठित हैं अर्थात लड़ाई में अकेले हैं और इस कहावत को सिद्ध करते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता तो फिर क्या सरकार का यह कर्तव्य नहीं हो जाता कि इनके लिए इस तरह के कानून बनाए और प्रशासन तथा व्यवस्था को उनके लागू करने के लिए तैयार करे जिससे किसी भी मुसीबत, प्राकृतिक आपदा और महामारी के समय उनका मान सम्मान और जीवन सुरक्षित रह सके।

किसी भी समाजसेवक, नेता और यूनियन लीडर के लिए वर्तमान समय से बेहतर और कौन सा वक््त आएगा जिसमें वे अपनी नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन कर सकें और इस विशाल आबादी की भलाई के लिए सरकारी हो या निजी क्षेत्र, सब को इस वर्ग की कभी भी अपेक्षा न करने के लिए न केवल कानूनन मजबूर कर सकें बल्कि इनकी कीमत का अंदाजा भी करा दें कि अगर इनके साथ कोई छेड़छाड़ या अमानवीय हरकत हुई तो उसकी जिम्मेदारी तथाकथित सभ्य और संपन्न समाज की होगी और जिसका खामियाजा और दंड उन्हें ही भुगतना होगा।

यह कोई मजदूर, वर्ग या सर्वहारा आंदोलन नहीं होगा बल्कि मानवीयता का संरक्षण और मनुष्य के जीने के अधिकार का ही प्रतिपादन होगा जिसमें सब के साथ न्याय और समानता के सिद्धांत पर चलने का संकल्प होगा।


भारत 

शुक्रवार, 15 मई 2020

ऊंघती सरकार, जागती जनता और महामारी का हाहाकार










यह सत्य कि समय पर न्याय न मिलना अन्याय का ही दूसरा रूप है, इसी प्रकार जब घोर संकट हो और राजा अर्थात सरकार समय पर मदद न करे तो वह उसके अकर्मण्य होने का ही सबूत है। यह वैसा ही है जैसा कि एक मरणासन्न व्यक्ति के मुंह पर घी लगते ही वह प्राण त्याग दे और कहा जाए कि हम तो उसे पौष्टिक भोजन दे रहे थे, फिर भी उसकी मृत्यु हो गई तो इसमें हमारा क्या दोष? कुछ ऐसा ही हमारी सरकार महामारी के दौर में अपना रवैया दिखा रही है।


सरकारी लापरवाही की सजा

जब इस बीमारी का शुरुआती दौर था तो प्रशासन ने हल्के में लिया और जब इसने सुरसा की तरह अपना आकार बढ़ाना शुरू किया तो, बिना यह सोचे कि जिस देश का इतिहास रोटी रोजी, शिक्षा और किराए के घरों में रहने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों में पलायन का रहा हो, वहां इतनी बड़ी आबादी के खाने पीने की व्यवस्था और उनके अपने मूल स्थान पर लौटने का उचित प्रबंध किए बिना तालाबंदी कर दी जाए, उसका परिणाम भयावह होना ही था।

सरकार इतनी भोली तो न थी कि यह न जानती हो कि इस बीमारी को बढ़ने से रोका तो जा सकता है लेकिन निकट भविष्य में इसका अंत असंभव है, मतलब यह कि इसे साथ लेकर ही जीना होगा तो फिर आधे अधूरे उपाय करना किसी प्रकार से तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता।

सम्पूर्ण तालाबंदी करते समय ही यदि शहरों और महानगरों से अपने जन्मस्थान या घर जाने की मजबूरी को समझकर यदि इन लाखों लोगों को सुरक्षित तरीके और स्वास्थ्य की जांच पड़ताल और बीमारी से बचाते हुए उन्हें पहुंचाने का इंतजाम कर दिया होता तो आज यह दृश्य देखने को न मिलते जिसमें लोग पैदल या जो भी सवारी मिले, अपने बीबी बच्चों के साथ लौटते दिखाई दे रहे हैं।

सरकार यह समझने में भी चूक गई कि शहरों में रहने वाले प्रवासियों का राशन कार्ड, जनधन खाता और स्थाई पता उनके गांव देहात का ही है और अधिकतर लोगों का परिवार वहीं रहता है इसलिए जब उन्हें मजदूरी मिलना बंद हो गया, घरों, दफ्तरों, कारखानों में नौकरी न रही, वेतन न मिलने से भुखमरी की नौबत आने लगी और इन मेहनतकश लोगों को मुफ्त की पंगत या लंगर में भोजन अपमानजनक लगा तो जैसे भी हो, अपने घर लौटने में ही भलाई समझी।

मजदूरों और गरीबों की मदद के नाम पर उनके खातों में पांच सौ रुपए जरूर आए, मुफ्त का राशन भी मिल गया लेकिन यह उनके स्थाई पते पर मिला न कि वहां जहां वे मजदूरी और रोजगार करते थे। उनके पास अपने को जिंदा रखने के लिए लौटने के सिवाय कोई विकल्प ही नहीं था क्योंकि शहर में रहने का किराया देने और खाने पीने का खर्च जुटाने का कोई साधन नहीं था। अगर एक देश एक राशन कार्ड का नियम पहले दिन ही बना दिया होता तब भी कुछ गनीमत होती, लेकिन सरकार ने इसके बजाय उन्हें मुफ्तखोरी की शिक्षा दी जो इनके स्वाभिमान पर ठोकर मारने जैसा था।

सरकार के ऊंघते हुए और चिड़ियों के खेत चुग जाने के बाद पछतावे के तौर पर जो श्रमिक स्पेशल ट्रेन और बसों के इंतजाम अब किए गए, अगर मार्च में तालाबंदी की घोषणा के साथ कर दिए जाते तो अनजाने और बेरहम शहरों का क्रूर चेहरा इन भाग्यहीन लोगों को देखना न पड़ता। अब वे दोबारा इन शहरों का रुख करने से पहले वे सौ बार सोचेंगे।

स्वदेशी बनने का ढोल पीटना

कांग्रेस सरकार के जमाने से लेकर वर्तमान भाजपा सरकार तक समय समय पर न जाने किस नशे की पीनक में यह घोषणा की जाती रही है कि चाहे सामर्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर न हो पर देश में ही सब कुछ बनाओ और यहीं पर बनी चीजें खरीदो, अब उनकी क्वालिटी घटिया हो, स्तरहीन हो, हानिकारक हो, इससे क्या फर्क पड़ता है क्योंकि घोषणाएं करने वालों के इस्तेमाल के लिए तो यह उत्पाद होते ही नहीं है, बल्कि आम जनता के लिए होते हैं !

कुटीर उद्योग, ग्रामोद्योग, छोटे और मंझोले उद्योगों की परिभाषा और उन्हें मिलने वाली छूट और सुविधाओं की व्याख्या अब तक इतनी जटिल, दोषपूर्ण और भ्रष्टाचार को पनपने देने वाली रही है कि पढ़े लिखे, कुशल कारीगर और सीमित साधन वाले उद्यमी के लिए यह आग में अपने हाथ जलाने वाली ही सिद्ध होती है, इसलिए समझदार तो इनका लाभ लेने से कतराते ही हैं और अगर कोई सूरमा बनने की कोशिश करता भी है तो यह उसके लिए घर फूंक तमाशा देखने जैसा होता है।

मिसाल के तौर अपनी उद्यमशीलता के बल पर कोई लघु उद्योग या स्टार्ट अप खोल भले ही लिया जाए, कुछ ही समय में दम तोड़ता नजर आता है। जो सफल हुए भी हैं, उनके संचालक या तो कुंए के मेंढ़क की तरह एक दायरे में बंधकर रह गए या इस दायरे से बाहर निकलने के लिए उन्होंने विदेशों में शिक्षा प्राप्त की अथवा विकसित देशों की कार्य शैली को अपनाया। उनकी सफलता में सरकार का कोई विशेष योगदान है, यह समझना नादानी है।

अगर इतिहास से कुछ सीख मिलती हो तो एक उदाहरण पर गौर कीजिए। अठाहरवीं सदी में भारत पर अंग्रेजों का पूरी तरह कब्जा जम जाने से पहले भारत के टेक्सटाइल यानी वस्त्र उद्योग विशेषकर कॉटन और सिल्क का विश्व के चैथाई व्यापार पर कब्जा था। अंग्रेज समझ गया कि जब तक इस व्यापार की कमर नहीं तोड़ी जाएगी तब तक भारत पर राज करना असंभव है। अंग्रेजों ने कच्चा माल अपने देश में भेजना और वहां उनसे वस्त्र बनाकर महंगे दामों पर भारत में बेचने का काम शुरू कर दिया। यहीं नहीं स्वदेशी कारीगरों को अपने क्रूर व्यवहार से दाने दाने को मोहताज कर दिया और उनके आत्म सम्मान को रौंदने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

इसका परिणाम यह हुआ कि स्वदेशी आंदोलन जो स्वतंत्रता संग्राम में शुरू हुआ था और बापू गांधी द्वारा आजादी के बाद ग्रामीण इलाकों को औद्योगिक बाजारों में परिवर्तित करने की सलाह पर अमल न करने के कारण आज भी जब तब राजनीति के खिलाड़ी अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए चलाते रहते हैं।

स्वतंत्र भारत में यही हुआ है। यहां सुविधाएं न होने से पढ़े लिखे और कुशल लोगों ने विदेशों का रुख कर लिया जिसे ब्रेन ड्रेन कहा गया। यह सिलसिला थमा नहीं है, बल्कि लगातार बढ़ रहा है क्योंकि देश में कल कारखाने खोलना और तकनीक एवं विज्ञान की उपलब्धियों का लाभ उठाना सरकारी अड़चनों के कारण आसान नहीं है। सरकार को अपने गिरेबान में झांकना होगा।

इस महामारी के हाहाकार में सरकार ने इन उद्योगों की परिभाषा बदली है और सर्विस सेक्टर को भी शामिल किया है तो उससे यह उम्मीद करना कि देश के मजदूरों, कारीगरों और सरकार के भरोसे अपना उद्यम खड़ा करने के लिए शिक्षित और कौशल से संपन्न लोग आगे आएंगे तो यह मृग मरीचिका ही सिद्ध होगी।

इसकी वजह यह है कि इन घोषित सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए जरूरी प्रमाण पत्र, कागजात जुटाने और अपनी योग्यता तथा पात्रता साबित करने में ही निर्धारित समय सीमा पार हो जाएगी। इस स्थिति में इन योजनाओं की पोल खुलना शुरू होने से पहले ही बहुत से उद्यमी अपनी गांठ की पूंजी भी गवां चुके होंगे।

स्वदेशी चीजें बनाओ, स्वदेशी खरीदो और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करो, यह सब बातें अब वैश्विक बाजार और ओपन इकोनॉमी में संभव नहीं, इतनी सी बात सरकार समझ ले तो यह देश पर बहुत बड़ा उपकार होगा।

लगभग तीन महीने का मूल्यवान समय गवांए बिना अगर सरकार यह सब कदम जो देश की अर्थव्यवस्था और उसकी गति को बनाए रखने के लिए जरूरी थे, अगर तब उठा लिए जाते तो आज हालात कितने काबू में होते, यह समझना कोई रॉकेट विज्ञान नहीं, बल्कि साधारण समझदारी की बात है।

अगर कुछ करना ही है तो मुक्त व्यापार, पारदर्शी नियम और आयात निर्यात में देश और देशवासियों की सहभागिता सुनिश्चित कर दीजिए, बाकी तो जनमानस स्वयं निर्णय कर ही लेगा कि उसके हित में क्या है और क्या नहीं, मतलब यह कि सरकार अपने काम से काम रखे और उद्यमियों के रास्ते में रोड़े अटकाए बिना उन्हें वे सब सुविधाएं और आर्थिक सहायता दे जिसके वे अधिकारी हैं।

Email – pooranchandsarin@gmail.com

भारत

शनिवार, 9 मई 2020

एन आर आई विवाह और लड़की की विवशता









विवाह हालांकि दो व्यक्तियों और उनके परिवारों के बीच होने वाला घनिष्ठ, प्रेममय  और सामाजिक संबंध है लेकिन फिर भी कुछ ऐसे विवाह होते हैं जो किए तो इन्हीं भावनाओं के आधार पर जाते हैं लेकिन उनका परिणाम कभी कभी बहुत दुखदाई निकलता है और विशेष रूप से लड़कियों का जीवन अक्सर नर्क की तरह हो जाता है।

ऐसी ही घटना पंजाब के एक छोटे से कस्बे से लगे एक गांव में हुई जो कहने को तो एक व्यक्ति के साथ घटी कही जा सकती  है लेकिन उसके दायरे में पूरा समाज आ जाता है। इसका जिक्र स्वयं भुक्तभोगी ने किया है और कुछ ऐसे प्रश्न उठाएं हैं  जिनका जवाब देने की जिम्मेदारी परिवार और समाज दोनों की है।

सोच बदलने की कहानी

होता यह है कि गांव की एक लड़की जो अभी कॉलेज में कृषि से संबंधित कोर्स कर रही है तथा जिसने अपनी जिन्दगी के सुनहरे सपने बुनने ही शुरू किए हैं, उसकी मर्जी के खिलाफ मातापिता शादी के लिए जोर जबरदस्ती करते हैं और एक एन आर आई लड़के से फेरे करवा देते हैं।

लड़का इस लड़की के साथ मौज मस्ती कर वापिस अमरीका चला जाता है और लड़की, इस उम्मीद में कि लड़के और उसके घरवालों के वायदे के मुताबिक अमरीका चली जाएगी, अपनी पढ़ाई पूरी करने लग जाती है।

लड़का अमरीका में ट्रक चलाता है और उसकी आमदनी उनसे भी ज्यादा है जो बड़ी बड़ी डिग्रियां लेकर वहां जाते हैं जैसे डॉक्टर, इंजिनियर, वैज्ञानिक आदि।  उन्हें  जो भी नौकरी मिले, उसका वेतन भारत से बहुत अधिक होता है, करने लगते हैं, लेकिन लेबर क्लास की आमदनी से उनका कोई मुकाबला नहीं। इसका मतलब यह भी है लेबर का  काम करने वालों को बिगड़ने में देर नहीं लगती और वे अक्सर अय्याशी, नशा, स्मगलिंग जैसे काम करने लगते हैं और वहां शादी न होने के कारण भारत में अपने पैसे के बल पर किसी भी सुन्दर, शिक्षित और आर्थिक दृष्टि से कमजोर परिवार की लड़की से शादी कर लेते हैं।

अब होता यह है कि शादी के बाद अय्याशी के लिए लड़का भारत में पत्नी के पास आता है और चला जाता है। अमरीका में भी उसे लड़कियों की कोई कमी नहीं और वह तथाकथित गोरी मेमों के साथ वक्त तो बिताता ही है, उसे ड्रग्स लेने का चस्का भी लग जाता है।

इधर लड़की का पिता अपनी बेटी की पढ़ाई और दूसरा जरूरी खर्चा भी उठाने से इंकार कर देता है और लड़का या उसके घरवाले पैसे नहीं भेजते तो लड़की को डिप्रेशन होने लगता है और  आत्महत्या करने के बारे में सोचने लगती है।

मुक्ति का रास्ता

वह एक दूसरा रास्ता खोजती है और अपनी बात अपने साथ पढ़ने वालों और अपने शुभचिंतकों तथा दोस्तों से शेयर करती है जिससे उसे काफी सहारा मिलता है और वह तनाव से बाहर आने लगती है, साथ ही अपने चारों ओर बुने गए चक्रव्यहू से बाहर निकलने की कोशिश करती है।

लड़की पढ़ी लिखी, समझदार है और अपने भविष्य के सपनों को समेटने का प्रयत्न करती है। शादी के बाद दो साल से वह अपने घर पर है। उसका मायका और ससुराल आसपास है जहां से उसे कोई मदद नहीं मिलती।

लड़के के घरवाले उसे अमरीका बुलाने को यह सोचकर राजी हो जाते हैं कि उसके आने से लड़का सुधर जाएगा और उनका वंश चलाने के लिए संतान भी हो जाएगी। लड़की भी यह सोचकर कि एक मार्ग तो मिला, जाने को तैयार हो जाती है।

अब विडम्बना यह है कि अमरीका में कानून सख्त होने के कारण लड़का और उसके घरवाले सोचते है कि अगर यह वहां आ गई और कानून को दस्तक दे दी या लड़के को तलाक देकर किसी और से शादी कर ली तो उनकी जिंदगी बर्बाद हो सकती है। इसलिए वे डर के कारण आनाकानी करने लगते हैं और यहां गांव में लड़की के घरवाले समाज के डर से कि उनकी बदनामी होगी, लड़की को न तो  तलाक लेने की कार्यवाही करने देते हैं और न ही उसका खर्चा उठाने को तैयार होते हैं।

कानून का सहारा

यहां यह बताना जरूरी है कि कुछ साल पहले इस तरह की घटनाओं को देखते हुए भारत की संसद ने कानून बनाया था कि एन आर आई से शादी को तीस दिन में रजिस्टर कराना होता है वरना लड़के का पासपोर्ट, वीजा रद्द हो सकता है और उसके लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती है।

कानून तो बन गया लेकिन सामाजिक जंजीरों के कारण इसके पालन पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता और इस तरह लड़कियों का जीवन बर्बाद होता रहता है, खास तौर से उनका जो न तो ज्यादा पढ़ी लिखी हैं और न ही उनके पास कोई हुनर है जिससे वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें।

कानून यह भी है कि यदि विदेश में कोई एन आर आई अपनी भारतीय पत्नी के साथ दुर्व्यवहार करता है तो उस देश का कानून तो अपना शिकंजा कसता ही है, साथ में भारतीय दूतावास में शिकायत करने पर पीड़ित महिला को विकसित देशों में तीन हजार और विकासशील देशों में दो हजार डॉलर की मदद मिलती है जिससे वे अपने पति और उसके घरवालों के खिलाफ कार्यवाही कर सकती है। इसके साथ ही अगर लड़का अमरीका में कोई अपराध करता है तो भारत में उसकी पत्नी उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकती है।

प्रश्न जिनका उत्तर जरूरी है

इस निर्दोष लड़की की कहानी से अनेक सवाल निकलते हैं जो हालांकि नए नहीं लेकिन आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि उनका हल तब तक नहीं हो सकता जब तक पैसे, रुतबे और शान शौकत देखकर तथा पैसों के लालच में आकर अपनी बेटी की शादी करने को लेकर समाज की सोच नहीं बदलती। जिस तरह हर पीली धातु सोना नहीं होती उसी तरह हर रिश्ते की गारंटी केवल पैसा नहीं हुआ करती।

विदेश में बसने का सपना, डॉलर में कमाई का लालच और अपने दोस्तों रिश्तेदारों के बीच अपना स्टेटस अचानक बढ़ जाने का ख्वाब न केवल गांव देहात, कस्बों, छोटे शहरों में देखा जाता है बल्कि बड़े महानगरों में निम्न वर्ग हो या मध्यम या फिर उच्च वर्ग ही क्यों न हो, समान रूप से देखा जाता है। इसमें चाहे लड़की का जीवन बर्बाद हो जाए, उसका कैरियर चैपट हो जाए, वह युवावस्था में ही बूढ़ी लगने लगे या फिर आर्थिक तंगी से परेशान होकर कोई अनैतिक काम करने लगे तो इसमें पुरुष हो या महिला, उनका भ्रम तो बना ही रहता है, जिसका टूटना उतना ही जरूरी है जितना यह कि अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया में बसना ही जीवन का उद्देश्य नहीं है। जरा सोचिए !


भारत


शनिवार, 2 मई 2020

वक्त बदलता है तो उसमें संभालने की शक्ति भी है










कहते हैं कि वक्त की धार इतनी पैनी, तेज और नुकीली होती है कि अगर किसी को इसकी मार झेलनी पड़ जाए तो जन्म जन्मांतर ही नहीं कभी कभी तो युग बीत जाने पर भी इसके घाव रिस्ते रहते हैं और जरा सी भी ठेस लगने पर उनमें असहनीय टीस या दर्द होने लगता है। इसीलिए कहते हैं कि वक्त से डर कर रहना चाहिए और इसके साथ ही समय सबसे बड़ा शिक्षक या गुरु भी है जिसका पढ़ाया पाठ जीवन भर याद रहता है।


 अंधेरे के बाद उजाले का नियम



दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप के अनेक देश बर्बाद हो गए थे और वे फिर से अपने पुराने गौरव को पाने में लगे थे। उन्हीं में से एक जर्मनी भी था जो दिन रात वैज्ञानिक और औद्योगिक उपलब्धियों को हासिल करने में जुटा था।

वहां कर्मचारियों के पास इतना काम रहता था कि उनके घर के काम अक्सर छूट जाते थे जिन्हें करने के लिए वे अपने दफ्तर या कारखाने से किसी न किसी बहाने गायब हो जाते थे। सरकार का जब इस ओर ध्यान गया और उत्पादन में कमी के नए आंकड़े आने लगे तो उसने यह आदेश दिया कि कोई भी कर्मचारी अपने काम पर अपनी शिफ्ट पूरी करने के लिए कभी भी आ और जा सकता है लेकिन उसे केवल कुछ घंटे जैसे कि दो से चार घंटों तक एक निश्चित समय पर अपने कार्यालय या कारखाने में रहना होगा और बाकी की शिफ्ट वह जब चाहे तब पूरी कर सकता है।

इसका असर यह हुआ कि कर्मचारियों द्वारा किए जाने वाले उत्पादन में  न केवल भारी बढ़ौतरी हो गई बल्कि वे पहले से ज्यादा खुश भी रहने लगे जिसकी वजह यह थी कि उन्हें घर के जरूरी काम करने की कोई टेंशन नहीं थी क्योंकि इसके लिए उनके पास उनकी मर्जी के मुताबिक पूरा वक्त था।

यह सत्य घटना इसलिए विचार करने योग्य हो जाती है क्योंकि आज एक लाइलाज बीमारी से लडने में हम इतना पस्त होते जा रहे हैं कि हर समय अगले पल की चिंता के साथ साथ नौकरी, व्यवसाय, रोजगार, आमदनी, बचत और पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने में शुरू हो चुकी मुसीबतों का सामना भी करना पड़ रहा है।




बीमारी का तो अंत हो ही जायेगा लेकिन इसका जो दूरगामी असर पड़ने वाला है वह लोगों को भीख और गरीबी के दलदल में डालने के साथ सामूहिक विरोध, आंदोलन से लेकर आत्महत्या तक ले जा सकता है।

बचाव के रास्ते

आज से लगभग सौ साल पहले और पिछले दस बीस सालों में भी अनेक ऐसी बीमारियों का सामना समाज को विश्व स्तर पर करना पड़ा है जो एकबार आ गईं तो फिर कभी गई नहीं, हालांकि उनका इलाज करने में हमें सफलता भी मिली और उनसे बचने के उपाय भी खोज लिए गए।

उदाहरण के लिए 1980 के दशक में एड्स रोग जब आया तो उसका कोई इलाज आज तक नहीं निकाल पाया तो लोगों ने उससे बचाव के रास्ते अपनाने शुरू कर दिए जैसे कि कंडोम के इस्तेमाल की अनिवार्यता, सर्जरी से पहले एड्स का टेस्ट, संक्रमित खून की पहचान और रक्तदान से लेकर मरीज को खून चढ़ाने में सावधानी जैसे उपाय करने लगे।

इसलिए सब से पहले तो यह मान और समझ लेना होगा कि कोरोना की बीमारी हमेशा के लिए आई है, इसलिए इसका चाहे इलाज हो या इससे बचाव, उसके रास्ते खोजना हमारी नियति बन चुकी है। इसके अतरिक्त भविष्य में यदि फिर कोई ऐसी महामारी आती है तो उसके मुकाबले के लिए तैयारी भी अभी से करनी जरूरी है।

जब सामाजिक या शारीरिक दूरी का रास्ता अपनाने की बात की जाती है तो यह क्यों भूल जाते हैं कि देश की लगभग आधी आबादी एक ही कमरे में चार पांच से लेकर दस या उससे भी अधिक लोगों के साथ रहने के लिए मजबूर है जिसका खाना पीना, रसोई से लेकर शौच तक उसी में होता है।

शायद सरकारों की समझ में यह बात आ जाए कि जितनी भी झुग्गी झोपड़ियां या स्लम बस्तियां हैं, उनके स्थान पर वहां रहने वालों के लिए उसी जमीन पर उनके लिए बहुमंजिला इमारतों का निर्माण बिना राजनीतिक स्वार्थ को ध्यान में रखकर तुरंत किए जाने की शुरुआत करना वक्त की जरूरत है ताकि भविष्य में फिर कोई ऐसी ही बीमारी आ जाए तो हम असावधान रहने के कारण उसका शिकार न हो जाएं।

यह अब हमारी सुरक्षा जरूरतों में शामिल हो गया है कि फेस मास्क, हाथ धोना, सफाई से रहना और तपाक से मिलने के बजाय दूर से नमस्ते करना जैसे उपाय हमारी आदत बन जाएं।






कहते हैं कि कोई भी महामारी या मुसीबत हमारी अपनी ही गलतियों का नतीजा होती है। आपस के लड़ाई झगड़े हों या प्राकृतिक आपदाएं हों, इनका मूल कारण हमारा अपना व्यवहार और सोच तथा काम करने का तरीका ही होता है।

सभी तरह के प्रदूषण, वन विनाश का कारण कुदरती साधनों का अंधाधुंध शोषण ही है।


झटकों का फायदा


कुदरत का कहर हो या बीमारी से ग्रस्त होना, उनसे लगने वाला झटका एक जैसा ही होता है और उसका असर सब कुछ बर्बाद करने जैसा ही होता है।

इस बीमारी ने एक अवसर दिया है कि हम अपने काम करने के तरीकों में बदलाव करें, आने जाने के साधनों का जरूरत पड़ने पर ही इस्तेमाल करें और वैज्ञानिक सोच को अपनाते हुए नई तकनीक और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना सीखें और उसे अपनाएं।

मिसाल के तौर पर कई वर्षों से इस बात पर बहस होती थी कि स्वास्थ्य की देखभाल और बीमारियों की रोकथाम और उनकी चिकित्सा के लिए टेली मेडिसिन और टेली काउंसलिंग को अपनाया जाए और लोगों को बीमार पड़ने पर डॉक्टर से लेकर अस्पताल तक सिवाय विशेष परिस्थितियों को छोड़कर, न जाना पड़े।

अब एक झटके में ही यह बात समझ में आ गई है कि घर बैठकर भी फोन, वीडियो, इंटरनेट के जरिए डॉक्टर से इलाज करवाया जा सकता है।

इसी तरह पढ़ाई लिखाई को लेकर चाहे सामान्य शिक्षा हो या उच्च शिक्षा, अब ऑनलाइन और वर्चुअल क्लासरूम की शुरुआत भी इसी बीमारी का जोरदार झटका लगने से हो चुकी है।

घर की तालाबंदी ने जो झटका दिया है उसने लोगों को अपने घर से ही अपना काम धंधा करने और व्यवसाय चलाने से लेकर नौकरी तक करने को इतना आसान और सुविधाजनक बना दिया है कि आगे आने वाले समय में इसे एक क्रांति की तरह लिया जाय तो आश्चर्य नहीं होगा।

केवल भारी उद्योगों, कल कारखानों, ढुलाई उतराई और खेती बाड़ी के कामों में ही कारीगर और मजदूर की जरूरत रह जाने वाली है, बाकी के कर्मचारी घर से ही बैठकर काम करें, इसके लिए नए नियम और कानून बनाने की बारी अब आ ही गई है जिसे जितनी जल्दी अंजाम दिया जाएगा, उतना ही बेहतर होगा।



इसका सबसे बड़ा लाभ सवारी ढोने के वाहनों और साधनों का कम से कम इस्तेमाल करने के रूप में होगा जिससे सड़कों पर धूल कम उड़ेगी, उनके रखरखाव और निर्माण पर कम खर्च होगा। इस तरह वायु प्रदूषण कम होगा, जल प्रदूषण से बचा जा सकेगा और शोर शराबे में भी कमी आयेगी।

आज जिस तरह बिजली और पानी हमारी घरेलू जरूरतों के लिए मुहैया कराया जाता है, उसी तरह इंटरनेट भी हरेक की जरूरत बन चुका है, उसकी स्पीड और उपलब्धता को जरूरत के हिसाब से बढ़ाया जाना न केवल सरकार की प्राथमिकता बल्कि प्रत्येक उपभोक्ता के लिए भी उसका अधिक से अधिक इस्तेमाल करना जरूरी हो रहा है। अगर दुनिया में अपना स्थान या वर्चस्व बनाए रखना है तो अब उसका पैमाना किसी देश की सैन्य शक्ति न होकर संवाद और  संचार साधनों का इस्तेमाल करने की योग्यता होना होगा।

कहावत है कि चिंता चिता के समान होती है जो अगर शरीर या व्यवसाय को लेकर लग जाए तो मनुष्य के खोखला होने में देर नहीं लगती लेकिन अगर यही चिंता एक स्वस्थ चिंतन का रूप धारण कर ले तो उसके परिणाम सुख देने वाले ही नहीं, चमत्कारी भी होते हैं। आज हम एक व्यक्ति, समाज और देश के रूप में जिस मोड़ पर खड़े हैं, उसमें एक ओर नव निर्माण की संभावनाएं हैं तो दूसरी ओर विनाश की खाई है। अब यह हम पर है कि हम किसे अपनाते हैं।

सलाम ...जांबाज सेनानी
कोरोना की इस दहशत में, 
अब हम हैं बंद दरवाजों में,
वे खुले आसमां के नीचे,
बिना किसी दीवारों के।

सड़कों के बैरियर पर ड्यूटी, 

भरी दोपहरी धूप के नीचे,
आंधी या तूफां आए,
बारिश की बूंदों से भीगें।
डटें रहें अपने मकसद पर
ये जाबांज सेनानी।

घर-घर जाकर जांच ये करते,

पीड़ित को सैन्टर पहुंचाते,
गली कूचों में गश्त लगाते,
खुद से पहले हमें बचाते,
हम सब तुम्हें सलाम बजात
ओ जांबाज सेनानी
सलाम, जांबाज सेनानी
यह ओजस्वी पंक्तियां इस स्तंभ की नियमित पाठिका रीना वाधवा ने भेजी हैं। 



भारत

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

युग बदलने पर भी मूल प्रश्न वहीं रहते हैं !









इन दिनों दूरदर्शन पर जो दो पुराने धारावाहिक फिर से प्रसारित हो रहे हैं, उनके बारे में यह एक हकीकत है कि जब पहले इन्हे दिखाया गया था तो दर्शक घरों में ही रहते थे और सड़कें, बाजार सूने हो जाते थे। आज भी इनके देखने वाले कम नहीं हुए हैं इसलिए लॉकडाउन में घर पर ही रहकर समय व्यतीत करने के अतिरिक्त कुछ सोचने, मतलब चिंतन मनन करने का भी समय मिल जाता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उस युग में जो सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थितियां थीं, आज भी वे देखी जा सकती हैं। लगता है भारत जैसा तब था, वैसा ही आज है अर्थात मनुष्य की सोच और उसकी समझ तथा कार्य शैली में कुछ खास बदलाव नहीं आया है।
आज का युग क्योंकि तर्क प्रधान अधिक है और संवाद तथा संचार के आधुनिक साधन हैं, इसलिए चलिए इन पर विचार करते हैं।

बड़ों की आज्ञा और नारी सम्मान

समय चाहे राम का हो या कृष्ण का, उनमें परिवार के बुजुर्गों यानी मातापिता, सगे संबंधी या जनमानस जो कह दें, उसे मानना अनिवार्य ही नहीं, बल्कि उसके सही गलत होने, कोई तर्क या बहस करने और अपनी बात रखने की तनिक भी गुंजाइश नहीं, बस पालन करना ही करना होता था।

राम को कैकई और दशरथ के किसी पुराने वचन को निभाने के लिए वनवास का हुक्म मिल गया और न तो राम यह पूछ सकते हैं कि मातापिता के अंतरंग क्षणों के बीच अगर कोई करार हुआ है तो उसका उत्तरदायित्व निर्वाह के लिए संतान को क्यों घसीटा जा रहा है और न ही यह कि इसे मानने या न मानने का जो परिणाम होगा उसके लिए कौन जिम्मेदार होगा?

दृश्य बदलता है, महाभारत में युधिष्ठर जो अपने परिवार में सबसे बड़े हैं, भाइयों तथा जनता के सहयोग से इंद्रप्रस्थ का निर्माण कर लेते हैं, चक्रवर्ती सम्राट बन जाते हैं। सब ओर सुख शांति है, प्रजा अपने राजा से प्रसन्न है और राज परिवार भी उनका पूरा ध्यान रखता है।




पांडवों के सगे संबंधियों में धृतराष्ट्र और उनके पुत्र एक षड्यंत्र के तहत जुआ खेलने का आयोजन करते हैं। यहां तक तो चलिए मान लेते हैं कि मनोरंजन के नाम पर ही इस विनाशकारी खेल के लिए पांडवों की ओर से युधिष्ठर ने सहमति दे दी होगी।

योग्यता की कसौटी

यह सच था कि न तो युधिष्ठर और न ही उनके भाई इस खेल में पारंगत थे जबकि दूसरी ओर दुर्योधन भी इसे खेलना नहीं जानता था। अब युधिष्ठर ने तो अपने सर्व ज्ञानी होने के अहंकार के कारण किसी अन्य मंजे हुए खिलाड़ी को साथ लेने के स्थान पर स्वयं अनाड़ी होते हुए भी खेलना शुरू कर दिया और दूसरी ओर दुर्योधन ने अपना अनाड़ीपन स्वीकार करते हुए इस खेल में पारंगत खिलाड़ी शकुनि को खेलने के लिए आगे कर दिया।

जब दांव लगने लगे तो युधिष्ठर ने अपनी प्रजा की तो छोड़िए, अपने भाइयों और अपनी पत्नी तक से कुछ नहीं पूछा और सब को एक के बाद दांव पर लगाते गए और अपने बुद्धि, विवेक से हीन होने और अनाड़ी होने के कारण सब को हारते गए।

 ऽ प्रश्न यह है कि क्या शासक द्वारा बिना अपनी प्रजा की मर्जी जाने उसे दांव पर लगाया जा सकता है ?  दूसरा प्रश्न यह है कि क्या छोटे भाई और पत्नी बड़े भाई की निजी संपत्ति हैं, मतलब उनकी कोई स्वतंत्र हैसियत नहीं है कि वे पूछ सकें कि, हे भाई या पति महोदय, आप बर्बाद होना चाहें तो हो सकते हैं, पर हमें बर्बाद करने का अधिकार आपको किसने दिया?
लेकिन द्रौपदी को छोड़कर किसी भी भाई ने यह प्रश्न नहीं किया, यहां तक कि अपने वस्त्र हरण का प्रयत्न किए जाने तक कोई उसकी हिमायत लेने नहीं उठा और यह तो भला हो कृष्ण का कि वे अपनी सखा या मित्र की पुकार पर उन्होंने उसे बचाने का प्रबंध कर दिया वरना द्रौपदी तो बुरी तरह लुट ही चुकी थी।

युधिष्ठर अपने पुरुष होने के अहंकार से इतना पीड़ित थे कि द्रौपदी के द्वारा सब कुछ लौटा लिए जाने पर भी फिर से जुआ खेलने लगे और दोबारा हार गए और वनवास तथा अज्ञात वास के भागी बने। उनके कारण ही उनके भाइयों और द्रौपदी की कष्ट गाथा फिर से शुरू हो गई।
यह उनका पुरुषत्व ही बोल रहा था कि वन में द्रौपदी द्वारा कुछ कहने पर वे उसे अपने मायके जाने के लिए कह देते हैं। यही नहीं गंधर्वों द्वारा दुर्योधन को पकड़ लेने पर अपने भाइयों को उसे छुड़ाने भेजते हैं और जब जयद्रथ ने द्रौपदी के हरण की कोशिश की तो वे उसे भी अपना रिश्तेदार होने के नाते मामूली दंड देकर छोड़ देते हैं और कोई उनसे प्रश्न नहीं कर सकता क्योंकि वे सबसे बड़े हैं।

प्रश्न उठता है कि क्या युधिष्ठिर को जुआ खेलने से इंकार नहीं कर देना चाहिए था, जयद्रथ को कठोर दण्ड नहीं देना चाहिए था और धृतराष्ट्र के आवरण में दुर्योधन की महत्वाकांक्षाओं का शुरू में ही अंत नहीं कर देना चाहिए था ?





शासक का कर्तव्य

आज की स्थिति में देखें तो प्रजातंत्र होने के बावजूद अगर शासक निरंकुश हो जाए तो वह अपने स्वार्थ के लिए क्या कुछ करने को तैयार नहीं हो जाता ?

अब जरा नारी के सम्मान, उसके गौरव और प्रतिष्ठा की बात करें तो लगता है कि रामायण और महाभारत के युग से लेकर वर्तमान काल तक उसकी स्थिति में कुछ खास परिवर्तन नहीं हुआ है।

राम द्वारा अपने रामराज्य में एक व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी को इसलिए छोड़ दिया जाता है क्योंकि वह कोई भी विकल्प न होने के कारण एक रात अपने घर नहीं लौट सकी थी।

राम को अपने राजा होने के कारण ऐसा नियम बनाना चाहिए था कि बिना किसी अपराध के केवल अपने पुरुष होने के कारण कोई भी पति अपनी मर्जी से अपनी पत्नी को बेसहारा नहीं कर सकता।

हालांकि उन्होंने खोजबीन कर यह पता कर लिया था कि उनके शासन में स्त्री का स्थान वह नहीं है जो होना चाहिए। उन्होंने न केवल स्त्री को उसकी गरिमा वापिस दिलाने और उसे बराबरी का अधिकार दिलाने के प्रति कोई नियम कानून नहीं बनाया बल्कि लोगों द्वारा उनके द्वारा अपनी पत्नी सीता को स्वीकार करने पर आपत्ति जताने के प्रतिकार स्वरूप सीता का ही त्याग करना मान लिया जबकि वह गर्भवती भी थीं।

प्रश्न उठता है कि क्या उस काल में भी स्त्री हमारे देश में स्वतंत्र नहीं थी, अपने बारे में स्वयं निर्णय लेने के स्थान पर समाज और अपने पति की सोच पर निर्भर थी।

क्या कुछ बदला है ?

आज भारत में अनेक कानूनों के बावजूद स्त्री का शोषण होता है, उससे छेड़छाड़ से लेकर उसका शील हरण तक होता है और उसके निर्दोष होने के बावजूद समाज से लेकर परिवार तक उसे ही सजा देने को तत्पर रहता है तो क्या यह समझ लिया जाय कि तब से लेकर आज तक कुछ भी नहीं बदला है।

यह तब भी होता था कि हम अपनी संतान को जो शिक्षा दें, वह वहीं ग्रहण करे, हम जो उसे बनाना चाहें, वह वही बने और कहीं उसने अपनी इच्छा और मर्जी के हिसाब से शिक्षा लेने की बात की या अपने मन का रोजगार या व्यवसाय करने की बात की तो वह माता पिता और परिवार का दुश्मन नंबर एक हो गया।




पिछले दिनों एक सत्य घटना पर आधारित फिल्म सांड की आंख आई थी जिसमें घर की बेटियां तो दूर, दादियां तक अपनी मर्जी से कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र नहीं थीं। वे चोरी छिपे न केवल स्वयं अपने मन की बात सुनती हैं बल्कि अपनी पोतियों को भी प्रोत्साहित करती हैं कि वे जो उनका मन चाहे, उन्हें करना चाहिए।

अब यहां भी पुरुष का पौरुष हावी हो जाता है जिसका अंत वृद्ध हो चुकी दादियों तक को पिंजरे में बंद रहने में ही उनकी भलाई कहकर चुप कराने की कोशिश से होता है। परिणाम वही कि आत्म सम्मान जाग उठता है और दादियां अपने ही पुरुषों के अभिमान को ठिकाने लगा देती हैं।

बदलाव क्यों न हो ?

भारत में जब यह लगता है कि मूलभूत प्रश्न वैसे ही हैं जैसे रामायण और महाभारत के काल में थे तो क्या यह सोचने का समय नहीं आ गया है कि विश्व में हो रहे परिवर्तन को सामने रखते हुए हमें भी उनमें बदलाव करना चाहिए।

हमारे यहां संतान पर उसके बड़े और अपने पैरों पर खड़ा हो जाने पर भी बड़े बुजुर्ग उन्हें अपने आधीन होने का भ्रम पाले रहते हैं और इसे सिद्ध करने के लिए उन पर तरह तरह के अंकुश लगाने से भी नहीं चूकते।

क्या ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए, जैसी कि अनेक प्रगतिशील देशों में है, कि उन्हें युवा होते होते और उनकी शिक्षा पूरी हो जाने पर उन्हें अपनी ही पहनाई गई बेड़ियों से मुक्त कर समाज में अपना योगदान करने के लिए बिना उनसे किसी भी तरह की अपेक्षा रखे छोड़ दें।

स्त्री को हम तब तक स्वतंत्र सोच और अपनी किस्मत का नियामक नहीं बना सकते जब तक हम उसके रहन सहन, आने जाने और अपनी मर्जी से अपने बारे में फैसला लेने के लिए खुला नहीं छोड़ देते।

जो यह सोचते हैं कि ऐसा करने से भारतीय संस्कृति और प्राचीन सभ्यता का बंटाधार हो जाएगा तो उन्हें सीता के वन गमन और द्रौपदी के चीर हरण के बारे में सोचना चाहिए कि क्या वह युक्तिसंगत था ?


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