शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

सरकार जानकारी जुटाए, जनता जानकारी दे, इसमें हर्ज क्या है?








यह बात किसी से छिपी नहीं है, चाहे नेता हो, राजनीतिक दल हो या सरकार और उसे चुनने वाले हों कि राज्यों से लेकर केंद्रीय सरकार के लिए वोट देने वाले मतदाताओं की सूचियों में भारी चूक होती है, मतलब यह कि किसी का नाम अगर स्थानीय चुनावों की सूची में तो है लेकिन लोकसभा की मतदाता सूची में नहीं है अर्थात एक लिस्ट में है, दूसरी में नहीं।


अब होता यह है कि वोटर इसे मामूली बात समझकर नजरंदाज कर देता है और सोचता है कि उसने अगर किसी चुनाव में वोट नहीं दिया तो कौन से पहाड़ टूट जाते। इस तरह वोट के जरिए सरकार चुनने के अपने मौलिक, संवैधानिक और एकमात्र अधिकार से वह किसी की गलती से या फिर जानबूझकर वंचित कर दिया गया और कहीं भी कोई आवाज उठना तो दूर, किसी के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगती। यह सब इसलिए हो पाता है क्योंकि हम अपने अधिकार हों या कर्तव्य, उनके प्रति न तो जागरूक हैं और न ही उसके नतीजों के बारे में जानने की रुचि होती है।


हंगामा क्यूँ करते हैं ?

जब हम अपने लिए कोई रोजगार करने या नौकरी करने के बारे में कदम उठाते हैं तो सबसे पहला काम अपने योग्य होने के प्रमाण पत्र, शिक्षा और अनुभव के विवरण जुटाते हैं और उन सब जानकारियों को हर सम्भव तरीके से उस संस्थान या व्यक्ति तक पहुँचाते हैं जो हमें व्यवसाय स्थापित करने या नौकरी देने में मदद कर सकता हो।


उदाहरण के लिए जब बैंक वाले हमें ऋण देने या सरकार का कोई विभाग अपनी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए हमारी पात्रता का आकलन करने के लिए व्यक्तिगत हो या पारिवारिक, शैक्षिक हो या आर्थिक यहाँ तक कि जातिगत हो या धार्मिक, कोई भी जानकारी माँगता है तो हम देने के लिए सहर्ष तैयार हो जाते हैं और बिना कोई सवाल पूछे तुरंत दे देते हैं, यह तक नहीं पूछते कि बहुत सी बेमतलब की जानकारी भी क्यों ली जा रही है जिसका कर्ज देने या लाभ देने से दूर का भी सम्बंध नहीं होता।


इसी तरह बच्चों को स्कूल में दाखिला दिलाते समय भी कोई पूछताछ नहीं करते और यहाँ तक कि अधिकारियों के सामने माता पिता होने का प्रमाण पत्र भी देते हैं, यदि स्वयं इंटरव्यू देना पड़े तो वह भी देते हैं जिससे प्रमाणित हो जाए कि उनकी संतान उस संस्था में पढ़ने के योग्य है। बहुत से माता पिता अपने बच्चे की जन्मतिथि तक गलत बताने से परहेज नहीं करते, अगर इससे आगे चलकर परीक्षा या नौकरी या कोई सहायता मिलने की उम्मीद हो।


आजादी के आसपास जन्मी पीढ़ी की तो अक्सर पैदा होने की दो तारीखें जीवन भर इनके साथ चलती हैं। एक जो स्कूल में दाखिले के समय लिखाई गयी और जो बाद में सरकारी दस्तावेजों में अंतिम समय तक लिखी रहती है और दूसरी जो असली होती है और जन्मपत्री के अनुसार होती है। मेरी स्वयं की दो तिथियाँ हैं, एक तीन मई जो सरकारी रिकार्ड में है और दूसरी अठारह जुलाई जो जन्मपत्री में है और असली है। मेरे पिता का कहना था कि स्कूल में तीन मई इसलिए लिखवाई क्योंकि मास्टर जी ने कहा था कि इसका फायदा परीक्षा में मिलेगा।


इस मामले में अकेला नहीं हूँ जो जीवन भर दो जन्म तिथियों को ढोता रहा है, बल्कि मेरे जैसे काफी अधिक संख्या में होंगे।
जानकारी लेने और देने का सिलसिला इतना व्यापक हो गया है कि अब तो कोई वस्तु खरीदने पर दुकानदार हमारी व्यक्तिगत जानकारी माँगता है तो वह भी बिना एक भी प्रश्न पूछे दे देते हैं, चाहे बाद में इसका गलत इस्तेमाल होने का अंदेशा ही क्यों न हो ?  मजेदार बात यह है कि कोई हंगामा नहीं होता !


जनसंख्या और जनगणना 


यह किसी भी समझदार व्यक्ति की समझ से परे होने की बात है कि अगर सरकार जनसंख्या के आँकड़े जुटाना चाहती है तो इसमें गलत क्या है ? अब अगर हम सरकार को भी वह सब जानकारी दे देते हैं जो कोई काम धंधा, रोजगार या नौकरी पाने के लिए दूसरों को बिना किसी हिचकिचाहट के देते हैं,

बहुत ही कम मात्रा में सरकार के माँगने पर देने से न केवल मना कर देते हैं बल्कि इसे लेकर हिंसात्मक आंदोलन करने तक पर उतारू हो जाते हैं। यही नहीं इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेते है और यहाँ तक कि राजनीतिक दलों के निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए उनकी कठपुतली बनने के लिए भी तत्पर हो जाते हैं।


जनकल्याण के लिए समर्पित किसी भी सरकार का यह दायित्व और कर्तव्य होता है कि वह देशवासियों के लिए इस तरह की योजनाएँ बनाए जो उसे सुख और शांति से जीवन जीने के साधन दे सकने की व्यवस्था कर सकें। यह तब ही सम्भव हो सकता है जब किसी भी सरकार या प्रशासनिक इकाई को यह पता होगा कि उसे कहाँ कितने लोगों के लिए कौन सी व्यवस्था करनी है।


इसे आसानी से इस तरह समझा जा सकता है कि जब रेल या हवाई यात्रा करने से पहले यह जानकारी ली जाती है कि यात्री को शाकाहारी भोजन चाहिए या माँसाहारी तो इसका मकसद केवल यह होता है कि कितने लोगों के लिए किस प्रकार के भोजन का इंतजाम करना होगा। 


भारत जैसे विशाल देश के लिए सही, सटीक और उपयोगी योजनाएँ बनाने का काम कोई भी सरकार केवल तब ही कर सकती है जब उसे यह पता होगा कि हमारी आबादी कितनी है, उसका घनत्व क्या है, कौन सी सुविधाएँ उस तक तुरंत पहुँचनी चाहिएँ और किन के लिए उसे पंच वर्षीय योजनाओं से जोड़ा जाना है।



जनसंख्या के आँकड़े एकत्रित करने का सरकार के पास कोई और कारण या अजेंडा भी हो सकता है तो आंदोलन करने वालों को इसका खुलासा करना चाहिए ताकि असलियत तो सामने आए, कुछ लोगों के बहकाने से जानकारी न देना या अपना नाम और पता गलत बताने से नुकसान केवल सामान्य नागरिक का ही होता है। यहीं से गरीबी बढ़ने और पिछड़ेपन की शुरुआत होती है।



भारत में हर दस वर्ष बाद जनगणना करने का मतलब ही यही है कि यह अनुमान लगाया जा सके कि देश में कितनी सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और दूसरे संसाधनों की जरूरत है और अगर इस कवायद के साथ साथ इस बात का हिसाब भी रख लिया जाए कि आबादी कितनी है, हालाँकि यह डूप्लीकेट एक्सरसाइज है, फिर भी बिना किसी अतिरिक्त आर्थिक बोझ के इसे किए जाने की जरूरत सरकार समझती है तो उसे करने देने में हर्ज ही क्या है ?



भारतीय नागरिकता 


यह तो तय होना ही चाहिए कि भारत में कितने नागरिक भारतीय हैं और कितने विदेशी। वसुधेव कुटुम्बकम का अर्थ यह नहीं कि कोई भी विदेशी अनधिकृत रूप से यहाँ रहता रहे और उस पर निष्कासन की कोई कार्यवाही न हो।

संविधान में नागरिकता को लेकर कोई भी विरोधाभास नहीं है, भारतीय नागरिक होने, उसके बनने और किसी को किन्हीं विशेष परिस्थितियों में नागरिक बनाने या किसी से उसकी भारतीय नागरिकता रद्द करने के लिए सब कुछ स्पष्ट रूप से वर्णित है तो फिर सभी भारतीय नागरिकों का एक रजिस्टर बनाने में हर्ज ही क्या है ?



जब कोई विदेशी देश में उत्पात मचाने, देशद्रोही गतिविधियाँ करने से लेकर आतंक फैलाने के इरादे से प्रवेश करता है और पकड़ा जाता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही होने तक डिटेन्शन सेंटर में रखा जाता है तो इसमें हर्ज ही क्या है ?


जब संविधान बना था, उस समय टेक्नालोजी का इतना विकास नहीं था, अब यदि प्रत्येक नागरिक को उसका एक ही पहचान पत्र मिल जाए जिसमें उसका सभी विवरण हो और सब ही जगह केवल एक ही कार्ड दिखाने से उसका काम चल जाए तो इसमें हर्ज ही क्या है ?


वर्ष अंत और नव वर्ष आगमन 


यह वर्ष राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक मोर्चों पर काफी उथल पुथल भरा होने के साथ साथ मंदी, बेरोजगारी, महँगाई के कारण भी याद किया जाएगा। युवा हों, अधेड़ हों या वृद्धावस्था का आलिंगन कर रहे बुजुर्ग हों, सभी के लिए इस वर्ष कुछ न कुछ था और इसका अंत भी एक साधारण परंतु मौलिक विषय नागरिकता पर जबरदस्त विवाद से हो रहा है, लेकिन फिर भी सभी पुरानी यादों को भुलाकर हँसी खुशी नए वर्ष में प्रवेश करने में हर्ज ही क्या है ?


(भारत)

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019

पढ़े लिखों का अनपढ़ जैसा व्यवहार भ्रष्ट नेता-अधिकारियों का जन्मदाता है







हमारे देश में स्वतंत्रता प्राप्त करने से पहले जो नेताओं की पीढ़ी थी, उसके सामने देश को आजादी दिलाने और देशवासियों की सेवा और वह भी ज्यादातर निस्वार्थता के साथ करने का लक्ष्य हुआ करता था जिसमें वे अक्सर अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति, यदि कोई होती थी, को भी लगा दिया करते थे।


आजादी के कुछ वर्षों बाद तक नेताओं के मन में यही भावना बनी रही लेकिन जैसे जैसे राजनीतिक नेतागीरी फायदे का सौदा दिखाई देने लगी और उससे बिना कुछ ज्यादा मेहनत किए धन, दौलत, शान-शौकत और सब से अधिक अपने पास ताकत होने का नशा सिर चढ़कर बोलने लगा तो उनके रंग ढंग बदलने लगे और सेवा के स्थान पर मेवा पाने की लालसा बलवती होती गयी।



आज जिस तरह राजनीतिज्ञों का पतन देखने को मिल रहा है और अनेकों विभिन्न अपराधों की सजा भुगतनी पड़ रही है, वह इस धारणा की पुष्टि करने के लिए काफी है कि अब अधिकतर लोग नेतागीरी का पेशा केवल इसलिए करते हैं कि उससे उन्हें समाज के नुकसान के बल पर भी मुनाफा होता रहे और वे नागरिकों को मूर्ख बनाने में सफल होते रहें।


शिक्षितों पर अज्ञानता का पर्दा 

यह देखकर दुःख तो होता ही है, आश्चर्य भी होता है कि कैसे पढ़े लिखे होने के बावजूद बहुत से लोग नेताओं के बहकावे में आकर बिना सच्चाई की परख किए हिंसा और सार्वजनिक सम्पत्ति की हानि करने पर उतारू हो जाते  हैं। उदाहरण के तौर पर नागरिक संशोधन कानून को लेकर मेरे एक शिक्षित मुस्लिम मित्र और सहयोगी ने पूछा कि ‘इससे उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त हो जाएगी तो वह कहाँ जाएगा, उसके पूर्वज यहाँ पैदा हुए, आजादी के बाद यहीं रहने का फैसला किया और इसे अपना वतन समझकर अब तक जीते रहे, अब उसका और उसके परिवार का क्या होगा, कहाँ जाएँगे हम लोग और यह कहते कहते उसकी आँखों से आँसू बहने लगे !‘


यह पूछने पर कि क्या उसने कानून पढ़ा है, उसका जवाब नहीं में सुनकर उसके सामने जब इंटर्नेट की मदद से समझाया तो उसका मन थोड़ा शांत हुआ लेकिन बाद में टी वी और अखबारों में छात्रों के प्रदर्शन की बात से फिर परेशान हो गया। ये नेता किस तरह जनता को मूर्ख समझते हैं, इसका इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में कई दलों के नेता ‘चोर चोर मौसेरे भाई‘ की कहावत को सिद्ध करते हुए राष्ट्रपति के पास स्वयं उन्हीं के हस्ताक्षर से बने कानून को वापिस लेने की गुहार लगाने चले गए ताकि जनता को दिखा सकें कि वे कितने संवेदनशील हैं।


प्रियंका गांधी जब यह कहती हैं कि इस कानून से संविधान की धज्जियाँ उड़ा दी गयी है और अरविंद केजरीवाल इस सवाल के जवाब में कि आखिर इस कानून से किसी की नागरिकता पर आँच कहाँ आ रही है,  पलटकर सवाल पूछने लगते हैं कि अभी इस कानून को लाने की जरूरत क्या थी तो इससे स्पष्ट हो जाता है कि इन नेताओं को सब कुछ पता है लेकिन जनता को बरगलाने का कोई भी मौका क्यों छोड़ा जाए ?


इसी तरह चाहे बंगाल की ममता हों या उत्तर प्रदेश की मायावती या अखिलेश हों, यह जानते हुए भी कि इस कानून से भारत में रहने वाले किसी भी मुस्लिम नागरिक की नागरिकता को कोई खतरा नहीं है, केवल जनता को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करने की खातिर भड़काऊ बयान देते रहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि जनता चाहे कितनी भी पढ़ी लिखी हो, उसे भ्रम में रखना बहुत ही आसान है।  उन्हें यह भी भरोसा होता है कि आम आदमी के पास दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने के बाद इतना समय ही कहाँ बचता है कि वह किसी भी मामले की सत्यता को जानने के बारे में सोचे।


पढ़े लिखों के इस व्यवहार से अनपढ़ जनता तो आसानी से बहकावे में आ ही जाती है और दोनों ही अनजाने में अपना अनिष्ट करने पर आमादा हो जाते हैं, लेकिन सब से बड़ा फायदा उनका होता है जो असामाजिक तत्वों की श्रेणी में आते हैं, गुंडागर्दी, लूटखसोट का कारोबार करते हैं और आगजनी से लेकर हत्या तक करने में उन्हें तनिक भी संकोच नहीं होता। उनकी हिम्मत इस वजह से हमेशा बुलंद बनी रहती है क्योंकि लगभग सभी दलों को उनकी अक्सर जरूरत पड़ती रहती है और उनके सिर पर नेताओं का वरदहस्त सदा बना रहता है।



अक्सर यह बात मन में आती है कि उच्च शिक्षित, प्रोफेशनल व्यवसायी से लेकर उद्योगपति तक में से कोई व्यक्ति साधारण परिस्थितियों में राजनीति अर्थात देश को नेतृत्व देने के लिए पहल क्यूँ नहीं करता तो इसका अर्थ यही है कि वे अपने नैतिक और व्यावसायिक मूल्यों के साथ कोई समझौता नहीं कर सकते।


एक बानगी देखिए। पहले तो कोई राजनीतिक दल उन्हें अपनी पोल खुलने के डर से टिकट ही नहीं देगा और अगर मान लीजिए किसी कारण से दे दिया और उसे चुनाव में उम्मीदवार घोषित कर दिया तो सबसे पहले जानते हैं उसका साथ देने उस क्षेत्र से कौन आएगा? उस इलाके का कोई सफेदपोश गुंडा जो अपनी धाक के बल पर अधिक से अधिक वोट दिलवाने की गारंटी लेगा। इसके बदले में जितने भी उसके गैर कानूनी काम हैं, उनके लिए जीत के बाद संरक्षण चाहेगा । उसके बाद अपनी तरफ से चुनाव में खर्च करने के लिए वे स्थानीय व्यापारी अपने पैसों से भरे बैग लेकर आएँगे जो जमाखोरी, कालाबाजारी और
मुनाफाखोरी को ही अपने काम धंधे का मूल मंत्र मानते हैं।


जब हालत यह है तो किसी भी ईमानदार व्यक्ति को बेमन से ही सही, अपने आदर्शों को तिलांजलि देने में डर क्यूँ लगेगा? उन्हें भी जीत के बाद अपनी पूर्ण सुरक्षा चाहिए।


शिक्षित होकर भी रिश्वत देना

अक्सर जब हम किसी सरकारी दफ्तर और आजकल तो पब्लिक सेक्टर से लेकर प्राइवेट  संस्थानों तक में अपना  कोई काम कराने के लिए, जोकि बिलकुल नियमों के मुताबिक होने पर भी, रिश्वत देने के लिए तैयार हो जाते हैं तो इसका कारण भ्रष्टाचार में लिपटा तंत्र तो है ही, साथ में हमारा पढ़ा लिखा होने के बावजूद यह मान लेना है कि रिश्वत तो देनी ही पड़ेगी चाहे हम कितने भी सही हों।


सामान्य नागरिक यह मानकर चलता है कि रिश्वत दिए बिना काम नहीं होगा लेकिन इसके लिए वह बिचैलियों के जाल में फँसकर अपना नुकसान ज्यादा कर लेता है क्योंकि  किसी भी सौदे में दलाली करने को अब एक व्यवसाय का दर्जा मिल चुका है। हालाँकि यह गलत और नैतिकता के खिलाफ है लेकिन आज इन शब्दों का मोल ही क्या रह गया है, इसलिए अपना काम निकलवाने के लिए सीधे ही अधिकारी से तय कर लीजिए कि वह क्या लेकर उसका काम करेगा, कम से कम दलाली तो बचेगी !


लगभग प्रत्येक व्यवसायी, व्यापारी और उद्योगपति के पास ऐसे अनुभवों का पिटारा होगा जिसमें से रिश्वत देकर काम कराने की अनगिनत कहानियाँ निकल पड़ेंगी। बिना रिश्वत दिए या अपने रसूख का इस्तेमाल किए बिना किसी का कोई भी काम समय पर हो गया हो तो इसका उदाहरण ढूँढने पर भी शायद ही मिले, यह चुनौती दी जा सकती है।


क्या करें और क्या नहीं 


यह एक विचित्र स्थिति है। फिर भी इतना तो कर ही सकते हैं कि अपने पढ़े लिखे होने का लाभ उठाकर किसी भी मामले में अपनी प्रतिक्रिया देने या कोई नासमझी भरा कदम उठाने से पहले उस विषय की पूरी जानकारी जुटा लें ताकि कोई आपको अपनी स्वार्थपूर्ति का साधन या अपनी सोची समझी चाल का मोहरा न बना सके। अराजकतावादी और गैर सामाजिक तत्वों से लेकर आतंकवादी तक हमारे भोलेपन का फायदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे, यदि हम तनिक भी असावधान रहेंगे।

(भारत)

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019

कानूनी अधिकार मिले तो ठीक है पर पड़ताल भी जरूरी है










यह विडंबना ही तो है कि हमारे देश में बरसों बरस तक किसी अन्य देश से आए नागरिक एक शरणार्थी के रूप में आएं जिन्हें उस देश में धार्मिक आधार पर जुल्म का शिकार होना पड़ा हो और यहां बिना किसी आधार पर रह रहे हों। उनका यहां रहने का एकमात्र तरीका यह रहा हो कि जो उनका देश था वहां से उन्हें भारत का वीजा मिला हो और वे उसकी अवधि समाप्त होने पर उस देश में लौटने के बजाय वीजा अवधि बढ़वाकर यहां रह रहे हों।



भारत में उन्हें रहने का न तो कानूनी अधिकार था न ही भारत के संविधान के अनुसार वे यहां रह सकते थे। भारत सरकार उन्हें जबरदस्ती वापिस जाने को भी नहीं कह सकती थी क्योंकि वे भारत में सदियों से रह रहे हिन्दू, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी हैं और राजनीतिक उथल पुथल के कारण पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में रह रहे थे और वहां उनके साथ भेदभापूर्ण व्यवहार हुआ जिसके चलते वे भारत आकर रहने लगे इस उम्मीद में कि कम से कम जिंदा तो बचे रहेंगे।



अब भारत की मजबूरी यह कि मानवीय आधार पर उन्हें निकाला नहीं जा सकता और कानूनन यहां रहने भी नहीं दिया का सकता। इन लोगो की मजबूरी यह कि कोई अन्य देश इन्हे क्यों स्वीकार करेगा, इसलिए अब भारत के सामने एक ही रास्ता बचता था कि इन्हे भारतीय नागरिकता दे दे और इसके लिए कानून में संशोधन कर इन्हे यहां वे सब अधिकार दे दिए जाएं जो सामान्य परिस्थतियों में किसी भी भारतीय नागरिक को मिले होते हैं।



एक खबर थी कि  डेढ़ करोड़ लोग हैं और दूसरे आंकड़ों के मुताबिक लगभग तीस हजार हैं जिन्हें कानून में संशोधन कर भारतीय नागरिकता दी जानी है।
संख्या चाहे कितनी भी हो लेकिन प्रश्न यह कि कैसे तय होगा कि ये अपने पर हो रहे अत्याचार के कारण वहां से भारत आए ?



हो सकता है कि उनकी बात सही हो लेकिन क्या ये नहीं हो सकता कि उनमें से कोई  उस देश के कानून के अनुसार किसी गैर कानूनी गतिविधि में शामिल होने के कारण वहां प्रताड़ित या दंडित किया गया हो और उससे बचने के लिए भारत इस उममीद पर आ गया हो कि यहां  कोई पूछताछ नहीं होगी और वे मजे में यहां रह सकते हैं। यही नहीं उनकी यहां जन्मी संतान भी यहां भारतीय संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए रह सकती है।



ऐसे लोगों को वोट देने या कोई भी ऐसी सरकारी सुविधा पाने का अधिकार नहीं जिसके लिए भारत की नागरिकता जरूरी हो। कुछ लोगों के साथ धार्मिक आधार पर प्रताड़ित किया जाना वास्तविक हो सकता है लेकिन हम उस देश के साथ कूटनीतिक संबंधों के जरिए सही बात का पता लगाएं बिना कैसे भारतीय नागरिक होने का अधिकार दे सकते हैं। अगर सरकार ने पूरी जांच पड़ताल कर ली है तब तो ठीक है लेकिन यदि नहीं तो आगे चलकर इनकी वजह से कोई अनहोनी भी हो सकती है।



भारत ही शायद एकमात्र ऐसा देश होगा जहां बिना नागरिकता लिए कोई भी आराम से दस बीस साल रह सकता है और न किसी को पता लगता है और न ही किसी को उसके पास भारतीय नागरिकता न होने का शक हो सकता है।



अब शायद ही गिने चुने लोगों को छोड़कर किसी को यह पता होगा कि अभिनेता अक्षय कुमार भारतीय नहीं बल्कि कनाडा के नागरिक हैं। इसी तरह और भी बहुत से साधन संपन्न, धनी मानी और रसूखदार लोग बिना भारतीय नागरिक बने यहां केवल फल फूल ही नहीं रहे होंगे बल्कि उनकी सरकार से लेकर राजनीति, व्यापार, व्यवसाय में भी भारी दखल होगा।



पाकिस्तान से यहां आकर अभिनय और गायन से शानदार जीवन बिताने वाले अनेक कलाकारों की पोल अक्सर खुलती रहती है। एक सवाल यह भी है कि यह लोग जो करोड़ों अरबों रुपया भारत में रहकर कमाते हैं, उस कहां रखते है, टैक्स किसे देते हैं और सरकार उनसे कुछ कहती क्यों नहीं कि आखिर बिना भारत की नागरिकता लिए यहां कैसे रह रहे हैं।



यह माना जा सकता है कि वास्तव में अत्याचार के शिकार अपने को भारतीय कहलाने और  भारत को ही अपना एकमात्र ठिकाना मानने वाले सच कह रहे हों लेकिन अपने राजनीतिक फायदे के लिए अर्थात वोट बैंक की खातिर एक धर्म विशेष के लोगों को भारत में रोके रखना कहां की इंसानियत है। रोहिंगियाओं की यही कहानी है।


जिन लोगों के बारे में आधिकारिक तौर पर पता है कि वे भारत के नागरिक नहीं है लेकिन यह भी वास्तविकता है कि बड़ी तादाद में ऐसे लोग यहां रह रहे हैं जिन्हें शरणार्थी नहीं बल्कि घुसपैठियों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए और उन्हें देश से निकाला ही जाना चाहिए।



संसद में कानून तो पास हो गया लेकिन अब चुनौती यह है कि इसके परिणामस्वरूप जो गुस्सा कुछ समुदायों में देखने को मिल रहा है और जिसके कम होने के बजाय उसके बढ़ने की उम्मीद ज्यादा है तो उससे कैसे निपटा जाएगा जबकि कुछ राजनीतिक दल इस मुद्दे से निकले आक्रोश्े की आग पर अपनी रोटियां सेकने में लगे हैं और पूरे देश में अस्थिरता का माहौल बनाना चाहते है।


एक उम्र के बाद 

आम तौर से साठ से पिचहतर वर्ष की आयु में पुरुष हो या महिला उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति ऐसी हो जाती है जिसमें वे अपने अब तक के जीवन का लेखा जोखा इस आधार पर करने लगते हैं कि उन्होंने जीवन में क्या खोया और क्या पाया।



सामान्य व्यक्ति जो कोई नौकरी, रोजगार, व्यापार या व्यवसाय जीवन भर करता रहा होता है, अब उससे निवृत्त होने और अपने पारिवारिक जनों के बीच अब तक की जमा पूंजी को बांटने की बात सोचने लगता है। कुछ लोगों के लिए यह अब तक की कमाई को ठिकाने लगाना होता है और कुछ के लिए उसे अपने भविष्य के लिए सुरक्षित स्थान पर रखकर उससे जो ब्याज यानी रिटर्न मिले उससे अपना बाकी का जीवन आराम से बिताने की इच्छा होती है।



इसके पीछे यह भी भावना रहती है कि अपना शेष जीवन तो सुख से बीत ही जाए, साथ में परिवार में बेटे बेटी, बहू, नाती पोतों के लिए भी कुछ न कुछ छोड़कर इस संसार से विदाई ली जाए।


अक्सर ज्यादातर लोगों की इच्छा बस अपने परिवार तक ही सीमित होकर रह जाती है और वे अपने और अपने जीवन साथी के साथ आनंद के क्षण अपनी मर्जी से बिताने का मौका तलाशते ही रह जाते हैं और जीवन की  डोर छूटने को हो जाती है।


ऐसे लोगों को चाहिए कि तन से कमजोर और मन से डावांडोल होने से पहले जिन्दगी की इस सच्चाई को मानते हुए कि शरीर को तो एक दिन पंच तत्व में विलीन हो ही जाना है अपने लिए अपनी सुविधा, शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार वह सब करने के बारे में केवल सोच विचार न करते हुए उस पर अमल कर देना चाहिए जो वे अब तक बस सपने में ही सोचा करते थे।



इस उम्र में वह सब करिए जो आप अब तक किसी न किसी वजह से कर नहीं पाए। मतलब यह कि कोई शौक जो किसी न किसी कारण अब तक सिर्फ सोचने से आगे न बढ़ पाए, उसे कर लीजिए, बिना इस बात की परवाह किए कि अगर कोई यह भी कहे कि इस उम्र में इन्हें यह शौक चर्राया है। मत सोचिए कि इस उम्र में लोग क्या कहेंगे जैसे कि सुनने को मिल सकता है ‘सींग  काटकर बच्छड़ों में शामिल हो रहे हैं‘ ।



 इस उम्र में अगर अपने से आधी से भी कम उम्र के लड़के लड़कियों या युवा स्त्री पुरुषों की संगत में वक्त बिताने का मन करे और ऐसा कोई अवसर हाथ आ जाए तो उसे पकड़ने में कोई कसर न बाकी रखें।



कहीं भी जाने, कुछ भी नया करने और देखने की तबीयत हो तो कदम पीछे हटाने की गलती न करें क्योंकि श्जिंदगी न मिलेगी दोबारा‘। कुछ दिन पहले एक अस्सी के लपेटे में चल रही एक ब्रिटिश महिला को लक्षद्वीप में अकेले घूमते देखकर और यह जानने के बाद कि वह एशिया और अफ्रीका के देशों का भ्रमण कर रही हैं, मन भाव विभोर हो उठा, हमारे यहां तो हाथ पैर से सही सलामत होते हुए भी ऐसी घुमक्कड़ी के बारे में सोचने पर भी आश्चर्य होता है।



जो कमाया है उसे खर्च करते रहिए चाहे वो जमापूंजी हो या जीवन के खट्टे मीठे अनुभव। इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि आप भविष्य में नहीं वर्तमान में जीना सीख जायेंगे।

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

गलत परवरिश, और पारिवारिक रिश्तों में कडुवाहट का असर











अक्सर जब इस तरह की बात सुनने, पढ़ने और देखने को मिलती है कि भाई भाई, भाई बहन एक दूसरे के खिलाफ खड़े हैं, उनमें मुकदमेबाजी हो रही है, एक दूसरे की शक्ल देखना तक गवारा नहीं, यहाँ तक कि मरने मारने पर आमादा हैं तो यही मुँह से निकलता है कि ‘क्या हो गया है आज की पीढ़ी को‘ या ‘माँ बाप ने ठीक से परवरिश न की होगी‘ या फिर सारा दोष कलयुग के सिर मढ़ दिया जाता है कि ‘बस यही और देखना बाकी था‘।



इसी तरह पति पत्नी के बीच और माता पिता का पुत्र या पुत्री के साथ जो प्रेम और भावनाओं का रिश्ता होता है, उसमें अगर कहीं गिरावट देखने को मिलती है तो उसका प्रभाव इनके व्यक्तिगत जीवन पर तो पड़ता ही है, साथ में इनके आसपास रहने वालों, रिश्तेदारों से लेकर उनके काम धंधे, रोजगार, व्यापार और आजीविका के साधनों पर भी पड़ता है।


अगर अपनी पौराणिक परंपराओं को देखें जैसे कि राम और उनके भाइयों के बीच कभी झगड़े या विवाद की कोई कथा देखने को नहीं मिलती। राम के वनवास की अवधि में भरत उनकी पादुका को सिंहासन पर रखकर राजकाज चलाते हैं और उनके लौटने पर उन्हें अयोध्या का राज्य सौंप देते हैं। यहाँ तक कि रावण का साथ उसके भाइयों और पुत्र ने यह जानते हुए भी कि रावण गलत है, नहीं छोड़ा और जिस भाई विभीषण ने विरोध किया उसके लिए ‘घर का भेदी लंका ढाए‘ जैसे अपमानजनक मुहावरे बन गए। इसी तरह पांडव भाइयों के बीच हमेशा आदर सम्मान बना रहा। कौरव भाइयों के बीच भी कभी मनमुटाव नहीं देखने को मिला और उन्होंने युद्ध में हमेशा एकता बनाए रखी।


संस्कार और परवरिश 


अब अपनी संतान के पालन पोषण में अलग अलग परिवेश और अपने अपने पारिवारिक संस्कारों तथा परवरिश की गठरी लेकर आए पति पत्नी जब माँ बाप बनते हैं तो उनकी क्या भूमिका होती है, यह आज के दौर में इस बात पर अधिक निर्भर करता है कि उनमें से किसकी बात का असर ज्यादा होता है। मिसाल के तौर पर जब उद्योगपति मुकेश अम्बानी को अपने भाई अनिल की आर्थिक स्थिति खराब होने और जेल तक जाने की नौबत आने का पता चलता है तो कहते हैं कि उनकी माँ ने ही बड़े बेटे को आदेश दिया था कि वह छोटे बेटे की इस मुसीबत के समय में मदद करे। हो सकता है अगर उनके पिता जीवित होते तो वे भी ऐसा ही करने को कहते।


असल में देखा जाए तो संतान को उनके बचपन से लेकर युवा होने और फिर जिंदगी की गाड़ी अपने बलबूते पर चलाने की जो ट्रेनिंग मिलती है उसकी नींव कितनी मजबूत है यह इस बात पर निर्भर करता है कि माता पिता स्वयं कितना इस बात को समझते हैं कि परवरिश के दौरान यह उनकी जिम्मेदारी बनती है कि संतान सही रास्ते पर चले और कोई ऐसा काम न करे जिससे उन पर  किसी को ऊँगली उठाने या आरोप लगाने की जरूरत पड़े।


यह बात इसलिए बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है जब वयस्क होने से पहले या बाद में कोई लड़का या लड़की किसी अपराध में शामिल पाया जाता है और लोग यह कहते हैं कि इसके पालने पोसने में ही खराबी रही होगी जो यह अपराधी बन गया। नाबालिग होते हुए भी चोरी, डकैती, लूटपाट, मारपीट, हत्या, बलात्कार जैसे जघन्य अपराध करने की प्रवृत्ति क्या यह नहीं कहती कि इसके लिए उनके माता पिता जिम्मेदार हैं और उन पर भी अदालती कार्यवाही होनी चाहिए और सजा मिलनी चाहिए क्योंकि संतान को अपराधी बनाने में उनकी परवरिश का बहुत बड़ा योगदान है।


जब संतान कोई अच्छा काम करने के कारण या कोई पदक पाने और नया कीर्तिमान स्थापित करने के लिए अपने माँ बाप और उनकी परवरिश को श्रेय देती है और वे भी उसकी उपलब्धि पर फूले नहीं समाते और उनके लिए यह अपने व्यक्तिगत सम्मान की बात होती है तो फिर उसके अपराध करने पर आपराधिक मानसिकता बनाने के लिए उन्हें जिम्मेदार क्यों नहीं ठहराया जा सकता और उन पर भी कानूनी कार्यवाही क्यों नहीं की जानी चाहिए, यह सोचने का विषय है जिस पर समाज से लेकर सरकार तक को विचार करना चाहिए।



ईर्ष्या, भेदभाव और व्यवहार 


यह एक मनोवैज्ञानिक विषय हो सकता है कि भाइयों और भाई बहनों के बीच बचपन से ही एक दूसरे के प्रति जलन क्यों पैदा होती है, वे एक दूसरे के साथ सामान्य या बाल सुलभ व्यवहार करते करते इतने उत्तेजित और उग्र क्यों हो जाते हैं कि एक दूसरे की हत्या तक करने की बात सोचने लगते हैं, परंतु इतना तो निश्चित है और यह वास्तविकता भी है कि उनके ऐसा बन जाने में माता पिता की भूमिका सबसे अधिक है।


असल में समस्या की जड़ यह नहीं है कि माँ बाप के अनपढ़ होने या पढ़े लिखे होने से संतान की परवरिश पर असर पड़ता है बल्कि यह है कि ज्यादातर माता पिता और उनकी संतान के बीच कोई बातचीत या संवाद ही नहीं होता और अगर होता भी है तो वह धौंस जमाने या डाँट डपटकर चुप कराने से अधिक नहीं होता।


इसी तरह जब एक भाई के दिल में दूसरे भाई से नफरत पलने लगती है या बहन से भाई को जलन होने लगती है तो यह माता पिता द्वारा उनकी परवरिश के दौरान खाने पीने से लेकर शिक्षा तक में भेदभाव और अनावश्यक रोकटोक लगाने या किसी एक को कुछ भी करने की छूट देने और दूसरे पर सभी तरह की बंदिशें लगाने के परिणाम के रूप में उनके सामने आता है। वे भाग्य से लेकर कलयुग तक को दोषी ठहराने लगते हैं जबकि उन्हें अपने ही गिरेबांन में झाँक कर देखना चाहिए कि वे ही संतान के उदंड होने, आज्ञा न मानने और अपनी मनमानी करने देने के लिए उत्तरदायी हैं।


रिश्तों की दीवार 


पारिवारिक रिश्तों की दीवार जब कमजोर होकर गिरने लगती है तो उसकी चपेट में समाज का आ जाना निश्चित है। दुर्भाग्य से किसी शिक्षा संस्थान में ऐसा कोई पाठ्यक्रम नहीं है जो बच्चों को वह सिखा सके जो उन्हें माँ बाप से परवरिश के समय सीखने को मिलना चाहिए। हकीकत यह भी है कि जुर्म करने की मानसिकता और उसकी ट्रेनिंग की शुरुआत बचपन से होने लगती है। यह विशेषकर तब होता है जब परिवार में असंतुलन होता है भय का वातावरण रहता है या सीमा से अधिक कुछ भी करने की छूट होती है। 


अनेक देशों में संतान की परवरिश में कमी के लिए माँ बाप को जिम्मेदार माना जाता है और उनसे पालन पोषण के अधिकार भी छीने जा सकते हैं लेकिन हमारे यहाँ सीधे नाबालिग या बालिग व्यक्ति को सजा सुना दी जाती है जबकि सजा उन्हें भी मिलनी चाहिए जो उनके अंदर आपराधिक मानसिकता का बीज बोने के लिए जिम्मेदार हैं।


यह बात और बेहतर ढंग से इस तरह भी समझी जा सकती है कि जब कोई अपने माता पिता के वृद्ध होने पर उनका तिरस्कार करता है, अकेलेपन का शिकार होने के लिए छोड़ देता है तो किसी हद तक मां बाप स्वंय भी इसके लिए जिम्मेदार होते हैं। यहां यह कहावत कि ‘जैसा बोओगे, वैसा काटोगे‘ सटीक बैठती है।




शुक्रवार, 22 नवंबर 2019

स्वस्थ रहने का अधिकार, देश की जरूरत और मेडिकल व्यवसाय में नैतिकता






किसी भी समाज में अगर ईश्वर के जैसा या उसके बराबर ही आदर और सम्मान दिलाने वाला अगर कोई व्यवसाय है तो उसमें मेडिकल और उससे जुड़े वे सब लोग आते हैं जो एक तरह से मनुष्य को बीमारी, दुर्घटना या किसी प्राकृतिक आपदा में फँसे लोगों की जीवन रक्षा के लिए जाने जाते हैं। इनमें डॉक्टर, नर्स इंसान के रक्षक और अस्पताल, डिस्पेन्सरी से लेकर दवाइयों की दुकान बीमार का इलाज करने के साधन के रूप में माने जाते हैं।


हरेक व्यवसाय में आर्थिक लाभ हानि का जो बही खाता चलता है वह मेडिकल व्यवसाय में नहीं रखा जा सकता और इसीलिए इसे सेवा का जरिया समझा जाता रहा है। आज स्थिति लगभग उलटी हो गयी है और इसे भी उसी तरह धन लाभ कमाने का जरिया मानने का चलन शुरू हो गया है जैसा कि दूसरे काम धंधों में माना जाता है।


इसका एक उदाहरण यह है कि पहले उपभोक्ता संरक्षण कानून में स्वास्थ्य की देखभाल करने को अन्य सेवाओं की भाँति सेवा के दायरे में रखा गया था और यदि मेडिकल सेवा में कोई खामी होती थी तो इस कानून के दायरे में दण्ड दिए जाने का प्रावधान था लेकिन अब ऐसा नहीं कर सकते, पीड़ित को सामान्य मुकदमे की तरह विभिन्न अदालतों में न्याय की गुहार लगानी होगी।


मेडिकल व्यवसाय में नैतिकता 

एक सर्वे के मुताबिक इस व्यवसाय में काम करने वाले डॉक्टर अनेक तरह के टेस्ट करने वाली लेबोरेटरी से चालीस से साठ प्रतिशत तक किकबैक पाते हैं जो उन्हें मरीज की जेब से निकलवाने की काबलियत के रूप में मिलता है। इसमें जरूरी टेस्ट भी मर्ज को दूर करने के लिए जरूरी बताकर मरीज को उन्हें करवाने के लिए मजबूर किया जाता है।


अब इन टेस्टों का नाम भी है और इन्हें को कराने के लिए मरीज का जो खून, यूरीन, बलगम आदि लिया जाता है वह नालियों में बहा दिया जाता है। इन टेस्टों के नाम भी है और इन्हें नाली या सिंक कहा जाता है। किसी भी लैबोरेटरी में किसी कर्मचारी को भरोसे में लेकर यह सच उगलवाया जा सकता है।



तीस से चालीस प्रतिशत तक डॉक्टर को किसी भारी फीस लेने वाले स्पेशलिस्ट को रेफर करने के लिए मिलता है और लगभग इतना ही अस्पताल की सेवाओं में से मिलता है। इसके साथ ही बड़े नामीगिरामी अस्पतालों के पेनल पर बने रहने के लिए डॉक्टर को उनमें मरीजों को भेजने के लिए अपने निर्धारित कोटे को पूरा करना होता है, तब ही वह उस अस्पताल के पेनल पर रह सकता है।



इन अस्पतालों में मरीज के आने के बाद उसे तीन चार दिन तक ऑब्जर्वेशन के नाम पर आई सी यू में रखा जाता है, जहाँ जरूरत न भी हो तो भी वेंटिलेटर पर रखा जाता है, डाइलिसिस जैसी चिकित्सा और महँगे इंजेक्शन और दवाइयाँ दी जाती हैं जिनकी कीमत उन पर छपे अधिकतम मूल्य से कई गुना ज्यादा होती है। हर उस चीज को मरीज के बिल में जोड़ा जाता है जो उसे दी जाती है चाहे सिरंज, पट्टी, बैंडिज कुछ भी हो।


एक और गोरखधंधा चलता है जो आमतौर से डॉक्टर दम्पति चलाते हैं। यह वन मैन शो होता है। दम्पति में से एक डॉक्टर की भूमिका निबाहता है और दूसरा अपने ही घर के कुछ कमरों को नर्सिंग होम की शक्ल देता है, इसमें दसवीं फेल नर्स, ढीली या कसी हुई वर्दी पहने अनपढ़ वार्ड बाय होते हैं। नर्स रिसेप्शन से लेकर इंजेक्शन लगाने, ग्लूकोस चढ़ाने से लेकर ऑपरेशन सहायक तक का काम करती है और रात को आई सी यू के बाहर भी बैठती है ताकि अगर कोई इमर्जेन्सी हो जाए तो फौरन दूसरी मंजिल पर रहने वाले डॉक्टर दम्पति में से किसी एक को बुला सके। यहाँ तक के किस्से हैं कि मरीज की मृत्यु होने के बाद भी नकली ऑपरेशन का ढोंग रचकर मोटी रकम वसूली जाती है।



इस तरह के क्लीनिक और नर्सिंग होम में जबरदस्ती सर्जरी से लेकर स्त्रियों की बच्चेदानी यह कहकर निकाल दी जाती है कि फायब्राड हो गए हैं जबकि ये प्रत्येक महिला में होते हैं। इसी तरह कोसमेटिक ट्रीटमेंट के नाम पर फेशियल, वैक्सिंग करने की बात कहकर त्वचा का इतना बुरा हाल कर देते हैं जिससे जान तक खतरे में पड़ सकती है।


अब क्योंकि चिकित्सा में लापरवाही का प्रावधान ही कानून में नहीं होगा तो फिर कैसे रोगी और उसके परिवार वाले अपने बचाव में कुछ कर सकेंगे, यह हमारे नीति निर्धारण करने वालों के लिए सोचने की ही नहीं बल्कि इस पर कुछ ठोस नियम कानून बनाने की भी जरूरत को उजागर करता है।


स्वस्थ रहने का अधिकार 

हमारे देश में चिकित्सा व्यवसाय की सबसे पहली कड़ी सरकारी अस्पतालों की है जो अनेक प्रशासनिक खामियों के बावजूद सामान्य व्यक्ति की बीमारी की अवस्था में पहली पसंद हैं।

इनमें भीड़ ही इतनी होती है कि डॉक्टर के मन में मरीज का आर्थिक शोषण करने की बात ही नहीं आ पाती, दूसरे ज्यादातर बीमार इलाज के लिए ही पैसों की कमी से जूझते रहते हैं। जो सम्पन्न होते हैं, वे अपने राजनीतिक या सामाजिक रुतबे की बदौलत यहाँ वी आई पी की तरह अपनी चिकित्सा कराने आते हैं और कभी कभी जरूरत न होने पर भी वार्ड में टिके रहते हैं और मुफ्त में महँगी से महँगी सुविधाओं का उपभोग करते रहते हैं।


दूसरी कड़ी है चिकित्सा को शुद्ध व्यवसाय और जबरदस्त मुनाफे के धंधे के रूप में देखने वाले बड़े व्यावसायिक और औद्योगिक घरानों द्वारा स्थापित फाइव स्टार अस्पतालों की जहाँ या तो वे लोग इलाज कराने जाते हैं जिनके पास पैसा फैंक कर तमाशा देखने की ताकत है या फिर वे जिनकी बीमारी का खर्च बीमा कम्पनियाँ चुकाती हैं। आम आदमी या थोड़ी बहुत हैसियत रखने और चिकित्सा के खर्च का जुगाड़ कर सकने वाला इनमें चला गया तो उसकी हालत गले में फँसी हड्डी की तरह हो जाती है जो न निगलते बनती है और न उगलते।


तीसरी कड़ी है उन धर्मार्थ और शुद्ध सेवा करने की नियत से खोले गए चिकित्सा संगठनों और संस्थानों की जो लगभग मुफ्त इलाज की सुविधाएँ देते हैं। इनकी संख्या बहुत कम है लेकिन इनमें चिकित्सा के उच्चतम पैमानों का पालन किया जाता है और कुछ की ख्याति तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी है।


एक चैथी कड़ी भी है जो झोलाछाप डाक्टरों की है, झाड़ फूँक, गंडे ताबीज , भूत प्रेत के डर जैसी बातों से इलाज करने के बहाने लोगों को ठगने का काम करते हैं।


इन सब परिस्थितियों के कारण क्या यह जरूरी नहीं है कि देश में प्रत्येक नागरिक को स्वस्थ रहने का अधिकार मिले और इसके लिए सभी राजनीतिक दल एक स्वर से सरकार से कानून बनाने की माँग करें जिसका मसौदा ऊपर कही गयी चारों कड़ियों तथा अन्य वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया जाय ?


दुनिया का कोई भी देश अस्वस्थ, बीमार और कमजोर नागरिकों के बल पर तरक्की नहीं कर सकता, इसलिए स्वस्थ रहने को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले और सभी के लिए एक जैसी चिकित्सा सुविधाएँ हों और इसके लिए आंदोलन भी करना पड़े तो उससे हिचकना नहीं चाहिए क्योंकि यह जनहित का मुद्दा है।


(भारत)

शुक्रवार, 15 नवंबर 2019

वैज्ञानिक सोच बढ़ाने में विज्ञान-फिल्मों का योगदान









यह कहना कि विज्ञान हमारी सोच को बदल सकने की ताकत रखता है, कल्पना और वास्तविकता का भेद समझा सकता है और जीवन जीने को आसान बना सकता है, न केवल सौ प्रतिशत सही है बल्कि अंधविश्वास से मुक्ति दिला सकने में भी सक्षम है।

इसीलिए कहा जता है कि विज्ञान कभी असफल नहीं होता, वह किसी प्रयोग के उम्मीद के मुताबिक परिणाम न देने से अनुसंधान और आविष्कार को नई तथा अनजान दिशाओं को खोजने की प्रेरणा देता है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा हाल ही में चाँद पर उतरने की कोशिश में आई कमी का विश्लेषण करने और यह समझने कि ‘क्या गलत हुआ‘ के बाद अगले साल एक बार फिर चाँद पर उतरने की घोषणा करना इसका एक उदाहरण है।


विज्ञान कभी हार नहीं मानता और उसके बाद जब नए प्रयासों तथा निरंतर खोजबीन करते रहने से कोई नई उपलब्धि मिलती है तो वह चमत्कार की तरह लगता है, विज्ञान एक वट वृक्ष की भाँति अपनी शाखाओं और प्रशाखाओं का निरंतर विस्तार करता रहता है, उसमें नित्य नई कोपलें फूटती रहती हैं और एक बार यह जानने का चस्का लग गया कि ‘आखिर ऐसा होता कैसे है‘ तो फिर प्रत्येक चीज को विज्ञान की कसौटी पर कसने की लत लग जाती है जिसे हम वैज्ञानिक सोच का नाम देते हैं।


विज्ञान की अभिव्यक्ति 



विज्ञान को जन जन तक पहुँचाने और देशवासियों की सोच को एक वैज्ञानिक की तरह बनाने में फिल्म एक ऐसा माध्यम है जो मुश्किल से मुश्किल समस्या को सुलझाने का तरीका बताने और अनेक जटिल प्रशनों के उत्तर और उनकी व्याख्या साधारण भाषा में करने के लिए सबसे अधिक कारगर है।


विज्ञान फिल्मों के लिए विशेष रूप से बनाए गए मंच अर्थात फिल्म समारोह विभिन्न क्षेत्रों में विकसित टेक्नोलोजी को जनता तक पहुँचाने का जरिया है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए इण्डिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टीवल की शुरुआत सन् 2015 में हुई ताकि यह दिखाया और बताया जा सके कि हमारा देश विज्ञान की मदद से किस तेजी से आगे बढ़ रहा हैं।


इस समारोह का पाँचवा संस्करण पाँच से आठ नवम्बर तक कोलकाता में भारत सरकार के संस्थान विज्ञान प्रसार द्वारा नोडल एजेंसी के रूप में भव्यता के साथ आयोजित किया गया जिसमें सत्यजीत रे फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान का महत्वपूर्ण योगदान था।


 भारतीय फिल्म निर्माताओं की दो सौ से अधिक प्राप्त फिल्मों में से छप्पन फिल्में नौमीनेट हुईं जिनका प्रदर्शन संस्थान के विभिन्न सभागारों में हुआ। इनके अतिरिक्त परमाणु और मिशन मंगल जैसी फीचर फिल्में भी दिखाई गयीं और उनके निर्देशकों ने दर्शकों से संवाद के दौरान विज्ञान और उससे जुड़े विषयों पर फिल्म निर्माताओं के सामने आने वाली कठिनाइयों के साथ साथ निर्माण के दौरान आने वाली चुनौतियों का जिक्र भी किया।


पर्यावरण, प्रदूषण, रासायनिक जोखिम, वन्य जीव संरक्षण, रोग निदान, योग, स्वास्थ्य, वैकल्पिक इंधन, ऊर्जा, सर्प दंश, स्टार्टअप, जल संरक्षण, सिंचाई संसाधन, पीने का पानी, नेवीगेशन, मोरिंगा की खेती, साफ सफाई, सूक्ष्म कीट, अंतरिक्ष, बदलता मौसम, कीटनाशक, आदिवासी जीवन, मधुमेह से बचाव, दिव्य नयन, कैंसर निदान, दिमागी बुखार, प्लास्टिक उपयोग जैसे विषयों पर फिल्में एक आम दर्शक के मन में जिज्ञासा पैदा करने में सहायता करती हैं कि किस प्रकार विज्ञान और प्रोद्योगिकी हमारी जीवन शैली को बेहतर बना सकती है।


योग क्रियाओं से बेहतर जीवन जीने की कला समझाती फिल्म सत्यम और बंद कमरे में कार्बन मोनो ओक्साईड से मृत्यु तथा मौसम में होने वाले गम्भीर बदलाव से आने वाले खतरे की चेतावनी जैसी फिल्में सार्वजनिक रूप से, विशेषकर विद्यालयों में दिखाई जानी चाहिएँ।


यह जानना अपने आप में ही भयावह है कि हमारे देश में पचास हजार से ज्यादा मौतें हर साल सांप के काटने से हो जाती हैं और हमारे पास इन्हें रोकने के लिए पर्याप्त साधन नहीं हैं, अभी भी पीड़ित का उपचार सपेरा और झाड़ फूँक से इलाज करने वाला ढोंगी ही करता है।


मोरिंगा की खेती पर बनी फिल्म से एहसास हुआ कि बढ़िया सेहत और लम्बी उम्र पाने का यह बेहतरीन उपाय है। कैंसर और फैलेरिया जैसी घातक बीमारियों का निदान सम्भव है। जिन प्रदेशों में पराली जलाने से प्रदूषण की गम्भीर समस्या पैदा होती है उनके लिए इससे बचने के लिए टेक्नोलोजी उपलब्ध है। फलों और सब्जियों में से कीटनाशक दूर करने के उपाय हैं, नेत्र ज्योति से वंचित लोगों के लिए दिव्य नयन जैसे यंत्र हैं।


जल संरक्षण और शुद्ध पेयजल से लेकर खेती में इस्तेमाल होने वाले हानिकारक रसायनों के विकल्प तैयार हैं। खाद्य पदार्थों के उत्पादन के समय प्रयोग में लाए गए नुकसान देने वाले तत्वों बचाव से लेकर जमीन की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के उपाय हमारे वैज्ञानिकों ने सुलभ करा दिए हैं।


यहाँ तक कि शहर हो या देहात गंदे नालों की सफाई और उनमें पैदा होने वाली जानलेवा गैस को बेअसर करने वाली टेक्नोलोजी उपलब्ध है। पशुपालन में आधुनिक तकनीकों से न केवल अधिक दूध उत्पादन हो सकता है बल्कि उनसे प्राप्त होने वाले गोबर से खाद और इंधन भी मिलता है।


जरूरत किस बात की 


हमारे देश में ही विज्ञान से सम्बंधित विषयों पर हर साल सैंकड़ों फिल्में बनती हैं और विदेशों से आने वाली फिल्मों की संख्या हजारों में है लेकिन विडम्बनापूर्ण स्थिति यह है कि इनका प्रसारण केवल फिल्म समारोहों अथवा उनके उद्घाटन तक ही सिमट कर रह जाता है। इससे बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण अवस्था यह है कि हमारे वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम से तैयार की गयी टेक्नोलोजी उसी तरह अलमारियों में बंद होकर व्यर्थ हो जाती है जिस प्रकार किसी फिल्म निर्माता द्वारा उस पर बनाई गयी फिल्म एक बार प्रदर्शित होने या देखने के बाद भुला दी जाती है।


क्या सरकार और प्रशासन को कोई ऐसी नीति नहीं बनानी चाहिए जिससे जीवन को बेहतर बना सकने की क्षमता रखने वाली विकसित और प्रामाणिक टेक्नोलोजी पर अमल किये जाने की कानूनी अनिवार्यता हो।


अंतरिक्ष, आणविक, अस्त्र शस्त्र जैसे विषयों को लेकर वैज्ञानिक प्रगति की बात करना और उनसे सम्बंधित नीति बनाने के बारे में अक्सर सुनने को मिलता है लेकिन ऐसा देखने और सुनने में कभी कभार ही आता है कि सामान्य जन की सहूलियत के लिए किसी टेक्नोलोजी पर अमल करने की नीति बनाई गयी हो।


विज्ञान की मदद से प्रदूषण, मौसम परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण से लेकर जनसंख्या में बढ़ौतरी तक को रोकने में सफलता मिल सकती है। यदि विकासशील या पिछड़े देश की पंक्ति से निकलकर विकसित देशों में शामिल होना है तो वैज्ञानिक सोच और विज्ञान सम्मत उपायों पर अमल करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है।

शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

सरदार पटेल और देश को जोड़ने की कार्यशैली आज भी जरूरी है








स्वतंत्रता के बाद यदि देश 550 से ज्यादा रियासतों में बंटा हुआ रह जाता और उनके राजा, महाराजा और नवाब आजाद भारत के शासक बन जाते तो क्या होता, यह सोचकर ही भय लगता है। अंग्रेजों ने 1857 के विद्रोह से सबक लेते हुए इन सब को खुश रखने में ही अपनी भलाई समझी।  उनके शौक मौज मस्ती को हवा देने और निरंकुश होने तक को अपनी सरपरस्ती में ले लिया, जुल्म और अत्याचार से लेकर उनकी सनक और अजीब हरकतों को बढ़ावा दिया और इस तरह जो राज्य अपनी न्यायप्रियता के लिए जाने जाते थे, वे भी प्रजा को लूटने लगे। अगर कहीं सरदार पटेल इस काम को अपने हाथ में न लेते और इन सब को लगभग हाँकने तक की नीति न अपनाते तो आज हम जिस प्रजातांत्रिक ढाँचे में रहकर खुलकर साँस ले पा रहे हैं, विश्व में नाम कमा रहे हैं, वह कदापि न होता।


विलासिता  में डूबे शासक 

इतिहासकारों और हमारे नेताओं की जीवनी लिखने वाले लेखकों ने उस समय का जो वर्णन किया है उसे पढ़कर यकीन नहीं होता कि हम किस हालत में थे। अंग्रेजों ने इन शासकों के लिए सभी रास्ते बंद कर रखे थे और वे अपना वक्त पोलो खेलकर या शिकार करते हुए व्यतीत करते थे। ये अंग्रेजों की चापलूसी करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। एक उदाहरण है। जब प्रिन्स ऑफ वेल्ज, बाद में सातवें एडवर्ड, भारत आए तो एक महाराजा ने हुक्म दिया कि उनकी चाय के लिए जो पानी उबाला जाए वह बैंक नोटों की गड्डियाँ जलाकर किया जाय। समझ सकते हैं कि उसके पास कितना पैसा होगा और फिर नाच गाने, महफिल सजाने और अंग्रेजों को शिकार पर ले जाने से लेकर उनके मनोरंजन के लिए सभी तरह का प्रबंध करने पर कितना भी खर्च करना पड़े, कोई कोरकसर नहीं छोड़ी जाती थी।



इस तरह के विचित्र हालात थे कि स्वार्थ, अय्याशी का बोलबाला था और प्रजा का पालन करना और उनके सुख दुःख का ध्यान रखना दूर की बात थी जो अंग्रेजों के लिए भारत पर शासन करते रहने के लिए बहुत उपयुक्त थी। हालाँकि कुछेक रियासतें जैसे कि मैसूर, बड़ौदा, ट्रावनकोर, कोचीन जहाँ शिक्षा का प्रसार भी था और चुनी हुई विधान सभाएँ थीं, प्रजा का ध्यान रखा जाता था, उन्हें छोड़कर बाकी सब जगह हिटलरशाही और पिछड़ेपन का साम्राज्य था। ज्यादातर रियासतों की अपनी सेना नहीं थी, पुलिस रख सकते थे और वे किसी भी स्थिति के लिए अंग्रेज सरकार के मोहताज थे।



भारत और पाकिस्तान का बँटवारा तय हो चुका था और अंग्रेजों की चाल के मुताबिक कोई भी रियासत दोनों में से किसी एक के साथ जाने या स्वतंत्र रहने की घोषणा कर सकती थी। इन्हें जितनी फिक्र अपने रुतबे, विलासिता और तोपों की सलामी मिलने की थी, उससे कहीं अधिक आजाद भारत में अपनी हुकूमत और वर्चस्व बनाए रखने की थी। सर कोरफील्ड जैसे अंग्रेज इन रियासतों के शासकों को भड़काने में लगे हुए थे कि वे आजाद भारत में अपनी हिस्सेदारी की ज्यादा से ज्यादा माँग करें और बराबर धमकी देते रहें कि उनकी नाजायज माँगें न मानने का नतीजा कितना खतरनाक हो सकता है।


कैसे कैसे शासक 

इन विकट परिस्थितियों में सरदार पटेल के सामने जबरदस्त चुनौती थी कि देश को खंड खंड होने से कैसे रोका जाए और इसके साथ ही जिन्ना की चाल को कैसे विफल किया जाए जो रियासतों को पाकिस्तान के साथ विलय करने के लिए सभी तरह के हथकंडे अपना रहा था। विडम्बना यह कि केवल चालीस दिनों में पंद्रह अगस्त से पहले सब कुछ किया जाना था। बीकानेर, पटियाला, ग्वालियर और बड़ौदा जैसी कुछ महत्वपूर्ण रियासतों ने भारत में विलय की सहमति दे दी थी लेकिन हैदराबाद के निजाम और कश्मीर के महाराजा जैसे लोग अपनी खिचड़ी अलग पकाने का ख्वाब देख रहे थे।



जोधपुर के महाराजा को तो जिन्ना ने खाली कागज पर दस्तखत कर के भी दे दिया था कि वो विलय की जी भी शर्तें चाहें इस पर लिख लें। उनके साथ जैसलमेर के महाराजकुमार थे जिन्हें दाल में कुछ काला लगा और महाराजा को समझाया कि जिन्ना के जाल में फँसने के बाद जाले में फँसी मकड़ी जैसी उनकी हैसियत हो जाएगी। अब इस कोरे कागज पर जिन्ना के दस्तख्त के बल पर भारत के साथ विलय करने के लिए अपनी माँगे मनवाने की कोशिश हुई जो पटेल के सहयोगी वी पी मेनन की सूझबूझ से सफल नहीं हो  पाई।


इसी तरह भोपाल के नवाब और इंदौर के महाराजा ने अपनी अकड़ दिखाई। नवाब ने हस्ताक्षर कर दिए लेकिन पंद्रह अगस्त से पहले घोषणा न करने को कहा। इंदौर के महाराजा ने दस्तखत न करने का मन बनाया और ट्रेन से दिल्ली पहुँचे तथा अपने डिब्बे को साइडिंग में खड़ा कर सरदार पटेल को वहाँ आकर मिलने का संदेश भिजवाया। पटेल ने राजकुमारी अमृत कौर को मिलने के लिए भेज दिया जिन्हें देखकर महाराजा अपनी चाल भूल गए और उन्हें उनकी औकात समझ में आ गयी। वह उनके साथ सरदार पटेल से मिलने गए और उनसे कहा की क्योंकि भोपाल के नवाब ने दस्तखत नहीं किए हैं तो वे भी नहीं करेंगे। जब नवाब के दस्तखत दिखाए गए तो उन्हें यकीन नहीं हुआ क्योंकि दोनों ने विलय न करने का तय किया था। उन्होंने दस्तावेज देखकर चुपचाप हस्ताक्षर कर दिए और लौट गए।


जूनागढ़ के नवाब को जिन्ना ने पाकिस्तान के साथ विलय करने के लिए प्रोत्साहित किया जबकि भौगोलिक दृष्टि से यह सम्भव नहीं था। जहाँ सरदार पटेल ने कुछ छोटी छोटी मुस्लिम बहुल रियासतों को पाकिस्तान के साथ विलय करने की सलाह देकर ईमानदारी दिखाई वहीं जिन्ना ने भारत को खंडित करने की कोई कोशिश नहीं छोड़ी। जूनागढ़ इसका उदाहरण है। उसके नवाब को कुत्तों से जबरदस्त लगाव था, यहाँ तक कि वह कुत्ते और कुत्तियों की शादियाँ बहुत धूमधाम से करने के लिए मशहूर था। प्रजा चाहे भूखी रहे पर कुत्तों को सुगंधित पानी से नहलाया जाता था और विदेशों से उनका भोजन मँगवाया जाता था।


उसने अपने प्रधानमंत्री नवाज भुट्टो को शासन की बागडोर सौंप रखी थी जिसने जूनागढ़ के पाकिस्तान के साथ विलय की घोषणा कर दी जिसने रियासत में खलबली मचा दी क्योंकि अस्सी प्रतिशत आबादी गैर मुस्लिम थी और पाकिस्तान से तीन सौ मील की दूरी को केवल समुद्र के रास्ते तय किया जा सकता था। यह निश्चित तौर पर जिन्ना का कुचक्र था जिसे तोड़ने में सरदार पटेल सफल हुए और जनता के भारी विरोध के कारण नवाब अपने कुत्तों की फौज, साढ़े सात लाख पौंड से भी अधिक रकम लेकर पाकिस्तान भाग गया और उसका प्रधानमंत्री भी जिन्ना द्वारा कोई मदद न करने के कारण भारत को प्रशासन सौंपकर चला गया। 


इस तरह पंद्रह अगस्त तक हैदराबाद और कश्मीर को छोड़कर भारत में सभी रियासतों का विलय हो गया। जहाँ तक कश्मीर की जिम्मेदारी सरदार पटेल की थी लेकिन पंडित नेहरु ने अपने भावनात्मक सम्बन्धों की दुहाई देकर इसे अपने हाथ में ले लिया। नेहरु को शेख अब्दुल्ला की दोस्ती पर भरोसा था जबकि सरदार पटेल का अब्दुल्ला पर कतई विश्वास नहीं था। शासन मित्रता पर नहीं चलाया जा सकता और इसी भूल की भारी कीमत अब तक चुकाने को देश मजबूर था।


हैदराबाद  के निजाम को सही रास्ते पर लाने के लिए सरदार पटेल ने नेहरु को दूर रखते हुए वह सब कदम उठाए जो एक घमंडी, कंजूस, बेशुमार दौलत के बल पर दुनिया को अपने कदमों पर झुका सकने का सपना पालने वाले बेवकूफ इंसान की अक्ल ठिकाने पर लाने के लिए उठाए जा सकते थे। इसका परिणाम यह हुआ निजाम को भारत के साथ विलय करने के लिए हामी भरनी पड़ी, बावजूद इसके कि उसने इस मामले को अमेरिका के राष्ट्रपति और यूनाइटेड नेशन में सुरक्षा परिषद तक ले जाने की पूरी कोशिश की ताकि यह मुद्दा अंतराष्ट्रीय हो जाए।


सरदार पटेल ने अपनी हृदय की गम्भीर बीमारी की अवस्था में भी सभी रियासतों को एक झंडे के नीचे खड़ा करने के काम में कोई कसर नहीं छोड़ी और राजपूताना, पंजाब, हिमाचल से लेकर सौराष्ट्र तक अपनी ध्वजा पताका फहराई। इसी तरह ओड़िसा, मध्य प्रदेश तथा अन्य स्थानों पर एकता की ऐसी लहर बनाई कि सब उसमें शामिल होते गए।


अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक और हिमालय से कन्याकुमारी तक पाँच लाख वर्ग मील के क्षेत्र से भारत देश की सुंदर रचना का श्रेय सरदार पटेल और उनके साथी सहयोगियों को जाता है और यह बात महात्मा गांधी ने भी स्वीकार की कि यह काम सरदार पटेल के सिवाय किसी और के करने से कभी नहीं हो पाता।


सरदार पटेल को अपनी अंतिम साँस तक यह पीड़ा चुभती रही कि भारत की आजादी के लिए पाकिस्तान के रूप में बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ी, हिंसा का तांडव देखना पड़ा और सब से बड़ी बात यह कि कश्मीर की समस्या न सुलझने के कारण पाकिस्तान के साथ हमेशा की दुश्मनी हो गयी।


वह इतने दूरदर्शी थे कि चीन की असलियत समझ चुके थे और इस बारे में नेहरु की आँखे खोलने के लिए सात नवम्बर, 1950 को उन्होंने जो पत्र उन्हें लिखा वह एक ऐतिहासिक दस्तावेज तो है ही, साथ में आज भी चीन की नीयत समझने के लिए काफी है।


सरदार पटेल एक साधारण परिवार में जन्मे एक ऐसे राष्ट्रीय योद्धा थे जो परिस्थितियों को अपने अनुकूल करना जानते थे और निर्भय होकर अपने लक्ष्य को साधने के लिए सभी अस्त्र शस्त्र साथ लेकर चलने वाले महापुरुष थे। 







शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2019

घरेलू हिंसा कानून में बदलाव का वक्त आ गया है









आज से डेढ़ दशक पहले भारत में घरेलू हिंसा और नारी शोषण को रोकने के लिए एक मजबूत कानून बना था और जिससे एक सुरक्षा कवच की भाँति विभिन्न प्रकार की हिंसा से प्रताड़ित महिलाओं को राहत मिली लेकिन जैसा कि प्रकृति का नियम है, निरंतर बदलाव की प्रक्रिया से नए वातावरण और परिस्थितियों का सृजन, उसी प्रकार अब समय आ गया है कि इस कानून में समय की जरूरत के हिसाब से उचित परिवर्तन किए जाएँ।



हालाँकि इस कानून का दायरा बहुत व्यापक है लेकिन व्यवहार में यह कमोबेश घर की महिलाओं के साथ मारपीट, उनका यौन सहित विभिन्न प्रकार से शोषण और उनके जीने के मूलभूत अधिकार को पुरुषों द्वारा हथियाए जाने से रोकने में ही अधिकतर इस्तेमाल में आता है।


घर से अधिक बाहर होती हिंसा 


इस सप्ताह मुंबई में सम्पन्न हुए मामी फिल्म समारोह में एक फिल्म बाई द ग्रेस ऑफ गॉड दिखाई गयी। यह फिल्म किसी विकासशील या अविकसित देश में नहीं बनी या वहाँ हो रही शोषण की घटनाओं का रूपांतरण नहीं थी बल्कि यूरोप के धनी और विकसित देश फ्रान्स में निर्मित हुई। 



इसकी कथा यह है कि एक पाँच बच्चों के पिता को जो एक घटना उसके बचपन से लेकर अब तक उसे चैन से जीने नहीं दे रही थी, वह थी तीस पैंतीस वर्ष पहले उसके साथ हुआ यौन शोषण जो किसी अन्य ने नहीं बल्कि धर्मोपदेशक एक चर्च के पादरी ने किया था। उल्लेखनीय है कि वह अकेला ही नहीं इसका शिकार नहीं हुआ था बल्कि सैंकड़ों नहीं बल्कि हजारों बच्चों को उस पादरी की यौन पिपासा को झेलना पड़ा था।


उल्लेखनीय यह है कि बचपन में अपने साथ हुए यौन दुर्व्यवहार के पीड़ित वयस्क होने और अपना अपना परिवार बसा चुके तथा एक तथाकथित सुखी जीवन बिता रहे लोग उस पादरी की हरकत को अभी तक अपने से दूर नहीं कर पाए थे। वे एक प्रकार से अपराध बोध में जी रहे थे कि वे अपने साथ हुए अत्याचार का कोई बदला नहीं ले सके और वह पादरी अब भी उसी तरह छोटे बच्चों का शोषण करता आ रहा है।



हालाँकि पादरी के कुकर्मों की जानकारी उसके वरिष्ठ लोगों की थी लेकिन किसी ने उसके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की। फिल्म के नायक ने दसियों वर्ष तक मानसिक संताप झेलने के बाद उससे बाहर निकलने और अपने साथ हुए शोषण का बदला लेने की हिम्मत दिखाई और पादरी की शिकायत अधिकारियों से यह जानते हुए भी की कि वह अकेला है और तंत्र बहुत मजबूत है। उसे भय था कि कहीं उसी को दोषी न मान लिया जाए और झूठा साबित न कर दिया जाए।



अधिकारियों के सामने वह और पादरी आए जिसमें उसके आरोप का जवाब पादरी ने यह दिया कि वह एक मानसिक रोग से पीड़ित है और छोटे बच्चों को देखते ही उसकी यौन भावनायें भड़क उठती हैं और वह उनके कोमल अँगो को सहलाने से लेकर मसलने और यौन क्रिया के लिए उत्तेजित हो जाता है।
इसके बाद फिल्म के नायक ने ऐसे लोगों से सम्पर्क करना शुरू किया जो यौन पीड़ित थे और अभी तक अपने साथ हुए दुष्कर्म को भूल नहीं पाए थे। एक व्यक्ति तो ऐसा था जिसका निजी अंग विकृत हो गया था और वह मिरगी की बीमारी का शिकार हो गया था।



इन सब पीड़ितों ने मिलकर अपना संगठन बनाया और अपने साथ हुए कुकर्म का बदला लेने का कानूनी रास्ता अपनाया। यहाँ यह महत्वपूर्ण नहीं है कि आरोपी को सजा हुई या नहीं बल्कि यह है कि बचपन या अल्हड़पन में जब किसी के साथ, चाहे महिला हो या पुरुष, यौन दुर्व्यवहार होता है तो वह जीवन भर उसे भूल नहीं पाता और हमेशा हीनभावना में जीता रहता है और एक ऐसे अपराध के लिए अपने को जिम्मेवार मानता रहता है जो उसके साथ हुआ लेकिन कभी उसका प्रतिकार नहीं कर सका।


सामाजिक और कानूनी संरक्षण 

अक्सर देखने में आता है कि जो अपराधी है उसे पारिवारिक संरक्षण के साथ समाज का संरक्षण भी आसानी से मिल जाता है। इस तरह के वाक्य ‘भूल जा जो तेरे साथ हुआ‘, ‘अगर जुबान खोली तो नतीजा भुगतने को तैयार रहना‘ ‘अपने साथ खानदान की इज्जत भी जाएगी‘, जो इस कहावत को सिद्ध करते हैं कि ‘समर्थ को दोष नहीं‘।



जिस तरह अपने साथ हुए यौन शोषण को नहीं भुलाया जा सकता, उसी प्रकार बचपन में हुई बिना किसी कारण की मारपीट, शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना, लिंग भेद के कारण हुए अपमान और यहाँ तक कि पालन पोषण में भी हुए भेदभाव को जीवन भर नहीं भुलाया जा सकता। हो सकता है कि वक्त का मरहम घाव को ढक दे लेकिन जरा सा कुरेदने वाली वाली घटना होते ही घाव फिर हरा होकर टीस देने लगता है।


घरेलू हिंसा के साथ बाहरी हिंसा से बचने के लिए भी कानून का रास्ता होना चाहिए। कानून की कमी के कारण ही सामाजिक अन्याय का प्रतिकार करने के लिए जब एक उम्र निकल जाने के बाद भी तनिक सा अवसर मिलते ही पीड़ित अपने साथ दशकों पहले हुए हुए शोषण को बयान करने के लिए सामने आ जाते हैं तो इसका एक कारण यह है कि जब उनके साथ यह हुआ था तब ऐसा कोई कानून नहीं था जो जुल्म करने वाले के मन में डर पैदा कर सकता।



ऐसे अनेकों उदाहरण हैं, सच्ची घटनाएँ हैं और जो निरंतर घटती रहती हैं जिनमें गुरु, शिक्षक, धर्मोपदेशक से लेकर समाज के दबंग लोग अपने अनुयायियों के साथ कैसा भी शोषण, जो शारीरिक, मानसिक, आर्थिक कुछ भी हो सकता है, करने के बाद स्वतंत्र घूमते रहते हैं। कार्यस्थल या जहाँ आप नौकरी करते हैं, वहाँ होने वाले शोषण से अलग हटकर परिवार और समाज के बीच होने वाले मानसिक और शारीरिक शोषण का निराकरण करने और कानून के प्रति डर पैदा करने वाली व्यवस्था के बारे में सोचने का सही वक््त यही है क्योंकि हम विकासशील देशों की श्रेणी में आते हैं।


विकसित देशों में आज भी यह समस्या इसलिए पीछा नहीं छोड़ रही क्योंकि उन्होंने अपनी विकासशील अवस्था में इस ओर ध्यान नहीं दिया था। हमारे पास अभी समय है इसलिए तुरंत इस बारे में सार्थक और मजबूत कानून बनाने की दिशा में कदम बढ़ाना ही अच्छा होगा।

शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2019

बैंक की नीति और नियत से जुड़ा है खातेदारों का भरोसा









बैंक से पैसा गायब हो जाने, अपना ही रुपया निकाल पाने की बेबसी और अपना तथा परिवार का छोटा मोटा खर्च चलाने को भी जेब में कुछ हो तो दिल हिल जाता है। पंजाब महाराष्ट्र सहकारी बैंक के खाताधारी बिना किसी अपराध के जो सजा भुगत रहे हैं, वह बैंकिंग व्यवस्था पर कलंक तो है ही, साथ में सरकार और प्रशासन की कमजोरी या मिलीभगत को भी उजागर करने के लिए पर्याप्त है।


एक उदाहरण देना काफी होगा। सन् 2001 में माधवपुरा मर्कंटायल कोआपरेटिव बैंक में जबरदस्त घोटाला हुआ था और उसके 45000 जमाकर्ताओं को पिछले वर्ष यानी सन् 2018 में यह आश्वासन मिला है कि उन्हें उनका पैसा वापिस मिल जाएगा। क्या पीएमसी के खाताधारियों का भी यही हश्र होने वाला है, यह सोचकर ही डर लगने लगता है।


ग्राहक की मानसिकता

असल में जब सहकारी बैंकों की शुरुआत हुई थी तो उन्होंने जनता को लुभाने के लिए दूसरे बैंकों से ज्यादा ब्याज देने की पेशकश की और थोड़ी सी अधिक कमाई के लालच में लोग अपनी बचत इन बैंकों में जमा कराने लगे।


इसमें उनकी कोई गलती नहीं क्योंकि हरेक अपनी रकम को बढ़ता हुआ देखना चाहता है और एक दो प्रतिशत ब्याज अधिक मिल रहा है तो वह उसे लेना चाहेगा। उसे यह भी बताया जाता है कि उसका धन सुरक्षित है और कानून के दायरे में है।


इसके साथ सहकारिता पर आधारित संगठनों को सरकारी प्रोत्साहन भी उन पर विश्वास करने का बड़ा कारण रहा है, हालाँकि सहकारिता आधारित संस्थान विशेषकर बैंक अधिक सफल नहीं हुए क्योंकि उनके संचालक निजी स्वार्थ के चलते और किसी कड़े कानून के होने से मनमानी करने के लिए स्वतंत्र हैं, अधिकतर नेता हैं और उनका उद्देश्य सेवा से ज्यादा मेवा खाना है।


इसके विपरीत जो सरकारी और निजी क्षेत्र के तथाकथित बड़े बैंक हैं, वे अपनी कम ब्याज की दरों को इस आधार पर जायज ठहराते हैं कि उनके खर्चे ज्यादा हैं, वे कम आबादी और दूरदराज के इलाकों में अपनी शाखायें नहीं खोल सकते और इसी तरह के तर्क दिए जाते हैं। विडम्बना यह है कि सरकार भी इसमें कुछ करने को अपनी मजबूरी बताती है और ग्राहक सहकारी बैंकिंग व्यवस्था पर भरोसा कर लेता है।


अब बारी आती है इन सहकारी बैंकों की नीति और नियत की, जिस पर उनके मालिकों का अधिकार होता है, सहकारिता का मुखौटा लगाकर वे कानून की धज्जियाँ उड़ाते हैं और जो असली मालिक अर्थात जमाकर्ताओं को लम्बे समय तक बहकाए रखते हैं और इस दौरान उनकी रकम ऐसे लोगों को ऋण देने के लिए इस्तेमाल करते हैं जिनका उद्देश्य ही यह होता है कि इसे उन्हें बैंक को लौटाना नहीं है।


सरकार सहकारिता को बढ़ावा देने के नाम पर हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है और इसलिए भी कोई सख्त कदम नहीं उठाती क्योंकि इन सहकारी बैंकों के कर्ताधर्ता दबंग राजनीतिज्ञ होते हैं और सत्ता पर उनकी पकड़ मजबूत होती है। ऐसे में ये बैंक दिवालिया हो जाते हैं तो भी ग्राहक को केवल एक लाख रुपए तक की बीमा राशि मिल सकती है चाहे उसका कितना भी पैसा जमा हो।


कहते हैं कि वक्त सभी तरह के घाव भर देता है। जैसे जैसे समय बीतता जाता है, लोग अपने साथ हुए अन्याय को भूलने लगते हैं और इस प्रकार धोखा, छल, कपट, बेईमानी चलती रहती है। सरकार इन घोटालों को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाती क्योंकि उसे यह मालूम रहता है कि हमारे देश में इस की टोपी उसके सिर पहनाने की परम्परा है।


कोई बड़ा वित्तीय संस्थान, बैंक आगे कर दिया जाएगा जो घोटालेबाज सहकारी बैंक के निर्दोष खातेदारों का मसीहा बन जाएगा और इस तरह उनके जख्मों पर मरहम लगा दिया जाएगा। इस दौरान लम्बी कानूनी प्रक्रिया चलती रहेगी और जिन दोषियों को जनता को दिखाने के लिए पकड़ा गया है वे सबूत होने या ऐसा ही कोई कानूनी दाँव खेलकर बच जाएँगे।


नियंत्रण का अभाव

यह जानकर आश्चर्य होता है कि सहकारी बैंकिंग व्यवस्था पर सरकार से लेकर रिजर्व बैंक तक की कड़ी निगरानी नहीं होती। वैसे तो यह बात सरकारी और निजी बैंक हों या छोटे वित्तीय बैंक, सब पर ही लागू होती है कि उनके अपने नियम और नीतियाँ हैं और उन पर किसी का हस्तक्षेप या दबाब नहीं होता। 
इसका अर्थ यह हुआ कि जमाकर्ताओं को किसी भी तरह की सुरक्षा प्राप्त नहीं है और कोई ऐसा नियंत्रक नहीं है जो उनके धन की हिफाजत की गारंटी ले सके। यह कैसी अर्थव्यवस्था है जो इतनी बेलगाम है कि किसी को भी कुछ भी करने के लिए आजाद छोड़ देती है।


इससे समझ में आसानी से सकता है कि क्यों बरसों बरस घोटालेबाज बैंक के साथ लेनदेन में हेराफेरी करते रहने में कामयाब हो जाते हैं और जब उनके पाप का घड़ा फूटने के कगार पर होता है, वे गायब ही जाते हैं, विदेशों में ऐसी जगह चले जाते हैं जहाँ से उनके वापिस लाए जाने की कोई सम्भावना नहीं होती।


जमाकर्ताओं के लिए सावधानी


सरकार और रिजर्व बैंक के नियंत्रण का अभाव, कानून की खामियाँ और भ्रष्टाचार पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था और केंद्र हो या राज्य, किसी से भी वक्त पर सहायता मिलने की वास्तविकता को देखते हुए उपभोक्ताओं को ही जागरूक होना होगा और इसके लिए वे कुछेक उपाय कर सकते हैं। कदाचित इससे उनके परिश्रम से अर्जित धन की सुरक्षा हो सके।


सबसे पहले अधिक ब्याज के लालच में पड़ें। अपना पैसा जमा रखने के लिए कम ब्याज दर होने पर भी उस बैंक में खाता खोलें जिसकी अधिक से अधिक शाखाएँ हों, उसकी काम करने की प्रणाली पारदर्शिता से पूर्ण हो और वह अपनी प्रतिष्ठा के लिए जाना जाता हो।


दूसरी बात यह कि अपनी रकम एक ही बैंक में फिक्सड डिपॉजिट में रखें,  अपने बचत खाते की समय समय पर जाँच करते रहें कि उसमें जमा या निकाली गयी राशि में कोई अनियमितता तो नहीं है। अगर कुछ गड़बड़ होने का संदेह हो तो उसका निवारण करने में समय गवाएँ, चाहे इसके लिए अपने काम से अवकाश ही क्यों लेना पड़े।


अक्सर बैंक अपनी ब्याज दरों में परिवर्तन करते रहते हैं, अपने ग्राहकों को नयी सुविधा देने की घोषणा करते रहते हैं, पुराने ग्राहकों के जागरूक होने का फायदा उठा कर वे उन्हें उन सुविधाओं से वंचित कर देते हैं, इस पर नजर रखें और इसका पता चलते ही तुरंत कार्यवाही करें और अगर खाता बंद भी करना पड़े तो कर दें।


आजकल नेट बैंकिंग और मोबाइल बैंकिंग का बोलबाला बढ़ रहा है, इसे जानिए, समझिए और अपनाइए। डेबिट और क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करने में सावधानी बरतिए और इनका इस्तेमाल तब ही करें जब इनसे खरीदी वस्तु का  भुगतान करने की आपने पहले से व्यवस्था कर रखी हो क्योंकि इन पर जो ब्याज लगाया जाता है वह मुसीबत का कारण बन सकता है।


किसी भी आकर्षक छूट पर अमल करने से पहले उसकी जाँच कर लें कि कहीं वह आगे चलकर आपकी जेब पर भारी पड़ने वाली तो नहीं है, सस्ती वस्तु महँगे दाम पर तो छूट के लालच में नहीं खरीद रहे और कोई भी खरीदारी करते समय अपने बैंक खाते या कार्ड का विवरण गोपनीय रखें क्योंकि धोखे की शुरुआत यहीं से होती है।


(भारत)