शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

सरकार जानकारी जुटाए, जनता जानकारी दे, इसमें हर्ज क्या है?








यह बात किसी से छिपी नहीं है, चाहे नेता हो, राजनीतिक दल हो या सरकार और उसे चुनने वाले हों कि राज्यों से लेकर केंद्रीय सरकार के लिए वोट देने वाले मतदाताओं की सूचियों में भारी चूक होती है, मतलब यह कि किसी का नाम अगर स्थानीय चुनावों की सूची में तो है लेकिन लोकसभा की मतदाता सूची में नहीं है अर्थात एक लिस्ट में है, दूसरी में नहीं।


अब होता यह है कि वोटर इसे मामूली बात समझकर नजरंदाज कर देता है और सोचता है कि उसने अगर किसी चुनाव में वोट नहीं दिया तो कौन से पहाड़ टूट जाते। इस तरह वोट के जरिए सरकार चुनने के अपने मौलिक, संवैधानिक और एकमात्र अधिकार से वह किसी की गलती से या फिर जानबूझकर वंचित कर दिया गया और कहीं भी कोई आवाज उठना तो दूर, किसी के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगती। यह सब इसलिए हो पाता है क्योंकि हम अपने अधिकार हों या कर्तव्य, उनके प्रति न तो जागरूक हैं और न ही उसके नतीजों के बारे में जानने की रुचि होती है।


हंगामा क्यूँ करते हैं ?

जब हम अपने लिए कोई रोजगार करने या नौकरी करने के बारे में कदम उठाते हैं तो सबसे पहला काम अपने योग्य होने के प्रमाण पत्र, शिक्षा और अनुभव के विवरण जुटाते हैं और उन सब जानकारियों को हर सम्भव तरीके से उस संस्थान या व्यक्ति तक पहुँचाते हैं जो हमें व्यवसाय स्थापित करने या नौकरी देने में मदद कर सकता हो।


उदाहरण के लिए जब बैंक वाले हमें ऋण देने या सरकार का कोई विभाग अपनी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए हमारी पात्रता का आकलन करने के लिए व्यक्तिगत हो या पारिवारिक, शैक्षिक हो या आर्थिक यहाँ तक कि जातिगत हो या धार्मिक, कोई भी जानकारी माँगता है तो हम देने के लिए सहर्ष तैयार हो जाते हैं और बिना कोई सवाल पूछे तुरंत दे देते हैं, यह तक नहीं पूछते कि बहुत सी बेमतलब की जानकारी भी क्यों ली जा रही है जिसका कर्ज देने या लाभ देने से दूर का भी सम्बंध नहीं होता।


इसी तरह बच्चों को स्कूल में दाखिला दिलाते समय भी कोई पूछताछ नहीं करते और यहाँ तक कि अधिकारियों के सामने माता पिता होने का प्रमाण पत्र भी देते हैं, यदि स्वयं इंटरव्यू देना पड़े तो वह भी देते हैं जिससे प्रमाणित हो जाए कि उनकी संतान उस संस्था में पढ़ने के योग्य है। बहुत से माता पिता अपने बच्चे की जन्मतिथि तक गलत बताने से परहेज नहीं करते, अगर इससे आगे चलकर परीक्षा या नौकरी या कोई सहायता मिलने की उम्मीद हो।


आजादी के आसपास जन्मी पीढ़ी की तो अक्सर पैदा होने की दो तारीखें जीवन भर इनके साथ चलती हैं। एक जो स्कूल में दाखिले के समय लिखाई गयी और जो बाद में सरकारी दस्तावेजों में अंतिम समय तक लिखी रहती है और दूसरी जो असली होती है और जन्मपत्री के अनुसार होती है। मेरी स्वयं की दो तिथियाँ हैं, एक तीन मई जो सरकारी रिकार्ड में है और दूसरी अठारह जुलाई जो जन्मपत्री में है और असली है। मेरे पिता का कहना था कि स्कूल में तीन मई इसलिए लिखवाई क्योंकि मास्टर जी ने कहा था कि इसका फायदा परीक्षा में मिलेगा।


इस मामले में अकेला नहीं हूँ जो जीवन भर दो जन्म तिथियों को ढोता रहा है, बल्कि मेरे जैसे काफी अधिक संख्या में होंगे।
जानकारी लेने और देने का सिलसिला इतना व्यापक हो गया है कि अब तो कोई वस्तु खरीदने पर दुकानदार हमारी व्यक्तिगत जानकारी माँगता है तो वह भी बिना एक भी प्रश्न पूछे दे देते हैं, चाहे बाद में इसका गलत इस्तेमाल होने का अंदेशा ही क्यों न हो ?  मजेदार बात यह है कि कोई हंगामा नहीं होता !


जनसंख्या और जनगणना 


यह किसी भी समझदार व्यक्ति की समझ से परे होने की बात है कि अगर सरकार जनसंख्या के आँकड़े जुटाना चाहती है तो इसमें गलत क्या है ? अब अगर हम सरकार को भी वह सब जानकारी दे देते हैं जो कोई काम धंधा, रोजगार या नौकरी पाने के लिए दूसरों को बिना किसी हिचकिचाहट के देते हैं,

बहुत ही कम मात्रा में सरकार के माँगने पर देने से न केवल मना कर देते हैं बल्कि इसे लेकर हिंसात्मक आंदोलन करने तक पर उतारू हो जाते हैं। यही नहीं इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेते है और यहाँ तक कि राजनीतिक दलों के निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए उनकी कठपुतली बनने के लिए भी तत्पर हो जाते हैं।


जनकल्याण के लिए समर्पित किसी भी सरकार का यह दायित्व और कर्तव्य होता है कि वह देशवासियों के लिए इस तरह की योजनाएँ बनाए जो उसे सुख और शांति से जीवन जीने के साधन दे सकने की व्यवस्था कर सकें। यह तब ही सम्भव हो सकता है जब किसी भी सरकार या प्रशासनिक इकाई को यह पता होगा कि उसे कहाँ कितने लोगों के लिए कौन सी व्यवस्था करनी है।


इसे आसानी से इस तरह समझा जा सकता है कि जब रेल या हवाई यात्रा करने से पहले यह जानकारी ली जाती है कि यात्री को शाकाहारी भोजन चाहिए या माँसाहारी तो इसका मकसद केवल यह होता है कि कितने लोगों के लिए किस प्रकार के भोजन का इंतजाम करना होगा। 


भारत जैसे विशाल देश के लिए सही, सटीक और उपयोगी योजनाएँ बनाने का काम कोई भी सरकार केवल तब ही कर सकती है जब उसे यह पता होगा कि हमारी आबादी कितनी है, उसका घनत्व क्या है, कौन सी सुविधाएँ उस तक तुरंत पहुँचनी चाहिएँ और किन के लिए उसे पंच वर्षीय योजनाओं से जोड़ा जाना है।



जनसंख्या के आँकड़े एकत्रित करने का सरकार के पास कोई और कारण या अजेंडा भी हो सकता है तो आंदोलन करने वालों को इसका खुलासा करना चाहिए ताकि असलियत तो सामने आए, कुछ लोगों के बहकाने से जानकारी न देना या अपना नाम और पता गलत बताने से नुकसान केवल सामान्य नागरिक का ही होता है। यहीं से गरीबी बढ़ने और पिछड़ेपन की शुरुआत होती है।



भारत में हर दस वर्ष बाद जनगणना करने का मतलब ही यही है कि यह अनुमान लगाया जा सके कि देश में कितनी सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और दूसरे संसाधनों की जरूरत है और अगर इस कवायद के साथ साथ इस बात का हिसाब भी रख लिया जाए कि आबादी कितनी है, हालाँकि यह डूप्लीकेट एक्सरसाइज है, फिर भी बिना किसी अतिरिक्त आर्थिक बोझ के इसे किए जाने की जरूरत सरकार समझती है तो उसे करने देने में हर्ज ही क्या है ?



भारतीय नागरिकता 


यह तो तय होना ही चाहिए कि भारत में कितने नागरिक भारतीय हैं और कितने विदेशी। वसुधेव कुटुम्बकम का अर्थ यह नहीं कि कोई भी विदेशी अनधिकृत रूप से यहाँ रहता रहे और उस पर निष्कासन की कोई कार्यवाही न हो।

संविधान में नागरिकता को लेकर कोई भी विरोधाभास नहीं है, भारतीय नागरिक होने, उसके बनने और किसी को किन्हीं विशेष परिस्थितियों में नागरिक बनाने या किसी से उसकी भारतीय नागरिकता रद्द करने के लिए सब कुछ स्पष्ट रूप से वर्णित है तो फिर सभी भारतीय नागरिकों का एक रजिस्टर बनाने में हर्ज ही क्या है ?



जब कोई विदेशी देश में उत्पात मचाने, देशद्रोही गतिविधियाँ करने से लेकर आतंक फैलाने के इरादे से प्रवेश करता है और पकड़ा जाता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही होने तक डिटेन्शन सेंटर में रखा जाता है तो इसमें हर्ज ही क्या है ?


जब संविधान बना था, उस समय टेक्नालोजी का इतना विकास नहीं था, अब यदि प्रत्येक नागरिक को उसका एक ही पहचान पत्र मिल जाए जिसमें उसका सभी विवरण हो और सब ही जगह केवल एक ही कार्ड दिखाने से उसका काम चल जाए तो इसमें हर्ज ही क्या है ?


वर्ष अंत और नव वर्ष आगमन 


यह वर्ष राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक मोर्चों पर काफी उथल पुथल भरा होने के साथ साथ मंदी, बेरोजगारी, महँगाई के कारण भी याद किया जाएगा। युवा हों, अधेड़ हों या वृद्धावस्था का आलिंगन कर रहे बुजुर्ग हों, सभी के लिए इस वर्ष कुछ न कुछ था और इसका अंत भी एक साधारण परंतु मौलिक विषय नागरिकता पर जबरदस्त विवाद से हो रहा है, लेकिन फिर भी सभी पुरानी यादों को भुलाकर हँसी खुशी नए वर्ष में प्रवेश करने में हर्ज ही क्या है ?


(भारत)

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019

पढ़े लिखों का अनपढ़ जैसा व्यवहार भ्रष्ट नेता-अधिकारियों का जन्मदाता है







हमारे देश में स्वतंत्रता प्राप्त करने से पहले जो नेताओं की पीढ़ी थी, उसके सामने देश को आजादी दिलाने और देशवासियों की सेवा और वह भी ज्यादातर निस्वार्थता के साथ करने का लक्ष्य हुआ करता था जिसमें वे अक्सर अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति, यदि कोई होती थी, को भी लगा दिया करते थे।


आजादी के कुछ वर्षों बाद तक नेताओं के मन में यही भावना बनी रही लेकिन जैसे जैसे राजनीतिक नेतागीरी फायदे का सौदा दिखाई देने लगी और उससे बिना कुछ ज्यादा मेहनत किए धन, दौलत, शान-शौकत और सब से अधिक अपने पास ताकत होने का नशा सिर चढ़कर बोलने लगा तो उनके रंग ढंग बदलने लगे और सेवा के स्थान पर मेवा पाने की लालसा बलवती होती गयी।



आज जिस तरह राजनीतिज्ञों का पतन देखने को मिल रहा है और अनेकों विभिन्न अपराधों की सजा भुगतनी पड़ रही है, वह इस धारणा की पुष्टि करने के लिए काफी है कि अब अधिकतर लोग नेतागीरी का पेशा केवल इसलिए करते हैं कि उससे उन्हें समाज के नुकसान के बल पर भी मुनाफा होता रहे और वे नागरिकों को मूर्ख बनाने में सफल होते रहें।


शिक्षितों पर अज्ञानता का पर्दा 

यह देखकर दुःख तो होता ही है, आश्चर्य भी होता है कि कैसे पढ़े लिखे होने के बावजूद बहुत से लोग नेताओं के बहकावे में आकर बिना सच्चाई की परख किए हिंसा और सार्वजनिक सम्पत्ति की हानि करने पर उतारू हो जाते  हैं। उदाहरण के तौर पर नागरिक संशोधन कानून को लेकर मेरे एक शिक्षित मुस्लिम मित्र और सहयोगी ने पूछा कि ‘इससे उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त हो जाएगी तो वह कहाँ जाएगा, उसके पूर्वज यहाँ पैदा हुए, आजादी के बाद यहीं रहने का फैसला किया और इसे अपना वतन समझकर अब तक जीते रहे, अब उसका और उसके परिवार का क्या होगा, कहाँ जाएँगे हम लोग और यह कहते कहते उसकी आँखों से आँसू बहने लगे !‘


यह पूछने पर कि क्या उसने कानून पढ़ा है, उसका जवाब नहीं में सुनकर उसके सामने जब इंटर्नेट की मदद से समझाया तो उसका मन थोड़ा शांत हुआ लेकिन बाद में टी वी और अखबारों में छात्रों के प्रदर्शन की बात से फिर परेशान हो गया। ये नेता किस तरह जनता को मूर्ख समझते हैं, इसका इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में कई दलों के नेता ‘चोर चोर मौसेरे भाई‘ की कहावत को सिद्ध करते हुए राष्ट्रपति के पास स्वयं उन्हीं के हस्ताक्षर से बने कानून को वापिस लेने की गुहार लगाने चले गए ताकि जनता को दिखा सकें कि वे कितने संवेदनशील हैं।


प्रियंका गांधी जब यह कहती हैं कि इस कानून से संविधान की धज्जियाँ उड़ा दी गयी है और अरविंद केजरीवाल इस सवाल के जवाब में कि आखिर इस कानून से किसी की नागरिकता पर आँच कहाँ आ रही है,  पलटकर सवाल पूछने लगते हैं कि अभी इस कानून को लाने की जरूरत क्या थी तो इससे स्पष्ट हो जाता है कि इन नेताओं को सब कुछ पता है लेकिन जनता को बरगलाने का कोई भी मौका क्यों छोड़ा जाए ?


इसी तरह चाहे बंगाल की ममता हों या उत्तर प्रदेश की मायावती या अखिलेश हों, यह जानते हुए भी कि इस कानून से भारत में रहने वाले किसी भी मुस्लिम नागरिक की नागरिकता को कोई खतरा नहीं है, केवल जनता को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करने की खातिर भड़काऊ बयान देते रहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि जनता चाहे कितनी भी पढ़ी लिखी हो, उसे भ्रम में रखना बहुत ही आसान है।  उन्हें यह भी भरोसा होता है कि आम आदमी के पास दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने के बाद इतना समय ही कहाँ बचता है कि वह किसी भी मामले की सत्यता को जानने के बारे में सोचे।


पढ़े लिखों के इस व्यवहार से अनपढ़ जनता तो आसानी से बहकावे में आ ही जाती है और दोनों ही अनजाने में अपना अनिष्ट करने पर आमादा हो जाते हैं, लेकिन सब से बड़ा फायदा उनका होता है जो असामाजिक तत्वों की श्रेणी में आते हैं, गुंडागर्दी, लूटखसोट का कारोबार करते हैं और आगजनी से लेकर हत्या तक करने में उन्हें तनिक भी संकोच नहीं होता। उनकी हिम्मत इस वजह से हमेशा बुलंद बनी रहती है क्योंकि लगभग सभी दलों को उनकी अक्सर जरूरत पड़ती रहती है और उनके सिर पर नेताओं का वरदहस्त सदा बना रहता है।



अक्सर यह बात मन में आती है कि उच्च शिक्षित, प्रोफेशनल व्यवसायी से लेकर उद्योगपति तक में से कोई व्यक्ति साधारण परिस्थितियों में राजनीति अर्थात देश को नेतृत्व देने के लिए पहल क्यूँ नहीं करता तो इसका अर्थ यही है कि वे अपने नैतिक और व्यावसायिक मूल्यों के साथ कोई समझौता नहीं कर सकते।


एक बानगी देखिए। पहले तो कोई राजनीतिक दल उन्हें अपनी पोल खुलने के डर से टिकट ही नहीं देगा और अगर मान लीजिए किसी कारण से दे दिया और उसे चुनाव में उम्मीदवार घोषित कर दिया तो सबसे पहले जानते हैं उसका साथ देने उस क्षेत्र से कौन आएगा? उस इलाके का कोई सफेदपोश गुंडा जो अपनी धाक के बल पर अधिक से अधिक वोट दिलवाने की गारंटी लेगा। इसके बदले में जितने भी उसके गैर कानूनी काम हैं, उनके लिए जीत के बाद संरक्षण चाहेगा । उसके बाद अपनी तरफ से चुनाव में खर्च करने के लिए वे स्थानीय व्यापारी अपने पैसों से भरे बैग लेकर आएँगे जो जमाखोरी, कालाबाजारी और
मुनाफाखोरी को ही अपने काम धंधे का मूल मंत्र मानते हैं।


जब हालत यह है तो किसी भी ईमानदार व्यक्ति को बेमन से ही सही, अपने आदर्शों को तिलांजलि देने में डर क्यूँ लगेगा? उन्हें भी जीत के बाद अपनी पूर्ण सुरक्षा चाहिए।


शिक्षित होकर भी रिश्वत देना

अक्सर जब हम किसी सरकारी दफ्तर और आजकल तो पब्लिक सेक्टर से लेकर प्राइवेट  संस्थानों तक में अपना  कोई काम कराने के लिए, जोकि बिलकुल नियमों के मुताबिक होने पर भी, रिश्वत देने के लिए तैयार हो जाते हैं तो इसका कारण भ्रष्टाचार में लिपटा तंत्र तो है ही, साथ में हमारा पढ़ा लिखा होने के बावजूद यह मान लेना है कि रिश्वत तो देनी ही पड़ेगी चाहे हम कितने भी सही हों।


सामान्य नागरिक यह मानकर चलता है कि रिश्वत दिए बिना काम नहीं होगा लेकिन इसके लिए वह बिचैलियों के जाल में फँसकर अपना नुकसान ज्यादा कर लेता है क्योंकि  किसी भी सौदे में दलाली करने को अब एक व्यवसाय का दर्जा मिल चुका है। हालाँकि यह गलत और नैतिकता के खिलाफ है लेकिन आज इन शब्दों का मोल ही क्या रह गया है, इसलिए अपना काम निकलवाने के लिए सीधे ही अधिकारी से तय कर लीजिए कि वह क्या लेकर उसका काम करेगा, कम से कम दलाली तो बचेगी !


लगभग प्रत्येक व्यवसायी, व्यापारी और उद्योगपति के पास ऐसे अनुभवों का पिटारा होगा जिसमें से रिश्वत देकर काम कराने की अनगिनत कहानियाँ निकल पड़ेंगी। बिना रिश्वत दिए या अपने रसूख का इस्तेमाल किए बिना किसी का कोई भी काम समय पर हो गया हो तो इसका उदाहरण ढूँढने पर भी शायद ही मिले, यह चुनौती दी जा सकती है।


क्या करें और क्या नहीं 


यह एक विचित्र स्थिति है। फिर भी इतना तो कर ही सकते हैं कि अपने पढ़े लिखे होने का लाभ उठाकर किसी भी मामले में अपनी प्रतिक्रिया देने या कोई नासमझी भरा कदम उठाने से पहले उस विषय की पूरी जानकारी जुटा लें ताकि कोई आपको अपनी स्वार्थपूर्ति का साधन या अपनी सोची समझी चाल का मोहरा न बना सके। अराजकतावादी और गैर सामाजिक तत्वों से लेकर आतंकवादी तक हमारे भोलेपन का फायदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे, यदि हम तनिक भी असावधान रहेंगे।

(भारत)

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019

कानूनी अधिकार मिले तो ठीक है पर पड़ताल भी जरूरी है










यह विडंबना ही तो है कि हमारे देश में बरसों बरस तक किसी अन्य देश से आए नागरिक एक शरणार्थी के रूप में आएं जिन्हें उस देश में धार्मिक आधार पर जुल्म का शिकार होना पड़ा हो और यहां बिना किसी आधार पर रह रहे हों। उनका यहां रहने का एकमात्र तरीका यह रहा हो कि जो उनका देश था वहां से उन्हें भारत का वीजा मिला हो और वे उसकी अवधि समाप्त होने पर उस देश में लौटने के बजाय वीजा अवधि बढ़वाकर यहां रह रहे हों।



भारत में उन्हें रहने का न तो कानूनी अधिकार था न ही भारत के संविधान के अनुसार वे यहां रह सकते थे। भारत सरकार उन्हें जबरदस्ती वापिस जाने को भी नहीं कह सकती थी क्योंकि वे भारत में सदियों से रह रहे हिन्दू, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी हैं और राजनीतिक उथल पुथल के कारण पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में रह रहे थे और वहां उनके साथ भेदभापूर्ण व्यवहार हुआ जिसके चलते वे भारत आकर रहने लगे इस उम्मीद में कि कम से कम जिंदा तो बचे रहेंगे।



अब भारत की मजबूरी यह कि मानवीय आधार पर उन्हें निकाला नहीं जा सकता और कानूनन यहां रहने भी नहीं दिया का सकता। इन लोगो की मजबूरी यह कि कोई अन्य देश इन्हे क्यों स्वीकार करेगा, इसलिए अब भारत के सामने एक ही रास्ता बचता था कि इन्हे भारतीय नागरिकता दे दे और इसके लिए कानून में संशोधन कर इन्हे यहां वे सब अधिकार दे दिए जाएं जो सामान्य परिस्थतियों में किसी भी भारतीय नागरिक को मिले होते हैं।



एक खबर थी कि  डेढ़ करोड़ लोग हैं और दूसरे आंकड़ों के मुताबिक लगभग तीस हजार हैं जिन्हें कानून में संशोधन कर भारतीय नागरिकता दी जानी है।
संख्या चाहे कितनी भी हो लेकिन प्रश्न यह कि कैसे तय होगा कि ये अपने पर हो रहे अत्याचार के कारण वहां से भारत आए ?



हो सकता है कि उनकी बात सही हो लेकिन क्या ये नहीं हो सकता कि उनमें से कोई  उस देश के कानून के अनुसार किसी गैर कानूनी गतिविधि में शामिल होने के कारण वहां प्रताड़ित या दंडित किया गया हो और उससे बचने के लिए भारत इस उममीद पर आ गया हो कि यहां  कोई पूछताछ नहीं होगी और वे मजे में यहां रह सकते हैं। यही नहीं उनकी यहां जन्मी संतान भी यहां भारतीय संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए रह सकती है।



ऐसे लोगों को वोट देने या कोई भी ऐसी सरकारी सुविधा पाने का अधिकार नहीं जिसके लिए भारत की नागरिकता जरूरी हो। कुछ लोगों के साथ धार्मिक आधार पर प्रताड़ित किया जाना वास्तविक हो सकता है लेकिन हम उस देश के साथ कूटनीतिक संबंधों के जरिए सही बात का पता लगाएं बिना कैसे भारतीय नागरिक होने का अधिकार दे सकते हैं। अगर सरकार ने पूरी जांच पड़ताल कर ली है तब तो ठीक है लेकिन यदि नहीं तो आगे चलकर इनकी वजह से कोई अनहोनी भी हो सकती है।



भारत ही शायद एकमात्र ऐसा देश होगा जहां बिना नागरिकता लिए कोई भी आराम से दस बीस साल रह सकता है और न किसी को पता लगता है और न ही किसी को उसके पास भारतीय नागरिकता न होने का शक हो सकता है।



अब शायद ही गिने चुने लोगों को छोड़कर किसी को यह पता होगा कि अभिनेता अक्षय कुमार भारतीय नहीं बल्कि कनाडा के नागरिक हैं। इसी तरह और भी बहुत से साधन संपन्न, धनी मानी और रसूखदार लोग बिना भारतीय नागरिक बने यहां केवल फल फूल ही नहीं रहे होंगे बल्कि उनकी सरकार से लेकर राजनीति, व्यापार, व्यवसाय में भी भारी दखल होगा।



पाकिस्तान से यहां आकर अभिनय और गायन से शानदार जीवन बिताने वाले अनेक कलाकारों की पोल अक्सर खुलती रहती है। एक सवाल यह भी है कि यह लोग जो करोड़ों अरबों रुपया भारत में रहकर कमाते हैं, उस कहां रखते है, टैक्स किसे देते हैं और सरकार उनसे कुछ कहती क्यों नहीं कि आखिर बिना भारत की नागरिकता लिए यहां कैसे रह रहे हैं।



यह माना जा सकता है कि वास्तव में अत्याचार के शिकार अपने को भारतीय कहलाने और  भारत को ही अपना एकमात्र ठिकाना मानने वाले सच कह रहे हों लेकिन अपने राजनीतिक फायदे के लिए अर्थात वोट बैंक की खातिर एक धर्म विशेष के लोगों को भारत में रोके रखना कहां की इंसानियत है। रोहिंगियाओं की यही कहानी है।


जिन लोगों के बारे में आधिकारिक तौर पर पता है कि वे भारत के नागरिक नहीं है लेकिन यह भी वास्तविकता है कि बड़ी तादाद में ऐसे लोग यहां रह रहे हैं जिन्हें शरणार्थी नहीं बल्कि घुसपैठियों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए और उन्हें देश से निकाला ही जाना चाहिए।



संसद में कानून तो पास हो गया लेकिन अब चुनौती यह है कि इसके परिणामस्वरूप जो गुस्सा कुछ समुदायों में देखने को मिल रहा है और जिसके कम होने के बजाय उसके बढ़ने की उम्मीद ज्यादा है तो उससे कैसे निपटा जाएगा जबकि कुछ राजनीतिक दल इस मुद्दे से निकले आक्रोश्े की आग पर अपनी रोटियां सेकने में लगे हैं और पूरे देश में अस्थिरता का माहौल बनाना चाहते है।


एक उम्र के बाद 

आम तौर से साठ से पिचहतर वर्ष की आयु में पुरुष हो या महिला उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति ऐसी हो जाती है जिसमें वे अपने अब तक के जीवन का लेखा जोखा इस आधार पर करने लगते हैं कि उन्होंने जीवन में क्या खोया और क्या पाया।



सामान्य व्यक्ति जो कोई नौकरी, रोजगार, व्यापार या व्यवसाय जीवन भर करता रहा होता है, अब उससे निवृत्त होने और अपने पारिवारिक जनों के बीच अब तक की जमा पूंजी को बांटने की बात सोचने लगता है। कुछ लोगों के लिए यह अब तक की कमाई को ठिकाने लगाना होता है और कुछ के लिए उसे अपने भविष्य के लिए सुरक्षित स्थान पर रखकर उससे जो ब्याज यानी रिटर्न मिले उससे अपना बाकी का जीवन आराम से बिताने की इच्छा होती है।



इसके पीछे यह भी भावना रहती है कि अपना शेष जीवन तो सुख से बीत ही जाए, साथ में परिवार में बेटे बेटी, बहू, नाती पोतों के लिए भी कुछ न कुछ छोड़कर इस संसार से विदाई ली जाए।


अक्सर ज्यादातर लोगों की इच्छा बस अपने परिवार तक ही सीमित होकर रह जाती है और वे अपने और अपने जीवन साथी के साथ आनंद के क्षण अपनी मर्जी से बिताने का मौका तलाशते ही रह जाते हैं और जीवन की  डोर छूटने को हो जाती है।


ऐसे लोगों को चाहिए कि तन से कमजोर और मन से डावांडोल होने से पहले जिन्दगी की इस सच्चाई को मानते हुए कि शरीर को तो एक दिन पंच तत्व में विलीन हो ही जाना है अपने लिए अपनी सुविधा, शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार वह सब करने के बारे में केवल सोच विचार न करते हुए उस पर अमल कर देना चाहिए जो वे अब तक बस सपने में ही सोचा करते थे।



इस उम्र में वह सब करिए जो आप अब तक किसी न किसी वजह से कर नहीं पाए। मतलब यह कि कोई शौक जो किसी न किसी कारण अब तक सिर्फ सोचने से आगे न बढ़ पाए, उसे कर लीजिए, बिना इस बात की परवाह किए कि अगर कोई यह भी कहे कि इस उम्र में इन्हें यह शौक चर्राया है। मत सोचिए कि इस उम्र में लोग क्या कहेंगे जैसे कि सुनने को मिल सकता है ‘सींग  काटकर बच्छड़ों में शामिल हो रहे हैं‘ ।



 इस उम्र में अगर अपने से आधी से भी कम उम्र के लड़के लड़कियों या युवा स्त्री पुरुषों की संगत में वक्त बिताने का मन करे और ऐसा कोई अवसर हाथ आ जाए तो उसे पकड़ने में कोई कसर न बाकी रखें।



कहीं भी जाने, कुछ भी नया करने और देखने की तबीयत हो तो कदम पीछे हटाने की गलती न करें क्योंकि श्जिंदगी न मिलेगी दोबारा‘। कुछ दिन पहले एक अस्सी के लपेटे में चल रही एक ब्रिटिश महिला को लक्षद्वीप में अकेले घूमते देखकर और यह जानने के बाद कि वह एशिया और अफ्रीका के देशों का भ्रमण कर रही हैं, मन भाव विभोर हो उठा, हमारे यहां तो हाथ पैर से सही सलामत होते हुए भी ऐसी घुमक्कड़ी के बारे में सोचने पर भी आश्चर्य होता है।



जो कमाया है उसे खर्च करते रहिए चाहे वो जमापूंजी हो या जीवन के खट्टे मीठे अनुभव। इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि आप भविष्य में नहीं वर्तमान में जीना सीख जायेंगे।

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

गलत परवरिश, और पारिवारिक रिश्तों में कडुवाहट का असर











अक्सर जब इस तरह की बात सुनने, पढ़ने और देखने को मिलती है कि भाई भाई, भाई बहन एक दूसरे के खिलाफ खड़े हैं, उनमें मुकदमेबाजी हो रही है, एक दूसरे की शक्ल देखना तक गवारा नहीं, यहाँ तक कि मरने मारने पर आमादा हैं तो यही मुँह से निकलता है कि ‘क्या हो गया है आज की पीढ़ी को‘ या ‘माँ बाप ने ठीक से परवरिश न की होगी‘ या फिर सारा दोष कलयुग के सिर मढ़ दिया जाता है कि ‘बस यही और देखना बाकी था‘।



इसी तरह पति पत्नी के बीच और माता पिता का पुत्र या पुत्री के साथ जो प्रेम और भावनाओं का रिश्ता होता है, उसमें अगर कहीं गिरावट देखने को मिलती है तो उसका प्रभाव इनके व्यक्तिगत जीवन पर तो पड़ता ही है, साथ में इनके आसपास रहने वालों, रिश्तेदारों से लेकर उनके काम धंधे, रोजगार, व्यापार और आजीविका के साधनों पर भी पड़ता है।


अगर अपनी पौराणिक परंपराओं को देखें जैसे कि राम और उनके भाइयों के बीच कभी झगड़े या विवाद की कोई कथा देखने को नहीं मिलती। राम के वनवास की अवधि में भरत उनकी पादुका को सिंहासन पर रखकर राजकाज चलाते हैं और उनके लौटने पर उन्हें अयोध्या का राज्य सौंप देते हैं। यहाँ तक कि रावण का साथ उसके भाइयों और पुत्र ने यह जानते हुए भी कि रावण गलत है, नहीं छोड़ा और जिस भाई विभीषण ने विरोध किया उसके लिए ‘घर का भेदी लंका ढाए‘ जैसे अपमानजनक मुहावरे बन गए। इसी तरह पांडव भाइयों के बीच हमेशा आदर सम्मान बना रहा। कौरव भाइयों के बीच भी कभी मनमुटाव नहीं देखने को मिला और उन्होंने युद्ध में हमेशा एकता बनाए रखी।


संस्कार और परवरिश 


अब अपनी संतान के पालन पोषण में अलग अलग परिवेश और अपने अपने पारिवारिक संस्कारों तथा परवरिश की गठरी लेकर आए पति पत्नी जब माँ बाप बनते हैं तो उनकी क्या भूमिका होती है, यह आज के दौर में इस बात पर अधिक निर्भर करता है कि उनमें से किसकी बात का असर ज्यादा होता है। मिसाल के तौर पर जब उद्योगपति मुकेश अम्बानी को अपने भाई अनिल की आर्थिक स्थिति खराब होने और जेल तक जाने की नौबत आने का पता चलता है तो कहते हैं कि उनकी माँ ने ही बड़े बेटे को आदेश दिया था कि वह छोटे बेटे की इस मुसीबत के समय में मदद करे। हो सकता है अगर उनके पिता जीवित होते तो वे भी ऐसा ही करने को कहते।


असल में देखा जाए तो संतान को उनके बचपन से लेकर युवा होने और फिर जिंदगी की गाड़ी अपने बलबूते पर चलाने की जो ट्रेनिंग मिलती है उसकी नींव कितनी मजबूत है यह इस बात पर निर्भर करता है कि माता पिता स्वयं कितना इस बात को समझते हैं कि परवरिश के दौरान यह उनकी जिम्मेदारी बनती है कि संतान सही रास्ते पर चले और कोई ऐसा काम न करे जिससे उन पर  किसी को ऊँगली उठाने या आरोप लगाने की जरूरत पड़े।


यह बात इसलिए बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है जब वयस्क होने से पहले या बाद में कोई लड़का या लड़की किसी अपराध में शामिल पाया जाता है और लोग यह कहते हैं कि इसके पालने पोसने में ही खराबी रही होगी जो यह अपराधी बन गया। नाबालिग होते हुए भी चोरी, डकैती, लूटपाट, मारपीट, हत्या, बलात्कार जैसे जघन्य अपराध करने की प्रवृत्ति क्या यह नहीं कहती कि इसके लिए उनके माता पिता जिम्मेदार हैं और उन पर भी अदालती कार्यवाही होनी चाहिए और सजा मिलनी चाहिए क्योंकि संतान को अपराधी बनाने में उनकी परवरिश का बहुत बड़ा योगदान है।


जब संतान कोई अच्छा काम करने के कारण या कोई पदक पाने और नया कीर्तिमान स्थापित करने के लिए अपने माँ बाप और उनकी परवरिश को श्रेय देती है और वे भी उसकी उपलब्धि पर फूले नहीं समाते और उनके लिए यह अपने व्यक्तिगत सम्मान की बात होती है तो फिर उसके अपराध करने पर आपराधिक मानसिकता बनाने के लिए उन्हें जिम्मेदार क्यों नहीं ठहराया जा सकता और उन पर भी कानूनी कार्यवाही क्यों नहीं की जानी चाहिए, यह सोचने का विषय है जिस पर समाज से लेकर सरकार तक को विचार करना चाहिए।



ईर्ष्या, भेदभाव और व्यवहार 


यह एक मनोवैज्ञानिक विषय हो सकता है कि भाइयों और भाई बहनों के बीच बचपन से ही एक दूसरे के प्रति जलन क्यों पैदा होती है, वे एक दूसरे के साथ सामान्य या बाल सुलभ व्यवहार करते करते इतने उत्तेजित और उग्र क्यों हो जाते हैं कि एक दूसरे की हत्या तक करने की बात सोचने लगते हैं, परंतु इतना तो निश्चित है और यह वास्तविकता भी है कि उनके ऐसा बन जाने में माता पिता की भूमिका सबसे अधिक है।


असल में समस्या की जड़ यह नहीं है कि माँ बाप के अनपढ़ होने या पढ़े लिखे होने से संतान की परवरिश पर असर पड़ता है बल्कि यह है कि ज्यादातर माता पिता और उनकी संतान के बीच कोई बातचीत या संवाद ही नहीं होता और अगर होता भी है तो वह धौंस जमाने या डाँट डपटकर चुप कराने से अधिक नहीं होता।


इसी तरह जब एक भाई के दिल में दूसरे भाई से नफरत पलने लगती है या बहन से भाई को जलन होने लगती है तो यह माता पिता द्वारा उनकी परवरिश के दौरान खाने पीने से लेकर शिक्षा तक में भेदभाव और अनावश्यक रोकटोक लगाने या किसी एक को कुछ भी करने की छूट देने और दूसरे पर सभी तरह की बंदिशें लगाने के परिणाम के रूप में उनके सामने आता है। वे भाग्य से लेकर कलयुग तक को दोषी ठहराने लगते हैं जबकि उन्हें अपने ही गिरेबांन में झाँक कर देखना चाहिए कि वे ही संतान के उदंड होने, आज्ञा न मानने और अपनी मनमानी करने देने के लिए उत्तरदायी हैं।


रिश्तों की दीवार 


पारिवारिक रिश्तों की दीवार जब कमजोर होकर गिरने लगती है तो उसकी चपेट में समाज का आ जाना निश्चित है। दुर्भाग्य से किसी शिक्षा संस्थान में ऐसा कोई पाठ्यक्रम नहीं है जो बच्चों को वह सिखा सके जो उन्हें माँ बाप से परवरिश के समय सीखने को मिलना चाहिए। हकीकत यह भी है कि जुर्म करने की मानसिकता और उसकी ट्रेनिंग की शुरुआत बचपन से होने लगती है। यह विशेषकर तब होता है जब परिवार में असंतुलन होता है भय का वातावरण रहता है या सीमा से अधिक कुछ भी करने की छूट होती है। 


अनेक देशों में संतान की परवरिश में कमी के लिए माँ बाप को जिम्मेदार माना जाता है और उनसे पालन पोषण के अधिकार भी छीने जा सकते हैं लेकिन हमारे यहाँ सीधे नाबालिग या बालिग व्यक्ति को सजा सुना दी जाती है जबकि सजा उन्हें भी मिलनी चाहिए जो उनके अंदर आपराधिक मानसिकता का बीज बोने के लिए जिम्मेदार हैं।


यह बात और बेहतर ढंग से इस तरह भी समझी जा सकती है कि जब कोई अपने माता पिता के वृद्ध होने पर उनका तिरस्कार करता है, अकेलेपन का शिकार होने के लिए छोड़ देता है तो किसी हद तक मां बाप स्वंय भी इसके लिए जिम्मेदार होते हैं। यहां यह कहावत कि ‘जैसा बोओगे, वैसा काटोगे‘ सटीक बैठती है।