शनिवार, 4 फ़रवरी 2023

गर्भवती होना स्त्री की मर्ज़ी पर आधारित उसका क़ानूनी अधिकार होना चाहिए

 

जब कोई महिला गर्भ धारण करती है और फिर शिशु को जन्म देती है तो अक्सर ईश्वर की कृपा, अल्लाह की देन या जो भी कोई धर्म हो, उसके प्रवर्तक की अनुकंपा कहकर धन्यवाद करने की परंपरा है। हक़ीक़त यह है कि यह कहकर पुरुष और स्त्री दोनों अपनी करनी का जिम्मा किसी अज्ञात शक्ति पर डालकर अपना पल्ला झाड़ने का काम करते हैं जबकि सिवाय उनके इसमें किसी भी का कोई हाथ नहीं हैं चाहे वह ईश्वर हो या कोई दिव्य कही जाने वाली ताक़त।


मेरे शरीर पर मेरा अधिकार

हालाँकि प्रजनन या रिप्रोडक्शन की क्रिया में दोनों की मर्ज़ी होती है पर स्त्री पर सबसे ज़्यादा असर पड़ता है । उस पर नौ महीने तक गर्भ में और प्रसव होने के बाद घर या परिवार में शिशु का लालन पालन करने और एक अच्छी संतान के रूप में बड़ा करने की ज़िम्मेदारी होती है। अगर लड़का या लड़की बड़े होकर भले बने तो इसका श्रेय पिता या परिवार को जाता है और कहीं ग़लत निकले तो माता को बुरा कहने का दौर शुरू होकर उस पार लांछन लगाने से लेकर उसकी ज़िंदगी को दूभर तक करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती।

प्रश्न यह है कि जब महिला को ही पति, परिवार और समाज को जवाब देना है तो फिर यह अधिकार भी उसका ही बनता है, उसे गर्भवती होना है या नहीं होना है, यह निर्णय उसका हो। यदि वह नहीं चाहती कि पुरुष उसके साथ असुरक्षित अर्थात् बिना किसी गर्भ निरोधक उपाय का इस्तेमाल किए शारीरिक संबंध बनाने पर ज़ोर डाले या नज़बूर करे तो उसका अधिकार है कि वह मना कर दे।

यदि घरवाले, सामाज के ठेकेदार यानी असरदार लोग जैसे मुखिया, सरपंच आदि और उससे भी आगे मामला अदालत में चला जाए और पति दावा करे कि यह उसके कंजुगल राइट्स यानी यौन संबंध बनाने के अधिकार का उल्लंघन है तो उसे कोई क़ानूनी राहत न मिले। यह तब ही हो सकता है जब इस बारे में पब्लिक हैल्थ सिस्टम के अंर्तगत क़ानून बनाया जाए। यह स्त्री की मर्ज़ी है कि वह निर्णय ले कि उसे संतान कब होनी चाहिए न कि पुरुष या घर के अन्य सदस्य क्योंकि यह उसका शरीर है जिस पर सबसे अधिक असर पड़ेगा।यदि वह इसके लिए राज़ी नहीं है तो आज के युग में बहुत से ऐसे साधन हैं जिनसे बिना स्वयं गर्भ धारण किए माता पिता बना जा सकता है।

यह अधिकार या इसे लेकर बना क़ानून सभी पर लागू हो, मतलब चाहे कोई खेत में काम करे, फैक्ट्री वर्कर हो, मज़दूरी करे, दिहाड़ी पर हो, किसी दफ़्तर में काम करे, अपना व्यवसाय करे या जीवन यापन के लिए कुछ भी करे, यदि संतान चाहिए तो यह स्त्री पर हो कि कब चाहिए और यदि वह न चाहे तो उस पर कोई दोष, कलंक न लगे या ज़बरदस्ती न की जाए। क़ानूनी व्यवस्था के साथ सामाजिक चेतना हो कि स्त्री के शरीर पर उसका हक़ है और इसमें धर्म, जाति, संप्रदाय या समुदाय का दखल न हो।

अधिकार के लाभ

गर्भ निरोधक का इस्तेमाल किए बिना न कहने का अधिकार मिल जाने से होने वाले लाभ इतने हैं कि अगर यह हो गया तो इसके दूरगामी परिणाम होने निश्चित हैं। चूँकि यह विषय बहुत संवेदनशील , नाज़ुक और पुरुष तथा स्त्री की भावनाओं से जुड़ा है इसलिए यह समझना ज़रूरी है कि इसके फ़ायदे क्या हैं ;

सबसे पहला लाभ तो यह होगा कि उतने ही बच्चे होंगे जितने की ज़रूरत परिवार, समाज और देश को होगी। जिसकी जितनी औक़ात या पालने की हिम्मत होगी, उससे ज़्यादा बच्चे नहीं होंगे। इस क़ानून के बन जाने से सरकार को पता होगा कि उसे कितनी आबादी के लिए स्वास्थ्य सेवाएँ मुहैया करानी है, उनकी शिक्षा के लिए कितनी व्यवस्था करनी है और रोज़गार एवं व्यापार तथा काम धंधों का इंफ़्रास्ट्रक्चर कितना बड़ा तैयार करना है।

इसका दूसरा लाभ यह होगा कि सरकार को परिवार नियोजन के लिए कोई नीति बनाने, कार्यक्रम या प्रचार प्रसार करने की ज़रूरत नहीं रहेगी और इस तरह करोड़ों रुपया बचेगा। इस पैसे का इस्तेमाल गर्भ निरोधक साधन जैसे कंडोम बनाने और उनकी सप्लाई सुनिश्चित करने पर होगा। इसके साथ ही गर्भवती महिलाओं को अपने घर से स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल में टीका लगवाने या प्रसव के लिए आने या उन्हें सुरक्षित तरीक़े से वहाँ तक ले जाने की सुविधा और साधन तैयार करने पर खर्च हो। प्रसव और उसके बाद जच्चा बच्चा के लिए निःशुल्क सैनिटोरियम या क्रैडल सुविधा, विशेषकर गाँव देहात और दूरदराज़ क्षेत्रों में देने पर सरकार को खर्चा करना होगा।

तीसरा लाभ यह होगा कि इस क़ानून से महिलाओं को यह एहसास और आभास होगा कि परिवार और समाज में उनकी एक हैसियत यानी आइडेंटिटी है, उनकी स्त्रियोचित गरिमा को कोई ठेस नहीं पहुँचा सकता।पति या परिवार उसके गर्भवती होने को लेकर लड़ाई झगड़ा, बदतमीज़ी या दुर्व्यवहार करता है तो समाज और क़ानून उसे सज़ा दे सकता है। इससे महिला का मनोबल बढ़ेगा और वे मेरे शरीर पर मेरे अधिकार की भावना के साथ अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ कोई भी फ़ैसला कर सकती हैं।

चौथा लाभ यह होगा कि चूँकि कोई भी महिला सोच समझकर अर्थात् अपनी आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर ही गर्भवती होने का निर्णय लेगी तो आज यह जो सड़कों पर नंग धडंग बच्चे आवारा घूमते, चौराहों पर कारों के पीछे भागते दिखाई देते हैं या फिर माँ बाप के काम पर जाने के बाद ग़लत संगत में पड़ जाते हैं, ऐसे दृश्य देखने को नहीं मिलेंगे। इसी के साथ बच्चों में यौन हिंसा या संबंध होने के मामलों में भी कमी आएगी। असल में होता यह है कि एक ही कमरे में बच्चों की मौजूदगी अर्थात् एक साथ सोने से माता पिता के प्रेमालाप के कारण उनमें जो जिज्ञासा पैदा होती है, उसकी शांति के लिए वे वैसी हो हरकत करते हैं जो वे देखते हैं।

इस क़ानून का एक लाभ यह भी होगा कि गर्भपात के मामलों में कमी आयेगी। अक्सर इच्छा और ज़रूरत न होने के कारण जब गर्भ ठहर जाता है तो उसे गिराने में ही भलाई लगती है और जब यह बार बार होता है तो इसका नुक़सान स्त्री को ही अपनी सेहत की क़ीमत से चुकाना पड़ता है।

यह क़ानून ज़रूरी क्यों है ?

वास्तविकता यह है कि देश में ग़रीबी हो या बेरोज़गारी, इसका सबसे बड़ा कारण बढ़ती आबादी है और जो है उसका सही ढंग से परवरिश न कर पाना है। जब गर्भ धारण करने के अधिकार का इस्तेमाल महिला को अपनी मर्ज़ी से करना होगा तो वह कभी नहीं चाहेगी कि उसकी संतान किसी अभाव में रहते हुए बड़ी हो।

एक बात यह भी है कि बहुत से धर्मों में गर्भ निरोधक इस्तेमाल करने की मनाही है और धर्मगुरु, पादरी, पुजारी यह तक हिदायत देते हैं कि जन्म के बाद शिशु को माँ का पहला दूध कब पिलाया जाए। इसी के साथ वे संतान होने या न होने पर टोने टोटके भी कराते हैं। जब महिला यह फ़ैसला लेने के लिए तैयार हो जाएगी कि उसे बच्चा चाहिए या नहीं और वह मज़बूती से अपनी बात पर क़ायम रहने का मन बना लेगी तो वह किसी ढोंगी के चक्कर में नहीं पड़ेगी।

महिला सशक्तिकरण की दिशा में यह क़ानून जो सिर्फ़ इतना है कि स्त्री को न कहने का क़ानूनी और सामाजिक अधिकार मिले तो फिर देश की दशा और दिशा बदलना निश्चित है।


शुक्रवार, 27 जनवरी 2023

गर्भवती होना स्त्री की मर्ज़ी पर आधारित उसका क़ानूनी आधिकार होना चाहिए


जब कोई महिला गर्भ धारण करती है और फिर शिशु को जन्म देती है तो अक्सर ईश्वर की कृपा, अल्लाह की देन या जो भी कोई धर्म हो, उसके प्रवर्तक की अनुकंपा कहकर धन्यवाद करने की परंपरा है। हक़ीक़त यह है कि यह कहकर पुरुष और स्त्री दोनों अपनी करनी का जिम्मा किसी अज्ञात शक्ति पर डालकर अपना पल्ला झाड़ने का काम करते हैं जबकि सिवाय उनके इसमें किसी भी का कोई हाथ नहीं हैं चाहे वह ईश्वर हो या कोई दिव्य कही जाने वाली ताक़त।

मेरे शरीर पर मेरा अधिकार

हालाँकि प्रजनन या रिप्रोडक्शन की क्रिया में दोनों की मर्ज़ी होती है पर स्त्री पर सबसे ज़्यादा असर पड़ता है । उस पर नौ महीने तक गर्भ में और प्रसव होने के बाद घर या परिवार में शिशु का लालन पालन करने और एक अच्छी संतान के रूप में बड़ा करने की ज़िम्मेदारी होती है। अगर लड़का या लड़की बड़े होकर भले बने तो इसका श्रेय पिता या परिवार को जाता है और कहीं ग़लत निकले तो माता को बुरा कहने का दौर शुरू होकर उस पार लांछन लगाने से लेकर उसकी ज़िंदगी को दूभर तक करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती।

प्रश्न यह है कि जब महिला को ही पति, परिवार और समाज को जवाब देना है तो फिर यह अधिकार भी उसका ही बनता है, उसे गर्भवती होना है या नहीं होना है, यह निर्णय उसका हो। यदि वह नहीं चाहती कि पुरुष उसके साथ असुरक्षित अर्थात् बिना किसी गर्भ निरोधक उपाय का इस्तेमाल किए शारीरिक संबंध बनाने पर ज़ोर डाले या नज़बूर करे तो उसका अधिकार है कि वह मना कर दे।

यदि घरवाले, सामाज के ठेकेदार यानी असरदार लोग जैसे मुखिया, सरपंच आदि और उससे भी आगे मामला अदालत में चला जाए और पति दावा करे कि यह उसके कंजुगल राइट्स यानी यौन संबंध बनाने के अधिकार का उल्लंघन है तो उसे कोई क़ानूनी राहत न मिले। यह तब ही हो सकता है जब इस बारे में पब्लिक हैल्थ सिस्टम के अंर्तगत क़ानून बनाया जाए। यह स्त्री की मर्ज़ी है कि वह निर्णय ले कि उसे संतान कब होनी चाहिए न कि पुरुष या घर के अन्य सदस्य क्योंकि यह उसका शरीर है जिस पर सबसे अधिक असर पड़ेगा।यदि वह इसके लिए राज़ी नहीं है तो आज के युग में बहुत से ऐसे साधन हैं जिनसे बिना स्वयं गर्भ धारण किए माता पिता बना जा सकता है।

यह अधिकार या इसे लेकर बना क़ानून सभी पर लागू हो, मतलब चाहे कोई खेत में काम करे, फैक्ट्री वर्कर हो, मज़दूरी करे, दिहाड़ी पर हो, किसी दफ़्तर में काम करे, अपना व्यवसाय करे या जीवन यापन के लिए कुछ भी करे, यदि संतान चाहिए तो यह स्त्री पर हो कि कब चाहिए और यदि वह न चाहे तो उस पर कोई दोष, कलंक न लगे या ज़बरदस्ती न की जाए। क़ानूनी व्यवस्था के साथ सामाजिक चेतना हो कि स्त्री के शरीर पर उसका हक़ है और इसमें धर्म, जाति, संप्रदाय या समुदाय का दखल न हो।

अधिकार के लाभ

गर्भ निरोधक का इस्तेमाल किए बिना न कहने का अधिकार मिल जाने से होने वाले लाभ इतने हैं कि अगर यह हो गया तो इसके दूरगामी परिणाम होने निश्चित हैं। चूँकि यह विषय बहुत संवेदनशील , नाज़ुक और पुरुष तथा स्त्री की भावनाओं से जुड़ा है इसलिए यह समझना ज़रूरी है कि इसके फ़ायदे क्या हैं ;

सबसे पहला लाभ तो यह होगा कि उतने ही बच्चे होंगे जितने की ज़रूरत परिवार, समाज और देश को होगी। जिसकी जितनी औक़ात या पालने की हिम्मत होगी, उससे ज़्यादा बच्चे नहीं होंगे। इस क़ानून के बन जाने से सरकार को पता होगा कि उसे कितनी आबादी के लिए स्वास्थ्य सेवाएँ मुहैया करानी है, उनकी शिक्षा के लिए कितनी व्यवस्था करनी है और रोज़गार एवं व्यापार तथा काम धंधों का इंफ़्रास्ट्रक्चर कितना बड़ा तैयार करना है।

इसका दूसरा लाभ यह होगा कि सरकार को परिवार नियोजन के लिए कोई नीति बनाने, कार्यक्रम या प्रचार प्रसार करने की ज़रूरत नहीं रहेगी और इस तरह करोड़ों रुपया बचेगा। इस पैसे का इस्तेमाल गर्भ निरोधक साधन जैसे कंडोम बनाने और उनकी सप्लाई सुनिश्चित करने पर होगा। इसके साथ ही गर्भवती महिलाओं को अपने घर से स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल में टीका लगवाने या प्रसव के लिए आने या उन्हें सुरक्षित तरीक़े से वहाँ तक ले जाने की सुविधा और साधन तैयार करने पर खर्च हो। प्रसव और उसके बाद जच्चा बच्चा के लिए निःशुल्क सैनिटोरियम या क्रैडल सुविधा, विशेषकर गाँव देहात और दूरदराज़ क्षेत्रों में देने पर सरकार को खर्चा करना होगा।

तीसरा लाभ यह होगा कि इस क़ानून से महिलाओं को यह एहसास और आभास होगा कि परिवार और समाज में उनकी एक हैसियत यानी आइडेंटिटी है, उनकी स्त्रियोचित गरिमा को कोई ठेस नहीं पहुँचा सकता।पति या परिवार उसके गर्भवती होने को लेकर लड़ाई झगड़ा, बदतमीज़ी या दुर्व्यवहार करता है तो समाज और क़ानून उसे सज़ा दे सकता है। इससे महिला का मनोबल बढ़ेगा और वे मेरे शरीर पर मेरे अधिकार की भावना के साथ अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ कोई भी फ़ैसला कर सकती हैं।

चौथा लाभ यह होगा कि चूँकि कोई भी महिला सोच समझकर अर्थात् अपनी आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर ही गर्भवती होने का निर्णय लेगी तो आज यह जो सड़कों पर नंग धडंग बच्चे आवारा घूमते, चौराहों पर कारों के पीछे भागते दिखाई देते हैं या फिर माँ बाप के काम पर जाने के बाद ग़लत संगत में पड़ जाते हैं, ऐसे दृश्य देखने को नहीं मिलेंगे। इसी के साथ बच्चों में यौन हिंसा या संबंध होने के मामलों में भी कमी आएगी। असल में होता यह है कि एक ही कमरे में बच्चों की मौजूदगी अर्थात् एक साथ सोने से माता पिता के प्रेमालाप के कारण उनमें जो जिज्ञासा पैदा होती है, उसकी शांति के लिए वे वैसी हो हरकत करते हैं जो वे देखते हैं।

इस क़ानून का एक लाभ यह भी होगा कि गर्भपात के मामलों में कमी आयेगी। अक्सर इच्छा और ज़रूरत न होने के कारण जब गर्भ ठहर जाता है तो उसे गिराने में ही भलाई लगती है और जब यह बार बार होता है तो इसका नुक़सान स्त्री को ही अपनी सेहत की क़ीमत से चुकाना पड़ता है।

यह क़ानून ज़रूरी क्यों है ?

वास्तविकता यह है कि देश में ग़रीबी हो या बेरोज़गारी, इसका सबसे बड़ा कारण बढ़ती आबादी है और जो है उसका सही ढंग से परवरिश न कर पाना है। जब गर्भ धारण करने के अधिकार का इस्तेमाल महिला को अपनी मर्ज़ी से करना होगा तो वह कभी नहीं चाहेगी कि उसकी संतान किसी अभाव में रहते हुए बड़ी हो।

एक बात यह भी है कि बहुत से धर्मों में गर्भ निरोधक इस्तेमाल करने की मनाही है और धर्मगुरु, पादरी, पुजारी यह तक हिदायत देते हैं कि जन्म के बाद शिशु को माँ का पहला दूध कब पिलाया जाए। इसी के साथ वे संतान होने या न होने पर टोने टोटके भी कराते हैं। जब महिला यह फ़ैसला लेने के लिए तैयार हो जाएगी कि उसे बच्चा चाहिए या नहीं और वह मज़बूती से अपनी बात पर क़ायम रहने का मन बना लेगी तो वह किसी ढोंगी के चक्कर में नहीं पड़ेगी।

महिला सशक्तिकरण की दिशा में यह क़ानून जो सिर्फ़ इतना है कि स्त्री को न कहने का क़ानूनी और सामाजिक अधिकार मिले तो फिर देश की दशा और दिशा बदलना निश्चित है।

शनिवार, 21 जनवरी 2023

पहाड़ों की बस्तियों के विनाश के लिए ज़िम्मेदार गुनहगारों को पहचानना है

 उत्तराखण्ड के खुबसूरत शहर जोशीमठ में जो हुआ और हो रहा है, इस बात की चेतावनी है कि अगर सही नीति नहीं बनी तो यह विनाशलीला इस बेल्ट के अन्य नगरों में भी देखने को मिल सकती है।


त्रासदी की शुरुआत

यह सिलसिला समय पर ठोस कार्यवाही किए बिना रुकने वाला नहीं है। इसकी चपेट में टिहरी, उत्तरकाशी, पौड़ी, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़, नैनीताल की बस्तियाँ आ सकती हैं। हिमाचल प्रदेश में भी दस्तक हुई थी लेकिन वहाँ सरकार ने जो फ़ौरी कदम उठाये, उससे स्थिति क़ाबू से बाहर नहीं हुई लेकिन ख़तरा वहाँ भी है। ज़रूरी है कि केंद्रीय और राज्य सरकारें इसे गंभीरता से लें, स्थानीय आबादी की बात सुनें और पर्यावरण बचाने की मुहिम में लगे लोगों को आंदोलनकारी न मानकर उनका सहयोग और समर्थन लें।

इसी के साथ वैज्ञानिकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। देखने में आता है कि उनसे खोजबीन करने को कहा तो जाता है लेकिन उनके सुझावों को दरकिनार करने और विकसित की गई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल न होने से हालात बद से बदतर होते जाते हैं। यह कोई डराने की बात नहीं है क्योंकि प्रकृति कभी भी अन्यायी नहीं होती और संभलने का वक़्त देती रहती है। विनाश एकदम नहीं होता, यदि उसकी आहट सुनाई दे और मनुष्य चेते नहीं तो उसकी गति अवश्य बढ़ जाती है।


कुछ वास्तविकताएँ

हिमालय पर्वत शृंखला के बारे में कहा जाता है कि यह अभी नाज़ुक अवस्था में है और शायद इसकी उम्र दुनिया के पर्वतों से बहुत कम है अर्थात् प्रकृति द्वारा इसकी जड़ों को मज़बूती देने और इसके फलने फूलने का काम पूरा नहीं हुआ है। इसलिए इस पर उतना ही बोझ या दबाव डालना चाहिये जिससे यह लड़खड़ाए नहीं और वरदान की जगह श्राप न देने लगे।

उत्तराखण्ड के पहाड़ों के बारे में कहा जाता है कि इसकी मिट्टी रेतीली और भुरभुरी है। रेत और चट्टान से मिलकर बना पहाड़ अक्सर ज़मीन के खिसकने या भू स्खलन का कारण बनता है। इसीलिए यहाँ लैंड स्लाईड होते रहते हैं और जब बारिश होती है तो बाढ़ का रूप लेकर भयंकर तबाही होती है। यह त्रासदी न हो तो ज़रूरी है कि इसके बीच में रुकावट खड़ी की जाए। कुदरत ने यह काम इस पूरे क्षेत्र में पेड़ पौधे लगाकर और उनसे बने वनों का विकास कर पूरा किया। उसे वनस्पति से भर दिया और यह हरित प्रदेश बन गया। इतनी तरह की जड़ी बूटियाँ, औषधियाँ और बेल पत्र तथा जीवनदायी पेड़ों की सौग़ात दी जिससे जीवन निर्बाध गति से चलता रहे।

अब शुरुआत होती है कि किस तरह मनुष्य ने प्रकृति के वरदान को अभिशाप में बदलना शुरू कर दिया। सबसे पहले उसकी निगाह जंगलों पर पड़ी और उसने बिना सोचे समझे अंधाधुंध इन्हें नष्ट करना शुरू कर दिया। पहाड़ नंगे होते गये और वे शिलाखंडों के रूप में लुढ़कने लगे। जंगलों की रुकावट जैसे जैसे हटती गई, वर्षा होने पर पानी के बहाव के साथ ये नीचे नदियों में गिरते रहे और जमा होकर उनका जलस्तर बढ़ने का कारण बने और इस प्रकार बाढ़ आई और अपनी चपेट में सब कुछ ले लिया। इसमें सड़कें, रिहायशी बस्तियाँ और खेत खलिहान सब कुछ आ गया।

नदियों को ख़ाली करने का काम हुआ और उससे जो निकला वह इमारतें बनाने की सामग्री थी। यह सरकार के लिए आमदनी और लोगों को रोज़गार देने का साधन बना। इससे वन विनाश को बढ़ावा मिला वन संरक्षण की बातें हवा हवाई हो गयीं।

उल्लेखनीय है कि यह सब कुछ आज़ादी मिलने के बाद हुआ, विशेषकर साठ के दशक से इसमें बहुत बढ़ौतरी होती गई। जंगलात के ठेकेदार और भवन निर्माता की साँठगाँठ इतनी बढ़ गई कि उनके लालच की कोई सीमा नहीं रही। तब कोई ऐसा कोई विशेष क़ानून भी नहीं था जो इनके कारनामों पर रोक लग पाता और इस तरह यह लूटपाट बढ़ती रही।

इसके साथ पर्यटन की सुविधाएँ बढ़ाने के नाम पर जहां से प्राकृतिक दृश्यों का सौंदर्य दिखाई देता, वहाँ होटल और दूसरी चीज़ें बनने लगीं जिनसे रातोंरात मालामाल हुआ जा सके।

जोशीमठ का हाल यह हुआ कि अपनी लोकेशन की वजह से यह धन कमाने की फैक्ट्री बन गया। कोई नियम तो था नहीं या जो भी था उसका पालन किए बिना बहुमंज़िली इमारतें बनने लगीं। एक नियम का उल्लेख करना आवश्यक है। निर्माण से पहले यहाँ की मिट्टी की जाँच ज़रूरी थी ताकि यह तय हो सके कि उसमें कितनी पकड़ है और वह कितना भार उठा सकती है। इसमें यह भी था कि यहाँ एक मंज़िल से ज़्यादा के निर्माण नहीं हो सकते और वर्षा के पानी की निकासी के लिये नालियाँ बनानी ज़रूरी हैं ताकि जलभराव न हो और यह क्षेत्र सीपेज से मुक्त रहे।

विडंबना यह है कि ज़्यादातर निर्माण कार्यों में इन साधारण से नियमों की अनदेखी की गई और बिना किसी नक़्शे या मंज़ूरी के होटल और रिहायशी इलाक़े बनते गये। इसका एक प्रमाण यह है कि आज जहां दरारों से तबाही हुई है इनमें से आधे बिना किसी नियम के बने हैं और वे किसी भी सहायता या मुआवज़े के अधिकारी नहीं हैं।

जब बात हाथ से निकलती गई और भविष्य में किसी ज़बरदस्त त्रासदी के आसार दिखाई देने लगे तो अब से लगभग पचास साल पहले एक समिति बना दी जिसकी रिपोर्ट आजतक धूल चाट रही है। इसका परिणाम यह हुआ कि आज यहाँ की पूरी आबादी के सामने अपना सिर छिपाने की जगह का संकट है, किसी रोज़गार या रोज़ी रोटी का साधन न होने से अधिकांश लोग विस्थापित हो चुके हैं। अपने नाते रिश्तेदारों के यहाँ कब तक आश्रय ले सकते हैं, जीवन की आवश्यक सुविधाएँ नहीं हैं और मज़े की बात यह कि केवल बयानबाज़ी के कोई ठोस कदम उठता नहीं दिख रहा। शायद किसी दूसरे नगर में इस तरह की एक और घटना होने का इंतज़ार है।

यह सही है कि विकास के नज़रिए से यहाँ हाइड्रो प्लांट लगने चाहिएँ लेकिन ऐसे नहीं कि कुछ साल पहले की तबाही में हज़ारों करोड़ की पूँजी वाला पूरा संयंत्र ही बह जाए। आज तपोवन विष्णुगढ़ प्रोजेक्ट का अस्तित्व ख़तरे में इसलिए है क्योंकि प्राकृतिक नियमों की अनदेखी की गई और मनुष्य द्वारा अपने लाभ के लिए बनाये गये नियमों का पालन किया गया। इसमें सबसे बड़ा कारण पेड़ों की कटाई और पानी की धारा को अपने हिसाब से मोड़ने का प्रयास था। विस्फोट से ब्लासिं्टग करना दूसरा कारण है लेकिन उसके बिना पहाड़ में सुरंगं नहीं बन सकती। टर्बाइन और दूसरे भारी उपकरण लगने और उनके संचालन से पैदा होने वाले कंपन का असर पर्वत पर पड़ना स्वाभाविक है। इसके बिना बिजली नहीं बन सकती।

इन परिस्थितियों में यह हो नहीं सकता कि विकास के कामों को रोक दिया जाए लेकिन इतना तो किया ही जा सकता है कि कुदरत से छेड़छाड़ करने के स्थान पर उसका सहयोग लिया जाए।

उत्तराखण्ड को देव भूमि कहा जाता है लेकिन लोभ लालच की राक्षसी प्रवृत्ति ने यहाँ के सभी सौंदर्य तथा पर्यटक स्थलों पर अपनी काली छाया डालनी शुरू कर दी है। हिमालय के ग्लेशियर पिघल रहे हैं जो जलवायु परिवर्तन का संकेत है। इसलिए यह समस्या केवल घरों में दरारें पड़ने की नहीं हैं बल्कि प्रकृति के साथ तालमेल रखकर कदम उठाने की है। ऐसा करना कोई अधिक कठिन भी नहीं है बशर्ते कि कुछेक साधारण कदम उठा लिए जायें जैसे कि; वन विनाश नहीं वन संरक्षण सुनिश्चित किया जाए। ज़रूरत से ज़्यादा और नियमों का उल्लंघन कर पेड़ काटने वालों को कठोर दंड जो आजीवन कारावास भी हो सकता है, दिया जाए।

पर्यटन पर नियंत्रण इस तरह से हो कि एक समय में निश्चित संख्या से अधिक पर्यटक उस स्थान पर न जा सकें।

सड़कों का निर्माण मैटेलिक तकनीक से हो ताकि वे बारिश में बह न जायें। अक्सर पहाड़ों पर टूटी सड़कों के कारण यातायात रुक जाता है जिससे केवल तब ही बचा जा सकता है जब उनका निर्माण, रखरखाव और मरम्मत आधुनिक तकनीक से हो।

ज़मीन से नियमों से अधिक पानी निकालने पर प्रतिबंध हो। असल में अंडरग्राउंड वाटर सतह से नीचे पहाड़ियों की चट्टानों को आपस में टकराने से रोकता है। यदि ज़्यादा पानी खींच लिया तो यह चट्टानें टकराने से सतह पर तबाही मचा सकती हैं।

वन संपदा के दोहन और शोषण पर नियंत्रण हो ताकि वनवासियों की आजीविका और उनके रहन सहन पर असर न पड़े। उनके स्वास्थ्य की देखभाल और शिक्षा का प्रबंध हो जिससे वे समाज की मुख्यधारा में आसानी से सम्मिलित हो सकें।

यदि भविष्य में जोशीमठ जैसी किसी दर्दनाक घटना को होने से रोकना है तो उसके लिए केंद्र और राज्य की सरकारों को मिलजुलकर स्थानीय जनता की भलाई को ध्यान में रखकर काम करना होगा।

एक सामान्य व्यक्ति के लिए जंगलों और पहाड़ों की भाषा समझना ज़रूरी है। इसके लिए यदि इच्छा हो तो कुछ समय एक सैलानी की तरह वनों से मित्रता करने के लिए वहाँ जाना चाहिए।


शुक्रवार, 6 जनवरी 2023

राजनीति से मुक्ति मिलने पर ही विज्ञान और वैज्ञानिक सोच संभव

 हमारे देश में जब तब राजनीतिज्ञ जिसमें मंत्री, मुख्य मंत्री और प्रधानमंत्री तथा राज्यपालों से लेकर राष्ट्रपति तक ज़्यादातर रस्म अदायगी की तरह और बहुत कम वास्तविकता को समझकर बयानबाज़ी करते रहते हैं। लेकिन इससे न तो विज्ञान का भला होता है, न ही वैज्ञानिक सोच बन पाती है। यही नहीं कथनी और करनी में इतना अंतर होता है कि वैज्ञानिक अगर इन पर भरोसा कर ले तो अपनी मंज़िल पाने में उसे अनंत काल तक प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है।


वैज्ञानिक प्रयोगशाला

प्रधानमंत्री का यह वक्तव्य या कहें कि उनका सपना भारत को इस सदी में विश्व की सबसे आधुनिक वैज्ञानिक प्रयोगशाला के रूप में देखने का है तो इस पर प्रत्येक भारतवासी को गर्व होना स्वाभाविक है। यदि वे इसके साथ ही वैज्ञानिकों के साथ नौकरशाही यानी ब्यूरोक्रैट्स द्वारा किए जाने वाले भेदभाव, लालफ़ीताशाही और उनकी ज़रूरतें पूरी करने में जानबूझकर या लेटलतीफ़ी के कारण देरी न होने देने के बारे में कुछ बंदोबस्त करते तो बेहतर होता।

क्योंकि विज्ञान से संबंधित फ़िल्में तथा रेडियो कार्यक्रम बनाने का काफ़ी अनुभव रहा है तो कुछ ऐसे उदाहरणों से बात समझने में आसानी होगी। दक्षिण भारत की एक बड़ी विज्ञान प्रयोगशाला में शरीर के तन्तुओं पर गहन शोध करने के लिए महिला वैज्ञानिक ने प्रस्ताव दिया कि आगे की खोज जर्मनी में उपलब्ध संसाधनों से ही हो सकती है इसलिए उसे आवश्यक सुविधाएँ दी जायें। आश्चर्य होगा कि इसके इंतज़ार में तीन साल बीत गये। तब ही ऑस्ट्रेलिया के एक संस्थान से उसे न्यौता मिला कि उसे वे सब सुविधाएँ तुरंत मिलेंगी अगर वे उनके लिये अनुसंधान करें। उसने स्वीकृति दी और अपनी मंज़िल पाई लेकिन उसका लाभ दूसरे देश को मिला।

एक प्रसिद्ध लेबोरेटरी में एक वैज्ञानिक सरकारी छात्रवृत्ति पर जर्मनी गये और वहाँ से जब आये तो अपने क्षेत्र में बहुत कुछ नया करने की इच्छा और जोश के साथ सरकार को प्रस्ताव दिया और उसके लिये संसाधन उपलब्ध कराने का प्निवेदन किया। फ़ाइलों की उठापटक और बेमतलब के सवाल जवाब तथा अनेक अनावश्यक स्पष्टीकरण में चार साल बीत गये। वैज्ञानिक महोदय निराश होकर शांत बैठ गये और रिटायर होने का इंतज़ार करने लगे। नौकरी छोड़कर विदेश जाकर अपनी खोज को आगे बढ़ाने का निर्णय भी उनके लिए एक विकल्प था लेकिन उसका लाभ किसी अन्य देश को मिलता, इसलिए उन्होंने अपना सपना अधूरा ही रहने दिया।

सरकारी प्रयोगशालाओं में काम कर रहे हमारे वैज्ञानिकों से अपनी खोज या किसी नयी टेक्नोलॉजी का विकास करने पर यह अपेक्षा की जाती है कि वे उसके बेचने का काम यानी मार्केटिंग भी करें। क्योंकि बेचने की कला उन्हें नहीं आती इसलिए ज़्यादातर टेक्नोलॉजी अलमारी में बंद होकर और समय के साथ उनमें बदलाव न होने के कारण किसी इस्तेमाल की नहीं रहतीं, पुरानी पड़ जाती हैं।

यह भी उम्मीद की जाती है कि जो ग्राहक अर्थात् टेक्नोलॉजी ख़रीदने और उससे अपना व्यापार या उद्योग विकसित करने वाला उद्यमी है, वह इनके पास जाये और यदि ख़रीदने का मन बनाये तो उसे उस तक पहुँचने यानी डिलीवरी होने में बरसों लग जाते हैं। इसीलिए उद्योगपति सरकारी प्रयोगशालाओं को ज़्यादा महत्व न देते हुए, जबकि उनमें अधिक संभावनाएँ होती हैं, निजी प्रयोगशालाओं से टेक्नोलॉजी लेने में अधिक रुचि दिखाते हैं।

असल में क्या है कि आज़ादी का अमृत महोत्सव आने तक भी सरकारी कामकाज़ में अंग्रेज़ी शासन की दासता समाप्त नहीं हो पाई है। अंग्रेज़ ने भारत में केवल उतने वैज्ञानिक विकास को महत्व दिया था जिससे उनकी ज़रूरतें पूरी हों और वे अपने देश में उनका व्यापारिक और औद्योगिक विकास कर सकें और फिर ज़बरदस्त मुनाफ़े तथा मुँहमाँगे दाम पर हमें और दूसरों को बेचें। इसका मतलब है कि दिमाग़ और कौशल हमारा और फ़ायदा उनका होता था। आज भी बहुत कुछ अपने बदले स्वरूप में जिसे ब्रेन ड्रेन कहते हैं, यही होता है।हमारी यही विडंबना है कि हमारे वैज्ञानिक विदेशों को मालामाल कर रहे हैं क्योंके हमारे यहाँ उनकी बात ध्यान से सुनने तक की फ़ुरसत नहीं, संसाधन उपलब्ध कराने की बात तो बहुत दूर की है।


किसी से कम नहीं पर विवश हैं

हमारे देश में प्रतिभा, कौशल, वैज्ञानिक सोच और स्वदेशी संसाधनों की कोई कमी नहीं हैं। कृषि क्षेत्र में हमारे वैज्ञानिकों ने हरित क्रांति की, स्वराज जैसे कम लागत के ट्रेक्टर का निर्माण किया, खेतीबाड़ी में आधुनिक मशीनों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया। लेकिन यहाँ भी इंपोर्टेड या विदेशी तकनीक ने हमारा पीछा नहीं छोड़ा। भैंस के दूध से फैट अलग कर बेबी मिल्क पाउडर हमने ही बनाया वरना तो इसके लिए भी निर्भर थे।

चमड़ा उद्योग पचास लाख लोगों को रोज़गार देता है, जो कभी कच्चे माल के रूप में अग्रेज़ ले जाते थे, आज यूरोप की फैशन इंडस्ट्री को टक्कर दे रहा है। एक खोज जिसने चुनावों का ढर्रा ही बदल दिया, जो मतदान के समय लगाई जाने वाली स्याही और इलेक्ट्रिक वोटिंग मशीन है। इसी तरह स्वास्थ्य, चिकित्सा और बीमारियों की रोकथाम के लिये आधुनिक दवाईयों का निर्माण भी हमने किया है और वह भी घोर विदेशी कम्पटीशन के होते हुए। अणु विज्ञान में हम बहुत आगे हैं अंतरिक्ष में एक से बढ़कर एक कुलाँचें भर रहे हैं। जहां तक ऊर्जा की बात है तो उसमें भी हमने सोलर ग्रिड की खोज से सब को चैंकाया है।

हमारे वैज्ञानिकों और अनुसंधान में लगे कर्मियों ने सीमित साधनों के बावजूद कमाल किए हैं। ज़रा सोचिए कि यदि समय पर सही सहायता मिलती और राजनीतिज्ञ अपनी पीठ थपथपाने के बजाय इन्हें पूरा श्रेय देते तो हम जहां हैं उससे बहुत आगे होते। हमारे सामने पीने के पानी की समस्या नहीं होती, नदियों में प्रदूषण नहीं घुलता और हवा में धुएँ के कारण फ़ेफ़डे ख़राब न होते। शहरों में गंदगी और कूड़े के ढेर नहीं होते, बदबू न होती और रिहायशी इलाक़ों में गंदे नालों को सहन न करना पड़ता।

यह सब बदल सकता है पर इसके लिए ज़रूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति, समय नष्ट किए बिना वैज्ञानिकों को समुचित संसाधनों की पूर्ति और जनता का सहयोग तथा सरकार की संकल्प शक्ति अपेक्षित है। अगर यह हो जाए तब ही प्रधान मंत्री का निश्चय सार्थक हो पाएगा अन्यथा दुनिया बहुत आगे निकल जाएगी और हम देखते रहेंगे।


शुक्रवार, 30 दिसंबर 2022

युद्ध समाप्ति और शांति तथा प्रगति की कामना का नया वर्ष

 प्रत्येक वर्ष बहुत सी अच्छी और बुरी, सामान्य तथा विशेष, उलझन या सुलझन से भरा होता है और अपने में खट्टी मीठी यादों को समेटे हुए भूतकाल बन कर अपना प्रभाव भविष्य पर छोड़ता जाता है।


युद्ध का उन्माद

यह वर्ष अनेक युद्धों से आरंभ हुआ। विश्व युद्ध बनने की आशंका ही नहीं, उसकी पूरी संभावना के साथ रुस और यूक्रेन की लंबी खिंचती लड़ाई के आसार अच्छे नहीं हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ और वैज्ञानिक मान रहे हैं कि अनेक देशों में इस समय मौसम के बदलते मिजाज़ का कारण युद्ध में इस्तेमाल हाथियार हैं। अनेक देशों में बर्फ़ और ठंडी हवाओं का तांडव इसी वजह से हो रहा है। सोचिए कि यदि एटमी लड़ाई हुई और अणु हथियारों का इस्तेमाल हुआ तो विश्व की क्या स्थिति होगी ? बहुत से देश तो अपना अस्तित्व ही खो चुके होंगे और संपूर्ण आबादी किसी न किसी दुष्प्रभाव को झेलने के लिये विवश हो जाएगी। इस संदर्भ में हीरोशिमा और नागासाकी की याद आना स्वाभाविक है।

असल में युद्ध का एक बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण कारण प्रतिदिन नये और पहले से अधिक घातक शस्त्रों का निर्माण है जिनकी ताक़त परखने के लिए युद्ध के हालात बनाए जाना ज़रूरी है। इसीलिए वे सभी देश जो इनका निर्माण करते हैं इनकी खपत के लिए कमज़ोर और लालची देशों की ज़मीन तलाशते रहते हैं जो अपने पड़ौसियों के साथ किसी न किसी बहाने से लड़ते रहें और उनके हथियारों का परीक्षण होता रहे।

युद्ध किसी समस्या का तत्काल समाधान तो कर सकता है लेकिन कभी भी स्थाई हल नहीं निकाल पाता।बार बार एक ही जगह और पुराने मुद्दे पर लड़ाइयों का होना यही दर्शाता है। इसलिए युद्ध के लिए किसी विशेष कारण की आवश्यकता नहीं होती। मामूली सी बात जिसका समाधान बातचीत और समझदारी से निकाला जा सकता हो, उसके लिए संघर्ष का रास्ता अपनाना व्यक्तिगत अहम् की संतुष्टि और अपने साम्राज्य विस्तार की लालसा के अतिरिक्त कुछ नहीं।

यह वर्ष अपने देश में चुनाव के ज़रिये राजनीतिक दलों के बीच हुई लड़ाइयों से भरा पूरा रहा और अगला वर्ष भी ऐसा ही रहेगा। यह भारतीय मतदाताओं की परिपक्वता ही है जिसने धर्म, जाति, वर्ग की विभिन्नता और धन के लालच पर ध्यान न देकर ज़्यादा से ज़्यादा ऐसे लोगों और दलों को चुना जो प्रगति के रास्ते पर चलते हुए उनकी समस्याओं का समाधान कर सकने की नीति और नीयत रखते हों। इतना तो तय है कि अब मनभावन और लुभावने वादों, किसी दल के पिछलग्गू बने रहने और आँख मूँदकर वोट डालने का युग समाप्ति के कगार पर है।


आत्मनिर्भरता का युग

यह दौर सवाल करने, योग्यता सिद्ध करने और लक्ष्य साधने के लिए समुचित संसाधन जुटाने का है। राजनीति ही नहीं, आर्थिक क्षेत्र में भी अब सोच का दायरा बदल रहा है। जो क़ाबिल है, वह रास्ते की रुकावट हटाना भी जानने लगा है, अपने साथ होने वाले भेदभाव के ख़लिाफ़ आवाज़ उठाने में संकोच नहीं करता, अन्याय का प्रतिकार करना सीख गया है और किसी भी तरह की ताक़त के नशे में चूर व्यक्ति से डरना तो दूर, उसे धराशायी करने का साहस अपने अंदर महसूस करने लगा है। सामान्य व्यक्ति भी अब सपने देखने और उन्हें पूरा करने की हिम्मत कर रहा है। चाहे क्षेत्र कोई भी हो, यदि वह योग्य है तो अब संसाधन जुटाना आसान हो रहा है। कुछ भी असंभव नहीं, जब ऐसी मानसिकता बनने लगती है तो फिर किसी के लिए उसे बेड़ियों में जकड़ना संभव नहीं। शिक्षित होने के प्रति लगाव, ग़रीबी को हराने का संकल्प और अपने भरोसे अपना लक्ष्य हासिल करने की मनोवृत्ति का तेज़ी से प्रसार हो रहा है।

यह वर्ष वैज्ञानिक उपलब्धियों के मामले में भी यादगार रहेगा। एक ओर अंतरिक्ष तो दूसरी ओर चिकित्सा तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो नवीन खोज हुई हैं उनसे मानवता की सेवा करना सुगम होगा।

सत्ताईस दिसंबर को दुनिया के अदीबों में सबसे अलग अपनी पहचान रखने वाले उर्दू के महान शायर ग़ालिब की जयंती मनाई जाती है। उनकी एक ग़ज़ल नये साल का एहसास कराती है मानो इसे इस मौक़े के लिए ही लिखा था।


दिया है दिल अगर उसको, बशर (इंसान) है, क्या कहिए

हुआ रक़ीब (प्रतिद्वंदी), तो हो, नामाबर (पत्रवाहक) है, क्या कहिए।


यह ज़िद, आज न आवे और आए बिन न रहे। क़ज़ा (मौत) से शिकवा हमें किस कदर है, क्या कहिए।


रहे हैं यों गह-ओ-बे गह (वक़्त बेवक़्त), कि कू-ए-दोस्त (यार की गली) को अब

अगर न कहिए कि दुश्मन का घर है, क्या कहिए


समझ के करते हैं, बाज़ार में वो, पुरसिश-ए-हाल (कुशल मंगल पूछना) कि ये कहें, सर-ए-रहगुज़र (बीच रास्ता) है, क्या कहिए।


तुम्हें नहीं है सर-ए-रिश्ता-ए-वफ़ा का ख़्याल

हमारे हाथ में कुछ है, मगर है क्या, कहिए


हसद (जलन), सज़ा-ए-कमाल-ए-सुख़न है क्या कीजे

सितम, बहा-ए-मता-ए-हुनर (कला का मूल्य) है, क्या कहिए।


कहा है किसने, कि ग़ालिब बुरा नहीं, लेकिन

सिवाय इसके, कि, आशुफ़्तासर (दीवाना) है, क्या कहिए।


एक दूसरी रचना है


कभी नेकी भी उसके जी में ग़र आ जाए है मुझसे

जफ़ाएँ करके अपनी याद, शर्मा जाए है मुझसे

खुदाया, जज़्बा-ए-दिल की मगर तासीर उल्टी है

कि जितना खेंचता हूँ और खिंचता जाए है मुझसे


उधर वो बदगुमानी है, इधर यह नातवानी (कमजोरी) है

न पूछा जाए है उससे, न बोला जाए है मुझसे

संभलने दे मुझे , अय नाउम्मीदी, क्या क़यामत है

कि दामान-ए-ख़्याल-ए-यार, छूटा जाए है मुझसे


क़यामत है, कि होवे मुद्दई का हमसफ़र, ग़ालिब

वह काफ़िर, जो ख़ुदा को भी न सौपा जाए है मुझसे


अपने लक्ष्य के प्रति दीवानगी आज जो देश में देखने को मिल रही है, वह इसी तरह क़ायम रहे, इस कामना के साथ नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ।


शुक्रवार, 23 दिसंबर 2022

उपभोक्ता क़ानून में सरकारी अनिवार्य सेवाए भी शामिल हों


प्रतिवर्ष 24 दिसंबर को उपभोक्ता दिवस मनाये जाने का चलन है। सरकार तथा कुछ ग़ैर सरकारी संगठनों द्वारा इसे मनाने की ख़ानापूर्ति भी की जाती है। लगभग साढ़े तीन दशक हो गये उपभोक्ता क़ानून बने और तीन साल पहले क़ानून में परिवर्तन भी हुए। हालाँकि उपभोक्ताओं के लिए ये क़ानून काफ़ी अच्छा रहा और और इसके कारण बहुत से लोगों को अपने साथ हुई धोखा धड़ी और जालसाजी से राहत भी मिली लेकिन फिर भी बहुत सी ऐसी बातें हैं जिनके बारे में बात करना ज़रूरी है।

सबसे पहले तो यह समझना होगा कि एक उपभोक्ता एक करदाता भी है और अगर वह इनकम टैक्स नहीं देता तो भी अनेक प्रकार के टैक्स चुकाता है, मतलब यह कि सरकार को अपनी कमाई का कुछ हिस्सा अवश्य देता है। इसलिए सरकार से बिजली, पानी, सड़क, परिवहन जैसी ज़रूरी सुविधाएँ पाने से वह एक उपभोक्ता है और अगर उनमें कोई ख़ामी पाई जाती है वह भी उसके उपभोक्ता अधिकारों के अंतर्गत आती है।मान लीजिए सड़क पर प्रशासन की लापरवाही से गड्ढे, नालों की सफ़ाई न होने से बदबू, धुएँ से सांस लेने में दिक़्क़त, गंदा पानी पीने से बीमारी, दुकानदारों द्वारा फुटपाथ का अतिक्रमण करने से चलने में परेशानी और इसी तरह की दूसरी असुविधाएं होती हैं तो एक उपभोक्ता होने के नाते प्रत्येक नागरिक को मुआवज़ा पाने का अधिकार है। इसी के साथ संबंधित विभाग तथा उसके कर्मचारियों पर जुर्माना लगाने और उन्हें सज़ा देने का प्रावधान होना चाहिए।

इसी तरह स्वास्थ्य सेवाएँ हैं। सरकार द्वारा नागरिकों को अपनी ओर से निःशुल्क सेवाएँ दी जाती हैं। अस्पताल में मुफ़्त इलाज की सुविधा है। यदि इसमें कोई ख़ामी पाई जाती है तो कोई राहत नहीं मिलती क्योंकि इसके लिए पैसे नहीं दिए गये। यह ग़लत है क्योंकि वह करदाता होने से उपभोक्ता है।

तीन वर्ष पहले जो नया उपभोक्ता क़ानून बना है उसमें पहले की भाँति सभी नियम हैं लेकिन जो बदलाव किए गये हैं वे महत्वपूर्ण होने के साथ असरदार भी हैं बशर्ते कि उनके मुताबिक़ काम हो। कहीं उनका भी हश्र दूसरे बहुत से क़ानूनों की तरह न हो जो जनता की भलाई के लिए होने के बावजूद उन पर सही से अमल न होने से बेकार हो जाते हैं।

उपभोक्ता क़ानून की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसमें ऑनलाइन शॉपिंग में धोखा होने पर उपभोक्ता को न्याय दिलाने के लिए व्यवस्था है जिससे निर्माता, विक्रेता और डिलीवरी करने वाली इकाई, तीनों पर क़ानूनी कार्यवाही की जा सकती है। आजकल डिजिटलीकरण के युग में और ट्रैफिक तथा भीड़भाड़ के कारण लोगों की रुचि ऑनलाइन ख़रीदारी में तेज़ी से बढ़ रही है। यह सुगम तरीक़ा है लेकिन ख़तरे भी हैं और जालसाज़ी की गुंजाइश रहती है, इसलिए केवल उन्हीं वेबसाईट का इस्तेमाल करें जो अधिकृत हैं और जिन पर भरोसा किया जा सकता है। इसमें चूक होने पर क़ानून भी बहुत कम मदद कर पाएगा।

इसके अतिरिक्त अब वह सेलिब्रिटी भी ज़िम्मेदार है जिसका विज्ञापन देखकर ख़रीदारी की गई है। इसमें सबसे बड़ी कमी यह है कि जब तक कोई कार्रवाई हो नुक़सान हो चुका होता है और नक़ली वेबसाईट ग़ायब हो जाती है। इसी तरह बहुत सी नामी कंपनियाँ अपने ग्राहकों के साथ अनुचित व्यवहार करती हैं जैसे कि शिकायत को दबा देना और बहाने बनाते हैं कि समुचित काग़ज़ात उपलब्ध नहीं हैं, यहाँ तक कि पैसे वापिस न करने पड़ें इसलिए स्टाफ की कमी या इधर उधर भटकाती हैं।

सरकार को चाहिए कि क़ानून के अंर्तगत यह नियम बनाये कि प्रत्येक निर्माता और सेवा प्रदाता के लिए अपने यहाँ कंज्यूमर रिलेशन अधिकारी की नियुक्ति अनिवार्य हो। उसके लिए समय सीमा निर्धारित हो जिसमें उसे शिकायत को निपटाना ही होगा और ऐसा न करना क़ानून का उल्लंघन होगा तथा जुर्माना या सज़ा देने का प्रावधान हो।

क़ानून में उपभोक्ता अथॉरिटी का भी गठन किया गया है जो एक बेहतरीन कदम है। इसे बने तीन साल हो जायेंगे लेकिन इसके कार्य के बारे में जानकारी का अभाव है। इस पर इस बात की जवाबदेही हो कि यदि कोई निर्माता गड़बड़ी करता है तो उसके ख़लिाफ़ मामले का संज्ञान लेकर स्वयं कार्यवाही की जाये।

हमारे देश में उपभोक्ता आंदोलन अब काफ़ी परिपक्व हो चुका है और ग्राहक अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहते हैं लेकिन नियमों की जानकारी के अभाव और कुछ अपनी लापरवाही के कारण समय सीमा के अंदर शिकायत नहीं करते। ज़रूरी है कि सरकार कि ओर से इनके प्रचार प्रसार के लिये लगातार विज्ञापन और फ़िल्म के ज़रिए जागरूक किया जाए।


शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022

अनैतिक होते हुए भी वेश्यावृत्ति कानूनी मान्यता प्राप्त व्यवसाय है

 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सत्रह दिसंबर को एक ऐसा दिवस मनाया जाता है जिसका संबंध वेश्यावृत्ति व्यवसाय को आदर और सम्मान दिलाना तथा इसमें शामिल व्यक्तियों के जीवन को सुरक्षित बनाना है । अमेरिका के सीएटल में ग्रीन रिवर किलर रूप में कुख्यात व्यक्तियों द्वारा वेश्याओं की बेरहमी से हत्या की घटनाएं इसकी प्रेरक थीं। सन 2003 से यह दिन सेक्स वर्करों, उनकी पैरवी करने वालों, मित्रों और परिवारों द्वारा मनाया जाता है।


वेश्यावृत्ति के प्रति नज़रिया

वेश्याओं के साथ हिंसक व्यवहार के खिलाफ़ यह दिवस मनाने का उद्देश्य यही है कि दुनिया भर में इस व्यवसाय में लगे लोगों के प्रति नफ़रत दूर करने और उनके साथ दुव्र्यवहार और भेदभाव करने से लेकर हिंसक बर्ताव करने की मानसिकता को कम करते हुए समाप्त किया जा सके। आम तौर से इनके साथ हुई मारपीट, हिंसा और हत्या की घटनाएं सामाजिक चेतना के अभाव में उजागर नहीं हो पातीं और अपराधी को कोई दंड नहीं मिलता।

वास्तविकता यह है कि हम चाहे जो भी कहें, इस व्यवसाय में लगे लोग हमारे आसपास रहने वाले समाज और परिवारों से ही आते हैं। लाल छतरी इनके अधिकारों का एक महत्वपूर्ण चिह्न है और इसका चलन सबसे पहले इटली के वेनिस शहर में सेक्स वर्करों द्वारा सन 2001 में किया गया था। उसके बाद इसे व्यापक रूप से मान्यता मिली।

भारत में वेश्यावृत्ति का इतिहास बहुत पुराना है और राजा महाराजा, नवाब और समाज के प्रतिष्ठित लोगों द्वारा मान्यता भी मिली। इन्हें नर्तकी, गणिका, देवदासी तथा अन्य जो भी अनेक नाम दिए गए, समाज और परिवार में इनके प्रति घृणा कम नहीं हुई। इनका शोषण, इनके साथ अपमानजनक और अमानवीय व्यवहार तथा हर किसी का इन्हें दुत्कारा जाना, हमेशा से मामूली बात समझा गया।

हमारे देश में ऐसे बहुत से शहर, कस्बे और गांव हैं जहां वेश्यावृत्ति एक व्यवसाय है । परिवार के लोग अर्थात पिता और भाई ही इसे चलाते हैं।

गुजरात का वाडिया गांव जो राजस्थान की सीमा से लगे उत्तरी गुजरात के बनासकांठा ज़िले में है, वहां सरानिया घुमंतु कबीले के पुरुष अपने परिवार की महिलाओं का सौदा करते हैं और लड़कियों को छोटी उम्र से ही वैश्या बनने और लड़कों को इनके लिए ग्राहक ढूंढने का प्रशिक्षण देते हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले का नटपुरवा गांव है जहां बच्चों को उनके पिता का नाम नहीं मालूम और वे अपनी मां के नाम से जाने जाते हैं। कर्नाटक में बेल्लारी और कोप्पल जिले में देवदासी बस्ती है जहां कन्या के कौमार्य की नीलामी होती है। हालांकि 1982 में देवदासी प्रथा को समाप्त कर दिया गया था लेकिन महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में आज भी यह प्रचलन में है। इसमें कोई संदेह नहीं कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में यह व्यवसाय अनेक रुकावटों के होते हुए भी प्रचलित है और पनप रहा है।


व्यवसाय के रूप में मान्यता

भारत में इस व्यवसाय में लगे पुरुषों और महिलाओं की संख्या कितनी है, इसके बारे में कोई निश्चित आंकड़ा नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने इसे एक व्यवसाय के रूप में हाल ही में मान्यता दी है और पुलिस को हिदायत दी है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी मर्ज़ी से इस व्यवसाय में है तो उसके काम में दखलंदाजी न करे और उसे अपराधी न माने।

किसी भी व्यक्ति को वयस्क होने पर अपनी रजामंदी से यह व्यवसाय करने का अधिकार है। उसे भी किसी अन्य व्यक्ति की तरह सुरक्षा, आदर और सम्मान पाने का कानूनी अधिकार है। इससे यह नहीं समझना चाहिए कि इससे उन लोगों को भी राहत मिलेगी जो नारी शोषण और उन्हें इस धंधे में जबरदस्ती या लालच देकर धकेलने के लिए जिमनेदार हैं।

गैरकानूनी न होते हुए भी वेश्यावृत्ति के अंतर्गत  आने वाली बहुत सी गतिविधियां दंडनीय है जैसे कि दलाली और वेश्यालय के लिए किराए पर जगह देना।

असल में हमारे देश में वेश्यावृत्ति को लेकर कोई प्रभावी कानून नहीं है जिसके कारण जिसके जो मन में आता है, किसी भी न्यायिक फैसले का अर्थ लगा लेता है। सबसे अधिक असर उन बच्चों पर पड़ता है जो ऐसे माहौल में परवरिश पाते हैं जिसमें उनके साथ भेदभाव होना सामान्य बात है। उनकी शिक्षा का कोई प्रबंध न होने से वे इसी काम में लग जाते हैं। पुलिस और समाजसेवी संस्थाओं द्वारा छापे की कार्यवाही से इन बच्चों को कुछ राहत मिलती है और एक उम्मीद होती है कि इनका जीवन बेहतर हो।

इस पेशे को अपनी मर्ज़ी या किसी मजबूरी से अपनाने वाले व्यक्तियों के लिए शिक्षा और किसी प्रकार के व्यावसायिक प्रशिक्षण का प्रबंध होने से ही उनका जीवन बदल सकता है। इसके लिए कुछ ऐसा कानून बनाने की दिशा में पहल की जानी चाहिए कि यदि इस व्यवसाय को छोड़कर कोई महिला कुछ और करना चाहती है और अपनी संतान का भविष्य बनाना चाहती हैं तो उसे सरकार तथा सामाजिक संगठनों द्वारा आर्थिक सहायता मिले। उसके लिए पुनर्वास योजना बनाई जाए और इस तरह का वातावरण बने कि वह सामान्य जीवन जी सके। उसके नाम के साथ जुड़ा सेक्स वर्कर का ठप्पा हटे और गलत काम करने का एहसास हावी न रहे।

यह भी आवश्यक है कि जिन कारणों से कोई महिला इस व्यवसाय को अपनाती है, उन्हें दूर किया जाए। सबसे पहले यह बात आती है कि यदि बहका फुसला कर, दवाब डालकर, लोभ लालच देकर कोई व्यक्ति किसी महिला को इस व्यवसाय में आने के लिए मजबूर करता है तो उसे सज़ा का डर हो। देखा जाए तो हमारे यहां महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को लेकर बहुत से कानून हैं लेकिन उनके प्रावधान इतने लचीले और भ्रम पैदा करने वाले हैं कि दोषी व्यक्ति बच जाता है और जो प्रताड़ित है, साधनहीन है, वह फंस जाता है और सज़ा पाता है।

वेश्यावृत्ति के पनपने का सबसे बड़ा कारण नैतिक मूल्यों का ह्रास, सामाजिक चेतना का अभाव, गरीबी और अशिक्षा है। यदि इस दिशा में काम किया जाए तो इस व्यवसाय को अपनाने के प्रति आकर्षण सहज रूप से कम होते हुए एक दिन पूरी तरह समाप्त हो सकता है। अभी इसे जो अपनाते हैं, उनके लिए यह बहुत आसान लगता है और अधिकतर लोगों के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं होता।

बहुत से देशों में यह व्यवसाय सम्मानजनक और कानूनी मान्यता तथा संरक्षण प्राप्त है। सेक्स वर्करों के बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा की व्यवस्था है। इन्हें सामाजिक सम्मान प्राप्त है और इनके साथ जबरदस्ती या हिंसक व्यवहार करने पर दण्ड दिया जाता है।  इन्हें एक इंसान की तरह देखा जाता है और इनके साथ अपमानजनक शब्द इस्तेमाल नहीं किए जा सकते।

हमारे देश में भी कुछ ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे इस व्यवसाय के प्रति आकर्षण समाप्त हो।  जिन्होंने इसे अपनाया है, उनके प्रति इंसानियत का नज़रिया हो और उन्हें सहज रूप में सामान्य नागरिक अधिकार मिलें।