शनिवार, 4 सितंबर 2021

शिक्षा नीति और शिक्षक की भूमिका

 शिक्षा नीति और शिक्षक की भूमिका

प्रति वर्ष सितंबर की पांच तारीख़ को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। इस साल भी इसे मनाया जाएगा या कहें कि केवल औपचारिकता निभाई जाएगी। प्रश्न यह है कि शिक्षक दिवस से अध्यापन का काम और अध्यापक का कर्तव्य उस महान व्यक्तित्व से कितना मेल खाता है जिनके नाम पर यह मनाया जाता है।

गुरु की परिभाषा

डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ऐसे शिक्षक थे जो मानते थे कि गुरु ऐसा होना चाहिए जिसकी सोच सब से अलग हो और वह अपने विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करने में सक्षम हो। इसी के साथ वे हिंदुत्व के कट्टर समर्थक थे और उनका विश्वास था कि यही वह कड़ी है जिससे पूर्व और पश्चिम को जोड़ा जा सकता है। वे भारतीय संस्कृति के प्रबल समर्थक थे।  हिंदुत्व को एक ऐसी जीवन शैली मानते और प्रचारित करते थे जिसमें मनुष्य को मानवता, सहिष्णुता और वसुधैव कुटुंबकम् का पाठ पढ़ाया जाना शिक्षक का पहला कर्तव्य माना गया है।

शिक्षक के रूप में भारत और विदेशों के प्रसिद्ध और उच्च संस्थान उनकी कर्मस्थली रहे और उन्हें एक विद्वान ही नहीं बल्कि अपने शिष्यों के साथ जीवन भर मधुर तथा आत्मीय संबंध बनाए रखने के लिए जाना जाता है।

डॉक्टर राधाकृष्णन की सोच की समीक्षा करना तब और जरूरी हो जाता है जब हम वर्तमान समय में सरकार द्वारा बनाई गई शिक्षा नीति की चर्चा करते हैं।  शिक्षकों की भूमिका को लेकर विशेष रूप से बहस की जानी चाहिए क्योंकि नीति की सफलता उन्हीं पर निर्भर है। देश में शिक्षक वर्ग तैयार करने, उन्हें प्रशिक्षण देकर इस काबिल बनाना कि वे अपने  विद्यार्थियों को ग्लोबल सिटीजन बनने के लिए तैयार कर सकें, इसका भार शिक्षक पर ही है।

इस सब के लिए वर्षों से अनेकों संस्थान कार्य कर रहे हैं। यदि इन उच्च शिक्षा संस्थानों से निकले विद्यार्थियों और वहां उपलब्ध सुविधाओं के इस्तेमाल में कुशलता हासिल करने के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो घोर निराशा का सामना करना पड़ेगा। कुछ संस्थान तो सफेद हाथी बन गए हैं, उनमें भविष्य के शिक्षक तैयार करने की सामग्री का उपयोग ही नहीं किया जाता और वह वर्षों से जंग खा रही है।

बहुत खोज करने पर एकाध संस्थान ही ऐसा मिला जहां सरकार द्वारा जनता से कर के रूप में प्राप्त धन का सही इस्तेमाल हो रहा हो। हालांकि निजी तौर पर संचालित कुछ इंस्टीट्यूट शानदार काम कर रहे हैं लेकिन वहां पढ़ने के बाद विद्यार्थियों में से अधिकतर का लक्ष्य संपन्न देशों में मोटे वेतन वाली नौकरी हासिल करना होता है।

लक्ष्य की पूर्ति

नई शिक्षा नीति में 2030 तक यानी अगले दस वर्षों में योग्य शिक्षक तैयार करने का निर्धारित  लक्ष्य पूरा हो पाएगा, इसमें भारी संदेह है। यहां इस बात का उल्लेख करना ज़रूरी है कि साठ के दशक से अब तक सभी सरकारें वोकेशनल एजुकेशन, स्किल डेवलपमेंट, गांव देहात में कारीगरों को तैयार करने से लेकर आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्थानीय तौर पर मौजूद विशाल सामग्री के उपयोग से कौशल विकास करने जैसे राग अलाप रहीं हैं।

इन चीजों पर जितना धन खर्च हो चुका है, उसके अनुसार देश में बहुत बड़े पैमाने पर रोज़गार पैदा हो चुका होता, बेरोज़गारी मिट जाती और देश आत्मनिर्भर हो जाता लेकिन ऐसा कुछ देखने को नहीं मिलता।

इसकी पुष्टि के लिए यह बताना आवश्यक है कि भारत में केवल पांच प्रतिशत विद्यार्थियों ने वोकेशनल ट्रेनिंग ली है जबकि अमरीका में 52, जर्मनी में 75 और दक्षिण कोरिया में 86 प्रतिशत लोग किसी न किसी कार्य में पूरी तरह से काबिल और सक्षम हैं और यही कारण है कि उनका औद्योगिक विकास हमारे देश से बहुत अधिक हुआ है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि शिक्षा पर हम कुल आमदनी का लगभग आधा प्रतिशत ही खर्च करते हैं जबकि विकसित देशों में चार प्रतिशत से भी अधिक होता है।

हमारे देश में योग्य, सक्षम, प्रतिभाशाली और पढ़ाने को ही अपना धर्म तथा कर्म मानने वाले शिक्षक तैयार करने की कोई मज़बूत व्यवस्था आज तक नहीं बन पाई।

अध्यापक बनने के लिए जिन रास्तों का इस्तेमाल होता है, उनमें सब से पहले वे सरकारी संस्थान आते हैं जो दशकों पूर्व बनाए गए घिसेपिटे पाठ्यक्रमों के अनुसार शिक्षक बनाते हैं। इसके बाद वे संस्थान आते हैं जो केवल पैसा लेकर बिना कोई ट्रेनिंग दिए पढ़ाने की डिग्री देते हैं जिसे दुर्भाग्य से सरकारी मान्यता भी मिली हुई होती है। तीसरे क्रम में वे लोग आते हैं जो अपने रसूख, दबदबे और पहुंच के बल पर बिना किसी व्यावसायिक शिक्षा के टीचर की नौकरी पा जाते हैं। इसके बाद वे लोग अध्यापक बन जाते हैं जिन्हें कोई दूसरी नौकरी नहीं मिलती और वे पढ़ाने का काम  दुकान चलाने की तरह करते हैं। चैथे क्रम में वे लोग हैं जो शिक्षा की दुकान खोलकर लोगों को भ्रमित करने के लिए चांसलर, प्रोफेसर, डीन जैसे पद बिना किसी योग्यता के स्वयं ग्रहण कर लेते हैं। ये लोग शिक्षा को सेवा का साधन न मानकर केवल मेवा प्राप्त करने का ज़रिया मानते हैं।

सिस्टम को तोड़ना ज़रूरी

शिक्षक तैयार करने के वर्तमान दोषपूर्ण सिस्टम को तोड़े बिना नई शिक्षा नीति पर सुचारू रूप से अमल कर पाना नितांत असंभव है। सन 2025 तक ऐसे लोग तैयार करने का लक्ष्य पूरा होना नामुमकिन है जिनके लिए रिसर्च और नॉलेज ही शिक्षक बनने की पहली सीढ़ी है। नेशनल रिसर्च फाउंडेशन का गठन इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है लेकिन इसकी सफलता तब ही संभव है जब इसका संचालन करने वाले इस योग्य हों कि वे विद्यार्थियों की जिज्ञासा को शांत कर सकें।

शिक्षा नीति के मुताबिक शिक्षक तैयार करने के लिए जब तक रिश्वतखोरी, भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगेगी तब तक न तो शिक्षक के प्रति सम्मान लोगों के मन में होगा और न ही गुरु और शिष्य की पवित्र परंपरा बन पाएगी। हालांकि शिक्षा नीति में व्यावसाय, कृषि, विधि, स्वास्थ्य, तकनीकी शिक्षा से लेकर प्रौढ़ शिक्षा तक का खाका खींचा गया है लेकिन इस सवाल का कहीं जवाब नहीं दिया गया है कि इन विषयों को पढ़ाने वाले शिक्षक कैसे और कहां तैयार होंगे ? उनके अंदर विद्यार्थियों तथा स्वयं अपना सम्मान अर्जित करने की इच्छा कितनी होगी और वह ज्ञान देने के लिए स्वयं ज्ञानी कैसे हो पाएंगे ?

पारदर्शी सिस्टम बनाया जाना आवश्यक है ताकि क्वालिटी एजुकेशन का महत्व भविष्य के शिक्षक समझ पाएं और अपने विद्यार्थियों में ऐसे गुण भर सकें जिनसे वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें, निराशा के स्थान पर आत्मविश्वास से भरे रहें और किसी भी हालत में अनैतिक कार्यों से दूर रहें। जिस दिन ऐसे शिक्षक तैयार होने शुरू हो जाएंगे तो समझिए कि भारत को विश्व का सिरमौर बनने से कोई नहीं रोक सकता।


शनिवार, 28 अगस्त 2021

दूसरों की लड़ाई लड़ने के बहाने दूसरे देशों को कमज़ोर करना है

 दूसरों की लड़ाई लड़ने के बहाने दूसरे देशों को कमज़ोर करना है

दुनिया भर में अमेरिका और रूस का डंका इस बात के लिए बजता रहा है कि वे धनी हैं, ताकतवर हैं और किसी को भी आसमान पर बिठाने और कोई न माने तो धरती पर धूल भी चटाने में माहिर हैं। ये दोनों  दूसरे देशों पर अपना सिक्का चलाने के चक्कर में फौज का इस्तेमाल, आर्थिक नाकेबंदी और अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में बदनामी तथा अपनी जी हुजूरी न करने वाले देश को सब से अलग थलग भी कर सकते हैं। यही नहीं स्वयं अपने को सुपर पावर भी कहते और मानते हैं।

अब इस कड़ी में चीन का भी जिक्र होने लगा है और वह इन दोनों महा शक्तियों के साथ सैद्धांतिक और वैचारिक मतभेद होते हुए भी इन्हीं के नक्शे कदम पर चल रहा है। उसे भी संसार में केवल अपनी ही तूती बोलती देखने का शौक है।

चक्की के दो पाट

अमेरिका और रूस ने अपने ब्लॉक बना लिए और इनमें समर्थक देशों को शामिल कर लिया।  जिसने इनके साथ असहयोग या इनकी नीतियों का विरोध किया उसे लालच देकर, बहला फुसलाकर और कोई देश तब भी न माने तो उसे बर्बाद और यहां तक कि नेस्तनाबूद करने तक में कोई कसर न छोड़ने की नीति का पालन करने में तनिक भी न हिचकिचाए।

अमेरिकी और रूसी ब्लॉक के देशों ने पूरी दुनिया पर राज करने के लिए अनेक ऐसे संगठन बना लिए जिनकी बात अगर कोई देश न माने तो उसका बहिष्कार करने की नीति का पालन किया जाने लगा। इसमें हथियारों की ख़रीद फरोख्त से लेकर आर्थिक पाबंदियां लगाने तक की धमकी देने और फिर भी कोई न माने तो उसे दबाने के लिए सख्ती होने लगी।

ज्यादातर राष्ट्र गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और प्राकृतिक संसाधनों की कमी से इनकी बात मानने को तैयार हो गए और उन्हें इन शक्तियों में से किसी एक के साथ जाने के लिए मज़बूर होना पड़ा। मतलब यह कि ये देश चक्की के दो पाटों के बीच घुन की तरह पिसने लगे।

गुट निरपेक्षता का ढोंग

भारत ने हालांकि किसी भी गुट में शामिल न होकर अपने को अलग रखने का दावा किया लेकिन यह कितना खोखला था, इसका पता इस बात से ही चल जाता है कि संकट के समय रूस का अपने साथ  खड़ा दिखाई देना हमारे लिए जरूरी हो गया । इसकी देखादेखी अमेरिका भी हमें अपनी तरफ करने के लिए डोरे डालने लगा।

अमेरिकी ब्लॉक हो या रूसी दोनों की नीयत एक ही थी कि अविकसित देशों के मानव संसाधनों से लेकर प्राकृतिक स्रोतों तक पर अपना अधिकार कर लें। विकासशील देशों को आर्थिक सहायता देकर इतना निर्भर कर दें कि एक सीमा से आगे उनका विकास ही न हो सके। इन दोनों को डर था कि कहीं उनके मुकाबले कोई तीसरी ताकत न खड़ी हो जाए। यह तीसरी ताकत भारत जैसे देश बनते दिखाई दिए तो दोनों गुटों ने उन पर दवाब डालने और इन प्रगतिशील देशों को कभी एक न होने देने के लिए सभी तरह के उपाय करने शुरू कर दिए।

यहां एक बात का जिक्र करना भी जरूरी है कि अमेरिका और रूस मुख्य रूप से अपने हथियारों और सैन्य शक्ति के बल पर दुनिया को अपनी मुठ्ठी में करना चाहते थे, वहां चीन ने नागरिकों की जरूरत की चीजें मुहैया कराकर अपना वर्चस्व स्थापित करने की नीति अपनाई। आज मेड इन चाइना का जलवा दुनिया भर में सिर चढ़कर बोल रहा है।

अमेरिका और रूस द्वारा अपने सैनिकों को दूसरे देशों में लड़ने के लिए भेजने के विरोध में उनके अपने नागरिक अब आवाज उठाने लगे हैं कि उनके शासक अपनी वाहवाही के लिए अपने लोगों को इन देशों में मरने के लिए भेजकर कौन सा देशहित का काम कर रहे है और यह भी कि क्या फौजी ताकत के बल पर उन देशों का भला हो पाया जहां उनके परिवार के लोग अपनी जान की बाजी लगा रहे हैं ?

उदाहरण के लिए क्या बीसियों वर्ष तक आर्थिक और सैन्य सहायता देने के बावजूद उन लोगों की मानसिकता को बदल पाए जिनके लिए आतंकवाद, हिंसा और लूटपाट ही जीवन का ध्येय रहा है ?  कह सकते हैं कि इन्हें पाल पोसकर अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति करना ही इन महा शक्तियों का उद्देश्य था। इसके लिए दुनिया भर में इन्हें समाप्त करने का ढोंग रचकर यह ताकतें दिखाना चाहती थीं कि वे कितनी संवेदनशील हैं और उनकी सहानुभूति आतंक का पर्याय बन चुके देशों के असहाय और मासूम नागरिकों के साथ है।

यदि अमेरिका पर ओसामा बिन लादेन का हमला न होता तो वह कभी अफगानिस्तान, पाकिस्तान जैसे आतंक का पर्याय बन चुके देशों की नकेल कसने के बारे में नहीं सोचता। यह बात और है कि यहां भी हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और की कहावत लागू होती है। अमेरिका और रूस दोनों ही दिखावा अधिक और वास्तविक सहायता न के बराबर करते हैं।

भारत के लिए सबक

अमेरिकी, रूसी अधिकारियों और तथाकथित विशेषज्ञों की भारत के विभिन्न क्षेत्रों में तैनाती आजादी के बाद से होती रही है। इसके विपरीत भारत के युवाओं की प्रतिभा और ज्ञान को नकारने और उन्हें विदेशियों की तुलना में निकम्मा साबित करने में हमारी सरकारों ने कोई कमी नहीं रहने दी।  इसका परिणाम यह हुआ कि भारत मं रहने की बजाय अमेरिका, यूरोप तथा अन्य समृद्ध देशों में जाने और वहीं बस जाने तथा भारत कभी न लौटने और भारत को बुरा भला कहने तक का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज तक बदस्तूर जारी है।

इसे चाहे ब्रेन ड्रेन कह लीजिए, सुविधाओं के लिए प्रतिभाओं का पलायन कहिए या कुछ और, सत्य यही है कि जब तक अपने देश के प्रति अगाध समर्पण और राष्ट्रवाद की लहर आगे नहीं बढ़ेगी तब तक भारत का अग्रणी देशों की पंक्ति में स्थान पाना एक कठिन कार्य है।

इसका अर्थ यही है कि अपनी लड़ाई स्वयं और अपने ही शस्त्रों से लड़नी होगी। विदेशी भाषा, तकनीक और ज्ञान को भारतीयता की कसौटी पर परख कर ही अपनाना होगा। इसके लिए जहां नागरिकों को विदेशी वस्तुओं, टेक्नोलॉजी के प्रति अपनी सोच बदलनी होगी, वहां सरकार को भी अपनी आर्थिक नीतियों, कर निर्धारण संबंधी कानूनों और प्रशासनिक सुविधाओं को अपने देश के उद्यमियों के लिए सरल बनाना होगा। केवल विदेशी निवेश को ध्यान में रखकर विदेशियों के हित की नीतियां बनाने से बचकर भारतीयों को ही प्रत्येक क्षेत्र में सभी प्रकार की सहायता देने की व्यावहारिक नीति बनाने से ही देश आगे बढ़ पाएगा।


शुक्रवार, 6 अगस्त 2021

अधिकतम खुदरा मूल्य की छूट, उपभोक्ताओं की लूट


कोई भी व्यापार, कारोबार करने वाले, उद्योग, कारखाना लगाने वाले व्यक्ति का सब से पहला लक्ष्य यह होता है कि मुनाफा या प्रॉफिट हो लेकिन यह कितना हो इसकी कोई सीमा नहीं होनी चाहिए! सरकार का कोई ऐसा कानून भी नहीं है और न ही कोई फार्मूला जो तय करे कि कितना मार्जिन रखा जाए। यह सब निर्माता के नियंत्रण और मर्ज़ी पर निर्भर है कि वह अपने उत्पाद की कितनी कीमत रखे। बस इतना ध्यान रखना जरूरी होता है कि जो भी मूल्य छापा जाए उसमें सभी कर शामिल हों ।

एम आर पी का अर्थ ?

अधिकतम खुदरा मूल्य, निर्माता द्वारा निर्धारित करने का चलन केवल भारत और बांग्लादेश में है और दुनिया के लगभग सभी देशों में यह दुकानदार और रिटेलर के हाथ में होता है कि वह स्थानीय बातों का ध्यान रखते हुए अपनी चीज़ अपने तय किए दाम पर बेचे। निर्माता को वस्तु की क्वालिटी, वह जिन चीज़ों से बनी है, उसका विवरण और बनाने तथा कब तक इस्तेमाल की जा सकती है, यह बताना जरूरी होता है और इन बातों को उपभोक्ता के अधिकारों का ध्यान रखते हुए स्पष्ट शब्दों और पढ़े जाने लायक अक्षरों में पैकेजिंग और वस्तु पर छापना होता है।

आपने देखा होगा कि अक्सर जब आप खरीददारी करने जाते हैं तो अन्य बातों के अतिरिक्त उसके मूल्य पर भी नज़र डालते हैं कि उसकी कीमत वाजिब है या नहीं। मान लीजिए उस पर एक हजार रुपए लिखा है, आपको महंगी लगती है और आप बाहर जाने को होते हैं तो दुकानदार या उसके कर्मचारी आपके पास आकर वही वस्तु कम दाम पर  बेचने की पेशकश करते हैं।  आप सोचते हैं कि कहीं और जाकर फ़िर से तलाश करने के बजाय यहीं मोलभाव कर ख़रीद लेना बेहतर है। आप आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि वह वस्तु उस पर छपी कीमत से आधे दाम पर आपको बेची जा रही हो सकती है।

यह मोलभाव, छपी कीमत से आधे से भी कम दाम पर वस्तु का मिल जाना क्या बताता है, यही कि बहुत ज्यादा झोल है और निर्माता तथा दुकानदार की मिलीभगत से आपको ठगने का प्रयास है। अगर आपने सीधे सीधे बिना भली भांति चेक किए वस्तु खरीद ली होती तो घर आकर परिवार वालों की बातें सुननी पड़ती और हो सकता है आपको मूर्ख होने की उपाधि भी मिल जाती जबकि आपने विक्रेता के विश्वास को आधार मानकर खरीददारी की थी।

मतलब यह कि आपके साथ विश्वासघात हुआ लेकिन इसकी कहीं सुनवाई नहीं हो सकती।

क्या उपभोक्ता संरक्षण कानून में ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए कि इस स्थिति में आप निर्माता और दुकानदार के खिलाफ़ कार्यवाही कर सकें और  धोखाधड़ी का मामला दर्ज़ किया जाए ?

एम आर पी का सामान्य अर्थ यही है कि छपी कीमत से ज्यादा नहीं वसूला जा सकता, सब जगह एक ही दाम होंगे, व्यक्ति अपनी जेब के हिसाब से खरीदेगा और उसके उपभोक्ता अधिकारों का हनन नहीं होगा। यहां तक तो ठीक है लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि किराए भाड़े के नाम पर ज्यादा दाम नहीं देने होंगे, पुराने स्टॉक पर छपी कीमत को नया स्टॉक बताकर वस्तु पर बढ़ी कीमत का एक और स्टीकर लगाकर ज्यादा दाम नहीं वसूले जायेंगे ?

यहां यह बताना भी ज़रूरी है कि ऑनलाइन शॉपिंग करने पर वही वस्तु कम दाम पर उपलब्ध हो जाती है जो दुकान या मॉल में ज्यादा दाम पर मिलेगी। आप सोचेंगे कि इसमें आने जाने का समय और खर्च भी बचता है और घर बैठे सामान आ जायेगा। हालांकि ऑनलाइन शॉपिंग में धोखाधड़ी की काफी संभावना है लेकिन इसे प्रतिष्ठित और जानी मानी ऑनलाइन शॉपिंग व्यवस्था से खरीदने पर इस बारे में भरोसा किया जा सकता है कि सही दाम पर सही वस्तु मिलेगी। एक और सुविधा है कि आप बार्गेनिंग कर सकते हैं लेकिन डर यही रहता है कि कहीं दाम कम कराने के चक्कर में घटिया चीज़ न मिल जाए?

दुकान या मॉल में यह सुविधा तो रहती है कि आप देखभाल कर, कीमत का मिलान कर मोलभाव कर सकते हैं। 

निर्माता, विक्रेता और ग्राहक

किसी ज़माने में ग्राहक को भगवान मानकर दुकानदार द्वारा उसे पूरी तरह संतुष्ट कर चीज़ बेचने का चलन था, आज उपभोक्ता संरक्षण कानून होते हुए भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ठगी, बेईमानी, धोखाधड़ी नहीं होगी। इस बात का कोई मायना नहीं रहा कि विक्रेता और खरीददार के संबंध कितने पुराने हैं और दोनों को एक दूसरे पर एक अरसे से भरोसा है कि कोई  चालबाजी नहीं होगी। हकीकत यह है कि निर्माता हो या विक्रेता, उसका ग्राहक से रिश्ता गैर बराबरी का होता है। कितनी भी जान पहचान हो, कितने भी पुराने संबंध हों, किसी का कोई मोल नहीं होता जब  ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की बात हो।

एमआरपी का गोरखधंधा ऐसा है कि ग्राहक समझ नहीं पाता कि किस पर विश्वास करे और इस दुविधा में वह वस्तु की क्वालिटी, उसका नापतोल, वजन और दूसरी ज़रूरी बातों पर ध्यान देना भूलकर केवल दाम कम कराने पर ज़ोर देता रहता है। वह यह भी नजरंदाज कर देता है कि सुरक्षा की दृष्टि से, विशेषकर बिजली से चलने वाले उपकरणों के मामले में दाम से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जो वस्तु वह ख़रीद रहा है, कितनी सुरक्षित है, कहीं उससे किसी दुर्घटना के होने का अंदेशा तो नहीं है ?

कहीं उस पर महंगा रोए एक बार और सस्ता रोए बार बार की कहावत तो लागू नहीं हो रही ?

एक बात और है और वह यह कि चाहे छपी हुई एमआरपी से अधिक न लेने की बंदिश विक्रेता पर हो लेकिन वह उसे न मानकर बढ़िया सर्विस देने के नाम पर आपसे बहुत अधिक कीमत वसूल करने के लिए आज़ाद है, ख़ास तौर पर होटल, रेस्त्रां, थियेटर, ट्रेन या हवाई यात्रा में उस पर कोई कानून लागू नहीं होता।

यह अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस नहीं है तो और क्या है ?  इसी के साथ उपभोक्ता अधिकारों का हनन भी है, यही नहीं कानून का मज़ाक भी है जिसके बारे में न तो सरकार और न ही उपभोक्ता संगठन कोई कार्यवाही करते हैं। इस स्थिति में एमआरपी का मतलब ही क्या रह जाता है ? यह घोटाला है जो निर्माता और सप्लायर मिलकर करते हैं और उपभोक्ता ठगे जाने के लिए मजबूर है।

उल्लेखनीय है कि एमआरपी की बदौलत सब से ज्यादा ठगी का शिकार दवाइयां, चिकित्सा उपकरण खरीदने वाले होते हैं जिनके लिए अक्सर कीमत से ज्यादा बीमारी से छुटकारा पाना अहमियत रखता है। अस्पताल में इलाज़ करा रहे मरीजों की तो और भी मुसीबत है।  उनसे तो मानो एक के चार वसूल करना अस्पताल का अधिकार ही है और अगर कहीं आपने बीमा पॉलिसी ली हुई है तब तो एमआरपी से कई गुना रकम बिल में जोड़ दी जाती है। मरीज़ और उसके परिवार वाले कुछ बोलते भी नहीं हैं क्योंकि उनके लिए पहले बीमारी से ठीक होना है और दूसरी बात वे यह सोचते हैं कि भुगतान तो बीमा कंपनी को करना है, इसलिए क्यों बिल को लेकर ज्यादा माथापच्ची की जाए ?

हल क्या है ?

अगर ऐसी व्यवस्था बनाई जाए कि सरकार मूल्य नियंत्रण करते हुए कीमत तय करे तो यह एक और बुराई को जन्म देगा क्योंकि इससे इंस्पेक्टर राज के लौटने की पूरी संभावना है। हालांकि सरकार कानून द्वारा यह सुनिश्चित कर सकती है कीमत तय करने का कोई फॉर्मूला अपनाया जाए और तय मानकों के अनुसार मूल्य निर्धारण हो लेकिन इसमें सब से बड़ा खतरा यह है कि इससे भ्रष्टाचार बढ़ सकता है क्योंकि अफसरों की मुठ्ठी गरम करने से मनमानी कीमत निर्धारित कराई जा सकती है।

एक तरीका यह भी है कि विक्रेता, दुकानदार और सप्लायर पर कीमत तय करने का काम छोड़ दिया जाए और वे स्थानीय परिस्थिति, प्रतियोगिता और वस्तु को लाने पर खर्च हुए भाड़े तथा अन्य खर्चों को ध्यान में रखते हुए कीमत तय करें और ग्राहक को भी यह सुविधा हो कि वह वस्तु की गुणवत्ता के आधार पर मोलभाव कर सके।

यह भी हो सकता है कि निर्माता की ओर से वस्तु का होलसेल और खुदरा मूल्य सुझाया जाए जिसके आधार पर उसका बिक्री मूल्य तय किया जा सके जो ग्राहक की खरीदने की क्षमता पर निर्भर हो। इससे होगा यह कि विक्रेता बहुत अधिक दाम रखने से बचेगा क्योंकि उसे डर रहेगा कि ग्राहक कहीं और भी खरीददारी करने जा सकता है।

एक तरीका यह भी है कि फिक्की, चैंबर ऑफ कॉमर्स और ऐसे ही संस्थान हैं वे उपभोक्ता संगठनों और निर्माताओं के साथ विचार विमर्श कर कोई फॉर्मूला बनाएं जिसके आधार पर खुदरा मूल्य तय किए जा सकें। ये संस्थान इस बात की भी गारंटी लें कि निर्माता द्वारा निर्माण करते समय गुणवत्ता और सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा गया है और वस्तु सभी सरकारी मानकों पर खरी है। इसी के साथ गुमराह करने वाले विज्ञापन प्रकाशित किए जाने पर कठोर कार्यवाही का प्रावधान हो।

एमआरपी की भुलभुलैया से जितना जल्दी निकला जा सके, उतना ही उपभोक्ता के लिए बेहतर होगा और इसमें सरकार की जिम्मेदारी सब से अधिक है क्योंकि उपभोक्ता संरक्षण के लिए वही जिम्मेदार है।








शनिवार, 31 जुलाई 2021

देश को उद्योग प्रधान बनाए बिना आर्थिक विकास संभव नहीं है।

 

खेतीबाड़ी को लेकर देशवासी अपने को कृषि प्रधान कहते हुए इतने भावुक हो जाते हैं कि धरती को मां और किसान को अन्नदाता कहते नहीं थकते। अब यह बात और है कि ज़मीन जब बंजर, सूखाग्रस्त और रेतीली हो जाती है तो उसका इलाज़ कर खेती के काबिल बनाने के बजाए या तो बेच देते हैं या सरकार द्वारा अधिग्रहण करने का इंतज़ार करते हैं। 

कृषि प्रधान होने के बावजूद किसानी में कम आमदनी होती है, खर्चे ज्यादा होने से किसान अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करता है, सरकारी सहायता पर निर्भर रहता है और हमेशा कर्जे में डूबा रहता है। फिर भी कृषि को हमारी अर्थव्यवस्था का पहला स्तंभ माना जाता है।

उद्योग प्रधान बनना नियति है

कृषि के बाद उद्योग को आर्थिक विकास का दूसरा स्तंभ कहा गया है लेकिन उसकी हालत ऐसी है कि सब्सिडी और छूट पर निर्भर रहता है और हमेशा ऐसी सरकारी घोषणाओं और योजनाओं की तलाश में रहता है जिनसे कुछ आर्थिक लाभ होता हो। यही कारण है कि जो देश हमारे आसपास के वर्षों में ही स्वतंत्र हुए वे आज हमसे बहुत अधिक समृद्ध हैं और औद्योगिक देशों की पहली पंक्ति में खड़े दिखाई देते हैं।

यह कैसा संयोग है कि पंडित नेहरू ने भारत को औद्योगिक राष्ट्र बनाने की अपनी सोच की व्याख्या करते हुए कहा था कि हम जो उत्पादन करते हैं, वह हमारे उपभोग के लिए पर्याप्त हो, मतलब हम अपनी जरूरतों को स्वयं ही पूरा करने के योग्य हों। वर्तमान समय में नरेंद्र मोदी का भी यही कहना है कि भारत आत्मनिर्भर बने और हम अपने पैरों पर खड़े हों ।

रुकावट कहां है ?

अगर इतिहास में झांके तो देखेंगे कि भारत में औद्योगिक विकास का अर्थ ऐसे नियम कायदे बनाना था कि उद्यमी सरकार के चंगुल में फंसे रहकर ही उत्पादन करे और तनिक भी इधर उधर होने पर कानून का शिकंजा उसे कस सके।

उद्योगपति को  हमेशा शक की नज़र से देखा गया, उस पर सख्त  पाबंदियां लगती रहीं।  देश में इंस्पेक्टर राज पनपने से नौकरशाहों यानी ब्यूरोक्रेसी और ऐसे उद्योगपतियों का गठजोड़ बन गया जो एक दूसरे को आर्थिक लाभ पहुंचाते रहे और इस तरह पैरलल यानी समानांतर इकोनॉमी की शुरुआत हो गई जिसे काला धन कहा गया। देश की संपदा, रुपया पैसा, प्राकृतिक स्रोत सब कुछ मुठ्ठी भर लोगों के गैर कानूनी कब्जे में आता गया और अधिकांश जनता पर गरीबी, बेरोजगारी हावी होती गई जो अब तक बरकरार है।

जब देश का सोना गिरवी रखने की नौबत आई तो पी वी नरसिम्हा राव की सरकार ने अपने वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के जरिए देश में आर्थिक सुधार और उदारीकरण के नाम पर प्रतिबंधों में ढील देनी शुरू की और परमिट राज खत्म होता दिखाई दिया। परंतु सरकारी अफसरों के मुंह खून लग चुका था तो उन्होंने ऐसे नियम बनाने शुरू कर दिए, अनावश्यक फॉर्म जमा करने और बेतुकी मांग पूरी करने के फ़रमान जारी कर दिए और उद्योग लगाने की इच्छा रखने वाले उद्यमियों के सामने इतनी जटिल प्रक्रिया रख दी जिसे केवल अफसरशाही ही सुलझा सकती थी। नतीज़ा यह हुआ कि रिश्वतखोरी और भाई भतीजावाद का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जो भ्रष्ट  राजनीतिज्ञों, उद्योगपतियों और नौकरशाहों के लिए अकूत संपत्ति जमा करने का अवसर बन गया।

मिसाल के तौर पर मान लीजिए आपने सरकार या निजी मालिकों से ज़मीन खरीदी तो उद्योग लगाने से पहले आपको अपनी पुश्तों तक का ब्योरा देना, लैंड यूज बदलने से लेकर पहले से ही सभी तरह के सर्टिफिकेट लाना, कितने लोगों को रोज़गार मिलेगा, उन्हें कितना वेतन दिया जायेगा, कौन सी मशीनरी लगेगी, कहां से आयेगी, अगर विदेश से आनी है तो इंपोर्ट करने की परमीशन, कंप्लीशन सर्टिफिकेट लेने और उत्पादन शुरू करने से पहले मिनीमम कंस्ट्रक्शन, वर्क परमिट, पूरी बिल्डिंग बनने और भविष्य की जरूरत का काल्पनिक अनुमान लगाकर आज ही पार्किग की व्यवस्था करना और बहुत सी बेसिरपैर की बातों को पूरा करना जरूरी कर दिया।

यह सिलसिला रुका नहीं बल्कि आज भी लगातार बढ़ता जा रहा है चाहे वर्तमान सरकार कितने भी दावे कर ले कि उसने गली सड़ी व्यवस्था को बदल दिया है पर हकीकत यही है कि आज भी देश में सरकारी नियम पालन करना तब तक असम्भव है जब तक कि नेताओं की सिफारिश और अफसरों की मुट्ठी गरम करने के लिए ढेर सारा पैसा न हो। ऐसी हालत में कोई उद्योग सफल कैसे होगा ?

उद्योगों की बंदरबांट

उद्योगों को ग्राम, कुटीर, स्मॉल, मीडियम, बड़े उद्योगों में बांट दिया और उनके लिए इन्वेस्टमेंट, संचालन, उत्पादन, मूल्य तय करने आदि  पर इतने नियंत्रण लगा दिए कि उद्योग शुरू करने से पहले ही उद्योगपति निराश हो जाए । इसके साथ ही  उद्योगों के लिए अलग अलग संरक्षण और आरक्षण की नीति अपनाई जाने लगी।

इस तरह की नीति, बदन पर होने वाली खुजली की तरह सिद्ध हुई जो एक अंग पर अगर शांत हो जाती तो दूसरे अंग पर होने लगती । मतलब यह कि आज अगर किसी  श्रेणी को छूट मिल रही है तो दूसरा उद्योग भी उसकी मांग करने लगता है। यह ऐसा ही है कि जैसे कोई मोमबत्ती बनाने वाला कहे कि उसकी प्रतियोगिता सूर्य से है क्योंकि दिन भर वो इतनी रोशनी करता है कि उसकी मोमबत्ती को खरीददार नहीं मिलते, इसलिए उसे भी छूट चाहिए।

होना यह चाहिए था कि सभी उद्योगों के लिए समान नियम, सुविधाएं और आसान प्रक्रिया बनती जिससे सभी का ध्यान स्वतंत्र होकर केवल उत्पादन बढ़ाने पर होता न कि भेदभाव होने से छूट हासिल करने की प्रतियोगिता करना।

दिशाहीन होने के परिणाम

औद्योगिक विकास को सही दिशा न मिलने का परिणाम नौकरियां पैदा करने में असफलता, विकास दर में गिरावट, प्रति व्यक्ति आय में कमी, देसी और विदेशी निवेश में रुकावट और बेरोज़गारी बढ़ते जाने के रूप में हुआ जिसका भविष्य में भारी मुसीबत का  कारण बनना तय है, यदि समय रहते ठोस कदम न उठाए गए।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि रिसर्च और ज़मीनी हकीकत को दरकिनार कर ट्रेनिंग और सुविधाएं तैयार किए बिना स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया, लोकल से ग्लोबल जैसी घोषणाएं कर दी गईं जो केवल कागज़ी बन कर रह गई हैं और उनमें लगने वाला धन नाले में बह जाने की तरह हो गया है ।

एक अनुमान के अनुसार अगले दस साल में यदि आर्थिक विकास की दर छः प्रतिशत रहती है तो १७५ मिलियन लोग रोजगार मांगने वालों की कतार में लगे होंगे जबकि केवल १२५ मिलियन को ही रोज़गार मिल सकेगा और बाकी ५० मिलियन निठल्ले और निकम्मे साबित होने से या तो भूख और गरीबी में पिसेंगे या आपराधिक गतिविधियों तथा गैर कानूनी कामों में शामिल हो जायेंगे। यहां यह बताना भी ज़रूरी है कि सन २०१५ में भारत सबसे तेज विकसित होने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक था और २०२० तक वह सबसे धीमी गति से बढ़ने वालों में शामिल हो गया ।

उद्योग प्रधान बनने का संकल्प

यदि वक्त रहते औद्योगिक उत्पादन को बढ़ावा देने वाली नीतियों को लागू नहीं किया गया तो स्थिति बहुत ख़राब हो जाने में कोई शंका नहीं है। देश को उद्योग प्रधान बनाने के लिए नियमों में आमूल चूल परिवर्तन, विनिवेश में तेज़ी, उद्योग लगाने वालों को बंधनों से मुक्त कर अपना निर्णय स्वयं लेने की छूट देनी होगी विशेषकर उनमें जिनमें कामगार, श्रमिक, मज़दूर और स्किल्ड लोग चाहिएं।

ऐसे उद्योग जिनमें बहुत अधिक पूंजी लगती है उन्हें छोड़कर मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर को युवा, साहसी और कुछ नया कर दिखाने की चाहत रखने वाले उद्यमियों  तथा अनुभवी उद्योगपतियों के हवाले करना होगा । उनके लिए पूंजी उपलब्ध करने के साथ साथ मूलभूत सुविधाओं का पूरे देश में जाल बिछाना होगा जिनमें ट्रांसपोर्टेशन, ज़मीन की उपलब्धता, बिजली, पानी, सीवर, सड़क और औद्योगिक तथा रिहायशी बस्तियों का निर्माण प्रमुख है।

इस बात को स्वीकार करना होगा कि कृषि से अधिक उद्योगों में आर्थिक विकास करने की क्षमता और संभावना है। भावुकता और राजनीतिक फायदों को ताक पर रखकर असलीयत का सामना करने से ही देश विकसित देशों की पंक्ति में स्थान सुनिश्चित कर सकता है, यह बात जितनी जल्दी समझ ली जाय, उतना ही देशवासियों के लिए बेहतर होगा।


देश को उद्योग प्रधान बनाए बिना आर्थिक विकास संभव नहीं है।


खेतीबाड़ी को लेकर देशवासी अपने को कृषि प्रधान कहते हुए इतने भावुक हो जाते हैं कि धरती को मां और किसान को अन्नदाता कहते नहीं थकते। अब यह बात और है कि ज़मीन जब बंजर, सूखाग्रस्त और रेतीली हो जाती है तो उसका इलाज़ कर खेती के काबिल बनाने के बजाए या तो बेच देते हैं या सरकार द्वारा अधिग्रहण करने का इंतज़ार करते हैं। 

कृषि प्रधान होने के बावजूद किसानी में कम आमदनी होती है, खर्चे ज्यादा होने से किसान अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करता है, सरकारी सहायता पर निर्भर रहता है और हमेशा कर्जे में डूबा रहता है। फिर भी कृषि को हमारी अर्थव्यवस्था का पहला स्तंभ माना जाता है।

उद्योग प्रधान बनना नियति है

कृषि के बाद उद्योग को आर्थिक विकास का दूसरा स्तंभ कहा गया है लेकिन उसकी हालत ऐसी है कि सब्सिडी और छूट पर निर्भर रहता है और हमेशा ऐसी सरकारी घोषणाओं और योजनाओं की तलाश में रहता है जिनसे कुछ आर्थिक लाभ होता हो। यही कारण है कि जो देश हमारे आसपास के वर्षों में ही स्वतंत्र हुए वे आज हमसे बहुत अधिक समृद्ध हैं और औद्योगिक देशों की पहली पंक्ति में खड़े दिखाई देते हैं।

यह कैसा संयोग है कि पंडित नेहरू ने भारत को औद्योगिक राष्ट्र बनाने की अपनी सोच की व्याख्या करते हुए कहा था कि हम जो उत्पादन करते हैं, वह हमारे उपभोग के लिए पर्याप्त हो, मतलब हम अपनी जरूरतों को स्वयं ही पूरा करने के योग्य हों। वर्तमान समय में नरेंद्र मोदी का भी यही कहना है कि भारत आत्मनिर्भर बने और हम अपने पैरों पर खड़े हों ।

रुकावट कहां है ?

अगर इतिहास में झांके तो देखेंगे कि भारत में औद्योगिक विकास का अर्थ ऐसे नियम कायदे बनाना था कि उद्यमी सरकार के चंगुल में फंसे रहकर ही उत्पादन करे और तनिक भी इधर उधर होने पर कानून का शिकंजा उसे कस सके।

उद्योगपति को  हमेशा शक की नज़र से देखा गया, उस पर सख्त  पाबंदियां लगती रहीं।  देश में इंस्पेक्टर राज पनपने से नौकरशाहों यानी ब्यूरोक्रेसी और ऐसे उद्योगपतियों का गठजोड़ बन गया जो एक दूसरे को आर्थिक लाभ पहुंचाते रहे और इस तरह पैरलल यानी समानांतर इकोनॉमी की शुरुआत हो गई जिसे काला धन कहा गया। देश की संपदा, रुपया पैसा, प्राकृतिक स्रोत सब कुछ मुठ्ठी भर लोगों के गैर कानूनी कब्जे में आता गया और अधिकांश जनता पर गरीबी, बेरोजगारी हावी होती गई जो अब तक बरकरार है।

जब देश का सोना गिरवी रखने की नौबत आई तो पी वी नरसिम्हा राव की सरकार ने अपने वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के जरिए देश में आर्थिक सुधार और उदारीकरण के नाम पर प्रतिबंधों में ढील देनी शुरू की और परमिट राज खत्म होता दिखाई दिया। परंतु सरकारी अफसरों के मुंह खून लग चुका था तो उन्होंने ऐसे नियम बनाने शुरू कर दिए, अनावश्यक फॉर्म जमा करने और बेतुकी मांग पूरी करने के फ़रमान जारी कर दिए और उद्योग लगाने की इच्छा रखने वाले उद्यमियों के सामने इतनी जटिल प्रक्रिया रख दी जिसे केवल अफसरशाही ही सुलझा सकती थी। नतीज़ा यह हुआ कि रिश्वतखोरी और भाई भतीजावाद का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जो भ्रष्ट  राजनीतिज्ञों, उद्योगपतियों और नौकरशाहों के लिए अकूत संपत्ति जमा करने का अवसर बन गया।

मिसाल के तौर पर मान लीजिए आपने सरकार या निजी मालिकों से ज़मीन खरीदी तो उद्योग लगाने से पहले आपको अपनी पुश्तों तक का ब्योरा देना, लैंड यूज बदलने से लेकर पहले से ही सभी तरह के सर्टिफिकेट लाना, कितने लोगों को रोज़गार मिलेगा, उन्हें कितना वेतन दिया जायेगा, कौन सी मशीनरी लगेगी, कहां से आयेगी, अगर विदेश से आनी है तो इंपोर्ट करने की परमीशन, कंप्लीशन सर्टिफिकेट लेने और उत्पादन शुरू करने से पहले मिनीमम कंस्ट्रक्शन, वर्क परमिट, पूरी बिल्डिंग बनने और भविष्य की जरूरत का काल्पनिक अनुमान लगाकर आज ही पार्किग की व्यवस्था करना और बहुत सी बेसिरपैर की बातों को पूरा करना जरूरी कर दिया।

यह सिलसिला रुका नहीं बल्कि आज भी लगातार बढ़ता जा रहा है चाहे वर्तमान सरकार कितने भी दावे कर ले कि उसने गली सड़ी व्यवस्था को बदल दिया है पर हकीकत यही है कि आज भी देश में सरकारी नियम पालन करना तब तक असम्भव है जब तक कि नेताओं की सिफारिश और अफसरों की मुट्ठी गरम करने के लिए ढेर सारा पैसा न हो। ऐसी हालत में कोई उद्योग सफल कैसे होगा ?

उद्योगों की बंदरबांट

उद्योगों को ग्राम, कुटीर, स्मॉल, मीडियम, बड़े उद्योगों में बांट दिया और उनके लिए इन्वेस्टमेंट, संचालन, उत्पादन, मूल्य तय करने आदि  पर इतने नियंत्रण लगा दिए कि उद्योग शुरू करने से पहले ही उद्योगपति निराश हो जाए । इसके साथ ही  उद्योगों के लिए अलग अलग संरक्षण और आरक्षण की नीति अपनाई जाने लगी।

इस तरह की नीति, बदन पर होने वाली खुजली की तरह सिद्ध हुई जो एक अंग पर अगर शांत हो जाती तो दूसरे अंग पर होने लगती । मतलब यह कि आज अगर किसी  श्रेणी को छूट मिल रही है तो दूसरा उद्योग भी उसकी मांग करने लगता है। यह ऐसा ही है कि जैसे कोई मोमबत्ती बनाने वाला कहे कि उसकी प्रतियोगिता सूर्य से है क्योंकि दिन भर वो इतनी रोशनी करता है कि उसकी मोमबत्ती को खरीददार नहीं मिलते, इसलिए उसे भी छूट चाहिए।

होना यह चाहिए था कि सभी उद्योगों के लिए समान नियम, सुविधाएं और आसान प्रक्रिया बनती जिससे सभी का ध्यान स्वतंत्र होकर केवल उत्पादन बढ़ाने पर होता न कि भेदभाव होने से छूट हासिल करने की प्रतियोगिता करना।

दिशाहीन होने के परिणाम

औद्योगिक विकास को सही दिशा न मिलने का परिणाम नौकरियां पैदा करने में असफलता, विकास दर में गिरावट, प्रति व्यक्ति आय में कमी, देसी और विदेशी निवेश में रुकावट और बेरोज़गारी बढ़ते जाने के रूप में हुआ जिसका भविष्य में भारी मुसीबत का  कारण बनना तय है, यदि समय रहते ठोस कदम न उठाए गए।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि रिसर्च और ज़मीनी हकीकत को दरकिनार कर ट्रेनिंग और सुविधाएं तैयार किए बिना स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया, लोकल से ग्लोबल जैसी घोषणाएं कर दी गईं जो केवल कागज़ी बन कर रह गई हैं और उनमें लगने वाला धन नाले में बह जाने की तरह हो गया है ।

एक अनुमान के अनुसार अगले दस साल में यदि आर्थिक विकास की दर छः प्रतिशत रहती है तो १७५ मिलियन लोग रोजगार मांगने वालों की कतार में लगे होंगे जबकि केवल १२५ मिलियन को ही रोज़गार मिल सकेगा और बाकी ५० मिलियन निठल्ले और निकम्मे साबित होने से या तो भूख और गरीबी में पिसेंगे या आपराधिक गतिविधियों तथा गैर कानूनी कामों में शामिल हो जायेंगे। यहां यह बताना भी ज़रूरी है कि सन २०१५ में भारत सबसे तेज विकसित होने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक था और २०२० तक वह सबसे धीमी गति से बढ़ने वालों में शामिल हो गया ।

उद्योग प्रधान बनने का संकल्प

यदि वक्त रहते औद्योगिक उत्पादन को बढ़ावा देने वाली नीतियों को लागू नहीं किया गया तो स्थिति बहुत ख़राब हो जाने में कोई शंका नहीं है। देश को उद्योग प्रधान बनाने के लिए नियमों में आमूल चूल परिवर्तन, विनिवेश में तेज़ी, उद्योग लगाने वालों को बंधनों से मुक्त कर अपना निर्णय स्वयं लेने की छूट देनी होगी विशेषकर उनमें जिनमें कामगार, श्रमिक, मज़दूर और स्किल्ड लोग चाहिएं।

ऐसे उद्योग जिनमें बहुत अधिक पूंजी लगती है उन्हें छोड़कर मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर को युवा, साहसी और कुछ नया कर दिखाने की चाहत रखने वाले उद्यमियों  तथा अनुभवी उद्योगपतियों के हवाले करना होगा । उनके लिए पूंजी उपलब्ध करने के साथ साथ मूलभूत सुविधाओं का पूरे देश में जाल बिछाना होगा जिनमें ट्रांसपोर्टेशन, ज़मीन की उपलब्धता, बिजली, पानी, सीवर, सड़क और औद्योगिक तथा रिहायशी बस्तियों का निर्माण प्रमुख है।

इस बात को स्वीकार करना होगा कि कृषि से अधिक उद्योगों में आर्थिक विकास करने की क्षमता और संभावना है। भावुकता और राजनीतिक फायदों को ताक पर रखकर असलीयत का सामना करने से ही देश विकसित देशों की पंक्ति में स्थान सुनिश्चित कर सकता है, यह बात जितनी जल्दी समझ ली जाय, उतना ही देशवासियों के लिए बेहतर होगा।


शनिवार, 24 जुलाई 2021

सरकार और किसान ज़िद छोड़ें वरना सबका नुकसान होना तय है

 

जब परिवार, समाज या देश के संदर्भ में कोई विवाद इतना खिंच जाए कि असली मुद्दा ही गायब हो जाए और बात इतनी बढ़ जाए कि शालीनता की जगह अभद्रता और शिष्टाचार के स्थान पर गाली गलौज का इस्तेमाल हो तो समझना चाहिए कि अराजकता की शुरुआत हो चुकी है और बातचीत से कोई हल निकलने की बात सोचना बेमानी है।

समस्या आमदनी से जुड़ी है।   

हमारे देश के तीन चैथाई लोग खेतीबाड़ी से जुड़े हैं लेकिन सच यह है कि किसानी करने वाले आधे लोग कर्ज़दार हैं और वह इसलिए कि कृषि कर्म से उन्हें इतना नहीं मिल पाता कि उधार लेने की ज़रूरत न हो, अपने बच्चों की फीस जमा करने और दूसरी जरूरतों के लिए खेत न बेचने पड़ते हों और मुख्य बात यह कि बीज, खाद, रसायन और सिंचाई के लिए साहूकार के पास अपनी होने वाली उपज को गिरवी रखने की मज़बूरी तो है ही।

यहां हम उन मुठ्ठी भर किसानों की चर्चा नहीं कर रहे जो पंजाब, हरियाणा या दूसरे उन इलाकों में हल चलाते हैं जहां की धरती उपजाऊ है, खेती के आधुनिक साधन हैं और इतने खुशहाल हैं कि बड़े जमींदार, संपन्न परिवार कहलाते हैं और उनके नाते रिश्तेदार देश के अमीर ही नहीं, इंग्लैंड, कनाडा और दूसरी जगहों पर शानदार जीवन व्यतीत करने वाले लोग हैं।

कृषि कानून और वास्तविकता

सरकार अपने बनाए कृषि कानूनों की वकालत करते हुए और उन्हें कृषकों के लिए लाभकारी बताते समय यह भूल कर जाती है कि ऐसे किसान जिनके खेतों का आकार बहुत छोटा है और जिनकी संख्या बहुत अधिक है, वे गरीबी के दलदल से जितना बाहर निकलने की कोशिश करते हैं, उतना ही और इसमें धंसते जाते हैं । उनके लिए सरकार का यह कहना बेमानी हो जाता है कि ऐसे ही किसानों की आय बढ़ाने के लिए यह कानून बनाए गए हैं और विडंबना यह कि उसे अन्नदाता कहा जाता है जबकि उसके लिए दो वक्त की रोटी जुटाना ही मुश्किल है।

जब यही हकीकत है तो सोचना यह होगा कि क्या किसान  इन कानूनों का लाभ उठाने में सक्षम हैं  ?

उदाहरण के लिए यह प्रवचन देना कि इन कानूनों के लागू होने पर किसान अपनी फ़सल कहीं भी किसी को भी अपने तय किए दाम पर बेच सकता है तो उस किसान के लिए यह दूर के ढोल सुहावने होने जैसा है क्योंकि उसके पास अपनी फसल को दूसरे स्थान पर बेचने के लिए न तो ले जाने की सुविधा है और न ही इतने पैसे कि वह ढुलाई तथा आने जाने का खर्च उठा सके ।

जो लोग यह कहते हैं कि वह अपनी उपज़ का भंडारण कर ले और जब अच्छे दाम मिलें तो बेचे, वे यह भूल जाते हैं कि इन छोटी जोतों वाले किसानों की स्टोरेज का किराया चुकाने की हैसियत होती तो वह साहुकार के यहां पैदावार पहले से गिरवी ही क्यों रखते ?

अब बात आती है कि किसान का कॉरपोरेट जगत और ऐसे व्यापारी के साथ कॉन्ट्रैक्ट करना जो खेतीबाड़ी में पैसा लगाकर एक रुपए के दस बनाने की नीयत रखते हों और जिनका कृषि से दूर दूर तक न कभी वास्ता रहा हो और न उनका इस व्यवसाय को अपनाने का इरादा हो।  वे ज़ाहिर है कि किसान के अनपढ़ या कम पढ़ा लिखा होने का फ़ायदा उठाकर इस तरह का कॉन्ट्रैक्ट करने का यत्न करेंगे जिससे उनका तो भरपूर फ़ायदा हो और किसान जिसकी ज़मीन है उसे इतना भी न मिले जो फसल उगाने में लगने वाली उसकी मेहनत की भरपाई तक कर सके ! मतलब यह कि ऐसे छोटे और मझौले किसान  के लिए कॉन्ट्रैक्ट की खेती करना अपनी बर्बादी को न्यौता देना है।

जब सरकार यह कहती है कि किसान के पास अमीर लोगों के साथ हुए एग्रीमेंट की कॉपी है और वह उसकी शर्तों का उल्लंघन होने पर ज़िला मजिस्ट्रेट या अदालत में मुक़दमा दायर कर सकता है और न्याय पा सकता है तो यह बात क्या किसी से छिपी है कि हमारे देश में न्याय पाने के लिए पीढ़ियां दांव पर लग जाती है लेकिन न्याय की बस उम्मीद ही रहती है, वह आसानी से मिलता नहीं है ?

यह कानून देखने में चाहे कितने अच्छे लगते हों, कागज़ पर कितने ही आकर्षक और लुभावने हों और सरकार की मंशा चाहे कितनी भी किसान का भला करने की रही हो लेकिन वास्तविकता यह है कि इन कानूनों के ज्यादातर हिस्से प्रैक्टिकल या व्यावहारिक नहीं हैं। यही कारण है कि सरकार और किसानों के बीच हुई बहुत बार की बातचीत का कोई नतीज़ा नहीं निकला।

किसान इन कानूनों को पूरी तरह वापिस लेने की बात ऐसे ही नहीं कर रहे बल्कि उसमें कुछ तथ्य ज़रूर है। सरकार का यह कहना कि वह इनमें संशोधन करने को तो राज़ी है लेकिन पूरी तरह रद्द करने के लिए तैयार नहीं है, उससे लगता है कि यह लड़ाई दोनों पक्षों की नाक का सवाल बन गई है।  दोनों ही अपनी अपनी ज़िद छोड़ने के बारे में सोचना तक नहीं चाहते, चाहे इससे देश की आर्थिक स्थिति पर कितना भी विपरीत प्रभाव क्यों न पड़े !

अब हम इस बात पर आते हैं कि जो कानून वास्तव में बहुत लाभकारी हैं और जिनमें थोड़ा बहुत फेरबदल कर उन्हें और भी उपयोगी बनाया जा सकता है तो फिर बुराई कहां है ?  इन कानूनों के बेहतर होने के बावजूद ये किसानों के लिए हितकारी क्यों नहीं हैं और वह इन्हें मानने से संकोच क्यों कर रहा है, जब तक इसका विश्लेषण नहीं होगा तब तक इस समस्या का कोई ऐसा समाधान निकलना असंभव है जो सबको मंजूर हो !

कानून नहीं, मूलभूत ढांचा चाहिए

इन कानूनों की सबसे बड़ी कमी यह है कि यह वक्त के मुताबिक नहीं हैं अर्थात अभी इनके अमल में लाए जाने का सही समय नहीं है। इसका अर्थ यह है कि जब तक कृषि क्षेत्र में ऐसा इन्फ्रास्ट्रक्चर यानी कि सुविधाएं नहीं होंगी जिनके भरोसे किसान यह सोच सके कि अगर कल कोई खतरा आ जाए, कुछ ऊंच नीच हो जाए तो उसकी कमर न टूट जाए, वह बर्बाद न हो जाए और ज़रा सा भी नुकसान न सह पाने की दशा में उसे आत्महत्या जैसा कदम न उठाना पड़ जाए।

यदि सरकार चाहती है कि किसान इन कानूनों को स्वीकार करें तो सबसे पहले उसे पूरे कृषि क्षेत्र में उन ज़रूरी सुविधाओं का प्रबंध करने की दूरदर्शी योजना बनानी होगी जिससे किसानों का आत्मविश्वास बढ़े और वे आर्थिक रूप से अपने को इतना सक्षम बना लें कि किसी भी अनहोनी का मुकाबला कर सकें।

इन उपायों में सबसे पहले उसके लिए सिंचाई, बिजली, बीज, उर्वरक और कीटनाशक का प्रबंध सुलभ और सस्ते दाम पर करने की ऐसी व्यवस्था करनी होगी जिसमें उसे इन चीजों के लिए किसी से ऋण न लेना पड़े।

इसके बाद उसकी उपज के भंडारण का इंतज़ाम निशुल्क करना होगा और उसके घर या खेत के आसपास ही फ़सल की बिक्री होने की व्यवस्था करनी होगी, चाहे इसके लिए मंडी को ही उसके घर तक क्यों न ले जाना पड़े। इससे उन कुछ लोगों का नुकसान हो सकता है जिनका वर्तमान मंडी व्यवस्था पर दबदबा है और जिनके पास अपने वेयरहाउस हैं तथा उनके निहित स्वार्थ इससे जुड़े हैं।  यह उनकी आमदनी का एक प्रमुख साधन भी है और मंडी के संचालन में हिस्सेदार होने से राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक लाभ मिलते हैं। उनके लिए नई व्यवस्था का विरोध करना स्वाभाविक है लेकिन यदि सरकार ठान ले और इन धनवान तथा ताकतवर किसानों का सहयोग हासिल कर ले  तो यह संभव है।

ध्यान रहे मूलभूत ढांचा अर्थात इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का काम सरकार को सरकारी उपक्रमों और विभागों के माध्यम से करना होगा जो कि सरकार के पास अपने एक विशाल तंत्र के रूप में मौजूद है। अगर यह निजी क्षेत्र को दे दिया तो किसान का शोषण होना निश्चित है क्योंकि पैसे वाला व्यापारी बिना मुनाफे के कोई काम नहीं करता।

इसके बाद सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य के स्थान पर ऊपज के लाभकारी मूल्य तय करने की नीति बनाए जिससे ज्यादा भाव पर बिक्री तो हो सके लेकिन उससे कम पर नहीं चाहे खरीददार सरकार हो या अन्य कोई भी हो।

वक्त के मुताबिक क्या सही है

देखा जाए तो वैसे भी इस समय कानून लागू करने की बाध्यता नहीं है क्योंकि अदालत की रोक है, इसलिए इन्हें निरस्त करने में ही समझदारी है ।

किसान नेताओं और सरकार को एक बार फ़िर नए सिरे से बातचीत की तैयारी करनी होगी जिसमें केवल इस विषय पर चर्चा और निर्णय हो कि देश भर के किसानों के लिए उनकी ज़रूरत के मुताबिक पूरा मूलभूत ढांचा किस तरह तैयार हो और इसके तैयार होने की समय सीमा तय कर दी जाए।  जब यह हो जायेगा तो किसान का आत्मबल और विश्वास मज़बूत होगा। उसके बाद यही कानून लागू कर दिए जाएं, तब किसी के लिए भी इनका विरोध करने की गुंजाइश नहीं होगी।

शनिवार, 12 जून 2021

लक्षद्वीप का कायाकल्प और प्राकृतिक सौंदर्य को खतरा

 


हमारे देश में जितने भी पर्यटन स्थल हैं, वे अधिकतर ऐतिहासिक, पौराणिक और सांस्कृतिक हैं। इनमें विशाल किले, राजा महाराजा, नबाब, बादशाह और शहंशाओं द्वारा बनवाए गए अनेक स्थल सदियों से आकर्षण का केंद्र रहे हैं। इसी तरह धार्मिक स्थल हैं जो पूरे देश में आस्था के प्रतीक और प्राचीन वास्तुकला के अद्वितीय भंडार हैं। इनका सौंदर्य अनूठा, अलौकिक और अद्भुत है।

इसके अतिरिक्त प्राकृतिक सौंदर्य के प्रतीक अनेक स्थल हैं जो अपनी विविधता के लिए प्रसिद्ध हैं।

ऐसे ही स्थलों में अरब सागर में स्थित लक्षद्वीप है जो अपनी प्राकृतिक संपदा के लिए विख्यात है। अभी तक यह क्षेत्र सैलानियों के लिए एक तरह से प्रतिबंधित रहा है। सरकार अब इसे भी देसी और विदेशी पर्यटकों के लिए खोलना चाहती है। इसका विरोध भी हो रहा है और इसे पर्यावरण संरक्षण में बाधक कहकर अनेक राजनीतिक और सामाजिक कार्यों से जुड़े लोगों द्वारा अनावश्यक बताया जा रहा है।

लक्षद्वीप अनूठा द्वीप समूह

फरवरी 2019 में विज्ञान प्रसार के लिए एक फिल्म बनाने के लिए लक्षद्वीप जाना हुआ। इस फिल्म का विषय था कि समुद्र के पानी से ऊर्जा अर्थात बिजली का उत्पादन करने में हमारी विज्ञान प्रयोगशालाओं ने जो प्रयास किए हैं और उनके फलस्वरूप जो उपलब्धियां हासिल की हैं उन्हें इंडिया साइंस चैनल के माध्यम से दर्शकों को अवगत कराना। फिल्म निर्माण के समय इस क्षेत्र के सौंदर्य को निहारने और इसकी विशेषताओं से परिचित होने का भी यह अवसर था।

सबसे पहले इस अनूठे क्षेत्र के प्राकृतिक सौंदर्य की बात करते हैं। 32 वर्ग किलोमीटर में फैले लक्षद्वीप में 36 स्थल हैं। इनमें 27 द्वीप हैं जिनमें से दस में आबादी है और 17 में कोई नहीं रहता। तीन रीफ हैं जो पर्यावरण की दृष्टि से अनमोल धरोहर हैं छः सैंड बैंक हैं जिनका भी इकोसिस्टम की दृष्टि से बहुत महत्व है।

लगभग 70 हजार की जनसंख्या वाले इस केंद्रशासित प्रदेश में कुछ इलाके ऐसे हैं जहां केवल दस लोग रहते हैं। यह पूरा अनुसूचित जनजाति क्षेत्र है और यहां की आबादी 9प्रतिशत मुस्लिम है। शेष तीन प्रतिशत में अधिकतर प्रशासनिक, सैन्य तथा अन्य सरकारी सेवाओं के लोग हैं।

स्थानीय आबादी हालांकि एक ही धर्म से संबंधित है लेकिन उनका व्यवहार इतना धर्म निर्पेक्ष है कि वहां बाहर से आने वाले व्यक्ति को लगता है कि उसमें और इनमें कोई अंतर नहीं है। स्वागत सत्कार, बातचीत से उनके मिलनसार होने का आभास इस धरती पर कदम रखते ही हो जाता है। हर तरह से मदद करने और किसी भी प्रकार की अपेक्षा न रखने की प्रवृति यहां स्थानीय आबादी में इतनी है कि अगर किसी को कहीं रहने की सुविधा न मिले तो उसे यह अपने घर ठहराने तक में कोई असुविधा महसूस नहीं करते और उसकी सुख सुविधा का  ध्यान रखने में कोई कमी नहीं रखते।

राजधानी कवारत्ती में अधिकतर सरकारी कार्यालय हैं और पूरे क्षेत्र का प्रशासन यहीं से चलता है। रहने के लिए जो भी होटल या गेस्ट हाउस हैं वे सरकारी हैं और यहां आने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना होता है कि इनमें रहने के लिए जगह उपलब्ध है और बुकिंग करा ली गई है। कई बार तो इसके लिए कई सप्ताह इंतजार करना पड़ सकता है क्योंकि बहुत सीमित मात्रा में निवास की सुविधाएं हैं।

बिजली और पानी

यह पूरा क्षेत्र जेनरेटर द्वारा उत्पन्न बिजली से चैबीसों घंटे प्रकाश प्राप्त करता है। इसके लिए डीजल समुद्र के रास्ते आता है और काफी खर्चीला है। सोलर एनर्जी से भी बिजली की आपूर्ति होती है लेकिन अभी इस दिशा में ज्यादा प्रगति नहीं हुई। हालांकि सौर ऊर्जा से डीजल से होने वाले प्रदूषण से बचा जा सकता है लेकिन इस दिशा में ज्यादा प्रगति न होने से आश्चर्य होता है कि सूरज महाराज की कृपा का लाभ उठाने से यह क्षेत्र वंचित क्यों है जबकि उनकी तरफ से धूप प्रदान करने में कोई कमी नहीं है ?

समुद्र के पानी से ऊर्जा प्राप्त करने का काम अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में है और उसमें बहुत समय लगने वाला है इसलिए सोलर एनर्जी ही वर्तमान में एकमात्र विकल्प है। यदि इस क्षेत्र का विकास करना है और पर्यटन की सुविधाएं प्रदान करनी हैं तो सबसे पहने ऊर्जा का प्रबंध करना होगा और सोलर तथा पवन ऊर्जा पर आधारित योजनाओं को लागू करना होगा।

यह प्लांट सन 2004 में चेन्नई स्थित एन आई ओ टी नामक वैज्ञानिक संस्थान द्वारा लगाया गया था। इस प्लांट से समुद्र के खारे पानी को मीठे पानी में बदला जाता है। आधुनिक विज्ञान और भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा इस तरह के प्लांट अधिक मात्रा में स्थापित किए जाने से ही पीने के पानी की व्यवस्था हो सकती है।

जहां तक पानी का संबंध है तो अभी भी यहां सब जगह खारा पानी ही उपलब्ध है। पीने का पानी बहुत सीमित मात्रा में उपलब्ध है। यह या तो बोतलबंद बाहर से आता है या फिर डीसैलिनेशन प्लांट से नलों के जरिए प्राप्त होता है। यह नल जगह जगह लगे हुए हैं जहां से पानी भरकर घरों तक लाया जाता है।

अगर इस क्षेत्र का विकास करना है और उसे पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करना है तो सब से पहले बिजली और पानी की समुचित व्यवस्था करनी होगी। वैसे भी यह दोनों स्थानीय आबादी की भी मूलभूत आवश्यकताएं हैं जिनकी पूर्ति किए बिना लक्षद्वीप के शहर कवारत्ती को स्मार्ट सिटी का आकार देना संभव नहीं है।

लक्षद्वीप के पर्यटन की दृष्टि से जो द्वीप विकसित किए जा सकते हैं उनमें बंगाराम पहले से ही सैलानियों का पसंदीदा स्थल है। जिन अन्य द्वीपों पर आबादी है उनका विकास जीवन के लिए आवश्यक सुविधाओं का प्रबंध करने से ही होगा। इनमें स्कूल, शौचालय, अस्पताल प्रमुख हैं।

नई प्रशासनिक घोषणा से बीफ को प्रतिबंधित करने और उसके स्थान पर मछली और अंडों का सेवन करने पर जोर देना कहीं से भी उचित नहीं है। बीफ का प्रचलन रोकने से स्थानीय आबादी के रोष का कारण बनना ठीक नहीं। यदि गौ रक्षा ही उद्देश्य है तो उसके लिए अलग से व्यवस्था की जानी चाहिए न कि ऐसा काम किया जाए जिससे विरोध की लहर पैदा हो।

अल्कोहल की अनुमति देना भी तर्कसंगत नहीं क्योंकि अभी तक यह क्षेत्र इस व्यसन से अपरिचित रहा है। पर्यटकों का स्वागत अल्कोहल के स्थान पर किसी अन्य भारतीय पेय पदार्थ से किया जा सकता है। इससे न केवल विदेशियों को एक भारतीय पेय का स्वाद मिलेगा बल्कि वे उसे अपने साथ भी ले जाना पसंद करेंगे।

जहां तक कानून व्यवस्था की बात है, यह प्रदेश अभी तक अपराध से लगभग अछूता है। यहां चोरी, डकैती, लूटपाट जैसी घटनाएं लगभग न के बराबर होती हैं। जनसंख्या एक दूसरे के साथ सहयोग करने और आपसी विश्वास को जीवनचर्या का अंग मानती है।

पंचायत चुनावों में भाग लेने के लिए दो बच्चों की सीमा बना देना न केवल हास्यास्पद है बल्कि गैरकानूनी भी है क्योंकि अभी तक संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।

लक्षद्वीप के प्राकृतिक सौंदर्य की बात ही निराली है। यहां समुद्र तट पर टहलना, बीच पर बैठकर पुरुषों और महिलाओं का ग्रुप बनाकर समय बिताना और अठखेलियां करती लहरों के उठने गिरने का आनंद लेना सुखद अनुभव है।

रीफ, कोरल और समुद्री वनस्पति तथा जीव अपनी प्राकृतिक छटा से मन मोह लेते हैं। समुद्र तट साफ सुथरे, स्वच्छ हैं और कूड़े कचरे से गंदे नहीं होते क्योंकि इस मामले में प्रशासन बहुत सख्त है। वैसे भी खाने पीने की दुकानें इन जगहों पर कम ही हैं इसलिए गंदगी भी नहीं है।

विकास की राजनीति

लक्षद्वीप का विकास करने के नाम पर कहीं कोई राजनीतिक एजेंडा तो नहीं, यह संशय उठना स्वाभाविक है। यहां जरूरत इस बात की है कि आवागमन के साधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कराए जाएं। इनमे सड़क बनाना प्रमुख है। एक द्वीप से दूसरे द्वीप तक जाने की अभी कोई बढ़िया व्यवस्था नहीं है। इसका भी पर्याप्त प्रबंध करना होगा।

यहां बरसात का पानी जमा करने का कोई साधन नहीं है और वह जितना जमीन में समा सकता है, ग्राउंड वाटर के रूप में जमा हो जाता है, बाकी बहकर समुद्र में चला जाता है। पहले जब आबादी कम थी तो इस ग्राउंड वाटर का इस्तेमाल पीने के पानी के रूप में हो जाता था। यहां का सीवेज सिस्टम बहुत पुराना होने से जंग खा कर बेकार हो जाने से ग्राउंड वाटर के साथ मिल गया। नतीजा प्रदूषित जल के रूप में हुआ और उसके पीने से अनेक बीमारियों को न्योता मिल गया। अब ग्राउंड वाटर का इस्तेमाल केवल धुलाई सफाई करने जैसे कामों के लिए होता है।

विकास करना ही अगर उद्देश्य है तो सबसे पहले इस क्षेत्र की मूलभूत आवश्यकताओं को ही पूरा कर लें तो काफी होगा। यह क्षेत्र पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने के लिए बहुत अधिक उपयुक्त नहीं है, इस बात को समझकर नए सिरे से यहीं रहकर स्थानीय लोगों को साथ लेकर विकास योजनाओं को बनाकर अमल में लाने से ही इस क्षेत्र का भला हो सकता है।

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