शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

पराक्रमी योद्धा सुभाष चन्द्र बोस और स्वतंत्रता संग्राम


भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में जहां समस्त देशवासियों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार योगदान किया, वहां इसका नेतृत्व करने में लगी एक पूरी पीढ़ी की एकजुटता और देश के प्रति समर्पण की यह भावना भी थी कि चाहे रास्ता कोई भी हो, मंजिल राष्ट्र को अंग्रेजों से मुक्त कराने की है।

इसके लिए गांधी ने सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह की राह दिखाई तो सुभाष ने सशस्त्र क्रांति का मार्ग अपनाया। इसी तरह अन्य सेनानियों ने भी अपने व्यवहार से मुक्ति संग्राम में शामिल होकर अपनी श्रेष्ठ भूमिका निभाई।सा

त्रिमूर्ति

महात्मा गांधी को बापू और राष्ट्रपिता कहकर सुभाष ने अपनी देशभक्ति का परिचय दिया तो गांधी जी ने उन्हें देशभक्तों का देशभक्त कहा और वैचारिक मतभेद होते हुए भी उन्हें अपने पुत्र की भांति स्नेह दिया।

जवाहर लाल नेहरू तो सुभाष के बड़े भैया थे ही। जब एक बार अपनी भतीजी द्वारा गुलाब का फूल डंडी समेत नेहरू को दिये जाने से पहले सुभाष ने डंडी साफ कर गुलाब का फूल उनके कोट में टांक दिया और कांटा चुभ जाने से जो रक्त निकला तो नेहरू ने उसकी ओर ध्यान दिलाया ही था कि सुभाष ने यह कहकर अपना कर्तव्य पूरा किया कि गुलाब तुम्हारे और कांटे मेरे हिस्से के हैं।

इसमें कोई विवाद नहीं है कि नेहरू और सुभाष दो भाइयों की तरह थे और गांधी जी दोनों ही के लिए पितातुल्य थे। इसका प्रमाण गांधी जी की इच्छा के विरुद्ध सुभाष का कांग्रेस का अध्यक्ष पद जीतने पर अपने को अलग कर दूसरी राह पकड़ लेना और गांधी जी का बिना किसी वैमनस्य के सुभाष को पुत्रवत स्नेह देना है।

यह कोई साधारण बात नहीं है बल्कि वर्तमान पीढ़ी के लिए संदेश है कि राजनीतिक दल आपस में विचारधारा को लेकर चाहे कितने भी अलग हों, आपसी व्यवहार में वे एक परिवार की तरह ही होने चाहिएं।

इसके विपरीत आज देखने में आता है कि एक दूसरे के विरोध में नेता एक दूसरे पर व्यक्तिगत आरोप लगाते हुए शिष्टता की सभी हदें पार कर जाते हैं। गालियां ही नहीं देते, मरने की कामना करते हैं और इसके लिए साजिश तक करते हैं।

जो लोग सोचते और कहते हैं कि गांधी, नेहरू एक तरफ और सुभाष दूसरी तरफ, तराजू के दो पलड़ों की तरह हैं तो इसमें अतिशयोक्ति नहीं है।  हालांकि यह उनकी विचारधारा तक ही सीमित था, असल में उनके व्यवहार में एक दूसरे के प्रति इतना आदर और सम्मान था कि इस त्रिमूर्ति को अलग अलग रखकर आजादी की लड़ाई में उनके योगदान को समझा ही नहीं जा सकता।

इसका एक उदाहरण यह है कि जब सुभाष विदेशों में हथियार जमा कर रहे थे तो भारत में गांधी जी भारत छोड़ो आंदोलन शुरू कर रहे थे। अगर इन दोनों में कोई मतभेद होता तो सुभाष बधाई न देते और गांधी जी उनकी सफलता की कामना नहीं करते।

महात्मा गांधी जानते थे कि भारतवासी गुलामी की जंजीरों में इतने जकड़ चुके हैं कि ताकतवर अंग्रेज से हथियारों के बल पर नहीं जीत सकते तो उन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह का मार्ग दिखाया।

सुभाष समझते थे कि दुश्मन को उसी की भाषा में जवाब दिया जाना सही है। वे गांधी जी की इस बात से सहमत थे कि भारतवासी सशस्त्र संघर्ष नहीं कर पाएंगे तो इसका हल उन्होंने दूसरे देशों से हथियार जुटाने और अपना ही सैन्य बल तैयार करने से निकाला। इसमें उन्होंने अधिनायकवादी  हिटलर और मुसोलिनी जैसे डिक्टेटर से भी मदद लेने में संकोच नहीं किया।

यह संगत का ही परिणाम कहा जा सकता है कि गांधी प्रजातंत्र के हिमायती थे तो सुभाष देश के लिए बीस वर्ष तक डिक्टेटरशिप को सही मानते थे। जहां तक इस बात को उछाला जाता रहा है कि आजादी गांधी और नेहरू के कारण मिली या सुभाष के कारण तो बाबा साहेब आंबेडकर ने भी सुभाष को महानायक माना।

सुभाष और उनकी आजाद हिन्द फौज ने जिस बहादुरी और जोखिम से स्वतंत्रता संग्राम लड़ा, उसकी मिसाल दुनिया में शायद ही किसी दूसरे देश में मिले। कदाचित यही कारण है कि जय हिन्द का नारा और कदम कदम बढ़ाए जा गीत आज तक हरेक की जुबान पर है।

क्या सीख सकते हैं

आज के दौर में इस बात पर बहस या आपस में तुलना करना बेमानी है कि अगर गांधी या सुभाष जीवित होते तो भारत कैसा होता ?  आजादी की लड़ाई एक अलग मानसिकता से लड़ी गई थी और स्वतंत्र भारत को विश्व में अग्रणी बनाने के लिए संघर्ष करना बिल्कुल अलग सोच है।

हक़ीकत यही है कि न आज गांधी जी की विचारधारा पर चला जा सकता है और न ही सुभाष की कार्यशैली को अपनाया जा सकता है।  गांधी और सुभाष का नाम लेकर अपनी स्वार्थ सिद्धि अवश्य की जा सकती है।


शनिवार, 16 जनवरी 2021

महामारी का टीका तो आ गया, पर चुनौतियां बहुत हैं

 

यह देश के लिए गर्व, वैज्ञानिकों के लिए उपलब्धि और राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा नागरिकों के संयम की जीत है कि एक ओर अनदेखी, अंजान बीमारी धीरे धीरे कम हो रही है और दूसरी ओर राहत मिल रही है कि अब सब कुछ पटरी पर लौट रहा है। परन्तु इससे यह समझना भूल होगी कि बीमारी खत्म हो जाएगी, इसका फैलाव रुक जाएगा और हम पहले की तरह रहने लगेंगे।

पहली बात तो यह है कि कोई भी टीका हो, वह कभी किसी बीमारी का इलाज नहीं होता क्योंकि ज्यादातर बीमारियों के बारे में यह संशय रहता है कि वह होती कैसे हैं, संक्रमण कैसे होता है और जब इस बारे में पक्की जानकारी नहीं है तो उन्हें न होने देने के लिए सौ प्रतिशत गारंटी कैसे दी जा सकती है ?

केवल बचाव ही उपाय है

इस बीमारी से बचाव के लिए टीकाकरण की प्रक्रिया और प्रभाव वैसा ही है जैसा कि जन्म लेने से पहले माता और उसके बाद शिशु का टीकाकरण होता है ताकि जीवन भर अनेक बीमारियों के हमले से बच कर रहा जा सके।

महामारी की तरह आई यह बीमारी भी टीका लगने से रुक जाएगी लेकिन अगर कोई समझे या कहे कि यह समाप्त हो जाएगी तो यह गलत होगा, इसलिए इससे बचे रहने के उपाय जो अभी तक किए जा रहे हैं और हम उनके अभ्यस्त हो गए हैं तो उन्हें जारी रखने में ही भलाई है।

टीकाकरण की शुरुआत पूरे विश्व में हो चुकी है और अब हमारे देश में भी हो रही है तो यह एक सकारात्मक कदम तो है ही, साथ में विश्वास भी है कि अब इसके संक्रमण से बचाव हो जाएगा।

यहां यह समझना भी जरूरी हो जाता है कि अब तक जितने भी टीकाकरण हुए हैं उनका लक्ष्य सीमित आबादी वाला रहा है लेकिन इस बीमारी का टीका तो सबको लगवाना ही होगा क्योंकि इसका शिकार बाल, युवा, अधेड़, वृद्ध में से कोई भी हो सकता है।

टीकाकरण से इतना होता है कि इसके लगने के बाद शरीर इस काबिल हो जाता है कि बीमारी का आक्रमण झेल सके और उसे दूर से ही नमस्ते कर भगाने में सफल हो जाया जाए। इसका मतलब यह है कि हमारी प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी इतनी अधिक हो कि हम उससे बचे रहने में सफल हों और बीमार न पड़ें। इसका एक अर्थ यह भी है कि जो भी वायरस है वह मनुष्य के शरीर में घुसने से पहले ही अपना शिकार न मिलने से इतना कमजोर हो जाय कि अपनी मौत खुद मर जाए।

अभी केवल स्वास्थ्य कर्मियों, जरूरी सेवाओं को प्रदान करने वाले व्यक्तियों को टीका लगेगा और उसके बाद पचास से अधिक उम्र वालों की बारी आएगी। इस काम में कितना समय लगेगा, इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है, निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता, फिर भी छह माह से एक वर्ष की अवधि तो अपने देश की जनसंख्या के आकार को देखकर लग ही सकती है। उसके बाद अन्य लोगों की बारी आएगी।

इस अवधि में यह भी पता चल जाएगा कि टीकाकरण की सफलता की औसत दर क्या है और यह भी कि इस दौरान हो सकता है कि वैज्ञानिक कोई नई खोज करने में भी सफल हो जाएं जिससे अधिक असरदार चिकित्सा पद्धति निकल सके।

चुनौतियां क्या हैं

इस टीकाकरण के असर के बारे में शोधकर्ताओं की ओर से दो बातें कही गई हैं, एक तो यह कि इसके लगने पर व्यक्ति स्वयं तो बच जाएगा लेकिन अगर उसके शरीर में वायरस है तो वह उससे दूसरों यानी अपने संपर्क में आने वालों को संक्रमित कर सकता है और दूसरी बात यह कि अगर वह अभी तक संक्रमण से बचा हुआ है तो अपने साथ दूसरों को भी इस बीमारी से बचाने के लिए कवच बन सकता है।

ऐसा इसलिए है कि अभी तक यह बीमारी लक्षण और बिना किसी लक्षण के बढ़ती हुई देखी जाती रही है। इसका अर्थ यह हुआ कि हमें यह नहीं समझना चाहिए कि जिनका टीकाकरण हो गया है उनसे संक्रमण नहीं हो सकता और उनके संपर्क में आने वाले पूरी तरह सुरक्षित हैं।

यह स्थिति केवल तब आ सकती है जब प्रत्येक व्यक्ति का टीकाकरण हो जाए जो कि वर्तमान परिस्थितियों में तुरंत संभव नहीं है। इसमें महीनों से लेकर कई वर्ष तक लगने वाले हैं, इसलिए प्रत्येक नागरिक को इसके लिए मानसिक तौर पर तैयार रहना होगा कि अभी इस बीमारी से बचकर रहने के उपाय करते हुए ही जीना होगा।

इसका अर्थ यही है कि हमने अपनी जिस जीवन शैली को इन दिनों अपनी दिनचर्या का अंग बना लिया है, उसे आगे भी अपनाए रखना होगा और कुछ चीजें तो ऐसी हैं कि वे जीवन भर साथ रहें तो अच्छा ही है।

इनमें बार बार हाथ धोने, घर, दफ्तर और काम करने की जगहों को सैनिटाइजर से रोगाणुमुक्त करते रहने, मास्क और दस्ताने पहनने की आदत को बरकरार रखने जैसी आदतों को हमेशा के लिए अपनाया जा सकता है। जहां तक दो गज की दूरी और भीड़भाड़ से बचकर रहने की बात है तो अभी कुछ समय तक तो इन्हें अपनाते रहना ही अच्छा होगा क्योंकि न जाने किस भेष में वायरस हमलावर हो जाए।

इस बीमारी के कारण हमारी जीवनशैली में बहुत से परिवर्तन हो गए हैं जिनमें से कुछ को कायम रखा जा सकता है और कुछ को छोड़ने के बारे में सोचा जा सकता है। इनमें बातचीत, मीटिंग, काम धंधे, रोजगार,  प्रेजेंटेशन आदि के लिए आधुनिक संचार और संवाद साधनों का इस्तेमाल सदा के लिए अपनाया जा सकता है।

जहां तक घर से ही दफ्तर का काम करने का चलन है तो यह कुछेक क्षेत्रों में तो जारी रह सकता है लेकिन अधिकतर मामलों में पुरानी परिपाटी अर्थात दफ्तर से ही काम शुरू करना ठीक रहेगा। जो लोग घर से काम कर रहे थे उनका कहना है कि कुछ समय के लिए तो यह ठीक है लेकिन हमेशा के लिए नहीं क्योंकि आमने सामने बैठकर चर्चा करने, वाद विवाद करने की बात ही कुछ और है। इसमें कुछ समय के लिए इतना ही ध्यान रखना काफी है कि बैठने की दूरी बनाए रखी जाए।

हमारे देश में संक्रमण की दर घटते जाने का एक कारण यह है कि इस बीमारी के दौरान अधिकांश लोगों ने अपनी इम्युनिटी बनाए रखने के लिए अपने खानपान में काफी बदलाव किए हैं। इन्हें भी इसी तरह जारी रखा जा सकता है क्योंकि पौष्टिकता हमेशा ही बनी रहनी चाहिए।

इन दिनों जिस भोजन को जंक फूड कहा जाता है उसकी तरफ से लोगों की जो रुचि कम हुई है, उसे वैसा ही रखा जा सकता है और ताजा, पौष्टिक भोजन करते रहना ही बेहतर है। योग क्रियाएं, व्यायाम तो वैसे ही स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक हैं, इसलिए ये भी जीवनचर्या का अंग बने रहें तो कोई बुराई नहीं।

यही सब चुनौतियां या अवसर हैं जिनके साथ हमें जीने की प्रैक्टिस हो ही गई है तो फिर इन्हें अपनाए रखने में ही समझदारी है।  


शनिवार, 9 जनवरी 2021

आत्मनिर्भर भारत महात्मा गांधी से लेकर वर्तमान सरकार तक

 


कोरोना महामारी जब अपने प्रचंड रूप में देश और दुनिया में हाहाकार मचा रही थी, उस समय भारत सरकार देश को आत्मनिर्भर बनाने की योजनाओं की घोषणा कर रही थी। लगभग  प्रतिदिन वित्त मंत्री तथा उनके सहयोगी आर्थिक मोर्चे पर जनता की भलाई और उसके मनोबल को बनाए रखने के लिए बनाई गई नीतियों की व्याख्या टीवी के माध्यम से कर रहे थे।

इसी दौरान बीस लाख करोड़ का पैकेज भी घोषित हुआ जो किसान, व्यापारी, उद्योगपति से लेकर सामान्य नौकरीपेशा या अपना छोटा मोटा कारोबार करने वाले तक के लिए लाभकारी बताया जा रहा था।

उस समय सभी लोग घरों में बंद थे, बाहर निकलने का मतलब अदृश्य वायरस की चपेट  में आकर अपना जीवन खतरे में डालना था। टीवी ही एकमात्र साधन था जिससे संसार भर में हो रही हलचल के बारे में पता चल जाता था। केवल बहुत जरूरी कामकाज हो रहे थे, ऐसे में लगता था कि सरकार जनता की भलाई के लिए कितनी चिंतित है और उसे सुकून पहुंचाने के लिए दिन रात मेहनत कर रही है।

तोहफा या गले की हड्डी

आत्मनिर्भर पैकेज भी सरकार की तरफ से दिया गया ऐसा ही तोहफा था और आश्चर्य होता था कि सरकार ने जन कल्याण के लिए कैसे आनन फानन में इतनी सारी योजनाएं बना डालीं। आत्मनिर्भर पैकेज तो एक तरह से पूरा बजट ही था जिसके दूरगामी परिणाम होने वाले थे।

उसी दौरान किसान बिल भी बन गया जो जल्दबाजी में या जानबूझकर तुरंत लागू भी कर दिया गया। इसे लेकर आज सरकार की जितनी फजीहत हो रही है, उससे लगता है कि या तो सरकार के मन में कुछ और था या फिर किसान ही समझ से इतना पैदल है कि उसे अपना अच्छा बुरा समझने की तमीज नहीं है।

एक और उदाहरण है। सरकार ने व्यापारियों को राहत देते हुए घोषणा की कि पुराने भुगतान 45 दिन में लेनदार के खाते में आ जाने चाहिएं। हकीकत यह है कि जब किसी ने अपने पुराने बिलों के भुगतान की बाबत इस नए आदेश के अनुसार कार्यवाही करने की बात कही तो जवाब मिलता था कि हमारे पास कोई आदेश नहीं आया और यह कि कोरोना के चलते कोई काम नहीं हो सकता। इस तरह के और भी बहुत से उदाहरण दिए जा सकते हैं और लगभग हर कोई सरकारी अधिकारियों से लेकर नेताओं तक से उनकी टालमटोल की आदत का शिकार हो रहा था।

जिस तरह किसान बिल पर चर्चा और पुनर्विचार की मांग उठ रही है, उसी तरह इस पूरे पैकेज पर जनता के बीच और संसद में बहस होनी चाहिए ताकि इन योजनाओं को तर्क और व्यावहारिकता की कसौटी पर खरा उतरने के बाद ही लागू करने का काम शुरू किया जाए।

परिवहन सुविधाएं, सड़क निर्माण, फ्रेट कॉरिडोर, यातायात व्यवस्था, व्यापार और उद्योग के लिए दी जाने वाली सुविधाएं आदि तो सरकार के सामान्य कार्यों में आते हैं तो फिर बीस लाख करोड़ के पैकेज से आम आदमी को गुमराह क्यों किया जा रहा है ?

प्रवासी महात्मा गांधी

नौ जनवरी को देश में प्रवासी दिवस मनाने का चलन है जिसमें विदेशों में बसे भारतीयों को अपने देश में बुलाने, उनसे चर्चा करने ताकि वे  अपनी कमाई में से कुछ यहां खर्च करें या मोटी रकम निवेश करें, उन्हें अलग से सुविधाएं देने और यह विनती करने कि अब बहुत रह लिए विदेश में, अपने वतन में लौट आइए, हम आपका स्वागत करने को तैयार बैठे हैं।

कुछ प्रवासी सरकार की बातों में आकर यहां आ भी जाते हैं लेकिन यहां जो लेट लतीफी और भ्रष्टाचार का तंत्र है, उससे परेशान होकर वापिस लौटने में ही अपनी भलाई समझते हैं। अभी वे जिन देशों में रहकर अपनी बुद्धि और कौशल के बल पर अपना विशेष स्थान बनाए हुए हैं और वहां की सरकारें उनकी पूरी मदद करती हैं, भारत आते ही यहां उन्हें नियम, कानून की बेड़ियों में जकड़ा जाने जैसी फीलिंग होती है और वे अपने वतन की खिदमत करना भूलकर वापिसी का टिकट कटा लेते हैं।

यह जो प्रवासी दिवस है, इसे मनाने की तारीख नौ जनवरी इसलिए रखी गई थी क्योंकि इसी दिन सन 1915 में मोहन दास करमचंद  गांधी सबसे पहले भारतीय प्रवासी के रूप में अपने गुरु गोपाल कृष्ण गोखले के आह्वान पर भारत आए थे और देश की सेवा करने का संकल्प लिया था।

उन्होंने सबसे पहला काम यह किया कि देश को जानने, समझने के लिए भारत भ्रमण पर निकल गए। उस दौर में आने जाने की सुविधाएं आज की तरह न होने से जितना भी घूम फिर सके, उनके लिए काफी था। जिस प्रकार खिचड़ी के एक चावल की जांच करना ही काफी है कि वह पक चुकी है या अभी कच्ची है, उन्हें समझने में देर नहीं लगी कि भारत को गुलाम बनाए रखने की अंग्रेज की चाल क्या है और इस गुलामी से बाहर निकालने के लिए क्या करना जरूरी है ?

अंग्रेज ने केवल इतना किया था कि हमें मानसिक रूप से इतना कुंद कर दिया था कि हमें उसकी बुराइयों में भी अच्छाईयां दिखाई देती थीं। शारीरिक क्षमता में मजबूत होते हुए भी हम उसके पतले दुबले पहलवान से भी हार जाते थे, उसके पुचकारने पर दुम हिलाने जैसा और मारने पर हाथ जोड़ कर माफी मांगने जैसा व्यवहार करने के आदी हो गए थे।

आत्म निर्भर होने का पाठ

बापू गांधी के सामने चुनौती थी कि कैसे देशवासियों को मानसिक दासता से मुक्त किया जाए ताकि वे अपनी हीनभावना और कुंठा से अलग हटकर अपने को सक्षम मानना शुरू करें।

यह मुश्किल काम था लेकिन गांधी ने चरखा देकर और खादी धारण करने और गांव में ही जो कुछ काम धंधा, रोजगार हो सकता था, उसके लिए आसपास उपलब्ध साधनों से अपनी रोजी रोटी कमाने और खेतीबाड़ी को प्राथमिकता देकर पेट भरने लायक अनाज उगाने का ऐसा मंत्र दिया कि देशवासी आत्मनिर्भर होने की तरफ चल पड़े।

अंग्रेज इस चरखे का मजाक उड़ाता रह गया और पूरा देश अंदर से इतना शक्तिशाली होता गया कि अंग्रेज को भगाने की तैयारी करने लगा। इसमें उन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह को शामिल कर दिया जिससे अंग्रेज कुछ न समझने के कारण बौखला गया और नतीजा यह हुआ कि उसके दमन चक्र से भी भारतीयों की हिम्मत नहीं टूटी और वे दिन पर दिन मजबूत होते गए।

गांधी ने ग्रामीण उद्योग, खादी व कुटीर उद्योग और अपने ही संसाधनों का ठीक से इस्तेमाल करने की ऐसी परंपरा शुरू कर दी जो हमें अपने पैरों पर खड़ा होने में रामबाण औषधि सिद्ध हुई।

इसे कहते हैं आत्मनिर्भरता अर्थात एक संकल्प कि हम किसी से कम नहीं और किसी को पछाड़ने की हमारी नीयत नहीं लेकिन आगे निकलने की दौड़ में सबसे आगे।

प्रथम प्रधान मंत्री नेहरू ने देश में वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं, औद्योगिक प्रतिष्ठानों से उन्हें जोड़ने और आधुनिक सुविधाओं से देश को संपन्न करने का काम शुरू किया अर्थात मजबूत नीव डालनी शुरू की। उनसे एक गलती यह हुई कि वे गांव देहात को कम और शहरों को ज्यादा प्राथमिकता देने लगे जबकि इसका उल्टा होना चाहिए था क्योंकि हम  कृषि प्रधान देश रहे हैं।

ग्रामीण क्षेत्र वीरान होते गए और शहरों के नाम पर कंक्रीट जंगल अस्तित्व में आते गए। यही गलती अब तक होती रही है और अब जाकर सरकार का ध्यान ग्रामीण क्षेत्रों की तरफ जाना शुरू हुआ है।

मिसाल के तौर पर हमारा जो मैनुफैक्चरिंग सेक्टर है वह इंपोर्टेड साज सामान हो या मशीनरी, उस पर निर्भर हो गया जबकि होना यह चाहिए था कि हम अपने ही संसाधनों से और स्वदेशी तकनीक से अपने कल कारखाने और उद्योग चलाते और उन्हें ग्रामीण इलाकों में स्थापित कर गांव देहात को समृद्ध करते और शहरों के साथ संतुलन बिठाकर काम करते।

आत्म निर्भर भारत को लेकर सरकार की सोच चाहे कितनी अच्छी हो लेकिन बेहतर होगा कि उसके सिपहसालार महात्मा गांधी की तरह देश के भीतरी हिस्से में जाकर अध्ययन करें, स्थानीय लोगों से बातचीत करें और अपनी योजनाओं पर आम आदमी की राय लें और उससे पूछें कि अगर उन्हें लागू किया जाए तो क्या ये उसे मंजूर होंगी और क्या इनसे उसका जीवन बदल सकता है और वह खुशहाल हो सकता है।

अगर उत्तर हां में मिलता है तो आगे बढ़ें और ना में मिलता है तो इस पूरे आत्म निर्भर पैकेज पर फिर से विचार कर नए सिरे से बनाएं वरना होगा यह कि जैसे आज किसान यह कह रहा है कि जब उसे यह बिल चाहिए ही नहीं तो क्यों उस पर लादने की कोशिश हो रही है, उसी तरह अन्य क्षेत्रों में भी विरोध होना शुरू हो जाएगा।

कहीं ऐसा न हो कि जनता उसके अन्य सुधारों को भी रद्द कर दे और देश को आत्म निर्भर बनाने का संकल्प अधूरा रह जाए। 

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

उपभोक्ता अदालत में ‘तारीख पर तारीख‘ का चलन और मुकदमों का ढेर

 


24 दिसंबर उपभोक्ता दिवस के रूप में मनाया जाना अब केवल एक लकीर पीटने की तरह हो गया है। अखबार के किसी कोने में या टीवी के एक छोटे से समाचार के जरिए इसकी खबर इस तरह से मिलती है कि उसकी प्रतिक्रिया आश्चर्य से यह कहने जैसी होती है ओके, उपभोक्ता दिवस जैसी भी कोई चीज हैऔर फिर उसे भुला दिया जाता है।

असल में बात यह है कि दुनिया भर में उपभोक्ताओं के साथ हो रही जालसाजी, धोखाधड़ी, फरेब आदि के खिलाफ सशक्त कानून बनाए जाने की जरूरत महसूस हुई। उपभोक्ताओं को संगठित कर और इसे आंदोलन का रूप देने की नीयत से भारत में भी यह सोचा जाने लगा कि हमारे यहां तो रोज ही इस तरह के मामले होते हैं और खरीददार कुछ नहीं कर पाता तो यह सब सोच कर भारत सरकार ने उपभोक्ता संरक्षण कानून बना दिया।

दूर के ढोल सुहावने

यह कानून बहुत ताम झाम से बनाया गया और लगा कि अब गलत काम करने वालों की खैर नहीं, मानो उपभोक्ता को एक ऐसा शस्त्र या कवच मिल गया हो जिसके भरोसे वह निश्चिंत होकर खरीददारी कर सकता है और अगर किसी ने उसके साथ कुछ भी ज्यादती करने की कोशिश की तो कानून उसे तुरंत सजा देगा।

इस कानून पर अमल करने के लिए प्रत्येक जिले में उपभोक्ता मंच, राज्य में राज्य आयोग और राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आयोग और उसके बाद उच्चतम न्यायालय से न्याय पाने की सुविधा, यह सब गठित कर दिया गया।

न्याय पाने की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए सादे कागज पर शिकायत लिखने, वकील की जरूरत न होने और कुछ ही हफ्तों में मामले में न्याय मिल जाने की व्यवस्था देख सुन कर मन में तसल्ली हुई कि अब दीवानी अदालतों में बरसों तक मुकदमेबाजी से बचा जा सकेगा और पैसे तथा समय की भी बचत होगी।

यहां तक तो सब ठीक था लेकिन वास्तविकता यह थी कि कागजों पर तो यह सब क्रियान्वित होता दिख रहा था लेकिन उस पर अमल करने की प्रक्रिया इतनी सुस्त, कमजोर और ढीली ढाली थी कि लोगों में इस कानून के प्रति अविश्वास होना शुरू हो गया।

नीति और नीयत का तालमेल

प्रारम्भ में इस कानून का व्यापक प्रचार प्रसार करने और जागो ग्राहक जागो की संकल्पना को साकार करने के लिए देश भर में उपभोक्ता आंदोलन जैसा माहौल बना।

यह गलत या बढ़ा चढ़ा कर कहने वाली बात नहीं है कि शुरुआत में इस कानून की वजह से लोगों को न्याय मिलने लगा था और वह काफी हद तक जागरूक होने लगा था।

इस कानून की बदौलत मिले अधिकारों को समझने भी लगा था। उसमें चीजों को देख परख कर, दूसरे उत्पादों से तुलना करने और दुकानदार से मोलभाव कर खरीददारी करने की आदत आने लगी थी। इसी के साथ वह यह कहना भी सीख गया था कि कंज्यूमर कोर्ट में घसीट लिया जाएगा अगर मेरे साथ कोई हेराफेरी करने की कोशिश भी की गई।

इसका असर भी देखने को मिलने लगा क्योंकि न्याय मिलने में बहुत देर नहीं लगती थी। मामले बढ़ने लगे और विडंबना यह हुई कि उपभोक्ताओं को संरक्षण देने वाली इस व्यवस्था में सेंध लगनी शुरू हो गई।

सरकार ने हरेक जिले और राज्य में उपभोक्ता अदालत तो बना दिए लेकिन उनके लिए जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने का काम सरकार की लालफीताशाही और ब्यूरोक्रेसी की भेंट चढ़ गया।

जिला उपभोक्ता मंचों में आज भी हालत यह है कि सदस्यों यानी न्यायाधीशों के बैठने के लिए टूटा फूटा फर्नीचर, सुविधाओं का अभाव और अपने मुकदमों की पैरवी के लिए आए लोगों के शोर से यह जगह किसी कबूतरखाने की तरह लगती है।

जब सदस्यों के लिए ही पर्याप्त सुविधाएं नहीं है तो फिर आम शिकायतकर्ता की तो बिसात ही क्या है। उसके बैठने तक की सुविधा ढंग की नहीं है और अगर कहीं किसी दिन ज्यादा केस हुए तो खड़े होने की भी जगह नहीं मिलती।

पता नहीं यह नियम है या परंपरा बन गई है कि उपभोक्ता अदालत में मामलों की सुनवाई पूरे दिन नहीं बल्कि केवल कुछ घंटों में ही सिमट गई है। अगर कहीं माननीय सदस्य गैरहाजिर हो गए फिर तो यह भी मुमकिन नहीं। इसी से जुड़ा है उनकी नियुक्ति का मामला। आज हजारों की संख्या में सदस्यों और अध्यक्षों के पद खाली पड़े हैं, वे कब भरे जाएंगे, कोई नहीं जानता। इस बीच मुकदमों के ढेर बढ़ते जाते हैं और कोई सुनवाई करना तो दूर यह बताने को तैयार नहीं कि यह इंतजार कब खत्म होगा।

एक मामले में तो उपभोक्ता अदालत को यह बताने में बारह साल लग गए कि संबंधित मामला उनकी परिधि में नहीं आता।

जो कानून निश्चित महीनों की अवधि में फैसला देने की बात कहता है, उसमें अब न्याय पाने के लिए सामान्य हालात में भी तीन से पांच साल तक लग सकते हैं। अगर मामला पेचीदा हुआ तो कितना वक्त लगेगा कोई नहीं जानता क्योंकि उच्चतम न्यायालय तक जाने या फैसलों को टालने की सुविधा पक्ष और विपक्ष दोनों के पास है।

इसके साथ यह भी सच है कि शिकायतकर्ता के सामने उत्पाद निर्माता के पास ऐसे वकीलों की कोई कमी नहीं जो किसी भी मामले को बरसों तक लटकाए रखने में उस्ताद हैं।

उपभोक्ता अपनी लड़ाई खुद लड़ता है क्योंकि कानून तो उसे यह सुविधा देता ही है पर वह आर्थिक दृष्टि से भी इतना संपन्न नहीं होता कि वकीलों की फीस दे सके, इसलिए वह ज्यादातर हार मान लेने और न्याय पाने को भूल जाने में ही अपनी भलाई समझता है।

उपभोक्ता अदालत में आने वाले अधिकतर मामले एकाध लाख या कुछेक हजार रूपए के होते हैं। अब अगर वह वकील की सेवा ले तो उसकी फीस देने में ही दसियों हजार देने पड़ जाएंगे। ऐसे में अगर उसके पक्ष में फैसला हुआ भी तो उसे क्या मिलेगा, यह सोचकर वह अन्याय सहने को ही अपनी किस्मत मान लेता है।

एक मामले में नामी कंपनी का लैपटॉप जिसकी कीमत 85 हजार थी, उसके खराब निकलने पर  शिकायत की तो उसका निपटारा होने में देर लगती देख अपने एक मित्र की सलाह पर वकील कर लिया तो उसके खर्च मे ही चालीस हजार निकल गए। दो साल बाद  न्याय मिलने की उम्मीद छोड़ दी और अपने को कम से कम मानसिक तनाव से तो मुक्त कर ही लिया।

उपभोक्ता संरक्षण कानून लागू करने में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसमें पीड़ित व्यक्ति को हरियाली यानी सब्जबाग ज्यादा दिखाए जाते हैं और वह अपने को झूठ मूठ का पहलवान समझने लगता है।

हकीकत में यह कानून उपभोक्ता की मदद कम करता है और निर्माता की ज्यादा क्योंकि उसके साथ अन्याय हुआ है यह सिद्ध करने की जिम्मेदारी उसकी होती है जिसे वह इसलिए पूरी नहीं कर पाता क्योंकि कानून के छेदों का इस्तेमाल करने में दूसरा पक्ष माहिर, शातिर और ताकतवर होता है।

ज्यादातर मामले इसी बात पर खारिज कर दिए जाते हैं कि उपभोक्ता को सभी नियमों की जानकारी दे दी गई थी  ये नियम कुछ इस तरह से लिखे जाते हैं कि कोई वकील ही उन्हें समझ सकता है। फिर इतने छोटे अक्षरों में होते हैं कि पढ़ने के लिए दूरबीन खरीदनी पड़े, इसके साथ ही इतनी जल्दबाजी में उससे दस्तखत करा लिए जाते हैं कि उसके पास कोई चारा नहीं होता।

उपभोक्ता कानून से खिलवाड़ के मामले चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत होते हैं और स्पष्ट लापरवाही होने के बावजूद डॉक्टर या अस्पताल साफ बच जाता है क्योंकि मरीज की जान का हवाला देकर सभी तरह के कागजों पर पहले ही हस्ताक्षर करवा लिए जाते हैं।

अगर इस बात पर विचार करें कि उपभोक्ता अदालत में पद कैसे भरे जाते हैं तो यह निकल कर आएगा कि इनके लिए राजनीतिक रसूख ज्यादा चाहिए, बनिस्बत इस पद की गरिमा के अनुकूल योग्यता के जिसमें किसी प्रकार की कानूनी डिग्री होने की बाध्यता न होकर केवल समाज सेवा का मुखौटा लगा लेना ही पर्याप्त है।

यही कारण है कि बरसों तक जिला फोरमों में नियुक्ति ही नहीं होती क्योंकि मंत्रियों या नियुक्ति अधिकारियों को अपनी पसंद का कोई बंदा ही नहीं मिलता।

पांच लाख से ज्यादा मामले पेंडिंग होना यही बताता है कि इस अच्छी न्याय प्रणाली में भी तारीख पर तारीख का चलन शुरू हो गया है जो इस बात को दिखाता है कि उपभोक्ताओं में शीघ्र न्याय पाने के प्रति अविश्वास की शुरुआत हो चुकी है। हालांकि इस कानून को नए कलेवर में 2020 में लागू किया जा चुका है लेकिन मूल प्रश्न वही है कि बिना समुचित इन्फ्रास्ट्रक्चर के कैसे इसका पालन होगा ?

हम जो हर बात में विदेशों की मिसाल देते हैं तो अमरीका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और एशियाई देशों में भी यह इतना सख्त है कि उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन की हिम्मत करना निर्माता के लिए बर्बादी की तरफ बढ़ना है। हमारे यहां सख्त कानून के होते हुए भी उपभोक्ता अदालत में न्याय पाने की आशा करना मृग मरीचिका ही है।

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

जमीन का आदर और किसान का सम्मान


किसान या जो लोग खेतीबाड़ी और इससे जुड़े काम और व्यवसाय से जुड़े हैं, उन्हें दो वर्गों में रखा जा सकता है, एक वे जो बहुत समृद्ध और खुशहाल हैं और दूसरे वे जिनकी आमदनी इतनी नहीं होती कि उनका गुजारा भी ठीक से हो सके।  हमेशा कर्जदार बने रहते हैं, गरीबी के कारण अपने बच्चों को भी खेतीबाड़ी न करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, कहीं दूसरा काम खोजने के लिए कहते हैं, चाहे अपना घरबार छोड़कर किसी शहर में छोटी मोटी नौकरी ही क्यों न करनी पड़े।

ऐसा इसलिए होता है कि क्योंकि जो आज संपन्न है उसने अपनी जमीन, उसकी मिट्टी को आदर सम्मान दिया, उसकी देखभाल अपने कुनबे की तरह की और उसे पोषक तत्वों की खुराक से ताकतवर बनाए रखा तथा पूरा ध्यान रखा कि जमीन को न तो किसी तरह की बीमारी लगे और न ही उसकी उपज में कमी हो। वे जानते थे कि खुशहाल होने पर ही उनका सम्मान होगा।

इसके विपरीत विपन्न किसान ने ज्यादातर अपनी जमीन और खेतीबाड़ी को राम भरोसे छोड़ दिया, देखभाल और पौष्टिकता के अभाव में उसे बंजर हो जाने दिया, उपजाऊपन खत्म होता दिखने पर भी जमीन का इलाज नहीं किया। जमीन लावारिस होकर सरकार की किसी भूमि अधिग्रहण योजना का इंतजार करने लगी ताकि उस पर कोई सड़क, हाईवे बन सके या कोई उद्योग लग सके या उसके एवज में उसके मालिक को मुआवजा मिल जाए।

कृषि एक उद्योग है

हमारे देश में लगभग 130 मिलियन हेक्टेयर जमीन इस समय बंजर या मरुस्थल का रूप ले चुकी है जो कुल कृषि भूमि का आधे से भी अधिक है। सरकार के वायदे के अनुसार इसे 2030 तक कृषियोग्य बनाना होगा क्योंकि ऐसा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करने के लिए जरूरी है और दबाव तथा चेतावनी भी कि यदि ऐसा न हुआ तो देश में भारी संकट आ सकता है।

हमारे देश में खेतीबाड़ी की दृष्टि से जो उन्नत प्रदेश हैं उनमें सबसे पहले पंजाब, हरियाणा और उत्तर भारत के राज्य है । समस्या की दृष्टि से राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर और कर्नाटक हैं जहां प्राकृतिक और मानवीय दोनों ही कारणों से जमीन से उतना लाभ नहीं मिलता जितना अपेक्षित है।

यह कोई कहावत नहीं बल्कि हकीकत है कि पंजाब और हरियाणा के जाट कहीं भी जाकर खेतीबाड़ी करें, वहां की जमीन उपजाऊ और उस इलाके को चमन न बना दें तो अपना नाम बदलवा लें।

जो किसान यह समझते हैं कि सही देखभाल न होने से जमीन इंसान की तरह बीमार पड़ सकती है, उसका इलाज करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। घर में किसी के अस्वस्थ होने का पता मुखिया को तुरंत चल जाता है उसी तरह किसान को भी अपनी जमीन और उसमें होने वाली फसल में किसी भी तरह का रोग होने का अहसास हो जाता है।

संवेदनशील किसान फौरन बीमारी की दवाई लाता है और लापरवाह उसे उसके हाल पर छोड़ देता है। विडंबना है कि आज देश में कृषि योग्य इतनी जमीन है कि कई महाद्वीपों की आबादी का पेट भर सके और हमारा किसान  अपनी उपज का सही मूल्य पाने के लिए ही संघर्ष करते हुए दिखाई देता है। जिन्हें देश के विभिन्न राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में जाने और काम करने का मौका मिला है, वे इस बात से भली भांति परिचित होंगे कि समान मौसम, सुविधाओं के होने पर भी एक जगह भरपूर फसल होती है तो दूसरी जगह जरूरत से भी कम होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि जो मिट्टी का सम्मान करने पर ही आदर मिलता है।

किसान अगर खेतीबाड़ी को एक उद्योग की तरह मानकर अपनी जमीन पर खेती करें तो   किसी के आगे झुकना नहीं पड़ेगा बल्कि वह मोहताज कहलाना तो दूर, किसी भी उद्योगपति से आर्थिक दृष्टि से बराबरी कर सकता है।

पानी, सिंचाई, प्रदूषण

जिन क्षेत्रों में कृषि भूमि बदतर हालत में है उसका प्रमुख कारण पानी है जो कभी वर्षा अधिक होने के कारण बाढ़ बनकर अपने साथ उपजाऊ मिट्टी की परत को बहाकर ले जाता है और कभी कम या बिल्कुल नहीं होने पर सूखे की स्थिति पैदा कर देता है और जमीन प्यासी रहकर कुछ भी उगाने के लायक नहीं रहती।

पानी से संबंधित दूसरा कारण है जल प्रदूषण जो  कल कारखानों, उद्योगों से निकलने वाले रसायनों के नदी नालों के पानी में घुलकर सिंचाई के लिए किसान के खेत तक पहुंचकर उसकी फसल को प्रदूषित कर देता है। इसके अतिरिक्त अंडरग्राउंड वाटर भी जहरीले रसायनों से प्रदूषित होकर फसल खराब करने में बहुत तेजी से काम करता है।

इसके लिए सरकार से किसानों को यह मांग करनी चाहिए कि यदि प्रदूषित पानी से सिंचाई करने पर फसल को नुक्सान होता है तो उसकी भरपाई हो और जो भी सरकारी या गैर सरकारी उद्योग हो उसे तुरंत बंद किया जाए।

संरक्षण खेती

कृषि वैज्ञानिकों ने संरक्षण  खेती या कंजर्वेशन एग्रीकल्चर के रूप में काफी समय पहले किसान को एक विकल्प दिया था। इस तरह की खेती का महत्वपूर्ण पक्ष जीरो टिलेज है जिसमें काफी कम लागत की मशीन से जुताई किए बिना बीजारोपण होता है। नीचे एक खुरपा लगा होता है जो जमीन की उतनी खुदाई करता है जितने में बीज समा जाए और फिर उसके बाद खेत में जो छीजन  है वह उसे ढंक लेती है। इस तरह दो काम हो जाते है, बिना जुताई किए बुआई हो गई और छीजन या पराली जलाने की नौबत नहीं आई और वायु प्रदूषण के आरोप से बच गए।

संरक्षण खेती में जो मूल तत्व है वह यह कि इससे खेतों की उपजाऊ परत के नष्ट न होने में मदद मिलती है। इसके साथ ही इस परत पर छीजन पड़ जाने से सुरक्षित भी हो जाती है और स्थाई रूप से ऑर्गेनिक मिट्टी की परत बन जाती है।

इस तरह की खेती से फसल की अदला बदली यानी आज एक और कल दूसरी फसल ली जा सकती है।  बहुत से देशों में इसके सफल परीक्षण हुए हैं और भारतीय कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार यह श्रेष्ठ पद्धति है।

इस बारे में मेरा निजी अनुभव है और विशेषज्ञों से चर्चा के अतिरिक्त इस पर एक फिल्म भी बनाई है ताकि इस तरीके का प्रचार प्रसार हो और किसान इसे अपनाने में रुचि दिखाएं।

संरक्षण खेती के अतिरिक्त एक सुझाव यह था कि किसान का पशुधन चरागाहों की समुचित व्यवस्था न होने से खेत में पौधों को अपना भोजन बनाता है और साथ में नष्ट भी बहुत करता है। इस समस्या का हल पशु चारे के लिए उपयुक्त चरागाहों का प्रबंध कर निकाला जा सकता है।

जमीन को उपजाऊ बनाए रखने के लिए कृषि वैज्ञानिकों और अनुभवी किसानों तथा जानकारों के अनुसार वाटर शेड मैनेजमेंट और वाटर हार्वेस्टिंग के जरिए जल संरक्षण और जल भंडारण के लिए बनाए गए जलाशयों, तालाबों के निर्माण और उनके रखरखाव के लिए समुचित योजनाएं बनाकर उन पर अमल किया जाय तो स्थाई रूप से किसान की अधिकतर समस्याएं हल हो सकती हैं। 

भंडारण की व्यवस्था

कृषि के क्षेत्र में एक सबसे अधिक लाभदायक और किसानों के फायदे का काम होना चाहिए,, वह यह है कि किसान को उसके खेत के पास ही भंडारण यानी स्टोरेज की सुविधा मिलनी चाहिए जहां वह अपनी फसल रख सके और उसकी फसल के बिकने तक बैंक उसे एडवांस रकम दें ताकि वह अगली फसल के लिए अपने खेत तय्यार कर सके। इससे उसे अपनी उपज जिस किसी भी दाम पर बेचने की मजबूरी नहीं होगी और वह मंडी या बिचैलियों के शोषण से बच सकेगा।

सरकार इसमें उसकी मदद के लिए इतना तो कर ही सकती है कि किसान की आर्थिक स्थिति के अनुसार या तो उसे बिल्कुल मुफ्त दे या ज्यादा से ज्यादा सब्सिडी दे ताकि वह निश्चिंत होकर खेतीबाड़ी पर अपना पूरा ध्यान और समय लगा सके। अभी तो उसे इसके लिए पैसा और साधन जुटाने में अपना खून पसीना बहाना पड़ता है जो खेत में बहे तो उसके दिन फिर सकते हैं और वह खुशहाली की तरफ कदम बढ़ा सकता है।

सरकार की उदासीनता

असल में हमारे यहां दिक्कत यह है कि सरकार अपने पास खेती की नई तकनीक और टेक्नोलॉजी के होते हुए भी किसान तक पहुंचा नहीं पाती। किसान की आमदनी बढ़ाने की बात तो की जाती है  लेकिन उसके लिए कोई कमिटमेंट न होने से किसान  पुराने तरीकों से ही खेतीबाड़ी करता रहता  है।

जहां तक कृषि भूमि के खराब होने के प्राकृतिक कारण जैसे भूकंप, सुनामी, भू स्खलन या वनों में लगने वाली आग है तो उस पर इंसान का वश न होने से ज्यादा कुछ तो नहीं किया जा सकता लेकिन यह तो किया ही जा सकता है कि हम अंधाधुंध कटाई कर वन विनाश न करें। पहाड़ों की जड़ों के खोखला होते जाने से उनके टूट कर गिरने से होने वाली तबाही से बचने का एकमात्र उपाय यही है कि वन संरक्षण के उपायों को अपनाया जाए और नदियों तथा पर्वतों में खनन का काम पैसों के लालच में आकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की तरह न किया जाए।

हमारे देश में कृषि और भूमि सुधार के लिए सरकार द्वारा अनेक योजनाएं और नीतियां बनती रही हैं और उन पर अमल करने के लिए अनेक कार्यक्रम चलाए जाते रहे हैं। इनका कितना असर होता है यह अपने आप में एक जांच का विषय है लेकिन इतना तो सच है कि खेतीबाड़ी की दशा और उपज की तादाद और गुणवत्ता में ज्यादा फर्क देखने को नही मिलता।

अगर हमें अपनी खेतीबाड़ी के लिए निर्धारित जमीन को पूरी तरह से अगले दस वर्ष में बंजर और मरुस्थल बनने से रोककर अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरना है, पूरी कृषि भूमि को उपजाऊ बनाना है तो उसके लिए अभी से इस तरह के उपाय करने होंगे जिनके सुखद और दूरगामी परिणाम हों ।


शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

किसान की मुसीबत, अफसरशाही और सरकार की फजीहत

 


हमारे देश में किसान को अन्नदाता, धरतीपुत्र, पालनहार तथा और भी न जाने कितने विशेषणों से पुकारा जाता है और इसी लय में उन्हें मूर्ख, गंवार कहते हुए होशियार, लालची से लेकर अदूरदर्शी और सीमित दायरे की सोच रखने वाला कुएं का मेंढक भी कह देते हैं। 

एसडीएम नही उपभोक्ता अदालत में फैसला

नए कृषि कानूनों को लेकर यही कहा जा सकता है कि वे बनाए तो किसान के हित में गए लेकिन उनका लाभ किसी और को होगा। इसीलिए उनके विरोध में आंदोलन हो रहा है और यह बात गौर करने की है कि इस बार इसकी अगुआई वे किसान कर रहे हैं जो पढ़े लिखे हैं और संपन्न हैं, उनके दोस्त, रिश्तेदार अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में किसानी कर रहे हैं और इन्हें गुमराह करना मुश्किल है।

किसान को सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि निजी क्षेत्र के लोग आकर उनकी उपज मनमाने दाम पर खरीदेंगे, मंडियां खत्म हो जाएंगी और उन्हें एमएसपी से भी कम दाम मिलेंगे। कोई विवाद होने पर वे एसडीएम की अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

इस समस्या को हल करने का बहुत ही आसान तरीका है और जिस का जिक्र  स्वामीनाथन जी ने भी किया है और वह न्यायसंगत भी है।

उदाहरण के लिए एक  घटना की याद दिलाई जा सकती है जिसमें एक महिला किसान ने निजी क्षेत्र की कंपनी से अपनी उपज का कॉन्ट्रैक्ट किया और जब पैसे देने की बारी आई तो अपने को चालाक समझने वाली कंपनी के अधिकारियों ने बहुत सी  कमियां निकालते हुए कम दाम देने चाहे।

यह किसान महिला उपभोक्ता अदालत में गई तो उसे इसकी परिधि में न आने वाला मामला बताकर नामंजूर कर दिया गया। मुकदमा राज्य आयोग और फिर राष्ट्रीय आयोग गया जहां उसे उपभोक्ता मानते हुए उसको न्याय मिला और दाम के साथ हर्जाना भी मिला।

इस घटना से सबक लेकर सरकार को कानून में संशोधन करना चाहिए कि एसडीएम की अदालत के स्थान पर उपभोक्ता अदालतों मे विवाद के निपटारे के लिए जाया जाय जहां सिविल अदालतों से जल्दी न्याय मिल जाता है।

सरकार भी कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा हो

दूसरी बात पर आते है और वह यह कि खरीददारी करते वक्त दाम कम देने के लिए यह बहाना बनाया जाता है कि जो पैदावार हुई है उसके आकार और गुणवत्ता में अंतर है। मामूली समझ रखने वाला भी यह जानता है कि एक ही पेड़ पर लगने वाला फल या एक ही खेत में होने वाली पूरी उपज एक जैसी नहीं हो सकती।

यह ठीक वैसा ही है जैसे कि एक ही मातापिता की संतान होने पर भी उनके गुण दोष अलग होते हैं लेकिन मां बाप उनके पालन पोषण में भेदभाव नहीं करते। इसी तरह उपज के मामले में किसान को कम कीमत क्यों मिले जबकि उसकी मेहनत उसे उगाने में एक जैसी हुई है।

इसलिए कानून में यह बदलाव होना चाहिए कि किसान की पूरी फसल के लिए एक ही कीमत दी जाएगी और अगर कोई कॉन्ट्रैक्ट करता है तो उसे  जो कीमत तय हुई है उसे कम करने का अधिकार नहीं होगा और उसे पूरी उपज एक ही दाम पर खरीदनी होगी।

खरीदने के बाद वह बाजार में किसी  जिंस के आकार, क्वालिटी या वैरायटी के मुताबिक कम ज्यादा कीमत पर जैसे चाहे बेच कर कितना भी मुनाफा कमाए।

तीसरी बात यह कि किसान को यह डर लगता है कि खरीददार अपने वायदे से मुकर गया तो वह बर्बाद हो जाएगा।

इसका भी सरल उपाय यह है कि जो एग्रीमेंट हो वह त्रिपक्षीय हो यानी उसमें किसान, खरीददार के साथ डीएम स्तर का अधिकारी भी दस्तखत करे। ऐसा होने पर न तो किसान और न ही खरीददार कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों का उल्लंघन करने की गलती करेगा क्योंकि कानून के हाथ लंबे होते हैं और आम तौर से कोई भी सरकार से दुश्मनी मोल लेना नहीं चाहेगा।

चैथी बात यह कि पचास वर्षों से भी अधिक समय से जो मंडी व्यवस्था आज अपनी जड़ें मजबूती से कृषि क्षेत्र में जमा चुकी है, उसे कमजोर करने से सरकार को क्या हासिल होगा, कुछ नहीं और फिर नई मंडियों को खड़ा करने के लिए समय और धन का अपव्यय नहीं होगा ?

इसका उपाय यह है कि वक्त के साथ जो बुराइयां मंडी व्यवस्था में आ गई हैं और वे राजनीतिक अखाड़े बनती जा रही हैं तथा नेताओं को उन पर कब्जा करने की होड़ लगी रहती है क्योंकि मंडियों की ताकत पैसे और वोट बैंक से आंकी जाने लगी है, तो बस इतना प्रावधान कर दीजिए कि मंडियां राजनीतिज्ञ नहीं बल्कि खेतीबाड़ी के विशेषज्ञों द्वारा चलाई जाएंगी और उन्हें आधुनिक टेक्नोलॉजी से संपन्न कर किसान की उपज बढ़ाने के उपायों पर काम करना होगा।

पांचवीं बात यह कि किसान तक खेती के नए तरीके, आधुनिक उपकरण, खाद, उर्वरक और बिजली पहुंचने के उपाय इस तरह किए जाएं कि उस पर आर्थिक बोझ न पड़े और वह इनका इंतजाम करने में अपना समय न लगाए बल्कि उस तक यह ऑटोमैटिक ढंग से पहुंच जाएं और वह भी लगभग मुफ्त मिलें।

इसी के साथ इन्हें इस्तेमाल करना सीखने के लिए उसे कहीं जाना न पड़े, मतलब यह कि उसके खेत में ही प्रयोगशाला बनाई जाए, शिक्षक वहीं उसे प्रैक्टिकल ट्रेनिंग दें और उसके सामने ही यह सिद्ध हो कि नई टेक्नोलॉजी सही है या पुरानी पारंपरिक तकनीक ज्यादा सही है। किसान पर दबाव न हो क्योंकि वह जो कहेगा या सवाल पूछेगा वह उसके अनुभव पर आधारित होंगे।

थोपने की गलती न हो।

अभी तक किसान पर नई टेक्नोलॉजी के नाम पर बहुत सी चीजें थोपी जाती रही हैं जिनका उसके लिए खास उपयोग नहीं होता। यह ठीक वैसे ही है जैसे कि सिपाही को कोई हथियार तब तक चलाने के लिए नहीं दिया जाता जब तक उसे पूरी तरह सिखा न दिया गया हो। यही बात किसान पर लागू है। हकीकत यह है कि उस तक नई टेक्नोलॉजी या उपकरण आसानी से पहुंच जाएं, यह होता ही नहीं है, उन्हें इस्तेमाल करना सिखाया जाना तो दूर की बात है।

कृषि मेले, प्रदर्शनियां और ऐसे ही तामझाम उसके नाम पर आयोजित होते हैं लेकिन वह किसान के लिए सैर सपाटे से अधिक नहीं होता और वह अपने खेत तक आते आते सब कुछ भूलकर अपने पुराने तरीकों से ही खेतीबाड़ी करने लगता है।

छटी बात यह कि कृषि मंत्रालय, उसके अंतर्गत विस्तार निदेशालय और कृषि अनुसंधान परिषद और उसके द्वारा संचालित कृषि प्रयोगशालाएं कही तो उसके लिए जाती हैं लेकिन उनकी उपयोगिता उसके लिए कितनी है, इस बारे में आजतक कोई अध्ययन नहीं हुआ। इन पर कितना धन व्यय हुआ और इनसे किसको कितना लाभ हुआ इसका आकलन अगर कभी हुआ तो ऐसी तस्वीर सामने आ सकती है जो कमीशन, रिश्वत और आर्थिक षड्यंत्र उजागर कर सकती है।

इनमें काम करने वाले अधिकारी हों या कृषि वैज्ञानिक, वे सभी किसान की दिनचर्या से अनभिज्ञ, सूटबूट पहनकर वातानुकूलित कमरों में बैठकर किसान की भलाई के लिए काम करने का दिखावा करते रहते हैं। उन्हें यह पता नहीं होता कि दफ्तर या लेबोरेटरी में केमिकल की गंध और खेत की मिट्टी की महक में कितना अंतर होता है। जिस तरह किसान यदि किसी प्रयोगशाला में चला जाय तो उसे रसायनों से बदबू आयेगी उसी तरह लैब के कर्मचारी को खेत में दुर्गंध ही आएगी।

नई दिल्ली के पूसा इंस्टीट्यूट के खेतों में विकसित टेक्नोलॉजी या बीज या तकनीक दूर देहात में रहने वाले किसान के लिए लाभकारी होगी, यह मुंगेरी लाल के सपनों जैसा है क्योंकि दोनों जगहों के मौसम या हालात बिल्कुल अलग हैं। इसीलिए अगर प्रयोगशाला हो तो वह किसान के खेत में हो और उसकी जरूरत के अनुसार तय हो और उसकी सलाह को मानने की मानसिकता कृषि वैज्ञानिकों में हो। ऐसा होने पर ही किसान की धरती सोना उगल सकती है।

किसान विद्यालय स्थापित हों

सातवीं बात यह कि किसान को खेतीबाड़ी की शिक्षा देने और उसे सभी नए अविष्कारों, खोज और संसाधनों को बताने का काम करना है तो उसके लिए उसी तरह के किसान विद्यालय खोले जाएं जैसे कि बड़ी उम्र के लोगों के लिए प्रौढ़ शिक्षा केंद्र खोले जाते हैं।

उसके बच्चों को लिए गांव में ही कृषि विद्यालय हों जैसे कि प्राइमरी या मिडिल स्कूल होते है। इनमें उसे सामान्य पढ़ाई के साथ खेतीबाड़ी की शिक्षा का सिलेबस इस तरह का हो जो उसके किसान मातापिता के विचारों के साथ मेल खाता हो ताकि थियोरी और प्रैक्टिकल का तालमेल बना रहे।

आठवीं बात यह कि किसान को नकद पैसे की खैरात न देकर उस तक वे संसाधन पहुंचाए जाएं जिनकी उसे खेती के लिए जरूरत है और जिनका इस्तेमाल कर वह अपनी आमदनी बढ़ा सकता है। मिसाल के तौर पर  75 हजार करोड़ सालाना उसके खाते में डालने के बजाय उसके खेत के लिए खाद, बीज, ट्यूब वेल, ड्रिप इरिगेशन, तालाब, जौहड़ आदि का निर्माण कर स्थाई सुविधाएं मुहैय्या करा दी जाती तो उसके बेहतर परिणाम निकलते।

किसान आंदोलन तो एक न एक दिन अभी या कुछ समय बाद समाप्त हो ही जाना है लेकिन यदि सरकार अपनी सोच में परिवर्तन कर ले और बनावटी किसान हितैषी दिखने के बजाय वास्तविक रूप में किसानों के हित में काम करने लगे तो न तो कानून की खामियों के कारण किसान को आंदोलन करना पड़ेगा और न ही उसकी इतनी फजीहत होगी जो अपनी कहीं बात को वापिस लेने से होती है।