शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

अभियान शुरू तब हों जब उनके पूरे होने का प्रबंध हो

 

कह सकते हैं कि हमारी सरकार घोषणाएं करने में महारथी और संकल्प लेने और तरह तरह के अभियान शुरू करने के मामले में सब से आगे है। अब यह और बात है कि इनके पूरे होने का जिम्मा कोई नहीं लेता, इसलिए ये सभी वक्त की धूल पड़ने से कुछ समय बाद दिखाई भी नहीं देते और न केवल भुला दिए जाते हैं बल्कि अगर कोई याद दिलाए तो एक नया अभियान आगे कर दिया जाता है।

हम अपनी आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं जो गर्व करने और राष्ट्र प्रेम की ज्वाला हृदय में धधकते रहने की भांति है। प्रत्येक देशवासी अपने घर में अपनी राष्ट्रीय पहचान स्वरूप राष्ट्र ध्वज तिरंगा फहराए, यह इस स्वतंत्रता दिवस का संकल्प है। याद आता है कि कभी केवल सरकारी भवनों और राष्ट्रीय समारोहों में अपना झंडा फहराने की परंपरा या इजाजत थी, भला हो कि अदालती कार्यवाही के बाद अब हर भारतवासी कभी भी कहीं भी तिरंगा फहरा सकता है। हालांकि इसके बनाने से लेकर इस्तेमाल, रखरखाव और सुरक्षित रखने के लिए नियम हैं लेकिन अधिकतर लोग जानकारी के अभाव में इसके उपयोग के बाद इसकी तरफ से लापरवाह हो जाते हैं। उम्मीद है कि इस बारे में भी हर घर तिरंगा अभियान में सरल भाषा में जो नियम हैं उनका बड़े पैमाने पर प्रचार प्रसार किया जाएगा।


अभियानों की बाढ़

चार फरवरी 1916 की बात है जब महात्मा गांधी वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर और उसके आसपास फैली गंदगी, कीचड़, पान की पीक देखकर बहुत विचलित हुए और वहां रहने वालों की जबरदस्त भर्त्सना की थी। विडंबना यह है कि लगभग एक सदी तक हम कमोबेश पूरे देश में इसी तरह रहते रहे , यद्यपि गाहे बगाहे सफाई व्यवस्था में सुधार के लिए कोशिशें चलती रहीं लेकिन देशव्यापी अभियान के रूप में भारत के गांवों, कस्बों और शहरों को स्वच्छता का पाठ पढ़ाने की शुरुआत 2014 में बापू के जन्मदिन से हुई।

इसमें कोई संदेह नहीं कि यह खुले में शौच करने के खिलाफ और हर घर में टॉयलेट के इस्तेमाल, रास्तों पर जन सुविधाओं के निर्माण और नागरिकों के मन में सफाई से रहने और इस बारे में अपनी सोच बदलने के बारे में एक ऐसा अभियान था जिसका पूरा होना देश के प्रत्येक नागरिक के भले के लिए आवश्यक था।

कह सकते हैं कि इस दिशा में काफी हद तक सफलता मिली है लेकिन पिछले कुछ समय से इस तरह की खबरें मिल रही हैं कि लोग अपने पुराने ढर्रे पर लौट रहे हैं। इसकी वजह यह नहीं कि सफाई से रहने के प्रति आकर्षण कम हो गया है बल्कि यह है कि सीवर लाईन बिछाने, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट न लगने और देहात हो या शहर, गंदगी भरे नालों से मुक्ति न मिलने तथा सबसे बड़ी बात यह कि वैज्ञानिक ढंग और देश में ही विकसित टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल में कोताही के कारण लोगों में निराशा बढ़ रही है।

हमारा मतलब व्यर्थ की आलोचना करना नहीं बल्कि यह है कि अटल जी की सरकार में जो निर्मल भारत अभियान शुरू हुआ था, उसकी खामियों और असफल रहने के कारणों को नजरंदाज न करते हुए स्वच्छ भारत अभियान चलाया जाता तो उसके नतीजे कुछ और ही होते। सीवेज डिस्पोजल की सही व्यवस्था न तब थी और न अब है। टॉयलेट में पानी की जरूरत के बारे में पहले भी ध्यान नहीं दिया गया और न अब, केवल शौचालय बनाना ही काफी नहीं, उसके लिए घर के बाहर गंदगी जमा न होने देने के लिए नालियों का इंतजाम और उनकी निरंतर सफाई होने और गंदगी का ट्रीटमेंट प्लांट तक पहुंचने की व्यवस्था भी आवश्यक है।

कुछ साल पहले बड़े जोरशोर से स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम शुरू किया गया था, उसकी नियति क्या हुई, किसी से छिपा नहीं और यह सरकार की विफलता का एक बदनुमा प्रमाण बन गया। अब तो इसकी कोई बात ही नहीं करता जबकि बेरोजगारी दूर करने में यह गेमचेंजर बन सकता था।

इसी तरह स्वस्थ भारत अभियान चलाया गया जो बिना इस बारे में कोई प्रबंध किए शुरू हो गया जिसमें हमारे देश में ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की खराब हालत को पहले सुधारना और व्यवस्थित करना आवश्यक था। अभी भी यहां डॉक्टर नहीं जाते, गर्भावस्था और प्रसव के बाद देखभाल नहीं होती, पौष्टिक खुराक का मिलना तो दूर, तुरंत मजदूरी करने जाने की मजबूरी है, बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर ही इन इलाकों में नहीं है तो ग्रामीण भारत कैसे स्वस्थ रह सकता है।

इसी कड़ी में जन आरोग्य और जन स्वास्थ्य अभियान चलाए गए जिनका कोई अतापता नहीं है। केवल मुफ्त इलाज की सुविधा से सेहतमंद नहीं रहा जा सकता, उसके लिए बड़े पैमाने पर अस्पताल, डिस्पेंसरी, डॉक्टर, नर्स और अन्य स्टाफ चाहिए जिसकी कितनी कमी है, यह बताने की न तो जरूरत है और न ही कोई आंकड़े देने की क्योंकि सरकारी खानापूर्ति के लिए जाली और भ्रामक दस्तावेज तैयार करने में सभी सरकारों को महारत हासिल है।

देश में शिक्षा को लेकर अक्सर चिंता प्रकट की जाती है लेकिन इसके लिए बजट में इजाफा करने के बजाय हर साल कटौती कर दी जाती है। स्कूलों की दशा सुधारने का काम शहरों में होता है, देहात में उनके बनने, खुलने और विद्यार्थियों के पढ़ने जाने का निर्णय सरपंच, मास्टर और दबंग नेता करते हैं। इसका प्रमाण यह है कि विषय कोई भी हो, विद्यार्थी के लिए उसकी जानकारी होना जरूरी न होकर केवल पास होकर अगली कक्षा में पढ़ने जाना है। अध्यापकों और पढ़ने वालों के ज्ञान के नमूने अक्सर सुर्खियों में रहते हैं।

अक्सर आपसी बातचीत और नेताओं के भाषणों में पर्यावरण संरक्षण मतलब प्राकृतिक साधनों जैसे वायु, जल, जंगल, जमीन, नदी, पर्वत, पशु, जीव जंतुओं और जीवन के लिए आवश्यक सामग्री को बचाए रखने के महत्व का जिक्र सुनने में आता रहता है। इसमें गंभीरता इसलिए नहीं होती क्योंकि यदि इन सभी चीजों के अनावश्यक इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई तो इससे सरकार, नेता और अधिकारियों के व्यक्तिगत स्वार्थ पूरे होने के रास्ते में रूकावट आ जायेगी।

प्रति वर्ष जो यह देश भर में नदियों में उफान, बाढ़ का तांडव और जन तथा धन की हानि होती है या फिर सूखे के कारण भयंकर बर्बादी होती है, रेगिस्तान का फैलाव होता है, तो क्या इसे रोकने के लिए सरकार के पास संसाधनों का अभाव है, नहीं ऐसा कतई नहीं है, बल्कि सच यह है कि यह सब जिन्हें हम अक्सर प्राकृतिक आपदा या कुदरत का कहर कह कर बचने की कोशिश करते हैं, यह एक साजिश की तरह है जिसमें अधिकारी, स्थानीय नेता से लेकर राज्य और केंद्र सरकार के मंत्री, सभी शामिल हैं।

अगर यह सब हर साल न हो तो फिर बाढ़, सूखा, अतिवृष्टि और संपत्ति के नष्ट होने के ऐवज में राहत के नाम पर धन की हेराफेरी करने पर अंकुश लग सकता है जो किसी को मंजूर नहीं है।

यह सब समझना कि ज्यादातर अभियान जनता के हित के लिए नहीं, कुछ मुठ्ठी भर लोगों की स्वार्थपूर्ति के लिए चलाए जाते हैं, कोई टेढ़ी खीर नहीं है बल्कि आसानी से समझ में आ जाने वाली साधारण सी बात है। इसलिए क्या यह जरूरी नहीं लगता कि जब भी कोई अभियान शुरू करने की घोषणा हो, जनता की तरफ से तर्क के आधार पर उसकी समीक्षा के बाद उसका समर्थन या विरोध करने की आदत डालना देशवासियों के लिए आवश्यक है?


शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

वैज्ञानिक सोच नास्तिक होना या धर्म को न मानना नहीं है

 

अक्सर यह बात सुनने को मिलती है कि हमारी सोचने समझने की योग्यता का आधार विज्ञान के अनुसार अर्थात वैज्ञानिक होना चाहिए। परंतु यह कोई नहीं जानता कि यह आधार क्या है? क्या यह कोई ऐसी वस्तु हैं जो कहीं बाजार में मिलती है, मोलभाव कर उसे हासिल किया जा सकता है या फिर इसका संबंध परंपराओं, धर्म के अनुसार की गई व्याख्याओं और पूर्वजों द्वारा निर्धारित कर दिए गए जीवन के मानदंडों से है ?


विज्ञान के सरोकार

विज्ञान का अर्थ यह लगाया जा सकता है कि ऐसा ज्ञान जो विशेष हो, उसे प्राप्त करने के लिए तथ्यों और तर्कों की कसौटियों से गुजरना पड़ा हो, वह इतना लचीला हो कि उसमें चर्चा, वादविवाद, शोध के जरिए परिवर्तन और संशोधन किया जा सके।

एक छोटा सा उदाहरण है। तेज़ हवा चलने से घर के खिड़की दरवाजे कई बार बजने, आवाज करने लगते हैं। कुछ लोग कह सकते हैं कि यह कोई भूत है जो खड़कड़ कर रहा है लेकिन दूसरा सोचता है कि कहीं इसकी चैखट तो ढीली नहीं पड़ गई और वह जाकर उसे कस देता है। आवाज़ आनी बंद हो जाती है।

यही वह ज्ञान है जो सामान्य से अलग है इसलिए यह विज्ञान कहा जाता है। हमारे संविधान में भी इस बात की व्यवस्था है जिसके अनुसार हमारे फंडामेंटल कर्तव्यों का पालन वैज्ञानिक ढंग से सोच विचार कर किया जाना चाहिए। इससे ही लोकतंत्र सुरक्षित और मानवीय गुणों का विकास हो सकता है।

जब हमें किसी बात पर उसके सही होने के बारे में संदेह होता है, उसे जांचने परखने के लिए उत्सुकता होती है तो यहीं से वैज्ञानिक सोच की शुरुआत होती है। इसके विपरीत जब किसी बात को केवल इसलिए माना जाए कि उसे पूर्वजों ने कहा है, उनकी परंपरा का निर्वाह कर्तव्य बन जाए, उसमें कतई बदलाव स्वीकार न हो तब यह कट्टरपन बन जाता है और यही लड़ाई झगडे, मनमुटाव और शत्रुता का कारण बन जाता है।

जो लोग यह कहते हैं कि विज्ञान में ईश्वर या परम सत्ता या किसी भी नाम से कहें, उसका कोई महत्व नहीं है तो यह अपने आप को भुलावे में रखने और वास्तविकता को स्वीकार न करने के बराबर है। हमारी सभी वैज्ञानिक प्रयोगशालायें और उनमें शोध और एक्सपेरिमेंट कर रहे सभी लोग चाहे सामने होकर यह न मानें कि परमेश्वर जैसी कोई चीज़ है लेकिन वे भी अपने अंतःकरण में मानते हैं कि कुछ तो है जो उनकी कल्पना से परे है, समय समय पर किसी अदृश्य शक्ति का नियंत्रण महसूस होता है।

कुछ लोग धर्म और धार्मिक विधि विधान को मानना अवैज्ञानिक कहते हैं और उनमें आस्था रखना और हवन, पूजन और कर्मकांड जैसी चीजों का उपहास करते हैं। इस बारे में केवल इतना कहा जा सकता है कि जब यह सब करने के लिए चढ़ावा, दिखावा धन की मांग और न देने पर ईश्वर का प्रकोप, दंड मिलने और अहित होने जैसी बातों के बल पर लूटखसोट, जबरदस्ती और शोषण किया जाए तो यह अपराध की श्रेणी में आता है। इसका विज्ञान से कोई संबंध नहीं है वरना तो इन सब चीजों के करने से वातावरण शुद्ध होता है, मानसिक और भावनात्मक तनाव कम होता है, मन केंद्रित होता है और शरीर में नवीन ऊर्जा का संचार होता है।

हमारे जीव, प्राणी और वन विज्ञान ने अनेक ऐसी संभावनाओं को हकीकत में बदला है जिन पर आश्चर्य हो सकता है। औषधियों के तैयार करने में जीवों से प्राप्त किए गए अनेक प्रकार के ठोस और तरल पदार्थ, जड़ी बूटियों के सत्व और प्राकृतिक तत्वों के मिश्रण का इस्तेमाल होता है और बाकायदा बने एक सिस्टम से गुजरने के बाद उनके प्रयोग की इज़ाजत दी जाती है। इसके स्थान पर यदि कोई व्यक्ति झाड़फूंक, गंडे ताबीज़, भभूत जैसी चीजों से ईलाज करने की बात करता है तो यह अपराध है क्योंकि विज्ञान इन्हें मान्यता नहीं देता। कोरोना जैसी महामारी से लेकर किसी भी दूसरे रोग की चिकित्सा दवाई, वैक्सीन, इंजेक्शन से होती है न कि किसी पाखंडी और झोलाछाप लोगों के इलाज़ से, इसलिए यह लोग भी अपराधी हैं।

विज्ञान का आधार हमेशा से तर्क यानी जो है उस पर शक या संदेह करना है। इसका मतलब यह है कि जो चाहे सदियों से चला आ रहा है लेकिन जिसकी सत्यता का कोई प्रमाण नहीं है और जो केवल परंपरा निबाहने के लिए होता रहा है, उसे न मानकर नई शुरुआत करना वैज्ञानिक है ।

यहां इस बात का ज़िक्र करना आवश्यक है कि जो लोग गणेश जी को प्लास्टिक सर्जरी का उदाहरण मानते हैं और इसी तरह की निराधार बातों का समर्थन करते हुए आधुनिक विज्ञान और टेक्नोलॉजी को चुनौती देते हैं, वे समाज का अहित कर रहे हैं और देश को आगे बढ़ाने के स्थान पर पीछे ले जाने का काम कर रहे हैं।


विज्ञान और धर्म

कोई भी धर्म किसी कुरीति या मानवता विरोधी काम का न तो समर्थन करता है और न ही मान्यता देता है, इसलिए धर्म अवैज्ञानिक नहीं है। इसी प्रकार चाहे कोई भी धर्म अपनी निष्ठा किसी भी अवतार, गुरु, पैगंबर, यीशु, तीर्थंकर, बुद्ध आदि महापुरुषों में रखे तो यह विज्ञानसम्मत है। इसलिए विज्ञान और धर्म का गठजोड़ तर्कसंगत है।

भारत तो अपनी प्राचीन संस्कृति, वैज्ञानिक उपलब्धियों और उनकी वर्तमान समय में उपयोगिता के बारे में विश्व भर में जाना जाता है जिसके कारण हम अनेक क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। तब फ़िर उन सब बुराइयों को ढोते हुए चलना कतई समझदारी नहीं है जो हमें दूसरों की नज़रों में हंसी का पात्र बनाती हैं।

वैज्ञानिक सोच और उसके आधार पर जब हमारे देश में सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक निर्णय लेने की शुरुआत एक अनिवार्य प्रक्रिया के रूप में हो जाएगी, तब ही हम गरीबी, बेरोज़गारी और विदेशों में प्रतिभा के पलायन को समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठा पाएंगे।  


शनिवार, 23 जुलाई 2022

आदिवासी राष्ट्रपति होने का अर्थ जनजातियों, वनवासियों की उन्नति है

 

राष्ट्रपति के रूप में आदिवासी महिला द्रौपदी मुर्मू का चुनाव क्या हमारे ट्राइबल क्षेत्रों की समस्याओं का समाधान कर पाएगा, निवासियों को शोषण से मुक्ति दिला पाएगा और उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ पाएगा ? यह एक ऐसा यक्ष प्रश्न है जिसका उत्तर केवल भविष्य के गर्भ में छिपा है।

इतिहास से सीख

ब्रिटिश शासन में आदिवासियों को जन्मजात गुनहगार और अपराधी मानकर सभी तरह के अत्याचार करने की खुली छूट का कानून बनाया गया था जिसका पालन आजादी के बहुत बाद तक होता रहा। जब यह बात बहुत अधिक जुल्म होने के बाद किसी तरह पहले प्रधानमंत्री नेहरू जी के पास पहुंची तो वे बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने आदिवासियों को विमुक्त जनजाति का नाम देकर और इस संबंध में कानून बनाकर इस काम की इतिश्री अपनी ओर से कर दी। परंतु स्थिति पहले जैसी ही रही।

जो लोग आदिवासी बहुल इलाकों में गए हैं या उन्हें वहां काम करने और व्यवसाय करने का मौका मिला है, वे इस बात को अगर सच्चे मन से स्वीकार करेंगे तो अवश्य ही यह कहेंगे कि चाहे कानून हो लेकिन वहां के मूल निवासियों का शोषण बंद नहीं हुआ है, वे स्वयं भी यह करते रहे हैं और पुलिस तथा प्रशासन द्वारा किए जाने पर भी चुप रहे हैं। नतीजा बाहरी लोगों द्वारा अपना मतलब निकलने तक का विकास, सरकारी योजनाओं की बंदरबांट और प्राकृतिक संसाधनों विशेषकर जल, जंगल और जमीन पर कब्जा कर स्थानीय लोगों को अपना गुलाम समझने के रूप में हुआ है।

व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कुछ उदाहरण इस कथन की पुष्टि के लिए काफी हैं। दूरदर्शन, पैरामिलिट्री फोर्स और कुछ अन्य संस्थानों के लिए नॉर्थ ईस्ट के इलाकों में फिल्में बनाते समय सरकारी नियमों और कानूनों की धज्जियां उड़ते देखकर समझ में आ गया कि जब तक स्थानीय स्तर पर लोग शिक्षित नहीं होंगे, बड़े शहरों में पढ़ने लिखने के बाद यहां वापिस नहीं आयेंगे और सरकारी नीतियों को लागू करने का काम स्वयं नहीं करेंगे तब तक इन इलाकों की तस्वीर बदल पाना संभव नहीं है।

विश्वास और भरोसा

ग्रामीण मंत्रालय के लिए रेडियो कार्यक्रम चलो गांव की ओर का प्रसारण उत्तर पूर्व की प्रमुख आठ भाषाओं या बोलियों में करने का आदेश मिला तो सबसे पहली समस्या दिल्ली में इन प्रदेशों से आकर रहने वालों में से ऐसे व्यक्तियों से संपर्क करने की थी जो हिंदी में बनने वाले मूल प्रोग्राम का अपनी भाषा में रूपांतर कर सकें। किसी तरह इन तक पहुंच बनाई तो पाया कि उन्हें हम पर तनिक भी विश्वास नहीं है। कारण यह था कि दिल्ली सहित सभी बड़े शहरों में रहने वाले लोगों ने उन्हें अपना नहीं माना, अनेक अपमानजनक शब्द उनके लिए इस्तेमाल किए, किराए पर घर देते समय ऐसी बंदिशें लगाईं कि वे अपने तीज त्यौहार भी न मना सकें, अपनी पसंद का खानपान भी न कर सकें और यही नहीं उनकी पोशाक, चलने फिरने और रहने सहने की आदतों पर भी अंकुश लगाने लगे।

बहुत समझाने पर वे यह प्रोग्राम करने को तैयार हुए, शुरू में हाथ के हाथ तय फीस मिलने पर राजी हुए। एक बार जब विश्वास हो गया कि उनका शोषण नहीं होगा, कोई उनसे अभद्र भाषा में बोलने या व्यवहार करने की हिम्मत नहीं करेगा और उनकी व्यक्तिगत और पारिवारिक उलझनों को सुलझाने का प्रयास होगा, तब कहीं जाकर उनका पूर्ण सहयोग मिल सका। भरोसे की यह कड़ी आज तक कायम है।

नॉर्थ ईस्ट के लगभग सभी प्रदेशों में जाने पर यह समझने में देर नहीं लगी कि आदिवासियों की जीवन शैली समझने और उनके रस्मों रिवाज को जानने तथा उन्हें उनके पारंपरिक तरीके अपनाने में कोई रुकावट न डालने से ही उनका भला हो सकता है।  उनकी अपनी न्याय और पंचायत व्यवस्था है, वन संरक्षण की अपनी विधियां हैं, खेतीबाड़ी के अपने तरीके हैं, रोजगार की अपनी अलग पहचान है, जरूरत केवल उन तक आधुनिक टेक्नोलॉजी और उसका इस्तेमाल करने के तरीके पहुंचाने की है।

एक दूसरा उदाहरण ओड़ीसा के झारसुगुड़ा जिले में दर्लीपली गांव का है जहां एनटीपीसी का प्लांट है। इस आदिवासी इलाके में गरीबी के कारण ये लोग अपने मृतकों का दाह संस्कार और उनकी अस्थियों का नदी में विसर्जन न कर पाने से शव को जमीन में गाड़ देते थे। वे अपनी जमीन समुचित मुआवजा मिलने पर भी नहीं दे रहे थे क्योंकि इससे उनके पूर्वज बिना विधिवत संस्कार के उखड़ जाते। अनेक प्रयासों के बाद अधिग्रहण करने वाले अधिकारी हकीकत समझ पाए और उन्हें  समझा पाए कि यह काम वे सरकारी अनुदान से अपनी इच्छानुसार कर सकते हैं और सभी पूजा पाठ, अस्थि विसर्जन में लगने वाली राशि उन्हें अलग से मिलेगी, तब कहीं जाकर वे अपनी जमीन देने पर सहमत हुए। अनुमान लगाएं कि यदि यह समझदारी न बरती जाती तो विद्रोह, मारपीट से लेकर खून खराबा तक हो सकता था और प्लांट कभी भी न लग पाता।

ओडिसा सहित अनेक आदिवासी क्षेत्रों के घने जंगलों, वनस्थलियों के पार, नदी, नालों के उफान और कुदरती कहर से त्रस्त तथा घोर समस्याओं से जूझ रहे आदिवासियों तक पहुंच कर अपनी आंखों से उनकी जरूरत समझने और पूरा करने का काम पिछले कुछ वर्षों में होते हुए देखा है। इसी प्रकार मध्य प्रदेश में पहली बार आदिवासी बहुल इलाकों में ग्राम पंचायतों में आदिवासी सदस्यों के बैठने के लिए सुविधाजनक कुर्सी मेज और कॉन्फ्रेंस रूम जैसी सुविधाएं देखकर लगा कि इनके प्रति सम्मान का भाव पैदा हो रहा है। वरना तो चाहे कितना भी समृद्ध आदिवासी हो, उसे जमीन पर झुक कर बैठ कर ही अपनी बात कहनी होती थी।

आदिवासी समाज और आत्मनिर्भरता

जब तक आदिवासी समाज और संस्कृति को गणतंत्र दिवस तथा अन्य आयोजनों में उन्हें एक दिखावटी वस्तु समझने की मानसिकता से ऊपर नहीं उठेंगे, उनका शोषण नहीं रुकेगा। वास्तविकता यह है कि यह समाज अपने भरण पोषण की जरूरतें पूरा करने और आत्मनिर्भर होने में शहर वालों से कहीं अधिक सक्षम है। उन्हें दिखावा करना नहीं आता, छल कपट से दूर रहते हैं, मानव धर्म का निर्वाह करने और वन्य जीवों के साथ तालमेल बिठा कर उनका संरक्षण और संवर्धन करने में उनका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। यही नहीं वे अपने पारंपरिक अस्त्र शस्त्रों से शत्रुओं का सामना करने में समर्थ हैं। उनकी मर्जी के बिना उनके इलाकों में प्रवेश कर पाना नामुमकिन है।

जब तक आदिवासियों, वनवासियों और जनजातियों के स्वाभाविक गुणों को समझकर उन्हें अपने साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए हमारी ओर से पहल नहीं होगी, उनका विश्वास अर्जित करने के प्रयत्न नहीं होंगे, उनकी सोच के अनुसार नीतियां और योजनाएं नहीं बनेंगी, तब तक उनका सहयोग मिलने की बात बेकार है।

हमारा हाल यह है कि उनकी संस्कृति, पहनावे, खानपान से लेकर लोक संगीत, नृत्य, कला में उनकी परंपराओं का सस्ते दामों में सौदा करने में निपुण हैं और इस सब को महंगे दामों में बेचकर मुनाफा कमाने में माहिर हैं। अगर कोई इंकार करे तो पुलिस और प्रशासन अपनी मनमानी से लेकर इन सीधे लोगों पर अमानुषिक अत्याचार करने से नहीं चूकता।

महामहिम राष्ट्रपति से उम्मीद की जा सकती है कि वे अपने कार्यकाल में आदिवासियों को राजनीतिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने में सफल होंगी। उनकी प्रकृति को बदले बिना उनके रक्षक प्राकृतिक स्रोतों के गैरजरूरी दोहन को रोकने में समर्थ होंगी। यह समाज आबादी के हिसाब से चाहे ग्यारह करोड़ के आसपास हो लेकिन इसकी क्षमता, ताकत और हिम्मत इतनी है कि समस्त भारत का गौरव बन सकता है। यह तब ही हो सकता है जब इनके साथ दुर्व्यवहार न हो, इनका शोषण न होने दिया जाए और इनके अधिकारों को किसी दूसरे के द्वारा हड़प लिए जाने की आशंका न हो।  


शनिवार, 2 जुलाई 2022

प्लास्टिक कानून व्यावहारिक न होने से उन्हें लागू करना अनुचित है

 

इसे परंपरा कहें या अपना बड़प्पन दिखाने की कोशिश या फिर अपनी धाक से लेकर धौंस जमाने की मानसिकता और हठधर्मी कि जो सरकार करे वही ठीक, चाहे वास्तविकता कुछ भी हो !

यही प्रवृत्ति सरकार के उस आदेश में दिखाई देती है जिसके अनुसार जुलाई से सिंगल यूज प्लास्टिक पर बैन लगा दिया गया है।


प्लास्टिक कथा

उन्नीसवीं सदी के मध्य में प्लास्टिक के रूप में एक ऐसी खोज हुई जिसने तेजी से पूरी दुनिया में अपनी धूम मचा दी। उसके बाद प्लास्टिक के इस्तेमाल से होने वाले नुकसान जैसे जैसे सामने आते गए, इस पदार्थ का विकल्प खोजा जाने लगा लेकिन अभी तक इसमें बहुत कम सफलता मिली है लेकिन भविष्य में कुछ भी हो सकता है।

प्लास्टिक के आने से पहले कागज से बनी चीजों का इस्तेमाल होता था जो महंगा भी था और उसके लिए पेड़ों को काटना पड़ता था। इसके साथ ही न तो यह वस्तुएं ज्यादा देर तक टिकती थीं और न ही इनमें रखकर लाई जाने वाली चीजें।  इसके अतिरिक्त  उनके निपटान यानी डिस्पोजल की समस्या भी थी।

यह दौर उद्योग धंधों के पनपने और उपभोक्ताओं के लिए प्रतिदिन नई चीजों के आने का था जिन्हें रखने के लिए प्लास्टिक से बनी टिकाऊ और सस्ती थैलियों का इस्तेमाल होने लगा। इसी तरह खाने पीने में प्लास्टिक के कप, ग्लास, प्लेट, नली, क्रॉकरी, कटलरी और बहुत सी दूसरी सामग्री ने घर घर में अपनी जगह बना ली। इस तरह प्लास्टिक हमारे जीवन का अनिवार्य अंग बन गया जिसके बिना कुछ भी करना संभव नहीं रहा।

अब इसी प्लास्टिक पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए हैं जिन्हें लागू करना न तो आसान है और न ही प्रैक्टिकल क्योंकि इसके विकल्प के रूप में केवल यही है कि हम कागज से बनी चीजों का इस्तेमाल फिर से शुरू कर दें।

कानून का पालन न करने और पकड़े जाने पर पांच साल की कैद और एक लाख तक का जुर्माना हो सकता है। कुछ राज्यों ने तो ऐसे दिशा निर्देश जारी किए हैं कि यदि कोई प्लास्टिक की थैली में घर का सामान लाते हुए पकड़ा गया तो उस पर कड़ी कार्यवाही होगी। ऐसे आदेशों से समाज में अफरातफरी और उसके बाद वसूली का धंधा ही बढ़ेगा।

सच यह भी है कि लगभग एक लाख छोटे, मध्यम उद्योग इस कारोबार में हैं और लाखों नहीं करोड़ों लोग इसके व्यापार से जुड़े हैं। प्लास्टिक बंदी से क्या अंधेर नगरी चैपट राजा की कहावत सिद्ध नहीं होती और समाज में अव्यवस्था फैलने का खतरा नहीं है ? यह भी हो सकता है कि इस कानूनन बंदी का कोई असर ही न हो और उद्योगपति, व्यापारी तथा उपभोक्ता कुछ ले दे कर इसके उल्लंघन होने पर बचने का रास्ता निकाल लें।


प्लास्टिक प्रदूषण

इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्लास्टिक के इस्तेमाल में अनेक दोष हैं, जैसे कि इसके डिस्पोजल का कोई सही प्रबंध न होने से यह बहुत घातक हो सकता है । मनुष्य से लेकर पशुओं तथा जलचरों के लिए नुकसानदायक है। अक्सर सड़कों, नदी के किनारों और समुद्र तट पर प्लास्टिक की बोतलें और कचरा बिखरा हुआ दिखाई देता है। अब क्योंकि इसके डिस्पोजल का कोई उचित प्रबंध सरकार से हुआ नहीं तो फिर इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने का कोई औचित्य नहीं बनता।

इसके विपरीत प्लास्टिक अपने गुणों के कारण, उसमें रखी वस्तुओं के देर तक तरोताजा रहने और पूरी तरह से कीटाणु रहित होने अर्थात हाइजीनिक होने से इसका इस्तेमाल न करना संभव नहीं है।

जब ऐसा है तो प्लास्टिक के दोषों का निराकरण करने का कानून बनाया जाता, उसका ऐसा विकल्प दिया जाता जो अपनी उपयोगिता में प्लास्टिक के बराबर होता और इसके साथ ही उसके निपटान के लिए वेस्ट मैनेजमेंट के जरिए उपकरण और प्लांट्स लगाए जाते, तब तो बात समझ में आती। 


टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल

ऐसा नहीं है कि इस दिशा में कोई काम नहीं हुआ। देश के कुछ राज्यों में प्लास्टिक प्रदूषण से बचने के लिए प्लांट्स लगे हैं लेकिन वे अपनी सीमित क्षमता के कारण बेअसर साबित हो रहे हैं। अपने देश के आकार और आबादी के सामने ये ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं। नतीजा यही है कि नदियों से लेकर समुद्र तक प्लास्टिक प्रदूषण फैलता जा रहा है।

ऐसा भी नहीं है कि यह समस्या केवल हमारे देश की हो, यह विश्वव्यापी है। जिन देशों ने इस समस्या के विकराल रूप लेने से पहले कदम उठा लिए, वे आज प्लास्टिक के फायदों का लाभ उठा रहे हैं और साथ ही उसके प्रदूषण से बच भी रहे हैं। प्रतिबंध लगाना तब ही सही हो सकता है कि जब उसका कोई समान विकल्प हो। सिंगल यूज प्लास्टिक जैसी कोई वस्तु जब तक खोज नहीं ली जाती, तब तक के लिए इस पर रोक लगाने के बारे में सरकार को व्यवहारिक दृष्टिकोण से विचार करना होगा। ऐसी नीति और कानून व्यवस्था लागू करनी होगी कि प्लास्टिक के लाभ मिलते रहें और स्वास्थ्य की रक्षा भी हो जाए।

एक बार इस्तेमाल कर फेंक दिए जाने वाले प्लास्टिक को रीसाइकल कर बहुत से उपयोगी पदार्थों में बदला जा सकता है। ऐसा नहीं है कि हमारा उद्योग जगत यह बात नहीं जानता लेकिन उसके सामने रीसाइक्लिंग प्लांट लगाने की पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं, इसकी लागत बहुत ज्यादा होने और मुनाफा कम होने और इसके साथ ही टैक्स और दूसरी सुविधाओं का आकर्षण न होने से इसमें बहुत कम निवेश हो रहा है।

ऐसा भी नहीं है कि हमारे देश में इस दिशा में अनुसंधान नहीं हो रहा या प्लास्टिक डिस्पोजल के लिए टेक्नोलॉजी का अभाव है। हमारी वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं, विशेषकर वे जो पर्यावरण प्रदूषण रोकने के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं, उन्होंने सस्ती और टिकाऊ टेक्नोलॉजी विकसित की हुई हैं। अफसोस की बात यह है कि जब सरकारी संस्थान ही उनका इस्तेमाल नहीं करते तो फिर प्राइवेट सेक्टर से इसकी उम्मीद रखना व्यर्थ है।

सिंगल यूज प्लास्टिक के इधर उधर फेंकने से हमारे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में नाले और नालियां भरे पड़े हैं जो गंदगी और बदबू के अतिरिक्त कुछ नहीं देते, स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हैं और अनेक बीमारियों का कारण हैं। यदि सरकार चाहे केंद्र की हो राज्य की, इन गंदे नालों से ही अपने देश में विकसित टेक्नोलॉजी से सफाई कराने की जिम्मेदारी ले ले तो फिर किसी तरह का प्रतिबंध लगाने की जरूरत नहीं रहेगी।

उदाहरण के लिए नागपुर स्थित नीरी प्रयोगशाला ने ऐसी टेक्नोलॉजी बहुत वर्ष पहले विकसित कर ली थी जिसके इस्तेमाल से इन नालों को प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्त किया जा सकता है। उसके पानी को साफ करके नाले के आसपास हरियाली के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी तरह निजी क्षेत्र में पीरामल समूह की वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं बहुत सराहनीय कार्य कर रही हैं।

एक उदाहरण अमेरिका का है। वहां एक ऐसा सिस्टम है कि प्रदूषण होते ही या उसकी संभावना होने पर तत्काल टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को अनिवार्य बना दिया गया है।


सरकार पुनर्विचार करे

यदि सरकार में इच्छाशक्ति है और वह वास्तव में प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्ति दिलाकर देशवासियों का भला करना चाहती है तो उसे अपने वर्तमान आदेश को रद्दी में डालकर नए सिरे से सोचना होगा। यहां यह बताना कि सरकार को इन सब अनुसंधानों और खोजपूर्ण तथ्यों की जानकारी नहीं है तो यह एक भ्रम है। सरकार सब कुछ जानती है लेकिन हो सकता है कि अपने राजनीतिक स्वार्थ या फिर किसी अन्य कारण से कम से कम इस मामले में तो सही कदम नहीं उठा रही।


शनिवार, 25 जून 2022

समय के साथ सिद्धांत, मूल्य, नैतिकता का बदलना आवश्यक नहीं है।

 एक कहावत है, जहां देखी तवा परात, वहां गंवाई सारी रात। इसका सीधा सा अर्थ है कि जिस स्थान पर पेट भरने का साधन हो, जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं का अभाव न हो, रहने की व्यवस्था हो और अपना अंत समय आने तक आराम से रहा जा सके, वह सर्वश्रेष्ठ है।


जीवन की राह

जन्म से लेकर मृत्यु तक की यात्रा में अनेक पड़ाव आना निश्चित है, जिन्हें व्यक्ति अपनी सामथ्र्य और इच्छा के अनुसार पार भी करता है। अपने स्वभाव के अनुसार सिद्धांत और मूल्य बनाता है।  यही नहीं, अपनी जरूरतों को पूरा करने के साथ साथ स्वयं अपने और दूसरों के लिए नैतिकता, ईमानदारी, भलमनसाहत तथा व्यवहार के मापदंड तैयार कर लेता है और अपेक्षा करता है कि वर्तमान और भविष्य की पीढियां उनका पालन करें। बहुतों ने अपना वर्चस्व यानि कि यह मनवाने के लिए कि वह औरों से श्रेष्ठ है, अपने नाम से उन्हें प्रसिद्ध और नैतिकता परखने की कसौटी के रूप में प्रचारित भी किया है। 

प्राचीन काल के हमारे ग्रंथों में कहा गया है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की धुरियों पर हमारा जीवन टिका है। इनकी व्याख्या करने के लिए सत्य, अहिंसा, आस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य के पांच सूत्र भी बनाए। इन पर चलने के लिए दूसरों के प्रति आदर, सहानुभूति, प्रेम और मानवीयता का व्यवहार करने की परंपरा बनाई ताकि सुख शांति से और मिलजुलकर जीवन का मार्ग तय हो जाए।

यह एक आदर्श स्थिति हो सकती है लेकिन इसके विपरीत जीवन में ईष्र्या, द्वेष, अहंकार जैसी प्रवृत्तियां कहां से आ गईं, यही नहीं वे मनुष्य पर हावी भी हो गईं और बेईमानी, छल कपट और धोखाधड़ी एक सामान्य व्यवहार बन गया।

इसका अर्थ यही है कि जीवन में चाहे सहनशीलता, संवेदना, परस्पर आत्मीयता और एक दूसरे के प्रति सद्भावना का कोई स्थान हो या न हो पर सफल होने के लिए किसी भी साधन को अपनाने में कोई बुराई नहीं है चाहे उसका स्वरूप अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार और नैतिक पतन ही क्यों न हो?


आधुनिकता और नैतिकता

क्या कभी इस बात पर गंभीरता से विचार किया गया है कि हमारे देश में चैदह पन्द्रह वर्ष से पैंतीस से चालीस वर्ष के युवा वर्ग के लिए अपराधों में हिस्सा लेना, हिंसक व्यवहार करना, नशे और ड्रग्स का सेवन और किसी भी कीमत पर अपनी धाक जमाए रखना जीवन शैली बन गया है ?

इसे आधुनिकीकरण, शहरीकरण या वैश्वीकरण कहकर किनारे नहीं किया जा सकता क्योंकि यह एक वास्तविकता है कि जिन देशों में इस तरह के व्यवहार पनपे, उनका पतन होने में अधिक समय नहीं लगा और निश्चित रूप से वहां की अर्थव्यवस्था बिगड़ी ही नहीं बल्कि बेकाबू होकर उस देश को ले डूबी।

इन देशों में निरंकुश शासक अपनी शोषण करने की आदत के बल पर अपनी प्रजा को विदेशी दासता से बचा नहीं पाए, अब चाहे यह राजनीतिक हो, आर्थिक हो, सामाजिक हो या फिर उन पर कब्ज़ा हो। और जब दुनिया इतनी छोटी हो गई है कि कुछ भी छिपाना आसान नहीं है तो फिर यह सोचने का यही सही वक्त है कि हम अपने देश में ऐसी परिपाटी को अपनी जड़ न मजबूत होने दें जिससे अनैतिक आचरण करना मामूली बात समझी जाने लगे।

ऐसी शिक्षा व्यवस्था को क्या कहेंगे जिसमें पढ़ाया तो यह जाता हो कि जीवन में ईमानदारी का होना आवश्यक है लेकिन घर, परिवार और समाज में यह देखने को मिले कि बेईमानी, रिश्वतखोरी, अत्याचार और कदम कदम पर भेदभाव करना एक सामान्य व्यवहार माने जाने की परंपरा है और उसका पालन करना अनिवार्य है ?

शिक्षा का उद्देश्य केवल जब इतना रह जाए कि जीवन में सुख सुविधाओं का अंबार लगाया जाए, उसके लिए कोई भी रास्ता अपनाने पर रोक न हो, कुछ भी करने की छूट हो और इसके साथ ही अगर किसी की नज़र में आ गए तो बच निकलने के अनेक रास्ते हों, तब समझना चाहिए कि देश का पतन होना निश्चित है।

इसे और स्पष्ट रूप से कहना हो तो कह सकते हैं कि अपने व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति के लिए सत्ता का दुरुपयोग करना सामान्य घटना बन जाए और किसी का उत्पीड़न और शोषण समाज को विचलित न कर सके। ऐसी स्थिति होने पर यदि पीड़ित शस्त्र उठा लें, आंदोलन का रास्ता अपना लें और किसी भी प्रकार से अपने साथ हुई ज्यादती का बदला लेने निकल पड़ें तो इसमें आश्चर्य क्यों होना चाहिए ?

डार्विन का सिद्धांत सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट का यह अर्थ तो कदापि नहीं है कि जो समर्थ है, ताकतवर है, वह कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र है। उस पर न कोई दोष लग सकता है और उसे यदि अपराधी ठहरा भी दिया गया हो तो उस पर कोई कार्यवाही तब तक नहीं की जा सकती जब तक वह कानून और संविधान में दिए गए सभी विकल्प न आजमा ले।

कोई भी व्यक्ति हो, उसका परिवार या जहां रहता है, वहां का समाज हो, सत्ताधारियों और उनके राजनैतिक प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता। यही कारण है कि यह जानते हुए भी कि उनके नेता का रास्ता गलत है, उसकी हिमायत करने और साथ देने के लिए वे विवश हैं।

इसका कारण यही है कि जीवन में नैतिक मूल्यों, सिद्धांतों और सही तथा सत्य का साथ देने की परिभाषा बदल गई है। यह बदलाव केवल गिरावट का संकेत है और आशंका इस बात की है कि जब साधारण नागरिक के सब्र का घड़ा भर जाएगा, तब क्या होगा ? सत्ता पाने और उस पर अधिकार जमाए रखने के लिए किसी भी साधन का इस्तेमाल सही लगने लगे, तो समझिए कि अशांति और विद्रोह होना तय है।

जब तक सत्ता, शासन और उसके कर्णधार अपने जीवन में नैतिक आचरण करने और भेदभाव न करने की नीति का पालन नहीं करेंगे, तब तक सामान्य नागरिक से यह उम्मीद करना कि वह केवल हाथ जोड़कर सब कुछ स्वीकार करता रहेगा, एक ऐसी गलतफहमी है जिसका शिकार बनने में देर नहीं लगती। यह जितनी जल्दी समझ में आ जाए कि शासक नहीं बल्कि जनता कर्णधार है, उतना बेहतर होगा।


शुक्रवार, 17 जून 2022

अनुशासनहीन होने का अर्थ अराजकता के रास्ते देशद्रोह तक जाना है

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शुक्रवार, 10 जून 2022

ब्रिटिश राज की मानसिकता भारत के विकास में रुकावट

 

यह कहावत, बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध ले, अपने आप में सही है लेकिन सत्य यह है कि भूतकाल हमेशा वर्तमान पर हावी होता आया है। यह कैसे भुलाया जा सकता है कि आज जो हम हैं, उस पर हमारे कल की छाया की बहुत बड़ी भूमिका है।

गुलामी की विरासत

सांसद और कांग्रेस नेता शशि थरूर ने अंग्रेज युग के बारे में एक शोधपूर्ण और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर ‘एन ईरा ऑफ डार्कनेस, द ब्रिटिश अंपायर इन इंडिया‘ लिखी है। इसे पढ़कर यह लगता ही नहीं बल्कि सिद्ध होता है कि स्वतंत्रता के बाद से अब तक भारतीयों के मन से अंग्रेजी राज की छाप या असर मिटा नहीं है।

यहां इस बात का जिक्र करना जरूरी है कि अंग्रेजों और मुगलों से भी पहले भारत की पहचान सोने की चिड़िया के रूप में थी। इसका कारण यह था कि हम संसार में अनेक क्षेत्रों में अद्वितीय थे, हमारे मुकाबले बहुत कम साम्राज्य थे। कोई भी विषय हो, हमारी राय का सबसे अधिक महत्व होता था। यह बात नोबल पुरस्कार से सम्मानित अमृत्य सेन से लेकर, रविंद्रनाथ टैगोर और अन्य विश्व प्रसिद्ध लेखकों और इतिहासकारों ने कही है। उदाहरण के लिए दर्शन, कृषि, शिक्षा, विज्ञान, कला, साहित्य, वास्तुकला, संगीत, व्यापार, उद्योग, निर्यात चिकित्सा, खगोल शास्त्र से लेकर ब्रह्माण्ड की अनेक गुत्थियों को सुलझाने में भारत सब से आगे था।

जब अंग्रेज आए तो सबसे पहले उन्होंने हमारी बुद्धि, कौशल, विरासत और सबसे आगे रहने के गर्व को चकनाचूर करने की नीतियां बनाईं ताकि हम मानसिक रूप से उनके गुलाम बन कर रह जाएं। इसके साथ यह भी कि अंग्रेज हमारी शारीरिक ताकत का अपने ही लोगों का दमन करने में इस्तेमाल कर सके।

जहां तक मुगल शासन का संबंध है, हालांकि वह क्रूरता के मामले में बहुत निर्मम थे और इसी के बल पर हमारे शासक बने लेकिन उन्होंने हमारी बहुत सी विरासत को नष्ट न कर उसमें वृद्धि करने का काम भी किया। वे दिखाना चाहते थे कि मुगल साम्राज्य की विरासत हमसे कम नहीं है और इसीलिए उन्होंने हमारे मंदिरों, भवनों और गढ़ तथा किलों से मुकाबला करने वाली बहुत सी मस्जिदों और इमारतों का निर्माण किया। इनमें से आज बहुत सी हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच विवाद का कारण बनी हुई हैं।

शशि थरूर की पुस्तक पढ़कर यह समझा जा सकता है कि अंग्रेजों ने जो भी कानून बनाए या नीतियों को लागू किया, वे सब अंग्रेजी साम्राज्य के लाभ और उसके विस्तार के लिए थे। इसमें से किसी भी काम में भारतीयों का हित नहीं होता था।

दुःख की बात यह है कि आजादी के बाद से अब तक बहुत से ऐसे कानून और नीतियां लागू हैं जो भारत में लूट खसोट के लिए अंग्रेजों ने बनाई थीं। विडंबना यह है कि हमारे संविधान में इन कानूनों को मान्यता मिली हुई है।


जुल्म पर आधारित कानून अब तक

एक उदाहरण है। जलियांवाला बाग में हत्याकांड के दोषी डायर को अंग्रेज सरकार ने इंग्लैंड में न केवल सम्मानित किया बल्कि उसे भारतीयों की कीमत पर बेशकीमती उपहार भी दिए। मतलब यह कि जुल्म करने वाले को सजा के बजाए पुरस्कार। इसी तरह बहुत से ब्रिटिश अधिकारियों को भारतीयों पर अत्याचार करने के लिए ईनाम दिए जाते थे। इस कड़ी में भ्रष्टाचार में लिप्त, बलात्कारी और कुशासन के लिए जाने जाने वाले अंग्रेज शामिल थे।

अब हम अपने देश की बात करते हैं। आज हमारी सरकारों में, चाहे केंद्र हो या राज्य सरकारें, अत्याचार के लिए मशहूर लोगों, भ्रष्ट नेताओं, रिश्वतखोर अधिकारियों और छल कपट से अपार संपत्ति हासिल करने वाले लोगों का बोलबाला उनसे कहीं ज्यादा है जो ईमानदार, मेहनती और अपने बल पर विभिन्न क्षेत्रों में भारत का नाम रौशन कर रहे हैं।

अगर ऐसा न होता तो किसी भी दोषी व्यक्ति और जेल में बंद अपराधी का दबंगई, गुंडागर्दी और धन के बल पर कोई भी चुनाव लडना संभव और सुविधाजनक न होता। अगर संविधान का संरक्षण न मिला होता तो ये चुनाव लड़कर मंत्री न बन पाते और यह भी न होता कि जिस पुलिस अधिकारी ने जिस गुंडे को गिरफ्तार किया हो, उसी की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी उसे दे दी जाए।

यह हमारे ही देश में हो सकता है क्योंकि हमने अनेक दावों के बावजूद ऐसे कानून नहीं बदले हैं जो अंग्रेजों ने हमारा दमन करने के लिए बनाए थे।

शशि थरूर ने बहुत ही साफगोई से वर्णन किया है कि किस तरह हमारी कॉटन और दूसरे कृषि उत्पादों का अंग्रेज अपने मुनाफे के लिए निर्यात करते थे। आज भी यह हो रहा है कि किसान केवल उगाएं, व्यापारी तथा उद्योगपति उत्पादन करें लेकिन उसका सबसे अधिक फायदा सरकार और उसके अमीर साथियों को मिले।

एक दूसरा उदाहरण है । अक्सर कहा जाता है कि अंग्रेज ने भारत की यातायात व्यवस्था को सुधारने के लिए रेल चलाकर बहुत बड़ा काम किया। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि अगर अंग्रेज रेल न लाए होते तो हम कितना और अधिक पिछड़े हुए होते। वास्तविकता यह है कि रेल का फायदा अंग्रेज के अपने लिए था क्योंकि उसे एक सस्ता साधन आने जाने और चीजों को लाने ले जाने के लिए चाहिए था। जब भी किसी भारतीय को इससे लाभ लेने की बात आती तो उसे नकार दिया जाता। यहां तक कि थर्ड क्लास डिब्बे में ही कोई हिंदुस्तानी जा सकता था और अंग्रेज जब चाहे तब वहां से उसे बाहर फिंकवा सकता था। सामान्य भारतीय को थर्ड क्लास का मानते हुए हमने भी इस व्यवस्था को बहुत समय तक कायम रखा।

अब हम शिक्षा की बात करते हैं । यह तर्क दिया जाता है कि भारत में अंग्रेजी भाषा नहीं पढ़ाई जाती और आज भी अगर न पढ़ाई जाए तो भारतवासी दुनिया में तरक्की नहीं कर सकते। हकीकत यह है कि अंग्रेज ने अंग्रेजी पढ़ाने का इंतजाम इसलिए किया ताकि वह ऐसे लोग तैयार हों जो शासन चलाने में मदद कर सकें। यह पढ़ाई भी बस इतनी कि कहीं बाबू जैसे कर्मचारी की जरूरत पूरी हो।

आज भी अंग्रेजी इसलिए पढ़ी जाती है ताकि उसके बलबूते बड़ी नौकरी, अधिकार संपन्न पद और अपनी एक अलग पहचान हासिल की जा सके। हमारी जो शिक्षा है वो रट्टा मारकर सफल तो कर देती है लेकिन उससे मानसिक विकास या अपनी अलग सोच पैदा नहीं होती। परीक्षा परिणाम तो सौ फीसदी आ सकते हैं लेकिन उसके आधार पर, केवल कुछेक अपवादों को छोड़कर जीवन में कोई कीर्तिमान स्थापित नहीं किया जा सकता। 

अगर हम अपनी प्राचीन शिक्षा पद्धति को देखें तो उस समय ओरल यानी मुंहजुबानी शिक्षा देने का प्रचलन अधिक था। पढ़ने के लिए वेद, उपनिषद और दूसरे ग्रंथ थे लेकिन उनका पढ़ना उनके लिए ही अनिवार्य था जो उनके पठन पाठन से कोई नया शोध करना चाहें, वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल करना हो या भविष्य की कोई नीति बनाने के लिए आवश्यक हो और  इसके लिए विशेष रूप से विश्वविद्यालयों में पढ़ाई की व्यवस्था होती थी।

सामान्य व्यक्ति को ग्रंथों से अधिक व्यावहारिक ज्ञान के विषयों की शिक्षा दी जाती थी ताकि वह नौकरी या व्यवसाय अपनाकर अपनी गृहस्थी का पालन कर सके। इसके साथ ही गुरुकुल और बाद में पाठशाला या मदरसा उसकी शिक्षा का केंद्र होता था और सीमित सब्जेक्ट होते थे । अंग्रेजों ने इतने विषय सिखाने शुरू कर दिए जिनका जीवन में कोई महत्व नहीं था । ऐसा इसलिए किया गया ताकि विद्यार्थी के मन में अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझने की मानसिकता बन सके । मतलब यह कि देसी अंग्रेज बन कर वे हुकूमत करने में मददगार हो सकें।

यह परंपरा या परिपाटी आज तक बदस्तूर जारी है। सरकार को वैज्ञानिक, शोधकर्ता, प्रोफेशनल और अपनी अलग सोच रखने वाले भारतीय नहीं चाहिएं बल्कि ऐसे कर्मचारी चाहिएं जो बाबूगिरी कर सकें और किसी भी गलत आदेश का पालन बिना किसी विरोध के कर सकें। इसीलिए शिक्षा, विशेषकर उच्च शिक्षा को इतना मुश्किल और महंगा कर दिया गया है कि कुछ ही के लिए यह संभव है। इसके साथ ही विद्यार्थी को ज्यादातर वे सब विषय पढ़ने पड़ते हैं जिनका उसके जीवन में कभी कोई उपयोग होने वाला ही नहीं होता।


दासता की सोच

आज हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। न जाने कितने समारोह अपनी आजादी को सुरक्षित रखने और स्वयं पर गर्व अनुभव करने के लिए मनाते रहे हैं। क्या यह वास्तविकता नहीं कि चाहे शासक हो या प्रजा, हम सब की सोच और मानसिकता अंग्रेजी शासन की गुलामी से अपने को मुक्त नहीं कर पाई है। बात बात पर अंग्रेजी शासन का उदाहरण देना क्या इसका प्रतीक नहीं है कि अभी तक ऐसी सोच रखने वाले इस देश में हैं कि अंग्रेजों के बनाए कानूनों और उनकी भाषा से ही हम उन्नति कर सकते हैं।े

यहां यह कहना जरूरी है कि सामान्य नागरिक द्वारा अपनी सोच का दायरा व्यापक और भारतीयता से ओतप्रोत करने का कोई अर्थ नहीं है जब तक कि शासन अर्थात सत्ताधारी व्यक्ति और राजनीतिक दल अपनी मानसिकता में आमूल चूल परिवर्तन नहीं करते। यथा राजा तथा प्रजा की उक्ति पूरी तरह लागू होती है।

ऐसा करने के लिए हिम्मत चाहिए, संविधान में संशोधन करने की तैयारी करनी होगी, सभी कानून जो गुलामी के दौर में बनाए गए थे, उन्हें रद्दी की टोकरी में फेंकना होगा।


एक उम्मीद

क्या इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि किसी अपराधी को चुनाव लड़ने न दिया जाए, रिश्वतखोरी के बिना सरकारी काम करवाए जा सकें, भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों को राजनीतिक संरक्षण न मिल सके, बेसिक जरूरतों को पूरा करने के लिए सत्ता में बैठे लोगों का मुंह न ताकना पड़े और यदि किसी के साथ अन्याय हुआ है तो उसे वर्षों तक न्याय पाने के लिए लड़ना न पड़े । वर्तमान सरकार, क्योंकि पूर्ण बहुमत में है, इसलिए उसके लिए यह करना कतई मुश्किल नहीं, केवल इच्छाशक्ति चाहिए।