शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

किसान परिवार की महिलाएं और खेतीबाड़ी








यह हैरान करने जैसी हकीकत है कि जिस खेतीबाड़ी को आमतौर से किसान यानी एक पुरुष का काम समझा जाता है, इसके विपरीत इस काम में महिलाओं का योगदान अधिक होता है लेकिन केवल पुरुष के पास ही सभी तरह के फैसले लेने का अधिकार होता है और उसमें औरत की भूमिका लगभग न के बराबर है।


हमारा मकसद स्त्री और पुरूष के बीच कोई मतभेद, प्रतियोगिता या छोटा बड़ा समझने का नहीं है बल्कि यह है कि अगर महिला कृषि कार्यों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती है तो इस बात का फैसला करने  का अगर उसे पूरा अधिकार नहीं भी देते फिर भी कम से कम उस की राय तो लें कि खेत में उगाने के लिए कौन सा बीज उत्तम रहेगा, सिंचाई का कौन सा साधन इस्तेमाल हो और खाद कौन सी लेनी चाहिए तथा फसल के निपटान से लेकर उसकी बिक्री तक कहाँ और कैसे हो ?


यह बात इसलिए प्रमुख है क्योंकि खेतीबाड़ी का लगभग आधा काम करना किसान परिवार की महिलाओं के जिम्मे आता है और अगर आँकड़े देखें तो दुनिया की अस्सी प्रतिशत महिलाएँ खेतीबाड़ी से जुड़ी हैं और हमारे देश में भी यह आँकड़ा कोई कम नहीं है।


महिलाओं को खेती की समझ

अभी जो वास्तविकता है वह यह कि अगर किसान के घर की महिला यह कहे कि इस बार हमारे खेत में जो आप हमेशा उगाते हो तो उसके बदले यह उगाओ तो झिड़क दिया जाता है कि तेरा काम यह नहीं और तू बस उतना ही कर जो तुझे बोने, काटने को कहा जाए, हम मर्दों को ज्यादा पता होता है कि क्या उगाना है क्या नहीं?

 अब जब फसल कम होती है, मर जाती है और कम या ज्यादा और गलत खाद और पानी देने से नष्ट हो जाती है तो किसान इसके लिए अपनी किस्मत को कोसता रहता है लेकिन उसे यह गवारा नहीं कि इस काम में अपने घर की महिलाओं से सलाह मशविरा कर ले और इसका कारण यह है कि खेतों के काम में औरतों का ज्यादा वक्त गुजरता है और उन्हें अपनी जमीन के बारे में परिवार के पुरुषों से अधिक जानकारी होती है।


खेतीबाड़ी से जुड़ें विषयों पर फिल्में बनाते समय स्वयं इस बात को देखा है कि यदि मान लीजिए पंचायत की सरपंच महिला है तो भी उसे अपने पति या ससुर के कहने और निर्देश के अनुसार ही पंचायत के फैसले करने होते हैं और अगर किसी महिला सरपंच ने अपनी मर्जी से कुछ किया तो परिवार में उसकी दुर्दशा होना निश्चित है।


हमारे देश में किसानी से कम आमदनी होने का सब से बड़ा कारण यह है कि ज्यादातर किसान इस काम में पूरा ध्यान नहीं देते और सरकार या कोई संस्थान अगर उन्हें बताने और समझने के लिए छपी सामग्री या आधुनिक टेक्नोलोजी के बारे जानकारी देता है तो वह उसका उपयोग न कर पुरानी प्रणालियों से ही खेतीबाड़ी करने को प्राथमिकता देते हैं।


हालाँकि जिन किसान परिवारों ने आधुनिक कृषि के तरीको को अपनाया और महिलाओं का पूरा सहयोग लिया वे समृद्ध और खुशहाली का स्वाद ले रहे हैं लेकिन यह बढ़ती माँग के अनुरूप न होने से पुराने पड़ चुके तरीकों से खेती करने वाले ज्यादातर किसान बदहाली और गरीबी की हालत में जी रहे हैं।


संयुक्त राष्ट्र के फूड और ऐग्रिकल्चर संस्थान की एक रिपोर्ट में यह बात कही गयी है कि महिला किसानों का कृषि उत्पादन तीस प्रतिशत तक इसलिए कम होता है क्योंकि उनके पास वह जानकारी और साधन नहीं पहुँच पाते जो पुरुषों के पास आते है और वे उनके बारे में महिलाओं को नहीं बताते और खुद उनका इस्तेमाल करने में उनकी कोई रुचि नहीं होती।


इसके अतिरिक्त सरकार और बहुत सी निजी संस्थाओं द्वारा किसानों को ट्रेनिंग देने के अनेक कार्यक्रम जब तब आयोजित होते रहते हैं, उनमें पुरुष किसान ही अधिकतर जाते हैं और अगर कोई महिला जाती भी है तो उसकी कुछ पूछने की हिम्मत ही नहीं होती क्योंकि ट्रेनर पुरुष होते हैं और गाँव की औरतों के लिए यह वर्जित है कि वह पराए मर्द से बात करें। अब जो मर्द इनमें भाग लेते हैं उनके लिए यह सैर सपाटा ज्यादा होता है और वे घर आते आते वह सब कुछ भूल चुके होते हैं जो उन्हें इन ट्रेनिंग शिविरों में बताया गया हो ।


जरूरत इस बात की है कि ट्रेनिंग के लिए महिला किसानों और किसान परिवार की महिलाओं के लिए ऐसे शिविर लगाए जाएँ जो महिलाओं के लिए महिलाओं द्वारा आयोजित हों। वे न केवल नई जानकारी और टेक्नॉलोजी को घर तथा खेतों तक ले आएँगी बल्कि पुरुषों को भी प्रेरणा देना का काम करेंगी जो अभी तक परम्परागत खेती के तरीकों से ही चिपके रहना चाहते हैं।


हमारे देश में ज्यादातर खेती छोटी जोतों में होती है इसलिए औरतों के लिए उनका प्रबंध करना और भी आसान है और वे घर और खेत दोनों ही स्थानों को कुशलतापूर्वक संभाल सकती हैं। इसके साथ साथ यह भी एक सच्चाई है कि महिलाओं को पुरुषों से ज्यादा इस बात की जानकारी होती है कि क्या पौष्टिक भोजन है और किस चीज की परिवार को जरूरत है जिससे सभी सेहतमंद रहें, तो जो महिला किसान है वो इस बात का पहले ध्यान रखेगी कि उसके खेत से जो उपज निकले, चाहे अनाज, फल, सब्जी या कुछ भी हो, वह पौष्टिक भी हो और अधिक समय तक टिकाऊ भी हो ताकि इस्तेमाल करने तक खराब न हो ।


कृषि विकास में महिला किसानों की भूमिका


जब किसानी करने वाली आधी संख्या महिलाओं की है तो उन्हें यह अधिकार देने में क्या हर्ज है कि वे अपनी बुद्धि और कौशल से खेतीबाड़ी से सम्बंधित सभी फैसलों को करें और पुरुषों के साथ इस मामले में भी कंधे से कंधा मिलाकर चलें। असलियत यह है कि कृषि वैज्ञानिक हों या अनुसंधानकर्ता, वे सब पुरुष किसानों से ही बात करते हैं जबकि खेतीबाड़ी हो या पशुपालन इस सब में महिलाओं की भूमिका अधिक है और विडम्बनापूर्ण यह है उनसे कोई बात ही नहीं करता और न उन तक पहुँचने की कोशिश करता है।


पुरुष और महिला के बीच बुनियादी फर्क यह होता है कि जहाँ मर्द को अपने मतलब की बात पहले समझ आती है वहाँ औरत को वह बात ज्यादा और जल्दी समझ में आती है जो परिवार और समाज के  लिए अधिक फायदेमंद हो, इसलिए खेतीबाड़ी के मामले में स्त्री की भूमिका को नजरंदाज करने के बजाय उसका लाभ उठाने में ही समझदारी है।


किसान की गरीबी दूर करने का यह कोई सार्थक तरीका नहीं है कि उसकी पैसों से मदद कर दी जाए बल्कि यह है कि बेहतर तकनीक, उत्तम बीज, बढ़िया खाद और सिंचाई तथा बिजली की आसानी से उपलब्धता निश्चित कर दी जाए, ऐसा होने पर उसे थोड़े ही समय में न सरकारी सब्सिडी और न ही नकद पैसों की खैरात की जरूरत पड़ेगी।


यह बात ऐसी नहीं है कि कोई नई हो बल्कि हरित क्रांति के जनक और नोबल पुरस्कार से सम्मानित डॉक्टर नॉर्मन बोरलोग ने बहुत पहले ही कह दी थी कि कृषि क्रांति अगर करनी है तो उसमें महिलाओं की निश्चित भूमिका है और उनके सहयोग के बिना यह सम्भव नहीं है।


यही नहीं भारत में हरित क्रांति के पुरोधा और जनक एम एस स्वामिनाथन ने तो अपनी राज्य सभा की सदस्यता के दौरान संसद में एक बिल भी पेश किया था जिसमें कृषि में महिलाओं के सक्रिय योगदान को कानून सम्मत बनाने की बात कही गयी थी  दुर्भाग्य से यह बिल सरकार और सदस्यों की उदासीनता के कारण परवान ही नहीं चढ़ सका।
अभी भी इस बारे में कानून बनाया जा सकता है जिसमें महिला किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए वित्तीय सुविधाएँ और कानूनी संरक्षण मिल सके।


 इसमें कोई बुराई भी नहीं क्योंकि अक्सर हम महिलाओं के सशक्तिकरण की बात करते ही रहते हैं तो फिर कृषि के क्षेत्र में उनके योगदान को न केवल सराहा जाना चाहिए बल्कि उन्हें अधिक से अधिक किसानी करने के लिए आमंत्रित भी करना चाहिए।

शुक्रवार, 16 अगस्त 2019

सीमित परिवार महिलाओं की पहल से ही सम्भव






जरा याद कीजिए कि इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी की सबसे बड़ी असफलता क्या थी? यह थी उनकी अधकचरी सोच, मर्द होने का अहंकार, प्रधान मंत्री माँ की ताकत को अपने मंसूबे पूरे करने का हथियार बना लेना और जिस विषय की बुनियादी समझ तक नहीं थी, मतलब फैमिली प्लानिंग को बंदूक के बल पर लागू करने की अमानवीय कोशिश जिसका नतीजा इतना दर्दनाक निकला कि उसके बाद किसी भी दल और उनके नेताओं की इस मुद्दे पर बात तक करने की हिम्मत नहीं हुई।


यह बात हर किसी की जुबान पर होती है चाहे दबे स्वर में ही हो कि हमारे विकास की गति धीमी इसलिए है क्योकिं संसाधन तैयार होने की तादाद कभी भी उस संख्या से मेल नहीं खा पाती जो बेरोकटोक आबादी बढ़ने से बन जाती है और हमारे प्रयासों को नाकामयाब बना देती है।

इस बार प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से अपने भाषण में इस मुद्दे को उठाते हुए देशवासियों का आह्वान किया कि परिवार को सीमित रखना भी देशभक्ति है तो लगा कि उनके मन में इस बारे में कोई न कोई योजना अवश्य चल रही होगी और वे अन्य मामलों की तरह इसे भी सुलझाने के लिए कृतसंकल्प हैं। यह भी सोचा होगा कि इस मद में करोड़ों रुपया लगाने के बावजूद सफलता क्यों नहीं मिली ? उनके भाषण से लगा कि वे सीमित परिवार रखने वालों को सम्मानित कर सकते हैं।


 तो समझ लीजिए कि इनकी संख्या देशभर में मुशकिल से दस प्रतिशत होगी इसलिए ये कभी भी शेष परिवारों के लिए रोल मॉडल नहीं हो सकते। सीमित परिवार रखने का संबंध हमारी जातिगत विभिन्नताओं, सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं तथा व्यक्तिगत आकांक्षाओं से जुड़ा है इसलिए अत्याधिक संवेदनशील भी हैं। इसलिए कोई बड़ा कानून बनाने या प्रतिबंध लगाने से पहले दो बार सोच लीजिएगा क्योंकि इस मामले में दांव उल्टा पड़ सकता है।



महिलाओं की निर्णायक भूमिका


एक घटना है जिसका जिक्र मलिंडा गेट्स ने अपनी किताब में किया है जो इस विषय को समझने की समझ पैदा करने का उदाहरण है। भारत में अपनी फाउंडेशन के कार्यक्रमों का ज़ायजा लेने के दौरान वे गर्भवती महिलाओं और उनके परिवारों से मिलीं। एक बुजुर्ग महिला ने कहा कि उसने आठ बच्चों को घर पर ही जन्म दिया जिनमें से छः जन्म लेने के बाद एक सप्ताह में ही मर गए। अब उसकी बहू गर्भवती है और वह चाहती है कि बहू को प्रसव के समय हर प्रकार की सुविधा मिले और नहीं चाहती कि वह दोबारा गर्भवती हो और उसका जीवन भी मेरी तरह यानी अपनी सास के जैसा हो।

एक अन्य महिला मीना जिसने दो सप्ताह पहले एक लड़के को जन्म दिया था उससे जब यह पूछा गया कि क्या वह फिर से माँ बनेगी तो उसका जवाब था ‘कभी नहीं‘ और साथ में यह भी जोड़ा कि वह (मलिंडा) इस नवजात शिशु को अपने साथ ले जाएँ और साथ में उसके दो साल के लड़के को भी। इसकी वजह यह बताई कि वह नहीं जानती कि वह इनका पालन पोषण कैसे करेगी? उसका पति मजदूर है और वह भी, फिर भी इतना नहीं कमा पाते कि ठीक से पेट भर सकें तो फिर बच्चों की परवरिश कैसे कर पाएँगे?

एक अन्य महिला जो अनेक बार माँ बन चुकी थी और फिर से एक बच्चे को जन्म देने वाली थी वह यह सोच रही थी कि वह इतनी मजबूर क्यों है कि वह यह नहीं कह पाती कि अब वह माँ नहीं बनना चाहती?

क्या कोई मर्द उन औरतों के दर्द को समझ सकता है जो अपने बच्चों को किसी और को देने के लिए तैयार हों, दूसरा बच्चा पैदा न करना चाहें और बच्चे का लालन पालन करने और उसके भविष्य के बारे में कोई भी फैसला लेने का अधिकार केवल उनके पति, ससुर या किसी अन्य पुरुष के हाथ में हो और सिर झुकाकर हर निर्णय मान लेने की बेबसी हो !

संसार की हर महिला चाहती है कि उसकी संतान स्वस्थ और सुखी हो, खूब पढ़े लिखे, अपने को योग्य बनाए, उनके अपने परिवार हों और वे अपने जीवन को खुशियों से भरते रहें और इसके साथ साथ वे स्वयं भी शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ हों और अपने को सुरक्षित इस रूप में समझें कि उन्हें यह निर्णय करने का अधिकार हो कि उन्हें कब माँ बनना है। बिना सोचे समझे गर्भवती हो जाना महिलाओं के लिए घातक, असम्मानजनक, निराश और अंधकारपूर्ण भविष्य का कारण है और विडम्बना यह कि इसके लिए उनके पति जिम्मेदार होते हैं और वह इसके लिए पत्नी को ही दोषी मानते हैं।

सीमित परिवार और संयम


राष्ट्रपिता बापू गांधी ने इस विषय पर बहुत कुछ लिखा है जिसका निष्कर्ष यही है कि संयम के बिना आबादी को बढ़ने से रोकना असम्भव है। इसका अर्थ यही है कि सहवास के समय स्त्री को यह भरोसा हो कि उसे अनचाहा गर्भ धारण नहीं करना होगा। पति को अपनी सोच बदलनी होगी कि वह जब चाहे यह क्रिया कर सकता है । बापू के समय में ही हालाँकि गर्भनिरोधक उपाय प्रचलन में आ गए थे लेकिन उन्होंने इनके बजाय प्राकृतिक रूप से परिवार को सीमित रखने का तरीका ‘संयम अपनाने‘ पर ही जोर दिया था। सुरक्षित दिनों में ही पति पत्नी सहवास करें और तब तक संतान की कामना न करें जब तक वे आर्थिक रूप से उसके पालन पोषण की जिम्मेदारी उठाने के लिए पूरी तरह से तैयार न हो जाएँ।

जहाँ तक सरकार और समाज की बात है तो इसके लिए सबसे पहले जरूरी यह है कि प्रत्येक गर्भवती महिला के सुरक्षित प्रसव की व्यवस्था हो और इसके लिए पर्याप्त स्वास्थ्य केंद्र, अस्पताल, नर्सिंग होम और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की सुविधाएँ उपलब्ध हों। ऐसा होने पर ही लोग सीमित परिवार की कल्पना कर पाएँगे और इसके सुखद परिणामों को समझ पाएँगे। उनकी समझ में आने लगेगा कि अधिक आबादी ही अकाल, भूख, गरीबी और परिवारों के बिखरने का मूल कारण है। बापू गांधी द्वारा सीमित परिवार के लिए संयम अपनाने की सीख भी इसी समझ से निकलेगी और देश बढ़ती आबादी की समस्या से निपटने में सक्षम हो पाएगा।

संयम और गर्भ निरोधक


जब तक संयम रखने के लिए मानसिक रूप से प्रत्येक व्यक्ति तैयार न हो जाए तब तक गर्भ निरोधकों का व्यापक इस्तेमाल और उनकी पूर्ति के लिए जरूरी वितरण व्यवस्था हो, अभी तो अगर कोई महिला किसी दुकान से कंडोम खरीदना चाहती है तो आसपास के दूसरे ग्राहक और दुकानदार तक भी संकोच दिखाते हैं। इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है कि यह केवल पुरुष की ही जिम्मेदारी है कि वह गर्भ निरोधक का प्रयोग करे। सरकार द्वारा घर घर निरोध मुहैया कराने की मुहिम इसलिए कारगर नहीं हुई क्योंकि इसको बांटने और इस्तेमाल करने की जिम्मेदारी पुरुष को दे दी गयी।


 महिला के लिए इसे जरूरी नहीं समझा गया कि वह इसका महत्व समझ कर स्वयं इसका इस्तेमाल करने की पहल करे।

यह समझना भी जरूरी है कि सीमित परिवार की कल्पना को साकार करने में धर्म और धार्मिक संगठनों का बहुत बड़ा योगदान है। अक्सर यह कहकर मुँह मोड़ लिया जाता है कि बच्चे तो भगवान की देन हैं या अल्लाह की मर्जी है या ईसा मसीह का वरदान है।इसे धर्म के हवाले से कह दिया जाता है कि संतान केवल पेट ही नहीं बल्कि काम करने के लिए हाथ पैर और दिमाग लेकर भी पैदा होती है इसलिए परिवार की सीमा बाँधने की क्या जरूरत है ?

धर्म चाहे कोई भी हो वो जीवन की एक शैली है, जीने का तरीका है, सुखी और सम्पन्न बनने का विधान है, उसमें परिवार नियोजित करने को धर्म के विरुद्ध आचरण कहीं नहीं आता। सच तो यह है कि सीमित परिवार होने पर ही धर्म और धार्मिक नियमों का पालन सुगमता से हो सकता है। इसके लिए धार्मिक प्रवचनों में धर्म के उपदेशकों को सीमित परिवार के महत्व पर बल देना होगा।

क्या होना चाहिए ?


सब से पहले तो सरकार को सीमित परिवार की योजना बनाने का काम केवल महिलाओं की भागीदारी से पूरा करने की व्यवस्था करनी होगी और इसे स्त्रियों के अधिकार क्षेत्र में लाना होगा कि वे तय करें कि कैसे इस अभियान को सफल बनाया जा सकता है। अब तक जनसंख्या नियंत्रण के लिए पुरुष ही ज्यादातर योजनाएँ बनाते आए हैं जबकि सुखी परिवार की कल्पना को साकार करने की जिम्मेदारी महिलाओं की है। तो फिर इसके लिए पुरुष ही क्यों योजना बनायें ?

प्रधान मंत्री जी एक सीमित परिवार मंत्रालय का गठन कर दीजिए जिसमें मंत्री से लेकर संतरी तक महिलाएँ हों और फिर देखिए कि जनसंख्या पर कितनी सफलता से नियंत्रण होता है। वरना डर यही है कि इतिहास अपने को फिर से न दोहरा ले, आबादी बढ़ने से रूकना तो दूर उसकी गति और अधिक तेज  हो जाए।

(भारत)

शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

उपभोक्ता कानून से क्या वास्तव में ग्राहक के अधिकार सुरक्षित है ?








उपभोक्ता कानून के अंतर्गत ग्राहक वह होता है जो पैसे खर्च कर कोई सामान खरीदता है या कोई सेवा लेता है। उसके साथ छल फरेब, धोखाधड़ी न हो और बेईमान दुकानदार, निर्माता या सेवा देने वाले उसका शोषण करने में कामयाब न हों और यदि ऐसा हो जाए तो कानूनी कार्यवाही से उनके हितों की रक्षा हो, इसके लिए जब उपभोक्ता संरक्षण कानून बना तो उसका व्यापक स्वागत हुआ और लोगों के मन में यह भरोसा हुआ कि अब वे बिना किसी शंका के खरीददारी कर सकते हैं।


सरकार ने इसके प्रचार प्रसार के लिए जागो ग्राहक जागो, अपने अधिकार और इसी तरह के दूसरे अभियान चलाए ताकि उपभोक्ता अपने अधिकारों को समझें और जरूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल करें। धीरे धीरे लोगों में जागरूकता बढ़ी और नागरिकों ने अपने अधिकारों का हनन होने पर इस कानून के अंतर्गत स्थापित जिला उपभोक्ता फोरम, राज्य आयोग और राष्ट्रीय आयोग तक का रूख किया।



उम्मीद थी कि सरकार ग्राहकों की निरंतर बढ़ती हुई संख्या के अनुसार प्रशासनिक व्यवस्था करेगी। कानून में बताई गयी एक निश्चित अवधि में उसके साथ न्याय हो जाएगा और मिलावटखोरी, जमाखोरी, अधिक मूल्य वसूली जैसी व्यापारिक बुराइयों से निजात मिलेगी और ऐसा करने वालों के मन में कानून का डर होगा।


आधे अधूरे इंतजाम

केंद्रीय मंत्री श्री राम विलास पासवान ने स्वयं कुबूल किया कि सवा तीन लाख मामले जिला स्तर पर, सवा लाख राज्य स्तर पर और बीस हजार से ज्यादा राष्ट्रीय स्तर पर फैसलों का इंतजार कर रहे हैं। यह तो नहीं बताया कि कब से पेंडिंग हैं लेकिन यह माना कि सभी जिलों में उपभोक्ता अदालतें खुली नहीं हैं और एक सौ अठारह जिला अदालतों में इनके अध्यक्ष यानी न्यायाधीश नियुक्त नहीं हुए हैं और सदस्यों यानि न्यायपालिका के लिए तीन सौ बासठ पद खाली पड़े हैं। ऐसी हालत में कैसे उम्मीद की जाए कि उपभोक्ता अदालतों में जल्दी न्याय मिलने की आशा से गए पीड़ितों को न्याय मिल पाएगा।


अब जरा इस बात को परखिए कि ज्यादातर जो जिला अदालतें हैं उनकी क्या हालत है। फर्नीचर के नाम पर न्यायाधीशों के बैठने तक के लिए ठीकठाक कुर्सी मेज नहीं हैं तो फिर जो शिकायत लेकर आया है तो उसके लिए टूटी फूटी बेंच और कई जगह तो वो भी नहीं, खड़े रहकर अपना मुकदमा लड़िए, जैसी हालत के लिए क्या प्रशासन जिम्मेदार नहीं है। पानी की सुविधा नदारद और कई स्थानों पर शौचालय तक नहीं हैं।


नया कानून 2019


सबसे पहले सन 1986 में उपभोक्ता संरक्षण कानून बना था। उसके बाद इसमें कुछ संशोधन हुए लेकिन अब उपभोक्ता संरक्षण कानून 2019 को उसकी जगह लेने के लिए दोनों सदनों की मंजूरी मिल गयी है। आम तौर से सामान्य व्यक्ति को कानूनों की पेचीदगियाँ न तो समझ में आती हैं

और वैसे भी वह उनकी तरफ इसलिए ध्यान नहीं देता क्योंकि जरूरत पड़ने पर वकील साहब से समझ लेगा। अन्य कानूनों से अलग यह कानून इस मायने में है कि इसमें व्यक्ति अपना मुकदमा खुद लड़ सकता है और उसे वकील की सेवाएँ लेने की जरूरत नहीं है। इस स्थिति में जरूरी हो जाता है कि सामान्य उपभोक्ता इन बातों को समझ ले।


नए कानून की कुछ खास बातें इस तरह हैं : 

पहले यह होता था कि केवल वहीं शिकायत की जा सकती थी जहाँ विक्रेता की दुकान या पंजीकृत कार्यालय हो लेकिन अब किसी भी जिला अदालत में शिकायत की जा सकती है।

 मंत्रालय इस प्रकार के नियम भी बना रहा है जिसमें एलेक्ट्रोनिकली शिकायत की जा सके और फीस भी डिजीटल तरीके से भरी जा सके। अब अगर किसी निर्माता ने उत्पाद बनाते समय नियमों का पालन नहीं किया और घटिया चीज बना कर बेची और खरीदार को नुकसान हुआ तो उसके खिलाफ सीधे ही शिकायत की जा सकती है और हर्जाना वसूला जा सकता है।


इस कानून में यह भी है कि अब कोई विक्रेता अपने ग्राहक की व्यक्तिगत जानकारी किसी और को नहीं दे सकता और इसके लिए उसे दंड मिल सकता है।  अभी तक यह होता था कि दुकानदार किसी न किसी बहाने से ग्राहक से जानकारी ले लेता था और फिर उसे दूसरों को बेच देता था और ग्राहक के पास दिन रात पता नहीं कहाँ से फोन आने लगते थे। अब इस पर कुछ लगाम लग सकती है।


भ्रामक विज्ञापन 


अक्सर जब कोई जाना माना चेहरा विशेषकर अभिनेता या खिलाड़ी कोई चीज बेचता है तो हम यह सोचकर कि क्वॉलिटी सही होगी, लेकिन धोखा होने पर सब अपना पल्ला झाड़ लेते थे। अब उन्हें विज्ञापन में कही या दिखाई बातों की पहले स्वयं उनके सही होने की जाँच करनी होगी वरना उनके लिए मुसीबत खड़ी हो सकती है।


भ्रामक विज्ञापनों के लिए निर्माता को दो से पाँच साल की जेल और दस से पचास लाख तक का जुर्माना हो सकता है। इसी तरह से एंडोर्स करने वाले यानी सिलेब्रिटी पर दस से पचास लाख तक का जुर्माना और एक से तीन साल तक का प्रतिबंध लगाया जा सकता है।


अब बिना सुनवाई के कोई शिकायत खारिज नहीं की जा सकती और अगर पंद्रह दिन तक कोई जवाब नहीं आता तो उसे स्वीकृत समझा जाएगा। अब शिकायत खारिज किए जाने की अवस्था में उसका कारण भी जानने का अधिकार उपभोक्ता को होगा, पहले की तरह किसी की मनमर्जी नहीं चल सकती।


इस तरह मिलावट करने वालों और गुमराह करने वालों को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है चाहे वह कितना भी नामचीन व्यक्ति हो या किसी भी क्षेत्र में सिलेब्रिटी हो। अब शायद इस रवैये पर लगाम लग सकेगी कि लोग अपने फेमस होने का फायदा उठाते हुए करोड़ों की आमदनी भी कर लें और और उस चीज के खराब निकलने पर जिसका वह विज्ञापन कर रहे हैं, कोई उनकी तरफ ऊँगली भी न उठाए।


एक नयी पहल यह हुई है कि अब उपभोक्ताओं के हितों की पूरी तरह रक्षा करने के लिए एक केंद्रीय उपभोक्ता सुरक्षा प्राधिकरण का गठन होगा जिसे सभी कानूनी अधिकार प्राप्त होंगे और उस पर इस बात की जिम्मेदारी होगी कि अगर देश के किसी भी कोने में उपभोक्ता के साथ धोखाधड़ी होती है तो वह अपनी ओर से उचित कार्यवाही कर सकेगा। यह प्राधिकरण किसी भी निर्माता द्वारा बनाई गयी दोषपूर्ण वस्तुओं को अपने कब्जे में ले सकता है, उत्पादन रोक सकता है और और कानून सम्मत कार्यवाही कर सकता है।


नये कानून को हालाँकि उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से काफी मजबूती प्रदान की गई है लेकिन इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि कानून का सही ढंग से पालन किए जाने के लिए जरूरी प्रशासनिक व्यवस्था बन जाए।


यह देश में उपभोक्ता आंदोलन को मजबूती देने के साथ साथ आम आदमी के जीवन में काफी राहत ला सकता है। यह निर्माताओं और सेवा प्रदान करने वालों को गलत तरीके से पैसा कमाने से रोक सकता है और सख््ती से लागू किए जाने पर उपभोक्ताओं को उनके शोषण से बचा सकता है।



शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

तीन तलाक बिल के बाद कश्मीर को भी बेड़ियों से मुक्त कीजिए









कुरीतियाँ या कुप्रथाएं जब परम्परा बन जाती हैं और जन सामान्य के बीच स्वीकार भी कर ली जाती हैं तब उन्हें समाप्त करना समाज या सरकार के लिए मुश्किल और जोखिम भरा हो जाता है।

तीन तलाक की प्रथा भी इसी श्रेणी में आती थी जिसे अब कानून बनाकर खत्म करने का सराहनीय प्रयास किया गया है। इससे जहाँ मुस्लिम समाज के बहुत बड़े वर्ग द्वारा इसका स्वागत किया गया है वहीं कुछ कट्टर लोग इसका विरोध करते हुए उच्चतम न्यायालय द्वारा इसे खारिज कराने की फिराक में भी हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि वे अपने मंसूबों में कामयाब न हो।


ऐसी ही एक प्रथा निकाह हलाला है जो इतनी अमानवीय है कि ज्यादातर मुस्लिम समाज उसके विरोध में नजर आता है। परंतु वह है तो सही चाहे छोटे तबके के बीच हो। कदाचित उसे भी समाप्त करने के लिए कानून बनाने की जरूरत पड़े।


इसी तरह की कुप्रथाएं सभी धर्मों में होंगी जो एक बार चलन में आ गयीं और समाज के बड़े वर्ग में स्वीकार कर ली गयीं तो फिर उन्हें समाप्त करना टेढ़ी खीर हो जाता है।
हिन्दू समाज में बाल विवाह, दहेज, छुआछूत जैसी कुरीतियाँ कानून बनाने पर भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई हैं।


असल में इन्हें केवल कानून से समाप्त करना एक ऐसी बचकानी सोच है जिससे बाहर निकलना जरूरी है और इसके बदले परिपक्वता के साथ इन बुराइयों को दूर करने की कोशिश की जाए तो उसमें सफलता मिल सकती है।


देखा जाए तो सभी बुराइयों की जड़ शिक्षा का अभाव, जीवन यापन और रोजगार के पर्याप्त साधन न होने से गरीबी का होना और सही राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व का न होना है। यदि प्रत्येक व्यक्ति तक राष्ट्र की सम्पत्ति और संसाधनों का उचित बँटवारा हो जाए तो फिर सामाजिक कुरीतियाँ हों या धार्मिक पाखंड और ऊँच नीच की भावना तो इनका समाप्त होना निश्चित है।


कश्मीर और भेदभाव


इसे कुप्रथा तो नहीं कहा जा सकता बल्कि अपने को दूसरों से अलग ही नहीं बल्कि श्रेष्ठ समझने की मानसिकता कहा जा सकता है। कश्मीर के साथ भी ऐसा ही हुआ है।
यह ‘लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पाई’ का भी उदाहरण है जब जम्मू कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के बाद भी वहाँ अस्थाई तौर पर ही सही पर कुछ ऐसी विशेष रियायतें दी गयीं और वे भी संविधान के जरिए कि वे आज तक देशवासियों के साथ भेदभाव रूपी गले की हड्डी और इस राज्य की प्रगति का रोड़ा बनी हुई हैं।


धारा 370 और 35ए


संविधान में ये धाराएँ टेम्परेरी, हटाई जा सकने वाली और कुछ समय के लिए विशेष सहायता देने के लिए जोड़ी गयीं थीं। उस समय के प्रशासकों ने ऐसी परिस्थितियाँ बना दीं कि ये एक तरह से स्थाई ही बन गयीं और अब इन्हें हटाने की बात करते ही खूनखराबे तक की धमकियाँ आने लगती हैं।

इन प्रावधानों के कारण ही इस राज्य के विकास के लिए केंद्रीय सरकार की बहुत सी लाभकारी योजनाओं का न पहुँच पाना है।

सब से बड़ी बात यह है कि एक तो वहाँ पर्यटन और सेव तथा सूखे मेवे के निर्यात के अलावा कोई और व्यापार का जरिया न के बराबर है और दूसरे किसी भी सरकारी या गैर सरकारी प्रतिष्ठान या उद्योग के लगने की सम्भावना नहीं है क्योंकि यहाँ अलगाववादी ताकतों की दहशत और गुंडागर्दी के सामने टिकने का जोखिम कोई नहीं लेना चाहता।


इस राज्य के बाहर का व्यक्ति यहाँ जमीन जायदाद न तो खरीद सकता है और न ही इस राज्य की कोई महिला दूसरे राज्य के व्यक्ति के साथ शादी करने के बाद अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकती है। उसके सारे अधिकार समाप्त हो जाते हैं।


इन धाराओं की बजह से इस राज्य को यह छूट मिली हुई है कि वह भारतीय संविधान को लागू करे या नहीं क्योंकि उसे अपना संविधान बनाने की छूट थी।

अगर यहाँ भी एक संविधान, एक कानून और पूरे देश के साथ मिलकर काम करने और निर्णय लेने की नीति होती तो आज यह राज्य अन्य राज्यों की तरह तेजी से तरक्की कर रहा होता।


अगर ये धाराएँ समाप्त हो जायें तो पाकिस्तानी घुसपैठिए और रोहिंग्याओं को यहाँ पनाह नहीं मिल पाएगी। इससे जो पूरे देश से अलग थलग पड़े रहने और राष्ट्र की मुख्य धारा से वंचित रहने की मजबूरी है, वह नहीं रहेगी और संसाधनों का तेजी से विकास हो सकेगा।
अभी जो केवल रक्षा, विदेशी मामले और संचार तक ही केंद्र सरकार सीमित रहने के लिए बंधी हुई है, इन धाराओं के समाप्त होने पर कृषि, शिक्षा, विज्ञान, प्रौ़द्योगिकी और व्यापार करने की केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ इस राज्य को भी उसी प्रकार मिल सकेगा जैसा अन्य राज्यों को मिलता है।


परंतु दिक्कत यह है कि बिना राज्य की सहमति से इन्हें समाप्त भी नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में सब से पहले जम्मू कश्मीर में ऐसे वातावरण का निर्माण करना होगा जिससे वहाँ के राजनीतिक दलों पर जनता की ओर से यह दबाव हो कि इन धाराओं का हटना आम नागरिकों के हित में है।


इन धाराओं का समाप्त होना राज्य के हित में इसलिए भी है क्योंकि उद्योग और निजी क्षेत्र में काम करने वाले यहाँ पैसा नहीं लगाते। यहाँ तक कि अच्छे डॉक्टर और दूसरे प्रफेशनल इसलिए नहीं आते कि उनके यहाँ जीवन भर रहने पर भी कोई अधिकार नहीं होंगे।


यह जो जमीन जायदाद खरीदने पर पाबंदी है वह असल में अंग्रेजों द्वारा यहाँ आकर बसने और फिर महाराजा के अधिकारों तक पर अंकुश लगाने की नीयत और कुटिल चाल से बचने के लिए लगाई गयी थी। अब स्वतंत्र भारत में ऐसा कोई डर नहीं है और जब जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तो कोई आशंका भी नहीं है तो फिर इस धारा का कोई मतलब नहीं रह जाता।


इसी तरह कॉलेज में दाखिले और कोई रोजगार या नौकरी करने पर अभी जो प्रतिबंध है वह हट जाए तो राज्य का आर्थिक विकास कितना होगा इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। इन धाराओं के हटने का सबसे बड़ा फायदा इस राज्य को जो मिलेगा वह है  पाकिस्तान की तरफ से किए जा रहे आंतकवाद की रोकथाम करना आसान हो जाएगा।


जब राज्य के निवासियों का ध्यान शिक्षा प्राप्त करने, काबिल होकर रोजगार करने और आधुनिक संसधान अपनाने की तरफ लग जाएगा तो वह स्वंय ही पाकिस्तानी पोपेगेंडे की तरफ से आंख मूंद लेगें और किसी भी हरकत को शुरू में ही समाप्त करने के प्रति सरकार के साथ मिलकर अपना बहुमूल्य योगदान करने लगेंगे।


इन हालात को देखते हुए जितनी जल्दी हो इन धाराओं को समाप्त कर देना चाहिए ताकि जम्मू कश्मीर के लोग उसी प्रकार देश के संसाधनों का इस्तेमाल कर सकें जैसे अन्य देशवासियों के लिए होता है।