शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

तीन तलाक बिल के बाद कश्मीर को भी बेड़ियों से मुक्त कीजिए









कुरीतियाँ या कुप्रथाएं जब परम्परा बन जाती हैं और जन सामान्य के बीच स्वीकार भी कर ली जाती हैं तब उन्हें समाप्त करना समाज या सरकार के लिए मुश्किल और जोखिम भरा हो जाता है।

तीन तलाक की प्रथा भी इसी श्रेणी में आती थी जिसे अब कानून बनाकर खत्म करने का सराहनीय प्रयास किया गया है। इससे जहाँ मुस्लिम समाज के बहुत बड़े वर्ग द्वारा इसका स्वागत किया गया है वहीं कुछ कट्टर लोग इसका विरोध करते हुए उच्चतम न्यायालय द्वारा इसे खारिज कराने की फिराक में भी हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि वे अपने मंसूबों में कामयाब न हो।


ऐसी ही एक प्रथा निकाह हलाला है जो इतनी अमानवीय है कि ज्यादातर मुस्लिम समाज उसके विरोध में नजर आता है। परंतु वह है तो सही चाहे छोटे तबके के बीच हो। कदाचित उसे भी समाप्त करने के लिए कानून बनाने की जरूरत पड़े।


इसी तरह की कुप्रथाएं सभी धर्मों में होंगी जो एक बार चलन में आ गयीं और समाज के बड़े वर्ग में स्वीकार कर ली गयीं तो फिर उन्हें समाप्त करना टेढ़ी खीर हो जाता है।
हिन्दू समाज में बाल विवाह, दहेज, छुआछूत जैसी कुरीतियाँ कानून बनाने पर भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई हैं।


असल में इन्हें केवल कानून से समाप्त करना एक ऐसी बचकानी सोच है जिससे बाहर निकलना जरूरी है और इसके बदले परिपक्वता के साथ इन बुराइयों को दूर करने की कोशिश की जाए तो उसमें सफलता मिल सकती है।


देखा जाए तो सभी बुराइयों की जड़ शिक्षा का अभाव, जीवन यापन और रोजगार के पर्याप्त साधन न होने से गरीबी का होना और सही राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व का न होना है। यदि प्रत्येक व्यक्ति तक राष्ट्र की सम्पत्ति और संसाधनों का उचित बँटवारा हो जाए तो फिर सामाजिक कुरीतियाँ हों या धार्मिक पाखंड और ऊँच नीच की भावना तो इनका समाप्त होना निश्चित है।


कश्मीर और भेदभाव


इसे कुप्रथा तो नहीं कहा जा सकता बल्कि अपने को दूसरों से अलग ही नहीं बल्कि श्रेष्ठ समझने की मानसिकता कहा जा सकता है। कश्मीर के साथ भी ऐसा ही हुआ है।
यह ‘लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पाई’ का भी उदाहरण है जब जम्मू कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के बाद भी वहाँ अस्थाई तौर पर ही सही पर कुछ ऐसी विशेष रियायतें दी गयीं और वे भी संविधान के जरिए कि वे आज तक देशवासियों के साथ भेदभाव रूपी गले की हड्डी और इस राज्य की प्रगति का रोड़ा बनी हुई हैं।


धारा 370 और 35ए


संविधान में ये धाराएँ टेम्परेरी, हटाई जा सकने वाली और कुछ समय के लिए विशेष सहायता देने के लिए जोड़ी गयीं थीं। उस समय के प्रशासकों ने ऐसी परिस्थितियाँ बना दीं कि ये एक तरह से स्थाई ही बन गयीं और अब इन्हें हटाने की बात करते ही खूनखराबे तक की धमकियाँ आने लगती हैं।

इन प्रावधानों के कारण ही इस राज्य के विकास के लिए केंद्रीय सरकार की बहुत सी लाभकारी योजनाओं का न पहुँच पाना है।

सब से बड़ी बात यह है कि एक तो वहाँ पर्यटन और सेव तथा सूखे मेवे के निर्यात के अलावा कोई और व्यापार का जरिया न के बराबर है और दूसरे किसी भी सरकारी या गैर सरकारी प्रतिष्ठान या उद्योग के लगने की सम्भावना नहीं है क्योंकि यहाँ अलगाववादी ताकतों की दहशत और गुंडागर्दी के सामने टिकने का जोखिम कोई नहीं लेना चाहता।


इस राज्य के बाहर का व्यक्ति यहाँ जमीन जायदाद न तो खरीद सकता है और न ही इस राज्य की कोई महिला दूसरे राज्य के व्यक्ति के साथ शादी करने के बाद अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकती है। उसके सारे अधिकार समाप्त हो जाते हैं।


इन धाराओं की बजह से इस राज्य को यह छूट मिली हुई है कि वह भारतीय संविधान को लागू करे या नहीं क्योंकि उसे अपना संविधान बनाने की छूट थी।

अगर यहाँ भी एक संविधान, एक कानून और पूरे देश के साथ मिलकर काम करने और निर्णय लेने की नीति होती तो आज यह राज्य अन्य राज्यों की तरह तेजी से तरक्की कर रहा होता।


अगर ये धाराएँ समाप्त हो जायें तो पाकिस्तानी घुसपैठिए और रोहिंग्याओं को यहाँ पनाह नहीं मिल पाएगी। इससे जो पूरे देश से अलग थलग पड़े रहने और राष्ट्र की मुख्य धारा से वंचित रहने की मजबूरी है, वह नहीं रहेगी और संसाधनों का तेजी से विकास हो सकेगा।
अभी जो केवल रक्षा, विदेशी मामले और संचार तक ही केंद्र सरकार सीमित रहने के लिए बंधी हुई है, इन धाराओं के समाप्त होने पर कृषि, शिक्षा, विज्ञान, प्रौ़द्योगिकी और व्यापार करने की केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ इस राज्य को भी उसी प्रकार मिल सकेगा जैसा अन्य राज्यों को मिलता है।


परंतु दिक्कत यह है कि बिना राज्य की सहमति से इन्हें समाप्त भी नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में सब से पहले जम्मू कश्मीर में ऐसे वातावरण का निर्माण करना होगा जिससे वहाँ के राजनीतिक दलों पर जनता की ओर से यह दबाव हो कि इन धाराओं का हटना आम नागरिकों के हित में है।


इन धाराओं का समाप्त होना राज्य के हित में इसलिए भी है क्योंकि उद्योग और निजी क्षेत्र में काम करने वाले यहाँ पैसा नहीं लगाते। यहाँ तक कि अच्छे डॉक्टर और दूसरे प्रफेशनल इसलिए नहीं आते कि उनके यहाँ जीवन भर रहने पर भी कोई अधिकार नहीं होंगे।


यह जो जमीन जायदाद खरीदने पर पाबंदी है वह असल में अंग्रेजों द्वारा यहाँ आकर बसने और फिर महाराजा के अधिकारों तक पर अंकुश लगाने की नीयत और कुटिल चाल से बचने के लिए लगाई गयी थी। अब स्वतंत्र भारत में ऐसा कोई डर नहीं है और जब जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तो कोई आशंका भी नहीं है तो फिर इस धारा का कोई मतलब नहीं रह जाता।


इसी तरह कॉलेज में दाखिले और कोई रोजगार या नौकरी करने पर अभी जो प्रतिबंध है वह हट जाए तो राज्य का आर्थिक विकास कितना होगा इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। इन धाराओं के हटने का सबसे बड़ा फायदा इस राज्य को जो मिलेगा वह है  पाकिस्तान की तरफ से किए जा रहे आंतकवाद की रोकथाम करना आसान हो जाएगा।


जब राज्य के निवासियों का ध्यान शिक्षा प्राप्त करने, काबिल होकर रोजगार करने और आधुनिक संसधान अपनाने की तरफ लग जाएगा तो वह स्वंय ही पाकिस्तानी पोपेगेंडे की तरफ से आंख मूंद लेगें और किसी भी हरकत को शुरू में ही समाप्त करने के प्रति सरकार के साथ मिलकर अपना बहुमूल्य योगदान करने लगेंगे।


इन हालात को देखते हुए जितनी जल्दी हो इन धाराओं को समाप्त कर देना चाहिए ताकि जम्मू कश्मीर के लोग उसी प्रकार देश के संसाधनों का इस्तेमाल कर सकें जैसे अन्य देशवासियों के लिए होता है।

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