शुक्रवार, 19 जून 2020

तनाव में शरीर की नहीं, उलझनों की हत्या कीजिए








हमारे देश में ही क्यों, दुनिया भर में ऐसा व्यक्ति शायद ही मिले जिसने जीवन के किसी मोड़ पर तनाव, अवसाद, निराशा की अवस्था में आत्मघात यानी अपनी हत्या करने के बारे में कभी न सोचा हो। हो सकता है किसी की कहानी या उसकी परेशानी सामने न आई हो पर यह सच है कि अगर जीवन है तो उसमें उतार चढ़ाव भी आयेंगे, हल्के, मंदे और अच्छे दिन भी देखने को मिलेंगे, अपने मन की न होने की घटनाएं भी होंगी और कभी कोई ऐसी बात भी होगी कि लगे कि अब और नहीं जीना!

हिटलर से हार बर्दाश्त नहीं हुई तो उसने अपने को गोली मार ली। चर्चिल, लिंकन, मार्टिन लूथर किंग से लेकर और भी न जाने विश्व की कितनी हस्तियां आत्महत्या के दरवाजे तक जाकर लौट आईं होंगी और उन्होंने खुद को मारने के बजाय अपनी उलझनों को खत्म करने या कहें कि अपने अतीत की हत्या करने को बेहतर समझा होगा।

शायद इसीलिए अदालतें भी जीने के अधिकार की तरह मरने की ख्वाहिश या अधिकार को मानने लगी हैं। अगर कोई जीना नहीं चाहता तो उसे मरने देने में क्या हर्ज है? लेकिन यहीं यह भी सच है कि मरना हो या जीना, दोनों में से एक भी आसान बात नहीं है, जहां जीने के लिए हिम्मत और साधन चाहिए वहीं मरने के लिए भी ये ही दोनों चीजें चाहिएं, और कुछ नहीं !

भावनाओं का खेल

अक्सर देखा गया है कि जो लोग भावुक होते हैं या ऐसे पेशे से जुड़े होते हैं जिनमें अपनी या किसी दूसरे की भावनाओं को व्यक्त करना होता है तो उनके लिए कभी कभी यह भेद समझना कठिन हो जाता है कि जो वे कर रहे हैं, कहीं वह ही तो सच नहीं और जो वे स्वयं हैं, उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है।

इन लोगों में अधिकतर वे लोग आते हैं जो अपने अभिनय, पेंटिंग, शिल्प या मूर्तियां गढ़ने के लिए विख्यात हैं। जब तक वे अपने काम को एक असाइनमेंट की तरह लेते हैं, तब तक तो ठीक रहता है, लेकिन जैसे ही उन्होंने उससे अपने स्वयं के व्यक्तित्व को जोड़ लिया तो वे अपने पात्र या अपनी बनाई कलाकृति की तरह सोचने लगते हैं, मतलब कि उसे अपने ऊपर सवारी करने देते हैं और तब वह इस तरह का व्यवहार करते हैं जो उनका खुद का नहीं उस रचना का होता है, जिसका निर्माण करने में उन्होंने अग्रणी और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

अगर यह मनस्थिति लंबे समय तक रही तो उसके परिणाम दोहरे व्यक्तित्व को ढोने की तरह निकलते हैं और अगर ध्यान न दिया तो इसका नतीजा आत्मघाती हो जाता है।

ऐसे लोग जिन्हें हम कलाकार, लेखक, गायक, नर्तक, शिल्पी आदि के नाम से जानते हैं, उनकी नियति यही है कि जो करो, उसमे लिप्त न होकर उसे केवल एक असाइनमेंट की तरह लें और ऐसा होने पर वे उन लोगों की लीला को भी समझ लेंगे जो उनका शोषण या उनकी भावुकता का फायदा उठाते हुए या उनकी हैसियत के कम होने की हालत में उन पर अपने दबदबे के कारण हावी होना चाहते हैं। इन्हें हम मगरमच्छ की संज्ञा दे सकते हैं जो किसी की जरा सी कमजोरी का फायदा उठाने में कभी पीछे नहीं रहते।

समझौता या सामना

जिन्दगी की दौड़ में न चाहते हुए भी ऐसी स्थितियां आती ही हैं जिनमें या तो यह चुनना होता है कि जो भी काम हम कर रहे हैं, चाहे नौकरी हो या अपना व्यवसाय, उसमें किसी तरह का दबाव, धमकी या नुकसान होता दीख रहा हो तो अपने सामने सिर्फ दो विकल्प होने पर किसे चुनें एक या तो हालात से या उनके लिए जिम्मेदार व्यक्ति से समझौता कर लिया जाय  या दूसरा यह कि ताल ठोककर सामना करने के लिए तैयार हो जाया जाए।

इसे एक कहानी के जरिए समझते हैं। एक व्यक्ति है जिसका नाम मान लीजिए कि श्याम लाल है। वह एक सरकारी अथवा प्राइवेट, एक ऐसे दफ्तर में काम करता है जिसमें बाहरी लोगों यानी पब्लिक से संपर्क करना पड़ता है यानी अधिकारी और जनता का रिश्ता है।

श्याम लाल अपने काम में माहिर है, वह नियमानुसार काम करता है और फैसला लेता है ताकि उसकी तरफ से न तो किसी को कोई परेशानी हो और न ही किसी के साथ ढील या नरमी बरतने का आक्षेप उस पर लगाया जा सके।

श्याम लाल का बॉस रामसिंह है जो एक तरफ अपनी सख्त मिजाजी के लिए जाना जाता है तो दूसरी तरफ वह अपने से ऊपर के अधिकारियों को खुश करने या अपनी कुछ अतिरिक्त कमाई के लिए मौकों की तलाश में रहता है। मतलब वह शातिर दिमाग है और इस जुगत में रहता है कि वह अगर कुछ गड़बड़ी भी करे तो उस पर दोष न आए और जरूरत पड़ने पर वह इसके लिए अपने किसी मातहत पर इस सब का ठीकरा फोड़ सके, अर्थात वह तो साफ बच जाए और कोई दूसरा फैंस जाए।

राम सिंह अपने फायदे के लिए श्याम लाल पर दबाव डालता है कि वह उसके कहे अनुसार काम करे और नियमों की परवाह न करते हुए उसके मुंह जबानी आदेशों का पालन करे।

राम सिंह के सामने दो रास्ते हैं, एक यह कि वह अपने दिल और दिमाग को गलत काम करने के लिए मना कर अपने बॉस के कहे अनुसार कार्यवाही करे और दूसरा यह कि बॉस  का कोपभजन बने। वह यह देखता है कि उसके साथ काम करने वाले भी बॉस की सख्ती और दबदबे के कारण उसकी बात मान लेने में ही अपनी भलाई समझते हैं। उसके सामने सांप छछूंदर जैसी स्थिति हो जाती है कि न निगलते बने और न ही उगलते ही बने।

वह घर आता है और अपनी विवशता पर चीख चीख कर रोता है, निराशा और तनाव इतना है कि जिंदगी बोझ लगने लगती है, वह परिवार वाला है, अपनी जिम्मेदारियों को भी समझता है लेकिन साथ ही गलत काम कर जीवन भर डरते हुए जीना भी नहीं चाहता। कशमकश इतनी है कि मन में उलझन का कोई तोड़ नहीं मिलता और उसकी हालत शरीर और दिमाग दोनों ही तरफ से टूटने जैसी हो जाती है।

वह पार्क में बैठता है, बाजार में बेमतलब घूमता रहता है और फिर बिना कुछ सोचे नदी की तरफ निकल जाता है। नदी को बहते देखता है तो सोचता है कि इसके साथ ही बह जाए लेकिन तब ही उसकी उलझन के सुलझने जैसा एक झटका उसे लगता है। वह सोचता है कि इस तरह तो रामसिंह जीत जाएगा और वह हार जाएगा। वह निर्णय करता है कि हारेगा नहीं बल्कि रामसिंह का सामना करेगा।

निर्णायक कदम

अगले दिन श्याम लाल अपने बॉस राम सिंह का सामना करते हुए उसके कहे मुताबिक और नियमों के विरुद्ध कुछ भी करने से इंकार कर देता है। परिणाम उसकी गोपनीय रिपोर्ट के खराब कर दिए जाने, पब्लिक से रिश्वत लेने, अपने पद का दुरुपयोग करने और आगे बढ़ने के सभी रास्ते बंद हो जाने के रूप मै निकलता है।

राम सिंह यहीं नहीं रुका, वह उसे सबके सामने अपमानित करने से नहीं चूकता और उसका मानसिक संतुलन बिगाड़ने का कोई मौका नहीं जाने देता। ऐसी ही एक अवस्था में श्याम लाल सब कुछ भूलकर राम सिंह का गला पकड़कर ऐसा दांव लगाता है कि वह जमीन पर धराशाई हो जाता है।

इसके बाद श्याम लाल अपने विभागाध्यक्ष के पास जाकर रामसिंह को पटकने की बात और उसका कारण भी विस्तार से बता देता है। वह वहां से वापिस आ रहा होता है तो उसे रामसिंह अंदर कमरे में जाता दिखाई देता है।

विभागीय जांच में श्याम लाल निर्दोष और रामसिंह के काले कारनामों का पर्दाफाश हो जाता है। श्याम लाल को एक नसीहत मिलती है  और राम सिंह को जेल हो जाती है।
यह कहानी यहीं तक है लेकिन इसे अन्याय के सामने न झुकने की मिसाल और अपनी उलझन के सुलझने और आत्महत्या की प्रवृत्ति के खिलाफ एक उदाहरण के रूप में तो रखा ही जा सकता है !


अब प्रश्न यह है कि श्याम लाल क्या अपने वर्तमान पद पर रहे, कोई दूसरी नौकरी या व्यवसाय कर ले या इतनी बड़ी दुनिया में अपने लिए कोई नई जगह तलाश करे जहां शोषण न होता हो, ईमानदारी से सब काम होता हो और मेहनत का पूरा मुआवजा मिलता हो ? जरा सोचिए और चिंतन कीजिए कि यदि किसी के सामने समझौता करने और सामना करने में से एक को चुनना हो तो किसे चुना जाएगा ! जरा सोचिए ?

अंत में

विश्व योग दिवस के अवसर पर कुछ ऐसे आसन या क्रियाएं सीख कर उन की प्रैक्टिस करना शुरू कर सकते हैं, जिनसे तनाव, नकारात्मक विचार, निराशा और आत्मघाती सोच का इलाज हो सकता है। इसके अतिरिक्त अतीत को ढोते रहना या भविष्य के बारे में सोच कर अपना वर्तमान खराब कर लेने में कोई समझदारी नहीं है।


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