शुक्रवार, 26 जून 2020

भारत चीन विवाद गलवान घाटी और लद्दाख









यह सब ही जानते हैं कि भारत और चीन के बीच 1962 के युद्ध से दोनों शक्तियों के संबंध मित्रता के स्थान पर शत्रुता के हो गए थे। चीन ने इसकी शुरुआत उससे काफी पहले तिब्बत को हड़पने से कर दी थी और तिब्बतियों तथा दलाई लामा के साथ भारत के सहयोग ने चीन को हमारे साथ दुश्मनी करने की नींव डालने का काम किया था।

अक्टूबर 1962 में अपनी सीमा की रक्षा के लिए भारत तिब्बत सीमा पुलिस आईटीबीपी का गठन इसी प्रथम उद्देश्य को लेकर किया गया कि चीन की विस्तारवादी चालों को रोककर भारतीय क्षेत्र की सुरक्षा की जाय।

अद्भुत क्षमता का प्रदेश

लद्दाख को समझना हो तो यह प्रदेश देखने जाना होगा लेकिन यह प्रत्येक के लिए संभव नहीं है क्योंकि खतरनाक मौसम, ऑक्सीजन की कमी और दुर्गम रास्ते तथा बर्फ की ऐसी किस्म जो छूने भर से शरीर में सुराख कर दे, किसी के भी उत्साह पर पानी फेर सकते हैं।

इसी के साथ यह भारत का अकेला ऐसा प्रदेश है जो अगर ढंग से विकसित हो जाय तो स्विट्जरलैंड के बर्फीले प्रदेशों को भी मात दे सकता है जहां इसी सौंदर्य को देखने के लिए दुनिया भर से सैलानी आते हैं।

मुझे लद्दाख में लेह से लेकर चुशूल सीमा तक जाने का अवसर मिला है। उसके वर्णन से इस क्षेत्र को समझना आसान होगा।

आईटीबीपी के लिए इस क्षेत्र में उसकी कार्यविधि पर एक फिल्म बनानी थी। चलिए यहां की सैर के लिए आगे बढ़ते हैं।

लेह हवाई अड्डे पर अपनी टीम के साथ उतरने से पहले वायुयान से ही जो इस क्षेत्र का विहंगम दृश्य देखा तो अभूतपूर्व आश्चर्य और सौंदर्य का अनुभव हुआ। क्या  प्रकृति इतनी
कृपालु हो सकती है, यह सोचते हुए नीचे उतरना हुआ और वहां जो दिख रहा था उस पर से नजरें हट ही नहीं रहीं थीं।

आईटीबीपी के गेस्ट हाउस में आए तो हिदायत दी गई कि कुछ समय के लिए बाहर नहीं निकलना है क्योंकि शरीर को वहां के मौसम के अनुकूल बनाने के लिए यह जरूरी है। टीम के दो सदस्य चुपचाप अपनी उम्र के जोश में बाहर निकल गए तो तुरंत अधिकारियों ने चेतावनी दी कि इसका परिणाम उनके गंभीर रूप से बीमार होने से निकल सकता है। उन्हें तुरंत लौटने को कहा गया। लापरवाही के कारण बीमार होने का उदाहरण अगले दिन एक पूजा स्थल पर मिल गया जिसमें एक सैलानी दंपति को निर्देशों का उल्लघंन करने पर अपने 8-10 साल के बेटे और स्वयं अपनी जान जोखिम में आ जाने की घटना का सामना करना पड़ा।

शूटिंग पर जाने से पहले हम लोगों को मौसम से रक्षा के लिए भारी भरकम जैकेट दी गईं और कपड़ों की कई परतें पहननी पड़ीं,  फिर भी जो भी अंग जरा सा खुला रहा वह ठंड से ठिठुराने का अहसास दिलाता रहा।

आईटीबीपी के वाहन टाटा 407 पर सवार होकर लेह से चले।  जगह जगह रुकते हुए बॉर्डर तक जाना था। कुछ ही दूर जाने पर ही बर्फ के दर्शन होने लगे जिसे छूने से मना किया गया क्योंकि यह बर्फ एक तरह से ठोस सिल्ली की तरह न होकर भुरभुरी जैसी थी। इसे नंगे हाथ से छूने पर घाव हो सकते हैं जो खतरनाक है।

आज जो हम टीवी पर लद्दाख की सड़कें देखते हैं, तब उनका अस्तित्व न के बराबर था। सड़क तो थीं लेकिन पथरीली, बंजर और बहुत ही कष्ट दायक। जरा सोचिए, एक तरफ लटकती बर्फ से ढकी पहाड़ियां और दूसरी तरफ ज्यादातर इलाके में गहरी खाई जिसमें अगर फिसल गए तो किसी को पता भी न चले। इसके विपरीत ये दुर्गम ढलान इतने सुन्दर कि उन्हें गहराई तक देखने के लोभ से बचना कठिन। कभी दूर तक सपाट इलाका आ जाता तो लगता कि विशाल प्याले जैसी उसकी बनावट इतनी मनभावन कि जैसे प्रकृति ने कोई मनोरम चित्र बनाकर हमारे सामने रख दिया हो।

हमें हिदायतों के मुताबिक शूट करते हुए चुशूल सीमा तक पहुंचना था। यह कठिन रास्ता प्राकृतिक सौंदर्य का रसपान करने और दृश्यों को कैमरे में समेटने की लालसा से काफी आसान हो गया।

उस समय यह प्रदेश तो क्या पूरा लेह लद्दाख का अधिकतर क्षेत्र पेड़ पौधों और हरियाली से वंचित था। इसकी कमी वहां के विभिन्न रंगों की पर्वत श्रृंखलाएं पूरा कर रहीं थीं। ऐसे पहाड़ देश में तो क्या विदेशों में भी नहीं देखने को मिलेंगे जो इतने आकर्षक हों जैसे इस इलाके में हैं।

चीन की तैयारियां

चुशूल क्षेत्र में एक पहाड़ी पर तैनात आइटीबीपी की चैकी तक पहुंचे तो वहां से चीनी क्षेत्र साफ नजर आ रहा था। अपनी तैयारी के सामने उनकी जो तैयारियां देखीं तो लगा कि चीन जैसे किसी युद्ध के लिए साज और समान वहां जुटा रहा है जिसके सामने हम कहीं नहीं ठहरते। आधुनिक दूरबीन से देखने पर उनकी सड़कें और सैनिक टुकड़ियां तथा वहां किए गए विशाल निर्माण हमारा मुंह चिढ़ाते हुए से लगे।

यहां जो सीमा थी वह नदी की एक पतली धारा के दोनों ओर कांटेदार तारों से बनी थी।

चैकी से नीचे आए तो सीमा पर जैसे ही शूटिंग के लिए कैमरा लगाया कि लाउडस्पीकर से आवाज आई ‘नो शूटिंग, नो शूटिग, हिंदी चीनी भाई भाई।‘ इस क्षेत्र में दोनों देशों के बीच संधि के मुताबिक किसी भी तरह के शस्त्र ले जाने की मनाही थी लेकिन कैमरे तक पर पाबंदी है, यह जानकर आश्चर्य हुआ। कैमरा टीम को वापिस भेज दिया तब कहीं शांति हुई वरना अधिकारियों के मुताबिक किसी भी क्षण चीन की तरफ से गोलीबारी होने का अंदेशा था।

दुर्गम क्षेत्र के दुर्लभ क्षण

लौटते हुए शाम होने लगी थी और हमें वापिस पहुंचना था लेकिन तब ही हमारे वाहन में कुछ ऐसी खराबी आ गई कि वहां रात भर रुकने के अतिरिक्त कोई चारा न था। अंधेरे की चादर पसरने लगी थी और चारों ओर सुनसान में किसी और चीज का तो नहीं पर खराब मौसम का डर जरूर लग रहा था। अचानक कहीं दूर एक टिमटिमाती रोशनी दिखी तो हमारे साथ आए आईटीबीपी के अधिकारी ने भरोसा दिलाया कि अब डरने की कोई बात नहीं।

यह एक छोटी चैकी थी जिसमें सैनिक इस समय खाना आदि बना रहे थे। हम ऊंची पहाड़ी से अंधेरे में टॉर्च के सहारे किसी तरह उस चैकी तक पहुंचे और वहां उन सैनिकों को अपनी परेशानी बताई तो न केवल उन्होंने रात गुजारने का इंतजाम किया बल्कि हमारी टीम के खाने का बंदोबस्त भी और इसी के साथ उनकी और हमारी कहानियां सुनने और सुनाने का दौर देर रात तक चलता रहा। सोने से पहले वे कहने लगे कि अब वे हमारी कहानियों को आपस में ही दोहराते हुए अपना समय गुजारा करेंगे।

जरा सोचिए उस सैनिक की व्यथा जो एकांत में महीनों तक अकेलेपन के दौर से गुजरता है फिर भी चेहरे पर शिकन नहीं लाता। उसे अपने घर से अपनी ड्यूटी तक पहुंचने में उस समय कई कई दिन तक पैदल चलकर आना होता था। न अच्छी सड़क, न कोई वाहन या साधन, बस अपना सामान लादकर कैंप तक पहुंचना और वहां दिन रात अपने शरीर को मौसम की मार सहने के काबिल बनाए रखना होता था ताकि शत्रु पर निगाह रखने में हल्की सी भी चूक न होने पाए।


विडम्बना यह भी कि सैनिकों को जो जैकेट और जूते मिलते थे, वे बढ़िया क्वालिटी के न होने पर सैनिकों की रक्षा करने में असमर्थ थे। बहुत कोशिशों के बाद उन्हें अच्छी क्वालिटी की इंपोर्ट की गई सामग्री मिलनी शुरू हुई। हालांकि बड़े अधिकारियों और अतिथियों के लिए यह सामग्री पहले से इंपोर्ट की जाती रही थी।

एक सैनिक ने इसके लिए आईटीबीपी के एक महा निदेशक जोगिंदर सिंह का आभार प्रकट किया जिनके आदेश से उन्हें यह जीवनरक्षक सामग्री मिलनी शुरू हुई। जब दिल्ली में उनसे इस घटना की चर्चा हुई तो उनका अपने सैनिकों के प्रति आदर और सरकारी लालफीताशाही के लिए क्रोध साफ दिख रहा था। कदाचित  आज ऐसे ही अधिकारियों के प्रयासों से लद्दाख में तैनात सैनिक शत्रु को सबक सिखाने के योग्य हुए हैं।

इस चैकी से सैनिकों से विदाई लेने से पहले एक और घटना का जिक्र जरूरी है जो सरकार की उदासीनता का उदाहरण है। प्रातः काल जब शौच के लिए बाहर आए तो सामने एक बांस की खपच्ची को टाट से लपेटकर बने शौचालय में निवृत्त होना पड़ा। यह न केवल अमानवीय था बल्कि एक सैनिक का अपमान भी था। आज की स्थिति क्या है, इसके बारे में तो ज्ञात नहीं पर उस समय यह देखकर दुःख बहुत हुआ। यह दुःख तब और ज्यादा लगा जब अधिकारियों के कैंप के बढ़िया शौचालय देखने को मिले।

लौटते हुए रास्ते में घोड़े, गधे और यहां पाए जाने वाले पशु कियांग के झुंड देखने को मिले। सपाट मैदान और इन पशुओं को हांकते यहां के निवासी। आसपास के गांव और उनमें रहने वाले लद्दाखी वास्तव में प्रशंसनीय हैं क्योंकि ये हर हाल में खुश रहने वाले लोगों में आते हैं। यहां तक सरकारी योजनाओं का लाभ आसानी से नहीं पहुंच पाता लेकिन इस समय जो सांसद है, वे इस क्षेत्र का सुनियोजित और पूर्ण विकास करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

यह वृतांत प्रस्तुत करने का मकसद पाठकों को इस क्षेत्र की महत्ता, यहां का प्राकृतिक सौंदर्य और हमारी तैयारियों से रूबरू कराना है। इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्तमान में हम भली भांति तैयार हैं और सैन्य दृष्टि से शत्रु से किसी भी प्रकार से कम नहीं है लेकिन फिर भी इतना तो कहना ही होगा कि यदि इस क्षेत्र का विकास सुनियोजित तरीके से किया जाता तो न केवल शत्रु का भय नहीं रहता बल्कि पर्यटन और आवागमन का यह अंतरराष्ट्रीय केंद्र होता।

पिछले कुछ वर्षों में इसकी जितनी कायापलट हुई है, अगर उससे पहले भी इस तरह के प्रयास होते तो किसी की हमारी जमीन की तरफ टेढ़ी नजर से देखने की कतई हिम्मत नहीं होती।

इस कहानी को अगले स्तंभ में भी जारी रखा जाएगा और कुछ ऐसे रहस्यों तथा जानकारियों से परिचित कराया जाएगा जो पाठकों के लिए ज्ञान और मनोरंजन का साधन होंगी।


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