शनिवार, 25 सितंबर 2021

आश्रम, अखाड़ा, मठ का अपराधीकरण रोकना ही धर्म है

हिंदू धर्म बहुत प्राचीन, सनातन और जीवन शैली के रूप में जाना जाता है। इसके अनुयायी इसकी महानता से गदगद दिखाई देते हैं। यह धर्म  सहनशील, परोपकारी, दयावान, मैत्री और सद्भाव का पोषक तथा मनुष्य की पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। सभी धर्मों की भांति इसमें भी भाईचारे, मिलजुलकर रहने और दूसरों का सम्मान तथा बराबर का स्थान देने की बात कही गई है।


यहां तक तो ठीक है लेकिन जब धर्म को कारोबार का जरिया बना दिया जाता है तो उसमें वे सभी दोष आ जाते हैं जो किसी भी व्यापार के गुण माने जाते हैं जिसमें प्रतियोगिता,  दूसरे की हानि, झूठ, फरेब, बेईमानी, धोखाधड़ी, हेराफेरी, कालाबाजारी, जमाखोरी, मिलावट जैसी चीज़ों को ज़रूरी समझा जाता है। इसे ही धर्म हो या व्यापार, उसका अपराधीकरण कहा जाता है। 

संन्यास और वैराग्य

हिंदू धर्म में चार आश्रम अर्थात ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास को जीवन जीने के तरीक़े के रूप में अपनाने की बात कही गई है। यहां हम केवल संन्यास की बात करना चाहते हैं क्योंकि इसे लेकर समाज में जो गंदगी फैलती है उसे जानना और साफ़ करना आवश्यक है। 

कुछ लोग छोटी उम्र से ही संसार से विरक्त होने का बहाना कर घर से भाग जाते हैं ।  इसका कारण ज्यादातर  घर परिवार के काम तथा पढ़ाई लिखाई में मन न लगना, मातापिता का डर और कोई गलत काम करने पर सज़ा मिलने की आशंका हो सकती है। कुछ विरले ही ऐसे होते हैं जिनके मन में बचपन से ही जीवन का सार जानने, आत्मा और परमात्मा के संबंध में जिज्ञासा होने और शांति प्राप्त करने की इच्छा होती है और वे बताकर या बिना कुछ कहे घर द्वार का त्याग कर देते हैं। 

वास्तविक संन्यासी के मन में व्यक्तिगत स्वार्थ के स्थान पर सर्वजन सुखाए, सर्वजन हिताय की भावना रहती है। पद, धन, सुविधाओं से भरपूर जीवन का महत्व न होकर सामान्य जन, समाज और देश की उन्नति का कार्य प्रमुख रहता है। ऐसे व्यक्ति क्रोध, हिंसा, भय, अहंकार से बचते हुए सादा जीवन जीने का प्रयास करते रहते हैं।

इसके विपरीत ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक होती है जो संन्यासी का चोला इसलिए ओढ़ते हैं ताकि वे इस रूप में लोगों को भरमा सकें, उनकी श्रद्धा, आस्था, विश्वास के साथ छल कपट कर उनका शोषण कर सकें और व्यक्तिगत रूप से अकूत धन संपदा, ज़मीन जायदाद जमा कर सकें। 

आदि शंकराचार्य की विरासत

आठवीं सदी में दक्षिण भारत के केरल प्रांत में कलडी नामक गांव जो अब कोच्चि के उपनगर का रूप ले चुका है, प्रभु भक्ति में लीन धार्मिक विधि विधान को मानने वाले ज्ञान के प्रतीक दंपति नमबूदरी ब्राह्मण शिवगुरु और आर्यम्बा रहते थे। उन्हें भी  अपने इष्टदेव भगवान शिव से संतान की कामना थी। एक रात आर्यम्बा ने स्वप्न में देखा कि शिव जी पूछ रहे हैं कि उन्हें क्या ऐसी संतान चाहिए जिसकी उम्र तो बहुत हो लेकिन मूर्ख हो अथवा ऐसी संतान जिसकी आयु कम लेकिन विश्व में उसकी ख्याति हो। माता ने कम उम्र की संतान की इच्छा की। उसके बाद उनके यहां एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम उन्होंने शंकर रखा। 

यही शंकर आगे चलकर आदि शंकराचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए जिन्होंने केवल  32 वर्ष की आयु पाई। कहते हैं कि तीन वर्ष की आयु तक वेद कंठस्थ हो गए थे, संस्कृत में लिखे ग्रंथों का पाठ करने लगे थे और केवल एक बार सुनने पर उन्हें याद हो जाता था। बचपन से ही शंकर के मन में त्याग और वैराग्य की भावना थी और वे संन्यासी बनना चाहते थे। माता को चिंता हुई। पिता की मृत्यु हो चुकी थी इसलिए मां अपने पुत्र का विवाह करने की बात सोचने लगीं परंतु शंकर के मन में तो वैराग्य समाया हुआ था।

एक दिन शंकर नदी में स्नान कर रहे थे कि एक मगरमच्छ ने उनकी टांग अपने जबड़े में दबा ली। शंकर ने मां को पुकारा और कहा कि जब तक वे उसे सन्यास धारण करने की अनुमति नहीं देंगी, उसका बचना मुश्किल है। कहते हैं कि मां के हां कहते ही मगरमच्छ ने टांग छोड़ दीऔर शंकर की जान बच गई। यह कथा सत्य है या कल्पना या मिथक लेकिन शंकर के विरक्त होकर संन्यास लेने का मार्ग खुल गया। माता की विनती पर उन्होंने वायदा किया कि जब भी वे उन्हें पुकारेंगी, वे अवश्य आ जायेंगे और उनकी मृत्यु होने पर दाह संस्कार भी वही करेंगे। यह कहकर उन्होंने विदा ली और सत्य, आत्मा, परमात्मा और गुरु की ख़ोज में निकल पड़े। 

श्री आदि शंकराचार्य ने भारत में अध्यात्म, वेदांत, नैतिकता और हिंदुत्व को मजबूत करने और स्वयं को पहचानने की ऐसी परंपरा का श्रीगणेश किया कि आज तक उनके योगदान को याद किया जाता है। अनेक बार पूरे देश का भ्रमण किया, अनेक ग्रंथों की रचना की और अद्वैत दर्शन की व्याख्या की। इस कड़ी में उत्तर में जोशीमठ, दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में पुरी और पश्चिम में द्वारका में मठ स्थापित किए। 

आज जो पूरे देश में विभिन्न स्थानों पर मठ, आश्रम, अखाड़ों आदि के रूप में हिंदू धर्म के प्रचार प्रसार के लिए अनेक संगठन दिखाई देते हैं, उनका श्रेय आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित मठों को दिया जाता है। आज देश भर में सौ शंकराचार्य हैं, मठाधीश हैं, महा मंडलेश्वर हैं और हिंदू धर्म के नाम पर न जाने कितने आश्रम और अखाड़े चलते हैं।

धर्म का कारोबार 

समय के साथ इनमें से अधिकांश संगठन वैभव, विलासिता, अकूत संपत्ति जमा करने के साधन बनते गए। इसी के साथ राजनीति पर भी इनका असर दिखाई देने लगा।  अगर किसी दल या उम्मीदवार को जीत हासिल करनी है तो इन आश्रमों , मठों, अखाड़ों आदि का आशीर्वाद देने  के नाम पर समर्थन और चुनाव के लिए धन तथा अन्य साधन जुटाने के लिए इस्तेमाल होने लगा। 

सामान्य जनता द्वारा दिया गया धन जिसमें नकदी, आभूषण से लेकर ज़मीन जायदाद तक शामिल है, इन संगठनों के संचालकों को बिना किसी प्रयास के प्राप्त होने लगी। करोड़ों, अरबों, खरबों की संपत्ति इनके पास आ गई जिस पर सरकार की निगाह होते हुए भी अपने स्वार्थ के कारण आज तक उसने कोई ऐसा कानून, नियम, कायदा लागू नहीं किया जिससे यह पता लगाया जा सके कि यह विशाल संपदा कितनी है, किस के नाम पर है और कहां से आई है ?

कहने का तात्पर्य यह है कि धार्मिकता की आड़ लेकर ये संगठन व्यापार का केंद्र बनते चले गए और इनमें ऐसे लोग शामिल ही नहीं बल्कि हावी होते गए जिनका समाज कल्याण, परोपकार जैसी चीज़ों में कोई रुचि न होकर केवल शुद्ध व्यापार करने की भावना थी। 

इसका परिणाम यही हुआ कि इन स्थानों पर कब्ज़ा करने और किसी भी प्रकार से उसे बनाए रखने का  सिलसिला शुरू हो गया।  इनमें भ्रष्टाचार, अनैतिकता से लेकर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिया हत्या तक करने की घटनाएं आम हो गईं। इनमें धर्म, शुचिता, पवित्रता, नैतिकता, शुद्ध आचरण, विरक्ति, वैराग्य, सांसारिक वस्तुओं से मोह न रखने जैसी बातें न होकर षडयंत्र रचने, विलासितापूर्ण जीवन जीने और अपने अनुयायियों के बल पर किसी से भी कैसा भी मोलभाव करने की प्रवृत्ति शुरू हो गई । अब  हालत यह है कि प्रतिदिन ऐसे खुलासे होते हैं जिन पर यकीन नहीं होता लेकिन वे सत्य और वास्तविक हैं। 

इन सभी धार्मिक स्थलों जिनमें मंदिर भी सम्मिलित हैं, बहुत वर्ष पहले आई एक फिल्म का यह गाना चरितार्थ होता हुआ दिखाई देता है : चल संन्यासी मंदिर में, तेरा चिमटा मेरी चूड़ियां दोनों हम बजाएंगे, साथ साथ हम गायेंगे। 

समय की मांग

वर्तमान परिस्थितियों में क्या सामान्य जन द्वारा यह आवाज़ उठाने का समय नहीं आ गया है कि इन सभी धार्मिक संगठनों और उनके पास एकत्रित धन संपत्ति की जांच पड़ताल हो और इन्हें सरकार द्वारा अपने कब्जे में लेकर इस सब को जनता की सुविधा के लिए शिक्षा, चिकित्सा, सामुदायिक विकास और देश के लिए वैज्ञानिक शोध संस्थान बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाए ? 

इस के लिए सरकार से कोई पहल करने की उम्मीद रखना भ्रम पालना होगा क्योंकि इन सब को यदि सरकार का संरक्षण न मिला होता तो आज यह हालत होती ही नहीं। इसलिए ज़रूरी यह है कि जनता की ओर से आवाज़ उठे, इसके लिए चाहे बड़े पैमाने पर ऐसे लोगों को आंदोलन करना पड़े जो इन संगठनों और इनके संचालकों की असलीयत जानते हैं और इससे अधिक इनके बहकावे में आकर अपनी संपत्ति गवां बैठे हैं, अनाचार और शोषण का शिकार हुए हैं लेकिन संगठित न होने से कोई कदम न उठाने के लिए विवश हैं। 

इसे सामाजिक परिवर्तन और आंदोलन को अन्याय का प्रतिकार और अपने अधिकार का रक्षण करने की श्रेणी में रखा जा सकता है।  

शनिवार, 4 सितंबर 2021

शिक्षा नीति और शिक्षक की भूमिका

 शिक्षा नीति और शिक्षक की भूमिका

प्रति वर्ष सितंबर की पांच तारीख़ को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। इस साल भी इसे मनाया जाएगा या कहें कि केवल औपचारिकता निभाई जाएगी। प्रश्न यह है कि शिक्षक दिवस से अध्यापन का काम और अध्यापक का कर्तव्य उस महान व्यक्तित्व से कितना मेल खाता है जिनके नाम पर यह मनाया जाता है।

गुरु की परिभाषा

डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ऐसे शिक्षक थे जो मानते थे कि गुरु ऐसा होना चाहिए जिसकी सोच सब से अलग हो और वह अपने विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करने में सक्षम हो। इसी के साथ वे हिंदुत्व के कट्टर समर्थक थे और उनका विश्वास था कि यही वह कड़ी है जिससे पूर्व और पश्चिम को जोड़ा जा सकता है। वे भारतीय संस्कृति के प्रबल समर्थक थे।  हिंदुत्व को एक ऐसी जीवन शैली मानते और प्रचारित करते थे जिसमें मनुष्य को मानवता, सहिष्णुता और वसुधैव कुटुंबकम् का पाठ पढ़ाया जाना शिक्षक का पहला कर्तव्य माना गया है।

शिक्षक के रूप में भारत और विदेशों के प्रसिद्ध और उच्च संस्थान उनकी कर्मस्थली रहे और उन्हें एक विद्वान ही नहीं बल्कि अपने शिष्यों के साथ जीवन भर मधुर तथा आत्मीय संबंध बनाए रखने के लिए जाना जाता है।

डॉक्टर राधाकृष्णन की सोच की समीक्षा करना तब और जरूरी हो जाता है जब हम वर्तमान समय में सरकार द्वारा बनाई गई शिक्षा नीति की चर्चा करते हैं।  शिक्षकों की भूमिका को लेकर विशेष रूप से बहस की जानी चाहिए क्योंकि नीति की सफलता उन्हीं पर निर्भर है। देश में शिक्षक वर्ग तैयार करने, उन्हें प्रशिक्षण देकर इस काबिल बनाना कि वे अपने  विद्यार्थियों को ग्लोबल सिटीजन बनने के लिए तैयार कर सकें, इसका भार शिक्षक पर ही है।

इस सब के लिए वर्षों से अनेकों संस्थान कार्य कर रहे हैं। यदि इन उच्च शिक्षा संस्थानों से निकले विद्यार्थियों और वहां उपलब्ध सुविधाओं के इस्तेमाल में कुशलता हासिल करने के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो घोर निराशा का सामना करना पड़ेगा। कुछ संस्थान तो सफेद हाथी बन गए हैं, उनमें भविष्य के शिक्षक तैयार करने की सामग्री का उपयोग ही नहीं किया जाता और वह वर्षों से जंग खा रही है।

बहुत खोज करने पर एकाध संस्थान ही ऐसा मिला जहां सरकार द्वारा जनता से कर के रूप में प्राप्त धन का सही इस्तेमाल हो रहा हो। हालांकि निजी तौर पर संचालित कुछ इंस्टीट्यूट शानदार काम कर रहे हैं लेकिन वहां पढ़ने के बाद विद्यार्थियों में से अधिकतर का लक्ष्य संपन्न देशों में मोटे वेतन वाली नौकरी हासिल करना होता है।

लक्ष्य की पूर्ति

नई शिक्षा नीति में 2030 तक यानी अगले दस वर्षों में योग्य शिक्षक तैयार करने का निर्धारित  लक्ष्य पूरा हो पाएगा, इसमें भारी संदेह है। यहां इस बात का उल्लेख करना ज़रूरी है कि साठ के दशक से अब तक सभी सरकारें वोकेशनल एजुकेशन, स्किल डेवलपमेंट, गांव देहात में कारीगरों को तैयार करने से लेकर आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्थानीय तौर पर मौजूद विशाल सामग्री के उपयोग से कौशल विकास करने जैसे राग अलाप रहीं हैं।

इन चीजों पर जितना धन खर्च हो चुका है, उसके अनुसार देश में बहुत बड़े पैमाने पर रोज़गार पैदा हो चुका होता, बेरोज़गारी मिट जाती और देश आत्मनिर्भर हो जाता लेकिन ऐसा कुछ देखने को नहीं मिलता।

इसकी पुष्टि के लिए यह बताना आवश्यक है कि भारत में केवल पांच प्रतिशत विद्यार्थियों ने वोकेशनल ट्रेनिंग ली है जबकि अमरीका में 52, जर्मनी में 75 और दक्षिण कोरिया में 86 प्रतिशत लोग किसी न किसी कार्य में पूरी तरह से काबिल और सक्षम हैं और यही कारण है कि उनका औद्योगिक विकास हमारे देश से बहुत अधिक हुआ है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि शिक्षा पर हम कुल आमदनी का लगभग आधा प्रतिशत ही खर्च करते हैं जबकि विकसित देशों में चार प्रतिशत से भी अधिक होता है।

हमारे देश में योग्य, सक्षम, प्रतिभाशाली और पढ़ाने को ही अपना धर्म तथा कर्म मानने वाले शिक्षक तैयार करने की कोई मज़बूत व्यवस्था आज तक नहीं बन पाई।

अध्यापक बनने के लिए जिन रास्तों का इस्तेमाल होता है, उनमें सब से पहले वे सरकारी संस्थान आते हैं जो दशकों पूर्व बनाए गए घिसेपिटे पाठ्यक्रमों के अनुसार शिक्षक बनाते हैं। इसके बाद वे संस्थान आते हैं जो केवल पैसा लेकर बिना कोई ट्रेनिंग दिए पढ़ाने की डिग्री देते हैं जिसे दुर्भाग्य से सरकारी मान्यता भी मिली हुई होती है। तीसरे क्रम में वे लोग आते हैं जो अपने रसूख, दबदबे और पहुंच के बल पर बिना किसी व्यावसायिक शिक्षा के टीचर की नौकरी पा जाते हैं। इसके बाद वे लोग अध्यापक बन जाते हैं जिन्हें कोई दूसरी नौकरी नहीं मिलती और वे पढ़ाने का काम  दुकान चलाने की तरह करते हैं। चैथे क्रम में वे लोग हैं जो शिक्षा की दुकान खोलकर लोगों को भ्रमित करने के लिए चांसलर, प्रोफेसर, डीन जैसे पद बिना किसी योग्यता के स्वयं ग्रहण कर लेते हैं। ये लोग शिक्षा को सेवा का साधन न मानकर केवल मेवा प्राप्त करने का ज़रिया मानते हैं।

सिस्टम को तोड़ना ज़रूरी

शिक्षक तैयार करने के वर्तमान दोषपूर्ण सिस्टम को तोड़े बिना नई शिक्षा नीति पर सुचारू रूप से अमल कर पाना नितांत असंभव है। सन 2025 तक ऐसे लोग तैयार करने का लक्ष्य पूरा होना नामुमकिन है जिनके लिए रिसर्च और नॉलेज ही शिक्षक बनने की पहली सीढ़ी है। नेशनल रिसर्च फाउंडेशन का गठन इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है लेकिन इसकी सफलता तब ही संभव है जब इसका संचालन करने वाले इस योग्य हों कि वे विद्यार्थियों की जिज्ञासा को शांत कर सकें।

शिक्षा नीति के मुताबिक शिक्षक तैयार करने के लिए जब तक रिश्वतखोरी, भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगेगी तब तक न तो शिक्षक के प्रति सम्मान लोगों के मन में होगा और न ही गुरु और शिष्य की पवित्र परंपरा बन पाएगी। हालांकि शिक्षा नीति में व्यावसाय, कृषि, विधि, स्वास्थ्य, तकनीकी शिक्षा से लेकर प्रौढ़ शिक्षा तक का खाका खींचा गया है लेकिन इस सवाल का कहीं जवाब नहीं दिया गया है कि इन विषयों को पढ़ाने वाले शिक्षक कैसे और कहां तैयार होंगे ? उनके अंदर विद्यार्थियों तथा स्वयं अपना सम्मान अर्जित करने की इच्छा कितनी होगी और वह ज्ञान देने के लिए स्वयं ज्ञानी कैसे हो पाएंगे ?

पारदर्शी सिस्टम बनाया जाना आवश्यक है ताकि क्वालिटी एजुकेशन का महत्व भविष्य के शिक्षक समझ पाएं और अपने विद्यार्थियों में ऐसे गुण भर सकें जिनसे वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें, निराशा के स्थान पर आत्मविश्वास से भरे रहें और किसी भी हालत में अनैतिक कार्यों से दूर रहें। जिस दिन ऐसे शिक्षक तैयार होने शुरू हो जाएंगे तो समझिए कि भारत को विश्व का सिरमौर बनने से कोई नहीं रोक सकता।