शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

नई शिक्षा नीति असरदार तो है पर खामियां भी बहुत हैं।


संसार में शायद ही किसी देश की शिक्षा का आधार ऐसा हो जिसमें यह न कहा जाता हो कि विद्यार्थियों को सत्य, शांति, प्रेम, अहिंसा, धर्म, सदाचार और सेवा का पाठ पढ़ाया जाना जरूरी है। हम भी इसी पर जोर देते हैं लेकिन व्यवहार में इनका पालन करना कितना कठिन है, यह भी जानते हैं। नई शिक्षा नीति का सैद्धांतिक आधार भी यही है। अपनी सोच को रचनात्मक बनाने की बात कही गई है और भली भांति सोच विचार किए बिना कुछ भी करने, मानने और र्नि ाय लेने की कोशिश को नकारा गया है। अच्छी बात है!

युवा पीढ़ी का भविष्य

अनुमान है कि अगले दस वर्षों में भारत में युवा पीढ़ी की आबादी विश्व में सबसे अधिक होगी। नई शिक्षा नीति में इस बात को ध्यान में रखकर काफी कुछ कहा गया है। देश के विकास में इनकी भूमिका को लेकर कोई संदेह भी नहीं है।  इस नीति में अनेक स्थानों पर तक्षशिला और नालंदा जैसी प्राचीन भारत की गौरवशाली शिक्षा पद्धति और परंपराओं का जिक्र किया गया है। प्रश्न यह है कि क्या हम अपने अतीत से कभी बाहर निकलेंगे भी या नहीं ?

इंटरनेट, आधुनिक संचार साधन और टेक्नोलॉजी ही देश, समाज और दुनिया का वर्तमान है। उस जमाने में जो कुछ था, वह हमारी धरोहर तो हो सकता है लेकिन मार्गदर्शक नहीं, इसलिए वर्तमान की बात करना ही बेहतर होगा।


यह कल्पना कि भारत शिक्षा के मामले में विश्व गुरु होगा और विदेशों से यहां विद्यार्थी पढ़ने आयेंगे और संसार भर के प्रसिद्ध शिक्षा संस्थान यहां अपनी शाखाएं खोलेंगे, हकीकत से दूर है और अगर ऐसा हो भी गया तो इनमें पढ़ने वाले केवल वे होंगे जो साधन संपन्न, अमीर और समृद्ध हैं जिनके लिए आज भी कहीं भी जाकर पढ़ना बहुत आसान है। भारतीय शिक्षा संस्थानों को हमारी जरूरत के अनुसार, हमारे संसाधनों से निर्मित और हमारे ही विद्वानों द्वारा
 
स्थापित किया जाना होगा तब ही हम ऐसे विद्यार्थियों की श्रृंखला बना सकते हैं जो देश को विकास के उच्चतम शिखर पर ले जा सकें।


विदेशों से टेक्नोलॉजी तो ले सकते हैं लेकिन उनकी काम करने की प्र ााली नहीं, उसे तो भारतीय ही होना होगा। नई शिक्षा नीति का आधार विदेशी शिक्षा जगत से उठाई गई बहुत सी धार ााएं हैं जिनका भारतीयता से कोई लेना देना नहीं है।


साठ पन्नों की इस शिक्षा नीति में परीक्षा प्र ााली में आमूल चूल परिवर्तन स्वागत योग्य है लेकिन यह समझ से परे है कि जब दुनिया भर में बोर्ड की परीक्षाओं को हटाया जा रहा है तो हम ही क्यों उससे चिपके हुए रहना चाहते हैं। पूरे साल विद्यार्थी ने जो पढ़ा और उसके आधार पर उसका जो आकलन हुआ वही उसके अगली कक्षा में जाने का आधार होना चाहिए। यह एक अच्छा कदम है कि अब अगर कोई विद्यार्थी किसी कार ा बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ देता है तो वह न केवल दोबारा उससे आगे की पढ़ाई जारी रख सकता है बल्कि उसने जितने वर्ष की पढ़ाई की है उसके प्रमा ा पत्र भी मिलेंगे जो नौकरी और रोजगार दिलाने में मददगार हो सकते हैं।

शिक्षा और रोजगार


अच्छी शिक्षा वही जो नौकरी या व्यवसाय करने के काबिल बना सके। नई नीति में स्कूली पढ़ाई के दौरान ही कोई कौशल सीखने और उसके लिए ट्रेनिंग करने या अप्रेंटिस बनाने की बात कहीं गई है लेकिन क्या स्कूल के बच्चों को कोई उद्योग या कारखाना अपने किसी फायदे के बिना यह अवसर देगा, इसमें संदेह है।

इसके साथ ही पहले इसका तो सर्वे करा लीजिए कि स्कूल में पढ़ने वाले क्या सीखना चाहते हैं और पढ़ाई लिखाई के बाद क्या करना चाहते हैं और यह कि क्या वे जो पढ़ रहे हैं, वह उनके किसी काम आयेगा भी या नहीं। ध्यान रहे कि हमारे ग्रामी ा और शहरी इलाकों की जरूरतें बिल्कुल अलग अलग हैं, सब के लिए एक जैसी पढ़ाई कारगर नहीं हो सकती।


यह सही है कि अब परीक्षाओं में प्राप्त अंकों से अधिक महत्व इस बात का होगा कि विद्यार्थी  में कुछ नया करने, आधुनिक सोच रखने और किसी भी काम को करने से पहले  आलोचनात्मक टिप्प ाी करने की काबिलियत है या नहीं। यह भी देखा जाएगा कि उसने   केवल रटकर तो अंक प्राप्त नहीं किए। यह जो आज सौ में से सौ अंक होने को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए जरूरी समझा जाता है उस पर ज्यादा ध्यान न देकर उसकी बहुमुखी प्रतिभा को जांचने परखने की व्यवस्था होगी।


सिलेबस और शिक्षक

 
नई शिक्षा नीति के अनुसार अब तक जो किताबें पढ़ाई जाती हैं, उनकी जगह नए सिलेबस, पुस्तकें तैयार होंगी और उन्हें पढ़ाने के तरीके इजाद किए जाएंगे। यह जिक्र कहीं नहीं है कि यह सब कब तक होगा जबकि अगले एकेडमिक वर्ष से नई शिक्षा नीति के तहत पढ़ाई शुरू हो जाने की बात कही है। कहीं ऐसा न हो कि कक्षाएं शुरू हो जाएं और पाठ्यक्रम तथा पठन पाठन सामग्री का पता ही न हो।


इस नीति में इस बात को अच्छा खासा नजरअंदाज किया गया है कि अब ऑनलाइन पढ़ाई और इंटरनेट का युग है। इस बात की पूरी संभावना है कि जब तक सामग्री तैयार हो और वह आए, उससे पहले ही पुरानी पड़ जाए। इस नीति को बनाते समय वर्तमान महामारी नहीं थी जिसने अब बहुत कुछ बदल और दिखा तथा सिखा दिया है।
विकसित देशों में पढ़ाई का यह तरीका बहुत पहले से था। इस मामले में यह बीमारी हमारे लिए वरदान कही जा सकती है कि अब हम भी शिक्षा के क्षेत्र में मॉडर्न हो गए हैं। इसलिए जरूरी यह है कि जो भी पाठ्यक्रम बने, वह केवल किताबी न होकर व्यावहारिक हो और वह इतना लचीला हो कि उसमें बदलाव करना आसान हो क्योंकि जब हर रोज नई टेकनीक सामने आ रही हैं तो पुरानी लकीर पीटने रहने से विद्यार्थियों में निराशा और डिप्रेशन तक होने से इंकार नहीं किया जा सकता।


राष्ट्रीय शिक्षा आयोग



यह पहली बार होने जा रहा है कि अब भारतीय शिक्षा की कमान उनके हाथों में होगी जो शिक्षा से जुड़े हैं और शिक्षा आयोग बनने से यह उम्मीद पैदा हुई है कि वह दिन भी आ सकता है जब किसी आई ए एस की जगह कोई शिक्षाविद् सभी तरह के र्नि ाय ले सकेगा।

यह एक सच्चाई है कि अब तक चाहे शिक्षा मंत्री हो या शिक्षा सचिव अथवा सचिवालय , उनका ताल्लुक राजनीति से लेकर ब्यूरोक्रेसी तक से कितना भी बढ़िया हो लेकिन शिक्षा, पढ़ाई लिखाई और इसके तौर तरीकों से कतई नहीं होता और न वे यह जानने की कोशिश करते हैं कि हमारे देश के गांव देहात और दूरदराज के इलाकों में रहने वालों को कौन सी शिक्षा चाहिए।

उन्हें यह सोचने का   वक़्त ही नहीं कि ग्रामी ा क्षेत्रों में स्कूल केवल तब ही क्यों भरे रहते हैं जब दोपहर का भोजन और स्कॉलरशिप के पैसे दिए जाते हैं। इसी तरह वे नहीं जानते कि अक्सर स्कूलों में ताला क्यों लगा रहता है और विद्यार्थी पढ़ने क्यों नहीं आते तथा उनके घरवाले भी उन पर स्कूल जाने के लिए जोर क्यों नहीं देते ?

 
नई शिक्षा नीति से शायद यह संभव हो सके कि ग्रामवासी और विशेषकर किसान और महिलाएं अपने बच्चों को पढ़ने भेजने में संकोच न करें क्योंकि उन्हें वही पढ़ाया जाएगा जो जरूरी है जैसे कि उन्नत खेती के तरीके, ग्रामी ा कौशल आधारित उद्योग लगाने की पढ़ाई , जरूरी पूंजी जुटाने के नियम, बैंकों और सहकारी संस्थाओं की कार्यप्र ााली तथा यह कि किस तरह जल, जंगल और जमीन का संरक्ष ा किया जा सकता है।


अभी तक उन्हें भी वही पढ़ाया जाता रहा है जो शहरों और महानगरों में पढ़ने वालों के हिसाब से होता है और इसीलिए उनका अपने गांव, अपनी धरती के प्रति लगाव कम होता जाता है और वे शहर भागते हैं। नई शिक्षा नीति में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को शिक्षक की भी भूमिका अदा करने की बात कही गई है लेकिन क्या किसी ने सोचा है कि उनकी दशा कितनी दयनीय है। उनके वेतन और नौकरी की शर्तों में बदलाव कर उन्हें अन्य शिक्षकों के अनुसार ही, यदि वे योग्य है, वेतन और अन्य भत्ते दिए जाएं और उनका एक कैडर बना दिया जाए जिसमें उन्नति करने के प्रावधान हों।



यह एक अच्छी सोच है कि अब पांच से दस किलोमीटर के क्षेत्र में ही हॉयर सेकेंडरी और प्राइमरी तथा माध्यमिक स्कूल स्थापित किए जाएंगे जिससे आने जाने की दिक्कत न हो, विशेषकर लड़कियों के लिए जो अक्सर दूरी के कार ा ही पढ़ाई छोड़ देती हैं।


शिक्षा के बारे में इस पुरानी सोच से बाहर निकलने की भी जरूरत है कि शिक्षा संस्थान चाहे किसी भी स्तर पर हों, उनके लिए धर्मार्थ यानी न लाभ न हानि के सिद्धांत पर ही चलना होगा। अब समय आ गया है कि शिक्षा का व्यवसायीकर ा हो और शिक्षा को समर्पित औद्योगिक इकाइयों को प्रतियोगिता में बने रहने के लिए इन्वेस्टमेंट प्लान के तहत चलाया जाए।  इसे शिक्षा का व्यापार न कहकर शिक्षा का आधुनिकीकर ा माना जाए और उसी के अनुरूप नियम बनें ताकि अभी जो इस्पेक्टर राज चलता है, वह समाप्त हो सके।


शिक्षकों के वेतन, रिहायशी सुविधाओं और समाज में उनके लिए सम्मान की कल्पना इस शिक्षा नीति में की गई है। इसी के साथ शिक्षा के नाम पर इस समय जो हर कोई इसमेें होने वाले मुनाफे को देखकर अपनी दुकान चलाने लगता है, उस पर भी अंकुश लग सकेगा   क्योंकि अब जो नियम बनाए जा रहे हैं उनमें इनका खोलना घाटे का सौदा ही होगा।

उम्मीद है कि नई शिक्षा नीति और शिक्षा मंत्रालय भारतीय विद्यार्थियों के सपने साकार करने में सक्षम होंगे।


(भारत)
 

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें