शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

क्या पढ़ें और क्या नहीं, इसका निर्णय स्वयं करना होगा








दसवीं और बारहवीं के नतीजे निकलने के बाद सबसे पहला प्रश्न पास होने वाले छात्र छात्राओं के लिए यह होता है कि आगे अगर पढ़ना है तो कौन से विषय लिए जाएं और आगे पढ़ाई जारी नहीं रखनी है तो क्या किया जाए। आज उनके पास विकल्प सीमित नहीं हैं क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में दुनिया भर में असीमित प्रयोग हुए हैं और लगातार हो रहे हैं ताकि तरक्की की दौड़ में किसी से पीछे न रह जाएं।

देखा जाए तो पिछले एक से दो दशकों के दौरान हमारे देश में भी स्कूली शिक्षा के बाद की पढ़ाई को लेकर अनेक नीतियां बनाई गईं, परिवर्तन भी हुए और युवाओं में बेरोजगारी बढ़ती देखकर स्किल इंडिया जैसे प्रयास भी शुरू हुए ताकि किसी न किसी कौशल या कारीगरी का विकास कर आजीविका का साधन जुटा लिया जाए।


उच्च शिक्षा का पैमाना

अनेक विकसित देशों ने स्कूल के बाद की पढ़ाई को लेकर किसी कॉलेज या शिक्षा संस्थान में दाखिले की इच्छा रखने वालों की योग्यता का आकलन करने के लिए उनके लिए विशेष परीक्षा आयोजित करने की पहल की ताकि पता चल सके कि वह विद्यार्थी  अपने हिसाब से चुने गए विषय को पढ़ने की काबिलियत भी रखता है या नहीं। जो इस परीक्षा में पास हो जाते उन्हें इन उच्च तकनीकी और व्यावसायिक संस्थानों में प्रवेश मिल जाता और जो नहीं पास होते उनके लिए रोजगार दे सकने वाले दूसरे विषय लेने के विकल्प खुले रहते ।


हमारे यहां इस तरह की कोई व्यवस्था न के बराबर होने के कारण माता पिता या अभिभावक जो विषय आपस में मिलकर तय कर लेते हैं, उसमें दाखिला लेे लेते हैं । अब क्योंकि बिना किसी कसौटी के आगे की पढ़ाई करने लगे और उसके पूरा करने के बाद रोजगार या नौकरी करने की बारी आई तो पता चलता है कि उन्होंने जो पढ़ा उसके मुताबिक कुछ है ही नहीं और फिर या तो जो काम मिल गया, कर लिया, वरना बेरोजगारी का आंकड़ा बढ़ाने में योगदान कर दिया।


तरक्की का रास्ता


औद्योगिक और आर्थिक रूप से समृद्ध देशों के कुछेक उदाहरण देखें तो बात आसानी से समझी जा सकती है। हमारे सबसे निकट प्रतिद्वंदी चीन में बारह से चैदह साल की उम्र में विद्यार्थियों को कोई न कोई वोकेशनल कोर्स करना होता है।


जापान ने इस हकीकत को समझकर कि उसके यहां प्राकृतिक स्रोतों का भंडार बहुत कम है उसने स्कूल से ही पढ़ाई का पैमाना उद्योग को बना कर वही पढ़ने की व्यवस्था की जिससे औद्योगिक क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा सके।


इसी तरह जर्मनी ने तय किया कि पढ़ाई के दौरान विद्यार्थियों का अस्सी प्रतिशत समय स्कूल में होगा तो बीस प्रतिशत किसी कारखाने या उद्योग में अपने हुनर को तलाशने और सुधारने में बिताना होगा। पढ़ाई के बाद यह प्रतिशत उलट जाएगा मतलब अस्सी प्रतिशत कारखाने में और बीस प्रतिशत समय जो काम कर रहे हैं उसमें और अधिक पारंगत होने के लिए उसकी पढ़ाई में बिताना।


इस व्यवस्था के जो लाभ हुए उनमें सब से पहले तो यह कि वे जो पढ़ रहे हैं, उसके बारे में स्वयं ही अपनी आलोचना करने की आदत पड़ती गई और उससे किसी भी समस्या का हल निकालना आसान हो गया। इसका एक फायदा यह भी हुआ कि उनके अंदर किसी भी चीज को जानने और फिर उसे करने की भावना आती गई और इस तरह उनके अंदर कल्पना शक्ति बढ़ती गई और वे किसी भी तरह के नए नए प्रयोग करने में सक्षम होते गए। इससे  अनुसंधान के जरिए  आविष्कारों का जन्म होता गया और दुनिया भर में इनके उद्योगों का डंका बजना शुरू हो गया।


हमारी वास्तविकता

अगर हम अपने देश की बात करें तो आज भी हमारे स्कूलों में ज्यादातर विषय वही पुराने, घिसे पिटे होते हैं जिनका नौकरी या रोजगार से कोई संबंध न होकर बस अंक प्राप्त करना होता है। यही कारण है कि शत प्रतिशत या उसके आसपास अंक प्राप्त करने वालों की संख्या हर साल बढ़ती जाती है और उसके बल पर नामी गिरामी कॉलेजों में प्रवेश भी मिल जाता है लेकिन अगर इस बात पर गौर करें कि उनमें से कितने पढ़ाई पूरी करने के बाद अपनी इच्छा के अनुसार नौकरी या व्यवसाय करने के काबिल हुए तो निराशा ही हाथ लगेगी। पढ़े लिखे ज्यादातर बेरोजगारों की यही कहानी है।


हमारे देश में हालांकि अब ऐसे संस्थान काफी संख्या में खुल गए हैं जहां औद्योगिक कौशल का विकास करने के कोर्स उपलब्ध हैं लेकिन उनके बारे  में अधिक प्रचार न होने के कारण जानकारी नहीं होती या फिर वे इतने आकर्षक और लुभावने नहीं होते कि उनमें दाखिला लेने के लिए विद्यार्थियों में होड़ लग जाए।
व्यवसाय की दृष्टि से उनका मूल्य बहुत अधिक है और वहां से पढ़कर निकले विद्यार्थियों को नौकरी या रोजगार के लिए भटकना नहीं पड़ता बल्कि पढ़ाई के दौरान ही औद्योगिक और व्यावसायिक इकाइयां उन्हें अपने यहां  नौकरी की पेशकश करने लगते हैं।



इसके विपरीत अधिकतर संख्या में विद्यार्थी ऐसे कोर्स करने लगते हैं जिनका आधार नौकरी, व्यवसाय या कौशल विकसित करना न होकर केवल डिग्री लेना होता है।


इतिहास की एक घटना का जिक्र करते हैं। जब अंग्रेज भारत आए तो उन्होंने देखा कि यहां के लोगों का अपने हुनर, कारीगरी और कौशल में कोई मुकाबला ही नहीं है तो उन्होंने व्यापार करने की नीयत से ईस्ट इंडिया कम्पनी स्थापित की। उसके बाद जो हुआ वो सब जानते हैं। उन्होंने हमारा शोषण किया और गुलाम बना लिया जिससे बाहर निकलने में दो सौ साल लग गए।


दुर्भाग्य से अंग्रेज ने जो शिक्षा व्यवस्था हमें गुलाम बनाए रखने के लिए जारी की, वह अब भी कायम है जिसका नतीजा यह है कि युवाओं को सफेदपोश कहलाना अर्थात बाबूगिरी करना ज्यादा पसंद आता है, बजाय नीली वर्दी पहनकर औद्योगिक विकास का अंग बनना।


अपना आकलन स्वयं करें 

किसी भी कॉलेज या शिक्षा संस्थान में प्रवेश लेने से पहले विद्यार्थियों और उनके माता पिता के लिए यह सोचना अनिवार्य है कि वे इस बात की तुलना करें कि कौन से विषय की पढ़ाई उन्हें रोजगार दिला सकती है, अपना व्यवसाय खड़ा करने के काबिल बना सकती है या फिर केवल डिग्रीधारी बनाकर बेरोजगारों या अपने अनुकूल काम न मिल सकने वालों की कतार में खड़ा कर सकती है।


एक बात और है और वह यह कि स्कूल की परीक्षाओं में अपनी मातृ भाषा में उत्तर देने की व्यवस्था से अधिक अंक प्राप्त करना आसान हो जाता है लेकिन उसके बाद कॉलेज या संस्थानों में पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी होता है जिसमें ये विद्यार्थी पिछड़ जाते हैं और अधिकतर या तो कम अंकों से पास होते हैं या पढ़ाई ही छोड़ देते हैं क्योंकि अंग्रेजी में दिए लेक्चर उनकी समझ में नहीं आते। इस वास्तविकता से आंख मूंदकर कॉलेज में दाखिला लेने का परिणाम निराशाजनक ही होता है।


इस तरह की पढ़ाई से तो बेहतर यही रहता है कि अपनी रुचि के अनुसार किसी औद्योगिक या व्यावसायिक संस्थान में अप्रेंटिस ही बन जाया जाए जिससे रोजगार की गारंटी तो हो जाए।

इसी के साथ सत्य यह भी है कि प्रोफेशनल शिक्षा के नाम पर पैसा बनाने की अनेक दुकानें भी कुकुरमुत्तों की तरह हर छोटे बड़े शहर या कसबे में खुल गईं हैं जिन पर कोई सरकारी या प्रशासनिक नियंत्रण नहीं होने से वे आर्थिक शोषण तो करती ही हैं, साथ में विद्यार्थियों का दोबारा लौटकर न आने वाला समय भी बर्बाद कर देती हैं।



कहीं भी दाखिला लेने से पहले जरूरी हो जाता है कि सबसे पहले यह तय करना कि जिन्दगी से हम क्या चाहते हैं और जब तय कर लें तो आगे का रास्ता साफ नजर आने लगता है।


अब वह जमाना नहीं कि किसी की नकल करते हुए या अपनी हैसियत और बुद्धि का गलत अंदाजा लगाकर काल्पनिक संसार में छलांग लगा ली जाय जिसका परिणाम हमेशा दुखदाई ही होता है। वक्त की नब्ज टटोलने यानि टाइम मैनेजमेंट की कला विद्यार्थी जीवन में ही पड़ जाए तो बेहतर रहता है।

वर्तमान हालात में विदेशों में जाकर उच्च तथा व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने के अवसर कुछ अरसे के लिए लगभग न के बराबर होने से जो कुछ अपने देश में है उसी का उपयोगिता की दृष्टि से विचार कर कोई निर्णय लेना ही श्रेयस्कर होगा।


Email: pooranchandsarin@gmail.com

(भारत)

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