शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

बहुत हुआ आंदोलन, लौटने और सोचने की बारी, कहीं देर न हो जाए।


संसद में आंदोलनकारी बनाम आंदोलनजीवी की चर्चा ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस दुविधा से बाहर निकलने का एक आसान रास्ता यह है कि आंदोलन, चाहे थोड़े समय के लिए ही सही, छोड़कर अपने घरों, खेत खलिहान लौट जाएं और एक बार फिर सोचें कि प्रधानमंत्री की इस घोषणा का क्या अर्थ है कि यह कानून ऑपशनल यानी वैकल्पिक हैं, मतलब यह कि अगर किसी को सुहाएं तो वो अपनाए और जिसे न अच्छे लगें, वह पहले की तरह काम करता रहे।

सोच का दायरा

असलियत यह है कि देश ही नहीं कृषि से जुड़े अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी भारत में कृषि सुधारों की जरूरत को महसूस किया है और इन नए कानूनों को पहला और सही कदम बताया है। तो अगर फिर भी विरोध होता है तो समझना होगा कि ऐसे कौन से कारण हैं जिनके चलते इन्हें किसान विरोधी बताया जा रहा है और आंदोलन करने की राह पकड़नी पड़ रही है।

इस आंदोलन में तीन तरह के किसान देखे जा सकते हैं, एक तो वे जिन्होंने कानूनों का गहराई से अध्ययन किया है और अपने हितों के उलट पाया है। उन्हें यह समझने में देर नहीं लगी कि इन कानूनों का लक्ष्य अमीर, सुविधा संपन्न और आधुनिक ढंग से खेती करने वाले किसानों के वर्चस्व, राजपाट और एकाधिकार को कम करना है। 

आमदनी के साधन पहले जैसे ही रहेंगे लेकिन एकछत्र अधिकार की उनकी हैसियत को ठेस लगने की पूरी संभावनाएं हैं। मतलब यह कि जमींदारा, साहूकारा नहीं रहेगा और जिन्हें वे अपनी प्रजा मानते हुए अपने रहमो करम से नवाजते रहते थे, वे अब अपनी मर्जी के मालिक बन कर जहां उन्हें अच्छा लगे, वहां जाने के लिए स्वतंत्र होने जा रहे हैं।

दूसरे किसान वे हैं जिन्होंने इन कानूनों को स्वयं पढ़ने और समझने के स्थान पर पहले वर्ग के किसानों द्वारा दी गई परिभाषा को सत्य वचन मानते हुए विरोध करना शुरू कर दिया।

तीसरा वर्ग उन किसानों का है जिन्होंने अपने ही घर परिवार और बिरादरी की युवा पीढ़ी और लॉकडाउन के कारण गांव देहात लौटने वाले लोगों  से सलाह मशविरा करने का काम किया। इन्हें इन कानूनों के जरिए अपनी आमदनी बढ़ने और परिवार के लिए आधुनिक रहन सहन की सुविधाऐं जुटाने की राह आसान लगी और इनके पक्षधर बन गए।

जल, जंगल और जमीन

पिछले अनेक वर्षों से कृषि, ग्राम विकास, पशु पालन और पर्यावरण से जुड़े अनेक विषयों पर लिखे गए लेखों का संपादन कर एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित अपनी पुस्तक का जिक्र करना ठीक रहेगा जिसमें विस्तारपूर्वक जानकारी दी गई है कि किस प्रकार हमारे किसान इन कानूनों से ही नहीं बल्कि अपने परिश्रम और आधुनिक टेक्नोलॉजी के मिश्रण से खुशहाल हो सकते हैं।

यह पुस्तक, इसी शीर्षक से नोशन प्रेस ने प्रकाशित की है और अमेजन तथा फ्लिपकार्ट से मंगवाई जा सकती है।

सरकार से क्या कहा जाए

अब हम इस बात पर आते हैं कि क्या सोच विचार करें और सरकार से किन बातों की मांग करें।

कृषि के लिए आवश्यक बिजली, पानी, बीज, उर्वरक और कीटनाशक इन पांच चीजों की जरूरत होती है। अगर ये आवश्यकतानुसार न मिलें तो किसान चाहे कितना भी मेहनती हो, वह प्रगति नहीं कर सकता।

आम तौर से अभी तक ये सुविधाएं उन किसानों तक आसानी से उपलब्ध थीं जिनके पास धन, बल और पर्याप्त मात्रा में जमीन थी। जिसके पास ये नहीं था वह गरीब और असहाय थे, जैसे तैसे गुजारा करते थे। स्वयं देखा है कि आज के दौर में भी ऐसे किसानों की विशाल संख्या है जिनकी आमदनी आठ सौ हजार रुपए महीने से ज्यादा नहीं है जिसका कारण एक ही है कि उनके पास खेती की बुनियादी चीजे ही नहीं हैं। यह सोचकर ही झुरझुरी होती है कि कोई कैसे इतनी कम रकम में अपने परिवार के लिए रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा आदि का प्रबंध कर सकता है।

तो फिर सबसे पहली मांग ये कि छोटे, सीमांत और मझौले किसान के लिए इन चीजों की व्यवस्था हो जो उसकी खेती की प्राणवायु हैं। यह सब चीजें लगभग मुफ्त या बहुत कम दाम पर मिलें जिन्हें खरीदने के लिए उसे कर्ज लेने के लिए न उकसाया जाए क्योंकि यही कर्ज है  जिसे वह जीवन भर नहीं उतार पाता और आत्महत्या तक कर लेता है। 

अब हमारा संवैधानिक और प्रशासनिक ढांचा इस तरह का है कि सरकार इन चीजों का  सम्पूर्ण और नियमित इंतजाम नहीं कर सकती तो उसने सोचा कि इनकी पूर्ति निजी क्षेत्र के पूंजीपतियों और व्यापारियों से करा दी जाय ताकि किसान को लाभ हो।

इसमें सबसे बड़ा खतरा किसान का शोषण और उसकी जमीन पर कब्जा होने का था। इसके लिए कानून बनाया गया कि अगर कोई अपना पैसा लगाता है तो कम से कम एक साल और ज्यादा से ज्यादा पांच साल का ही कॉन्ट्रैक्ट कर सकता है, जमीन का मालिकाना हक नहीं बदलेगा और जो दाम तय हो, वह हर हालत में किसान को मिलेगा ।

यहां यह मांग करनी चाहिए कि जो कांट्रेक्ट या समझौता हो वह त्रिपक्षीय हो अर्थात किसान, पूंजीपति और राज्यपाल की ओर से अधिकृत व्यक्ति। ऐसे एग्रीमेंट का उल्लघंन करने की हिम्मत शायद कोई विरला ही करेगा जिसे अपना धन, मान सम्मान प्यारा न हो

विवाद की न्यायिक व्यवस्था

यहां सरकार से यह मांग करनी चाहिए कि दोनों पक्षों में विवाद होने की स्थिति में उसके निपटारे के लिए डिस्प्यूट सेटलमेंट अथॉरिटी बनाए जो एक निश्चित समय में निर्णय दे जिसका फैसला अंतिम रूप से मान्य हो। किसी एसडीएम या सिविल अदालत से अलग एक स्वतंत्र व्यवस्था ही किसान के लिए न्यायपूर्ण हो सकती है।

अब हम उनकी बात करते हैं जिनके पास आधुनिक विज्ञान, टेक्नोलॉजी, संचार एवं संवाद के साधनों की कमी है। इसके लिए यह मांग करनी चाहिए कि आबादी के हिसाब से ऐसे सुविधा केंद्र यानी फैसिलिटेशन सेंटर स्थापित हों जहां जानकारी भी मिले और सभी संसाधन लगभग मुफ्त मिलें। इन केंद्रों का संचालन, रख रखाव और वित्तीय व्यवस्था करना सरकार की जिम्मेदारी हो। ये केंद्र ग्रामीण समाज से तालमेल रखते हुए ईमानदारी से काम करें, इसके लिए बाकायदा बजट दिया जाय और उसकी जवाबदेही सुनिश्चित हो।

मूल्य निर्धारण

सरकार से तीसरी मांग यह करनी चाहिए कि किसान को निर्धारित और लाभकारी मूल्य किस तरह से मिले। उसे न तो वर्तमान मंडियों के हवाले छोड़ा जा सकता है और न ही भविष्य में निजी क्षेत्र द्वारा स्थापित की जाने वाली बिक्री व्यवस्था के अधीन।

इसके लिए अलग से प्राइस सेटलमेंट अथॉरिटी यानी मूल्य निर्धारण प्राधिकरण का गठन हो जिसके दायरे में सभी किसान, खरीददार हों और एक भली भांति तय किए गए स्टैंडर्ड यानी पैमाने के आधार पर किसी भी उपज का मूल्य तय किया जा सके। इसमें चाहे अनाज, फल, सब्जियां या अन्य कोई भी फसल हो, सभी शामिल हों। यह वर्तमान एमएसपी व्यवस्था से अलग हो क्योंकि जो अभी तक चलता रहा है, वह अब बेअसर हो रहा है।

इस प्राधिकरण की यह जिम्मेदारी हो कि तय समय सीमा में किसान को उसकी उपज का दाम मिल जाए और अगर कोई भी व्यापारी, चाहे मिल हो, फूड प्रोसेसिंग यूनिट हो या सरकारी खरीद हो, समय पर दाम न चुकाने पर कड़ी कार्यवाही हो जिसमें जुर्माने से लेकर जेल की हवा खाने तक की धाराएं हों। 

सरकार से चौथी मांग यह करनी चाहिए कि जिन पूंजीपतियों को वह ग्रामीण क्षेत्रो में निवेश का अवसर दे रही है वह उस इलाके में भंडारण के लिए गोदाम,  वेयरहाउस और अन्य उपकरण लगाएं जहां किसान अपनी उपज स्टोर कर सके और इस जगह का उससे केवल मामूली किराया लिया जाए। इसी के साथ बैंकों से कहा जाए कि वह किसान को इस भंडार में रखी उपज के आधार पर कृषि ऋण उपलब्ध कराएं। इससे फायदा यह होगा कि किसान को अगली फसल के लिए अपनी वर्तमान उपज को औने पौने दाम पर बेचना नहीं पड़ेगा। जब उसे यह आजादी दी है कि वह जहां चाहे अपनी फसल बेच सकता है तो उसे यह सुविधा भी मिलनी चाहिए कि वह जब चाहे अपनी फसल बेच सके और उसपर अगली फसल के लिए संसाधन जुटाने का बोझ न हो । 

अगर किसान और सरकार इन बातों को मान लें तो एक समृद्ध और आर्थिक रूप से मजबूत ग्रामीण समाज की कल्पना साकार हो सकती हैं।  


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