शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

रचनाकार को दान, दक्षिणा, दया नहीं, सम्मान चाहिए


अक्सर देखने, पढ़ने, सुनने में आता है कि जिन्होंने एक रचनाकार की तरह जीवन जिया और जब वे अशक्त, कमजोर, बीमार और आर्थिक दृष्टि से विपन्न हो जाते हैं तो समाज का रवैया उनके प्रति दया दिखाने, रुपए पैसे से मदद करने और उनके प्रति सहानुभूति प्रकट करने जैसा हो जाता है। इनमें सभी विधाओं के रचनाकार हैं ये लेखक, कवि, गीतकार, संगीतकार, नाटककार और उनकी रचनाओं को स्वरूप देने वाले शिल्पी, नर्तक, अभिनेता सभी हैं।

जब तक ये सभी श्रेणियों के रचनाकार क्रियाशील रहते हैं, अपने ओजपूर्ण लेखन, सशक्त वाणी और आकर्षक व्यक्तित्व से सबके प्रिय बने रहते हैं, इनके प्रशंसक, मित्रों और चाहने वालों का दायरा बढ़ता रहता है ।

प्रकृति और रचनाकार

सबसे बड़े रचनाकार जिसने यह दुनिया बनाई और इसे सभी रंगों से रंगकर जीने लायक बनाया, उसके नियमानुसार जीवन के तीसरे और चैथे चरण अर्थात वृद्धावस्था में प्रवेश तय है। जिस प्रकार किसी वाटिका में अंकुर फूटने से लेकर समय आने पर पतझड़ के समय पेड़ पौधों  के प्रति भाव बदलने लगता है, उसी प्रकार मनुष्य के वयोवृद्ध होने पर उसके प्रति आदर, सम्मान, समर्पण का भाव बदलने लगता है। हमदर्दी दिखाने का और कुछ ऐसा करने का भाव पैदा होने लगता है जिससे लगे कि इनकी आर्थिक सहायता हो जाय और इस उम्र में आराम से अपने अंतिम समय के आने की प्रतीक्षा करें। ये लोग भूल जाते हैं कि रचनाकार का स्वाभिमान उनकी इस हरकत से चोटिल हो जाता है और वह इनकी तरफ कुछ इस तरह से देखता है मानो ये नादान, नासमझ और मदद करने के नाम पर केवल उसकी अनमोल और कालजई कृतियों के आवरण में अपने लिए वाहवाही लूटने वाले हैं।

सहानुभूति बनाम सम्मान

रचनाकार और उसके  प्रति सहानुभूति का भाव समझने के लिए एक उदाहरण देना काफी होगा।

एक बड़े मनोरंजन चैनल के एक शो में सुप्रसिद्ध गीतकार संतोष आनंद को बुलाया जाता है। उनके आने से आयोजक हों, कार्यक्रम के संचालक हों या दर्शक, सभी अभिभूत हो जाते हैं और वही नशा छा जाता है जो मंच से उनकी कविताओं और गीतों को सुनकर सभाओं में छाया करता रहा है।

उनके प्रति आदर, सम्मान के साथ साथ उनकी उम्र की मजबूरी का जिक्र होता है तो एक सफल गायिका और शो की जज नेहा कक्कड़ उनकी पांच लाख रुपए से मदद करने का एलान करती हैं। इसे सुनते ही गीतकार से अधिक श्रोताओं और रचनाकार की रचनाओं के दीवाने रहे दर्शकों को अटपटा लगा होगा कि ये क्या हो रहा है ?

उम्मीद के मुताबिक संतोष आनंद ने अपने स्वाभिमान का जिक्र करते हुए अस्वीकार कर दिया लेकिन तब अपने दंभ को अलग रखते हुए स्वयं को  उनकी पोती समान बताते हुए जब दोबारा यह पेशकश की तो उन्होंने बात को आगे न बढ़ाते हुए स्वीकृति तो दे दी लेकिन उनके चेहरे  की भंगिमा कह रही थी कि उन्हें यह स्वीकार नहीं कि कोई उनके प्रति दया दिखाए।

इस घटना में एक दूसरे जज संगीतकार विशाल ने रचनाकार की गरिमा के अनुकूल संतोष आनंद की अप्रकाशित रचनाएं प्रकाशित करने की पेशकश की तो उनकी मुख मुद्रा प्रसन्न होकर स्वीकृति देने की थी। दो व्यक्ति, दो स्थितियां और एक रचनाकार का स्वाभिमान बहुत कुछ कह जाता है  जिसे समझने के लिए संवेदनशील होना आवश्यक है ।

यह घटना क्या इस और ईशारा नहीं करती कि समाज के सक्षम व्यक्ति स्वयं अपनी ओर से तथा सरकार के जरिए कुछ ऐसी व्यवस्था करने की शुरुआत करें जिससे किसी रचनाकार को अपने अंतिम पड़ाव में किसी का आश्रित न होना पड़े। इससे भी अधिक उन्हें बेसहारा होकर मृत्यु का इंतजार न करना पड़े।

रचनाकार का सम्मान

यह विडंबना ही है कि जिस रचनाकार की कृतियों से पाठक अपने को समृद्ध करते रहे हैं, उनसे प्रेरणा पाकर जीवन का रास्ता निकालते आए हैं और समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त कर सम्मानित होते रहे हैं, उस समाज में रचनाकार की अनदेखी ही नहीं, उसका अनादर और अवहेलना करने के उदाहरण मिलते रहते हैं।

जहां हम एक ओर सम्मान सहित वृद्ध होने के अधिकार की वकालत करते हैं, वहां यदि कुछ ऐसा हो जाए जो रचनाकार को बिना उस पर कोई एहसान किए उसकी जरूरतों को पूरा कर सके तो यह उनके सत्कार की भांति होगा।

साहित्यकारों और रचनाकारों के सम्मान के लिए कुछ प्रदेश सरकारों ने आर्थिक सहायता राशि निश्चित की हुई है और उनके आवास का प्रबंध करने की पहल भी की है लेकिन जरूरत इस बात की है कि राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी व्यवस्था हो जिससे अपने आप इनकी मदद हो जाए,  हाथ फैलाने की  नौबत न आए। यह काम साहित्य, संगीत, कला, नाटक तथा अन्य विधाओं से जुड़ी सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के जरिए आसानी से किया जा सकता है।

यह एक वास्तविकता है कि रचनाकार चाहे किसी भी विधा में अपनी साधना करे, वह अन्य व्यक्तियों से काफी अलग होता है। उसकी सोच और मानसिक अवस्था भिन्न होती है, वह अपना एक संसार अपने चारों ओर बना लेता है, आम तौर से अकेले रहना पसंद करता है, विशेषकर जब वह किसी रचना को जन्म दे रहा हो।

कहा जाता है कि रचनाकार को अपनी कृति रचते समय उतनी ही पीड़ा होती है जितनी किसी महिला को अपनी संतान को जन्म देते समय होती है। इसी के अनुरूप उसकी प्रसन्नता भी एक मां की तरह होती है जब वह पहली बार अपनी संतान को देखती है।  जब रचनाकार की कृति पुस्तक रूप में या कलाकृति के रूप में थियेटर में प्रदर्शित होती है तो निर्माता की तरह उसकी खुशी का अनुमान लगाया जा सकता है।

रचनाकार के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने से अधिक कोई अन्य शस्त्र उसे हानि नहीं पहुंचा सकता। यदि इतना ही समाज समझ ले तो बहुत होगा और किसी रचनाकार को मानसिक त्रासदी झेलनी नहीं पड़ेगी और वह उन्मुक्त होकर अपने रचना धर्म का पालन करता रहेगा।


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