शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

स्वास्थ्य और पोषण प्रत्येक नागरिक का कानूनी अधिकार होना चाहिए

 स्वास्थ्य और पोषण प्रत्येक नागरिक का कानूनी अधिकार होना चाहिए

किसी भी परिवार, समाज और देश की शक्ति इस बात से आंकी जाती है कि वह शारीरिक और मानसिक रूप से कितना स्वस्थ, जागरूक तथा आत्मनिर्भर या स्वावलंबी है। इसका मतलब यह हुआ कि सेहतमंद रहना पहली जरूरत और उसके लिए पौष्टिक भोजन मिलना प्राथमिकता के दायरे में आता है।

इसी के साथ यह वास्तविकता भी है कि स्वास्थ्य और पोषण की शुरुआत जन्म लेने से पहले अर्थात माता के गर्भ से ही हो जाती है और यह हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हो जाता है कि हमें इस प्रकार का भोजन, सुविधाएं और वातावरण मिले कि हम जीवन भर स्वस्थ और हृष्ट पुष्ट रह सकें।

ऐतिहासिक हकीकत

स्वतंत्र होने के बाद समाज और सरकार के सामने सबसे बड़ी उलझन यह थी कि सदियों की दासता ने नागरिकों को दब्बू, कमजोर, बीमार और गरीब बने रहने के लिए मजबूर कर दिया था।  जो संपन्न तबका था, उसने इसका लाभ उठाते हुए इन्हें बराबरी का स्थान देने के बजाय अपनी दया का पात्र बना दिया ।

इसका परिणाम यह हुआ कि एक बहुत बड़ा वर्ग अस्वस्थ और कुपोषित रहने लगा क्योंकि उसके लिए वे सब साधन जुटाना असंभव था जिनसे वह अपने खानपान में पौष्टिकता का ध्यान रख सके। उसके लिए रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पी जैसे हालात उसकी जिंदगी को ढोने का काम करने लगे ।

अब क्योंकि आबादी की रफ्तार तेज थी तो जो समर्थ थे उनके पास अपना हुक्म बजा लाने वालों की कभी कमी नहीं हुई।  कुपोषण के कारण लोग मरते गए और उनसे भी अधिक कुपोषित बच्चे पैदा होते गए। जो किसी तरह जी गए, वे अपने पूर्वजों की तरह अपने मालिक की गुलामी करने के लिए तैयार होते गए। इनके लिए न शिक्षा का इंतजाम हुआ, न पौष्टिक भोजन और न ही उनकी शारीरिक और मानसिक आवश्यकताओं को पूरा करने वाले साधन जुटाए गए। इसके विपरीत जो पैसे वाले थे, दबंग थे उनका कब्जा  शिक्षा, स्वास्थ्य और पौष्टिकता के सभी साधनों पर होता गया।

संवैधानिक जरूरत

हमारे संविधान में स्वास्थ्य और पोषण के अधिकार की कोई व्यवस्था नहीं थी, इसलिए सरकार को कभी कोई चिंता नहीं हुई कि देश की बढ़ती आबादी को ध्यान में रखकर जनमानस के स्वस्थ और हृष्ट पुष्ट रहने के लिए दूरगामी और लाभकर नीतियां बनाई जाएं।

सन 1975 में सरकार ने महिला एवं बाल विकास विभाग के जरिए स्थिति की गंभीरता को समझते हुए और वह भी इसलिए कि अस्वस्थ आबादी उसके ज्यादा काम की नहीं है, आई सी डी एस के नाम से एक योजना शुरू की जिसके अंतर्गत देश में बड़े पैमाने पर आंगनवाड़ियों की स्थापना का लक्ष्य रखा गया। इनमें गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं का टीकाकरण और उन्हें पौष्टिक भोजन दिए जाने की शुरुआत हुई।

यह कार्यक्रम न केवल वक्त की जरूरत था बल्कि देश को स्वास्थ्य का वरदान देने में भी सक्षम था, इसलिए हाथों हाथ लिया गया और सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए इस क्षेत्र में अपनी उपयोगिता सिद्ध करने लगा। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की कड़ी में ए एन एम और आशा वर्कर भी जुड़ गए और अब यह ग्रामीण और पिछड़े शहरी क्षेत्रों में बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण का आधार बन गया है।

शोषण का रूप

अब हम इनके अधिकारों की बात करते हैं। हालांकि जब यह कार्यक्रम शुरू हुआ था तब इसमें अपना योगदान करने वालों से उम्मीद की जाती थी कि वे स्वैच्छिक आधार यानी समाज सेवा करने के लिए आगे आएं और उन्हें इसके लिए वेतन के स्थान पर आनरेरियम यानी पारिश्रमिक दिया जाएगा जो उस समय आठ से हजार और बारह सौ रुपए तक तय किया गया।

इससे जहां एक ओर थोड़ी बहुत बेरोजगारी दूर हुई, वहां स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की एक समर्पित सेना भी तैयार हो गई। इन्हें यह समझ में आने लगा कि सेवा भावना के नाम पर उनका शोषण हो रहा है। वे अपने अधिकारों और उन्हें मिलने वाले मामूली से पारिश्रमिक के प्रति जागरूक होने लगे।

वर्तमान स्थिति में यह न केवल न्यायसंगत है बल्कि शोषण करने के आरोप से मुक्ति का भी अवसर है कि इनके लिए ऐसा कानून बनाया जाए जिससे इन्हें समुचित वेतन, सुविधाएं और साधन मिलें, परिवार के पालन पोषण की व्यवस्था हो ताकि इनके भी स्वास्थ्य की रक्षा हो सके।

इस आंगनवाड़ी समुदाय की सार्थकता कोविड महामारी के कारण हुए लॉकडाउन के दौरान सिद्ध हो गई क्योंकि जब महीनों तक जरूरतमंद महिलाओं और बच्चों को टीकाकरण और पौष्टिक भोजन की सुविधाएं नहीं मिलीं तो इस दौरान जन्म लेने वाले शिशु और उनकी माताएं कुपोषण का शिकार होने से बच नहीं पाए और अब एक बड़ी आबादी की कमजोर और बीमार रहने की समस्या खड़ी हो गई है। हालांकि सरकार ने पोषण माह और इसी तरह की व्यवस्थाएं कीं लेकिन यह ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है।

लॉकडाउन के दौरान जहां एक ओर संपन्न या खाते पीते परिवारों की श्रेणी में आने वाले अपनी इम्यूनिटी यानी रोगों से लड़ने की क्षमता बरकरार रख सके, वहां एक बड़ी जनसंख्या ऐसे व्यक्तियों की है जो अपनी आर्थिक स्थिति और हालात की मजबूरी के कारण अस्वस्थ और कुपोषित हो गए हैं।

कानून बनाने का सही समय

यह एक चेतावनी भी है और जरूरत भी कि इस बारे में हमारे सांसद, विधायक, नीति और कानून बनाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले यह विचार करें कि स्वस्थ तथा हृष्ट पुष्ट बने रहने का संवैधानिक अधिकार लोगों को दिया जाए।

यह अधिकार मिल जाने से यह जिम्मेदारी सरकार की हो जाएगी कि देश से कुपोषण का नामोनिशान कैसे मिटाया जाय और प्रत्येक नागरिक के स्वस्थ रहने के लिए क्या व्यवस्था की जाय। इसमें यह भी हो कि जिस प्रकार अर्ध सैनिक बल होते हैं, उसी तरह अर्ध स्वस्थ बल भी गठित हों जिनमें आंगनवाड़ी, बालवाड़ी और इसी तरह के अन्य संगठनों में काम करने वालों के वेतन, सुविधाओं से लेकर पेंशन तक की व्यवस्था हो।

आज हमारे देश में डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की भारी कमी है जो क्रमशः छह लाख और बीस लाख की है। स्वास्थ्य मानकों के अनुसार प्रति हजार व्यक्तियों के लिए एक डॉक्टर होना चाहिए जो वर्तमान स्थिति में असंभव है। यदि पैरा हैल्थ सर्विस शुरू हो जाए और उसे प्रशासनिक सेवा का स्वरूप देकर मजबूती प्रदान की जाय तो देश स्वास्थ्य और पोषण के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो सकता है। इसके साथ ही अभी ये काम अलग अलग मंत्रालयों में होता है। इसे केवल स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन किया जाए जिससे समन्वय स्थापित करने में मदद मिलेगी। 

इस बारे में सार्वजनिक रूप से चर्चा और बहस आयोजित की जाएं क्योंकि यह राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा है।

इस कानून के बन जाने से कुपोषित भारत के कलंक से मुक्ति मिल सकेगी और इसी के साथ बेरोजगारी, अशिक्षा और सामाजिक असमानता को दूर करने में भी मदद मिलेगी।  


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