शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

सामाजिक न्याय की सूरत बदलनी चाहिए

दुनिया की जानी मानी और प्रभावशाली संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ ने कुछ सोच समझकर ही सन् 2007 में बीस फरवरी की तारीख़ विश्व सामाजिक न्याय दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा की होगी। हो सकता है कि उसके ध्यान में संसार के कुछ देशों में सामाजिक अन्याय की ऐसी घटनाएं सामने आईं हों जिनका प्रभाव व्यापक रूप से पड़ता हो और एक मुहिम जैसा कुछ चलाना जरूरी लगा हो।

सामाजिक अन्याय

खैर जो भी हो, विषय की गंभीरता को देखते हुए अपने देश में उन बातों पर चर्चा करना एक बार फिर आवश्यक हो जाता है जिनसे सामाजिक न्याय की स्थापना हो और बड़े पैमाने पर फैली असमानता के निराकरण या उसे कम करने के प्रति लोगों में कुछ तो बेचैनी हो।

हालांकि इस मुद्दे को लेकर अक्सर बहस होती रहती है कि अगर किसी व्यक्ति, परिवार, समाज के साथ किसी भी तरह का अन्याय होता है तो उसके खिलाफ आवाज उठानी ही चाहिए और जो लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें कानून के माध्यम से सजा मिलनी चाहिए। लेकिन ऐसा होता नहीं है और जिस व्यक्ति या समुदाय ने कोई अन्याय किया है वह और भी चैड़ा होकर पहले से ज्यादा ताकत के साथ अपने विरुद्ध खड़े होने वालों को सबक सिखाने की नीयत से अन्याय और अत्याचार करने की नई से नई तरकीब निकाल कर अपना दबदबा कायम रखने में कामयाब होता जाता है। वह जानता है कि जब सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का क्योंकि राजनीतिक और प्रशासनिक समर्थन ज्यादातर उसके साथ होता है।

हमारे संविधान में इस बात की पुरजोर तरीके से व्यवस्था की गई है जिससे सामाजिक अन्याय करना संभव न हो, लेकिन जब समाज के कमजोर तबके से अन्याय होता है तो मतलब साफ है कि जिन लोगों पर संविधान के प्रावधानों को लागू करने की जिम्मेदारी है, वे उसकी अनदेखी कर रहे हैं और उनका साथ दे रहे हैं जो अन्याय करने में सबसे आगे हैं।

अगर ऐसा न होता तो देश की लगभग तीन चौथाई सम्पत्ति पर एक प्रतिशत लोगों का कब्जा नहीं होता और एक चैथाई आबादी को भूखे पेट रहने की मजबूरी नहीं होती।

कानून हैं पर बेअसर

हमारे देश में सामाजिक अन्याय को रोकने के लिए बने कानूनों की भरमार है, इनमें संशोधन भी होते रहते हैं और नए कानून बनते रहते हैं। अब क्यूंकि इन्हें लागू करने वाला तंत्र उदासीन बना रहता है तो सामाजिक अन्याय करने वाले उनके उल्लंघन का खुला खेल खेलते रहते हैं। कानून को अपना चाकर बना लेते हैं और पालन करवाने वालों को नौकर ताकि मनमानी करने में कोई कसर बाकी नहीं रहे।

हमारे देश में लिंग परीक्षण, भ्रूण हत्या, ऑनर किलिंग, बाल विवाह, दहेज जैसी कुरीतियों के ख़िलाफ सख्त कानून हैं लेकिन प्रतिदिन ये सब सबकी आंखों के सामने खुलेआम होता है।

हम अपने ही घर, पास पड़ौस और बाहर कदम रखने और कुछ दूर ही चलने पर सामाजिक न्याय की धज्जियां उड़ाई जाते हुए देखते रहते हैं और कुछ नहीं करते।

बाल मजदूरी अपराध है लेकिन अपने ही घर में स्कूल जाने की उम्र के बच्चों विशेषकर लड़कियों से घरेलू काम करवाने में कोई संकोच नहीं करते। इनके साथ बात और व्यवहार करने में शालीनता की सभी हदें पार करने से लेकर इनका शोषण करने तक इनके किसी संवैधानिक अधिकार की बात मन में ही नहीं आती।

सड़क, चौराहे, नुक्कड़ से लेकर किसी ढाबे और कारखाने में चार से चौदह साल तक के बच्चे काम करते हुए मिल जाएंगे जबकि यह गैर कानूनी है। ग्रामीण क्षेत्रों में चले जाइए तो वहां इस उम्र के बच्चे खेतों में काम करते मिलेंगे या पशुओं की देखभाल करते हुए अथवा कोई ऐसा ही मजदूरी का काम जो कानूनन इन्हें नहीं करना चाहिए।

थोड़ा आगे बढ़ने पर कुछ ऐसे युवा मिल जाएंगे जो शिक्षित होंगे लेकिन अपनी योग्यता प्रमाणित करने का अवसर हाथ से जाते हुए देखते रहने को विवश हैं क्योंकि सिफारिश, रिश्वत और भाई भतीजवाद का बोलबाला है और मजे की बात यह कि यह भी गैर कानूनी है।

महिलाओं को लेकर बहुत से कानून हैं जिनके अनुसार न तो उनके साथ लिंग के आधार पर कोई भेदभाव हो सकता है और न ही उन्हें पुरुषों से कम वेतन या मजदूरी दी जा सकती है। परन्तु ऐसा प्रतिदिन सबके सामने होता है। यही नहीं उनके साथ कोई दुर्व्यवहार होता है तो उन्हें ही कटघरे में खडा कर दिया जाता है कि गलती तो केवल औरत ही कर सकती है, मर्द तो बेचारे और पाकसाफ होते हैं। अगर कहीं किसी महिला ने हिम्मत कर न्याय की गुहार लगा दी तब तो हो सकता है कि उसका जीना ही मुश्किल हो जाय क्योंकि कानून उसके साथ बेशक हो लेकिन सामाजिक और कानूनी व्यवस्था तो उनके पास है जो नारी उत्पीड़न को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं।

जरा सा आगे बढ़ जाने पर हो सकता है आपको पास के धार्मिक स्थान पर भीख मांगते और किसी दानवीर द्वारा भूखों को दिए जा रहे भोजन की लंबी कतार में बच्चे, नौजवान, महिलाएं, बेसहारा, अपाहिज और वृद्ध मिल जाएं। यहां यहां यह कहना बेमानी हो जाता है कि भीख मांगना अपराध है।

कानून से बड़ा भाग्य

सामाजिक न्याय की अवधारणा इसलिए की गई होगी ताकि सब को शिक्षा, रोजगार, परिवार के भरण पोषण की सुविधा और सामान्य जीवन जी सकने की सहूलियत मिल जाय लेकिन यह सब लगता है कि संवैधानिक अधिकार के स्थान पर भाग्य के क्षेत्र में आता है। अगर किस्मत में होगा तो मिल जाएगा वरना कुछ नहीं मिलेगा।

अक्सर बहुत से लोगों को सामाजिक अन्याय की रोकथाम के लिए आंदोलन करते हुए, क्रांति जैसी किसी चीज का बखान करते हुए और अपने अंदर के गुस्से को प्रकट करने के लिए अहिंसा का दामन पकड़ कर अपनी न्यायोचित बात कहते हुए देखा जा सकता है।

हो सकता है कि कुछ लोग उत्तेजित होकर और अपने मानसिक संतुलन पर काबू पाने में असमर्थ होने पर हिंसा का रास्ता अपना लें। अब क्योंकि अपनी बात कहने के लिए हिंसात्मक रास्ता अख्तियार करना गैर कानूनी है तो तुरंत सरकार और प्रशासन हरकत में आ जाता है और हिरासत, गिरफ्तारी, मुकदमे का दौर शुरू हो जाता है। इसमें उस बात का कोई महत्व नहीं रहता जिसके लिए आंदोलन के जरिए अपनी बात कहने की कोशिश की गई थी लेकिन भावावेश में आकर कुछ ऐसा कर बैठना ही महत्वपूर्ण हो जाता है जो कानून के दायरे में नहीं आता।

विश्व सामाजिक न्याय दिवस पर क्या सरकार से कुछ ऐसी व्यवस्था करने की उम्मीद की जा सकती है जिससे संविधान में मिले अधिकार की रक्षा हो सके और उसे पाने के लिए कुछ ऐसा न करना पड़े जो असंवैधानिक या गैर कानूनी है?

·       सामाजिक न्याय की तसवीर बदली जानी चाहिए और यह तब ही बदल सकती है जब लोगों की सोच बदले।

·      जब बाल मजदूरी अपराध है तो फिर अपने घर, दफ्तर, कारखाने में हम क्यों उनसे काम लेना बंद नहीं करते ? यदि उनके पालन पोषण, शिक्षा की व्यवस्था करना उनके माता पिता या परिवार के वश में नहीं है तो फिर कोई ऐसी सरकारी व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकती जिससे उनका बचपन मजदूरी के दलदल में फंसने से बचा रह सके ?

·     युवाओं के लिए पर्याप्त शिक्षा प्राप्त करने पर अपनी योग्यता के अनुसार रोजगार या व्यवसाय न मिलने की अवस्था में क्या सरकार और समाजसेवी संस्थाओं से लेकर उद्योगपतियों का यह कर्तव्य नहीं है कि वे इनके लिए ऐसे संसाधन विकसित करें जिनसे इनकी योग्यता का उचित मूल्यांकन हो सके ?

·    वृद्ध और अशक्त होने पर तथा परिवार द्वारा उनकी देखभाल करने की असमर्थता के कारण वे बेसहारा न हों, उनके लिए सम्मानजनक तरीके से जीने की व्यवस्था करना क्या सरकारी मशीनरी का दायित्व नहीं है ?

·    सामाजिक न्याय केवल कानूनी कार्यवाही से सुनिश्चित नहीं किया जा सकता, तो फिर क्या फिर इससे अलग हटकर कुछ ऐसा नया नहीं होना चाहिए जिससे लोगों को न्याय मिलना एक सामान्य प्रक्रिया बन जाए और अपने अधिकार पाने के लिए संघर्ष न करना पड़े ?


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