शनिवार, 7 नवंबर 2020

कानून की कमजोर कड़ी और सरकार की नीयत से ही अपराध पनपता है

 


सामान्य नागरिक को जब प्रतिदिन वही कुछ सुनने, पढ़ने और देखने को मिले जो गैर कानूनी है, न्यायिक व्यवस्था के खिलाफ है तो उसे सरल भाषा में कहा जाय तो वह नैतिक,पारिवारिक और सामाजिक तथा आर्थिक मोर्चे पर गिरावट का प्रतीक है।

कानून और अपराध की जुगलबंदी

बलात्कार, शोषण, मारपीट, हिंसा, धोखाधड़ी और इसी तरह की घटनाएं न केवल गैर कानूनी हैं बल्कि कानून में उनके लिए कड़ी सजा का भी प्रावधान है।

क्या कभी इस पर ध्यान गया है कि अपराध करना कुछ लोगों की आदत क्यों बन जाता है? असल में जब आपराधिक मानसिकता किसी परिवार या जिस समाज में वह रहता है उसके जीवन मूल्यों का हिस्सा बन जाए तो फिर अपराध करना वैसा ही हो जाता है जैसे कि भूख लगने पर खाना खा कर अपनी मूंछों पर ताव देना या डकार मारना।

यह एक आम प्रवृत्ति है कि जब परिवार, समाज या फिर सरकार की तरफ से भी कोई नियम या कानून बनाया जाता है तो ज्यादातर लोगों की यही प्रतिक्रिया होती है: लो एक और कानून आ गया, हमें बताने चले हैं कि क्या करना है, पहले खुद तो इसे मानें, हमसे पूछ कर बनाया था, कोई हम पर अपनी मर्जी नहीं थोप सकता या फिर यह कि वैसे तो कानून में कोई कमी नहीं है लेकिन विरोधी पक्ष का होने के नाते हम इसे कतई नहीं मान सकते, चाहे कुछ भी हो जाए ।

विरोध की आदत

आगे बढ़ने से पहले एक घटना का जिक्र जरूरी है ताकि समझा जा सके कि यह आदत नाम की चिड़िया है क्या ?

कुछ समय पहले एक कॉरपोरेट संस्थान द्वारा अपने कर्मचारियों के लिए एक फिल्म बनाने का प्रस्ताव मिला। प्रबंधकों ने बताया कि उनके यहां फैक्टरी और दफ्तर में बड़ी संख्या में लोग समय पर नहीं आते और अगर कोई एक्शन लो तो लाल झंडा या फिर हड़ताल तक कर देते हैं। दूसरी बात यह कि कारखाने में कामगार लापरवाही से काम करते हैं और भारी नुकसान करते है, चाहे वेतन काट लें, सजा दे दें, कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि यहां यूनियन बहुत ताकतवर है।

बहुत सोचने के बाद फिल्म बनानी शुरू की और उसमें पहला सीन यह रखा कि सुबह के नौ बजे हैं लेकिन कोई काम पर नहीं आया, दूसरा सीन दस बजे का था और कुछ लोग काम पर आते दिखाए, इसके बाद ग्यारह बजे का सीन दिखाया जिसमें सभी कर्मचारी काम पर आते और अपनी ड्यूटी करते दिखे।

इसके बैकग्राउंड में यह कमेंट्री सुनाई:

हो सकता है कि आज आप देर से उठे हों, किसी घरेलू काम से कहीं जाना जरूरी हो, कोई मिलने आ गया हो या फिर किसी भी कारण से काम पर समय से यह सोचकर न पहुंच पाए हों कि जल्दी क्या है, चले जाएंगे- नौकरी तो पक्की है। लेकिन ध्यान रखिए कि कहीं काम पर देर से जाना आपकी आदत न बन जाए और कहीं ऐसा हुआ तो जीवन में आप सभी जगह देर से पहुंचेंगे जिसकी वजह से न केवल दूसरों से पीछे रह जाएंगे बल्कि हो सकता है कि आपका कोई बहुत बड़ा नुकसान हो जाए।

यह फिल्म रोज शूट होती और अगले दिन गेट पर दिखाई जाती। कुछ ही दिनों में लगभग शत प्रतिशत लोग नौ बजे आने लगे। कारण था कि कोई भी निजी जीवन में पीछे नहीं रहना चाहता और यह समझ में आने लगा था कि देरी की आदत एक बार पड़ गई तो नुकसान अपना ही होने वाला है। कोई भी कर्मचारी अब दस या ग्यारह बजे काम पर आता हुआ दिखाई देना नहीं चाहता था।

अब दूसरी समस्या को हल करने के लिए एक ट्रेनिंग फिल्म बनाई जिसमें विस्तार से उत्पाद बनाने की प्रक्रिया दिखाई गई और उसे टी वी रूम में सब के देखने के लिए रख दिया।

इसी के साथ इस संदेश वाली फिल्म सब को दी गई कि यदि आप की समझ में प्रोसेस न आए या कहीं अटक जाएं तो तुरंत काम बंद कर दें और इसके लिए आपसे न तो कुछ पूछा जाएगा और न ही प्रोडक्शन में कमी आने की जिम्मेदारी आपकी होगी। आपको बस यह करना है कि काम रोकने के बाद टी वी रूम मे जाकर ट्रेनिंग फिल्म देखिए और समझिए कि आप क्या गलती कर रहे थे और फिर उसके अनुसार अपना काम कीजिए। फिर भी उत्पाद ठीक न बने तो अपने सुपरवाइजर को सूचित कर दीजिए और जब तक कि समाधान न निकले, कुछ मत कीजिए।

इस फिल्म का असर यह हुआ कि प्रोडक्शन तो बढ़ा ही, साथ में सही क्वालिटी का भी बनने लगा।

यह किस्सा सुनाने का अर्थ यह है कि कानून बनाने वाले कोई भी नियम बनाने से पहले यह सुनिश्चित नहीं करते कि उसके पालन करने में कोई दिक्कत तो नहीं आयेगी, बस उसकी घोषणा कर देते हैं।

वास्तविकता तो यह है कि जब कोई ऐसा नियम, कायदा, कानून बनता है जो व्यवहार में न लाया जा सकता हो, तब ही लोग उसका उल्लंघन करने, न मानने या विरोध करने पर उतारू होते हैं वरना कौन नहीं चाहता कि  कानून का पालन न करने पर मिलने वाले दंड से बचा रहे और अच्छा नागरिक भी कहलाए।

नसीहत नहीं हकीकत

मिसाल के तौर पर ट्रैफिक कानूनों को ही ले लीजिए। सड़कों पर कट, डिवाइडर, सही दूरी पर मुड़ने की जगह, चैराहे पर लाइट्स, ट्रैफिक संकेत और चलने तथा ड्राइविंग के लिए सही सड़क ठीक से न होने के कारण ही ज्यादातर लोग ट्रैफिक नियमों का पालन न करने के लिए मजबूर होते हैं।

जिस व्यवस्था में सिपाही की हल्की सी मुठ्ठी गरम करने पर जुर्माने से बचा जा सकता हो, घर पर ही बिना ड्राइविंग सीखे लाइसेंस मिल जाता हो, परिवार में ही नियम मानने पर जोर न दिया जाता हो, दुर्घटना होने पर मदद करने वाले को ही पुलिस, थाने, कचहरी के चक्कर लगाने से लेकर गुनहगार सिद्ध करने का चलन हो तो मन में कानून को लेकर क्या धारणा बनेगी, सोचना कोई रॉकेट साइंस नहीं है

इसी तरह हर वर्ष अक्टूबर नवंबर में पराली जलाने या त्योहारों पर पटाखे चलाने से होने वाले प्रदूषण की बात होती है लेकिन कभी सरकार ने इसका कोई इंतजाम नहीं किया जिससे किसान हों या आम नागरिक, कैसे यह काम करने से अपने को रोक सकते हैं ?

गलती कहां है ?

जिस देश में प्रधान मंत्री को चुनाव जीतने के लिए यह कहना पड़े कि उनकी पार्टी को वोट देने पर कोरोना की दवाई मुफ्त मिलेगी, बिना किसी ठोस योजना के लाखों लोगों को रोजगार देने का वायदा कर वोट बटोरने के लिए लॉलीपॉप दिया जाता हो, योग्यता की बजाय भाई भतीजावाद, धन, बाहु बल और भ्रष्टाचार का बोलबाला हो तो वहां कानून को ठेंगा दिखाने का चलन तो होगा ही, अपराधियों का विधान सभा और संसद सदस्य बन जाना तो मामूली बात है !

नियम कानून की अनदेखी का परिणाम टैक्स चोरी, घटिया उत्पादन, असुरक्षित सामग्री और जान का जोखिम तो होता ही है, साथ में जहां से भी खरीदो वही सामान मिलता है जिसे बनाते समय क्वालिटी का नहीं ज्यादा से ज्यादा मुनाफा  कमाने का ध्यान रखा जाता है।

अगर इस बात पर बहस हो या चिंतन किया जाय कि सामान्य व्यक्ति हो या विशिष्ट कहलाए जाने वाला अर्थात संभ्रांत,  कानून या नियम कायदों को न मानने या उनकी धज्जियां उड़ाने के लिए क्यों तत्पर ही नहीं बल्कि अपना धर्म तक समझने लगता है तो यही बात सामने आयेगी कि इसके पीछे नासमझी, बिना किसी विश्लेषण, जरूरत से ज्यादा कड़ाई और अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति पर ही सबसे ज्यादा ध्यान देना है।

किसी भी कानून की अवज्ञा, उसका विरोध, आंदोलन या उसका कचरे की पेटी में फेंक दिया जाना और उसका इस्तेमाल केवल तब करना जब उससे किसी दल, सरकार या सत्ताधारियों का मतलब पूरा होता हो या आम जनता को अपनी ताकत का एहसास कराना हो, तब ही ऐसे हालात बनते हैं जिनसे अराजकता फैलती है।  कर्फ्यू, लाठी चार्ज, गोली चलाने से लेकर किसी भी प्रकार से दमन करना न्यायसंगत हो जाय और नैतिक मूल्यों की बात तो छोड़िए, परिवार और समाज को बचाए रखना मुश्किल ही नहीं, असंभव जैसा लगने लगता है।

सरकार को कोई कानून बनाने के बाद उसमें ढिलाई क्यों देनी पड़ती है, एमनेस्टी और रियायत देने को क्यों विवश होना पड़ता है, यह तब ही होता है जब कानून बनाने का आधार नैतिक और सामाजिक मूल्यों का बलिदान कर देना होता है।

बड़ा हो या छोटा कोई भी कानून हो, जैसे कि नोटबंदी, जीएसटी, नागरिकता से लेकर नए कृषि कानून की फजीहत या फिर टैक्स में राहत के नाम पर शिकंजे को और अधिक मजबूत करना, सामान्य व्यक्ति को यह लगना कि कानून या नियम अव्यावहारिक ही नहीं, अनैतिक भी है तो फिर अव्यवस्था तो होगी ही, कानून तोड़ना ही विकल्प बन जाएगा और तरक्की के रास्ते बंद होने की नौबत तो आयेगी ही, ऐसी हालत में या तो अपने को कोसने या फिर विद्रोह तक करने के अतिरिक्त और कुछ उपाय बचता ही कहां है ?

 

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