शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

पशुपालन का अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है







यह देखकर हैरानी भी होती है और हँसी भी आती है कि कुछ लोग पशुधन विशेषकर दुधारू पशुओं में सर्वश्रेष्ठ कही जाने वाली गाय की देखभाल और उसका संरक्षण करने की बात सुनते ही आग बबूला हो जाते हैं, अपना संतुलन खोने की हद तक चले जाते हैं और इस कदर विरोध करने लगते हैं जैसे कि मानो पशुधन की रक्षा करने की बात करना उनका अपमान हो। इसके विपरीत हकीकत यह है कि आज पशुधन की बदौलत ही हमारा देश दुनिया भर में इस क्षेत्र में पहले या दूसरे स्थान पर है और देश की अर्थव्यवस्था में वृद्धि करने, रोजगार देने और ग्रामीण इलाकों में खेतीबाड़ी के साथ साथ ग्रामवासियों को आमदनी का अतिरिक्त साधन देने में पशुपालन की इतनी बड़ी भूमिका है कि उसे नजरंदाज करना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा।



पशुपालन और किसानी


हमारे देश में किसान के पास साल भर में लगभग छः महीने ही खेतीबाड़ी और उससे जुड़े काम रहते हैं। अब बाकी के छः महीने वह पशुपालन अर्थात गाय , भैंस , बकरी पालने से लेकर मुर्गी, भेड़ और अन्य पशुओं को पालता है जिससे उसे अतिरिक्त आमदनी भी होती है और खाली भी नहीं बैठना पड़ता। हालाँकि पशुपालन के लिए अनेक शिक्षण संस्थान अब खुल गए हैं और उनसे पढ़ाई करने के बाद आधुनिक टेक्नॉलोजी और नवीन तकनीकों की जानकारी होने के बाद इस क्षेत्र में रोजगार की अपार सम्भावनाएँ होती हैं, लेकिन अधिकांश किसानों के लिए पशुपालन एक पुश्तैनी काम होने से पढ़ाई लिखाई भी की हो, फिर भी एक फायदेमंद काम है।


ज्यादा दूर क्यों जाएँ, तीस चालीस साल पहले तक दिल्ली जैसे शहर में घर में गाय पालने को परम्परा थी और गौसेवा को पुण्य का काम समझा जाता था। गाँव देहात में तो पशुपालन आज भी मुख्य है और दो तिहाई ग्रामीणों की आजीविका इससे चलती है, इसके साथ ही छोटे शहरों, कस्बों में तो यह अभी भी बहुत से परिवारों की आय का प्रमुख स्रोत है।

किसान के लिए हल बैल से खेती करना आज भी सुगम है क्योंकि छोटी जोत वालों के लिए ट्रैक्टर का इस्तेमाल काफी महँगा भी है और उससे क्योंकि खेत में गहराई तक खुदाई हो जाती है इसलिए उसे ज्यादा खाद और पानी की जरूरत पड़ती है। यहाँ तक कि अनेक परीक्षण करने पर यह बात भी सामने आई कि हल बैल से खेती करने पर ट्रैक्टर का इस्तेमाल करने के मुकाबले अधिक उपज हुई। यह भी ध्यान रखने की बात है कि ट्रैक्टर से मिला धुआँ और बैल से मिला गोबर और मूत्र जो खाद बनकर किसान के काम आया।


ट्रैक्टर और खेतीबाड़ी के लिए आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल जरूरी है लेकिन वहाँ जहाँ बड़ी जोत हों, लम्बे चौड़े खेत हों और खाद तथा सिंचाई की पूर्ण व्यवस्था हो। इन बड़े किसानों के लिए पशुपालन का अधिक महत्व हो लेकिन छोटे और मंझोले किसानों के लिए यह उनकी रीढ़ के सामान है जो जितनी मजबूत होगी उतनी ही खुशहाली गाँव देहात में होगी।


किसान के लिए परिवार में पशुधन, विशेषकर गाय भैंस एक तरह से चलता फिरता बैंक है। जब जरूरत पड़ी, कोई अचानक खर्चा गया या फिर शादी में लेनदेन की बात सामने आई तो यही पशुधन उसका सहारा बनता है। ये पशु खाते क्या हैं : खरपतवार और छीजन तथा खेती के लिए अनुपयुक्त जमीन पर उगे चरागाह का चारा और देते हैं पौष्टिक दूध तथा गोबर से खाद, इंधन और स्वच्छ वातावरण जो प्रदूषण रहित है।


बापू गांधी तो गौसेवा को सत्य और अहिंसा के सिद्धांत पर चलने के लिए अनिवार्य साधन तक मानते थे। जो गाय हमारी सांस्कृतिक परम्पराओं, तीज त्योहारों से जुड़ी है और आस्था से जुड़ी है तथा आर्थिक समृद्धि का प्रतीक है, परिवार के सम्मान को बढ़ाती है और उसका प्रत्येक अंग हमारे लिए उपयोगी है तथा जो अपने मरने के बाद भी अपने अवशेषों से हमारी आमदनी करवा जाती है तो ऐसे जीव का संरक्षण और संवर्धन करना व्यक्तिगत भलाई तो है ही, साथ में देश की अर्थव्यवस्था में भी योगदान करना है।


पशुपालन और व्यवसाय

आज दुधारू पशुओं जैसे गाय भैंस का पालन केवल व्यक्तिगत नहीं रह गया है बल्कि इसने अब संगठित व्यापार का रूप ले लिया है। भैंस के माँस निर्यात में तो हम पहले स्थान पर हैं हीं, साथ में सम्पूर्ण पशुधन के मामले में भी सबसे आगे हैं। मुर्गी, भेड़ पालन में भी बहुत आगे हैं, यहाँ तक कि मछली पालन में भी दूसरे स्थान पर हैं।


जो अन्य पशु हैं जैसे घोड़े, खच्चर, ऊँट उनकी उपयोगिता इतनी है कि आज भी जंगलों, पहाड़ी इलाकों और दुर्गम स्थानों पर यातायात का एकमात्र साधन हैं। देश की लगभग एक चौथाई आबादी किसी किसी रूप में पशुपालन से जुड़ी है, चाहे यह शवान यानि कुत्तों का पालन ही क्यों हो जिसने भी अब एक उभरते व्यापार का रूप ले लिया है।


जहाँ तक अर्थव्यवस्था के कमजोर होने और देश में मंदी का दौर होने, उद्योगों के बंद होने के कगार पर होने, रोजगार कम होने से लेकर निवेशकों द्वारा निवेश करने में संकोच करने या हाथ खींच लेने का संबंध है तो इसका कारण आर्थिक नीतियों का कारगर होना नहीं है। इससे पूरी तरह सहमत इसलिए नहीं हुआ जा सकता क्योंकि इसके कुछ कारण ऐसे हैं जो मुनाफाखोरी और लालच से जुड़े हैं।

जो भी हो, जरूरत इस बात की है कि वैकल्पिक उद्योग के रूप में ही सही, पशुपालन को औद्योगिक दर्जा दिया जाए, इसमें भी सस्ते ऋण, सस्ती जमीन और मुफ्त बुनियादी सुविधाएँ दी जाएँ तो यह क्षेत्र अपार सम्भावनाओं वाला सिद्ध होगा।


पशुपालन के शिक्षण और प्रशिक्षण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर तो सुविधाएँ हैं लेकिन उन तक हरेक की पहुँच होने से लोगों की इसमें ज्यादा रुचि नहीं होती। इसके लिए जिला स्तर पर ट्रेनिंग सेंटर खुलें और पशुओं के रखरखाव से लेकर उनकी चिकित्सा तक के व्यापक प्रबंध हों। अभी तो यह हालत है कि ग्रामीण क्षेत्रों में पशु बीमार हो जाए तो उसका इलाज करने के लिए समय पर पशु चिकित्सक ही नहीं मिलता और पशु की असामयिक मौत हो जाती है।
डेयरी उद्योग, मत्स्य पालन, सुअर, मुर्गी, भेड़, बकरी पालन से लेकर घोड़े और ऊँट पालन तक में उद्योग का आकार लेने की क्षमता है। इन्हें प्रोत्साहन देने से उद्यमशीलता को बढ़ावा मिलेगा, उत्पादकता में वृद्धि होगी, रोजगार के साधन बढ़ेंगे और इनसे जुड़े छोटे उद्योग तथा कल कारखाने खुलेंगे जो व्यक्तिगत समृद्धि का कारण तो बनेंगे ही, देश की आर्थिक स्थिति भी पहले से अधिक और स्थाई तौर पर मजबूत करेंगे।

शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

मंदी नहीं बेईमानी की नजरबंदी है, नीयत साफ होनी चाहिए








अर्थव्यवस्था चौपट हो रही है, मंदी आ रही है, गिरावट का दौर है, इतना भी सच नहीं है। एक आम आदमी जब बड़े बड़े अर्थशास्त्रियों, तथाकथित विद्वानों के कथन और मीडिया में बहस सुनता है तो अक्सर चकरा जाता है कि किस पर यकीन करे और किस पर नहीं। सरकार कहती है तरक्की की राह पर देश तेजी से दौड़ रहा है और बस कुछ ही समय में बड़े बड़े देशों से न केवल बराबरी करने लगेंगे बल्कि कई देशों को तो पीछे छोड़ देंगे। इसके उलट कुछ लोग इस तरह की बातें करते हैं कि मानो देश रसातल में जा रहा है और अंधेर नगरी चौपट राजा की कहावत सिद्ध हो रही है। परंतु ऐसा नहीं है और अगर असलियत समझी जाए तो बात कुछ और ही है।



भूतपूर्व प्रधान मंत्री और अर्थशास्त्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने जब ऑटो सेक्टर में बिक्री में हो रही गिरावट पर मंदी का ठीकरा फोड़ा तो लगा कि वाकई में ऐसा है, लेकिन थोड़ा दिमाग पर जोर डालने पर लगा कि गाड़ियों की बिक्री कम होने के दूसरे ही कारण है।


मान लीजिए आप अच्छे खासे बजट की गाड़ी खरीदने जाते हैं और पता करते हैं कि उसकी बाजार में कीमत क्या है तो हैरान हो जाते हैं कि जो नई गाड़ी अभी अभी शोरूम से खरीदकर लाए हैं उसकी कीमत बाहर आते ही दस से बीस प्रतिशत कम हो जाती है। क्या इसका मतलब यह नहीं है उस गाड़ी की कीमत वही है जो बाहर लाने पर हो गई है और कार निर्माता ने ज्यादा कीमत वसूली है। आप ने अगर गाड़ी खरीद ली तो पछताते हैं और नहीं खरीदी तो मुफ्त में चूना लगने से बच गए हों, ऐसा महसूस करते हैं।


पिछले कुछ समय से ओला, उबर, मेरु जैसी कम्पनियाँ वाजिब किराए पर सभी तरह की गाड़ियाँ उपलब्ध करा रही हैं, आप कहीं भी जाने के लिए इन्हें बुक कर सकते हैं, न ड्राइवर का झंझट, न पार्किंग की किल्लत, आराम से गाड़ी के मालिक की तरह अपने गंतव्य तक पहुँच जाइए। अब हुआ यह कि उन लोगों को गाड़ी खरीदने की जरूरत कम होने लगी, और यही नहीं अपनी गाड़ी अगर है तो उसे घर पर खड़ी रहने देकर इन वाहनों से आना जाना आसान लगने लगा, ऐसे में नई गाड़ी की जरूरत ही नहीं लगती।


इसी के साथ साथ आम आदमी के आने जाने के लिए इलेक्ट्रिक रिक्शा अब छोटे बड़े शहरों और ग्रामीण इलाकों तक पहुँच रहा है और हाथ से रिक्शा खींचकर सवारी ले जाने का अमानवीय काम और साईकल रिक्शा की कमरतोड़ मेहनत करने वाले अब ईरिक्शा खरीदकर अपनी रोजी रोटी कमाने लगे हैं तो इससे अब बसों में लटकने या तिपहियों की मनमानी और उनसे निकलते धुएँ से बचने का रास्ता भी निकल आया है। अगर कोई उद्यमी जगह जगह चार्जिंग स्टेशन और सस्ती तथा टिकाऊ बैटरियाँ उपलब्ध कराने का व्यापार कर ले तो इसमें आमदनी और रोजगार की बहुत सम्भावनाएँ हैं।



जब से इलेक्ट्रिक गाड़ियों के बहुतायत से आने की चर्चा शुरू हुई है तो प्रदूषण फैलाने वाली पेट्रोल, डीजल की गाड़ियों को न खरीदने का मन हो रहा है कि कुछ इंतजार करने में कोई हर्ज नहीं, अगर गाड़ी खरीदनी ही है! इसलिए पैसेंजर गाड़ियों की बिक्री में कमी होने से मंदी आने की कोई सम्भावना नहीं है क्योंकि अब उन वाहनों की बिक्री दस प्रतिशत से ज्यादा हो रही है जो माल, सवारियाँ और सभी तरह की अन्य सामग्री ढोने के काम आती हैं, यहाँ तक कि खेतीबाड़ी में काम आने वाले भी, जैसे बस, ट्रक, लॉरी, ट्रैक्टर आदि।


अर्थशास्त्र के सिद्धांत माँग और पूर्ति के आधार पर ही कोई व्यापार टिकता है, इसलिए जब अब पुल, राजमार्ग, हर जगह सड़कें और यहाँ तक कि देहात में घर और शौचालय तथा दूसरी जरूरत की चीजें बन रही है तो फिर मालवाहक गाड़ियों की बिक्री तो बढ़ेगी ही, इसलिए ऑटो सेक्टर में आई गिरावट तो मंदी का पैमाना हो नहीं सकती।
असल में आज जरूरत लक्जरी पैसेंजर गाड़ियों की नहीं बल्कि आधुनिक और संचार साधनों से लैस बढ़िया बसें चाहियें जो टूरिस्ट से लेकर हम आम भारतियों को भी आरामदायक यात्रा का सुख दे सकें और खटारा तथा धुआँ उगलती बसों से निजात दिला सकें। इसी तरह ट्रक, ट्रैक्टर और खेतीबाड़ी के काम आने वाले यंत्र और वाहन चाहियें जिनकी पूर्ति माँग से कम होने के कारण ओवरर्लोडिंग और उत्पादन में कमी आना लाजिमी है।


मंदी और महँगाई 

असल में आम आदमी के लिए मंदी की समझ यह है कि आप ढेर सारे पैसे लेकर बाजार जाएँ और सामान इतना सस्ता मिलने लगे कि काफी कुछ खरीदने पर भी पैसे बच रहें और महँगाई यह है कि चीजें इतनी महँगी हैं कि जेब भी खाली हो गयी और जरूरत का सामान भी खरीद न पाए।

यह जानकर कि अब जो लोग अमीर हैं और पैसा लुटाने की हद तक खर्च करने में कभी दोबारा नहीं सोचते थे उन्हें भी अब चीजें महँगी लगने लगी हैं और वे भी दस रुपए के दो केलों के आठ सौ रुपए देने पर शिकायत करने लगे हैं तो एक आदमी को जरूर तसल्ली महसूस हुई होगी कि चलो अब इन्हें भी अपनी जेब कटती महसूस हो रही है क्योंकि ऐसे ही लोगों की वजह से ही उसे बाजार में हर चीज के कई गुणा दाम देने पड़ते हैं और वह सस्ती से सस्ती चीज ढूँढता रहता है क्योंकि उसकी जेब में सिर्फ मेहनत के पैसे होते हैं।


जब मॉल में दस रुपए की पानी की बोतल के अस्सी रुपए और बीस रुपए के मक्का के दानों के दो सौ रुपए लिए जाएँ तो आम आदमी उन्हें न खरीदने में ही समझदारी दिखाने लगा है। अब जब बाजार में बहुत कम लागत के सामान के बीस गुना दाम वसूले जाएँगे तो उनकी बिक्री में कमी आना तो अनिवार्य है तो फिर यह महँगाई कहाँ हुई , यह तो सरासर बेईमानी और मुनाफाखोरी है जिस पर अंकुश लगाने का काम उपभोक्ता और सरकार बड़ी आसानी से कर सकती है। 


वास्तविकता यह है कि चीजों के दाम उन लोगों की वजह से ज्यादा बढ़ते हैं जिनके पास रिश्वतखोरी, कालाबाजारी और टैक्स चोरी का अकूत धन होता है और उन्हें किसी भी चीज का कोई भी दाम देने का बुरा नहीं लगता क्योंकि यह मेहनत से कमाया हुआ धन नहीं होता। विलासिता से लेकर आवश्यक वस्तुओं की बिक्री में कमी आने का एक कारण यह भी है कि अब इन सब बुराइयों की काट होने लगी हैं और बड़े बड़ों तक को इस तरह से की गई कमाई के नतीजे के तौर पर जेल के दरवाजे उनके लिए खुलते नजर आ रहे हैं।


डर के बिना प्रीत नहीं 

यह डर ही है जो कानून का पालन करना सिखाता है और उलटी चाल चलने वालों को सीधे रास्ते पर लाने का काम करता है। एक किस्सा है। हाल ही में भोपाल और लखनऊ में जाना हुआ और दोनों जगह अलग अलग सरकारी दफ्तर के साहबों की करतूत सामने ऐसी आई कि कानून का डर क्या होता है यह दिखाई दिया। इन दोनों ही स्थानों से सरकारी खजाने से कैसे बिना काम के बिलों के लंबे चौड़े भुगतान हो जाते हैं, इसके अनेक उदाहरण मिले।


अफसर और सप्लायर आधी आधी बंदरबाँट कर के कागजों में काम दिखाकर कैसे लूटपाट करते रहे हैं, इसके किस्से कोई नए नहीं हैं लेकिन अब अफसरशाही को कानून का डर महसूस होने लगा है जिसे कुछ लोग आर्थिक आतंकवाद के रूप में परिभाषित करने लगे हैं। इसलिए यह डर अच्छा है क्योंकि कम से कम इसी वजह से लोग ईमानदार हो सकेंगे और अपराध करने के कलंक से बचे रहेंगे।


डर का ताजा उदाहरण यह है कि जब से यातायात नियमों में बदलाव कर भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया है और इस पर अमल भी हो रहा है तो लोग अपनी आदतों में सुधार करने को मजबूर हो रहे हैं। इन नए नियमों से हादसों के कम होने का पता तो कुछ समय बाद लगेगा पर आम आदमी  को जरूर सड़क पर पैदल चलने या वाहन का सही इस्तेमाल करने में सहूलियत होगी जो अब तक गाड़ियों की अंधाधुँध रफ्तार से पीड़ित रहता था।


मंदी, महँगाई, अर्थव्यवस्था, शेयर बाजार , इंडेक्स , निफ्टी जैसे भारी भरकम शब्दों की व्याख्या समझने के चक्कर में पड़ने से बेहतर यह होगा कि सामान्य व्यक्ति अपने घर की आमदनी और खर्चों का तालमेल बिठाना सीख ले और नौकरी, व्यापार, कारोबार, उद्यम की बढ़ौतरी तथा सरकारी योजनाओं का कैसे लाभ उठा सकता है, यह सोचने में अपनी ऊर्जा लगाए। यह जो राजनेता और उनके दल हैं वे उसे भरमाने में कोई कसर नहीं रखेंगे बशर्ते कि वह जागरूक न हो।

(भारत)

शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

किसान परिवार की महिलाएं और खेतीबाड़ी








यह हैरान करने जैसी हकीकत है कि जिस खेतीबाड़ी को आमतौर से किसान यानी एक पुरुष का काम समझा जाता है, इसके विपरीत इस काम में महिलाओं का योगदान अधिक होता है लेकिन केवल पुरुष के पास ही सभी तरह के फैसले लेने का अधिकार होता है और उसमें औरत की भूमिका लगभग न के बराबर है।


हमारा मकसद स्त्री और पुरूष के बीच कोई मतभेद, प्रतियोगिता या छोटा बड़ा समझने का नहीं है बल्कि यह है कि अगर महिला कृषि कार्यों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती है तो इस बात का फैसला करने  का अगर उसे पूरा अधिकार नहीं भी देते फिर भी कम से कम उस की राय तो लें कि खेत में उगाने के लिए कौन सा बीज उत्तम रहेगा, सिंचाई का कौन सा साधन इस्तेमाल हो और खाद कौन सी लेनी चाहिए तथा फसल के निपटान से लेकर उसकी बिक्री तक कहाँ और कैसे हो ?


यह बात इसलिए प्रमुख है क्योंकि खेतीबाड़ी का लगभग आधा काम करना किसान परिवार की महिलाओं के जिम्मे आता है और अगर आँकड़े देखें तो दुनिया की अस्सी प्रतिशत महिलाएँ खेतीबाड़ी से जुड़ी हैं और हमारे देश में भी यह आँकड़ा कोई कम नहीं है।


महिलाओं को खेती की समझ

अभी जो वास्तविकता है वह यह कि अगर किसान के घर की महिला यह कहे कि इस बार हमारे खेत में जो आप हमेशा उगाते हो तो उसके बदले यह उगाओ तो झिड़क दिया जाता है कि तेरा काम यह नहीं और तू बस उतना ही कर जो तुझे बोने, काटने को कहा जाए, हम मर्दों को ज्यादा पता होता है कि क्या उगाना है क्या नहीं?

 अब जब फसल कम होती है, मर जाती है और कम या ज्यादा और गलत खाद और पानी देने से नष्ट हो जाती है तो किसान इसके लिए अपनी किस्मत को कोसता रहता है लेकिन उसे यह गवारा नहीं कि इस काम में अपने घर की महिलाओं से सलाह मशविरा कर ले और इसका कारण यह है कि खेतों के काम में औरतों का ज्यादा वक्त गुजरता है और उन्हें अपनी जमीन के बारे में परिवार के पुरुषों से अधिक जानकारी होती है।


खेतीबाड़ी से जुड़ें विषयों पर फिल्में बनाते समय स्वयं इस बात को देखा है कि यदि मान लीजिए पंचायत की सरपंच महिला है तो भी उसे अपने पति या ससुर के कहने और निर्देश के अनुसार ही पंचायत के फैसले करने होते हैं और अगर किसी महिला सरपंच ने अपनी मर्जी से कुछ किया तो परिवार में उसकी दुर्दशा होना निश्चित है।


हमारे देश में किसानी से कम आमदनी होने का सब से बड़ा कारण यह है कि ज्यादातर किसान इस काम में पूरा ध्यान नहीं देते और सरकार या कोई संस्थान अगर उन्हें बताने और समझने के लिए छपी सामग्री या आधुनिक टेक्नोलोजी के बारे जानकारी देता है तो वह उसका उपयोग न कर पुरानी प्रणालियों से ही खेतीबाड़ी करने को प्राथमिकता देते हैं।


हालाँकि जिन किसान परिवारों ने आधुनिक कृषि के तरीको को अपनाया और महिलाओं का पूरा सहयोग लिया वे समृद्ध और खुशहाली का स्वाद ले रहे हैं लेकिन यह बढ़ती माँग के अनुरूप न होने से पुराने पड़ चुके तरीकों से खेती करने वाले ज्यादातर किसान बदहाली और गरीबी की हालत में जी रहे हैं।


संयुक्त राष्ट्र के फूड और ऐग्रिकल्चर संस्थान की एक रिपोर्ट में यह बात कही गयी है कि महिला किसानों का कृषि उत्पादन तीस प्रतिशत तक इसलिए कम होता है क्योंकि उनके पास वह जानकारी और साधन नहीं पहुँच पाते जो पुरुषों के पास आते है और वे उनके बारे में महिलाओं को नहीं बताते और खुद उनका इस्तेमाल करने में उनकी कोई रुचि नहीं होती।


इसके अतिरिक्त सरकार और बहुत सी निजी संस्थाओं द्वारा किसानों को ट्रेनिंग देने के अनेक कार्यक्रम जब तब आयोजित होते रहते हैं, उनमें पुरुष किसान ही अधिकतर जाते हैं और अगर कोई महिला जाती भी है तो उसकी कुछ पूछने की हिम्मत ही नहीं होती क्योंकि ट्रेनर पुरुष होते हैं और गाँव की औरतों के लिए यह वर्जित है कि वह पराए मर्द से बात करें। अब जो मर्द इनमें भाग लेते हैं उनके लिए यह सैर सपाटा ज्यादा होता है और वे घर आते आते वह सब कुछ भूल चुके होते हैं जो उन्हें इन ट्रेनिंग शिविरों में बताया गया हो ।


जरूरत इस बात की है कि ट्रेनिंग के लिए महिला किसानों और किसान परिवार की महिलाओं के लिए ऐसे शिविर लगाए जाएँ जो महिलाओं के लिए महिलाओं द्वारा आयोजित हों। वे न केवल नई जानकारी और टेक्नॉलोजी को घर तथा खेतों तक ले आएँगी बल्कि पुरुषों को भी प्रेरणा देना का काम करेंगी जो अभी तक परम्परागत खेती के तरीकों से ही चिपके रहना चाहते हैं।


हमारे देश में ज्यादातर खेती छोटी जोतों में होती है इसलिए औरतों के लिए उनका प्रबंध करना और भी आसान है और वे घर और खेत दोनों ही स्थानों को कुशलतापूर्वक संभाल सकती हैं। इसके साथ साथ यह भी एक सच्चाई है कि महिलाओं को पुरुषों से ज्यादा इस बात की जानकारी होती है कि क्या पौष्टिक भोजन है और किस चीज की परिवार को जरूरत है जिससे सभी सेहतमंद रहें, तो जो महिला किसान है वो इस बात का पहले ध्यान रखेगी कि उसके खेत से जो उपज निकले, चाहे अनाज, फल, सब्जी या कुछ भी हो, वह पौष्टिक भी हो और अधिक समय तक टिकाऊ भी हो ताकि इस्तेमाल करने तक खराब न हो ।


कृषि विकास में महिला किसानों की भूमिका


जब किसानी करने वाली आधी संख्या महिलाओं की है तो उन्हें यह अधिकार देने में क्या हर्ज है कि वे अपनी बुद्धि और कौशल से खेतीबाड़ी से सम्बंधित सभी फैसलों को करें और पुरुषों के साथ इस मामले में भी कंधे से कंधा मिलाकर चलें। असलियत यह है कि कृषि वैज्ञानिक हों या अनुसंधानकर्ता, वे सब पुरुष किसानों से ही बात करते हैं जबकि खेतीबाड़ी हो या पशुपालन इस सब में महिलाओं की भूमिका अधिक है और विडम्बनापूर्ण यह है उनसे कोई बात ही नहीं करता और न उन तक पहुँचने की कोशिश करता है।


पुरुष और महिला के बीच बुनियादी फर्क यह होता है कि जहाँ मर्द को अपने मतलब की बात पहले समझ आती है वहाँ औरत को वह बात ज्यादा और जल्दी समझ में आती है जो परिवार और समाज के  लिए अधिक फायदेमंद हो, इसलिए खेतीबाड़ी के मामले में स्त्री की भूमिका को नजरंदाज करने के बजाय उसका लाभ उठाने में ही समझदारी है।


किसान की गरीबी दूर करने का यह कोई सार्थक तरीका नहीं है कि उसकी पैसों से मदद कर दी जाए बल्कि यह है कि बेहतर तकनीक, उत्तम बीज, बढ़िया खाद और सिंचाई तथा बिजली की आसानी से उपलब्धता निश्चित कर दी जाए, ऐसा होने पर उसे थोड़े ही समय में न सरकारी सब्सिडी और न ही नकद पैसों की खैरात की जरूरत पड़ेगी।


यह बात ऐसी नहीं है कि कोई नई हो बल्कि हरित क्रांति के जनक और नोबल पुरस्कार से सम्मानित डॉक्टर नॉर्मन बोरलोग ने बहुत पहले ही कह दी थी कि कृषि क्रांति अगर करनी है तो उसमें महिलाओं की निश्चित भूमिका है और उनके सहयोग के बिना यह सम्भव नहीं है।


यही नहीं भारत में हरित क्रांति के पुरोधा और जनक एम एस स्वामिनाथन ने तो अपनी राज्य सभा की सदस्यता के दौरान संसद में एक बिल भी पेश किया था जिसमें कृषि में महिलाओं के सक्रिय योगदान को कानून सम्मत बनाने की बात कही गयी थी  दुर्भाग्य से यह बिल सरकार और सदस्यों की उदासीनता के कारण परवान ही नहीं चढ़ सका।
अभी भी इस बारे में कानून बनाया जा सकता है जिसमें महिला किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए वित्तीय सुविधाएँ और कानूनी संरक्षण मिल सके।


 इसमें कोई बुराई भी नहीं क्योंकि अक्सर हम महिलाओं के सशक्तिकरण की बात करते ही रहते हैं तो फिर कृषि के क्षेत्र में उनके योगदान को न केवल सराहा जाना चाहिए बल्कि उन्हें अधिक से अधिक किसानी करने के लिए आमंत्रित भी करना चाहिए।

शुक्रवार, 16 अगस्त 2019

सीमित परिवार महिलाओं की पहल से ही सम्भव






जरा याद कीजिए कि इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी की सबसे बड़ी असफलता क्या थी? यह थी उनकी अधकचरी सोच, मर्द होने का अहंकार, प्रधान मंत्री माँ की ताकत को अपने मंसूबे पूरे करने का हथियार बना लेना और जिस विषय की बुनियादी समझ तक नहीं थी, मतलब फैमिली प्लानिंग को बंदूक के बल पर लागू करने की अमानवीय कोशिश जिसका नतीजा इतना दर्दनाक निकला कि उसके बाद किसी भी दल और उनके नेताओं की इस मुद्दे पर बात तक करने की हिम्मत नहीं हुई।


यह बात हर किसी की जुबान पर होती है चाहे दबे स्वर में ही हो कि हमारे विकास की गति धीमी इसलिए है क्योकिं संसाधन तैयार होने की तादाद कभी भी उस संख्या से मेल नहीं खा पाती जो बेरोकटोक आबादी बढ़ने से बन जाती है और हमारे प्रयासों को नाकामयाब बना देती है।

इस बार प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से अपने भाषण में इस मुद्दे को उठाते हुए देशवासियों का आह्वान किया कि परिवार को सीमित रखना भी देशभक्ति है तो लगा कि उनके मन में इस बारे में कोई न कोई योजना अवश्य चल रही होगी और वे अन्य मामलों की तरह इसे भी सुलझाने के लिए कृतसंकल्प हैं। यह भी सोचा होगा कि इस मद में करोड़ों रुपया लगाने के बावजूद सफलता क्यों नहीं मिली ? उनके भाषण से लगा कि वे सीमित परिवार रखने वालों को सम्मानित कर सकते हैं।


 तो समझ लीजिए कि इनकी संख्या देशभर में मुशकिल से दस प्रतिशत होगी इसलिए ये कभी भी शेष परिवारों के लिए रोल मॉडल नहीं हो सकते। सीमित परिवार रखने का संबंध हमारी जातिगत विभिन्नताओं, सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं तथा व्यक्तिगत आकांक्षाओं से जुड़ा है इसलिए अत्याधिक संवेदनशील भी हैं। इसलिए कोई बड़ा कानून बनाने या प्रतिबंध लगाने से पहले दो बार सोच लीजिएगा क्योंकि इस मामले में दांव उल्टा पड़ सकता है।



महिलाओं की निर्णायक भूमिका


एक घटना है जिसका जिक्र मलिंडा गेट्स ने अपनी किताब में किया है जो इस विषय को समझने की समझ पैदा करने का उदाहरण है। भारत में अपनी फाउंडेशन के कार्यक्रमों का ज़ायजा लेने के दौरान वे गर्भवती महिलाओं और उनके परिवारों से मिलीं। एक बुजुर्ग महिला ने कहा कि उसने आठ बच्चों को घर पर ही जन्म दिया जिनमें से छः जन्म लेने के बाद एक सप्ताह में ही मर गए। अब उसकी बहू गर्भवती है और वह चाहती है कि बहू को प्रसव के समय हर प्रकार की सुविधा मिले और नहीं चाहती कि वह दोबारा गर्भवती हो और उसका जीवन भी मेरी तरह यानी अपनी सास के जैसा हो।

एक अन्य महिला मीना जिसने दो सप्ताह पहले एक लड़के को जन्म दिया था उससे जब यह पूछा गया कि क्या वह फिर से माँ बनेगी तो उसका जवाब था ‘कभी नहीं‘ और साथ में यह भी जोड़ा कि वह (मलिंडा) इस नवजात शिशु को अपने साथ ले जाएँ और साथ में उसके दो साल के लड़के को भी। इसकी वजह यह बताई कि वह नहीं जानती कि वह इनका पालन पोषण कैसे करेगी? उसका पति मजदूर है और वह भी, फिर भी इतना नहीं कमा पाते कि ठीक से पेट भर सकें तो फिर बच्चों की परवरिश कैसे कर पाएँगे?

एक अन्य महिला जो अनेक बार माँ बन चुकी थी और फिर से एक बच्चे को जन्म देने वाली थी वह यह सोच रही थी कि वह इतनी मजबूर क्यों है कि वह यह नहीं कह पाती कि अब वह माँ नहीं बनना चाहती?

क्या कोई मर्द उन औरतों के दर्द को समझ सकता है जो अपने बच्चों को किसी और को देने के लिए तैयार हों, दूसरा बच्चा पैदा न करना चाहें और बच्चे का लालन पालन करने और उसके भविष्य के बारे में कोई भी फैसला लेने का अधिकार केवल उनके पति, ससुर या किसी अन्य पुरुष के हाथ में हो और सिर झुकाकर हर निर्णय मान लेने की बेबसी हो !

संसार की हर महिला चाहती है कि उसकी संतान स्वस्थ और सुखी हो, खूब पढ़े लिखे, अपने को योग्य बनाए, उनके अपने परिवार हों और वे अपने जीवन को खुशियों से भरते रहें और इसके साथ साथ वे स्वयं भी शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ हों और अपने को सुरक्षित इस रूप में समझें कि उन्हें यह निर्णय करने का अधिकार हो कि उन्हें कब माँ बनना है। बिना सोचे समझे गर्भवती हो जाना महिलाओं के लिए घातक, असम्मानजनक, निराश और अंधकारपूर्ण भविष्य का कारण है और विडम्बना यह कि इसके लिए उनके पति जिम्मेदार होते हैं और वह इसके लिए पत्नी को ही दोषी मानते हैं।

सीमित परिवार और संयम


राष्ट्रपिता बापू गांधी ने इस विषय पर बहुत कुछ लिखा है जिसका निष्कर्ष यही है कि संयम के बिना आबादी को बढ़ने से रोकना असम्भव है। इसका अर्थ यही है कि सहवास के समय स्त्री को यह भरोसा हो कि उसे अनचाहा गर्भ धारण नहीं करना होगा। पति को अपनी सोच बदलनी होगी कि वह जब चाहे यह क्रिया कर सकता है । बापू के समय में ही हालाँकि गर्भनिरोधक उपाय प्रचलन में आ गए थे लेकिन उन्होंने इनके बजाय प्राकृतिक रूप से परिवार को सीमित रखने का तरीका ‘संयम अपनाने‘ पर ही जोर दिया था। सुरक्षित दिनों में ही पति पत्नी सहवास करें और तब तक संतान की कामना न करें जब तक वे आर्थिक रूप से उसके पालन पोषण की जिम्मेदारी उठाने के लिए पूरी तरह से तैयार न हो जाएँ।

जहाँ तक सरकार और समाज की बात है तो इसके लिए सबसे पहले जरूरी यह है कि प्रत्येक गर्भवती महिला के सुरक्षित प्रसव की व्यवस्था हो और इसके लिए पर्याप्त स्वास्थ्य केंद्र, अस्पताल, नर्सिंग होम और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की सुविधाएँ उपलब्ध हों। ऐसा होने पर ही लोग सीमित परिवार की कल्पना कर पाएँगे और इसके सुखद परिणामों को समझ पाएँगे। उनकी समझ में आने लगेगा कि अधिक आबादी ही अकाल, भूख, गरीबी और परिवारों के बिखरने का मूल कारण है। बापू गांधी द्वारा सीमित परिवार के लिए संयम अपनाने की सीख भी इसी समझ से निकलेगी और देश बढ़ती आबादी की समस्या से निपटने में सक्षम हो पाएगा।

संयम और गर्भ निरोधक


जब तक संयम रखने के लिए मानसिक रूप से प्रत्येक व्यक्ति तैयार न हो जाए तब तक गर्भ निरोधकों का व्यापक इस्तेमाल और उनकी पूर्ति के लिए जरूरी वितरण व्यवस्था हो, अभी तो अगर कोई महिला किसी दुकान से कंडोम खरीदना चाहती है तो आसपास के दूसरे ग्राहक और दुकानदार तक भी संकोच दिखाते हैं। इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है कि यह केवल पुरुष की ही जिम्मेदारी है कि वह गर्भ निरोधक का प्रयोग करे। सरकार द्वारा घर घर निरोध मुहैया कराने की मुहिम इसलिए कारगर नहीं हुई क्योंकि इसको बांटने और इस्तेमाल करने की जिम्मेदारी पुरुष को दे दी गयी।


 महिला के लिए इसे जरूरी नहीं समझा गया कि वह इसका महत्व समझ कर स्वयं इसका इस्तेमाल करने की पहल करे।

यह समझना भी जरूरी है कि सीमित परिवार की कल्पना को साकार करने में धर्म और धार्मिक संगठनों का बहुत बड़ा योगदान है। अक्सर यह कहकर मुँह मोड़ लिया जाता है कि बच्चे तो भगवान की देन हैं या अल्लाह की मर्जी है या ईसा मसीह का वरदान है।इसे धर्म के हवाले से कह दिया जाता है कि संतान केवल पेट ही नहीं बल्कि काम करने के लिए हाथ पैर और दिमाग लेकर भी पैदा होती है इसलिए परिवार की सीमा बाँधने की क्या जरूरत है ?

धर्म चाहे कोई भी हो वो जीवन की एक शैली है, जीने का तरीका है, सुखी और सम्पन्न बनने का विधान है, उसमें परिवार नियोजित करने को धर्म के विरुद्ध आचरण कहीं नहीं आता। सच तो यह है कि सीमित परिवार होने पर ही धर्म और धार्मिक नियमों का पालन सुगमता से हो सकता है। इसके लिए धार्मिक प्रवचनों में धर्म के उपदेशकों को सीमित परिवार के महत्व पर बल देना होगा।

क्या होना चाहिए ?


सब से पहले तो सरकार को सीमित परिवार की योजना बनाने का काम केवल महिलाओं की भागीदारी से पूरा करने की व्यवस्था करनी होगी और इसे स्त्रियों के अधिकार क्षेत्र में लाना होगा कि वे तय करें कि कैसे इस अभियान को सफल बनाया जा सकता है। अब तक जनसंख्या नियंत्रण के लिए पुरुष ही ज्यादातर योजनाएँ बनाते आए हैं जबकि सुखी परिवार की कल्पना को साकार करने की जिम्मेदारी महिलाओं की है। तो फिर इसके लिए पुरुष ही क्यों योजना बनायें ?

प्रधान मंत्री जी एक सीमित परिवार मंत्रालय का गठन कर दीजिए जिसमें मंत्री से लेकर संतरी तक महिलाएँ हों और फिर देखिए कि जनसंख्या पर कितनी सफलता से नियंत्रण होता है। वरना डर यही है कि इतिहास अपने को फिर से न दोहरा ले, आबादी बढ़ने से रूकना तो दूर उसकी गति और अधिक तेज  हो जाए।

(भारत)

शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

उपभोक्ता कानून से क्या वास्तव में ग्राहक के अधिकार सुरक्षित है ?








उपभोक्ता कानून के अंतर्गत ग्राहक वह होता है जो पैसे खर्च कर कोई सामान खरीदता है या कोई सेवा लेता है। उसके साथ छल फरेब, धोखाधड़ी न हो और बेईमान दुकानदार, निर्माता या सेवा देने वाले उसका शोषण करने में कामयाब न हों और यदि ऐसा हो जाए तो कानूनी कार्यवाही से उनके हितों की रक्षा हो, इसके लिए जब उपभोक्ता संरक्षण कानून बना तो उसका व्यापक स्वागत हुआ और लोगों के मन में यह भरोसा हुआ कि अब वे बिना किसी शंका के खरीददारी कर सकते हैं।


सरकार ने इसके प्रचार प्रसार के लिए जागो ग्राहक जागो, अपने अधिकार और इसी तरह के दूसरे अभियान चलाए ताकि उपभोक्ता अपने अधिकारों को समझें और जरूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल करें। धीरे धीरे लोगों में जागरूकता बढ़ी और नागरिकों ने अपने अधिकारों का हनन होने पर इस कानून के अंतर्गत स्थापित जिला उपभोक्ता फोरम, राज्य आयोग और राष्ट्रीय आयोग तक का रूख किया।



उम्मीद थी कि सरकार ग्राहकों की निरंतर बढ़ती हुई संख्या के अनुसार प्रशासनिक व्यवस्था करेगी। कानून में बताई गयी एक निश्चित अवधि में उसके साथ न्याय हो जाएगा और मिलावटखोरी, जमाखोरी, अधिक मूल्य वसूली जैसी व्यापारिक बुराइयों से निजात मिलेगी और ऐसा करने वालों के मन में कानून का डर होगा।


आधे अधूरे इंतजाम

केंद्रीय मंत्री श्री राम विलास पासवान ने स्वयं कुबूल किया कि सवा तीन लाख मामले जिला स्तर पर, सवा लाख राज्य स्तर पर और बीस हजार से ज्यादा राष्ट्रीय स्तर पर फैसलों का इंतजार कर रहे हैं। यह तो नहीं बताया कि कब से पेंडिंग हैं लेकिन यह माना कि सभी जिलों में उपभोक्ता अदालतें खुली नहीं हैं और एक सौ अठारह जिला अदालतों में इनके अध्यक्ष यानी न्यायाधीश नियुक्त नहीं हुए हैं और सदस्यों यानि न्यायपालिका के लिए तीन सौ बासठ पद खाली पड़े हैं। ऐसी हालत में कैसे उम्मीद की जाए कि उपभोक्ता अदालतों में जल्दी न्याय मिलने की आशा से गए पीड़ितों को न्याय मिल पाएगा।


अब जरा इस बात को परखिए कि ज्यादातर जो जिला अदालतें हैं उनकी क्या हालत है। फर्नीचर के नाम पर न्यायाधीशों के बैठने तक के लिए ठीकठाक कुर्सी मेज नहीं हैं तो फिर जो शिकायत लेकर आया है तो उसके लिए टूटी फूटी बेंच और कई जगह तो वो भी नहीं, खड़े रहकर अपना मुकदमा लड़िए, जैसी हालत के लिए क्या प्रशासन जिम्मेदार नहीं है। पानी की सुविधा नदारद और कई स्थानों पर शौचालय तक नहीं हैं।


नया कानून 2019


सबसे पहले सन 1986 में उपभोक्ता संरक्षण कानून बना था। उसके बाद इसमें कुछ संशोधन हुए लेकिन अब उपभोक्ता संरक्षण कानून 2019 को उसकी जगह लेने के लिए दोनों सदनों की मंजूरी मिल गयी है। आम तौर से सामान्य व्यक्ति को कानूनों की पेचीदगियाँ न तो समझ में आती हैं

और वैसे भी वह उनकी तरफ इसलिए ध्यान नहीं देता क्योंकि जरूरत पड़ने पर वकील साहब से समझ लेगा। अन्य कानूनों से अलग यह कानून इस मायने में है कि इसमें व्यक्ति अपना मुकदमा खुद लड़ सकता है और उसे वकील की सेवाएँ लेने की जरूरत नहीं है। इस स्थिति में जरूरी हो जाता है कि सामान्य उपभोक्ता इन बातों को समझ ले।


नए कानून की कुछ खास बातें इस तरह हैं : 

पहले यह होता था कि केवल वहीं शिकायत की जा सकती थी जहाँ विक्रेता की दुकान या पंजीकृत कार्यालय हो लेकिन अब किसी भी जिला अदालत में शिकायत की जा सकती है।

 मंत्रालय इस प्रकार के नियम भी बना रहा है जिसमें एलेक्ट्रोनिकली शिकायत की जा सके और फीस भी डिजीटल तरीके से भरी जा सके। अब अगर किसी निर्माता ने उत्पाद बनाते समय नियमों का पालन नहीं किया और घटिया चीज बना कर बेची और खरीदार को नुकसान हुआ तो उसके खिलाफ सीधे ही शिकायत की जा सकती है और हर्जाना वसूला जा सकता है।


इस कानून में यह भी है कि अब कोई विक्रेता अपने ग्राहक की व्यक्तिगत जानकारी किसी और को नहीं दे सकता और इसके लिए उसे दंड मिल सकता है।  अभी तक यह होता था कि दुकानदार किसी न किसी बहाने से ग्राहक से जानकारी ले लेता था और फिर उसे दूसरों को बेच देता था और ग्राहक के पास दिन रात पता नहीं कहाँ से फोन आने लगते थे। अब इस पर कुछ लगाम लग सकती है।


भ्रामक विज्ञापन 


अक्सर जब कोई जाना माना चेहरा विशेषकर अभिनेता या खिलाड़ी कोई चीज बेचता है तो हम यह सोचकर कि क्वॉलिटी सही होगी, लेकिन धोखा होने पर सब अपना पल्ला झाड़ लेते थे। अब उन्हें विज्ञापन में कही या दिखाई बातों की पहले स्वयं उनके सही होने की जाँच करनी होगी वरना उनके लिए मुसीबत खड़ी हो सकती है।


भ्रामक विज्ञापनों के लिए निर्माता को दो से पाँच साल की जेल और दस से पचास लाख तक का जुर्माना हो सकता है। इसी तरह से एंडोर्स करने वाले यानी सिलेब्रिटी पर दस से पचास लाख तक का जुर्माना और एक से तीन साल तक का प्रतिबंध लगाया जा सकता है।


अब बिना सुनवाई के कोई शिकायत खारिज नहीं की जा सकती और अगर पंद्रह दिन तक कोई जवाब नहीं आता तो उसे स्वीकृत समझा जाएगा। अब शिकायत खारिज किए जाने की अवस्था में उसका कारण भी जानने का अधिकार उपभोक्ता को होगा, पहले की तरह किसी की मनमर्जी नहीं चल सकती।


इस तरह मिलावट करने वालों और गुमराह करने वालों को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है चाहे वह कितना भी नामचीन व्यक्ति हो या किसी भी क्षेत्र में सिलेब्रिटी हो। अब शायद इस रवैये पर लगाम लग सकेगी कि लोग अपने फेमस होने का फायदा उठाते हुए करोड़ों की आमदनी भी कर लें और और उस चीज के खराब निकलने पर जिसका वह विज्ञापन कर रहे हैं, कोई उनकी तरफ ऊँगली भी न उठाए।


एक नयी पहल यह हुई है कि अब उपभोक्ताओं के हितों की पूरी तरह रक्षा करने के लिए एक केंद्रीय उपभोक्ता सुरक्षा प्राधिकरण का गठन होगा जिसे सभी कानूनी अधिकार प्राप्त होंगे और उस पर इस बात की जिम्मेदारी होगी कि अगर देश के किसी भी कोने में उपभोक्ता के साथ धोखाधड़ी होती है तो वह अपनी ओर से उचित कार्यवाही कर सकेगा। यह प्राधिकरण किसी भी निर्माता द्वारा बनाई गयी दोषपूर्ण वस्तुओं को अपने कब्जे में ले सकता है, उत्पादन रोक सकता है और और कानून सम्मत कार्यवाही कर सकता है।


नये कानून को हालाँकि उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से काफी मजबूती प्रदान की गई है लेकिन इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि कानून का सही ढंग से पालन किए जाने के लिए जरूरी प्रशासनिक व्यवस्था बन जाए।


यह देश में उपभोक्ता आंदोलन को मजबूती देने के साथ साथ आम आदमी के जीवन में काफी राहत ला सकता है। यह निर्माताओं और सेवा प्रदान करने वालों को गलत तरीके से पैसा कमाने से रोक सकता है और सख््ती से लागू किए जाने पर उपभोक्ताओं को उनके शोषण से बचा सकता है।



शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

तीन तलाक बिल के बाद कश्मीर को भी बेड़ियों से मुक्त कीजिए









कुरीतियाँ या कुप्रथाएं जब परम्परा बन जाती हैं और जन सामान्य के बीच स्वीकार भी कर ली जाती हैं तब उन्हें समाप्त करना समाज या सरकार के लिए मुश्किल और जोखिम भरा हो जाता है।

तीन तलाक की प्रथा भी इसी श्रेणी में आती थी जिसे अब कानून बनाकर खत्म करने का सराहनीय प्रयास किया गया है। इससे जहाँ मुस्लिम समाज के बहुत बड़े वर्ग द्वारा इसका स्वागत किया गया है वहीं कुछ कट्टर लोग इसका विरोध करते हुए उच्चतम न्यायालय द्वारा इसे खारिज कराने की फिराक में भी हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि वे अपने मंसूबों में कामयाब न हो।


ऐसी ही एक प्रथा निकाह हलाला है जो इतनी अमानवीय है कि ज्यादातर मुस्लिम समाज उसके विरोध में नजर आता है। परंतु वह है तो सही चाहे छोटे तबके के बीच हो। कदाचित उसे भी समाप्त करने के लिए कानून बनाने की जरूरत पड़े।


इसी तरह की कुप्रथाएं सभी धर्मों में होंगी जो एक बार चलन में आ गयीं और समाज के बड़े वर्ग में स्वीकार कर ली गयीं तो फिर उन्हें समाप्त करना टेढ़ी खीर हो जाता है।
हिन्दू समाज में बाल विवाह, दहेज, छुआछूत जैसी कुरीतियाँ कानून बनाने पर भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई हैं।


असल में इन्हें केवल कानून से समाप्त करना एक ऐसी बचकानी सोच है जिससे बाहर निकलना जरूरी है और इसके बदले परिपक्वता के साथ इन बुराइयों को दूर करने की कोशिश की जाए तो उसमें सफलता मिल सकती है।


देखा जाए तो सभी बुराइयों की जड़ शिक्षा का अभाव, जीवन यापन और रोजगार के पर्याप्त साधन न होने से गरीबी का होना और सही राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व का न होना है। यदि प्रत्येक व्यक्ति तक राष्ट्र की सम्पत्ति और संसाधनों का उचित बँटवारा हो जाए तो फिर सामाजिक कुरीतियाँ हों या धार्मिक पाखंड और ऊँच नीच की भावना तो इनका समाप्त होना निश्चित है।


कश्मीर और भेदभाव


इसे कुप्रथा तो नहीं कहा जा सकता बल्कि अपने को दूसरों से अलग ही नहीं बल्कि श्रेष्ठ समझने की मानसिकता कहा जा सकता है। कश्मीर के साथ भी ऐसा ही हुआ है।
यह ‘लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पाई’ का भी उदाहरण है जब जम्मू कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के बाद भी वहाँ अस्थाई तौर पर ही सही पर कुछ ऐसी विशेष रियायतें दी गयीं और वे भी संविधान के जरिए कि वे आज तक देशवासियों के साथ भेदभाव रूपी गले की हड्डी और इस राज्य की प्रगति का रोड़ा बनी हुई हैं।


धारा 370 और 35ए


संविधान में ये धाराएँ टेम्परेरी, हटाई जा सकने वाली और कुछ समय के लिए विशेष सहायता देने के लिए जोड़ी गयीं थीं। उस समय के प्रशासकों ने ऐसी परिस्थितियाँ बना दीं कि ये एक तरह से स्थाई ही बन गयीं और अब इन्हें हटाने की बात करते ही खूनखराबे तक की धमकियाँ आने लगती हैं।

इन प्रावधानों के कारण ही इस राज्य के विकास के लिए केंद्रीय सरकार की बहुत सी लाभकारी योजनाओं का न पहुँच पाना है।

सब से बड़ी बात यह है कि एक तो वहाँ पर्यटन और सेव तथा सूखे मेवे के निर्यात के अलावा कोई और व्यापार का जरिया न के बराबर है और दूसरे किसी भी सरकारी या गैर सरकारी प्रतिष्ठान या उद्योग के लगने की सम्भावना नहीं है क्योंकि यहाँ अलगाववादी ताकतों की दहशत और गुंडागर्दी के सामने टिकने का जोखिम कोई नहीं लेना चाहता।


इस राज्य के बाहर का व्यक्ति यहाँ जमीन जायदाद न तो खरीद सकता है और न ही इस राज्य की कोई महिला दूसरे राज्य के व्यक्ति के साथ शादी करने के बाद अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकती है। उसके सारे अधिकार समाप्त हो जाते हैं।


इन धाराओं की बजह से इस राज्य को यह छूट मिली हुई है कि वह भारतीय संविधान को लागू करे या नहीं क्योंकि उसे अपना संविधान बनाने की छूट थी।

अगर यहाँ भी एक संविधान, एक कानून और पूरे देश के साथ मिलकर काम करने और निर्णय लेने की नीति होती तो आज यह राज्य अन्य राज्यों की तरह तेजी से तरक्की कर रहा होता।


अगर ये धाराएँ समाप्त हो जायें तो पाकिस्तानी घुसपैठिए और रोहिंग्याओं को यहाँ पनाह नहीं मिल पाएगी। इससे जो पूरे देश से अलग थलग पड़े रहने और राष्ट्र की मुख्य धारा से वंचित रहने की मजबूरी है, वह नहीं रहेगी और संसाधनों का तेजी से विकास हो सकेगा।
अभी जो केवल रक्षा, विदेशी मामले और संचार तक ही केंद्र सरकार सीमित रहने के लिए बंधी हुई है, इन धाराओं के समाप्त होने पर कृषि, शिक्षा, विज्ञान, प्रौ़द्योगिकी और व्यापार करने की केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ इस राज्य को भी उसी प्रकार मिल सकेगा जैसा अन्य राज्यों को मिलता है।


परंतु दिक्कत यह है कि बिना राज्य की सहमति से इन्हें समाप्त भी नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में सब से पहले जम्मू कश्मीर में ऐसे वातावरण का निर्माण करना होगा जिससे वहाँ के राजनीतिक दलों पर जनता की ओर से यह दबाव हो कि इन धाराओं का हटना आम नागरिकों के हित में है।


इन धाराओं का समाप्त होना राज्य के हित में इसलिए भी है क्योंकि उद्योग और निजी क्षेत्र में काम करने वाले यहाँ पैसा नहीं लगाते। यहाँ तक कि अच्छे डॉक्टर और दूसरे प्रफेशनल इसलिए नहीं आते कि उनके यहाँ जीवन भर रहने पर भी कोई अधिकार नहीं होंगे।


यह जो जमीन जायदाद खरीदने पर पाबंदी है वह असल में अंग्रेजों द्वारा यहाँ आकर बसने और फिर महाराजा के अधिकारों तक पर अंकुश लगाने की नीयत और कुटिल चाल से बचने के लिए लगाई गयी थी। अब स्वतंत्र भारत में ऐसा कोई डर नहीं है और जब जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तो कोई आशंका भी नहीं है तो फिर इस धारा का कोई मतलब नहीं रह जाता।


इसी तरह कॉलेज में दाखिले और कोई रोजगार या नौकरी करने पर अभी जो प्रतिबंध है वह हट जाए तो राज्य का आर्थिक विकास कितना होगा इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। इन धाराओं के हटने का सबसे बड़ा फायदा इस राज्य को जो मिलेगा वह है  पाकिस्तान की तरफ से किए जा रहे आंतकवाद की रोकथाम करना आसान हो जाएगा।


जब राज्य के निवासियों का ध्यान शिक्षा प्राप्त करने, काबिल होकर रोजगार करने और आधुनिक संसधान अपनाने की तरफ लग जाएगा तो वह स्वंय ही पाकिस्तानी पोपेगेंडे की तरफ से आंख मूंद लेगें और किसी भी हरकत को शुरू में ही समाप्त करने के प्रति सरकार के साथ मिलकर अपना बहुमूल्य योगदान करने लगेंगे।


इन हालात को देखते हुए जितनी जल्दी हो इन धाराओं को समाप्त कर देना चाहिए ताकि जम्मू कश्मीर के लोग उसी प्रकार देश के संसाधनों का इस्तेमाल कर सकें जैसे अन्य देशवासियों के लिए होता है।