शुक्रवार, 22 नवंबर 2019

स्वस्थ रहने का अधिकार, देश की जरूरत और मेडिकल व्यवसाय में नैतिकता






किसी भी समाज में अगर ईश्वर के जैसा या उसके बराबर ही आदर और सम्मान दिलाने वाला अगर कोई व्यवसाय है तो उसमें मेडिकल और उससे जुड़े वे सब लोग आते हैं जो एक तरह से मनुष्य को बीमारी, दुर्घटना या किसी प्राकृतिक आपदा में फँसे लोगों की जीवन रक्षा के लिए जाने जाते हैं। इनमें डॉक्टर, नर्स इंसान के रक्षक और अस्पताल, डिस्पेन्सरी से लेकर दवाइयों की दुकान बीमार का इलाज करने के साधन के रूप में माने जाते हैं।


हरेक व्यवसाय में आर्थिक लाभ हानि का जो बही खाता चलता है वह मेडिकल व्यवसाय में नहीं रखा जा सकता और इसीलिए इसे सेवा का जरिया समझा जाता रहा है। आज स्थिति लगभग उलटी हो गयी है और इसे भी उसी तरह धन लाभ कमाने का जरिया मानने का चलन शुरू हो गया है जैसा कि दूसरे काम धंधों में माना जाता है।


इसका एक उदाहरण यह है कि पहले उपभोक्ता संरक्षण कानून में स्वास्थ्य की देखभाल करने को अन्य सेवाओं की भाँति सेवा के दायरे में रखा गया था और यदि मेडिकल सेवा में कोई खामी होती थी तो इस कानून के दायरे में दण्ड दिए जाने का प्रावधान था लेकिन अब ऐसा नहीं कर सकते, पीड़ित को सामान्य मुकदमे की तरह विभिन्न अदालतों में न्याय की गुहार लगानी होगी।


मेडिकल व्यवसाय में नैतिकता 

एक सर्वे के मुताबिक इस व्यवसाय में काम करने वाले डॉक्टर अनेक तरह के टेस्ट करने वाली लेबोरेटरी से चालीस से साठ प्रतिशत तक किकबैक पाते हैं जो उन्हें मरीज की जेब से निकलवाने की काबलियत के रूप में मिलता है। इसमें जरूरी टेस्ट भी मर्ज को दूर करने के लिए जरूरी बताकर मरीज को उन्हें करवाने के लिए मजबूर किया जाता है।


अब इन टेस्टों का नाम भी है और इन्हें को कराने के लिए मरीज का जो खून, यूरीन, बलगम आदि लिया जाता है वह नालियों में बहा दिया जाता है। इन टेस्टों के नाम भी है और इन्हें नाली या सिंक कहा जाता है। किसी भी लैबोरेटरी में किसी कर्मचारी को भरोसे में लेकर यह सच उगलवाया जा सकता है।



तीस से चालीस प्रतिशत तक डॉक्टर को किसी भारी फीस लेने वाले स्पेशलिस्ट को रेफर करने के लिए मिलता है और लगभग इतना ही अस्पताल की सेवाओं में से मिलता है। इसके साथ ही बड़े नामीगिरामी अस्पतालों के पेनल पर बने रहने के लिए डॉक्टर को उनमें मरीजों को भेजने के लिए अपने निर्धारित कोटे को पूरा करना होता है, तब ही वह उस अस्पताल के पेनल पर रह सकता है।



इन अस्पतालों में मरीज के आने के बाद उसे तीन चार दिन तक ऑब्जर्वेशन के नाम पर आई सी यू में रखा जाता है, जहाँ जरूरत न भी हो तो भी वेंटिलेटर पर रखा जाता है, डाइलिसिस जैसी चिकित्सा और महँगे इंजेक्शन और दवाइयाँ दी जाती हैं जिनकी कीमत उन पर छपे अधिकतम मूल्य से कई गुना ज्यादा होती है। हर उस चीज को मरीज के बिल में जोड़ा जाता है जो उसे दी जाती है चाहे सिरंज, पट्टी, बैंडिज कुछ भी हो।


एक और गोरखधंधा चलता है जो आमतौर से डॉक्टर दम्पति चलाते हैं। यह वन मैन शो होता है। दम्पति में से एक डॉक्टर की भूमिका निबाहता है और दूसरा अपने ही घर के कुछ कमरों को नर्सिंग होम की शक्ल देता है, इसमें दसवीं फेल नर्स, ढीली या कसी हुई वर्दी पहने अनपढ़ वार्ड बाय होते हैं। नर्स रिसेप्शन से लेकर इंजेक्शन लगाने, ग्लूकोस चढ़ाने से लेकर ऑपरेशन सहायक तक का काम करती है और रात को आई सी यू के बाहर भी बैठती है ताकि अगर कोई इमर्जेन्सी हो जाए तो फौरन दूसरी मंजिल पर रहने वाले डॉक्टर दम्पति में से किसी एक को बुला सके। यहाँ तक के किस्से हैं कि मरीज की मृत्यु होने के बाद भी नकली ऑपरेशन का ढोंग रचकर मोटी रकम वसूली जाती है।



इस तरह के क्लीनिक और नर्सिंग होम में जबरदस्ती सर्जरी से लेकर स्त्रियों की बच्चेदानी यह कहकर निकाल दी जाती है कि फायब्राड हो गए हैं जबकि ये प्रत्येक महिला में होते हैं। इसी तरह कोसमेटिक ट्रीटमेंट के नाम पर फेशियल, वैक्सिंग करने की बात कहकर त्वचा का इतना बुरा हाल कर देते हैं जिससे जान तक खतरे में पड़ सकती है।


अब क्योंकि चिकित्सा में लापरवाही का प्रावधान ही कानून में नहीं होगा तो फिर कैसे रोगी और उसके परिवार वाले अपने बचाव में कुछ कर सकेंगे, यह हमारे नीति निर्धारण करने वालों के लिए सोचने की ही नहीं बल्कि इस पर कुछ ठोस नियम कानून बनाने की भी जरूरत को उजागर करता है।


स्वस्थ रहने का अधिकार 

हमारे देश में चिकित्सा व्यवसाय की सबसे पहली कड़ी सरकारी अस्पतालों की है जो अनेक प्रशासनिक खामियों के बावजूद सामान्य व्यक्ति की बीमारी की अवस्था में पहली पसंद हैं।

इनमें भीड़ ही इतनी होती है कि डॉक्टर के मन में मरीज का आर्थिक शोषण करने की बात ही नहीं आ पाती, दूसरे ज्यादातर बीमार इलाज के लिए ही पैसों की कमी से जूझते रहते हैं। जो सम्पन्न होते हैं, वे अपने राजनीतिक या सामाजिक रुतबे की बदौलत यहाँ वी आई पी की तरह अपनी चिकित्सा कराने आते हैं और कभी कभी जरूरत न होने पर भी वार्ड में टिके रहते हैं और मुफ्त में महँगी से महँगी सुविधाओं का उपभोग करते रहते हैं।


दूसरी कड़ी है चिकित्सा को शुद्ध व्यवसाय और जबरदस्त मुनाफे के धंधे के रूप में देखने वाले बड़े व्यावसायिक और औद्योगिक घरानों द्वारा स्थापित फाइव स्टार अस्पतालों की जहाँ या तो वे लोग इलाज कराने जाते हैं जिनके पास पैसा फैंक कर तमाशा देखने की ताकत है या फिर वे जिनकी बीमारी का खर्च बीमा कम्पनियाँ चुकाती हैं। आम आदमी या थोड़ी बहुत हैसियत रखने और चिकित्सा के खर्च का जुगाड़ कर सकने वाला इनमें चला गया तो उसकी हालत गले में फँसी हड्डी की तरह हो जाती है जो न निगलते बनती है और न उगलते।


तीसरी कड़ी है उन धर्मार्थ और शुद्ध सेवा करने की नियत से खोले गए चिकित्सा संगठनों और संस्थानों की जो लगभग मुफ्त इलाज की सुविधाएँ देते हैं। इनकी संख्या बहुत कम है लेकिन इनमें चिकित्सा के उच्चतम पैमानों का पालन किया जाता है और कुछ की ख्याति तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी है।


एक चैथी कड़ी भी है जो झोलाछाप डाक्टरों की है, झाड़ फूँक, गंडे ताबीज , भूत प्रेत के डर जैसी बातों से इलाज करने के बहाने लोगों को ठगने का काम करते हैं।


इन सब परिस्थितियों के कारण क्या यह जरूरी नहीं है कि देश में प्रत्येक नागरिक को स्वस्थ रहने का अधिकार मिले और इसके लिए सभी राजनीतिक दल एक स्वर से सरकार से कानून बनाने की माँग करें जिसका मसौदा ऊपर कही गयी चारों कड़ियों तथा अन्य वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया जाय ?


दुनिया का कोई भी देश अस्वस्थ, बीमार और कमजोर नागरिकों के बल पर तरक्की नहीं कर सकता, इसलिए स्वस्थ रहने को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले और सभी के लिए एक जैसी चिकित्सा सुविधाएँ हों और इसके लिए आंदोलन भी करना पड़े तो उससे हिचकना नहीं चाहिए क्योंकि यह जनहित का मुद्दा है।


(भारत)

शुक्रवार, 15 नवंबर 2019

वैज्ञानिक सोच बढ़ाने में विज्ञान-फिल्मों का योगदान









यह कहना कि विज्ञान हमारी सोच को बदल सकने की ताकत रखता है, कल्पना और वास्तविकता का भेद समझा सकता है और जीवन जीने को आसान बना सकता है, न केवल सौ प्रतिशत सही है बल्कि अंधविश्वास से मुक्ति दिला सकने में भी सक्षम है।

इसीलिए कहा जता है कि विज्ञान कभी असफल नहीं होता, वह किसी प्रयोग के उम्मीद के मुताबिक परिणाम न देने से अनुसंधान और आविष्कार को नई तथा अनजान दिशाओं को खोजने की प्रेरणा देता है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा हाल ही में चाँद पर उतरने की कोशिश में आई कमी का विश्लेषण करने और यह समझने कि ‘क्या गलत हुआ‘ के बाद अगले साल एक बार फिर चाँद पर उतरने की घोषणा करना इसका एक उदाहरण है।


विज्ञान कभी हार नहीं मानता और उसके बाद जब नए प्रयासों तथा निरंतर खोजबीन करते रहने से कोई नई उपलब्धि मिलती है तो वह चमत्कार की तरह लगता है, विज्ञान एक वट वृक्ष की भाँति अपनी शाखाओं और प्रशाखाओं का निरंतर विस्तार करता रहता है, उसमें नित्य नई कोपलें फूटती रहती हैं और एक बार यह जानने का चस्का लग गया कि ‘आखिर ऐसा होता कैसे है‘ तो फिर प्रत्येक चीज को विज्ञान की कसौटी पर कसने की लत लग जाती है जिसे हम वैज्ञानिक सोच का नाम देते हैं।


विज्ञान की अभिव्यक्ति 



विज्ञान को जन जन तक पहुँचाने और देशवासियों की सोच को एक वैज्ञानिक की तरह बनाने में फिल्म एक ऐसा माध्यम है जो मुश्किल से मुश्किल समस्या को सुलझाने का तरीका बताने और अनेक जटिल प्रशनों के उत्तर और उनकी व्याख्या साधारण भाषा में करने के लिए सबसे अधिक कारगर है।


विज्ञान फिल्मों के लिए विशेष रूप से बनाए गए मंच अर्थात फिल्म समारोह विभिन्न क्षेत्रों में विकसित टेक्नोलोजी को जनता तक पहुँचाने का जरिया है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए इण्डिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टीवल की शुरुआत सन् 2015 में हुई ताकि यह दिखाया और बताया जा सके कि हमारा देश विज्ञान की मदद से किस तेजी से आगे बढ़ रहा हैं।


इस समारोह का पाँचवा संस्करण पाँच से आठ नवम्बर तक कोलकाता में भारत सरकार के संस्थान विज्ञान प्रसार द्वारा नोडल एजेंसी के रूप में भव्यता के साथ आयोजित किया गया जिसमें सत्यजीत रे फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान का महत्वपूर्ण योगदान था।


 भारतीय फिल्म निर्माताओं की दो सौ से अधिक प्राप्त फिल्मों में से छप्पन फिल्में नौमीनेट हुईं जिनका प्रदर्शन संस्थान के विभिन्न सभागारों में हुआ। इनके अतिरिक्त परमाणु और मिशन मंगल जैसी फीचर फिल्में भी दिखाई गयीं और उनके निर्देशकों ने दर्शकों से संवाद के दौरान विज्ञान और उससे जुड़े विषयों पर फिल्म निर्माताओं के सामने आने वाली कठिनाइयों के साथ साथ निर्माण के दौरान आने वाली चुनौतियों का जिक्र भी किया।


पर्यावरण, प्रदूषण, रासायनिक जोखिम, वन्य जीव संरक्षण, रोग निदान, योग, स्वास्थ्य, वैकल्पिक इंधन, ऊर्जा, सर्प दंश, स्टार्टअप, जल संरक्षण, सिंचाई संसाधन, पीने का पानी, नेवीगेशन, मोरिंगा की खेती, साफ सफाई, सूक्ष्म कीट, अंतरिक्ष, बदलता मौसम, कीटनाशक, आदिवासी जीवन, मधुमेह से बचाव, दिव्य नयन, कैंसर निदान, दिमागी बुखार, प्लास्टिक उपयोग जैसे विषयों पर फिल्में एक आम दर्शक के मन में जिज्ञासा पैदा करने में सहायता करती हैं कि किस प्रकार विज्ञान और प्रोद्योगिकी हमारी जीवन शैली को बेहतर बना सकती है।


योग क्रियाओं से बेहतर जीवन जीने की कला समझाती फिल्म सत्यम और बंद कमरे में कार्बन मोनो ओक्साईड से मृत्यु तथा मौसम में होने वाले गम्भीर बदलाव से आने वाले खतरे की चेतावनी जैसी फिल्में सार्वजनिक रूप से, विशेषकर विद्यालयों में दिखाई जानी चाहिएँ।


यह जानना अपने आप में ही भयावह है कि हमारे देश में पचास हजार से ज्यादा मौतें हर साल सांप के काटने से हो जाती हैं और हमारे पास इन्हें रोकने के लिए पर्याप्त साधन नहीं हैं, अभी भी पीड़ित का उपचार सपेरा और झाड़ फूँक से इलाज करने वाला ढोंगी ही करता है।


मोरिंगा की खेती पर बनी फिल्म से एहसास हुआ कि बढ़िया सेहत और लम्बी उम्र पाने का यह बेहतरीन उपाय है। कैंसर और फैलेरिया जैसी घातक बीमारियों का निदान सम्भव है। जिन प्रदेशों में पराली जलाने से प्रदूषण की गम्भीर समस्या पैदा होती है उनके लिए इससे बचने के लिए टेक्नोलोजी उपलब्ध है। फलों और सब्जियों में से कीटनाशक दूर करने के उपाय हैं, नेत्र ज्योति से वंचित लोगों के लिए दिव्य नयन जैसे यंत्र हैं।


जल संरक्षण और शुद्ध पेयजल से लेकर खेती में इस्तेमाल होने वाले हानिकारक रसायनों के विकल्प तैयार हैं। खाद्य पदार्थों के उत्पादन के समय प्रयोग में लाए गए नुकसान देने वाले तत्वों बचाव से लेकर जमीन की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के उपाय हमारे वैज्ञानिकों ने सुलभ करा दिए हैं।


यहाँ तक कि शहर हो या देहात गंदे नालों की सफाई और उनमें पैदा होने वाली जानलेवा गैस को बेअसर करने वाली टेक्नोलोजी उपलब्ध है। पशुपालन में आधुनिक तकनीकों से न केवल अधिक दूध उत्पादन हो सकता है बल्कि उनसे प्राप्त होने वाले गोबर से खाद और इंधन भी मिलता है।


जरूरत किस बात की 


हमारे देश में ही विज्ञान से सम्बंधित विषयों पर हर साल सैंकड़ों फिल्में बनती हैं और विदेशों से आने वाली फिल्मों की संख्या हजारों में है लेकिन विडम्बनापूर्ण स्थिति यह है कि इनका प्रसारण केवल फिल्म समारोहों अथवा उनके उद्घाटन तक ही सिमट कर रह जाता है। इससे बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण अवस्था यह है कि हमारे वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम से तैयार की गयी टेक्नोलोजी उसी तरह अलमारियों में बंद होकर व्यर्थ हो जाती है जिस प्रकार किसी फिल्म निर्माता द्वारा उस पर बनाई गयी फिल्म एक बार प्रदर्शित होने या देखने के बाद भुला दी जाती है।


क्या सरकार और प्रशासन को कोई ऐसी नीति नहीं बनानी चाहिए जिससे जीवन को बेहतर बना सकने की क्षमता रखने वाली विकसित और प्रामाणिक टेक्नोलोजी पर अमल किये जाने की कानूनी अनिवार्यता हो।


अंतरिक्ष, आणविक, अस्त्र शस्त्र जैसे विषयों को लेकर वैज्ञानिक प्रगति की बात करना और उनसे सम्बंधित नीति बनाने के बारे में अक्सर सुनने को मिलता है लेकिन ऐसा देखने और सुनने में कभी कभार ही आता है कि सामान्य जन की सहूलियत के लिए किसी टेक्नोलोजी पर अमल करने की नीति बनाई गयी हो।


विज्ञान की मदद से प्रदूषण, मौसम परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण से लेकर जनसंख्या में बढ़ौतरी तक को रोकने में सफलता मिल सकती है। यदि विकासशील या पिछड़े देश की पंक्ति से निकलकर विकसित देशों में शामिल होना है तो वैज्ञानिक सोच और विज्ञान सम्मत उपायों पर अमल करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है।

शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

सरदार पटेल और देश को जोड़ने की कार्यशैली आज भी जरूरी है








स्वतंत्रता के बाद यदि देश 550 से ज्यादा रियासतों में बंटा हुआ रह जाता और उनके राजा, महाराजा और नवाब आजाद भारत के शासक बन जाते तो क्या होता, यह सोचकर ही भय लगता है। अंग्रेजों ने 1857 के विद्रोह से सबक लेते हुए इन सब को खुश रखने में ही अपनी भलाई समझी।  उनके शौक मौज मस्ती को हवा देने और निरंकुश होने तक को अपनी सरपरस्ती में ले लिया, जुल्म और अत्याचार से लेकर उनकी सनक और अजीब हरकतों को बढ़ावा दिया और इस तरह जो राज्य अपनी न्यायप्रियता के लिए जाने जाते थे, वे भी प्रजा को लूटने लगे। अगर कहीं सरदार पटेल इस काम को अपने हाथ में न लेते और इन सब को लगभग हाँकने तक की नीति न अपनाते तो आज हम जिस प्रजातांत्रिक ढाँचे में रहकर खुलकर साँस ले पा रहे हैं, विश्व में नाम कमा रहे हैं, वह कदापि न होता।


विलासिता  में डूबे शासक 

इतिहासकारों और हमारे नेताओं की जीवनी लिखने वाले लेखकों ने उस समय का जो वर्णन किया है उसे पढ़कर यकीन नहीं होता कि हम किस हालत में थे। अंग्रेजों ने इन शासकों के लिए सभी रास्ते बंद कर रखे थे और वे अपना वक्त पोलो खेलकर या शिकार करते हुए व्यतीत करते थे। ये अंग्रेजों की चापलूसी करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। एक उदाहरण है। जब प्रिन्स ऑफ वेल्ज, बाद में सातवें एडवर्ड, भारत आए तो एक महाराजा ने हुक्म दिया कि उनकी चाय के लिए जो पानी उबाला जाए वह बैंक नोटों की गड्डियाँ जलाकर किया जाय। समझ सकते हैं कि उसके पास कितना पैसा होगा और फिर नाच गाने, महफिल सजाने और अंग्रेजों को शिकार पर ले जाने से लेकर उनके मनोरंजन के लिए सभी तरह का प्रबंध करने पर कितना भी खर्च करना पड़े, कोई कोरकसर नहीं छोड़ी जाती थी।



इस तरह के विचित्र हालात थे कि स्वार्थ, अय्याशी का बोलबाला था और प्रजा का पालन करना और उनके सुख दुःख का ध्यान रखना दूर की बात थी जो अंग्रेजों के लिए भारत पर शासन करते रहने के लिए बहुत उपयुक्त थी। हालाँकि कुछेक रियासतें जैसे कि मैसूर, बड़ौदा, ट्रावनकोर, कोचीन जहाँ शिक्षा का प्रसार भी था और चुनी हुई विधान सभाएँ थीं, प्रजा का ध्यान रखा जाता था, उन्हें छोड़कर बाकी सब जगह हिटलरशाही और पिछड़ेपन का साम्राज्य था। ज्यादातर रियासतों की अपनी सेना नहीं थी, पुलिस रख सकते थे और वे किसी भी स्थिति के लिए अंग्रेज सरकार के मोहताज थे।



भारत और पाकिस्तान का बँटवारा तय हो चुका था और अंग्रेजों की चाल के मुताबिक कोई भी रियासत दोनों में से किसी एक के साथ जाने या स्वतंत्र रहने की घोषणा कर सकती थी। इन्हें जितनी फिक्र अपने रुतबे, विलासिता और तोपों की सलामी मिलने की थी, उससे कहीं अधिक आजाद भारत में अपनी हुकूमत और वर्चस्व बनाए रखने की थी। सर कोरफील्ड जैसे अंग्रेज इन रियासतों के शासकों को भड़काने में लगे हुए थे कि वे आजाद भारत में अपनी हिस्सेदारी की ज्यादा से ज्यादा माँग करें और बराबर धमकी देते रहें कि उनकी नाजायज माँगें न मानने का नतीजा कितना खतरनाक हो सकता है।


कैसे कैसे शासक 

इन विकट परिस्थितियों में सरदार पटेल के सामने जबरदस्त चुनौती थी कि देश को खंड खंड होने से कैसे रोका जाए और इसके साथ ही जिन्ना की चाल को कैसे विफल किया जाए जो रियासतों को पाकिस्तान के साथ विलय करने के लिए सभी तरह के हथकंडे अपना रहा था। विडम्बना यह कि केवल चालीस दिनों में पंद्रह अगस्त से पहले सब कुछ किया जाना था। बीकानेर, पटियाला, ग्वालियर और बड़ौदा जैसी कुछ महत्वपूर्ण रियासतों ने भारत में विलय की सहमति दे दी थी लेकिन हैदराबाद के निजाम और कश्मीर के महाराजा जैसे लोग अपनी खिचड़ी अलग पकाने का ख्वाब देख रहे थे।



जोधपुर के महाराजा को तो जिन्ना ने खाली कागज पर दस्तखत कर के भी दे दिया था कि वो विलय की जी भी शर्तें चाहें इस पर लिख लें। उनके साथ जैसलमेर के महाराजकुमार थे जिन्हें दाल में कुछ काला लगा और महाराजा को समझाया कि जिन्ना के जाल में फँसने के बाद जाले में फँसी मकड़ी जैसी उनकी हैसियत हो जाएगी। अब इस कोरे कागज पर जिन्ना के दस्तख्त के बल पर भारत के साथ विलय करने के लिए अपनी माँगे मनवाने की कोशिश हुई जो पटेल के सहयोगी वी पी मेनन की सूझबूझ से सफल नहीं हो  पाई।


इसी तरह भोपाल के नवाब और इंदौर के महाराजा ने अपनी अकड़ दिखाई। नवाब ने हस्ताक्षर कर दिए लेकिन पंद्रह अगस्त से पहले घोषणा न करने को कहा। इंदौर के महाराजा ने दस्तखत न करने का मन बनाया और ट्रेन से दिल्ली पहुँचे तथा अपने डिब्बे को साइडिंग में खड़ा कर सरदार पटेल को वहाँ आकर मिलने का संदेश भिजवाया। पटेल ने राजकुमारी अमृत कौर को मिलने के लिए भेज दिया जिन्हें देखकर महाराजा अपनी चाल भूल गए और उन्हें उनकी औकात समझ में आ गयी। वह उनके साथ सरदार पटेल से मिलने गए और उनसे कहा की क्योंकि भोपाल के नवाब ने दस्तखत नहीं किए हैं तो वे भी नहीं करेंगे। जब नवाब के दस्तखत दिखाए गए तो उन्हें यकीन नहीं हुआ क्योंकि दोनों ने विलय न करने का तय किया था। उन्होंने दस्तावेज देखकर चुपचाप हस्ताक्षर कर दिए और लौट गए।


जूनागढ़ के नवाब को जिन्ना ने पाकिस्तान के साथ विलय करने के लिए प्रोत्साहित किया जबकि भौगोलिक दृष्टि से यह सम्भव नहीं था। जहाँ सरदार पटेल ने कुछ छोटी छोटी मुस्लिम बहुल रियासतों को पाकिस्तान के साथ विलय करने की सलाह देकर ईमानदारी दिखाई वहीं जिन्ना ने भारत को खंडित करने की कोई कोशिश नहीं छोड़ी। जूनागढ़ इसका उदाहरण है। उसके नवाब को कुत्तों से जबरदस्त लगाव था, यहाँ तक कि वह कुत्ते और कुत्तियों की शादियाँ बहुत धूमधाम से करने के लिए मशहूर था। प्रजा चाहे भूखी रहे पर कुत्तों को सुगंधित पानी से नहलाया जाता था और विदेशों से उनका भोजन मँगवाया जाता था।


उसने अपने प्रधानमंत्री नवाज भुट्टो को शासन की बागडोर सौंप रखी थी जिसने जूनागढ़ के पाकिस्तान के साथ विलय की घोषणा कर दी जिसने रियासत में खलबली मचा दी क्योंकि अस्सी प्रतिशत आबादी गैर मुस्लिम थी और पाकिस्तान से तीन सौ मील की दूरी को केवल समुद्र के रास्ते तय किया जा सकता था। यह निश्चित तौर पर जिन्ना का कुचक्र था जिसे तोड़ने में सरदार पटेल सफल हुए और जनता के भारी विरोध के कारण नवाब अपने कुत्तों की फौज, साढ़े सात लाख पौंड से भी अधिक रकम लेकर पाकिस्तान भाग गया और उसका प्रधानमंत्री भी जिन्ना द्वारा कोई मदद न करने के कारण भारत को प्रशासन सौंपकर चला गया। 


इस तरह पंद्रह अगस्त तक हैदराबाद और कश्मीर को छोड़कर भारत में सभी रियासतों का विलय हो गया। जहाँ तक कश्मीर की जिम्मेदारी सरदार पटेल की थी लेकिन पंडित नेहरु ने अपने भावनात्मक सम्बन्धों की दुहाई देकर इसे अपने हाथ में ले लिया। नेहरु को शेख अब्दुल्ला की दोस्ती पर भरोसा था जबकि सरदार पटेल का अब्दुल्ला पर कतई विश्वास नहीं था। शासन मित्रता पर नहीं चलाया जा सकता और इसी भूल की भारी कीमत अब तक चुकाने को देश मजबूर था।


हैदराबाद  के निजाम को सही रास्ते पर लाने के लिए सरदार पटेल ने नेहरु को दूर रखते हुए वह सब कदम उठाए जो एक घमंडी, कंजूस, बेशुमार दौलत के बल पर दुनिया को अपने कदमों पर झुका सकने का सपना पालने वाले बेवकूफ इंसान की अक्ल ठिकाने पर लाने के लिए उठाए जा सकते थे। इसका परिणाम यह हुआ निजाम को भारत के साथ विलय करने के लिए हामी भरनी पड़ी, बावजूद इसके कि उसने इस मामले को अमेरिका के राष्ट्रपति और यूनाइटेड नेशन में सुरक्षा परिषद तक ले जाने की पूरी कोशिश की ताकि यह मुद्दा अंतराष्ट्रीय हो जाए।


सरदार पटेल ने अपनी हृदय की गम्भीर बीमारी की अवस्था में भी सभी रियासतों को एक झंडे के नीचे खड़ा करने के काम में कोई कसर नहीं छोड़ी और राजपूताना, पंजाब, हिमाचल से लेकर सौराष्ट्र तक अपनी ध्वजा पताका फहराई। इसी तरह ओड़िसा, मध्य प्रदेश तथा अन्य स्थानों पर एकता की ऐसी लहर बनाई कि सब उसमें शामिल होते गए।


अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक और हिमालय से कन्याकुमारी तक पाँच लाख वर्ग मील के क्षेत्र से भारत देश की सुंदर रचना का श्रेय सरदार पटेल और उनके साथी सहयोगियों को जाता है और यह बात महात्मा गांधी ने भी स्वीकार की कि यह काम सरदार पटेल के सिवाय किसी और के करने से कभी नहीं हो पाता।


सरदार पटेल को अपनी अंतिम साँस तक यह पीड़ा चुभती रही कि भारत की आजादी के लिए पाकिस्तान के रूप में बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ी, हिंसा का तांडव देखना पड़ा और सब से बड़ी बात यह कि कश्मीर की समस्या न सुलझने के कारण पाकिस्तान के साथ हमेशा की दुश्मनी हो गयी।


वह इतने दूरदर्शी थे कि चीन की असलियत समझ चुके थे और इस बारे में नेहरु की आँखे खोलने के लिए सात नवम्बर, 1950 को उन्होंने जो पत्र उन्हें लिखा वह एक ऐतिहासिक दस्तावेज तो है ही, साथ में आज भी चीन की नीयत समझने के लिए काफी है।


सरदार पटेल एक साधारण परिवार में जन्मे एक ऐसे राष्ट्रीय योद्धा थे जो परिस्थितियों को अपने अनुकूल करना जानते थे और निर्भय होकर अपने लक्ष्य को साधने के लिए सभी अस्त्र शस्त्र साथ लेकर चलने वाले महापुरुष थे। 







शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2019

घरेलू हिंसा कानून में बदलाव का वक्त आ गया है









आज से डेढ़ दशक पहले भारत में घरेलू हिंसा और नारी शोषण को रोकने के लिए एक मजबूत कानून बना था और जिससे एक सुरक्षा कवच की भाँति विभिन्न प्रकार की हिंसा से प्रताड़ित महिलाओं को राहत मिली लेकिन जैसा कि प्रकृति का नियम है, निरंतर बदलाव की प्रक्रिया से नए वातावरण और परिस्थितियों का सृजन, उसी प्रकार अब समय आ गया है कि इस कानून में समय की जरूरत के हिसाब से उचित परिवर्तन किए जाएँ।



हालाँकि इस कानून का दायरा बहुत व्यापक है लेकिन व्यवहार में यह कमोबेश घर की महिलाओं के साथ मारपीट, उनका यौन सहित विभिन्न प्रकार से शोषण और उनके जीने के मूलभूत अधिकार को पुरुषों द्वारा हथियाए जाने से रोकने में ही अधिकतर इस्तेमाल में आता है।


घर से अधिक बाहर होती हिंसा 


इस सप्ताह मुंबई में सम्पन्न हुए मामी फिल्म समारोह में एक फिल्म बाई द ग्रेस ऑफ गॉड दिखाई गयी। यह फिल्म किसी विकासशील या अविकसित देश में नहीं बनी या वहाँ हो रही शोषण की घटनाओं का रूपांतरण नहीं थी बल्कि यूरोप के धनी और विकसित देश फ्रान्स में निर्मित हुई। 



इसकी कथा यह है कि एक पाँच बच्चों के पिता को जो एक घटना उसके बचपन से लेकर अब तक उसे चैन से जीने नहीं दे रही थी, वह थी तीस पैंतीस वर्ष पहले उसके साथ हुआ यौन शोषण जो किसी अन्य ने नहीं बल्कि धर्मोपदेशक एक चर्च के पादरी ने किया था। उल्लेखनीय है कि वह अकेला ही नहीं इसका शिकार नहीं हुआ था बल्कि सैंकड़ों नहीं बल्कि हजारों बच्चों को उस पादरी की यौन पिपासा को झेलना पड़ा था।


उल्लेखनीय यह है कि बचपन में अपने साथ हुए यौन दुर्व्यवहार के पीड़ित वयस्क होने और अपना अपना परिवार बसा चुके तथा एक तथाकथित सुखी जीवन बिता रहे लोग उस पादरी की हरकत को अभी तक अपने से दूर नहीं कर पाए थे। वे एक प्रकार से अपराध बोध में जी रहे थे कि वे अपने साथ हुए अत्याचार का कोई बदला नहीं ले सके और वह पादरी अब भी उसी तरह छोटे बच्चों का शोषण करता आ रहा है।



हालाँकि पादरी के कुकर्मों की जानकारी उसके वरिष्ठ लोगों की थी लेकिन किसी ने उसके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की। फिल्म के नायक ने दसियों वर्ष तक मानसिक संताप झेलने के बाद उससे बाहर निकलने और अपने साथ हुए शोषण का बदला लेने की हिम्मत दिखाई और पादरी की शिकायत अधिकारियों से यह जानते हुए भी की कि वह अकेला है और तंत्र बहुत मजबूत है। उसे भय था कि कहीं उसी को दोषी न मान लिया जाए और झूठा साबित न कर दिया जाए।



अधिकारियों के सामने वह और पादरी आए जिसमें उसके आरोप का जवाब पादरी ने यह दिया कि वह एक मानसिक रोग से पीड़ित है और छोटे बच्चों को देखते ही उसकी यौन भावनायें भड़क उठती हैं और वह उनके कोमल अँगो को सहलाने से लेकर मसलने और यौन क्रिया के लिए उत्तेजित हो जाता है।
इसके बाद फिल्म के नायक ने ऐसे लोगों से सम्पर्क करना शुरू किया जो यौन पीड़ित थे और अभी तक अपने साथ हुए दुष्कर्म को भूल नहीं पाए थे। एक व्यक्ति तो ऐसा था जिसका निजी अंग विकृत हो गया था और वह मिरगी की बीमारी का शिकार हो गया था।



इन सब पीड़ितों ने मिलकर अपना संगठन बनाया और अपने साथ हुए कुकर्म का बदला लेने का कानूनी रास्ता अपनाया। यहाँ यह महत्वपूर्ण नहीं है कि आरोपी को सजा हुई या नहीं बल्कि यह है कि बचपन या अल्हड़पन में जब किसी के साथ, चाहे महिला हो या पुरुष, यौन दुर्व्यवहार होता है तो वह जीवन भर उसे भूल नहीं पाता और हमेशा हीनभावना में जीता रहता है और एक ऐसे अपराध के लिए अपने को जिम्मेवार मानता रहता है जो उसके साथ हुआ लेकिन कभी उसका प्रतिकार नहीं कर सका।


सामाजिक और कानूनी संरक्षण 

अक्सर देखने में आता है कि जो अपराधी है उसे पारिवारिक संरक्षण के साथ समाज का संरक्षण भी आसानी से मिल जाता है। इस तरह के वाक्य ‘भूल जा जो तेरे साथ हुआ‘, ‘अगर जुबान खोली तो नतीजा भुगतने को तैयार रहना‘ ‘अपने साथ खानदान की इज्जत भी जाएगी‘, जो इस कहावत को सिद्ध करते हैं कि ‘समर्थ को दोष नहीं‘।



जिस तरह अपने साथ हुए यौन शोषण को नहीं भुलाया जा सकता, उसी प्रकार बचपन में हुई बिना किसी कारण की मारपीट, शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना, लिंग भेद के कारण हुए अपमान और यहाँ तक कि पालन पोषण में भी हुए भेदभाव को जीवन भर नहीं भुलाया जा सकता। हो सकता है कि वक्त का मरहम घाव को ढक दे लेकिन जरा सा कुरेदने वाली वाली घटना होते ही घाव फिर हरा होकर टीस देने लगता है।


घरेलू हिंसा के साथ बाहरी हिंसा से बचने के लिए भी कानून का रास्ता होना चाहिए। कानून की कमी के कारण ही सामाजिक अन्याय का प्रतिकार करने के लिए जब एक उम्र निकल जाने के बाद भी तनिक सा अवसर मिलते ही पीड़ित अपने साथ दशकों पहले हुए हुए शोषण को बयान करने के लिए सामने आ जाते हैं तो इसका एक कारण यह है कि जब उनके साथ यह हुआ था तब ऐसा कोई कानून नहीं था जो जुल्म करने वाले के मन में डर पैदा कर सकता।



ऐसे अनेकों उदाहरण हैं, सच्ची घटनाएँ हैं और जो निरंतर घटती रहती हैं जिनमें गुरु, शिक्षक, धर्मोपदेशक से लेकर समाज के दबंग लोग अपने अनुयायियों के साथ कैसा भी शोषण, जो शारीरिक, मानसिक, आर्थिक कुछ भी हो सकता है, करने के बाद स्वतंत्र घूमते रहते हैं। कार्यस्थल या जहाँ आप नौकरी करते हैं, वहाँ होने वाले शोषण से अलग हटकर परिवार और समाज के बीच होने वाले मानसिक और शारीरिक शोषण का निराकरण करने और कानून के प्रति डर पैदा करने वाली व्यवस्था के बारे में सोचने का सही वक््त यही है क्योंकि हम विकासशील देशों की श्रेणी में आते हैं।


विकसित देशों में आज भी यह समस्या इसलिए पीछा नहीं छोड़ रही क्योंकि उन्होंने अपनी विकासशील अवस्था में इस ओर ध्यान नहीं दिया था। हमारे पास अभी समय है इसलिए तुरंत इस बारे में सार्थक और मजबूत कानून बनाने की दिशा में कदम बढ़ाना ही अच्छा होगा।

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2019

बैंक की नीति और नियत से जुड़ा है खातेदारों का भरोसा









बैंक से पैसा गायब हो जाने, अपना ही रुपया निकाल पाने की बेबसी और अपना तथा परिवार का छोटा मोटा खर्च चलाने को भी जेब में कुछ हो तो दिल हिल जाता है। पंजाब महाराष्ट्र सहकारी बैंक के खाताधारी बिना किसी अपराध के जो सजा भुगत रहे हैं, वह बैंकिंग व्यवस्था पर कलंक तो है ही, साथ में सरकार और प्रशासन की कमजोरी या मिलीभगत को भी उजागर करने के लिए पर्याप्त है।


एक उदाहरण देना काफी होगा। सन् 2001 में माधवपुरा मर्कंटायल कोआपरेटिव बैंक में जबरदस्त घोटाला हुआ था और उसके 45000 जमाकर्ताओं को पिछले वर्ष यानी सन् 2018 में यह आश्वासन मिला है कि उन्हें उनका पैसा वापिस मिल जाएगा। क्या पीएमसी के खाताधारियों का भी यही हश्र होने वाला है, यह सोचकर ही डर लगने लगता है।


ग्राहक की मानसिकता

असल में जब सहकारी बैंकों की शुरुआत हुई थी तो उन्होंने जनता को लुभाने के लिए दूसरे बैंकों से ज्यादा ब्याज देने की पेशकश की और थोड़ी सी अधिक कमाई के लालच में लोग अपनी बचत इन बैंकों में जमा कराने लगे।


इसमें उनकी कोई गलती नहीं क्योंकि हरेक अपनी रकम को बढ़ता हुआ देखना चाहता है और एक दो प्रतिशत ब्याज अधिक मिल रहा है तो वह उसे लेना चाहेगा। उसे यह भी बताया जाता है कि उसका धन सुरक्षित है और कानून के दायरे में है।


इसके साथ सहकारिता पर आधारित संगठनों को सरकारी प्रोत्साहन भी उन पर विश्वास करने का बड़ा कारण रहा है, हालाँकि सहकारिता आधारित संस्थान विशेषकर बैंक अधिक सफल नहीं हुए क्योंकि उनके संचालक निजी स्वार्थ के चलते और किसी कड़े कानून के होने से मनमानी करने के लिए स्वतंत्र हैं, अधिकतर नेता हैं और उनका उद्देश्य सेवा से ज्यादा मेवा खाना है।


इसके विपरीत जो सरकारी और निजी क्षेत्र के तथाकथित बड़े बैंक हैं, वे अपनी कम ब्याज की दरों को इस आधार पर जायज ठहराते हैं कि उनके खर्चे ज्यादा हैं, वे कम आबादी और दूरदराज के इलाकों में अपनी शाखायें नहीं खोल सकते और इसी तरह के तर्क दिए जाते हैं। विडम्बना यह है कि सरकार भी इसमें कुछ करने को अपनी मजबूरी बताती है और ग्राहक सहकारी बैंकिंग व्यवस्था पर भरोसा कर लेता है।


अब बारी आती है इन सहकारी बैंकों की नीति और नियत की, जिस पर उनके मालिकों का अधिकार होता है, सहकारिता का मुखौटा लगाकर वे कानून की धज्जियाँ उड़ाते हैं और जो असली मालिक अर्थात जमाकर्ताओं को लम्बे समय तक बहकाए रखते हैं और इस दौरान उनकी रकम ऐसे लोगों को ऋण देने के लिए इस्तेमाल करते हैं जिनका उद्देश्य ही यह होता है कि इसे उन्हें बैंक को लौटाना नहीं है।


सरकार सहकारिता को बढ़ावा देने के नाम पर हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है और इसलिए भी कोई सख्त कदम नहीं उठाती क्योंकि इन सहकारी बैंकों के कर्ताधर्ता दबंग राजनीतिज्ञ होते हैं और सत्ता पर उनकी पकड़ मजबूत होती है। ऐसे में ये बैंक दिवालिया हो जाते हैं तो भी ग्राहक को केवल एक लाख रुपए तक की बीमा राशि मिल सकती है चाहे उसका कितना भी पैसा जमा हो।


कहते हैं कि वक्त सभी तरह के घाव भर देता है। जैसे जैसे समय बीतता जाता है, लोग अपने साथ हुए अन्याय को भूलने लगते हैं और इस प्रकार धोखा, छल, कपट, बेईमानी चलती रहती है। सरकार इन घोटालों को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाती क्योंकि उसे यह मालूम रहता है कि हमारे देश में इस की टोपी उसके सिर पहनाने की परम्परा है।


कोई बड़ा वित्तीय संस्थान, बैंक आगे कर दिया जाएगा जो घोटालेबाज सहकारी बैंक के निर्दोष खातेदारों का मसीहा बन जाएगा और इस तरह उनके जख्मों पर मरहम लगा दिया जाएगा। इस दौरान लम्बी कानूनी प्रक्रिया चलती रहेगी और जिन दोषियों को जनता को दिखाने के लिए पकड़ा गया है वे सबूत होने या ऐसा ही कोई कानूनी दाँव खेलकर बच जाएँगे।


नियंत्रण का अभाव

यह जानकर आश्चर्य होता है कि सहकारी बैंकिंग व्यवस्था पर सरकार से लेकर रिजर्व बैंक तक की कड़ी निगरानी नहीं होती। वैसे तो यह बात सरकारी और निजी बैंक हों या छोटे वित्तीय बैंक, सब पर ही लागू होती है कि उनके अपने नियम और नीतियाँ हैं और उन पर किसी का हस्तक्षेप या दबाब नहीं होता। 
इसका अर्थ यह हुआ कि जमाकर्ताओं को किसी भी तरह की सुरक्षा प्राप्त नहीं है और कोई ऐसा नियंत्रक नहीं है जो उनके धन की हिफाजत की गारंटी ले सके। यह कैसी अर्थव्यवस्था है जो इतनी बेलगाम है कि किसी को भी कुछ भी करने के लिए आजाद छोड़ देती है।


इससे समझ में आसानी से सकता है कि क्यों बरसों बरस घोटालेबाज बैंक के साथ लेनदेन में हेराफेरी करते रहने में कामयाब हो जाते हैं और जब उनके पाप का घड़ा फूटने के कगार पर होता है, वे गायब ही जाते हैं, विदेशों में ऐसी जगह चले जाते हैं जहाँ से उनके वापिस लाए जाने की कोई सम्भावना नहीं होती।


जमाकर्ताओं के लिए सावधानी


सरकार और रिजर्व बैंक के नियंत्रण का अभाव, कानून की खामियाँ और भ्रष्टाचार पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था और केंद्र हो या राज्य, किसी से भी वक्त पर सहायता मिलने की वास्तविकता को देखते हुए उपभोक्ताओं को ही जागरूक होना होगा और इसके लिए वे कुछेक उपाय कर सकते हैं। कदाचित इससे उनके परिश्रम से अर्जित धन की सुरक्षा हो सके।


सबसे पहले अधिक ब्याज के लालच में पड़ें। अपना पैसा जमा रखने के लिए कम ब्याज दर होने पर भी उस बैंक में खाता खोलें जिसकी अधिक से अधिक शाखाएँ हों, उसकी काम करने की प्रणाली पारदर्शिता से पूर्ण हो और वह अपनी प्रतिष्ठा के लिए जाना जाता हो।


दूसरी बात यह कि अपनी रकम एक ही बैंक में फिक्सड डिपॉजिट में रखें,  अपने बचत खाते की समय समय पर जाँच करते रहें कि उसमें जमा या निकाली गयी राशि में कोई अनियमितता तो नहीं है। अगर कुछ गड़बड़ होने का संदेह हो तो उसका निवारण करने में समय गवाएँ, चाहे इसके लिए अपने काम से अवकाश ही क्यों लेना पड़े।


अक्सर बैंक अपनी ब्याज दरों में परिवर्तन करते रहते हैं, अपने ग्राहकों को नयी सुविधा देने की घोषणा करते रहते हैं, पुराने ग्राहकों के जागरूक होने का फायदा उठा कर वे उन्हें उन सुविधाओं से वंचित कर देते हैं, इस पर नजर रखें और इसका पता चलते ही तुरंत कार्यवाही करें और अगर खाता बंद भी करना पड़े तो कर दें।


आजकल नेट बैंकिंग और मोबाइल बैंकिंग का बोलबाला बढ़ रहा है, इसे जानिए, समझिए और अपनाइए। डेबिट और क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करने में सावधानी बरतिए और इनका इस्तेमाल तब ही करें जब इनसे खरीदी वस्तु का  भुगतान करने की आपने पहले से व्यवस्था कर रखी हो क्योंकि इन पर जो ब्याज लगाया जाता है वह मुसीबत का कारण बन सकता है।


किसी भी आकर्षक छूट पर अमल करने से पहले उसकी जाँच कर लें कि कहीं वह आगे चलकर आपकी जेब पर भारी पड़ने वाली तो नहीं है, सस्ती वस्तु महँगे दाम पर तो छूट के लालच में नहीं खरीद रहे और कोई भी खरीदारी करते समय अपने बैंक खाते या कार्ड का विवरण गोपनीय रखें क्योंकि धोखे की शुरुआत यहीं से होती है।


(भारत)


शनिवार, 12 अक्टूबर 2019

स्टार्ट अप की सफलता के लिए योग्यता का पैमाना







स्टार्ट अप उद्यमी होने अर्थात अपना खुद का कारोबार खड़ा करने का दूसरा नाम है। यह व्यवसाय या काम धंधा क्या हो, इसकी पहचान इस बात पर निर्भर है कि व्यक्ति कितना काबिल है, उसकी सोच कैसी है और पहले से चल रहे उद्योग धंधों से अलग कुछ करने की उसकी मंशा क्या है? यह आँकड़ा कि एक हजार में से केवल एक स्टार्ट अप ही कामयाब होता है, यह बताने और स्वयं के समझने के लिए काफी है कि स्टार्ट अप कोई ऐसी योजना नहीं है कि हर कोई उसे आजमा ले और सफल होने के सपने देखने लगे।


विज्ञान प्रसार के लिए इस विषय पर विज्ञान चैनल पर प्रसारित होने के लिए फिल्म बनाने का अवसर एक ऐसी ही चुनौती थी और इस दौरान जो सुनने, देखने और समझने को मिला, वह ऐसा अनुभव है जो पाठकों के साथ बाँटने से उनकी अनेक शंकाओं का निवारण कर सकता है।



सपने पूरा करना 

आमतौर पर पढ़ाई लिखाई के दौरान स्कूल के बाद कॉलेज और फिर किसी व्यावसायिक या तकनीकी संस्थान में अपने ज्ञान को पैना करने और शिक्षकों द्वारा प्रेरित किए जाने पर युवा मन सपने देखने लगता है कि मुझे कुछ ऐसा बनाना है जो दुनिया से अलग हो। अक्सर होता यह है कि बिना इस बात की परवाह किए कि उसकी सोच वास्तविक धरातल पर उतरने से पहले पूरी तरह मजबूत भी है या नहीं, वह उद्यमी बनने के लिए ऐसी छलाँग मारता है कि औंधे मुँह धरती पर गिर जाता है और असफल लोगों की सूची में स्वयं अपना नाम लिख देता है।



स्टार्ट अप का मतलब यह नहीं है कि जो मन में आया उसे करने के लिए मैदान में कूद गए बल्कि यह है कि अपनी सोच का दायरा बढ़ा कर यह तय करना है कि जो कुछ भी करने की बात मन में आई है उससे क्या समाज की कोई समस्या सुलझ सकती है ? मतलब यह कि इसके लिए गहन अध्ययन करना होगा और सामाजिक सरोकारों से रूबरू होना पड़ेगा और इस बात से जूझना होगा कि मेरी सोच दूसरों से अलग कैसे है और जब यह अपनी समझ में आ जाए तब ही उद्यमी का चोला धारण कीजिए और स्टार्ट अप की दुनिया में पैर पसारिए।


हमारा दौर कलयुग का है अर्थात मशीन का बोलबाला है। हाथ पैर से काम करने के स्थान पर वही काम मशीन से करने पर समय और संसाधन दोनों की ही बचत होती है, ऑटोमेशन इस युग की वास्तविकता है तो फिर किसी भी उद्यम का सपना साकार करने के लिए अनुसंधान और आविष्कार ही वह मूल तत्व है जिस पर स्टार्ट अप की इमारत खड़ी की जा सकती है ।


फेल होने का डर 


सोच या सपना तो है पर उसे पूरा करने के लिए पैसा और संसाधन नहीं हैं, यह कोई नई बात नहीं है, हरेक यही सोचकर बैठ जाता है कि उसके पास पैसा होता तो उसके सपनों को पंख लग जाते लेकिन वह यह नहीं सोच पाता कि क्या वास्तव में वह जो करना चाहता है उसमें गेमचेंजर होने की क्षमता है भी या नहीं !
ज्यादातर स्टार्ट अप इसलिए फेल होते हैं क्योंकि उन्हें शुरू करने वालों में ओवरकॉन्फिडेन्स होता है, वह ऐसे भ्रम में फँस जाते है जिस पर उनका नियंत्रण नहीं होता और किसी भी नतीजे पर पहुँचने के लिए सीमित मात्रा में लिए गए सैम्पल को ही अपनी सफलता का पैमाना बना लेते हैं। वह भूल जाते हैं कि चैका छक्का लगाना कतई आसान नहीं है, हाँ कभी कभार अच्छी किस्मत से लग भी जाता है लेकिन व्यवहार में ऐसा कभी नहीं होता।


आज हमारे देश में ऐसी सुविधाएँ हैं जहाँ यह बताने और समझाने की व्यवस्था है कि आपके विचार और उसकी सफलता के बीच जो खाई है, उसे कैसे पार किया जाए। विभिन्न वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों से जुड़े ऐसे इंक्युबेशन सेंटर हैं जहाँ अगर आपके विचार में दम है तो उसकी पूरी जाँच परख के बाद जरूरी सुविधाएँ जैसे कि काम करने की जगह, उचित सलाह, ट्रेनिंग से लेकर मार्केटिंग और शुरुआती निवेश तक का इंतजाम है।


यह सेंटर कुछ इस तरह से हैं जैसे कि अंडे के तैयार होने से पहले उसे सेना पड़ता है, इसी तरह यहाँ आकर एक निश्चित अवधि के लिए युवा वैज्ञानिकों, वरिष्ठ वैज्ञानिक, प्रोफेसर, पीएचडी स्कॉलर तथा अपने विचार की प्रामाणिकता सिद्ध कर सकने वालों को वे सभी सुविधाएँ मुहैया कराई जाती हैं जो उनके सपनों को उड़ान देने के लिए आवश्यक हैं।


निधि, प्रयास, अटल इनोवशन और बिराक जैसे संसाधन आज भारतीय युवाओं को उपलब्ध हैं, जहाँ अगर योग्यता है तो उसे सिद्ध करने के लिए धन से लेकर प्रयोगशालाओं तक की सुविधाएँ हैं। प्रयोगशाला में विकसित टेक्नॉलोजी को मार्केट तक लाने के समुचित प्रबंध हैं।


स्टार्ट अप की स्थापना के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए अनेक संस्थाएँ हैं, सरकार ने आयकर में छूट और सब्सिडी देने की सुविधा दी है और निजी तौर पर फंडिंग देने के लिए दुनिया भर के उद्योगपति और धनवान इस तरह के प्रोजेक्ट तलाशते रहते हैं जिनसे वे स्वयं तो पैसे को कई गुना करें हीं, साथ में लोगों को सहूलियत भी मिले।


शुरुआती तैयारी 


यहाँ लाख रुपए का प्रश्न यह है कि स्टार्ट अप की शुरुआत कहाँ से की जाए, तो इसके लिए अपने आसपास की दुनिया को टटोलिए कि उसे किस चीज की जरूरत है और उस तक उसे कैसे पहुँचाया जा सकता है। जो कुछ भी पहले से मौजूद है उसे अच्छी तरह से खँगालिए कि उसकी गुणवत्ता बढ़ाने के लिए उसमें क्या नया जोड़ा जाए कि उसकी उपयोगिता पहले से कई गुना ज्यादा हो जाए। यह जानने के लिए कि कौन सा उत्पाद या सेवा मार्केट में हिट हो सकती है, उसके लिए देश भर में भ्रमण और जरूरत हो तो विदेश में भी खोजबीन की जाए।


स्टार्ट अप के लिए आम तौर से जरूरी यह भी है कि यह अकेले व्यक्ति का काम नहीं है। अपनी जैसी ही सोच रखने वाले एक से अधिक लोग ही इसमें सफलता की ऊँचाइयाँ छू सकते हैं, उनमें एक दूसरे के प्रति विश्वास जहाँ एक ओर जरूरी है, वहाँ ‘हाँ‘ या ‘न‘ सुनने और समझने की भी मानसिकता होनी चाहिए। ज्यादातर स्टार्ट अप इसलिए फेल हो जाते हैं क्योंकि उनकी शुरुआत करने वालों का मन एक दूसरे से मिला हुआ नहीं होता। वे पहली असफलता को ही अंतिम मान लेते हैं। होना यह चाहिए कि स्थिति और परिस्थितियों के अनुसार अपनी कार्य योजना में परिवर्तन करते रहें और असफल होने के कारणों को पहचान कर आगे की प्लानिंग करें।


आज हमारे देश को एक विकासशील अर्थव्यवस्था होने के नाते यह सुविधा है कि यहाँ हर चीज अधिक मात्रा में चाहिए क्योंकि माँग के मुकाबले पूर्ति नहीं हो पाती। किसी भी क्षेत्र में देख लीजिए, यही असलियत है।


ग्रामीण और शहरी लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाएँ, कृषि, ऊर्जा, पर्यावरण की समस्याएँ, आने जाने के साधन और परिवहन को आसान बनाने की सुविधाएँ, शारीरिक और मानसिक जरूरतों को पूरा करने के लिए खानपान से लेकर रहन सहन तक को सुगम बना सकने वाले उपकरणों को उपलब्ध कराना तथा और भी बहुत से क्षेत्रों में नयापन लाने के प्रयास करना एक स्टार्ट अप की अच्छी शुरुआत हो सकती है।


जब भी आपको लगे कि आपकी कोई नई सोच है, उसे बेझिझक पूरा करने के लिए पहला कदम उठाने में किसी प्रकार का संकोच न करें क्योंकि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।


(भारत)

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019

प्लास्टिक प्रदूषण और स्वच्छता अभियान, आखिर गलती कहाँ हो रही है?








जैसा कि कहावत है कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो ना तो निगलते बनती हैं और ना ही उगलते, ऐसा ही इन दिनों काफी जोर पकड़ रहे प्लास्टिक प्रदूषण से निबटने के बारे में हो रही बयानबाजी के बारे में कहा जा सकता है। 

वास्तविकता यह है कि अभी तक यह तय नहीं हो सका है कि प्लास्टिक, जो  एक प्रकार से जादुई पदार्थ है, के इस्तेमाल से क्या बचा जा सकता है? आज की परिस्थितियों में तो असंभव है क्योंकि यह जिंदगी में इस तरह घुलमिल गया है कि इस पर प्रतिबंध लग जाने की बात से ही घबराहट होती है।


ऐसा नहीं है केवल हम ही प्लास्टिक से होने वाले प्रदूषण से निजात पाने की अटकलें लगा रहे हैं, दुनिया भर में बड़े बड़े देशों से लेकर छोटे से छोटे देश में यह चर्चा का विषय है और सब ही इसके इस्तेमाल से होने वाले स्वास्थ्य पर खतरों और पर्यावरण के नुकसान से बचने की तरकीबें सोच रहे हैं। क्या इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि प्लास्टिक हमारी जीवन शैली, हमारे रहन सहन से लेकर खान पान तक से जुड़ गया है और कुछ ऐसा हो गया है कि इसके बिना ठीक उसी तरह नहीं रहा जा सकता जिस प्रकार हवा पानी के बिना नहीं रहा जा सकता।


प्लास्टिक का इस्तेमाल कहाँ नहीं होता, बोतल, ढक्कन, थैली, नली, पैकेट, पाउच, पैकिजिंग, कप प्लेट, अनेक तरह के पर्दे, शीट यानी कि अगर इन सब को मिलाकर देखा जाए तो हर चीज के साथ प्लास्टिक की जुगलबंदी है  । अगर जितना भी प्लास्टिक है, एक साथ इस्तेमाल करें तो पूरी दुनिया को सात बार इससे लपेटा जा सकता है।


प्लास्टिक से दोस्ती 

जब प्लास्टिक की यह महिमा है तो इस पर प्रतिबंध लगाने की बात सोचना भी बेमानी और हानिकारक है। इसके स्थान पर जरूरत इस बात की है कि प्लास्टिक से दोस्ती करने और इसके गलत इस्तेमाल अर्थात इसे जलाने, नदी, नालों और समुद्र में फेंकने से बचने के उपाय किए जाएँ तो यह न हमारे जीवन और न ही पर्यावरण के लिए खतरनाक होगा।


जिन देशों ने भी प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून बनाए, उनमें से अधिकतर के पास इस बारे में कोई आँकड़ा नहीं है कि कानून का नतीजा क्या निकला, मतलब यह कि वाहवाही के लिए कानून तो बना दिया लेकिन उस पर अमल इसलिए नहीं कराया जा सका क्योंकि प्लास्टिक इस्तेमाल करने से बचना नामुमकिन है।


हमारे देश में भी ऐसी ही गलती करने की घोषणा तो हो चुकी थी और स्वच्छता आंदोलन की तरह प्लास्टिक मुक्ति आंदोलन की शुरुआत होने वाली थी लेकिन अब इसे तीन साल यानी २०२२ तक के लिए टाल दिया गया है। बेहतर यह होता कि तीन साल का कोई ऐसा कार्यक्रम लागू करने की योजना जनता के सामने रखी जाती जिससे लोग प्लास्टिक से दोस्ती करने यानी उसके लाभदायक और रोजगार देने वाले पक्ष को अपनाते और इस तरह उसके दुष्परिणामों के प्रति जागरूक होते तथा आवश्यक सावधानी बरतते।


भारत सरकार के परिवहन मंत्री ने सड़क बनाने के लिए प्लास्टिक के इस्तेमाल को प्राथमिकता देते हुए इसके उपयोगी होने की गारंटी दे दी है। इसके विपरीत उपभोक्ता मंत्री इस पर रोक लगाने की वकालत कर रहे हैं। हमारे वैज्ञानिक प्लास्टिक प्रदूषण से बचने की टेक्नॉलोजी विकसित कर चुके है। हमारे ही देश में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें प्लास्टिक और दूसरे कचरे के पहाड़नुमा ढेर को सुंदर बगीचे में परिवर्तित कर दिया गया है।


ऐसी टेक्नॉलोजी है जो प्लास्टिक से होने वाले प्रदूषण से हमारी रक्षा कर सकती है। आज विज्ञान निरंतर रोजगार के नए नए साधन उपलब्ध करा रहा है। जरूरत केवल इतना भर जागरूक होने की है कि प्लास्टिक का इस्तेमाल करने के बाद वह हमारे जल स्रोतों तक न पहुँचने पाए, चाहे वे नदियाँ हों या विशाल समुद्र।


प्लास्टिक उद्योग अपने आप में बहुत उपयोगी और बड़ी तादाद में रोजगार पैदा कर सकने की विशेषता लिए हुए है। अक्सर आर्थिक संकट से जूझ रही नगर पालिकाओं, नगर निगम और दूसरी प्रशासनिक इकाइयों के लिए इस्तेमाल किए हुए प्लास्टिक से उद्योग लगाने पर काफी कमाई हो सकती है।


यह सच है कि प्लास्टिक को गलने के लिए सैंकड़ों साल चाहिएँ तो फिर हम उसे इतने समय तक बेकार पड़े रहने देने के बजाय उपयोग में क्यों न लाएँ , बस यही समझ का फेर है। प्लास्टिक के गुण जैसे कि वह सस्ता, टिकाऊ, कम वजन और हल्का होता है तो उन्हें अपनाएँ और प्लास्टिक को नेस्तनाबूद करने की बात न करें तो यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी लाभकारी होगा और व्यक्तिगत समृद्धि का भी रास्ता बनेगा।


प्लास्टिक उद्योग विदेशी मुद्रा कमाने का भी बेहतरीन जरिया है, जो देश प्लास्टिक कचरे के निपटान की समस्या से परेशान हैं, हम उनके साथ व्यापार कर सकते हैं और अपने लिए आमदनी की साधन तैयार कर सकते हैं।
जो लोग यह समझते हैं कि प्लास्टिक से बनी चीजों का इस्तेमाल रोकने के लिए दूसरी सामग्रियों से उन्हें बनाया जाए तो यह कतई फायदे का सौदा नहीं है और केवल धन और ऊर्जा की बर्बादी है, हाँ शौक के तौर पर इन्हें बनायें तो कोई बुराई नहीं लेकिन यदि प्लास्टिक से बनी चीजों के विकल्प के रूप में इसे देखेंगे तो निराशा ही हाथ लगेगी।


योजनाओं की असफलता 


असल में हमारे देश में ज्यादातर योजनाओं को लोक लुभावन होने के आधार पर बनाया और लागू किया जाता है। मिसाल के तौर पर स्वच्छ शौचालय बनाने की स्कीम बहुत उपयोगी होने के बावजूद जिन क्षेत्रों के लिए बेहद जरूरी थी, वहाँ पूरी तरह सफल नहीं हो पाई है।


हम कितना भी ढोल पीट लें लेकिन हकीकत यह है कि घर में शौचालय होने के बावजूद ग्रामीण अभी भी खुले में शौच करने जाते हैं। ऐसा नहीं है कि वे अपने शौक के कारण ऐसा करते हैं, बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि घर में जो शौचालय बना है उसका इस्तेमाल करने के लिए कई बालटी पानी चाहिए जबकि उनके पास दिन भर की जरूरत के लिए ही सिर्फ एक दो बालटी पानी ही उपलब्ध है और उसे भी लाने के लिए घंटों बर्बाद करने पड़ते हैं।


इसी के साथ गंदगी के निपटान के लिए जो डिस्पोजल प्लांट लगने चाहिए थे तो वह न होने से गाँव वाले क्यों अपने इलाके को बदबू से भरा बनाएँगे। गंदगी से खाद बनती है लेकिन उसे बनने में चार पाँच साल लगते हैं तो क्यों कोई दो गड्ढों वाला शौचालय बनाएगा ?


स्वच्छ शौचालय योजना केवल उन्हीं क्षेत्रों में कामयाब हुई है जहाँ पानी और डिस्पोजल प्लांट की सुविधा है। इन इलाकों में किसान को ऑर्गानिक खाद भी मिल रही है और गंदगी से छुटकारा भी तो फिर किसान घर के शौचालय से बनने वाली खाद का इंतजार क्यों करेगा।


आँकड़ों के आधार पर देश को खुले में शौच से मुक्त किए जाने की घोषणा तो की जा सकती है लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो यह सही नहीं है। यही हाल तीन साल बाद देश को प्लास्टिक मुक्त करने की घोषणा का होगा, सरकार की चाल देखते हुए इसमें कोई संदेह नहीं है।