सोमवार, 16 नवंबर 2020

अंतरधार्मिक हो या अंतर्जातीय, विवाह, लव जिहाद नहीं है

 


विवाह को पवित्र बंधन माना गया है जो जीवन भर चलता है और पति पत्नी की कुछ जोड़ियां तो एक दूसरे के प्रति इतनी समर्पित होती हैं कि अगले जन्म से लेकर सात जन्मों तक अपने संबंधों के इसी रूप की कामना ही नहीं करतीं बल्कि उसके लिए मन्नत मांगने से लेकर उपवास, व्रत आदि भी रखती हैं।

रिश्तों का बिगड़ना

जब वैवाहिक संबंध खराब होते होते टूटने के कगार तक पहुंच जाएं तो यह बात मन में तो आती ही है कि कहीं कुछ तो गलत हुआ है, चाहे वह विवाह से पहले की जाने वाली छानबीन में कमी रही हो या फिर बाद में एक दूसरे की प्रकृति से मेल न खाने से हुआ हो या दोनों के परिवारों में से किसी एक की अनावश्यक दखलंदाजी के कारण हुआ हो।

हमारे देश में विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं जो अपनी एक से अधिक जातियों या बिरादरियों में बटे हुए हैं। जहां तक कामकाज करने, नौकरी, व्यवसाय, व्यापार करने की बात है, सभी आपस में किसी न किसी रूप से जुड़े होते हैं और अपनी हैसियत, ओहदे, सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक स्थिति के अनुसार एक दूसरे के साथ व्यवहार करते हैं और अगर थोड़ा विस्तार करें तो यह भावना या रिश्ता वसुधैव कुटुंबकम् की धारणा तक चला जाता है, मतलब कि संसार में सभी मिलजुलकर और सुरक्षा तथा एक दूसरे के प्रति विश्वास रखते हुए अनेक बातों में बिल्कुल अलग होते हुए भी एक परिवार की तरह रहें।

यह आदर्श स्थिति तब एकदम पलट जाती है जब दो व्यक्तियों के आपस में विवाह करने और जीवन भर साथ रहने का निर्णय करने की बात आती है। उस समय वे सब बातें महत्वपूर्ण हो जाती हैं जिनकी ओर कभी ध्यान नहीं जाता।  जैसे कि जो व्यक्ति शादी करना चाहते हैं, उनकी और उनके परिवार की हैसियत, रुतबा, धन, संपत्ति, जमीन, जायदाद, रहन सहन का ढंग और सबसे अधिक विचारों का मेल होने से लेकर संबंधों के निर्वाह करने के प्रति कमिटमेंट होने तक को जांचा परखा जाता है ताकि बाद में कोई परेशानी न हो और एक आदर्श स्थिति बनी रहे, चाहे परिस्थिति कैसी भी हो और उसमें कितना भी परिवर्तन हो जाए, मतलब कि साथ तो निभाना ही है।

विवाह में दरार और कानून

अक्सर जब वैवाहिक संबंधों में बिखराव, रिश्तों में कड़वाहट और एक दूसरे के प्रति अविश्वास के  कारण अलग रहने में ही भलाई नजर आने लगती है तो उसके लिए पहले तो व्यक्तिगत या पारिवारिक सलाह मशविरा या आपसी रजामंदी से विवाद को सुलझाने की कोशिश की जाती है और जब किसी भी तरह बात न बने तो कानूनन अलग होने का रास्ता अपना लिया जाता है।

यह तब अधिक आसान हो जाता है जब दोनों पक्षों के धर्म और जाति एक हों लेकिन अगर ये अलग अलग हैं तो फिर बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। इसका कारण यह है कि सभी धर्मों में विवाह को लेकर अपने अपने कानून हैं, तलाक लेने और देने के तरीके हैं और उसके बाद बच्चों को लेकर एक दूसरे के  अधिकारों को तय करने के कानून है। इसी तरह बाकी चीजों के बारे में निर्णय करने के प्रावधान हैं।

विभिन्न धर्मों के कानूनों में यह विसंगतियां कभी कभी बहुत बड़े विवाद का कारण बनकर  जघन्य अपराध करने तक के लिए उकसाने का काम करती हैं। असामाजिक तत्वों द्वारा  साम्प्रदायिक तनाव, हिंसा और धर्म का सहारा लेकर नफरत फैलाने तक का वातावरण बनाना आसान हो जाता है। अगर सही समय पर कार्यवाही न हो तो गांव, शहर, कस्बा, प्रदेश और फिर पूरा देश इसकी चपेट में आ जाता है, जबकि बात केवल इतनी सी होती है कि अलग अलग धर्म या जाति के लड़के और लड़की ने विवाह करने का निर्णय कर लिया है। जरा सी बात का अफसाना बन जाता है और यहां तक कि कई बार सरकारें तक केवल इसी मुद्दे पर पलट जाती हैं।

धार्मिक विभिन्नता या लव जिहाद

हमारे देश में जिन धर्मों के बीच काफी समानताएं हैं जैसे कि हिन्दू और सिख तो उनके बीच जब विवाह संबंध स्थापित होते हैं तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता लेकिन जैसे ही  मुस्लिम तथा इसाई धर्म और हिन्दू तथा सिख धर्म के पालन करने वालों के बीच विवाह जैसी घटना  होती है तो अगर समझदारी से काम न लिया गया तो बात का बतंगड़ बनने में देर नहीं लगती।

इस तरह की परिस्थिति इसलिए बनती है क्योंकि इन धर्मों के नियम, रीति रिवाज, तौर तरीके और वैवाहिक जीवन की अनेक गतिविधियों में बहुत अधिक अंतर होता है, इसलिए जरूरी यह हो जाता है कि यदि मान लीजिए हिन्दू और मुस्लिम लड़के और लड़की के बीच विवाह संबंध तय होता है तो दोनों के परिवारों को सबसे पहले एक दूसरे के धर्म की मान्यताओं को सम्मान देते हुए उन्हें अपनाने की पहल करनी होगी। इसमें ऐसा नहीं हो सकता कि एक पक्ष तो मान ले और दूसरा न माने बल्कि इस कहावत पर चलना होगा कि एक ने कही, दूजे ने मानी, बाबा कह गए दोनों ही ज्ञानी।

धर्म और जाति से अलग हटकर वैवाहिक संबंध स्थापित करने में कोई बुराई नहीं है बशर्ते कि इसका आधार अय्याशी, कट्टरपन और समाज विरोधी गतिविधियां जैसे कि आतंकवाद न हो।

दो धर्मों के मानने वालों के बीच प्रेम संबंध हो जाना और फिर विवाह कर लेने में कोई हर्ज नहीं है और समाज भी इसे इसी नजरिए से देखता है लेकिन जब इसमें निहित स्वार्थों से लेकर  राजनीतिक हितों की पूर्ति देखी जाने लगती है, तब ही भ्रम फैलता है और छोटी सी घटना विशाल आकार धारण कर लेती है।

असल में दोनों धर्मों के बीच आस्था, पूजा और तीज त्योहारों में अंतर को आधार बनाकर जब संघर्ष की स्थिति पैदा करने की नीति अपनाई जाती है तब ही हालात बिगड़ते हैं वरना तो विवाह  एक ऐसा पवित्र बंधन है जिसमें दो व्यक्तियों के मिलन के साथ दो आत्माओं का भी मिलन होता है।

इसे  लव जिहाद का नाम देकर कानून बनाने तक का फैसला करने से पहले नेताओं, बुद्धिजीवियों और समाज के प्रबुद्ध लोगों को एक साथ बैठकर चिंतन करना होगा क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि जिस सौहार्द की डाली पर हम सभी बैठे हैं, उसी को काटकर फेंक दें और फिर एक नए विवाद को जन्म दे दिया जाए।

विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच वैवाहिक संबंध स्थापित होने से कम से कम किसी का धर्म खतरे में नहीं आता है और न ही ऐसी परिस्थिति बनती है जिसे लेकर ज्यादा चिंता की जाय बल्कि इसे एक सामान्य सामाजिक और पारिवारिक गतिविधि के रूप में देखना ही श्रेयस्कर है।

शनिवार, 7 नवंबर 2020

कानून की कमजोर कड़ी और सरकार की नीयत से ही अपराध पनपता है

 


सामान्य नागरिक को जब प्रतिदिन वही कुछ सुनने, पढ़ने और देखने को मिले जो गैर कानूनी है, न्यायिक व्यवस्था के खिलाफ है तो उसे सरल भाषा में कहा जाय तो वह नैतिक,पारिवारिक और सामाजिक तथा आर्थिक मोर्चे पर गिरावट का प्रतीक है।

कानून और अपराध की जुगलबंदी

बलात्कार, शोषण, मारपीट, हिंसा, धोखाधड़ी और इसी तरह की घटनाएं न केवल गैर कानूनी हैं बल्कि कानून में उनके लिए कड़ी सजा का भी प्रावधान है।

क्या कभी इस पर ध्यान गया है कि अपराध करना कुछ लोगों की आदत क्यों बन जाता है? असल में जब आपराधिक मानसिकता किसी परिवार या जिस समाज में वह रहता है उसके जीवन मूल्यों का हिस्सा बन जाए तो फिर अपराध करना वैसा ही हो जाता है जैसे कि भूख लगने पर खाना खा कर अपनी मूंछों पर ताव देना या डकार मारना।

यह एक आम प्रवृत्ति है कि जब परिवार, समाज या फिर सरकार की तरफ से भी कोई नियम या कानून बनाया जाता है तो ज्यादातर लोगों की यही प्रतिक्रिया होती है: लो एक और कानून आ गया, हमें बताने चले हैं कि क्या करना है, पहले खुद तो इसे मानें, हमसे पूछ कर बनाया था, कोई हम पर अपनी मर्जी नहीं थोप सकता या फिर यह कि वैसे तो कानून में कोई कमी नहीं है लेकिन विरोधी पक्ष का होने के नाते हम इसे कतई नहीं मान सकते, चाहे कुछ भी हो जाए ।

विरोध की आदत

आगे बढ़ने से पहले एक घटना का जिक्र जरूरी है ताकि समझा जा सके कि यह आदत नाम की चिड़िया है क्या ?

कुछ समय पहले एक कॉरपोरेट संस्थान द्वारा अपने कर्मचारियों के लिए एक फिल्म बनाने का प्रस्ताव मिला। प्रबंधकों ने बताया कि उनके यहां फैक्टरी और दफ्तर में बड़ी संख्या में लोग समय पर नहीं आते और अगर कोई एक्शन लो तो लाल झंडा या फिर हड़ताल तक कर देते हैं। दूसरी बात यह कि कारखाने में कामगार लापरवाही से काम करते हैं और भारी नुकसान करते है, चाहे वेतन काट लें, सजा दे दें, कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि यहां यूनियन बहुत ताकतवर है।

बहुत सोचने के बाद फिल्म बनानी शुरू की और उसमें पहला सीन यह रखा कि सुबह के नौ बजे हैं लेकिन कोई काम पर नहीं आया, दूसरा सीन दस बजे का था और कुछ लोग काम पर आते दिखाए, इसके बाद ग्यारह बजे का सीन दिखाया जिसमें सभी कर्मचारी काम पर आते और अपनी ड्यूटी करते दिखे।

इसके बैकग्राउंड में यह कमेंट्री सुनाई:

हो सकता है कि आज आप देर से उठे हों, किसी घरेलू काम से कहीं जाना जरूरी हो, कोई मिलने आ गया हो या फिर किसी भी कारण से काम पर समय से यह सोचकर न पहुंच पाए हों कि जल्दी क्या है, चले जाएंगे- नौकरी तो पक्की है। लेकिन ध्यान रखिए कि कहीं काम पर देर से जाना आपकी आदत न बन जाए और कहीं ऐसा हुआ तो जीवन में आप सभी जगह देर से पहुंचेंगे जिसकी वजह से न केवल दूसरों से पीछे रह जाएंगे बल्कि हो सकता है कि आपका कोई बहुत बड़ा नुकसान हो जाए।

यह फिल्म रोज शूट होती और अगले दिन गेट पर दिखाई जाती। कुछ ही दिनों में लगभग शत प्रतिशत लोग नौ बजे आने लगे। कारण था कि कोई भी निजी जीवन में पीछे नहीं रहना चाहता और यह समझ में आने लगा था कि देरी की आदत एक बार पड़ गई तो नुकसान अपना ही होने वाला है। कोई भी कर्मचारी अब दस या ग्यारह बजे काम पर आता हुआ दिखाई देना नहीं चाहता था।

अब दूसरी समस्या को हल करने के लिए एक ट्रेनिंग फिल्म बनाई जिसमें विस्तार से उत्पाद बनाने की प्रक्रिया दिखाई गई और उसे टी वी रूम में सब के देखने के लिए रख दिया।

इसी के साथ इस संदेश वाली फिल्म सब को दी गई कि यदि आप की समझ में प्रोसेस न आए या कहीं अटक जाएं तो तुरंत काम बंद कर दें और इसके लिए आपसे न तो कुछ पूछा जाएगा और न ही प्रोडक्शन में कमी आने की जिम्मेदारी आपकी होगी। आपको बस यह करना है कि काम रोकने के बाद टी वी रूम मे जाकर ट्रेनिंग फिल्म देखिए और समझिए कि आप क्या गलती कर रहे थे और फिर उसके अनुसार अपना काम कीजिए। फिर भी उत्पाद ठीक न बने तो अपने सुपरवाइजर को सूचित कर दीजिए और जब तक कि समाधान न निकले, कुछ मत कीजिए।

इस फिल्म का असर यह हुआ कि प्रोडक्शन तो बढ़ा ही, साथ में सही क्वालिटी का भी बनने लगा।

यह किस्सा सुनाने का अर्थ यह है कि कानून बनाने वाले कोई भी नियम बनाने से पहले यह सुनिश्चित नहीं करते कि उसके पालन करने में कोई दिक्कत तो नहीं आयेगी, बस उसकी घोषणा कर देते हैं।

वास्तविकता तो यह है कि जब कोई ऐसा नियम, कायदा, कानून बनता है जो व्यवहार में न लाया जा सकता हो, तब ही लोग उसका उल्लंघन करने, न मानने या विरोध करने पर उतारू होते हैं वरना कौन नहीं चाहता कि  कानून का पालन न करने पर मिलने वाले दंड से बचा रहे और अच्छा नागरिक भी कहलाए।

नसीहत नहीं हकीकत

मिसाल के तौर पर ट्रैफिक कानूनों को ही ले लीजिए। सड़कों पर कट, डिवाइडर, सही दूरी पर मुड़ने की जगह, चैराहे पर लाइट्स, ट्रैफिक संकेत और चलने तथा ड्राइविंग के लिए सही सड़क ठीक से न होने के कारण ही ज्यादातर लोग ट्रैफिक नियमों का पालन न करने के लिए मजबूर होते हैं।

जिस व्यवस्था में सिपाही की हल्की सी मुठ्ठी गरम करने पर जुर्माने से बचा जा सकता हो, घर पर ही बिना ड्राइविंग सीखे लाइसेंस मिल जाता हो, परिवार में ही नियम मानने पर जोर न दिया जाता हो, दुर्घटना होने पर मदद करने वाले को ही पुलिस, थाने, कचहरी के चक्कर लगाने से लेकर गुनहगार सिद्ध करने का चलन हो तो मन में कानून को लेकर क्या धारणा बनेगी, सोचना कोई रॉकेट साइंस नहीं है

इसी तरह हर वर्ष अक्टूबर नवंबर में पराली जलाने या त्योहारों पर पटाखे चलाने से होने वाले प्रदूषण की बात होती है लेकिन कभी सरकार ने इसका कोई इंतजाम नहीं किया जिससे किसान हों या आम नागरिक, कैसे यह काम करने से अपने को रोक सकते हैं ?

गलती कहां है ?

जिस देश में प्रधान मंत्री को चुनाव जीतने के लिए यह कहना पड़े कि उनकी पार्टी को वोट देने पर कोरोना की दवाई मुफ्त मिलेगी, बिना किसी ठोस योजना के लाखों लोगों को रोजगार देने का वायदा कर वोट बटोरने के लिए लॉलीपॉप दिया जाता हो, योग्यता की बजाय भाई भतीजावाद, धन, बाहु बल और भ्रष्टाचार का बोलबाला हो तो वहां कानून को ठेंगा दिखाने का चलन तो होगा ही, अपराधियों का विधान सभा और संसद सदस्य बन जाना तो मामूली बात है !

नियम कानून की अनदेखी का परिणाम टैक्स चोरी, घटिया उत्पादन, असुरक्षित सामग्री और जान का जोखिम तो होता ही है, साथ में जहां से भी खरीदो वही सामान मिलता है जिसे बनाते समय क्वालिटी का नहीं ज्यादा से ज्यादा मुनाफा  कमाने का ध्यान रखा जाता है।

अगर इस बात पर बहस हो या चिंतन किया जाय कि सामान्य व्यक्ति हो या विशिष्ट कहलाए जाने वाला अर्थात संभ्रांत,  कानून या नियम कायदों को न मानने या उनकी धज्जियां उड़ाने के लिए क्यों तत्पर ही नहीं बल्कि अपना धर्म तक समझने लगता है तो यही बात सामने आयेगी कि इसके पीछे नासमझी, बिना किसी विश्लेषण, जरूरत से ज्यादा कड़ाई और अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति पर ही सबसे ज्यादा ध्यान देना है।

किसी भी कानून की अवज्ञा, उसका विरोध, आंदोलन या उसका कचरे की पेटी में फेंक दिया जाना और उसका इस्तेमाल केवल तब करना जब उससे किसी दल, सरकार या सत्ताधारियों का मतलब पूरा होता हो या आम जनता को अपनी ताकत का एहसास कराना हो, तब ही ऐसे हालात बनते हैं जिनसे अराजकता फैलती है।  कर्फ्यू, लाठी चार्ज, गोली चलाने से लेकर किसी भी प्रकार से दमन करना न्यायसंगत हो जाय और नैतिक मूल्यों की बात तो छोड़िए, परिवार और समाज को बचाए रखना मुश्किल ही नहीं, असंभव जैसा लगने लगता है।

सरकार को कोई कानून बनाने के बाद उसमें ढिलाई क्यों देनी पड़ती है, एमनेस्टी और रियायत देने को क्यों विवश होना पड़ता है, यह तब ही होता है जब कानून बनाने का आधार नैतिक और सामाजिक मूल्यों का बलिदान कर देना होता है।

बड़ा हो या छोटा कोई भी कानून हो, जैसे कि नोटबंदी, जीएसटी, नागरिकता से लेकर नए कृषि कानून की फजीहत या फिर टैक्स में राहत के नाम पर शिकंजे को और अधिक मजबूत करना, सामान्य व्यक्ति को यह लगना कि कानून या नियम अव्यावहारिक ही नहीं, अनैतिक भी है तो फिर अव्यवस्था तो होगी ही, कानून तोड़ना ही विकल्प बन जाएगा और तरक्की के रास्ते बंद होने की नौबत तो आयेगी ही, ऐसी हालत में या तो अपने को कोसने या फिर विद्रोह तक करने के अतिरिक्त और कुछ उपाय बचता ही कहां है ?

 

शनिवार, 31 अक्टूबर 2020

निकम्मापन भाग्य हीनता और कर्म फल किस्मत का लिखा नहीं है

 


अक्सर जब कुछ अपने हिसाब से न हो तो अपने आप से यह कहने का मन करता है कि ऐसा मेरे ही साथ क्यों होता है, मेरी तो किस्मत खराब है, मैंने किसी का क्या बिगाड़ा जो यह देखने को मिल रहा है या फिर जरा सी बात पर क्रोध हो आना, दूसरे को भला बुरा कहना या स्वयं ही रोने लगना जैसे कि अब जीवन में कुछ बचा ही नहीं।

इसके विपरीत कुछ लोग कैसे भी हालात हों, कितनी भी कोई आलोचना करे और जीवन में कैसे भी उतार चढ़ाव आएं, ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे कि उन पर किसी भी चीज का ज्यादा असर नहीं पड़ता और अगर थोड़ा बहुत पड़ भी जाए तो वह कंधे पर पड़ी धूल या बारिश की बूंद की तरह ऐसे झटक देते हैं कि मानो कुछ हुआ ही न हो और पहले की तरह मस्त मौला जैसा बर्ताव करते रहते हैं।

ज्योतिष का मायाजाल

ऐसे लोग जो निराशा के भंवर में डांवाडोल हो रहे हों या आशा के समुद्र में हिचकोले खाने का लुत्फ उठा रहे हों, उन लोगों के संपर्क में ज्यादातर आते हैं जो उनकी कुंडली के गृह देखकर या हाथों की रेखाएं पढ़कर या फिर भविष्य जानने के दूसरे तरीकों जिसमें टैरो कार्ड, फेंग शुई से लेकर तारामंडल की चाल तक शामिल है, यहां तक कि साधु सन्यासी के पास भी, अवश्य जाते हैं ताकि अपना भविष्य जान सकें।

अब ये लोग जो बताते हैं उसमें कितना सच, कितनी हवाबाजी और कौन सा मनोविज्ञान होता है कि सामान्य व्यक्ति, चाहे  कुछ समय के लिए ही हो, इन पर विश्वास कर उन घटनाओं का होना  निश्चित मान लेता है जो भविष्य में होने वाली हैं, जिनके बारे में विश्वास दिलाकर ये भविष्य बताने का कारोबार करने वाले भारी भरकम फीस लेने के जुगाड में लगे रहते हैं।

अगर इन भविष्यवक्ताओं के बताए अनुसार कुछ नहीं हुआ तो ये अपने सीमित ज्ञान का दोष न मानकर कहेंगे कि जन्म का समय इधर उधर होगा, हाथ की रेखाएं विचारों के अनुसार बदलती रहती हैं और अपना पिंड छुड़ा लेते हैं। इन विद्याओं में कितनी सच्चाई है इसके बारे में कुछ न कहकर यह कहा जा सकता है कि इन पर यकीन करने वाले लगभग निकम्मेपन को स्वीकार कर बस अच्छा वक्त आने का इंतजार करते रहते हैं जो असल में मृग तृष्णा है।

एक मित्र कहने लगे कि उनके ज्योतिषी ने कहा है कि उनका भाग्य दो वर्ष बाद चमकेगा और तब तक वो चाहे कितना भी परिश्रम कर लें, कुछ हासिल नहीं होगा । मित्र ने इस बात पर यकीन करते हुए दो साल तक एक निकम्मे व्यक्ति की तरह कोई भी काम न करने का फैसला कर लिया। अब हुआ यह कि यह समय बीतते बीतते वह पूरी तरह आरामतलब हो गए और इस बात को पांच वर्ष हो गए, वह अब भी कोई काम नहीं करते और भाग्य को दोष देते रहते हैं।

ऐसे न जाने कितने उदाहरण होंगे जिनमें ग्रह दशा बदलने के इंतजार में लोग युवा से अधेड़ और बूढ़े हो जाते हैं।

एक टैरो कार्ड रीडर ने अपने क्लाइंट से कहा कि वह चाहे कहीं भी रहें, वह उन्हें देख सकता है और यहां तक कि वे कहां जा रहे हैं, क्या कपड़े पहने हैं, क्या खा पी रहे हैं, सब जान सकता है। अब वह व्यक्ति पूरी तरह इन महाशय के चंगुल में था और ये उसे मुंहमांगी फीस देते जा रहे थे।

 

 

कर्म और उसका परिणाम

जिस प्रकार प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है उसी प्रकार हम चाहे अपनी समझ से कोई अच्छा  काम करें या जानबूझकर बुरा काम अथवा अनजाने में ही दोनों में से एक काम हो जाए तो भी उसका परिणाम अवश्य ही निकलेगा और  कर्ता को उसका फल मिलना तय है।

व्यक्ति के तौर पर और समाज में सामूहिक रूप से भी कोई काम किया जाता है तो उसका आधार परवरिश, वातावरण और आर्थिक स्थिति ही होता है। उदाहरण के लिए चोरी डकैती, हत्या, यौन अपराध से लेकर स्वयं का कोई लाभ न होने पर भी दूसरे का अनिष्ट करने तक के कर्म हो सकता है कि विरासत में मिले हों या संगत के नतीजे के तौर पर हों, पर उनका फल मिलना निश्चित है।  इसी तरह अपनी हानि की संभावना को जानते हुए भी सकारात्मक, सहृदयता, जिम्मेदारी के साथ कोई भी कार्य करने पर परिणाम जो भी हो, मन में ग्लानि नहीं रहती।

जहां तक भाग्य का संबंध है, वह हमारा लक्ष्य तो दिखा सकता है लेकिन उस तक पहुंचना तो स्वयं को ही पड़ेगा। इसके अलावा एक भी गलत कदम कभी भी सही मोड़ पर नहीं ले जा सकता।

अपराधी या दुष्कर्म करने वाला परिस्थितिवश बच गया तो इसका मतलब यह नहीं कि वह दंड से हमेशा के लिए बच गया। इसी तरह बदला लेने को न्याय करना मान लेना भी भूल है क्योंकि यदि कोई गलत कदम उठा लिया तो यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं लेगा चाहे पीढ़ियां बीत जाएं।

हमारे कर्म केवल एक अवसर की तरह हैं, उनसे पुरस्कार या दंड तय नहीं होता, एक रास्ता ही दिखाई देता है, और कुछ नहीं।

जहां तक भाग्य का संबंध है तो इसका निर्धारण किसी के वश में नहीं, मिसाल के लिए पहला विश्व युद्ध दो देशों के राजपरिवारों के बीच घटी एक साधारण सी घटना से शुरू हुआ और पूरी दुनिया उसकी चपेट में आ गई। इसी तरह दूसरे विश्व युद्ध में यदि एक नाजी ने सैकड़ों यहूदियों को मौत के घाट उतार दिया तो इसका मतलब यह नहीं कि इस अकेले को उसका फल भोगना था बल्कि पूरी  दुनिया को भोगना पड़ा।

वर्तमान में जीना

हालांकि यह संभव नहीं है कि जीवन में घटी किसी घटना को मिटाया जा सके लेकिन इतना तो किया ही जा सकता है कि उसे दिमाग के कंप्यूटर की हार्ड डिस्क में एक कोने में रखकर भुला दिया जाय और जो वर्तमान में घट रहा है उसके अनुसार यह सोचकर जिया जाए कि यह भी उसी मेमोरी का हिस्सा बनने वाला है जिसे भुलाया जा चुका है।

ऐसा न करने पर वह बात जो न जाने कब हुई थी आज भी सीने पर एक बोझ की तरह बनी रहेगी। मतलब यह कि पिछला कोई भी संबंध जो चाहे किसी के अच्छे या बुरे व्यवहार के कारण बना हो , उससे अपने आप को अलग रख कर या तोड़कर ही उससे मिली खुशी या गम को भुलाया जा सकता है वरना पुरानी यादें जीने नहीं देंगी और वर्तमान के सुखद क्षणों का मजा भी नहीं ले पाएंगे।

जहां तक ईश्वर का संबंध है, उसे इस बात से कोई मतलब नहीं कि कोई गरीब है या अमीर, कमजोर है या बलवान, शासक है या प्रजा, नर है या नारी, मानव है या दानव, वह किसी के भी कर्म चाहे कैसे भी हों, अपने ही हिसाब से उनके फल देता है। जब यह समझ में आ गया तो फिर बदकिस्मत या भाग्यशाली होने का कोई अर्थ नहीं रह जाता, केवल कर्म करते जाने को ही अपनी नियति मान लेने में ही समझदारी है।

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2020

अपराधी बनने की शुरुआत घर से ही होती है

 


अक्सर जब यह देखने, सुनने, पढ़ने को मिलता है और आपसी बातचीत में चर्चा का विषय बनता है कि समाज में अपराध बढ़ रहे हैं, लोग जरा सी बात पर मारपीट, हत्या कर देते हैं, जो बच्चे अभी वयस्क भी नहीं हुए, इन कामों में शामिल हैं, बड़ों की बात मानना या उनका आदर करना तो दूर, उनका अपमान करने से लेकर उनके साथ भी दुश्मन जैसा व्यवहार करने से नहीं चूकते तो सोचना जरूरी हो जाता है कि आखिर गलती कहां हुई है?

हकीकत का सामना

इससे पहले कि आगे बढ़ें, एक अनुभव बताना है और वह यह कि कुछ वर्ष पूर्व एडल्ट एजुकेशन विभाग के लिए फिल्म श्रृंखला बनाते समय एक ऐसे व्यक्ति से मुलाकात हुई जिसकी उम्र पचास के लगभग थी, वह खूंखार जैसा दिखता था, बदन पर कई जगह कटने फटने के निशान थे और स्वभाव झगड़ालू था।

यह व्यक्ति अपने पड़ोसी से लड़ रहा था और उसे धमकी दे रहा था कि अगर जो वह कर रहा है, उससे बाज नहीं आया था तो उसका वह हाल करेगा कि याद रखेगा।

बात बस इतनी थी कि पड़ोसी अपनी 15-16 साल की लड़की को स्कूल जाने से रोक रहा था और अपनी मां के साथ दूसरों के घरों में काम करने जाने और पैसे कमाने के लिए कह रहा था जबकि लड़की पढ़ाई में होशियार थी और उसे छोड़ना नहीं चाहती थी। इस बात को लेकर घर में रोज कोहराम मचता रहता था।

जब पड़ोसी ने कहा कि उसकी लड़की है, वह जो चाहे उसके साथ करे तो इस पर उस व्यक्ति ने कहा कि वह क्या उसे जानता नहीं है, लड़की को स्कूल जाने से रोक और फिर देख मैं क्या करता हूं।

यह घटना फिल्म बनाने के लिए बहुत अच्छी थी तो जब उस व्यक्ति से पूछा कि वह क्यों अपने पड़ोसी की लड़की के लिए इस तरह की जिद कर रहा है तो उसका जवाब चैंकाने वाला था। कहने लगा कि जब वह 10-12 साल का था तो अक्सर स्कूल से गैरहाजिर हो जाता था, अध्यापक की तो क्या कहें, मातापिता को भी बहका देता था।

बड़ा होने पर संगत उसके जैसों की ही मिली और पहले तो चोरी चुपके और फिर खुलेआम शराब, सिगरेट, ड्रग्स की लत लग गई। घरवालों ने पैसे देने बंद करने से लेकर यह भी कह दिया कि पेट भरना है तो कमाई करो लेकिन अनपढ़ होने, कोई काम करना न जानने के कारण किसी तरह की आमदनी तो हो नहीं सकती थी, इसलिए चोरी, जेब काटने और दूसरे अपराध करने शुरू कर दिए। इस तरह थाना, पुलिस, कोर्ट कचहरी और जेल आना जाना शुरू हो गया।

पूरा जीवन एक अपराधी की तरह बीतने लगा और अभी भी पीछा नहीं छूटा है। इसलिए अब मैं अगर किसी लड़के या लड़की को स्कूल जाते और पढ़ाई करते नहीं देखता हूं तो मेरा खून खौलने लगता है।

यह किस्सा सुनाने का मतलब इतना ही है कि हमारे देश में जितने भी जुवेनाइल क्राइम होते हैं, उनके पीछे यही एक कारण है कि पढ़ने लिखने की उम्र में जैसे भी हो पैसा कमाने के चक्कर में पड़ गए और इसका ऐसा लालच पड़ा कि सही और गलत समझना ही भूल गए।

युवा वर्ग और अपराध

दौर चाहे वर्तमान हो या पिछले कुछ वर्षों का इतिहास हो, आंकड़े इसी बात की गवाही देते मिलेंगे कि युवा वर्ग में अपराध करने और इसमें औरों को भी शामिल करने की प्रवृत्ति का सबसे बड़ा कारण उनका अनपढ़ या मामूली पढ़ा लिखा होना और किसी भी तरह का काम करने के कौशल का न होना है।

निर्भया, निठारी से लेकर हाथरस या किसी भी स्थान पर किसी भी ऐसे जघन्य अपराध की खोजबीन कर लीजिए जिसमें 15 से 25 साल तक का युवा वर्ग सम्मिलित पाया जाता हो तो लगभग शत प्रतिशत वे ऐसे मिलेंगे जिन्होंने स्कूल का मुंह नहीं देखा या छोड़ दिया या निकाल दिए गए हों।

यही कारण है कि बहुत से विकसित और विकासशील देशों में अगर स्कूल जाने की उम्र का कोई  लड़का या लड़की पढ़ता लिखता नहीं तो उसके लिए माता पिता को जिम्मेदार मानकर उनसे अपने बच्चों के पालन पोषण का अधिकार छीन लिया जाता है।

जहां तक हमारे देश की बात है, यहां इस तरह का कोई कानून बनाने की कौन कहे, सोचा भी नहीं  जा सकता क्योंकि राजनीतिक दलों, सरकारों के मंत्रियों और सांसद तथा विधायकों में अनपढ़ों, मामूली पढ़े लिखे और अपराध की दुनिया की सीढ़ी पर चढ़कर सत्ताधारी बने लोगों की तादाद उनसे कहीं ज्यादा है जो राजनीति को देश के विकास और समाज कल्याण के लिए  सेवा का मार्ग समझते हैं।

शिक्षा की गुणवत्ता या क्वालिटी कैसी भी ही, इतना तो निश्चित है कि पढ़ने लिखने से व्यवहार में विनम्रता और किसी भी काम को करने से पहले उसके बारे में भलीभांति सोच विचार करने की बुद्धि का विकास तो होता ही है।

अपराध की मानसिकता

यहां यह तर्क दिया जा सकता है कि क्या पढ़े लिखे और बड़ी बड़ी डिग्रियां रखने वाले तथा विदेशों से शिक्षा प्राप्त लोग अपराध करते नहीं पाए जाते तो आंकड़े कहते हैं कि इनका प्रतिशत पूरी आबादी के शून्य और एक प्रतिशत के बीच रहता है।

मिसाल के तौर पर माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चोकसी, सुब्रत राय, हर्षद मेहता जैसे अपराधी उंगलियों पर गिने जा सकते हैं और इन्होंने जो अपराध किए वे आर्थिक अपराध हैं और उन्हें हमारे सिस्टम की खामियों का फायदा उठाते हुए करने में कामयाब हुए।

इसके अतिरिक्त जो इनके चंगुल में फंसकर अपना बहुत कुछ लुटा बैठे उनमें ज्यादातर अशिक्षित लोग थे। मिसाल के तौर पर सहारा और हर्षद घोटाले जैसे कांड इसलिए सफत हो पाए क्योंकि उन्होंने ऐसे लोगों को अपना निशाना बनाया जो पढ़े लिखे न होने के कारण इनके जाल में आसानी से फंस गए।

अपराध और रोजगार

अपराधी बनने के लिए शिक्षा के बाद जिस कारण की सबसे बड़ी भूमिका है, वह है रोजगार और जो अंततः शिक्षा से ही जुड़ा हुआ है।

बेरोजगारी का सबसे बड़ा कारण शिक्षा का अभाव, कार्य कुशलता यानी स्किल का न होना और संसाधनों का सीमित होना तो है ही, साथ में इसके राजनीतिक और सामाजिक कारण भी हैं।

इनमें सबसे पहले जब साधारण व्यक्ति यह देखता है कि कुछ लोग अनपढ़ या मामूली शिक्षा की ही बदौलत केवल अपने रुतबे और दबंगई के आधार पर नेतागिरी का पेशा अपनाकर अकूत धन और ताकत के मालिक बन रहे हैं तो उन्हें भी पढ़ने लिखने की क्या जरूरत है ?

इस तरह इन नेताओं को अपने समर्थक मिल जाते हैं जो जरा से लालच में आकर कहीं भी धरना, प्रदर्शन, तोड़फोड़, हिंसा, आगजनी से लेकर कुछ भी अनैतिक और गैर कानूनी काम करने को तैयार हो जाते हैं। विडंबना यह है कि इसे ही ये लोग अपना रोजगार मान लेते हैं।

बेरोजगारी के अन्य कारण भी हो सकते हैं लेकिन उनका महत्व इतना नहीं है जितना कि इस बात का कि रोजगार करने या पाने के लिए जरूरी शिक्षा और काम करने की इच्छा तथा उसे करने की योग्यता और कुशलता का न होना है।

यहां यह कहा जा सकता है कि सभी प्रकार से काबिल होते हुए भी रोजगार नहीं मिलता तो इससे सरकारों की नीतियों की खामियों को तो जिम्मेदार माना जा सकता है जिन्हें बदलने और रोजगारपरक बनाने के लिए विवश किया जा सकता है लेकिन इससे पढ़ाई लिखाई और कौशल होने के महत्व को कम नहीं आंका जा सकता।

आम आदमी को इससे कोई ज्यादा मतलब नहीं होता कि सरकार उसके लिए किस तरह की आर्थिक, औद्योगिक विकास की नीतियां बना रही है, उसे केवल इस बात से सरोकार होता है कि उसके रहन सहन और आजीविका के साधन और परिवार के पालन पोषण पर क्या असर होगा।

यदि देश में बचपन से ही अपराधी बनने की राह को रोकना है तो उसके लिए माता पिता और अभिभावकों को यह तय करना होगा कि वे बच्चों को उनके बचपन से ही पैसा बनाने की मशीन यानी एटीएम बनाना चाहते हैं और अपराध की दुनिया में कदम रखने की पहल करते हुए देखना चाहते हैं या फिर कुछ वर्षों का इंतजार करते हुए उनके शिक्षित होकर बेहतर भविष्य के सपने को साकार करना चाहते हैं, इसका चुनाव उन्हें ही करना है, जरा सोचिए !