हमारे देश में जब तब राजनीतिज्ञ जिसमें मंत्री, मुख्य मंत्री और प्रधानमंत्री तथा राज्यपालों से लेकर राष्ट्रपति तक ज़्यादातर रस्म अदायगी की तरह और बहुत कम वास्तविकता को समझकर बयानबाज़ी करते रहते हैं। लेकिन इससे न तो विज्ञान का भला होता है, न ही वैज्ञानिक सोच बन पाती है। यही नहीं कथनी और करनी में इतना अंतर होता है कि वैज्ञानिक अगर इन पर भरोसा कर ले तो अपनी मंज़िल पाने में उसे अनंत काल तक प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है।
वैज्ञानिक प्रयोगशाला
प्रधानमंत्री का यह वक्तव्य या कहें कि उनका सपना भारत को इस सदी में विश्व की सबसे आधुनिक वैज्ञानिक प्रयोगशाला के रूप में देखने का है तो इस पर प्रत्येक भारतवासी को गर्व होना स्वाभाविक है। यदि वे इसके साथ ही वैज्ञानिकों के साथ नौकरशाही यानी ब्यूरोक्रैट्स द्वारा किए जाने वाले भेदभाव, लालफ़ीताशाही और उनकी ज़रूरतें पूरी करने में जानबूझकर या लेटलतीफ़ी के कारण देरी न होने देने के बारे में कुछ बंदोबस्त करते तो बेहतर होता।
क्योंकि विज्ञान से संबंधित फ़िल्में तथा रेडियो कार्यक्रम बनाने का काफ़ी अनुभव रहा है तो कुछ ऐसे उदाहरणों से बात समझने में आसानी होगी। दक्षिण भारत की एक बड़ी विज्ञान प्रयोगशाला में शरीर के तन्तुओं पर गहन शोध करने के लिए महिला वैज्ञानिक ने प्रस्ताव दिया कि आगे की खोज जर्मनी में उपलब्ध संसाधनों से ही हो सकती है इसलिए उसे आवश्यक सुविधाएँ दी जायें। आश्चर्य होगा कि इसके इंतज़ार में तीन साल बीत गये। तब ही ऑस्ट्रेलिया के एक संस्थान से उसे न्यौता मिला कि उसे वे सब सुविधाएँ तुरंत मिलेंगी अगर वे उनके लिये अनुसंधान करें। उसने स्वीकृति दी और अपनी मंज़िल पाई लेकिन उसका लाभ दूसरे देश को मिला।
एक प्रसिद्ध लेबोरेटरी में एक वैज्ञानिक सरकारी छात्रवृत्ति पर जर्मनी गये और वहाँ से जब आये तो अपने क्षेत्र में बहुत कुछ नया करने की इच्छा और जोश के साथ सरकार को प्रस्ताव दिया और उसके लिये संसाधन उपलब्ध कराने का प्निवेदन किया। फ़ाइलों की उठापटक और बेमतलब के सवाल जवाब तथा अनेक अनावश्यक स्पष्टीकरण में चार साल बीत गये। वैज्ञानिक महोदय निराश होकर शांत बैठ गये और रिटायर होने का इंतज़ार करने लगे। नौकरी छोड़कर विदेश जाकर अपनी खोज को आगे बढ़ाने का निर्णय भी उनके लिए एक विकल्प था लेकिन उसका लाभ किसी अन्य देश को मिलता, इसलिए उन्होंने अपना सपना अधूरा ही रहने दिया।
सरकारी प्रयोगशालाओं में काम कर रहे हमारे वैज्ञानिकों से अपनी खोज या किसी नयी टेक्नोलॉजी का विकास करने पर यह अपेक्षा की जाती है कि वे उसके बेचने का काम यानी मार्केटिंग भी करें। क्योंकि बेचने की कला उन्हें नहीं आती इसलिए ज़्यादातर टेक्नोलॉजी अलमारी में बंद होकर और समय के साथ उनमें बदलाव न होने के कारण किसी इस्तेमाल की नहीं रहतीं, पुरानी पड़ जाती हैं।
यह भी उम्मीद की जाती है कि जो ग्राहक अर्थात् टेक्नोलॉजी ख़रीदने और उससे अपना व्यापार या उद्योग विकसित करने वाला उद्यमी है, वह इनके पास जाये और यदि ख़रीदने का मन बनाये तो उसे उस तक पहुँचने यानी डिलीवरी होने में बरसों लग जाते हैं। इसीलिए उद्योगपति सरकारी प्रयोगशालाओं को ज़्यादा महत्व न देते हुए, जबकि उनमें अधिक संभावनाएँ होती हैं, निजी प्रयोगशालाओं से टेक्नोलॉजी लेने में अधिक रुचि दिखाते हैं।
असल में क्या है कि आज़ादी का अमृत महोत्सव आने तक भी सरकारी कामकाज़ में अंग्रेज़ी शासन की दासता समाप्त नहीं हो पाई है। अंग्रेज़ ने भारत में केवल उतने वैज्ञानिक विकास को महत्व दिया था जिससे उनकी ज़रूरतें पूरी हों और वे अपने देश में उनका व्यापारिक और औद्योगिक विकास कर सकें और फिर ज़बरदस्त मुनाफ़े तथा मुँहमाँगे दाम पर हमें और दूसरों को बेचें। इसका मतलब है कि दिमाग़ और कौशल हमारा और फ़ायदा उनका होता था। आज भी बहुत कुछ अपने बदले स्वरूप में जिसे ब्रेन ड्रेन कहते हैं, यही होता है।हमारी यही विडंबना है कि हमारे वैज्ञानिक विदेशों को मालामाल कर रहे हैं क्योंके हमारे यहाँ उनकी बात ध्यान से सुनने तक की फ़ुरसत नहीं, संसाधन उपलब्ध कराने की बात तो बहुत दूर की है।
किसी से कम नहीं पर विवश हैं
हमारे देश में प्रतिभा, कौशल, वैज्ञानिक सोच और स्वदेशी संसाधनों की कोई कमी नहीं हैं। कृषि क्षेत्र में हमारे वैज्ञानिकों ने हरित क्रांति की, स्वराज जैसे कम लागत के ट्रेक्टर का निर्माण किया, खेतीबाड़ी में आधुनिक मशीनों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया। लेकिन यहाँ भी इंपोर्टेड या विदेशी तकनीक ने हमारा पीछा नहीं छोड़ा। भैंस के दूध से फैट अलग कर बेबी मिल्क पाउडर हमने ही बनाया वरना तो इसके लिए भी निर्भर थे।
चमड़ा उद्योग पचास लाख लोगों को रोज़गार देता है, जो कभी कच्चे माल के रूप में अग्रेज़ ले जाते थे, आज यूरोप की फैशन इंडस्ट्री को टक्कर दे रहा है। एक खोज जिसने चुनावों का ढर्रा ही बदल दिया, जो मतदान के समय लगाई जाने वाली स्याही और इलेक्ट्रिक वोटिंग मशीन है। इसी तरह स्वास्थ्य, चिकित्सा और बीमारियों की रोकथाम के लिये आधुनिक दवाईयों का निर्माण भी हमने किया है और वह भी घोर विदेशी कम्पटीशन के होते हुए। अणु विज्ञान में हम बहुत आगे हैं अंतरिक्ष में एक से बढ़कर एक कुलाँचें भर रहे हैं। जहां तक ऊर्जा की बात है तो उसमें भी हमने सोलर ग्रिड की खोज से सब को चैंकाया है।
हमारे वैज्ञानिकों और अनुसंधान में लगे कर्मियों ने सीमित साधनों के बावजूद कमाल किए हैं। ज़रा सोचिए कि यदि समय पर सही सहायता मिलती और राजनीतिज्ञ अपनी पीठ थपथपाने के बजाय इन्हें पूरा श्रेय देते तो हम जहां हैं उससे बहुत आगे होते। हमारे सामने पीने के पानी की समस्या नहीं होती, नदियों में प्रदूषण नहीं घुलता और हवा में धुएँ के कारण फ़ेफ़डे ख़राब न होते। शहरों में गंदगी और कूड़े के ढेर नहीं होते, बदबू न होती और रिहायशी इलाक़ों में गंदे नालों को सहन न करना पड़ता।
यह सब बदल सकता है पर इसके लिए ज़रूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति, समय नष्ट किए बिना वैज्ञानिकों को समुचित संसाधनों की पूर्ति और जनता का सहयोग तथा सरकार की संकल्प शक्ति अपेक्षित है। अगर यह हो जाए तब ही प्रधान मंत्री का निश्चय सार्थक हो पाएगा अन्यथा दुनिया बहुत आगे निकल जाएगी और हम देखते रहेंगे।
शुक्रवार, 6 जनवरी 2023
राजनीति से मुक्ति मिलने पर ही विज्ञान और वैज्ञानिक सोच संभव
शुक्रवार, 30 दिसंबर 2022
युद्ध समाप्ति और शांति तथा प्रगति की कामना का नया वर्ष
प्रत्येक वर्ष बहुत सी अच्छी और बुरी, सामान्य तथा विशेष, उलझन या सुलझन से भरा होता है और अपने में खट्टी मीठी यादों को समेटे हुए भूतकाल बन कर अपना प्रभाव भविष्य पर छोड़ता जाता है।
युद्ध का उन्माद
यह वर्ष अनेक युद्धों से आरंभ हुआ। विश्व युद्ध बनने की आशंका ही नहीं, उसकी पूरी संभावना के साथ रुस और यूक्रेन की लंबी खिंचती लड़ाई के आसार अच्छे नहीं हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ और वैज्ञानिक मान रहे हैं कि अनेक देशों में इस समय मौसम के बदलते मिजाज़ का कारण युद्ध में इस्तेमाल हाथियार हैं। अनेक देशों में बर्फ़ और ठंडी हवाओं का तांडव इसी वजह से हो रहा है। सोचिए कि यदि एटमी लड़ाई हुई और अणु हथियारों का इस्तेमाल हुआ तो विश्व की क्या स्थिति होगी ? बहुत से देश तो अपना अस्तित्व ही खो चुके होंगे और संपूर्ण आबादी किसी न किसी दुष्प्रभाव को झेलने के लिये विवश हो जाएगी। इस संदर्भ में हीरोशिमा और नागासाकी की याद आना स्वाभाविक है।
असल में युद्ध का एक बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण कारण प्रतिदिन नये और पहले से अधिक घातक शस्त्रों का निर्माण है जिनकी ताक़त परखने के लिए युद्ध के हालात बनाए जाना ज़रूरी है। इसीलिए वे सभी देश जो इनका निर्माण करते हैं इनकी खपत के लिए कमज़ोर और लालची देशों की ज़मीन तलाशते रहते हैं जो अपने पड़ौसियों के साथ किसी न किसी बहाने से लड़ते रहें और उनके हथियारों का परीक्षण होता रहे।
युद्ध किसी समस्या का तत्काल समाधान तो कर सकता है लेकिन कभी भी स्थाई हल नहीं निकाल पाता।बार बार एक ही जगह और पुराने मुद्दे पर लड़ाइयों का होना यही दर्शाता है। इसलिए युद्ध के लिए किसी विशेष कारण की आवश्यकता नहीं होती। मामूली सी बात जिसका समाधान बातचीत और समझदारी से निकाला जा सकता हो, उसके लिए संघर्ष का रास्ता अपनाना व्यक्तिगत अहम् की संतुष्टि और अपने साम्राज्य विस्तार की लालसा के अतिरिक्त कुछ नहीं।
यह वर्ष अपने देश में चुनाव के ज़रिये राजनीतिक दलों के बीच हुई लड़ाइयों से भरा पूरा रहा और अगला वर्ष भी ऐसा ही रहेगा। यह भारतीय मतदाताओं की परिपक्वता ही है जिसने धर्म, जाति, वर्ग की विभिन्नता और धन के लालच पर ध्यान न देकर ज़्यादा से ज़्यादा ऐसे लोगों और दलों को चुना जो प्रगति के रास्ते पर चलते हुए उनकी समस्याओं का समाधान कर सकने की नीति और नीयत रखते हों। इतना तो तय है कि अब मनभावन और लुभावने वादों, किसी दल के पिछलग्गू बने रहने और आँख मूँदकर वोट डालने का युग समाप्ति के कगार पर है।
आत्मनिर्भरता का युग
यह दौर सवाल करने, योग्यता सिद्ध करने और लक्ष्य साधने के लिए समुचित संसाधन जुटाने का है। राजनीति ही नहीं, आर्थिक क्षेत्र में भी अब सोच का दायरा बदल रहा है। जो क़ाबिल है, वह रास्ते की रुकावट हटाना भी जानने लगा है, अपने साथ होने वाले भेदभाव के ख़लिाफ़ आवाज़ उठाने में संकोच नहीं करता, अन्याय का प्रतिकार करना सीख गया है और किसी भी तरह की ताक़त के नशे में चूर व्यक्ति से डरना तो दूर, उसे धराशायी करने का साहस अपने अंदर महसूस करने लगा है। सामान्य व्यक्ति भी अब सपने देखने और उन्हें पूरा करने की हिम्मत कर रहा है। चाहे क्षेत्र कोई भी हो, यदि वह योग्य है तो अब संसाधन जुटाना आसान हो रहा है। कुछ भी असंभव नहीं, जब ऐसी मानसिकता बनने लगती है तो फिर किसी के लिए उसे बेड़ियों में जकड़ना संभव नहीं। शिक्षित होने के प्रति लगाव, ग़रीबी को हराने का संकल्प और अपने भरोसे अपना लक्ष्य हासिल करने की मनोवृत्ति का तेज़ी से प्रसार हो रहा है।
यह वर्ष वैज्ञानिक उपलब्धियों के मामले में भी यादगार रहेगा। एक ओर अंतरिक्ष तो दूसरी ओर चिकित्सा तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो नवीन खोज हुई हैं उनसे मानवता की सेवा करना सुगम होगा।
सत्ताईस दिसंबर को दुनिया के अदीबों में सबसे अलग अपनी पहचान रखने वाले उर्दू के महान शायर ग़ालिब की जयंती मनाई जाती है। उनकी एक ग़ज़ल नये साल का एहसास कराती है मानो इसे इस मौक़े के लिए ही लिखा था।
दिया है दिल अगर उसको, बशर (इंसान) है, क्या कहिए
हुआ रक़ीब (प्रतिद्वंदी), तो हो, नामाबर (पत्रवाहक) है, क्या कहिए।
यह ज़िद, आज न आवे और आए बिन न रहे। क़ज़ा (मौत) से शिकवा हमें किस कदर है, क्या कहिए।
रहे हैं यों गह-ओ-बे गह (वक़्त बेवक़्त), कि कू-ए-दोस्त (यार की गली) को अब
अगर न कहिए कि दुश्मन का घर है, क्या कहिए
समझ के करते हैं, बाज़ार में वो, पुरसिश-ए-हाल (कुशल मंगल पूछना) कि ये कहें, सर-ए-रहगुज़र (बीच रास्ता) है, क्या कहिए।
तुम्हें नहीं है सर-ए-रिश्ता-ए-वफ़ा का ख़्याल
हमारे हाथ में कुछ है, मगर है क्या, कहिए
हसद (जलन), सज़ा-ए-कमाल-ए-सुख़न है क्या कीजे
सितम, बहा-ए-मता-ए-हुनर (कला का मूल्य) है, क्या कहिए।
कहा है किसने, कि ग़ालिब बुरा नहीं, लेकिन
सिवाय इसके, कि, आशुफ़्तासर (दीवाना) है, क्या कहिए।
एक दूसरी रचना है
कभी नेकी भी उसके जी में ग़र आ जाए है मुझसे
जफ़ाएँ करके अपनी याद, शर्मा जाए है मुझसे
खुदाया, जज़्बा-ए-दिल की मगर तासीर उल्टी है
कि जितना खेंचता हूँ और खिंचता जाए है मुझसे
उधर वो बदगुमानी है, इधर यह नातवानी (कमजोरी) है
न पूछा जाए है उससे, न बोला जाए है मुझसे
संभलने दे मुझे , अय नाउम्मीदी, क्या क़यामत है
कि दामान-ए-ख़्याल-ए-यार, छूटा जाए है मुझसे
क़यामत है, कि होवे मुद्दई का हमसफ़र, ग़ालिब
वह काफ़िर, जो ख़ुदा को भी न सौपा जाए है मुझसे
अपने लक्ष्य के प्रति दीवानगी आज जो देश में देखने को मिल रही है, वह इसी तरह क़ायम रहे, इस कामना के साथ नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ।
शुक्रवार, 23 दिसंबर 2022
उपभोक्ता क़ानून में सरकारी अनिवार्य सेवाए भी शामिल हों
प्रतिवर्ष 24 दिसंबर को उपभोक्ता दिवस मनाये जाने का चलन है। सरकार तथा कुछ ग़ैर सरकारी संगठनों द्वारा इसे मनाने की ख़ानापूर्ति भी की जाती है। लगभग साढ़े तीन दशक हो गये उपभोक्ता क़ानून बने और तीन साल पहले क़ानून में परिवर्तन भी हुए। हालाँकि उपभोक्ताओं के लिए ये क़ानून काफ़ी अच्छा रहा और और इसके कारण बहुत से लोगों को अपने साथ हुई धोखा धड़ी और जालसाजी से राहत भी मिली लेकिन फिर भी बहुत सी ऐसी बातें हैं जिनके बारे में बात करना ज़रूरी है।
सबसे पहले तो यह समझना होगा कि एक उपभोक्ता एक करदाता भी है और अगर वह इनकम टैक्स नहीं देता तो भी अनेक प्रकार के टैक्स चुकाता है, मतलब यह कि सरकार को अपनी कमाई का कुछ हिस्सा अवश्य देता है। इसलिए सरकार से बिजली, पानी, सड़क, परिवहन जैसी ज़रूरी सुविधाएँ पाने से वह एक उपभोक्ता है और अगर उनमें कोई ख़ामी पाई जाती है वह भी उसके उपभोक्ता अधिकारों के अंतर्गत आती है।मान लीजिए सड़क पर प्रशासन की लापरवाही से गड्ढे, नालों की सफ़ाई न होने से बदबू, धुएँ से सांस लेने में दिक़्क़त, गंदा पानी पीने से बीमारी, दुकानदारों द्वारा फुटपाथ का अतिक्रमण करने से चलने में परेशानी और इसी तरह की दूसरी असुविधाएं होती हैं तो एक उपभोक्ता होने के नाते प्रत्येक नागरिक को मुआवज़ा पाने का अधिकार है। इसी के साथ संबंधित विभाग तथा उसके कर्मचारियों पर जुर्माना लगाने और उन्हें सज़ा देने का प्रावधान होना चाहिए।
इसी तरह स्वास्थ्य सेवाएँ हैं। सरकार द्वारा नागरिकों को अपनी ओर से निःशुल्क सेवाएँ दी जाती हैं। अस्पताल में मुफ़्त इलाज की सुविधा है। यदि इसमें कोई ख़ामी पाई जाती है तो कोई राहत नहीं मिलती क्योंकि इसके लिए पैसे नहीं दिए गये। यह ग़लत है क्योंकि वह करदाता होने से उपभोक्ता है।
तीन वर्ष पहले जो नया उपभोक्ता क़ानून बना है उसमें पहले की भाँति सभी नियम हैं लेकिन जो बदलाव किए गये हैं वे महत्वपूर्ण होने के साथ असरदार भी हैं बशर्ते कि उनके मुताबिक़ काम हो। कहीं उनका भी हश्र दूसरे बहुत से क़ानूनों की तरह न हो जो जनता की भलाई के लिए होने के बावजूद उन पर सही से अमल न होने से बेकार हो जाते हैं।
उपभोक्ता क़ानून की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसमें ऑनलाइन शॉपिंग में धोखा होने पर उपभोक्ता को न्याय दिलाने के लिए व्यवस्था है जिससे निर्माता, विक्रेता और डिलीवरी करने वाली इकाई, तीनों पर क़ानूनी कार्यवाही की जा सकती है। आजकल डिजिटलीकरण के युग में और ट्रैफिक तथा भीड़भाड़ के कारण लोगों की रुचि ऑनलाइन ख़रीदारी में तेज़ी से बढ़ रही है। यह सुगम तरीक़ा है लेकिन ख़तरे भी हैं और जालसाज़ी की गुंजाइश रहती है, इसलिए केवल उन्हीं वेबसाईट का इस्तेमाल करें जो अधिकृत हैं और जिन पर भरोसा किया जा सकता है। इसमें चूक होने पर क़ानून भी बहुत कम मदद कर पाएगा।
इसके अतिरिक्त अब वह सेलिब्रिटी भी ज़िम्मेदार है जिसका विज्ञापन देखकर ख़रीदारी की गई है। इसमें सबसे बड़ी कमी यह है कि जब तक कोई कार्रवाई हो नुक़सान हो चुका होता है और नक़ली वेबसाईट ग़ायब हो जाती है। इसी तरह बहुत सी नामी कंपनियाँ अपने ग्राहकों के साथ अनुचित व्यवहार करती हैं जैसे कि शिकायत को दबा देना और बहाने बनाते हैं कि समुचित काग़ज़ात उपलब्ध नहीं हैं, यहाँ तक कि पैसे वापिस न करने पड़ें इसलिए स्टाफ की कमी या इधर उधर भटकाती हैं।
सरकार को चाहिए कि क़ानून के अंर्तगत यह नियम बनाये कि प्रत्येक निर्माता और सेवा प्रदाता के लिए अपने यहाँ कंज्यूमर रिलेशन अधिकारी की नियुक्ति अनिवार्य हो। उसके लिए समय सीमा निर्धारित हो जिसमें उसे शिकायत को निपटाना ही होगा और ऐसा न करना क़ानून का उल्लंघन होगा तथा जुर्माना या सज़ा देने का प्रावधान हो।
क़ानून में उपभोक्ता अथॉरिटी का भी गठन किया गया है जो एक बेहतरीन कदम है। इसे बने तीन साल हो जायेंगे लेकिन इसके कार्य के बारे में जानकारी का अभाव है। इस पर इस बात की जवाबदेही हो कि यदि कोई निर्माता गड़बड़ी करता है तो उसके ख़लिाफ़ मामले का संज्ञान लेकर स्वयं कार्यवाही की जाये।
हमारे देश में उपभोक्ता आंदोलन अब काफ़ी परिपक्व हो चुका है और ग्राहक अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहते हैं लेकिन नियमों की जानकारी के अभाव और कुछ अपनी लापरवाही के कारण समय सीमा के अंदर शिकायत नहीं करते। ज़रूरी है कि सरकार कि ओर से इनके प्रचार प्रसार के लिये लगातार विज्ञापन और फ़िल्म के ज़रिए जागरूक किया जाए।
शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022
अनैतिक होते हुए भी वेश्यावृत्ति कानूनी मान्यता प्राप्त व्यवसाय है
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सत्रह दिसंबर को एक ऐसा दिवस मनाया जाता है जिसका संबंध वेश्यावृत्ति व्यवसाय को आदर और सम्मान दिलाना तथा इसमें शामिल व्यक्तियों के जीवन को सुरक्षित बनाना है । अमेरिका के सीएटल में ग्रीन रिवर किलर रूप में कुख्यात व्यक्तियों द्वारा वेश्याओं की बेरहमी से हत्या की घटनाएं इसकी प्रेरक थीं। सन 2003 से यह दिन सेक्स वर्करों, उनकी पैरवी करने वालों, मित्रों और परिवारों द्वारा मनाया जाता है।
वेश्यावृत्ति के प्रति नज़रिया
वेश्याओं के साथ हिंसक व्यवहार के खिलाफ़ यह दिवस मनाने का उद्देश्य यही है कि दुनिया भर में इस व्यवसाय में लगे लोगों के प्रति नफ़रत दूर करने और उनके साथ दुव्र्यवहार और भेदभाव करने से लेकर हिंसक बर्ताव करने की मानसिकता को कम करते हुए समाप्त किया जा सके। आम तौर से इनके साथ हुई मारपीट, हिंसा और हत्या की घटनाएं सामाजिक चेतना के अभाव में उजागर नहीं हो पातीं और अपराधी को कोई दंड नहीं मिलता।
वास्तविकता यह है कि हम चाहे जो भी कहें, इस व्यवसाय में लगे लोग हमारे आसपास रहने वाले समाज और परिवारों से ही आते हैं। लाल छतरी इनके अधिकारों का एक महत्वपूर्ण चिह्न है और इसका चलन सबसे पहले इटली के वेनिस शहर में सेक्स वर्करों द्वारा सन 2001 में किया गया था। उसके बाद इसे व्यापक रूप से मान्यता मिली।
भारत में वेश्यावृत्ति का इतिहास बहुत पुराना है और राजा महाराजा, नवाब और समाज के प्रतिष्ठित लोगों द्वारा मान्यता भी मिली। इन्हें नर्तकी, गणिका, देवदासी तथा अन्य जो भी अनेक नाम दिए गए, समाज और परिवार में इनके प्रति घृणा कम नहीं हुई। इनका शोषण, इनके साथ अपमानजनक और अमानवीय व्यवहार तथा हर किसी का इन्हें दुत्कारा जाना, हमेशा से मामूली बात समझा गया।
हमारे देश में ऐसे बहुत से शहर, कस्बे और गांव हैं जहां वेश्यावृत्ति एक व्यवसाय है । परिवार के लोग अर्थात पिता और भाई ही इसे चलाते हैं।
गुजरात का वाडिया गांव जो राजस्थान की सीमा से लगे उत्तरी गुजरात के बनासकांठा ज़िले में है, वहां सरानिया घुमंतु कबीले के पुरुष अपने परिवार की महिलाओं का सौदा करते हैं और लड़कियों को छोटी उम्र से ही वैश्या बनने और लड़कों को इनके लिए ग्राहक ढूंढने का प्रशिक्षण देते हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले का नटपुरवा गांव है जहां बच्चों को उनके पिता का नाम नहीं मालूम और वे अपनी मां के नाम से जाने जाते हैं। कर्नाटक में बेल्लारी और कोप्पल जिले में देवदासी बस्ती है जहां कन्या के कौमार्य की नीलामी होती है। हालांकि 1982 में देवदासी प्रथा को समाप्त कर दिया गया था लेकिन महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में आज भी यह प्रचलन में है। इसमें कोई संदेह नहीं कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में यह व्यवसाय अनेक रुकावटों के होते हुए भी प्रचलित है और पनप रहा है।
व्यवसाय के रूप में मान्यता
भारत में इस व्यवसाय में लगे पुरुषों और महिलाओं की संख्या कितनी है, इसके बारे में कोई निश्चित आंकड़ा नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने इसे एक व्यवसाय के रूप में हाल ही में मान्यता दी है और पुलिस को हिदायत दी है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी मर्ज़ी से इस व्यवसाय में है तो उसके काम में दखलंदाजी न करे और उसे अपराधी न माने।
किसी भी व्यक्ति को वयस्क होने पर अपनी रजामंदी से यह व्यवसाय करने का अधिकार है। उसे भी किसी अन्य व्यक्ति की तरह सुरक्षा, आदर और सम्मान पाने का कानूनी अधिकार है। इससे यह नहीं समझना चाहिए कि इससे उन लोगों को भी राहत मिलेगी जो नारी शोषण और उन्हें इस धंधे में जबरदस्ती या लालच देकर धकेलने के लिए जिमनेदार हैं।
गैरकानूनी न होते हुए भी वेश्यावृत्ति के अंतर्गत आने वाली बहुत सी गतिविधियां दंडनीय है जैसे कि दलाली और वेश्यालय के लिए किराए पर जगह देना।
असल में हमारे देश में वेश्यावृत्ति को लेकर कोई प्रभावी कानून नहीं है जिसके कारण जिसके जो मन में आता है, किसी भी न्यायिक फैसले का अर्थ लगा लेता है। सबसे अधिक असर उन बच्चों पर पड़ता है जो ऐसे माहौल में परवरिश पाते हैं जिसमें उनके साथ भेदभाव होना सामान्य बात है। उनकी शिक्षा का कोई प्रबंध न होने से वे इसी काम में लग जाते हैं। पुलिस और समाजसेवी संस्थाओं द्वारा छापे की कार्यवाही से इन बच्चों को कुछ राहत मिलती है और एक उम्मीद होती है कि इनका जीवन बेहतर हो।
इस पेशे को अपनी मर्ज़ी या किसी मजबूरी से अपनाने वाले व्यक्तियों के लिए शिक्षा और किसी प्रकार के व्यावसायिक प्रशिक्षण का प्रबंध होने से ही उनका जीवन बदल सकता है। इसके लिए कुछ ऐसा कानून बनाने की दिशा में पहल की जानी चाहिए कि यदि इस व्यवसाय को छोड़कर कोई महिला कुछ और करना चाहती है और अपनी संतान का भविष्य बनाना चाहती हैं तो उसे सरकार तथा सामाजिक संगठनों द्वारा आर्थिक सहायता मिले। उसके लिए पुनर्वास योजना बनाई जाए और इस तरह का वातावरण बने कि वह सामान्य जीवन जी सके। उसके नाम के साथ जुड़ा सेक्स वर्कर का ठप्पा हटे और गलत काम करने का एहसास हावी न रहे।
यह भी आवश्यक है कि जिन कारणों से कोई महिला इस व्यवसाय को अपनाती है, उन्हें दूर किया जाए। सबसे पहले यह बात आती है कि यदि बहका फुसला कर, दवाब डालकर, लोभ लालच देकर कोई व्यक्ति किसी महिला को इस व्यवसाय में आने के लिए मजबूर करता है तो उसे सज़ा का डर हो। देखा जाए तो हमारे यहां महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को लेकर बहुत से कानून हैं लेकिन उनके प्रावधान इतने लचीले और भ्रम पैदा करने वाले हैं कि दोषी व्यक्ति बच जाता है और जो प्रताड़ित है, साधनहीन है, वह फंस जाता है और सज़ा पाता है।
वेश्यावृत्ति के पनपने का सबसे बड़ा कारण नैतिक मूल्यों का ह्रास, सामाजिक चेतना का अभाव, गरीबी और अशिक्षा है। यदि इस दिशा में काम किया जाए तो इस व्यवसाय को अपनाने के प्रति आकर्षण सहज रूप से कम होते हुए एक दिन पूरी तरह समाप्त हो सकता है। अभी इसे जो अपनाते हैं, उनके लिए यह बहुत आसान लगता है और अधिकतर लोगों के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं होता।
बहुत से देशों में यह व्यवसाय सम्मानजनक और कानूनी मान्यता तथा संरक्षण प्राप्त है। सेक्स वर्करों के बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा की व्यवस्था है। इन्हें सामाजिक सम्मान प्राप्त है और इनके साथ जबरदस्ती या हिंसक व्यवहार करने पर दण्ड दिया जाता है। इन्हें एक इंसान की तरह देखा जाता है और इनके साथ अपमानजनक शब्द इस्तेमाल नहीं किए जा सकते।
हमारे देश में भी कुछ ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे इस व्यवसाय के प्रति आकर्षण समाप्त हो। जिन्होंने इसे अपनाया है, उनके प्रति इंसानियत का नज़रिया हो और उन्हें सहज रूप में सामान्य नागरिक अधिकार मिलें।
शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022
दिव्यांग व्यक्ति को भय, अपराध और हीन भावनाओं से मुक्त रहना होगा
जब हम किसी ऐसे व्यक्ति से मिलते या उसे देखते और सुनते हैं जो किसी शारीरिक या मानसिक कमी से पीड़ित है तो दया दिखाते हैं या चिढ़ जाते हैं। उसके लिए सहानुभूति प्रकट करते हैं या उसे दूर हटने के लिए कहने से लेकर फटकार तक लगा देते हैं।
यह अभिशाप नहीं
मनुष्य की इन्हीं हरकतों को देखकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने तीस वर्ष पहले प्रति वर्ष 3 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिव्यांग दिवस मनाने की शुरुआत की ताकि सभी प्रकार से ठीकठाक लोग ऐसे व्यक्तियों का अनादर न करें और उन्हें अपने जैसा ही सामान्य जीवन जीने देने में सहायक बनें।
आज दुनिया भर में लगभग पचास करोड़ लोग किसी न किसी प्रकार से दिव्यांग होने के कारण ज़िंदगी को जैसे तैसे ढोने के लिए बाध्य हैं। भारत में यह संख्या तीन करोड़ के आसपास है जिनमें से ज्यादातर गांव देहात में रहते हैं और बाकी छोटे बड़े शहरों में किसी तरह अपना जीवन चला रहे हैं।
हकीकत यह है और जोकि अपने आप में बहुत बड़ा सवाल भी है कि शारीरिक हो या मानसिक, दिव्यांग व्यक्तियों को परिवार और समाज अपने ऊपर बोझ समझने की मानसिकता से ग्रस्त रहता है। उसके बाद ऐसे लोग समाज की हिकारत का शिकार बनते जाते हैं और इस तरह देश के लिए भी निकम्मे बन जाते हैं।
दूसरे दर्जे के नागरिक
सरकार को क्योंकि इन लोगों को लेकर समाज में अपनी अच्छी छवि बनानी होती है तो वह इनकी देखभाल, स्वास्थ्य, रोज़गार को लेकर जब तब योजनाएं बनाती रहती है। इनके पीछे यह उद्देश्य बहुत कम रहता है कि उन्हें समाज में बराबरी का दर्ज़ा मिले बल्कि यह रहता है कि वे दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर सरकार की मेहरबानी से किसी तरह जीवित रहें। मिसाल के तौर पर उन्हें केवल चटाई बनाने, टोकरी बुनने और थोड़े बहुत दूसरे काम जो उनके लिए हाथ की कारीगरी से हो सकते हों, के योग्य ही समझा जाता है।
हालांकि सरकार ने शिक्षा और नौकरी में उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था की हुई है लेकिन उनके लिए पढ़ाई लिखाई के विशेष साधन न होने से वे अनपढ़ ही रह जाते हैं और जब पढ़ेंगे नहीं तो नौकरी के लिए ज़रूरी शैक्षिक योग्यता को कैसे पूरा करेंगे, इसलिए उनके लिए आरक्षित पद ख़ाली पड़े रहते हैं। आंकड़े बताते हैं कि उनकी आधी आबादी को अक्षर ज्ञान तक नहीं होता और बाकी ज्यादा से ज्यादा चैथी कक्षा तक ही पढ़ पाते हैं। ऐसी हालत में उनकी किस्मत में बस कोई छोटा मोटा काम या फिर भीख मांगकर गुज़ारा करना लिखा होता है।
उल्लेखनीय है कि दिव्यांग व्यक्तियों ने ही अपने लिए ऐसे साधन जुटाए हैं जिनसे वे एक आम इंसान की तरह जी सकें। इसका सबसे बड़ा उदाहरण लुईस ब्रेल हैं जिन्होंने ब्रेल लिपि के आविष्कार से नेत्रहीन व्यक्तियों के जीवन को उम्मीदों से भर दिया। परंतु यहां भी मनुष्य ने अपनी भेदभावपूर्ण नीति को नहीं छोड़ा और उनके लिए ब्रेल लिपि में केवल वही सामग्री तैयार कराने को प्राथमिकता दी जिससे वे केवल सामान्य ज्ञान प्राप्त कर सकें न कि उनकी योग्यता को परखकर विभिन्न विषयों जैसे कि मेडिकल, इंजीनियरिंग जैसे विषयों की पाठ्य पुस्तकें तैयार कराने पर जोर दिया जाता।
जहां तक किसी अन्य रूप से दिव्यांग व्यक्तियों जैसे कि सुनने, बोलने, किसी अंग के न होने या विकृत होने का प्रश्न है तो उनके लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं है कि वे सामान्य विद्यार्थी की तरह शिक्षा प्राप्त कर सकें। इसी के साथ उनकी मदद करने के लिए बनाए जाने वाले उपकरण भी इतने महंगे और साधारण क्वालिटी के होते हैं कि वे कुछ ही समय में इस्तेमाल करने लायक नहीं रहते। हमारे देश में अभी तक आने जाने के साधनों तक में दिव्यांग व्यक्तियों के लिए ज़रूरी साधनों और उपकरणों का अभाव है।
जिसके पास पैसा है, साधन हैं या उसके असरदार लोगों से संबंध हैं, तो वह तो देश हो या विदेश कहीं से भी अपने लिए सब से बढ़िया इक्विपमेंट मंगवा सकता है लेकिन शेष दिव्यांग व्यक्तियों के जीवन में कुछ खुशी तब ही आ पाती है जब वे स्वयं अपने बलबूते पर और आपस में मिलजुलकर अपने लिए कुछेक सुविधाओं को जुटाने में अनेक कठिनाइयों के बावजूद सफल हो पाते हैं।
हमारे देश में ऐसी निजी संस्थाएं, एनजीओ हैं जिन्होंने बिना सरकारी या गैर सरकारी सहायता से अपने जीवन को सुखी और खुशहाल बनाया है। एक उदाहरण है। एनटीपीसी, टांडा के लिए फिल्म बनाते समय एक ऐसी क्रिकेट टीम से मुलाकात हुई जिसमें सभी खिलाड़ी नेत्रहीन थे, यहां तक कि उनके प्रशिक्षक भी। उन्होंने एक ऐसी गेंद बनाई जिसमें उसे फेंकने पर आवाज होती थी और बल्लेबाज उसे सुनकर बैटिंग करता था। इसी प्रकार फील्डर भी आवाज से ही उसे मैदान में पकड़ने के लिए भागता था। क्रिकेट खेलने के लिए सभी नियम जिनका पालन आसानी से संभव हो सके, वे सब इस टीम ने सीख लिए थे और वे मज़े से खेल का आनंद ले रहे थे।
दिव्यांग होने से बचाव
अब हम इस बात पर आते हैं कि क्या दिव्यांग होने से बचा जा सकता है ? जहां तक जन्म के समय होने वाली विकृतियों का संबंध है तो केवल थोड़ी सी सावधानी बरतने से इनसे बचा जा सकता है। गर्भवती महिला को प्रसव होने तक गर्भ में पल रहे शिशु और अपनी सेहत का ज्ञान और ध्यान रखने से यह बहुत आसान है। अल्ट्रासाउंड एक ऐसी तकनीक है जो गर्भ में हो रही किसी भी विकृति का पता लगा सकती है। यदि इस बात की ज़रा भी संभावना हो कि गर्भ में कोई भी विकार हो तो गर्भपात करा लेना ही समझदारी है क्योंकि विकलांग शिशु का पालन बहुत चुनौतीपूर्ण और कष्टदायक होता है। कानून भी इसकी इजाज़त देता है।
ऐसी दिव्यांगता जो सामान्य जीवन के दौरान हुई हो जैसे कि किसी दुर्घटना का शिकार हुए हों, युद्ध में हताहत होने से कोई अंग खो बैठे हों या फिर किसी अन्य परिस्थिति के कारण अक्षम हो जाएं तो यह न समझते हुए कि ज़िंदगी समाप्त हो गई है, इसे सहज भाव से स्वीकार कर लें और उसके अनुरूप जीवन जीने की बात मानने के लिए अपने मन और शरीर को तैयार करें तो लगेगा ही नहीं कि दिव्यांग हैं।
दिव्यांग होने की सबसे कड़ी और कठिन परिस्थिति तब होती है जब शरीर से अधिक मानसिक तनाव से ग्रस्त व्यक्ति किसी तरह अपना जीवन जीने की कोशिश करता है। अक्सर वह इसमें हार जाता है और अकेलेपन की भावना को अपने मन पर हावी होने देने के बाद आत्महत्या करने में ही अपना भला समझने लगता है।
मानसिक उलझनों या व्याधियों से जूझ रहे व्यक्तियों को भी दिव्यांग माने जाने की आवश्यकता है और उनके लिए भी विशेष उपाय किए जाने चाहिएं जैसे कि आसानी से मिलने वाली काउंसलिंग और समाज में ऐसे व्यक्ति को स्वीकार करने की मानसिकता और परिवार का समर्थन तथा उन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ऐसे उपाय जिनसे वह उबर सके।
आम तौर से अपने साथ हुए भयानक हादसे जैसे बलात्कार, शारीरिक उत्पीड़न और किसी की धोखाधड़ी का शिकार होने पर अपना सब कुछ गवां देने के बाद मनुष्य की मानसिक स्थिति उलट पलट हो जाती है। वह स्वयं इन चीजों से ऊपर उठने की कितनी भी कोशिश करे, सफल नहीं हो पाता। ऐसे व्यक्तियों की संख्या आज के भौतिकतावादी युग में बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। इनके लिए ज़रूरत है कि ऐसे विद्यालयों, विशेष शिक्षा पाठ्यक्रमों, प्रयोगशालाओं और काउंसलिंग इकाईयों की स्थापना हो जहां उनके उपचार की आधुनिक टेक्नोलॉजी पर आधारित व्यवस्था हो। इसके बाद सबसे अधिक ज़रूरी है कि मानसिक रूप से दिव्यांग व्यक्तियों को चिकित्सा के लिए तैयार करना। दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में कुछ ऐसे संस्थान हैं जो मानसिक बीमारियों से मुक्ति प्राप्त करने वाले व्यक्तियों ने शुरू किए हैं। इनके बारे में इंटरनेट पर काफी कुछ उपलब्ध है।
दिव्यांग होना कोई अभिशाप नहीं है, इसलिए यह कतई सही नहीं है कि यदि कोई इस श्रेणी में है तो वह अपने आप को दीन हीन समझे, दूसरों की दया या सहानुभूति की उम्मीद पर जिए, डरता रहे या फिर इसे अपना अपराध समझे। सत्य यह है कि जब वह स्वयं अपनी कमान संभालेगा तो वह किसी भी क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित करने में सक्षम हो पाएगा।
शुक्रवार, 25 नवंबर 2022
संविधान दिवस पर इसके महत्व पर मंथन आवश्यक है
26 नवंबर देश के जीवन में एक महत्वपूर्ण तिथि है । इस दिन देश की दिशा निर्धारित हुई, संविधान के अनुसार चलने की प्रक्रिया आरंभ हुई और स्वतंत्र भारत के नए अध्याय की शुरुआत हुई। जिस प्रकार आज आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है और अब तक की उपलब्धियों तथा कमियों पर विचार विमर्श किया जा रहा है, उसी तरह संविधान और उसके अंतर्गत बने कानूनों एवं उन्हें लागू करने वाली व्यवस्था के बारे में बातचीत करना आवश्यक हो गया है। संविधान दिवस के अवसर पर यह और भी जरुरी है।
सर्वोच्च पद और संविधान
सबसे पहली बात तो यह है कि वर्तमान संविधान के अनुसार किसी भी संवैधानिक पद और प्रशासनिक पदों पर भी प्रधान मंत्री की सिफारिश पर ही राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति की जाती है। यहां तक कि राष्ट्रपति पद पर नियुक्ति के लिए भी उसी की राय सबसे महत्वपूर्ण होती है। राज्यपाल, मुख्य न्यायाधीश, चुनाव आयुक्त से लेकर अंतिम निर्णय करने वाले सभी पदों पर, कहना चाहिए, उसी की मर्जी चलती है।
बेशक कहा जाए कि प्रधान मंत्री किसी एक दल का नहीं, सब का होता है लेकिन वास्तविकता यही है कि देश में सत्तारूढ़ दल का वर्चस्व, अधिकार और उसका मनमानापन बढ़ता है और इस पद पर आसीन व्यक्ति सब कुछ करने में सक्षम होता है और ऐसा इसलिए संभव है क्योंकि संविधान में इसकी व्यवस्था है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण एक प्रधान मंत्री द्वारा आपातकाल का लगाया जाना है।
इस तरह सबसे पहले प्रधान मंत्री के अधिकारों पर संविधान द्वारा दी गई छूट या व्यवस्था पर फिर से विचार करना जरूरी है ताकि कोई भी व्यक्ति निरंकुश न हो सके।
संविधान में भेदभाव
इसके बाद इस बात पर आते हैं कि हमारे संविधान में समानता, धर्म, सेकुलर होने तथा अन्य बातों को लेकर जो व्यवस्था दी गई हैं, वर्तमान समय में उनका क्या उपयोग तथा कैसा दुरुपयोग हो रहा है।
जहां तक समानता की बात है तो इस पर गंभीरता से विचार किया जाए कि इससे क्या लाभ और क्या हानि हो रही है। मिसाल के तौर पर क्या कभी अमीर और गरीब, अधिकारी और आधीन, ताकतवर और कमजोर तथा शासक और प्रजा एक समान हो सकते हैं ? कभी नहीं !
इस स्थिति पर चिंतन कीजिए । यदि कोई व्यक्ति किसी अपराध के लिए सजा पा चुका है, वह किसी सरकारी, पब्लिक सेक्टर और निजी क्षेत्र में भी नौकरी करने के अयोग्य हो जाता है। यहां तक कि अपना रोजगार, व्यापार या व्यवसाय करना भी आसान नहीं होता। वह सरकारी सहायता, विभिन्न योजनाओं के तहत मिलने वाली आर्थिक मदद, बैंक का सहयोग और जनता की सहानुभूति से भी वंचित हो जाता है । इस के विपरीत किसी साधारण या संगीन जुर्म में जेल में रहकर भी घोषित अपराधी चुनाव लड़ सकता है, सांसद, विधायक, मंत्री बनकर कानून बनाने वाला बन सकता है। यह इसलिए संभव है क्योंकि संविधान इसकी इजाजत देता है। क्या इस व्यवस्था पर नए सिरे से विचार नहीं होना चाहिए ? हकीकत यह है कि दोनों ही वेतन और दूसरे भत्ते पाते हैं, समय सीमा से बंधे हैं लेकिन व्यवहार के मामले में यह सीधे पक्षपात है लेकिन संवैधानिक है इसलिए मान्य है।
इसके बाद बात करते हैं धर्म की, तो इसमें यह है कि सभी देशवासी अपने धर्म का पालन और उसके अनुरूप बर्ताव कर सकते हैं। इसका मतलब यह है कि यदि एक धर्म के मानने वाले कहते हैं कि उनके लिए संविधान और उसके अंतर्गत बने कानूनों को मानने से ज्यादा जरूरी है कि वे अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चलें और क्योंकि संविधान इसकी अनुमति देता है तो वे वही करेंगे जो उनके धर्म के मुताबिक है। इसके लिए चाहे उन पर कट्टर होने का ही आरोप क्यों न लगे
धर्म के पालन की संवैधानिक व्यवस्था होने से और अपने धर्म को सब से बड़ा मानने की मनस्थिति से विवाद, संघर्ष, आंदोलन से लेकर उन्माद तथा दंगे फसाद तक के नजारे देखे जा सकते हैं। यही नहीं अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए प्राचीन परम्पराओं, बेमतलब के रीति रिवाजों, मान्यताओं, कुरीतियों, अंधविश्वास, दिखावा, पाखंड और इंसानियत तक के विरोध में जनमानस को नुकसान पहुंचाने वाले कारनामें करना बहुत आसान हो जाता है। यह इसलिए क्योंकि संविधान में अपने धर्म के नाम पर कुछ भी करने की इजाजत है।
अब जरा इस बात पर गौर कीजिए कि चाहे कितने भी अपराधियों को सबूत के अभाव में छोड़ना पड़े और किसी भी निरपराध को उसके निर्दोष होने का प्रमाण न होने से जेल में बंद होना पड़े तो यह संवैधानिक और कानून के मुताबिक है और इसकी कोई अपील या दलील नहीं हो सकती। क्या यह सही संवैधानिक व्यवस्था है और क्या यह उसके दुरुपयोग की श्रेणी में नहीं आती ? तो क्या इस विसंगति को रोकने के लिए फिर से विचार करना जरूरी नहीं है ?
आज हमारी अदालतों द्वारा दिए गए ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो उसके अन्याय के प्रतीक हैं लेकिन उन्हें मानने के लिए बाध्य हैं क्योंकि वे कानून के मुताबिक हैं। और यह जो पीढ़ियों तक चलने वाले मुकदमों के भंडार हमारी अदालतों में लंबित पड़े हैं, वे संविधान के अनुसार बनी न्यायिक व्यवस्था की नाकामी नहीं तो और क्या है?
उल्लेखनीय है कि जिस समय संविधान बनाया जा रहा था तब स्थितियां बिल्कुल भिन्न थीं, इसमें शामिल विद्वान अंग्रेजी हुकूमत के दौर के गवाह थे और उनकी सोच का दायरा गुलामी की परिधि से बाहर निकलने तक सीमित था। उन परिस्थितियों में जो उन्होंने किया, वह तर्कसंगत था और संविधान के रचने में उनका योगदान सर्वोत्तम था। उन्होंने जैसे भारत की कल्पना की होगी, उनकी दृष्टि में उससे बेहतर कुछ और नहीं था। परंतु वास्तविकता यह है कि आजाद भारत की जरूरतें, उसके अनुभव, संसाधन और वैश्विक स्तर पर देश की प्रगति का अनुमान उन्हें नहीं हो सकता था।
इसी तरह की बहुत सी धाराएं, व्यवस्थाएं हैं जो आज बेमानी हो गई हैं, यहां तक कि मूलभूत अधिकारों को लेकर भी वक्त गुजरने के कारण बहुत सी विसंगतियां पैदा हो गई हैं जो संविधान बनाते समय नहीं थीं। मौलिक अधिकार, समानता का सिद्धांत, धर्म के अनुसार आचरण, आरक्षण व्यवस्था, जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव जैसी बहुत सी बातें हैं जिन पर नए सिरे से विचार करना जरूरी है।
परिवर्तन कैसा हो
जब ऐसा है तो क्या इसमें कोई बुराई है कि संविधान में कही गई बहुत सी ऐसी बातें जो वर्तमान समय से मेल नहीं खाती, उन्हें बदलने की दिशा में काम किया जाए ?
बेहतर रहेगा कि एक ऐसी संवैधानिक पीठ का गठन किया जाए जिसमें सभी मान्यताप्राप्त राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि हों, सामाजिक संगठनों के गणमान्य व्यक्ति हों और समाज के वे लोग हों जिन्होंने किसी भी क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित किए हों। इनमें वैज्ञानिक, व्यापारी, व्यवसाय करने वाले, अर्थशास्त्री, नौकरीपेशा, शिक्षा, खेल और उन सभी चीजों से जुड़े लोग हों जो वर्तमान समय की आवश्यकताएं हैं। यदि ऐसा हो तो जब हम संविधान का अमृत महोत्सव मना रहे हों तो एक नए शोध पर आधारित संविधान की रचना हो चुकी हो। वैसे भी हम संविधान संशोधन के जरिए काफी कुछ बदल चुके हैं तो एक बार इसके संपूर्ण आकार के बारे में ही सोच विचार कर लिया जाए तो यह एक सही शुरुआत होगी।
शुक्रवार, 18 नवंबर 2022
दिन अशुभ हो, क्या इसकी कामना की जा सकती है ?
आम तौर पर इस बात की उम्मीद की जाती है कि दूसरे आप के लिए आपका दिन शुभ रहने की बात कहें, ऐसे संदेश भेजें जिनसे लगे कि वे शुभचिंतक हैं, जब कुछ कहीं से खरीदें तो सामान तो मिले ही, साथ में बेचने वाला शुक्रिया कहे। परंतु यदि विक्रेता मुस्कराते हुए कहे कि आपका दिन अशुभ हो तो अटपटा लगना स्वाभाविक है।
अजब गजब संसार
इंटरनेट पर कुछ न कुछ खोजने की आदत सी पड़ गई है। ऐसे ही निगाह पड़ी कि एक दंपति ने न जाने किस परिस्थिति में एक दिन जो 19 नवंबर था, दूसरों को उनका दिन अशुभ होने की कामना करने की शुरुआत कर दी। यह अटपटा तो था लेकिन अपने अंदर छिपी भावनाओं को बिना किसी लागलपेट के कहने का साहस भी लगा।
अब यह जरूरी तो नहीं कि मन में प्रत्येक व्यक्ति के लिए उनके दिन के शुभ होने की कामना की जाए। दुकानदार या वस्तु विक्रेता द्वारा उसके यहां से कुछ खरीदने पर ग्राहक का दिन खराब होने या अशुभ होने की मुस्कराते हुए की गई कामना अजब है तो गजब भी है और वह भी चेहरे पर मुस्कान के साथ।
अक्सर हम बिना बात किसी को भी और विशेषकर आधुनिक दौर में उसके दिन के शुभ होने की कामना करते हैं । व्हाट्सएप, फेसबुक और दूसरे संवाद साधनों को खोलते ही न जाने किस किस से दिन भर खुश रहने के संदेश मिलते रहने से एक तरह की खीज सी होती है। कोई काम की बात तो की नहीं, बस शुभ प्रभात, आपका दिन शुभ हो, आप खुश रहें जैसे संदेश और साथ में कैसी भी फोटो जिसका कोई मतलब समझ नहीं आता। इसे मिटाने या डिलीट करने का मन करता है। कुछ ग्रुपों में यह ताकीद भी होती है कि इस तरह के संदेश न भेजें जाएं क्योंकि यह सब एक जैसे होते हैं और इन्हें पढ़ना समय नष्ट करना है।
भगवान भला करे
भारतीय संस्कृति में किसी के अपमान करने, बुरा भला कहने पर या फिर लड़ाई झगड़ा टालने के लिए यह कहने की परंपरा है कि भगवान तेरा भला करे। मतलब कि मेरे साथ अच्छा नहीं किया तो कोई बात नहीं लेकिन मेरी तरफ से बात समाप्त, अब जो भी है वह ईश्वर या ऊपर वाला है, वह देख लेगा। इस एक वाक्य, इच्छा या कामना से किसी विवाद का अंत न भी हो पर उसकी शुरुआत तो हो ही जाती है। हो सकता है कि वक्त गुजरने के साथ मन की कटुता और बदला लेने की भावना अपने आप धीरे धीरे कमजोर पड़ते हुए गायब ही हो जाए।
जीवन में यह संभव नहीं कि उतार चढ़ाव न हों, इसी लिए कहा जाता है कि वक्त के गुजरने का इंतजार किया जाए। जब समय एक जैसा रहना ही नहीं तो फिर सुख हो या दुःख, क्या अंतर पड़ता है! अगर यह न हो तो जिंदगी एकदम सपाट हो जाएगी, न कोई उत्साह, रोमांच या कुछ नया होने का इंतजार, क्या ऐसा जीवन बोरियत से भरा नहीं होगा ?
इसे इस तरह भी लिया जा सकता है कि जो होने वाला है, उसके बारे में अनुमान तो लगाया जा सकता है लेकिन निश्चित कुछ नहीं कहा जा सकता। यही स्थिति मनुष्य को कुछ न कुछ करते रहने के लिए बाध्य करती रहती है और अगर यह न हो तो जीवन नीरस हो जायेगा जिसे जीने को भी मन नहीं चाहेगा। जब तक मन में यह बात रहती है कि ऊंट किस करवट बैठेगा, तब तक जिंदगी जीने लायक लगती है।
यह एक मनोरंजक स्थिति है कि मन में कुछ और हो और कहना या करना कुछ और पड़े तो सोच कैसी होगी ? ऐसे क्षण अक्सर आते हैं जिनमें चाह कर भी अपनी वास्तविक भावनाओं को व्यक्त करना तो दूर, ऐसा सोचते हुए भी डर लगता है कि अगर गलती से भी यह प्रकट हो गया कि हमारे मन में क्या है तो न जाने कैसा तूफान आ जाएगा। और यही डर हमसे वह करा लेता है जो हम करना नहीं चाहते। शायद ऐसी ही स्थिति रही होगी जब उस दंपति ने शुभ की जगह अशुभ दिन होने की कामना करने की शुरुआत की। कहा जा सकता है कि यह एक तरह से अपने मन में छिपे अंजाने भय से मुक्ति पाने की क्रिया है जो अक्सर सही समय पर सही बात कहने के लिए तैयार करती है।
न कहने या करने की हिम्मत
यदि इस बात को व्यापक संदर्भ में देखा जाए तो एक तरह से अपने मन में जो कुछ भी हो, उसे कहने की हिम्मत आ जाए तो बहुत से ऐसे निर्णय लेना आसान हो जाएगा जिनके बारे में मन में दुविधा या संशय रहता है।
मान लीजिए, परिवार के बीच कोई मतभेद है और संकोचवश मन की बात कह नहीं पा रहे हैं तो उससे मिलने वाले लाभ या हानि का सही अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। इसी तरह नौकरी, व्यापार या कोई सौदा करते समय अपनी बात रखने में हिचकिचाहट हो गई तो अर्थ का अनर्थ हो सकता है। आपके बारे में गलत राय बन सकती है जो आगे चलकर किसी बड़ी परेशानी या चुनौती का कारण बन सकती है। क्षण भर की चुप्पी जीवन का जंजाल बन सकती है।
इसका और भी विस्तार करें या देशव्यापी संदर्भ में देखें तो व्यक्ति के चुप रह जाने से राजनीति में गलत व्यक्ति का चुनाव हो जाता है। हमारा भ्रम हानिकारक हो जाता है और जो चतुर और चालाक है, वह अयोग्य होते हुए भी हम पर शासन करता है। यहीं से रिश्वत लेने देने तथा भ्रष्ट होने की शुरुआत होती है। यही स्थिति अगर परिवार में हो तो उसके बिखराव का कारण बन जाती है। अपने ही घर में बेगाना होने का एहसास अनेक समस्याओं को जन्म देता रहता है जिसका परिणाम परिवार में बंटवारा ही होता है।
इस दिन को यदि सही ढंग से मनाया जाए और चाहे किसी को अच्छा लगे या बुरा, बिना मुंह बनाए या नाक भौं सिकोड़े, हलकी सी मुस्कान के साथ जो सोचते हैं, वह कह दिया जाए तो मन में अफसोस नहीं रहेगा। इससे सामने कुछ और, पीछे उसके विपरीत आचरण करने से भी मुक्ति मिल जाएगी।