शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

तीन तलाक बिल के बाद कश्मीर को भी बेड़ियों से मुक्त कीजिए









कुरीतियाँ या कुप्रथाएं जब परम्परा बन जाती हैं और जन सामान्य के बीच स्वीकार भी कर ली जाती हैं तब उन्हें समाप्त करना समाज या सरकार के लिए मुश्किल और जोखिम भरा हो जाता है।

तीन तलाक की प्रथा भी इसी श्रेणी में आती थी जिसे अब कानून बनाकर खत्म करने का सराहनीय प्रयास किया गया है। इससे जहाँ मुस्लिम समाज के बहुत बड़े वर्ग द्वारा इसका स्वागत किया गया है वहीं कुछ कट्टर लोग इसका विरोध करते हुए उच्चतम न्यायालय द्वारा इसे खारिज कराने की फिराक में भी हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि वे अपने मंसूबों में कामयाब न हो।


ऐसी ही एक प्रथा निकाह हलाला है जो इतनी अमानवीय है कि ज्यादातर मुस्लिम समाज उसके विरोध में नजर आता है। परंतु वह है तो सही चाहे छोटे तबके के बीच हो। कदाचित उसे भी समाप्त करने के लिए कानून बनाने की जरूरत पड़े।


इसी तरह की कुप्रथाएं सभी धर्मों में होंगी जो एक बार चलन में आ गयीं और समाज के बड़े वर्ग में स्वीकार कर ली गयीं तो फिर उन्हें समाप्त करना टेढ़ी खीर हो जाता है।
हिन्दू समाज में बाल विवाह, दहेज, छुआछूत जैसी कुरीतियाँ कानून बनाने पर भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई हैं।


असल में इन्हें केवल कानून से समाप्त करना एक ऐसी बचकानी सोच है जिससे बाहर निकलना जरूरी है और इसके बदले परिपक्वता के साथ इन बुराइयों को दूर करने की कोशिश की जाए तो उसमें सफलता मिल सकती है।


देखा जाए तो सभी बुराइयों की जड़ शिक्षा का अभाव, जीवन यापन और रोजगार के पर्याप्त साधन न होने से गरीबी का होना और सही राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व का न होना है। यदि प्रत्येक व्यक्ति तक राष्ट्र की सम्पत्ति और संसाधनों का उचित बँटवारा हो जाए तो फिर सामाजिक कुरीतियाँ हों या धार्मिक पाखंड और ऊँच नीच की भावना तो इनका समाप्त होना निश्चित है।


कश्मीर और भेदभाव


इसे कुप्रथा तो नहीं कहा जा सकता बल्कि अपने को दूसरों से अलग ही नहीं बल्कि श्रेष्ठ समझने की मानसिकता कहा जा सकता है। कश्मीर के साथ भी ऐसा ही हुआ है।
यह ‘लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पाई’ का भी उदाहरण है जब जम्मू कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के बाद भी वहाँ अस्थाई तौर पर ही सही पर कुछ ऐसी विशेष रियायतें दी गयीं और वे भी संविधान के जरिए कि वे आज तक देशवासियों के साथ भेदभाव रूपी गले की हड्डी और इस राज्य की प्रगति का रोड़ा बनी हुई हैं।


धारा 370 और 35ए


संविधान में ये धाराएँ टेम्परेरी, हटाई जा सकने वाली और कुछ समय के लिए विशेष सहायता देने के लिए जोड़ी गयीं थीं। उस समय के प्रशासकों ने ऐसी परिस्थितियाँ बना दीं कि ये एक तरह से स्थाई ही बन गयीं और अब इन्हें हटाने की बात करते ही खूनखराबे तक की धमकियाँ आने लगती हैं।

इन प्रावधानों के कारण ही इस राज्य के विकास के लिए केंद्रीय सरकार की बहुत सी लाभकारी योजनाओं का न पहुँच पाना है।

सब से बड़ी बात यह है कि एक तो वहाँ पर्यटन और सेव तथा सूखे मेवे के निर्यात के अलावा कोई और व्यापार का जरिया न के बराबर है और दूसरे किसी भी सरकारी या गैर सरकारी प्रतिष्ठान या उद्योग के लगने की सम्भावना नहीं है क्योंकि यहाँ अलगाववादी ताकतों की दहशत और गुंडागर्दी के सामने टिकने का जोखिम कोई नहीं लेना चाहता।


इस राज्य के बाहर का व्यक्ति यहाँ जमीन जायदाद न तो खरीद सकता है और न ही इस राज्य की कोई महिला दूसरे राज्य के व्यक्ति के साथ शादी करने के बाद अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकती है। उसके सारे अधिकार समाप्त हो जाते हैं।


इन धाराओं की बजह से इस राज्य को यह छूट मिली हुई है कि वह भारतीय संविधान को लागू करे या नहीं क्योंकि उसे अपना संविधान बनाने की छूट थी।

अगर यहाँ भी एक संविधान, एक कानून और पूरे देश के साथ मिलकर काम करने और निर्णय लेने की नीति होती तो आज यह राज्य अन्य राज्यों की तरह तेजी से तरक्की कर रहा होता।


अगर ये धाराएँ समाप्त हो जायें तो पाकिस्तानी घुसपैठिए और रोहिंग्याओं को यहाँ पनाह नहीं मिल पाएगी। इससे जो पूरे देश से अलग थलग पड़े रहने और राष्ट्र की मुख्य धारा से वंचित रहने की मजबूरी है, वह नहीं रहेगी और संसाधनों का तेजी से विकास हो सकेगा।
अभी जो केवल रक्षा, विदेशी मामले और संचार तक ही केंद्र सरकार सीमित रहने के लिए बंधी हुई है, इन धाराओं के समाप्त होने पर कृषि, शिक्षा, विज्ञान, प्रौ़द्योगिकी और व्यापार करने की केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ इस राज्य को भी उसी प्रकार मिल सकेगा जैसा अन्य राज्यों को मिलता है।


परंतु दिक्कत यह है कि बिना राज्य की सहमति से इन्हें समाप्त भी नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में सब से पहले जम्मू कश्मीर में ऐसे वातावरण का निर्माण करना होगा जिससे वहाँ के राजनीतिक दलों पर जनता की ओर से यह दबाव हो कि इन धाराओं का हटना आम नागरिकों के हित में है।


इन धाराओं का समाप्त होना राज्य के हित में इसलिए भी है क्योंकि उद्योग और निजी क्षेत्र में काम करने वाले यहाँ पैसा नहीं लगाते। यहाँ तक कि अच्छे डॉक्टर और दूसरे प्रफेशनल इसलिए नहीं आते कि उनके यहाँ जीवन भर रहने पर भी कोई अधिकार नहीं होंगे।


यह जो जमीन जायदाद खरीदने पर पाबंदी है वह असल में अंग्रेजों द्वारा यहाँ आकर बसने और फिर महाराजा के अधिकारों तक पर अंकुश लगाने की नीयत और कुटिल चाल से बचने के लिए लगाई गयी थी। अब स्वतंत्र भारत में ऐसा कोई डर नहीं है और जब जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तो कोई आशंका भी नहीं है तो फिर इस धारा का कोई मतलब नहीं रह जाता।


इसी तरह कॉलेज में दाखिले और कोई रोजगार या नौकरी करने पर अभी जो प्रतिबंध है वह हट जाए तो राज्य का आर्थिक विकास कितना होगा इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। इन धाराओं के हटने का सबसे बड़ा फायदा इस राज्य को जो मिलेगा वह है  पाकिस्तान की तरफ से किए जा रहे आंतकवाद की रोकथाम करना आसान हो जाएगा।


जब राज्य के निवासियों का ध्यान शिक्षा प्राप्त करने, काबिल होकर रोजगार करने और आधुनिक संसधान अपनाने की तरफ लग जाएगा तो वह स्वंय ही पाकिस्तानी पोपेगेंडे की तरफ से आंख मूंद लेगें और किसी भी हरकत को शुरू में ही समाप्त करने के प्रति सरकार के साथ मिलकर अपना बहुमूल्य योगदान करने लगेंगे।


इन हालात को देखते हुए जितनी जल्दी हो इन धाराओं को समाप्त कर देना चाहिए ताकि जम्मू कश्मीर के लोग उसी प्रकार देश के संसाधनों का इस्तेमाल कर सकें जैसे अन्य देशवासियों के लिए होता है।

शनिवार, 27 जुलाई 2019

धर्म से नहीं जातिवादी सोच से निकली नफरत को समाप्त करना जरूरी है।





जहाँ यह हमारा दुर्भाग्य था कि शताब्दियों तक हम दासता की बेड़ियों में जकड़े रहे वहाँ उससे भी बड़ी बदकिस्मती यह रही कि आजाद होने के बाद हमने उस जातिवादी सोच को ही अपनाया जिसे अंग्रेजों ने भारत पर शासन के लिए इस्तेमाल किया था यह सोच थी कि फूट डालो और राज करो क्योंकि इसके बिना किसी विदेशी की ताकत नहीं थी कि वह हमारे जैसे प्राचीन संस्कृति और सभ्यता वाले देश पर राज कर सकता।


इंटोलरन्स बनाम असहिष्णुता


जहाँ तक हिन्दू धर्म का संबंध है यह अपने आप में इतना व्यापक है कि वह सब को साथ लेकर चलने और समान भाव से एक दूसरे के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत पर आधारित होने से धर्म से भी अधिक एक जीवन शैली की तरह प्रतिपादित हो चुका है।

जो लोग इसके असहिष्णु होने की बात करते हैं और इसके प्रतीकों को अपमानित करने और तिरस्कार करने तक से नहीं चूकते वे अधिकतर इस धर्म में ही जन्मे हैं। दुनिया के किसी भी धर्म में इस तरह की छूट नहीं है कि उसमें रहते हुए उसके खिलाफ बोलते रहें और आपको इसके लिए दंड भी न मिले।


यह हिन्दू धर्म की सहिष्णुता ही है कि संसद में लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान एक महिला श्रीमती रमा देवी से समाजवादी पार्टी के सांसद आजम खान, उनके यह कहने पर कि उन्हें जो कहना है वह उनकी तरफ मतलब अध्यक्ष की कुर्सी की ओर देखकर कहें, की हिम्मत यह कहने की नहीं होती कि ‘ मैं तो आपकी आँखों में आँखे डालकर बैठे रहना चाहता हूँ ‘ और इसके लिए संसद के अनेक सदस्यों द्वारा इसके लिए क्षमा माँगने को कहने पर भी वह निरलज्जता से मुस्कुराते नहीं रहते।


इस तरह की घटनाओं को सहिष्णुता बनाम छिछोरापन कहेंगे या कुछ और। जब यह व्यवहार गली मोहल्ले और बीच सड़क पर होता है और इसके विरोध में मारपीट हो जाती है तो असहिष्णुता का जामा पहना कर बवाल पैदा करने की कोशिश की जाती है।


और यह क्या बात हुई कि जय श्री राम कहने पर उसे लिंचिंग तक पहुँचा दिया जाए जबकि गाँव देहात हो या शहर और महानगर आज भी एक दूसरे को अभिवादन करने के लिए राम राम कहते हैं।


हिंदुओं को वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत उनके काम और जीवन यापन के लिए अपनाए गए कर्म के आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय , वैश्य, शूद्र की श्रेणी में रखने का अर्थ यह नहीं था कि उनमें कोई ऊँच नीच या बड़े छोटे होने की व्यवस्था थी बल्कि यह था कि समाज में वेदपाठी और ज्ञानी ब्राह्मण हो, रक्षा करने के लिए क्षत्रिय हो, व्यापार के लिए वैश्य और सेवक के रूप में शूद्र भी हों। जिसको जो ठीक लगे और उसमें उस काम को करने की योग्यता हो वह अपना ले और उसी के अनुसार उसका वर्ण निर्धारित हो जाए।


अब हुआ यह कि इस वर्ण व्यवस्था से अंग्रेजों को फूट डालने के लिए हिंदुओं के विभिन्न वर्णों को आपस में लड़ाने और धर्म के आधार पर मुस्लिमों से लड़वाकर राज करने का आसान नुस्खा मिल गया।


इसका नतीजा क्या हुआ ? बँटवारा और कत्ल ए आम जिसका दंश आज तक कायम है। आजादी के बाद इसी जातिवादी और धार्मिक कट्टरपंथ को बढ़ावा देने के लिए संविधान के अनुच्छेद पंद्रह का मजाक बना दिया जिसमें सब को बराबरी का हक दिया गया है।


इस अनुच्छेद की अवमानना के लिए देश में अनेक प्रकार के आरक्षणों का प्रावधान किया जाने लगा।


देश की राष्ट्रवादी पार्टी कांग्रेस परिवारवादी दल बनने की ओर चल पड़ी, इसी की देखादेखी देश में ऐसे दलों का उभरना शुरू हो गया जो मूल रूप से एक परिवार पर केंद्रित थीं और कांग्रेस की तरह देश के संसाधनों पर कब्जा करने लगीं। यह सब करने के लिए मोहरे के रूप में आरक्षण की चपेट में आई वे जातियाँ थीं जिन्हें गरीबी में रखने से ही इन परिवारवादी पार्टियों की खुशहाली पक्की हो सकती थी।


चाहे कांशीराम और मायावती की बहुजन समाज पार्टी हो, मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी हो या लालू यादव की आर जे डी हो अथवा दक्षिण भारत के अनेक परिवारवादी दल हों, सव जातिगत वोट बैंक के आधार पर सत्ता कब्जियाने में सफल होती रहीं।


देश के विकास की फिक्र कम और अपनी ताकत बढ़ाने की नीतियाँ गरीब को और अधिक गरीब बनातीं गयीं। रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के साथ सरकारी खजाने की लूट खसोट का दौर देश को रसातल में ले जाने लगा।
ऐसे में साम्प्रदायिक कही जाने वाली भारतीय जन संघ और अब भारतीय जनता पार्टी अपनी राष्ट्रवादी छवि बनाने में कामयाब हो गयी। जनता तो त्रस्त थी ही उसने बाकी सभी दलों को एक के बाद एक नकारना शुरू कर दिया और भाजपा के सभी दोषों को भुलाकर अपना लिया। 


जातिवादी सोच


यह विडम्बना ही है कि भारत जैसे विशाल देश में कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा जाति के आधार पर लोगों को बाँटने और अपना उल्लू सीधा करने का आसान नुस्खा जाति पर आधारित आरक्षण व्यवस्था में मिल गया। उन्होंने इसका जमकर फायदा उठाया और अब तक उठा रहे हैं।


होना यह चाहिए था कि केवल गरीबी और पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण होना चाहिए था। अब जातिगत आधार पर किए गए आरक्षण को खत्म करने और गरीबी को आरक्षण का पैमाना बनाने की बात करते ही यह स्वार्थी लोग सक्रिय हो जाते हैं और हिंसा तक पर उतारू हो जाते हैं।


हकीकत यह कि आरक्षण ने जातियों में छोटा और बड़ा होने की भावना इतनी भर दी है कि वे एक दूसरे के साथ ही अछूत होने का व्यवहार करते हैं।
इस दिशा में एक सराहनीय पहल जतिग्रस्त होने के लिए मशहूर हरियाणा के कुछ जिलों की खाप पंचायतों ने अपने नाम के आगे जाति न लिखने से की है।
यह एक अच्छी पहल है लेकिन इतने से ही काम चलने वाला नहीं। जब तक शिक्षा और नौकरी पाने के लिए जाति पूछी जाती रहेगी तब तक जातिवाद के चंगुल से बाहर निकलना असम्भव है।


जातिवाद की रोटियाँ सेंकने वाले दलों की आधी कमर उसी दिन टूट जाएगी जिस दिन उनके जाति के आधार पर लोगों को बाँटने और नफरत रूपी जहर फैलाने के सभी विकल्प समाप्त हो जाएँगे।


इसके लिए सामाजिक जागरूकता की जरूरत है। यह सोचने की भी आवश्यकता है कि जातियों को आपस में लड़वाकर फायदा किस का हो रहा है। जिस दिन यह समझ में आ जाएगा तो जातिवाद की राजनीति करने वालों की पूरी ही कमर टूट जाएगी।


सरकार की भूमिका केवल इतनी होनी चाहिए कि वह कानून व्यवस्था को न बिगड़ने दे और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्यवाही करने से न चूके।

शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

तुर्की और ग्रीस में बिताए कुछ यादगार दिन












भारत में मुस्लिम शासन की स्थापना का श्रेय तुर्की को जाता है जो हमलावर के रूप में यहाँ आए थे। मोहम्मद गौरी ने पृथ्वी राज चौहान को हराकर यहाँ कुतुबुदीन ऐबक को दिल्ली की गद्दी सौंप दी और वापिस चला गया। मोहम्मद गजनी भी तुर्की था जिसने सत्रह बार हमला किया। इस तरह मोहम्मद, तुगलक, खिलजी ने यहाँ मुस्लिम राज्य की नींव डाली और अकबर ने इसे मजबूती दी।


तुर्की में सन् 1923 तक ऑटमन राजशाही थी जिसे अपने निरंकुश और बर्बर शासन के कारण आम नागरिकों के रोष का सामना करना पड़ा। सन् 1881 में जन्मे मुस्तफा कमाल ने इसके खिलाफ मोर्चा बुलन्द किया और 1923 में टर्की गणराज्य की स्थापना की और पहले राष्ट्रपति बने।


एक दौर ऐसा आया कि भारत में कांग्रेस के कुछ युवाओं ने अपने को यंग टर्क कहना शुरू कर दिया जो इस दल में रहकर उसकी नीतियों का विरोधी स्वर था जिसने आगे चलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।






भारत तुर्की से चार गुना बड़ा है और दोनों देशों के बीच काफी सांस्कृतिक समानताएँ हैं। हिंदी, उर्दू शब्दों का काफी प्रचलन है। कीमा, कोफ्ता, हलवा, पुलाव, तंदूर, दुनिया जैसे ढेरों शब्द हैं जो समान हैं।


लगभग साढ़े चार हजार किलोमीटर दूर तुर्की के इस्तांबुल हवाई अड्डे पर उतरते समय यही सब बातें मन में थीं। यहाँ मुस्लिम देशों जैसी कट्टरता नहीं है, लोगों का पहनावा आधुनिक भी है और मुस्लिम भी, खानपान, रहन सहन, बातचीत एशिया और यूरोप का मिलाजुला स्वरूप है। यह यूरोप का द्वार भी है और कुछ हिस्सा यूरोप में आता है।



इस्तांबुल से बस यहाँ के प्रसिद्ध शहर कैपादोशिया के लिए चली तो रास्ते भर प्राकृतिक सौंदर्य के दर्शन होते रहे। यह जगह विश्व धरोहर है और यहाँ आकर टर्की के ऐतिहासिक खंडहर देखने से इसकी प्राचीन संस्कृति के दर्शन हो जाते हैं।


ज्वालामुखी प्रभावित क्षेत्र है और लगभग एक करोड़ साल से लेकर अब तक यह फटते रहते हैं, हालाँकि अब काफी कम हो गए हैं। इनसे निकला लावा अनेक धातुओं का मिश्रण है और उससे अनेक तरह की आकृतियाँ बन गयीं हैं। पत्थर की शिलाओं को देखकर आप अपनी कल्पना के मुताबिक उनका आकार सोच सकते हैं। इन्हें काल्पनिक चिमनियों का नाम दिया गया है। एक शिला विष्णु का आकार है तो दूसरी बुद्ध जैसी, तीसरी हैट पहने यूरोपियन की तो चौथी में महिला पुरुष एक दूसरे का चुम्बन लेते हुए लगते हैं।



यह चिमनियाँ घाटियों में दूर दूर तक फैली हैं और मनचाहा आकार दिखाई देने लगता है। कुछ आकार नदी और बरसात के पानी ने अपने मन से बना दिए हैं।
यहाँ पर छोटी और बड़ी गुफाओं से भरे क्षेत्र हैं। इनमें यात्री और व्यापारी ठहरते थे और इनका इस्तेमाल सराय की तरह होता था।


शहरों का आर्किटेक्चर बहुत सुंदर है लेकिन उलझन भरा भी है जिसे समझने के लिए वास्तुविद की जरूरत पड़ती है।
इस क्षेत्र में मृत्यु के बाद शव को गर्भ के शिशु के आकार में घर के फर्श में गाडे जाने की परंपरा थी। इस तरह के अवशेष मिले हैं जिनसे पता चलता है कि दुनिया की पहली ब्रेन सर्जरी यहाँ एक 20-25 साल की महिला की हुई थी।



इस पूरी घाटी में विभिन्न रंगों की छटा बिखरी है जो ज्वालामुखी फटने से निकले लावा से बनी है।
औटोमन पीरीयड में यह क्षेत्र सुख शांति से परिपूर्ण था। ईसाई सम्प्रदाय के लिए चर्च बनाए गए। कुछ मस्जिद और चर्च एक दूसरे से सटे हुए है और दोनों धर्मों के लोग बिना किसी भेदभाव और परेशानी के इनमें आते हैं।
यह देखकर मन में विचार आया कि क्या अयोध्या में बाबरी मस्जिद और राम मंदिर एक साथ एक दूसरे से सटे हुए नहीं बन सकते।इस इलाके में कुदरती तौर पर ऐतिहासिक और धार्मिक केंद्र बन गए हैं।



इन विशाल इमारतों में अंदर के कमरे चट्टान से अपने आप बन गए और उनमें आने जाने के लिए सीढ़ियाँ और सुरंग भी हैं। पहले जमाने में इनमें काफी चहल पहल रहा करती होगी पर अब सब जगह जाना मुमकिन नहीं है।
यहाँ नाग देवता की पूजा होती थी चित्रकारी अद्भुत है और मनमोहक भी।



गोरेम संग्रहालय घाटियों से घिरा एक विशाल क्षेत्र है इसकी खोज यूरोपियनों ने अठारहवीं शताब्दी में की और दुनिया के सामने एक अजूबे की तरह इसे सराहा गया। अनगिनत आकृतियाँ हैं चित्रकारी है और खूबसूरत कला का संगम हैं।



हमारे यहाँ अजंता एलोरा की गुफाएँ और खजुराहो की चित्रकारी की तुलना इनसे की जा सकती है।
इस्तांबुल शहर हमारे जैसे व्यस्त शहरों की तरह ही है। तकसिम चौराहा मशहूर है। यहाँ मिठाई की दुकान पर भारतीय व्यंजनों की तरह स्वादिष्ट मुकलावा मिलता है।



यहाँ से अगला पड़ाव ग्रीस की राजधानी ऐथेंस का था। यहाँ क्रूज पर ठहरना और समुद्र के रास्ते विभिन्न शहरों को देखना अच्छा अनुभव था।
ऐथेंस की एतिहासिक पहाड़ी और अथीना देवी इस क्षेत्र की रक्षक के रूप में मानी जाती हैं। उनकी प्रतिमा में पंख नहीं हैं। मान्यता है कि पंख न होने से देवी हमेशा यहीं रहेंगी और कभी छोड़कर नहीं जाएँगी।
एक शहर मयकोनोस है जिसकी इमारतें एकदम सफेद रंग की हैं।



यहाँ अनेक द्वीप हैं जिनमें आबादी बसी हुई है। संकरी गलियों और गलियारों से होते हुए ऊपर तक जाया जा सकता है जहाँ से समुद्र का नजारा बहुत ही आकर्षक दिखता है।
ऐसा ही एक द्वीप साँटोरिनी है जो काफी सुंदर है। यहाँ ज्वालामुखी के मुहाने तक जाया जा सकता है।
इतिहास और पुरातत्व की दृष्टि से तुर्की और ग्रीस दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। इन सभी स्थानों पर जाने के लिए वहाँ की सरकारों ने पर्यटन को ध्यान में रखते हुए लगभग सभी प्रकार की सुविधाएँ प्रदान की हैं।



हमारे देश में भी ऐसे एक नहीं सैंकड़ों इलाके हैं जो इतिहास और पुरातत्व के नजरिए से बहुत ही आकर्षक हैं परंतु खेद है कि इनमें से ज्यादातर जगहों पर आने जाने की सुविधाओं का अभाव है जिसके कारण विदेशी ही नहीं देश के लोग भी वहाँ जाने से कतराते हैं।



उत्तर पूर्व हिमालय की कंदराएँ, लेह लद्दाख की घाटी, खजुराहो की गुफाएं और हिमालय पर्वत की रंग बिरंगी पर्वत श्रंखलाएँ इतनी खूबसूरत और मनमोहक हैं कि उन्हें निरंतर निहारते रहने पर भी थकान नहीं महसूस होती।
हमारे देश में यदि इन सभी स्थानों पर सुगम और सस्ती सेवाएँ प्रदान कर दी जाएँ तो हम भी विदेशियों को बहुत कुछ ऐसा दे सकते हैं जिसे वे कभी भूल नहीं पाएँगे।

शनिवार, 6 जुलाई 2019

रीति रिवाज और परम्पराओं का बदलना ही वक्त के साथ कदम मिलाकर चलना है








तनाव की पीड़ा 


अक्सर हर किसी को इस दुविधा का सामना करना पड़ता है कि वह स्थापित या परिवार और घर के मुखिया द्वारा बनाई परम्पराओं और रीति रिवाजों का पालन करे या नहीं, उन्हें छोड़ दे या उनसे चिपका रहे या फिर वो करे जो उसकी अपनी परिस्थितियाँ कहती हैं या उसका मन करता है जिसमें उसे परिवार से लेकर समाज तक के विरोध का सामना करना पड़ सकता है।


इस तरह वह एक ऐसे तनाव में जीने लगता है जिसमें अपने को असहाय समझने का दर्द तो होता ही है साथ ही डर का ऐसा तानाबाना अपने चारों ओर बुन लेता है जिसमें छटपटाहट, बेचौनी, बेबसी इतनी बढ़ जाती है कि डिप्रेशन में जीने लगता है और अपनी मानसिक शांति से लेकर सेहत तक का बँटाधार कर लेता है। मजे की बात यह कि इस अवस्था के लिए वह जिम्मेदार नहीं होता, बस एक प्रकार से ऐसे जुर्म की सजा भुगतने लगता है जो उसने किया ही नहीं होता।


एक उदाहरण से बात समझी जा सकती है। हमारे समाज में विभिन्न कानून होने के बावजूद एक बहुत बड़ी आबादी के बीच, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में यह परम्परा रही है और आज भी डंके की चोट पर चल रही है कि लड़का और लड़की के पाँच या आसपास की उम्र का हो जाने पर उनकी शादी तय कर दी जाए, तेरह से अठारह साल तक के होने पर उनकी शादी कर दी जाए, लेनदेन अर्थात दहेज की रस्म निबाह दी जाए और लड़की पर घर की सारी जिम्मेदारी और लड़के पर कुछ भी कैसे भी और कहीं से भी कमा कर लाने का हुक्म सुना दिया जाए और ऐसा न हो तो उनका चूल्हा चौका अलग करने की धमकी दे दी जाए।


यह कहा जा सकता है कि बाल विवाह, दहेज प्रथा रोकने के लिए कानून है जिसके जवाब में यह सुनने को मिले कि यह तो हमारे यहाँ की परम्परा है, घूँघट करना हमारा रिवाज है और लड़का हो या लड़की हमारी इजाजत के बिना न कोई फैसला ले सकते हैं और न ही हमारा हुक्म टाल सकते हैं, चाहे कानून कुछ भी कहे।


अब मुस्लिम समाज में तलाक को लेकर बने कानून की मुखालफत और मुस्लिम महिलाओं को खेलकूद, अभिनय जैसे करीयर अपनाने में रुकावट डालने से लेकर उनकी व्यक्तिगत जिंदगी के अहम फैसलों को भी परम्परा के नाम पर पुरुषों द्वारा तय करना यही बताता है कि कानून कुछ भी हो, वही होगा जो ये तय करेंगे और अगर किसी ने चीं चुपड़ की तो उसका हुक्का पानी बंद।

आज के तकनीक और टेक्नॉलजी पर आधारित तथा इंटर्नेट द्वारा संचालित युग में इस तरह की बातों का न तो कोई महत्व है और न ही परम्पराओं और रीति रिवाजों का दकियानूसी की हद पार करने के बाद उनका कुरीतियां बन जाने पर भी उन्हें ढोते रहने का क्या कोई मतलब रह जाता है?


अब होता यह है कि जो युवा इनके चंगुल में फँस जाते हैं और न तो उनमेंं इतना साहस होता है कि विरोध कर सकें और न ही इतने समर्थ होते हैं कि अपने पैरों पर खड़े हो सकें तो उनके सामने डिप्रेशन या तनाव को अपने ऊपर हावी होने देने के अलावा कोई चारा नहीं होता। जरूरी नहीं है यह हकीकत कम पढ़े लिखे, ग्रामीण समाज और समाज के वंचित तबके की ही हो। उनकी हालत तो दयनीय होती ही है पर यह उन समूहों में भी कम नहीं है जो अपने को शिक्षित, प्रोफेशनल और आधुनिक होने का दम भरते हैं।


इसका दुष्परिणाम यह होता है कि एक पूरी पीढ़ी गली सड़ी परम्पराओं और निरर्थक रीति रिवाजों के फेरे में पड़ी रहकर घुटन भरी जिंदगी जीने, नशे जैसी घातक आदतों से जकड़े जाने, क्रोध, हिंसा का शिकार बनने और आत्महत्या करने का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर हो जाती है।


बापू गांधी की कोशिश 


हालाँकि हमारे देश में अनेक समाज सुधारकों ने इस हालत को बदलने के लिए आंदोलन और क्रांतिकारी कदम उठाए हैं और उनके प्रयासों से कुछ हद तक लगाम भी लगी है लेकिन सबसे अधिक दूरंदेंशी की बात न केवल करने बल्कि अपने व्यक्तिगत आचरण और व्यावहारिक उपायों से इन बुराइयों का निराकरण करने के सरल और सफल कदम उठाने की नींव बापू गांधी ने डाली। दुःख की बात यह रही कि हमारी सरकारों ने समय समय पर उनका नाम तो लिया लेकिन अमल या तो किया ही नहीं या फिर आधे अधूरे मन से काम चलाओ की नीति अपनाई। अगर ऐसा न होता तो आज भी सिर पर मैला ढोने, सीवर की गंदगी साफ करने, छुआछूत बरतने, झूठे आडंबर करने से लेकर बाल विवाह, भू्रण हत्या, धर्म और जाति के आधार पर सुविधाओं का बँटवारा करने की मानसिकता कभी की समाप्त हो चुकी होती और इस विचार को बल मिलता कि एक सभ्य समाज में इनका कोई अस्तित्व नहीं होना चाहिए।


बापू के अनुसार जब तक पर्याप्त जागरूकता और सुविधाओं का रूढ़ियों में जकड़े समाज तक पहुँचना सुनिश्चित नहीं होगा तब तक न कोई नियम न कोई कानून प्रभावी हो सकता है। यह कोई मुश्किल काम नहीं है, मिसाल के तौर पर यदि हमने शिक्षा को उन तक पहुँचाना है तो पहले वहाँ शिक्षा के साधन पहुँचाने होंगे। मान लीजिए कोई परिवार लड़के या लड़की को इसलिए स्कूल नहीं भेजता क्योंकि वह मजदूरी कर घर के खर्च चलाता है तो उतनी रकम उसके परिवार को सरकार की तरफ से मिलनी चाहिए जिससे परिवार की आमदनी की भरपाई हो सके और बच्चा मन लगाकर अपनी पढ़ाई कर सके।



बच्चों का स्कूल से गैरहाजिर रहना या मिड डे मील के वक्त ही स्कूल जाना और स्कूल में अध्यापकों का न होना इस बात का प्रमाण है कि इमारत तो बन गयी लेकिन उसमे ंपढ़ने और पढ़ाने वाले पहुँचे इसकी तरफ न सोचा और न कुछ किया।


शिक्षा ही ऐसा माध्यम है जो इस बात की समझ दे सकता है कि कौन सी परम्पराएँ और रीति रिवाज जिन्हें मानना चाहिए और किन्हें बदलना चाहिए या पूरी तरह खारिज कर देना चाहिए। बाल मजदूरी, बाल विवाह, दहेज जैसी कुप्रथाएं से निपटने का एक ही उपाय है कि सम्बंधित वर्ग का आर्थिक सशक्तिकरण किया जाए। यह तब ही हो सकता है जब इनके सामने शिक्षा प्राप्त करने के सभी दरवाजे खुले हों।


असल में दिक्कत यह है इन वर्गों के कल्याण का दावा करने वाली ज्यादातर राजनीतिक पार्टियाँ इन्हें अनपढ़ बनाए रखने, अपना वोट बैंक समझने और अपना पिछलग्गू बनाए रखने का ही काम करती रहीं हैं। लेकिन अब हालत बदल रही है जो एक अच्छा लक्षण है।


इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि समाज की मुख्यधारा में इस विशाल आबादी जिसे गरीब कहा जाता है को अगर शामिल करना है तो ऐसे साधन उन तक सुलभ कराने होंगे जिनकी मदद से पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार पुरानी और निर्जीव हो चुकी परम्पराओं तथा रीति रिवाजों का होलिका दहन हो सके ताकि वे समझें कि इस देश की सम्पदा पर उनका भी हक है।


शिक्षा के बाद है स्वास्थ्य सम्बंधी पुरानी परम्पराओं से मुक्ति जैसे कि यह तय पंडित और मौलवी तय करें कि नवजात शिशु को माँ का दूध कब पीना है, बीमारी की अवस्था में झाडफूँक, ताबीज हो, डॉक्टर का इलाज, घर के मर्द ताड़ी पीकर खेत में पड़े रहें और माँ बीमार बच्चे को अस्पताल भी न ले जा सके क्योंकि परम्परा नहीं कहती कि औरत घर से बाहर जाए, इसी तरह की दूसरी बेड़ियाँ हैं जो केवल तब ही टूट सकती हैं जब सरकार अपनी सेवाओं को देने के लिए बनी इमारतों से बाहर निकलकर उस घर तक पहुँचे जहाँ इनकी जरूरत है।
स्कूल, प्राथमिक चिकित्सा केंद्र, अस्पताल तक पहुँचने का इंतजाम किए बिना केवल खातों में पैसा डालने से अपेक्षित बदलाव फिलहाल तो असम्भव है, ठीक उसी तरह जैसे कि परम्परा और रीति रिवाज का बदलाव तब तक नहीं हो सकता जब तक उसका विकल्प न हो। वर्तमान सरकार के सामने अपनी योग्यता सिद्ध करने का यही मापदंड है।


(भारत)

शुक्रवार, 21 जून 2019

महिला सशक्तिकरण सीमित परिवार, शिक्षा और बराबरी से ही सम्भव है








मलिंडा गेट्स 


विश्व के सबसे धनी परिवार और अपने उद्यम, सोच और दानशीलता के लिए प्रसिद्ध बिल और मलिंडा गेट्स की छाप आज दुनिया भर में उनके विभिन्न कार्यों के माध्यम से देखी जा सकती है।

मलिंडा गेट्स दुनियाभर में समाज के लिए उपयोगी कार्यक्रमों के लिए जानी जाती हैं। हाल ही में उनकी पुस्तक ‘द मोमेंट ऑफ लिफ्ट‘ पढ़ी जिसमें उनके द्वारा किए गए कार्यों का संक्षिप्त लेखा जोखा तो है ही, परंतु उससे भी अधिक समाज में महिलाओं की सोच बदलने और उन्हें स्वयं को पहचान कर अपनी उपस्थिति का एहसास कराने की बात बड़ी मजबूती से रखने का एक प्रमाणित दस्तावेज है।


इस पठनीय पुस्तक में उन्होंने संसार भर के विकासशील और गरीबी से लड़ रहे  देशों में महिलाओं की हालत का जायजा तो लिया ही है, साथ ही वह वहाँ उनकी हालत  में सुधार लाने की दृष्टि से जो कुछ भी अपनी फाउंडेशन तथा व्यक्तिगत रूप से कर सकती हैं, उसकी रूपरेखा तैयार करने से लेकर उन्हें अमली जामा पहनाने का भी महत्वपूर्ण कार्य किया है।यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है कि एक धनवान व्यक्ति एक गरीब और जिंदगी तथा समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी महिला के दर्द और तकलीफ को न केवल महसूस कर पाता है बल्कि उसे हाथ पकड़ कर ऊपर लाने की कोशिश करता है और उसमें कामयाब भी होता है।



महिला की मर्जी जरूरी


भारत के संदर्भ में इस किताब में अनेक ऐसी कहानियाँ हैं जो हमारी बदलती दुनिया का आइना हैं और यह बात सिद्ध करती हैं कि अगर महिला को ताकतवर बनाना है तो सबसे पहली शर्त उसे पुरुष की मर्जी से नहीं बल्कि अपनी पहल पर संतान को जन्म देने का अधिकार मिलना है, उसके बाद उसके पढ़ने लिखने और अपनी इच्छा से जो वह चाहे करने की इजाजत पुरुष से लेने की जरूरत न हो।


मलिंडा ने अपनी माँ की बात को अपने जीवन का मूल मंत्र बना लिया कि ‘अगर आप अपना अजेंडा खुद नहीं बनाते तो कोई और तय कर देगा कि क्या करना है और क्या नहीं करना है। अगर मैं अपने अजेंडा में उन चीजों को शामिल नहीं करती जो मेरे लिए जरूरी हैं तो दूसरे लोग मेरे लिए वह सब तय कर देंगे जो वे जरूरी समझते हैं‘। इस अवस्था में पुरुष केवल अपना स्वार्थ और फायदा ही देखेगा, यह बात सदियों से चली आ रही है और महिलाओं के पिछड़ेपन, दब्बू बने रहने और मर्द के इशारे पर ही कुछ करने या न करने की कुप्रथा दशकों तथा सदियों से चली आ रही है।


एक उदाहरण है : कानपुर जिले के एक गाँव की बहुत ही गरीब बेटी जिसका नाम सोना है, जब वह दस साल की थी तो उसने जिद पकड़ ली कि उसे पढ़ना है और शिक्षक चाहिए। जब यह बात उसने मलिंडा से कही तो उन्हें लगा कि इस बच्ची ने तो उन्हें झकझोर कर रख दिया और यह कि उससे उन्हें सीखने की जरूरत है।


अनेक विरोधों के बावजूद वह अपनी बात पर कायम रही । जहाँ वह रहती थी, वह सरकारी रिकार्ड में गैर कानूनी होने के कारण सभी सरकारी सुविधाओं से वंचित जगह थी। सोना का कहना था कि उसे आगे बढ़ने के लिए मदद करो, चाहे कुछ भी करो। मलिंडा और उनके सहयोगियों के प्रयास से जगह नियमित हुई, स्कूल और सभी सरकारी सुविधाएँ मिलने का रास्ता साफ हुआ, पूरी बस्ती का कायाकल्प हो गया।



इस बदलाव के पीछे की कहानी यह है कि पहले औरतों ने तय किया कि वे संतान को जन्म तब ही देंगी जब वह उसकी जरूरत समझेंगी और तब तक गर्भ निरोधक और अन्य तरीकों के इस्तेमाल से गर्भधारण नहीं करेंगी जब तक संतान के पालन पोषण, शिक्षा और आगे बढ़ने के समुचित साधन उपलब्ध नहीं हो जाएँगे।



हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या यह है कि गरीबी, भुखमरी, बीमारी का मूल कारण जनसंख्या को बढ़ने से रोकने के लिए किए जाने वाले उपायों को आधे अधूरे तरीकों से लागू करना है। यह उपाय फेल होने का कारण यही है कि स्त्री को न तो अपनी मर्जी से संतान को जन्म देने का अधिकार है और न ही पुरुष द्वारा गर्भनिरोधक इस्तेमाल करने की अनिवार्यता है। नतीजा यही होता है कि आबादी बढ़ने पर कोई अंकुश नहीं लगता और जितने भी संसाधन तैयार होते हैं, वे लगातार कम पड़ते जाते हैं।



इसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है। इन दिनों बिहार और कुछेक अन्य स्थानों से चिकित्सा सुविधाओं के अभाव और साफ सफाई के प्रति उदासीनता के कारण बच्चों को हो रही बीमारी से होने वाली मौतों का आँकड़ा बढ़ता जा रहा है। क्या यह सच्चाई नहीं है कि जिस तरह से आबादी बढ़ी, उसकी तुलना में चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार न हो पाना है?



अस्पताल में डॉक्टर और नर्स, शिक्षा संस्थाओं में शिक्षक उस संख्या में तैयार नहीं हो पाते जिस तादाद में आबादी बढ़ रही है। ऐसे में पूरा सिस्टम चरमरायेगा नहीं तो क्या होगा और इसका कारण आबादी पर नियंत्रण न होना नहीं है तो और क्या है? जरा सोचिए ! बिना सोचे समझे संतान उत्पन्न करना एक तरह से पूरे सिस्टम को अव्यवस्थित करने की पहल करने में अपनी आहुति देना है।



महिलाओं को न केवल गर्भवती होने के समय का चुनाव करने की आजादी होनी चाहिए, बल्कि यह भी कि प्रसव से पहले और बाद में मिलने वाली सुविधाओं को हासिल करने का भी अधिकार होना चाहिए।


लेखिका ने इस किताब में भारत में महिलाओं द्वारा स्वयं सहायता समूहों के जरिए एक दूसरे को ताकतवर बनाने का जिक्र करते हुए कहा है कि इनकी सफलता के पीछे यही है कि महिलाएँ यहाँ आकर एक दूसरे से बात करती हैं, अपने सुख दुःख साँझा करती हैं और आत्मनिर्भर बनने के उपायों पर चर्चा ही नहीं करतीं, बल्कि उन पर अमल भी करती हैं। वे जो कमाती हैं, उसे अपने ऊपर खर्च करने की आदत हो रही है और परिवार में अपनी हैसियत और पहचान के साथ पुरुष प्रधान परिवार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सफल हो रहीं हैं।



स्त्री का अनादर 


क्या कारण है कि एक पुत्र के रूप में जिस माता का अपनी शिशु अवस्था में वह स्तनपान करता है और किसी तरह के अनादर की भावना उसमें नहीं होती, वही पुत्र बड़ा होकर उसका अपमान करने से भी नहीं चूकता।


लेखिका का मत है कि इसका कारण पुरुषों द्वारा बनाए गए धार्मिक नियम और परम्पराएँ हैं जो उसके बड़ा होने तक उसके अंदर महिलाओं का सम्मान न करने और उन्हें अपने हाथ का खिलौना बनाए रखने की भावना को मजबूत करती रहती हैं। पुरुष और स्त्री या लड़के और लड़की के बीच भेदभाव करने की गलत सोच के बढ़ने का भी यही आधार है। महिलाओं को जीवन भर इस लांछन को ढोना पड़ता है कि उन्हें नजरें नीची रखनी हैं,


पुरुष की कही हर बात उनके लिए पत्थर की लकीर है, अपना शारीरिक और मानसिक शोषण होने पर भी चुप रहना है और घर से बाहर कदम तक नहीं रखना है चाहे अपने बीमार बच्चे को डॉक्टर के पास ही ले जाना हो। यहाँ तक कि यदि घर के मर्द उसकी बेटी को वेश्या बनाने के लिए सौदा कर रहे हों, तब भी उसे चुप रहना है।
लेखिका ने अनेक ऐसी समस्याओं को उजागर करने के साथ साथ उनका समाधान भी देने का प्रयास किया है जो भारत ही नहीं, सभी  विकासशील और गरीबी के चंगुल में फँसे देशों में आम तौर से देखी जा सकती हैं, जैसे कि बाल विवाह, दहेज, यौन उत्पीड़न, बिना वेतन के मजदूरी और महिलाओं को अपने को हीन भावना से ग्रस्त रखे रहने की पुरुष मानसिकता।



महिला सशक्तिकरण के लिए बनाए गए कार्यक्रमों और नीतियों के असफल रहने का सबसे बड़ा कारण यह है कि इन्हें बनाने और अमल में लाने का जिम्मा पुरुष को दे दिया जाता है जो औरत की तरह न तो सोच सकता है और न ही उसमें उनकी भावनाओं को समझने की बुद्धि होती है और जरूरी संवेदनाओं का नितांत अभाव होता है। इसके पीछे यही सोच होती है कि न तो महिलायें इतनी सक्षम होती हैं कि वे नीतियाँ बना सकें और न ही वे उनके लिए जरूरी साधन जुटा सकती हैं।



लेखिका ने अपनी पुस्तक में न केवल इस बात को पूरी तरह  सिद्ध किया है कि महिलाओं में निर्णय लेने और सफलतापूर्वक किसी भी काम को पूरा करना करने की अपूर्व क्षमता होती है बल्कि यह भी कि वे किसी भी परिस्थिति में पुरुषों से अधिक बेहतर नेतृत्व दे सकती हैं। इसका उदाहरण स्वयं उन्होंने अपने और अपने पति के बीच बराबरी के व्यावसायिक सम्बन्धों और पारिवारिक निर्णयों का उल्लेख कर दिया है।



यह पुस्तक पुरुष और स्त्री के व्यवहार को लेकर अनेक तथ्यों को उजागर करने का काम करती है और इसे पढ़ने में पाठक की रुचि बराबर बनाए रखने में सक्षम है, विशेषकर भारत के सम्बंध में वर्णित अनेक घटनाओं को सच्चाई के साथ पेश करने में। यह पुस्तक स्वागत योग्य और इतनी लयपूर्ण है कि शुरू से अंत तक कहीं बोरियत नहीं होती।


शुक्रवार, 14 जून 2019

कृषि, उद्योग, शिक्षा और स्वरोजगार बजट का मूल मंत्र होना चाहिए








वित्त मंत्री ने जनता से पूछा है कि वह बजट कैसा बनायें। यह मात्र औपचारिकता है क्योंकि एक तो सरकार के मंत्रियों अधिकारियों और बाबुओं तक की रुचि ज्यादातर केवल अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित अखबारों में छपे लेखों और सम्पादकीय टिप्पणियों में होती है और भाषाई समाचार पत्रों पर नजर डालने की उनकी कोई इच्छा नहीं होती, दूसरी बात यह कि उद्योग और व्यापार करने वालों के संगठनों को सरकार ज्यादा महत्व देती है 


क्योंकि वे संगठित तो होते ही है, साथ में सरकारी नीतियों और निर्णयों पर अपनी छाप डालने में माहिर होते हैं। इसीलिए अधिकतर योजनाएँ केवल एक वर्ग अर्थात सम्पन्न और प्रभावशाली लोगों तक ही सीमित रह जाती हैं और उनके बीच ही इन योजनाओं की बंदरबाँट हो जाती है। सामान्य नागरिक के हिस्से में वही कुछ आता है जो इन लोगों के या तो किसी इस्तेमाल का नहीं होता या फिर इनके द्वारा लाभ लेने के बाद छीजन के रूप में बच जाता है।

असल में सरकार की योजनाएँ और उनके लिए बजट बनाने की प्रक्रिया अपनाते समय हालाँकि कहा यही जाता है  कि सामान्य नागरिक के हित को ध्यान में रखकर ही इसका प्रारूप तैयार किया गया है लेकिन उसका तानाबाना इतना पेचीदा होता है कि लाभ केवल उच्च वर्ग को ही मिलता है। खैर, जो भी हो वित्त मंत्री के लिए कुछ सुझाव हैं जो एक पत्र के रूप में प्रस्तुत हैं

माननीय वित्त मंत्री, 

किसान और युवा शक्ति को लेकर सरकार हर बार किसानों की दुर्दशा और युवाओं की बेरोजगारी का रोना रोते हुए बजट में खैरात के रूप में कुछ टुकड़े उनकी तरफ उछाल देती है तो सबसे पहले किसान को दी जाने वाली किसी भी सब्सिडी को बंद कर उसके स्थान पर उन्हें लगभग मुफ्त में कृषि कर्म के लिए कुछेक मूल सुविधाएँ प्रदान कर दे।

सबसे पहले बिजली देने का प्रबंध कर दे ताकि वे अपने खेतों में सिंचाई और दूसरी जरूरतों को पूरा कर सकें। 

सरकार को बजट में यह प्रावधान करने की जरूरत है । कृषि क्षेत्रों में ऊर्जा की पूर्ति थर्मल या हाइड्रो प्लांट से करने के बजाय सौर, पवन और बायोमास ऊर्जा उत्पादन के प्लांट लगाने की विशाल योजना बनाई जाए जिसका पूरा खर्च सरकार उठाए और उससे पैदा होने वाली बिजली बिना किसी प्रकार के शुल्क के किसान को दी जाए। ये ऊर्जा प्लांट शुरू कर दिए जाने के बाद इन्हें ग्राम, ब्लाक और जिला पंचायत को उनकी क्षमता के अनुसार संचालित करने के लिए सौंप दिए जाए, उनके रखरखाव का खर्च पंचायत उठाए और बिजली के वितरण की जिम्मेदारी एक सहकारी संस्था को दी जाए जो किसान और पढ़े लिखे ग्रामवासियों को शामिल कर बनाई गयी हो। उसका ऑडिट हो और पारदर्शिता का पालन हो।

विकसित देशों में कृषि कार्यों के लिए सौर, पवन और बायोमास ऊर्जा का प्रयोग सफल रहा है और अनेक देशों में तो खेतीबाड़ी के अतिरिक्त अन्य कार्यों के लिए इसी क्लीन एनर्जी के जरिए उद्योग भी चलाए जा रहे हैं। इससे जहाँ बिजली उत्पादन का खर्च न्यूनतम हो गया है वहाँ पर्यावरण के लिए घातक प्रदूषण से भी मुक्ति मिली है। 

इसका कारण यह है कि कोयले, तेल और प्राकृतिक गैस से जितनी ऊर्जा का उत्पादन होता है उतना केवल बीस दिन में सूर्य देवता से मिल जाता है।

इसके बाद आती है सिंचाई की व्यवस्था जिसके लिए किसान आज के आधुनिक युग में भी केवल आसमान की ओर ताकता रहता है, वर्षा हो गयी तो बल्ले बल्ले और न हुई तो सूखे की चपेट से मरने तक की नौबत। सरकार को बजट में इसके लिए समस्त देश के कृषि क्षेत्रों के लिए ऐसे संयंत्र लगाने होंगे जिनसे जल संरक्षण हो सके, तालाब, पोखर और कूप के साथ साथ बड़े जलाशय बनें जिनमे पानी के ठहरने का प्रबंध हो और वर्षा का पानी इनमे जमा होता रहे और एक बूँद भी व्यर्थ न जाए। 

इन संयंत्रों के संचालन के लिए सौर या पवन ऊर्जा का इस्तेमाल हो और इस पानी का वितरण करने के लिए भी कृषि सहकारी समिति बिजली के साथ साथ पानी भी सिंचाई की जरूरत के हिसाब से उसका कोटा बनाकर किसानों को दे। इस तरह पानी की आपूर्ति भी किसान को बिना एक भी पैसा खर्च किए हो जाएगी और उसके खेत कभी सिंचाई के बिना सूखे नहीं रहेंगे। 

इसी तरह खाद, उर्वरक, बीज और कीटनाशक भी किसान को लगभग बिना किसी लागत के देने के लिए बजट में प्रावधान कर दीजिए। 

कृषि उत्पादों की खपत के लिए इन पर आधारित उद्योगों की स्थापना ग्रामीण इलाकों से सटे क्षेत्रों में हो जिनका संचालन भी सौर ऊर्जा से किया जाए। खेत से अनाज, दाल, फल, सब्जी और सभी तरह की दूसरी उपज सीधे इन उद्योगों में प्रासेसिंग के लिए आ जाएँ और फिर देश भर में इनके वितरण की व्यवस्था भी सहकारी समिति के माध्यम से हो। भंडारण के लिए कोल्ड स्टोर हों और इस तरह बिक्री में बिचौलियों की जरूरत न रहे। 

इस तरह पूरा ग्रामीण क्षेत्रफल कृषि उत्पादन, कृषिजनित उद्योग और कृषि व्यापार की एक सम्पूर्ण इकाई बन जाएगा और प्रधान मंत्री का किसानों की आमदनी दुगुना करने का संकल्प भी पूरा हो जाएगा। 

इसे इस प्रकार से समझिए कि जैसे सरकार का दायित्व प्रत्येक गाँव में स्कूल, कस्बे में कॉलेज और जिला तथा राज्य में विश्वविद्यालय खोलने का है , उसी प्रकार किसान और ग्राम तथा वनवासियों को विद्युत शक्ति, खाद की उपलब्धता, सिंचाई के लिए पानी की व्यवस्था, प्रमाणित और उन्नत बीज का वितरण और कीटनाशकों की सुगमता देना भी उसका कर्तव्य ही नहीं बल्कि अनिवार्यता है। 

कांग्रेस और कुछ हद तक आपकी पिछली सरकार ने उन्हें पहले कर्ज और फिर उसकी माफी से ग्रामीण क्षेत्रों में निकम्मेपन को बढ़ावा दिया है। इसकी जगह उसे खेती के लिए मुफ्त संसाधन दे दीजिए और लक्ष्य निर्धारित कर दीजिए कि एक निश्चित अवधि जो तीन से चार साल की हो सकती है, उसके बाद उसे इन सब साधनों की वाजिब कीमत चुकाने होगी।

शिक्षा और स्वरोजगार 

वित्त मंत्री जी यह कहावत सुनिए, ऐसी शिक्षा दीजिए कि रोजगार सुगम हुई जाए, को मूल मंत्र बनाकर सबसे पहले उच्च शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए योग्य विद्यार्थियों को दस से पच्चीस लाख तक का ब्याज मुक्त ऋण चार साल के लिए देने का प्रावधान इस बजट में कर दीजिए। इस अवधि में विद्यार्थी अपने को इस काबिल बना लेगा कि उसके लिए बढ़िया रोजगार करना या नौकरी पाना आसान हो जाए।

जब तक विद्यार्थी चार वर्ष की अवधि समाप्त करे तो उसके सामने रोजगार की कोई समस्या न हो तो इसके लिए आप इस अवधि में ऐसे इंक्युबेशन सेंटर, ट्रेनिंग संस्थान, वेंचर सेंटर और टेक्नॉलोजी संस्थान बनाने या पहले से स्थापित केंद्रों का विस्तार करने के लिए एक मोटी रकम खर्च कीजिए ताकि शिक्षा प्राप्त करने के बाद विद्यार्थी यहाँ आए और अपने अनुसंधान, व्यावसायिक प्रोजेक्ट, मोडयूल और जीवन में जो करना चाहता है उसे अमली जामा पहना सके। यह सुविधा उसे प्राथमिकता के आधार पर एक या दो वर्ष के लिए मिले और उसके लिए केवल उसकी रुचि को ही पैमाना माना जाए और यह सब उसे बिना किसी शुल्क के प्राप्त हो।

इस प्रकार की ठोस व्यवस्था करने का परिणाम चार या पाँच साल बाद देखने को मिलेगा जब यह युवा शक्ति अपने सपनों को साकार करने के लिए सक्षम हो चुकी होगी। उसके पास नौकरी से ज्यादा स्वरोजगार करने के अधिक अवसर होंगे और इस तरह यह सरकार एक ऐसा माहौल बना सकेगी जिसमें युवाओं को न तो बेरोजगारी का सामना करना होगा और न ही अपनी प्रतिभा के सही मूल्याँकन के लिए विदेशों का रूख करने की इच्छा होगी। 

वित्त मंत्री जी, हमारे देश में बेरोजगारी की समस्या इसलिए है क्योंकि युवा न तो रोजगार या नौकरी के काबिल बन पाते हैं और इस तरह अधकचरे शिक्षित बेरोजगार हो जाते हैं और न ही अपना कोई व्यवसाय या स्वरोजगार करने के योग्य बन पाते हैं। सरकार को उन्हें केवल काबिल बनाना है, उसके बाद तो वे आपसे न कुछ माँगेंगे और न ही अपेक्षा रखेंगे। वे स्वावलंबी, आत्मनिर्भर और स्वयं पर विश्वास करने वाली पीढ़ी का नेतृत्व करने के लिए भली भाँति तैयार हो जाएँगे और फिर देखिए किस तरह से देश दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की करता है।

इस बार का बजट किसान और युवाओं को समर्पित कर दीजिए, उसके बाद आपको उनके लिए कुछ करने की जरूरत नहीं रह जाएगी।

वित्त मंत्री जी, एक जरूरी काम यह करना होगा कि इस बजट में आयकर मुक्त आमदनी की सीमा दस लाख कर दीजिए और उसके बाद पंद्रह, बीस और पच्चीस प्रतिशत आयकर के तीन स्लैब बना दीजिए। इसी प्रकार जी एस टी के दो स्लैब जो पाँच और पंद्रह प्रतिशत के हों, उसकी घोषणा कर दीजिए।  वे सभी वस्तुएँ और सेवाएँ जो दैनिक उपयोग की हैं या सामान्य रूप से उनकी जरूरत पड़ती है उन्हें इसके दायरे से मुक्त कर दीजिए।

आशा है आपको यह सुझाव पसंद आएगें और आगामी बजट में इनका समावेश होगा। पाठकों से अनुरोध है कि वे अपने सुझाव मेरे ई मेल पर या सीधे ही  ूूण्उलहवअण्पद पर भेज दें। 


(भारत)

शुक्रवार, 7 जून 2019

वन शक्ति और जल शक्ति से मिल सकता है जीने लायक पर्यावरण











रस्म अदायगी 

हर साल की तरह इस बार भी पाँच जून को पर्यावरण दिवस कुछ वायदों, भाषणों, आयोजनों के साथ गुजर गया, पहले की भाँति बढ़ते ताप, घटते जल स्रोत, गहराते प्रदूषण और जिंदगी जीने के कम होते जा रहे प्राकृतिक संसाधनों को लेकर चिन्ताएँ और आशंकाएँ व्यक्त की गयीं और पुराने आश्वासनों को दोहराने के साथ यह दिन भूतकाल में बदल गया।


अब जरा हकीकत पर नजर डालें। हमारे जंगल जहाँ वातावरण से कार्बन सोखने में माहिर हैं और एक वृक्ष का तीन चौथाई हिस्सा जल से पूर्ण होता है, वहाँ उसे ही अपना अस्तित्व खतरे में लगता है क्योंकि हर साल लाखों हेक्टेयर वन कट जाते हैं और वहाँ की जमीन बंजर होती जाती है। एक ओर देश के लगभग तीस करोड़ लोग जंगलों पर निर्भर हैं, रोजी रोटी और रहने के लिए उस पर निर्भर हैं, दूसरी ओर भयंकर आग उन्हें तेजी से भस्म करती जा रही है। ऐसा कोई साल नहीं बीतता जब अग्नि का प्रकोप जंगलों को नहीं लीलता।


देश के एक चौथाई हिस्से को वनों से घिरा माना जाता है, विडम्बना यह है कि इसमें से आधे विनाश के कगार पर पहुँच चुके है और आधे ठीकठाक घने जंगल हैं। इसका क्या नतीजा देखने को मिल रहा है उसे समझने के लिए यह जानना होगा कि आखिर यह पौधे करते क्या हैं जिन्हें लगाने और बचाने के लिए दुनिया भर में इतनी हायतोबा मची रहती है। यह जो पेड़ पौधे हैं, वे पानी, कार्बन और दूसरे रसायन धरती और वायु को देते हैं और चारों ओर फैली वनस्पति दूर से मौसम पर नियंत्रण रखते हुए हम तक साँस लेने के लिए शुद्ध हवा और पीने के लिए विभिन्न स्रोतों से साफ पानी पहुँचाते रहते हैं।


वन शक्ति 

वनों की इस महत्ता को जिन लोगों ने समझा वे अपनी जान की बाजी लगाकर भी इनकी रक्षा और पालन पोषण करते हैं। चलिए आपको 19 जनवरी, 2019 को 96 वर्ष की आयु में मृत्यु को प्राप्त हुए एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताते हैं जिन्हें वृक्ष मानव के नाम से पुकारा जाता था। ये थे विश्वेश्वर दत्त सकलानी जो टिहरी गढ़वाल के एक गाँव में पैदा हुए और आठ साल की उम्र से ही ऐसी धुन सवार हुई कि पेड़ लगाने शुरू कर दिए और जीवन में पचास लाख से ज्यादा पेड़ लगाए।


कई बार गाँव वालों से झगड़ा भी हुआ क्योंकि कुछ लोगों ने समझा कि ये इस तरह जमीन को कब्जाना चाहते हैं लेकिन यह अपनी धुन के पक्के होने से पेड़ लगाने और उनकी सेवा करने के काम में लगे रहे। ओक, देवदार, भीमल और चौड़े पत्तों वाले पेड़ लगाते थे जो आज इस प्रदेश की अनमोल वन सम्पदा है, लेकिन इसी उत्तराखंड में वनों को आग से बचाने के लिए न तो पर्याप्त साधन हैं और न ही इसके लिए कोई सार्थक और दूरगामी योजना है जिससे वन संरक्षण हो सके।


यह बात मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि वन विभाग के लिए कुछ समय पहले फिल्म बनाते समय स्वयं वनों की दुर्दशा देखी है। जब कभी किसी पेड़ कटने का दृश्य सामने आता है तो सुंदर लाल बहुगुणा की याद आ जाती है जो पेड़ से लिपट जाते थे और बाद में चिपको आन्दोलन के सूत्रधार बने। हमारे देश में वनों को बचाने के लिए अनेक तरह के परम्परागत उपाय किए जाते रहे हैं। एक उदाहरण है मेघालय में पवित्र वनस्थली के रूप में विशाल वनसंपदा जहाँ से कोई एक पत्ता या टहनी तक नहीं ले जा सकता। इसे आस्था और विश्वास से जोड़ दिया गया कि यदि कोई ऐसा करने की कोशिश भी करेगा तो वन देवता के दंड का भागी होना निश्चित है।


जल शक्ति 

इसे हम इस तरह से समझें कि आज मरुस्थल से घिरे जैसलमेर में स्थानीय लोगों के जागरूक और हरियाली के प्रति संवेदनशील होने के कारण पानी की कमी नहीं है जबकि विश्व में सर्वाधिक वर्षा का रिकार्ड रखने वाला चेरापूंजी पानी की कमी होने के खतरे से जूझ रहा है और वहाँ जाने पर अब वैसे मनमोहक दृश्य नहीं दिखाई देते जैसे अब से तीस चालीस साल पहले दिखाई देते थे।

इसका कारण केवल यही हुआ कि एक जगह जल संरक्षण के सभी उपाय किए गए क्योंकि वहाँ के लोगों को पानी की कीमत मालूम थी और दूसरी जगह पर पानी भरपूर था इसलिए जल संरक्षण के प्रति उदासीनता और लापरवाही से काम लिया गया।



पेड़ पानी सोखते हैं और उसे वातावरण में छोड़ते हैं। एक औसत पेड़ एक दिन में ढाई सौ से चार सौ गैलन पानी सोखने और छोड़ने का काम करता है। कह सकते हैं कि धरती को तीन चौथाई पानी वनों से वर्षा के जरिए मिलता है। यही नहीं एक पेड़ पानी को बाढ़ का रूप लेने से भी रोकता है।



इससे समझना आसान हो जाता है वृक्ष और जल एक दूसरे के पर्याय हैं और एक के बिना दूसरे का न तो महत्व है और न ही उनका स्वतंत्र अस्तित्व बना रह सकता है।


क्या आपने किसी पेड़ से बात करने का लुत्फ उठाया है, उसके किसी रखवाले से पूछिए तो पता चलेगा कि पेड़ को भी खुशी और आनंद से झूमना आता है और वह अपने कटने या सूखा ठूँठ बन जाने पर रुदन और चीतकार भी करता है। इसीलिए पेड़ों में जीवन की कल्पना की जाती है। इसी तरह किसी नदी, झरने या ताल के आसपास उनकी ध्वनि सुनी जा सकती है।


कुदरत की व्यवस्था देखिए कि पानी की नमी को पेड़ आत्मसात कर लेते हैं और फिर पूरे वातावरण को शीतल कर देते हैं। इसी आधार पर आज उमस से पीने के लिए पानी इकट्ठा करने की विधि पर सफलतापूर्वक काम हो रहा है और हम हैं कि वन और जल दोनों ही संसाधनों को बर्बाद करने पर तुले हुए हैं और केवल बातबाजी से इनका संरक्षण करना चाहते हैं।


आज हम जो साँस लेने के लिए शुद्ध हवा के संकट से जूझ रहे हैं उसका सबसे बड़ा कारण पेड़ और पानी की कद्र न करना है। वन क्षेत्र कम होते जाने से वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। खबरों के मुताबिक उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल, राजस्थान में होने वाली पचास प्रतिशत से ज्यादा मौतों के लिए वायु प्रदूषण जिम्मेदार है। मरने वालों में से आधे सत्तर साल से कम उम्र के हैं मतलब युवा पीढ़ी और समाज के विकास में सार्थक और कर्मठ होकर योगदान कर सकने वाली जनसंख्या असामयिक मौत का शिकार हो रही है। इसके विपरीत यदि वायु प्रदूषण न हो तो इंसान की उम्र सत्रह साल बढ़ सकती है।


जहाँ तक जल शक्ति की बात है, हमारी सभी नदियाँ प्रदूषित होने के भयंकर दौर से गुजर रही हैं। दूषित पानी से होने वाली बीमारियों से होने वाली मौतों के आँकड़े परेशान कर सकते हैं।


रुकावट कहाँ है?


असल में हमारी सोच और कथनी तथा करनी में कोई तालमेल न होना और विज्ञान तथा टेक्नॉलोजी के प्रति उदासीनता है। मिसाल के तौर पर हमारे शहरों, कस्बों और देहाती इलाकों में एक बड़ी समस्या नालों और नालियों, वहाँ कोई तालाब, नहर या झील है तो उनमें गंदगी को बेरोकटोक डालने और जमा होते जाने का अंतहीन सिलसिला चल रहा है। वर्षों तक इनकी सफाई न होने से यहाँ रहने वालों को नई नई बीमारियों का शिकार होना पड़ता है और कई जगह तो इस कदर गंदगी रहती है कि वहाँ रहना तो क्या उस जगह से गुजरना भी किसी खतरे से कम नहीं है।


अब हमारे यहाँ हमारी ही स्वदेशी लैब जो नागपुर में है और नीरी के नाम से दुनिया भर में प्रतिष्ठा पा चुकी है उसने एक ऐसी टेक्नालोजी का विकास किया है जिससे इन नाले, नालियों, झीलों और तालाबों में इस्तेमाल कर उस जगह को अच्छे खासे घूमने के स्थान में बदला जा सकता है।


इसी तरह शहर हो या देहात, कई जगह तो कूड़े के पहाड़ बन गए हैं, इन्हें हमारे ही लैब में बनी टेक्नॉलोजी के इस्तेमाल से सस्ते इंर्धन और जैविक खाद में बदला जा सकता है। ऐसा नहीं है कि इनका इस्तेमाल नहीं हो रहा है। मैंने स्वयं अपनी फिल्मों के निर्माण के दौरान ऐसे बहुत से कस्बे और जिले देखे हैं जहाँ इनका सही इस्तेमाल हुआ और आज वहाँ भरपूर खुशहाली है।


जब ऐसा है तो उदाहरण के लिए दिल्ली में कूड़े के पहाड़ का कुतुब मीनार के आकार का हो जाना क्या कहानी कहता है, यह समझना कोई मुश्किल नहीं है। इसी तरह दिल्ली और नोएडा में जो नाला वहाँ आफत का कारण बन चुका है और मुंबई में बीचों बीच बहता विशाल नाला और इसी तरह के दूसरे महानगरों में बदबू और गदंगी से भरे नाले इन शहरों के माथे पर कलंक की तरह लगे दिखाई देते हैं, तो उसके बारे में कुछ न कहा जाए, वही बेहतर होगा। यह हालत इसलिए है क्योंकि यह प्रादेशिक सरकारों से लेकर केन्द्र सरकार तक इस मामले में कुम्भकरण की तरह नींद में सोए हुए होने के कारण हो रहा है।


यह हमारे नीति निर्धारकों और शासन की बागडोर पकड़े सत्ताधारी दलों की मानसिकता पर निर्भर है कि वे जनमानस को प्रदूषण से मुक्ति दिलाने का काम करें, वरना तो पर्यावरण दिवस की खानापूर्ति तो हर साल होती ही रहती है।