शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

दिन अशुभ हो, क्या इसकी कामना की जा सकती है ?

आम तौर पर इस बात की उम्मीद की जाती है कि दूसरे आप के लिए आपका दिन शुभ रहने की बात कहें, ऐसे संदेश भेजें जिनसे लगे कि वे शुभचिंतक हैं, जब कुछ कहीं से खरीदें तो सामान तो मिले ही, साथ में बेचने वाला शुक्रिया कहे। परंतु यदि विक्रेता मुस्कराते हुए कहे कि आपका दिन अशुभ हो तो अटपटा लगना स्वाभाविक है।


अजब गजब संसार

इंटरनेट पर कुछ न कुछ खोजने की आदत सी पड़ गई है। ऐसे ही निगाह पड़ी कि एक दंपति ने न जाने किस परिस्थिति में एक दिन जो 19 नवंबर था, दूसरों को उनका दिन अशुभ होने की कामना करने की शुरुआत कर दी। यह अटपटा तो था लेकिन अपने अंदर छिपी भावनाओं को बिना किसी लागलपेट के कहने का साहस भी लगा। 

अब यह जरूरी तो नहीं कि मन में प्रत्येक व्यक्ति के लिए उनके दिन के शुभ होने की कामना की जाए। दुकानदार या वस्तु विक्रेता द्वारा उसके यहां से कुछ खरीदने पर ग्राहक का दिन खराब होने या अशुभ होने की मुस्कराते हुए की गई कामना अजब है तो गजब भी है और वह भी चेहरे पर मुस्कान के साथ।

अक्सर हम बिना बात किसी को भी और विशेषकर आधुनिक दौर में उसके दिन के शुभ होने की कामना करते हैं । व्हाट्सएप, फेसबुक और दूसरे संवाद साधनों को खोलते ही न जाने किस किस से दिन भर खुश रहने के संदेश मिलते रहने से एक तरह की खीज सी होती है।  कोई काम की बात तो की नहीं, बस शुभ प्रभात, आपका दिन शुभ हो, आप खुश रहें जैसे संदेश और साथ में कैसी भी फोटो जिसका कोई मतलब समझ नहीं आता। इसे मिटाने या डिलीट करने का मन करता है। कुछ ग्रुपों में यह ताकीद भी होती है कि इस तरह के संदेश न भेजें जाएं क्योंकि यह सब एक जैसे होते हैं और इन्हें पढ़ना समय नष्ट करना है।


भगवान भला करे

भारतीय संस्कृति में किसी के अपमान करने, बुरा भला कहने पर या फिर लड़ाई झगड़ा टालने के लिए यह कहने की परंपरा है कि भगवान तेरा भला करे। मतलब कि मेरे साथ अच्छा नहीं किया तो कोई बात नहीं लेकिन मेरी तरफ से बात समाप्त, अब जो भी है वह ईश्वर या ऊपर वाला है, वह देख लेगा। इस एक वाक्य, इच्छा या कामना से किसी विवाद का अंत न भी हो पर उसकी शुरुआत तो हो ही जाती है। हो सकता है कि वक्त गुजरने के साथ मन की कटुता और बदला लेने की भावना अपने आप धीरे धीरे कमजोर पड़ते हुए गायब ही हो जाए।

जीवन में यह संभव नहीं कि उतार चढ़ाव न हों, इसी लिए कहा जाता है कि वक्त के गुजरने का इंतजार किया जाए। जब समय एक जैसा रहना ही नहीं तो फिर सुख हो या दुःख, क्या अंतर पड़ता है! अगर यह न हो तो जिंदगी एकदम सपाट हो जाएगी, न कोई उत्साह, रोमांच या कुछ नया होने का इंतजार, क्या ऐसा जीवन बोरियत से भरा नहीं होगा ?

इसे इस तरह भी लिया जा सकता है कि जो होने वाला है, उसके बारे में अनुमान तो लगाया जा सकता है लेकिन निश्चित कुछ नहीं कहा जा सकता। यही स्थिति मनुष्य को कुछ न कुछ करते रहने के लिए बाध्य करती रहती है और अगर यह न हो तो जीवन नीरस हो जायेगा जिसे जीने को भी मन नहीं चाहेगा। जब तक मन में यह बात रहती है कि ऊंट किस करवट बैठेगा, तब तक जिंदगी जीने लायक लगती है।

यह एक मनोरंजक स्थिति है कि मन में कुछ और हो और कहना या करना कुछ और पड़े तो सोच कैसी होगी ? ऐसे क्षण अक्सर आते हैं जिनमें चाह कर भी अपनी वास्तविक भावनाओं को व्यक्त करना तो दूर, ऐसा सोचते हुए भी डर लगता है कि अगर गलती से भी यह प्रकट हो गया कि हमारे मन में क्या है तो न जाने कैसा तूफान आ जाएगा। और यही डर हमसे वह करा लेता है जो हम करना नहीं चाहते। शायद ऐसी ही स्थिति रही होगी जब उस दंपति ने शुभ की जगह अशुभ दिन होने की कामना करने की शुरुआत की। कहा जा सकता है कि यह एक तरह से अपने मन में छिपे अंजाने भय से मुक्ति पाने की क्रिया है जो  अक्सर सही समय पर सही बात कहने के लिए तैयार करती है।


न कहने या करने की हिम्मत

यदि इस बात को व्यापक संदर्भ में देखा जाए तो एक तरह से अपने मन में जो कुछ भी हो, उसे कहने की हिम्मत आ जाए तो बहुत से ऐसे निर्णय लेना आसान हो जाएगा जिनके बारे में मन में दुविधा या संशय रहता है।

मान लीजिए, परिवार के बीच कोई मतभेद है और संकोचवश मन की बात कह नहीं पा रहे हैं तो उससे मिलने वाले लाभ या हानि का सही अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। इसी तरह नौकरी, व्यापार या कोई सौदा करते समय अपनी बात रखने में हिचकिचाहट हो गई तो अर्थ का अनर्थ हो सकता है। आपके बारे में गलत राय बन सकती है जो आगे चलकर किसी बड़ी परेशानी या चुनौती का कारण बन सकती है। क्षण भर की चुप्पी जीवन का जंजाल बन सकती है।

इसका और भी विस्तार करें या देशव्यापी संदर्भ में देखें तो व्यक्ति के चुप रह जाने से राजनीति में गलत व्यक्ति का चुनाव हो जाता है। हमारा भ्रम हानिकारक हो जाता है और जो चतुर और चालाक है, वह अयोग्य होते हुए भी हम पर शासन करता है। यहीं से रिश्वत लेने देने तथा भ्रष्ट होने की शुरुआत होती है।  यही स्थिति अगर परिवार में हो तो उसके बिखराव का कारण बन जाती है। अपने ही घर में बेगाना होने का एहसास अनेक समस्याओं को जन्म देता रहता है जिसका परिणाम परिवार में बंटवारा ही होता है।

इस दिन को यदि सही ढंग से मनाया जाए और चाहे किसी को अच्छा लगे या बुरा, बिना मुंह बनाए या नाक भौं सिकोड़े, हलकी सी मुस्कान के साथ जो सोचते हैं, वह कह दिया जाए तो मन में अफसोस नहीं रहेगा। इससे सामने कुछ और, पीछे उसके विपरीत आचरण करने से भी मुक्ति मिल जाएगी।


शुक्रवार, 4 नवंबर 2022

परिवारों में बिखराव का कारण विश्वास और समझ का अभाव

 

पारिवारिक पृष्ठभूमि पर लिखी कोई साहित्यिक रचना जैसे कहानी, कविता और उपन्यास पढ़ते हैं या फिल्म और सीरियल देखते हैं तो उनसे हमारा जुड़ाव तब ही हो पाता है जब उनमें कुछ ऐसा हो, जो लगे कि आसपास घटने वाली घटनाओं का चरित्र चित्रण है। पाठक या दर्शक इन्हें बेशक सास बहू टाईप की प्रस्तुति कहें और चाहे कितनी भी आलोचना करें, ये मन को भाती हैं, अच्छी लगती हैं और कितने भी विरोध हों, अपने कथानक के कारण लोकप्रियता के पायदान की सीढियां चढ़ती जाती हैं।

मन में यह बात आना स्वाभाविक है कि ऐसा क्यों होता है कि परिवारों में तनाव देखने को मिलता है, साधारण सी बात पर बिखराव हो जाता है और जीवन का अधिकांश समय एक साथ व्यतीत करने पर बंटवारे की नौबत आ जाती है। यही नहीं, आपसी मनमुटाव सड़कों पर आ जाता है और अडौसी पडौसी से लेकर नाते रिश्तेदार तक आश्चर्य करते पाए जाते हैं कि इस परिवार से ऐसी उम्मीद नहीं थी, सब लोग हमेशा एक साथ खड़े नज़र आते थे, इन्हें क्या हो गया कि एक दूसरे का मुंह तक नहीं देखना चाहते। यही नहीं, ऐसे उदाहरण हैं जिनमें मारपीट से लेकर हत्या तक की घटनाएं हो जाती हैं और आपसी रंजिश या दुश्मनी इतनी बढ़ जाती है कि खानदानी या पुश्तैनी बन जाती है। पीढ़ियां गुजर जाती हैं और यह तक याद नहीं रहता कि मनमुटाव की शुरुआत कब और कैसे हुई थी, बस एक परंपरा सी हो जाती है जिसे कायम रखना है।


अनावश्यक हस्तक्षेप

यह विधि का विधान है कि हम अपने मातापिता या संतान का चुनाव नहीं कर सकते। पति पत्नी द्वारा एक दूसरे का चुनाव करना अपने वश में होता है और उसके लिए सभी के पास बहुत से विकल्प होते हैं। यह भी मान्यता है कि जोड़ियां ऊपर से बनकर आती हैं और कौन किस का जीवन साथी बनेगा, यह सब भाग्य की बात है। परंतु वास्तविकता यह है कि आज के दौर में बहुत कुछ खोजबीन करने और अपने मन मुताबिक संबंध मिलने पर ही वैवाहिक जीवन का आरंभ हो पाता है। अक्सर जिन्हें हम बेमेल जोड़ी कहते हैं, चाहे किसी भी कारण से हों, वे जीवन भर साथ निभाती हैं और बहुत से संबंध शुरू से ही बिगड़ने लगते हैं और एक स्थिति ऐसी आती है जिसमें संबंध विच्छेद ही एकमात्र उपाय बचता है।

आखिर ऐसा क्या होता है कि बहुत देखने भालने के बावजूद रिश्तों में खटास आ जाती है, एक दूसरे से कोई बहुत बड़ी शिकायत न होने पर भी अलग होना ही बेहतर लगता है। इसका कारण परिवार में जिन्हें हम अपने कहते हैं, उनकी अनावश्यक दखलंदाजी है जो दरार पैदा करने का काम करती है ।

व्यावहारिक उपाय

यहां एक दूसरी व्यवस्था का ज़िक्र करना है जो नौकरी या व्यवसाय से जुड़ी है। किसी भी संस्थान में यह नियम लागू रहता है कि कोई भी कर्मचारी अपने काम के बारे में अपने परिवार वालों को केवल यह बता सकता है कि वह कहां काम करता है और ज्यादा से ज्यादा यह कि वहां मोटे तौर पर क्या काम होता है। इससे अधिक कुछ नहीं। यह पाए जाने पर कि कर्मचारी के घरवाले जब तब ऑफिस में उससे मिलने बिना किसी काम के आते रहते हैं तो इसके लिए चेतावनी से लेकर नौकरी तक पर आंच आ सकती है।

इसके पीछे यह तर्क है कि घरवालों से यदि कर्मचारी ने अपने काम के बारे में कोई चर्चा की या किसी समस्या के बारे में सलाह ली तो उसके परिणाम अच्छे नहीं होते। मान लीजिए, किसी सदस्य के मशविरे को मानकर कार्यवाही कर ली और उससे उलझन सुलझने के बजाए ज्यादा उलझ गई तो जिसकी सलाह ली गई, वह तुरंत कहेगा कि उसने अपनी समझ से कहा था, अगर वह गलत निकली तो उसके लिए वह जिम्मेदार नहीं, यदि सही निकली तो वह पूरा श्रेय लेने को तैयार हो जाएगा ।

अब हम उस परिवार की बात करते हैं जो बिखरने के कगार पर है। मान लीजिए, आपकी बेटी या बहन का विवाह हो गया है और वह अपने घर यानी ससुराल की कोई समस्या या अपनी परेशानी अथवा अपने साथ हो रहे व्यवहार के बारे में कोई बात बताती है और आपने अपनी समझ से कुछ ऐसा कह या कर दिया जो उसके परिवार वालों के व्यवहार से मेल नहीं खाता और लड़की ने आपके कहे अनुसार अपना कदम उठा लिया तो बात बिगड़ना निश्चित है। 

इसे गैर ज़रूरी दखलंदाजी से दोनों परिवारों के बीच दरार पड़नी शुरू हो सकती है। इसी तरह यदि परिवार की बहु अपने मायके वालों की रुचि, उनकी आवभगत और जब चाहे तब उससे मिलने आ जाने की आदत को आवश्यकता से अधिक महत्व देती है तो समझिए कि संबंधों के बिगड़ने की शुरुआत हो चुकी है।

अक्सर परिवारों में मुखिया की मृत्यु होने पर संपत्ति को लेकर वाद विवाद होता है जिसका कारण अधिकतर किसी वसीयत के न होने या उसमें किसी को कम या ज्यादा देने से होता है।

कई मामलों में मृत्यु के समय जो व्यक्ति पास था, वह सहमति या जबरदस्ती यदि संपत्ति अपने नाम लिखा लेता है तो ऐसी स्थिति में परिवार के अन्य सदस्यों के सामने लंबी मुकदमेबाजी के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं रहता। इसका एक ही हल है कि अपने जीवन काल में ऐसी लिखित व्यवस्था कर दी जाए जिससे बाद में विवाद या झगड़ा होने की संभावना न रहे।

व्यापक स्तर पर प्रभाव

परिवार में यदि सब कुछ ठीक नहीं है तो उसका प्रभाव समाज पर पड़ना स्वाभाविक है क्योंकि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। इसे यदि व्यापक अर्थों में देखा जाए तो पारिवारिक असंतुलन या उसके विघटन का असर देश पर भी पड़ता है। आर्थिक विकास भी प्रभावित होता है और एकजुट रहने की शक्ति कमज़ोर पड़ती है।

बहुत से देशों में यह एक पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था बन गई है कि जब संतान के पालन पोषण और उसकी शिक्षा की जिम्मेदारी पूरी हो जाती है और वह वयस्क होकर अपने मुताबिक जीवन जीने के लिए तैयार हो जाता है, उसे अलग कर दिया जाता है । वह अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हो जाता है। मातापिता उसका साथ तो देते हैं लेकिन दखलंदाजी नहीं करते, न ही अपनी बात थोपते हैं। इसमें सरकार भी उनका साथ देती है और यह उसकी नीतियों की जिम्मेदारी है कि वह युवा अपने व्यक्तिगत जीवन में  समर्थ हो और अपने देश की प्रगति में योगदान करे।

हमारे देश में संयुक्त परिवार की परंपरा रही है इसलिए विदेशी मॉडल अपनाना सरल नहीं है। जिस तरह से आज एकल परिवार की धारणा को बल मिल रहा है, उससे स्थिति में बदलाव आना निश्चित है लेकिन वर्तमान समय में सबसे ज्यादा ज़रूरी है कि परिवार में बिखराव को रोकने के प्रयत्न किए जाएं। यह परिवार से लेकर सरकार तक का दायित्व है।


शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2022

विश्व इंटरनेट दिवस


प्रति वर्ष 29 अक्टूबर को विश्व इंटरनेट दिवस मनाने की परंपरा सन 1969 में पड़ी जब दो व्यक्तियों ने पहली बार एक कंप्यूटर से दूसरे कंप्यूटर तक दो शब्द एल और ओ भेजने में सफलता पाई। ये थे चार्ली क्लाइन जो अपने सहयोगी बिल दुवेल को लॉगिन शब्द भेजना चाहते थे लेकिन केवल दो अक्षर ही भेज पाए और सिस्टम क्रैश हो गया। इसी के साथ दुनिया को एक ऐसी खोज मिल गई जो आज जीवन की एक महत्वपूर्ण गतिविधि या कहें कि आपस में संवाद करने की जबरदस्त ताकत बन गई है। यह अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग के चंद्रमा पर कदम रखने के दो माह बाद हुआ था। उसके बाद सन 2005 से इंटरनेट का आकार बढ़ते बढ़ते पूरी दुनिया पर इस तरह छा गया कि इसने काम करने के तरीके, सोचने की दिशा और अपनी बात पलक झपकते ही दूसरों तक पहुंचाने की क्रिया को एक नया रूप दे दिया।

देखा जाए तो इंटरनेट क्या है, बस डाकखाने का परिवर्तित रूप है। जैसे पहले हम पत्र लिखकर डाक के डिब्बे में डालकर उसके अपने गंतव्य तक पहुंच जाने की व्यवस्था करते थे, वही इंटरनेट करता है। जिस तरह डाकघर में पत्रों को छांट कर अलग अलग खानों में रखकर और फिर वहां से जहां पहुंचाना है, सुनिश्चित किया जाता था, उसी तरह इंटरनेट से हमारा संदेश एक से दूसरे कंप्यूटर तक पहुंचता है। अंतर केवल इतना है कि जिस काम में पहले दिन से लेकर सप्ताह तक लग जाते थे, अब वह पलक झपकते ही हो जाता है।

आज पोस्ट ऑफिस की जगह सर्च इंजन हैं जो हुक्म मेरे आका की तर्ज़ पर अलादीन के चिराग की तरह तुरंत आपकी मनचाही सूचना हाज़िर कर देते हैं। मिसाल के तौर पर किसी शब्द का अर्थ जानना हो तो डिक्शनरी की ज़रूरत नहीं, बस टाईप कीजिए और जितने भी संभव अर्थ हैं, वे सामने स्क्रीन पर दिखाई दे जायेंगे। उनमें जो आपके मतलब का है, वह उठा लीजिए और अपना काम कीजिए।

इंटरनेट का काम है कि आपने जो जानकारी मांगी है, वह सबसे पहले, सबसे तेज़ और अनेक विकल्पों के साथ आप तक पहुंचाए।

इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग

इसके बाद मार्क जुकरबर्ग ने फेसबुक पकड़ा दी और उसके साथ व्हाट्सअप, ट्विटर, इंस्टाग्राम से लेकर कितने ही ऐसे प्लेटफॉर्म आते गए कि इंसान उन्हीं में इतना व्यस्त हो गया या कहें कि उलझ गया कि लगा कि कुछ और करने के लिए वक्त निकलना मुश्किल है।

अमेजन ने तो जैसे चमत्कार ही कर दिया। कहीं जाने की ज़रूरत नहीं, घर पर ही जो चाहो मिल जाएगा।

इंटरनेट केवल संदेश यानि मेल भेजने का साधन ही नहीं रहा, उसने शॉपिंग, बैंकिंग और लेनदेन को इतना सुगम और हरेक की पहुंच में ला दिया कि उसके लिए न पहले से कुछ इंतजाम करना है और न कहीं जाना है, बस कंप्यूटर हो या मोबाईल, उस पर उंगलियां चलानी हैं, जो चाहते हैं,वह हो सकता है। न लाईन में लगकर धक्कामुक्की करना, न कर्मचारी से बहस में उलझना और न ही किसी पर निर्भर रहकर इंतजार करना।

दुरुपयोग की असीमित संभावना

यहां तक तो ठीक लेकिन जब भारत जैसे देश में जहां सरकारी तंत्र हो या निजी व्यवस्था, समय पर काम न करने, चीज़ों को लटकाने और अपने किसी  स्वार्थ के लिए किसी काम को करने में टालमटोल करने की आदत वर्षों पुरानी हो, उसे बदलने में इंटरनेट कोई मदद नहीं कर सकता।

इसके अलावा जिस प्रकार किसी अविष्कार या अनुसंधान अथवा खोज के गुणों के बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है और उनसे लाभ उठाया जा सकता है लेकिन यदि कोई उसका गलत इस्तेमाल करना चाहे तो उसकी एक सीमित हद तक रोकथाम तो की जा सकती है, परंतु उसे फुलप्रूफ करना असम्भव है। ऐसा ही इंटरनेट के साथ है। इसका दुरुपयोग करना भी उतना ही आसान है, जितना इसका सदुपयोग।

आज इंटरनेट के ज़रिए साईबर क्राईम हो रहे हैं। लोगों को ठगने की इसमें बहुत आसानी है क्योंकि ठग तक पहुंचना मुश्किल है। इसके साथ ही ब्लैकमेल करने की कला जिसे आती है, उसके लिए यह एक अचूक साधन हैं। गलत संदेश देकर, बहका फुसलाकर अपने मनमुताबिक शिकार के अज्ञान या जानकारी के अभाव का पूरा फायदा उठाते हुए लूटपाट करना बहुत आसान है। अपराधी को पकड़ना मुश्किल होने से केवल हाथ मलने के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं है।

इंटरनेट व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से इस तरह वंचित करता है कि पता ही नही चलता कि कब वह इसका आदी हो गया है। दिन रात कंप्यूटर, मोबाईल या किसी अन्य उपकरण के ज़रिए वह इसमें इतना लिप्त रह सकता है कि उसे समय का भी अंदाज़ नहीं रहता।

इंटरनेट के ज़रिए लोगों की भावनाओं को भड़काना बहुत आसान है, इससे दंगे कराए जा सकते हैं, आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सकता है और समाज में उथलपुथल से लेकर युद्ध जैसे हालात पैदा किए जा सकते हैं। मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता और पोर्नोग्राफी के ज़रिए बहुत कुछ ऐसा दिखाया जा सकता है जो सामान्य रूप से निंदा की परिधि में आता है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि इंटरनेट कामकाजी दुनिया के लिए एक वरदान है, महामारी के समय यही सबसे बड़ा साथी रहा है, घर बैठकर पढ़ाई करने से लेकर अपनी नौकरी या व्यवसाय करने की सुविधा और अपार संभावनाएं इसकी बदौलत प्राप्त हुई हैं।

इसी के साथ कुछ देशों में अब इंटरनेट के बिना न रहने की आदत अर्थात इसकी लत छुड़ाने के लिए अनेक कार्यक्रम या कहें कि ईलाज के तरीक़े अपनाने की पहल होने लगी है। 

इंटरनेट आपके अकेलेपन का साथी भी है और बाकी दुनिया से अलग रखने का साधन भी लेकिन यह एक तरह के मानसिक तनाव को भी जन्म दे रहा है। एक अनुमान के अनुसार हमारे देश की आधी आबादी इंटरनेट का इस्तेमाल करती है। उसकी निर्भरता अब ऑनलाइन रहने तक सिमट गई है। इससे उसके व्यक्तिगत जीवन से लेकर स्वास्थ्य तक पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। यह स्थिति चिंताजनक है। इसका हल भी स्वयं व्यक्ति के पास है, उसे ही सोचना है कि वह इसकी आदत पड़ने से पहले किस तरह ऐसा व्यवहार करे जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।



शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022

ब्रिटेन की ताकत शिक्षा व्यवस्था और रोजगार तथा कम आबादी है

 

यह सही है कि हम अंग्रेजों की हुकूमत सह रहे थे और कितने ही संकल्पों और बलिदानों के बाद स्वतंत्र हुए लेकिन उतना ही बड़ा सच यह है कि आज भी ब्रिटेन एक आम भारतीय को यहां आकर रहने, नागरिकता प्राप्त करने के लिए लालायित करता रहता है।

यात्रा वृत्तांत

इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड के संयुक्त रूप ग्रेट ब्रिटेन की यात्रा एक सैलानी के रूप में करने पर अनेक बातें मन में उमड़ती घुमड़ती रहीं। इनमें सबसे अधिक यह था कि आखिर कुछ तो होगा जो अंग्रेज हम पर सदियों तक शासन कर पाए !

इसका जवाब यह हो सकता है कि इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि यहां शताब्दियों से शिक्षा की ऐसी व्यवस्था स्थापित होती रही थी जो विद्यार्थी हो या जिज्ञासु, उसे किसी भी विषय के मूल तत्वों को समझने और फिर जो उलझन है, समस्या है, उसका हल निकालने का सामथ्र्य प्रदान करती है।

पूरे देश में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का जाल फैला हुआ है और दुनिया का कोई भी विषय हो, यहां उसे पढ़ने का प्रबंध है और यही नहीं उसमें पारंगत होना लक्ष्य है। उद्देश्य यह नहीं कि इसका गुणगान किया जाए लेकिन वास्तविकता आज भी यही है और तब भी थी जब हमारे देश के गुलामी की जंजीरों को काटना सीखने से पहले भारतीय यहां पढ़ने आते थे। इनमें बापू गांधी, नेहरू, बोस भी थे तो वर्तमान दौर के अमृत्य सेन भी है।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय को देखने से लगता है कि जैसे एक पूरा शहर ही शिक्षा का केंद्र हो। यहां के भवन, क्लासरूम, पुस्तकालय इतने भव्य और विशाल हैं कि भारत में उनकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। विद्यार्थियों की लगन भी कमाल की है। सदियों से यहां शोध के लिए संसार के सभी देशों से लोग पढ़ने आते रहे हैं। हमारी गाईड ने एक किस्सा बताया कि जब बिजली नहीं थी तो दोपहर तीन बजे अंधेरा होने से पहले लाइब्रेरी बंद हो जाती थी। एक बार कुछ विद्यार्थी यहां पढ़ते पढ़ते सो गए और दरवाजे बंद होने का उन्हें पता नहीं चला। रात भर में उनके शरीर ठंड से अकड़ गए और सुबह मृत मिले। तब न बिजली थी, न हीटर और न आज की तरह एयरकंडीशन।

जहां तक यहां की शिक्षा प्रणाली है, उसके बारे में इतना कहना काफी है कि यह विद्यार्थियों को ब्रिटेन के तौर तरीके सिखाती है और जो कुछ पढ़ा है उसका पूरा लाभ केवल इसी देश में मिल सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि जो पढ़ने आयेगा, वह शिक्षित होकर यहीं का होकर रहने और अंग्रेजों की प्रशासन व्यवस्था का एक अंग बन जाने को प्राथमिकता देते हुए यहीं बस जायेगा। उसकी पढ़ाई लिखाई की पूछ या उपयोगिता उसके अपने देश में बहुत कम होने से वह लौटने के बारे में नहीं सोचता। यहीं नौकरी, फ़िर शादी भी किसी अपने देश की यहां पढ़ने वाली या स्थानीय लड़की से कर गृहस्थी बसा लेगा। अपने मातापिता को, अगर यह चाहे और वे भी आना चाहें, तो बुला लेगा वरना ख़ुद मुख्तार तो वह हो ही जाता है।

कोई भी भारतीय अपने बच्चों को यहां पढ़ने भेजने से पहले यह सोच कर रखे कि काबिल बनने के बाद वे भारत लौटकर आने वाले नहीं हैं। इसका कारण यह कि उसे पढ़ाई के दौरान पार्ट टाइम जॉब करने की सुविधा होती है, स्कॉलरशिप हो तो और भी बेहतर और सबसे बड़ी बात यह कि नौकरी के अवसर बहुत मिलने लगते हैं। अपने देश में न इतनी जल्दी नौकरी मिलेगी और न ही यहां जितना वेतन और सुविधाएं।

यहां भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश से आए लोग बहत अधिक हैं। जहां हमारे देश से पढ़ने के लिए आते हैं, वहां दूसरे देशों से कोई भी काम, जैसे टैक्सी ड्राइवर, खानसामा, वेटर या जो भी मिल जाए, करने वाले आते हैं।


ब्रेन ड्रेन रुक सकता है

यह सोचना काफ़ी हद तक सही है कि यदि यहां पढ़ने के बाद भारतवासी लौट आएं और नौकरी, व्यवसाय करें तो देश की अर्थव्यवस्था में कितना फर्क पड़ेगा। इसके विपरीत भारत सरकार ने अभी हाल ही में समझौता किया है जिसमें भारत से आने वालों को यहां की नागरिकता प्राप्त करने को बहुत आसान बना दिया गया है। होना तो यह चाहिए कि शिक्षा पूरी होने के बाद उसका अपने देश लौटना अनिवार्य हो ताकि भारत का जो उस पर धन लगा है, उसकी भरपाई हो सके।

यहां शिक्षित व्यक्ति को नौकरी या व्यवसाय करने के लिए सरकार को विशेष योजना बनानी होगी ताकि ब्रिटेन में नौकरी करने का उसके लिए विशेष आकर्षण न हो। यहां गोवा, गुजरात, पंजाब से आए लोग बहुत बड़ी संख्या में हैं। लंदन, ब्रिस्टल, मैनचेस्टर, कार्डिफ, एडिनबरा, ग्लासगो जैसे शहरों में दूसरे देशों से आए लोग सभी जगहों पर मिल जायेंगे। भारतीय खाने के शौकीन अंग्रेज़ इंडियन रेस्टोरेंट में अक्सर देखने को मिल जायेंगे। हाथ से खाने की आदत नहीं तो रोटी का टुकड़ा दाल या सब्जी में डुबोकर खाते देखना मनोरंजक है, ठीक उसी तरह जैसे कांटे छुरी से खाने का अभ्यास।

लंदन में मैडम टुसाद के संग्रहालय में विश्व के नामचीन लोगों के मोम से बने पुतले आपनी तरह की कारीगरी की बढ़िया मिसाल है। धोखा होता है कि कोई जीवित व्यक्ति तो नहीं खड़ा, उसका चेहरा जैसे कि बस अभी बात करने लगेगा। पुतले बनाने की विधि भी बताई जाती है।

यहां का एक दूसरा आकर्षण हैरी पॉटर म्यूज़ियम है जो बच्चों से लेकर बड़ों तक को आकर्षित करता है। सिरीज़ बनाने में कितनी मेहनत और कितनी तैयारी करनी पड़ती है, उसका सूक्ष्म विवरण यहां देखने और समझने को मिलता है।

लंदन से कुछ दूरी पर बाथ स्पा शहर है। यहां रोमन स्नानागार अपने प्राचीन रूप में देखने को मिल जायेंगे। उस समय की संस्कृति की झलक दिखाई देती है।

ब्रिटेन में जहां एक ओर विशाल और भव्य गिरिजाघर या कैथेड्रल हैं, जिन्हें देखकर इसकी प्राचीन संस्कृति और सभ्यता का पता चलता है, दूसरी ओर प्राकृतिक सौंदर्य के बेशुमार स्थल हैं। रोची नदी का विशाल पाट अपनी गंगा या नर्मदा जैसा लगता है। निर्मल जल, कभी शांत तो कभी अपने उग्र रूप में बहता हुआ, नाव या क्रूज की सैर को रोमांचक बना देता है।

स्कॉटलैंड को व्हिस्की का देश भी कहा जाता है। सत्रहवीं सदी की डिस्टलरीज आज भी शराब बना रहीं हैं जो पूरी दुनिया में अपने शौकीनों की प्यास बुझा रहीं हैं। मदिरा पीने का अपना अलग अंदाज़ है, उसके स्वाद, महक और रंग रूप का विवरण मोहक है। जौ, पानी और यीस्ट का इस्तेमाल कर बनाई जा रही मदिरा को बनते हुए देखना अपने आप में एक अनुभव है।

यहां के हरे भरे वन, बर्फ से ढकी चोटियां और नंगे पर्वत तथा मैदानी इलाकों का सौंदर्य देखते ही बनता है। दूर तक फैली हरियाली, हल्की बारिश और तेज हवा के झोंके ठंडक का एहसास कराते हैं। सारांश यह कि ग्रेट ब्रिटेन की सैर रोमांचक, शिक्षाप्रद और शानदार रही, यह तो कहा ही जा सकता है।

सच यह भी है कि अंग्रेज़ हमारे बौद्धिक, अद्योगिक और व्यापारिक संसाधनों का तब भी शोषण करते थे, जब यहां शासन करते थे। आज भी हमारे युवाओं को अपनी समृद्धि के लिए इस्तेमाल करते हैं। पहले यहां से कृषि और उद्योग के लिए रॉ मेटीरियल मुफ्त ले जाते थे और उनसे बने उत्पाद हमें ही बेचते थे, आज उच्च शिक्षा के नाम पर हमारे कुशाग्र और परिश्रमी युवाओं को लुभाते हैं। आश्चर्य होगा यदि जैसे तब विदेशी वस्तुओं के खिलाफ़ आंदोलन हुआ था, आज भी ब्रिटेन में शिक्षा प्राप्त कर वहीं न बस जाने को लेकर कोई मुहिम शुरू हो।


शनिवार, 8 अक्टूबर 2022

लंदन की सैर का मतलब भारत से तुलना करना भी है

 

प्रत्येक भारतवासी के मन में कभी तो यह बात आती ही होगी कि आखिर अंग्रेज़ी सल्तनत में ऐसा क्या था कि उनका सूरज कभी डूबता नहीं था ? काफी समय से यह बात  मन में थी कि अगर मौका मिले तो एक बार इंग्लैंड ज़रूर जाया जाए और अपने पाठकों को इस मुल्क की सैर कराई जाए । मन में इच्छा थी और वह पूरी भी हो गई और सत्ताईस सितंबर को मुंबई से लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर कदम रख दिए।

सुबह साढ़े सात बजे प्लेन ने लैंड किया और औपचारिकताएं निभाते हुए बाहर आने में दो घंटे लग गए। यह हवाई अड्डा बहुत विशाल है लेकिन भारत के दिल्ली और मुंबई के हमारे भी इसके सामने कुछ कम नहीं लगे। टैक्सी से केंसिंगटन में होटल तक की दूरी तय करने के दौरान इस आधुनिक शहर की झलक मिलने लगी। साफ़ सुथरी सड़कें, यातायात एकदम व्यवस्थित और उससे भी अधिक अनुशासित ढंग से अपने आप चल रहा था। अपनी लेन में चलना है, क्रॉसिंग पर सिग्नल का पालन ज़रूरी है और अगर जल्दबाजी या लापरवाही हुई तो कैमरे की निगाहें आप पर हैं। इसीलिए दुर्घटनाएं न के बराबर होती हैं।

हमारे यहां अभी केवल कुछ ही शहरों में और वह भी खास जगहों पर चालान कटने का डर होने से ट्रैफिक ठीकठाक तरीके से चलता है। वरना तो ज्यादातर जगहों पर नियम पालन करना अपनी हेठी समझी जाती है । कानून के डर के बिना जब तक ट्रैफिक नियम मानने की आदत नहीं बनती और सब कुछ चलता है जैसी मानसिकता रहती है तो सुधार होना ज़रा कठिन है।


यातायात

लंदन में आने जाने के लिए अंडरग्राउंड ट्यूब रेल है जो यहां की लाइफलाइन है, कहीं से कहीं भी जाना बहुत आसान है और वह भी निश्चित समय में। कई स्टेशनों पर नीचे से ऊपर पंद्रह बीस मंजिल तक रेल चलती है । इन स्टेशनों पर लिफ्ट की व्यवस्था है और पैदल इतना ऊपर चढ़ना उतरना परेशानी का कारण बन सकता है, इसकी चेतावनी दी जाती है।

दुनिया की पहली अंडरग्राउंड रेल की शुरुआत लंदन में सन 1863 में सड़कों पर भीड़भाड़ कम करने के लिए हुई थी । तब स्टीम इंजन का जमाना था। उसके बाद इलेक्ट्रिक पावर और लिफ्ट्स का इस्तेमाल शुरू हुआ और 1908 से 1930 तक इसका काफी विस्तार हो गया। इस रेल को चलते हुए 160 वर्ष हो जायेंगे। अब इसकी 11 लाईन हैं और 402 किलोमीटर तक 270 स्टेशनों के बीच फैलाव है। प्रतिदिन पचास लाख यात्री इनमें सफर करते हैं।


दर्शनीय स्थल

लंदन में वेस्टमिंस्टर एक तरह से शहर का केंद्र है। यहां विशाल और अद्भुत कारीगरी, अनोखी वास्तु कला तथा प्राचीन इतिहास की गवाह एक शानदार इमारत के रूप में बना चर्च वेस्टमिंस्टर एबे है। यह सन 1066 से राजशाही और राजतिलक की परंपरा निभा रहा है। अब तक यहां 17 मोनार्क अंतिम विश्राम कर चुके हैं। इनके अतिरिक्त बहुत से गणमान्य और प्रभावशाली और बड़ी हैसियत रखने वाले भी यहां मरने के बाद शान से अपने अपने रुतबे के मुताबिक आराम फरमा रहे हैं । यह पहले काफी छोटी जगह थी । हेनरी तृतीय ने सन 1245 में वर्तमान निर्माण शुरू कराया जो सोलहवीं शताब्दी तक चला। यहां शाही घराने के विवाह भी संपन्न हुए हैं । यहां का प्रशासन किसी आर्चबिशप या बिशप के पास नहीं बल्कि यह सीधे राजसिंहासन के अधिकार क्षेत्र में है।

इस इलाके में यहां की संसद है। इस के साथ थेम्स नदी की सैर भी क्रूज से की जा सकती है। क्रूज से यात्रा के दौरान लंदन ब्रिज, लंदन आई और आसपास की सामान्य ऊंचाई से लेकर बहुमंजिली शानदार इमारतों को देखते हुए वापिस आया जा सकता है।

यहां पार्लियामेंट स्क्वायर में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मूर्ति स्थापित है। यहीं पर सबसे आगे विंस्टन चर्चिल का विशालकाय बुत भी है जिसे देखकर याद हो आया कि यही वह शख्स था जिसने भारत विभाजन की रूपरेखा तैयार की थी और लॉर्ड माउंटबेटन को अपनी योजना को अमल में लाने के लिए भेजा था। पीछे खड़े गांधी जी भी उसके इरादों को भांप नहीं पाए। वह तो नेहरू और सबसे अधिक सरदार पटेल थे जिन्होंने चर्चिल के मंसूबों को कामयाब नही होने दिया।  एक बार फिर वह घटनाक्रम घूमने लगा जिसमें स्वतंत्र कहलाकर भी अंग्रेजों की गुलामी करने की गंदी राजनीतिक चाल चली गई थी जो सफल न हो सकी, बेशक उसके लिए बहुत कुछ कुर्बान करना पड़ा।

हमारे नेताओं की समझदारी से देश एक कुचक्र से तो बच गया लेकिन दो टुकड़ों में बांट दिया गया। यह भी चर्चिल की ही सनक थी कि दो अलग देश होकर भी एक दूसरे के विरोधी बने रहें।

सहूलियत वाला शहर

लंदन में भी कभी वायु और जल प्रदूषण हुआ करता था। अब यह बीते दिनों की बात हो गई है। यहां की हवा साफ और सांस लेने पर ताज़गी का अहसास कराती है। थोड़े थोड़े अंतराल पर बहुत से पार्क हैं, उनमें घने पेड़ हैं, रंग बिरंगे फूलों की छटा देखते ही बनती है। नल से साफ पीने का पानी मिलता है।

बकिंघम पैलेस के आसपास और सामने के पार्क में रानी एलिजाबेथ को श्रद्धांजलि देते हुए लोग एक निश्चित स्थान पर फूलों के गुलदस्ते रख जाते हैं। यहां सामने जेम्स पार्क में एक नहर है जिसमें जलपक्षी तैरते रहते हैं। बहुत ही सुन्दर और मनोहारी दृश्य है। पैदल सैर करने वाले लोग बढ़ते जा रहे हैं, हल्की सी ठंडक अनुभव होने से मौसम के बदलाव का संकेत मिल रहा है।

यह शहर प्राचीन वैभव, संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक होने के साथ आधुनिक शिक्षा, विज्ञान और साहित्य का भी केंद्र है। वास्तुकला की दृष्टि से यहां के घर अपनी विशिष्ट पुरातन शैली के हैं। उन्हीं के साथ जब बाजार का रुख करते हैं तो वर्तमान शैली के भवन दिखाई देते हैं। प्राचीन और नवीन का संगम अपनी अनोखी अदा से इठलाता नज़र आता है जैसे दोनों एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हों।

असल में यही अंग्रेजी शासन का मुख्य आधार रहा है। वे जहां भी गए और शासन की बागडोर अपने हाथ में ली तो उन्होंने उन सब चीजों के साथ तालमेल बिठाने को प्राथमिकता दी जिससे उनके लिए लोगों में विश्वास पैदा हो और वे उन्हें आक्रांता समझने के बजाय मित्र समझें।

भारत पर उनके शासन की जड़ें जमाए रखने में अंग्रेजों की यही तरकीब कामयाब हुई और बहुत से भारतीयों  ने उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में भलाई समझी। अंग्रेज़ तो मुट्ठी भर थे लेकिन साथ हमारे ही लोगों ने दिया।  इसका लाभ हुकूमत ने यहां लोगों को आपस में फूट डालकर राज करने की नीति अपनाकर लिया।

लंदन एक खूबसूरत शहर है, इसमें दो राय नहीं लेकिन इसके साथ साथ यह अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां के लोग दूसरों के साथ व्यवहार करते समय एक हो जाते हैं और अपने मतभेद भुला देते हैं। यहीं से इनकी असली मंशा शुरू होती है।  यह एक ओर अपने व्यवहार से अपना बनाए रखते हैं और दूसरी ओर अपनी होशियारी से उनका सब कुछ कब्जाने में सफल हो जाते हैं। इसका प्रमाण यह है कि लंदन में जितने भी म्यूजियम, संग्रहालय और गैलरी हैं उनमें दुनिया भर

से लाई गई नायाब चीजें हैं जिनमें भारत का कोहिनूर हीरा भी है।

कहना होगा कि लंदन समावेशी शहर है। यहां कई जगह पर स्थानीय आबादी से ज्यादा दूसरे देशों से पढ़ने, नौकरी, व्यवसाय या व्यापार करने के लिए आए लोग बस गए हैं। अचानक कोई अपनी भाषा में बात करने लगे तो सुखद आश्चर्य होता है। उसके बाद तो बातों बातों में भारत के किसी भी प्रदेश से यहां आकर बसे हों, अपनेपन के साथ बातचीत का सिलसिला शुरू हो जाता है जो एक यादगार क्षण रहता है।   


शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

सृष्टि के अनुसार मनुष्य और पशु पक्षी एक दूसरे पर निर्भर तथा पूरक हैं


अक्सर इंसान और जानवर के बीच संघर्ष होने, एक दूसरे पर हमला करने की वारदात होती रहती हैं। मनुष्य क्योंकि सोच सकता है इसलिए वह अपने लाभ के लिए उनकी नस्ल मिटाने में भी संकोच नहीं करता जबकि प्रकृति की अनूठी व्यवस्था है कि दोनों अपनी अपनी हदों में एक साथ रह सकते हैं।


प्राकृतिक संतुलन

देश में चीते समाप्त हो गए थे और जानकारों के मुताबिक उससे प्राकृतिक संतुलन में विघ्न पड़ रहा था, इसलिए उन्हें फिर से यहां बसाया जा रहा है। कुछ तो महत्वपूर्ण होगा कि यह कवायद की गई। चीता सबसे तेज दौड़ने वाला जीव है, अपनी हदें पार न करने के लिए जाना जाता है, जैव विविधता और इकोसिस्टम बनाए रखने में सहायक है। वन संरक्षण के लिए जरूरी जानवरों की श्रेणी में आता है जैसे शेर, बाघ, तेंदुआ, हाथी, गैंडा जैसे बलशाली, भारी भरकम और बहुउपयोगी पशु हैं।

सभी पशु पक्षी मनुष्य के सहायक हैं लेकिन यदि उनके व्यवहार को समझे बिना उनके रहने की जगह उजाड़ने की कोशिश की जाती है तो वे हिंसक होकर  विनाश कर सकते हैं। उदाहरण के लिए हाथी जमीन को उपजाऊ बना सकता है लेकिन उसे क्रोध दिला दिया तो पूरी फसल चैपट कर सकता है। इसी तरह गैंडा कीचड़ में रहकर मिट्टी की अदलाबदली का काम करता है, प्रतिदिन पचास किलो वनस्पति की खुराक होने से जंगल में कूड़ा करकट नहीं होने देता और उसके शरीर पर फसल के लिए हानिकारक कीड़े जमा हो जाते हैं, वे पक्षियों का भोजन बनते हैं और इस तरह संतुलन बनाए रखते हैं। लेकिन यदि वह विनाश पर उतर आए तो बहुत कुछ नष्ट कर सकता है।

हाथी के दांत और गैंडे के सींग के लिए मनुष्य इनकी हत्या कर देता है जबकि ये दोनों पदार्थ उसकी कुदरती मौत होने पर मिल ही जाने हैं। इन पशुओं के सभी अंग और उनके मलमूत्र दवाइयां बनाने से लेकर खेतीबाड़ी के काम आते हैं और कंकाल उर्वरक का काम करते हैं। ये दोनों पशु कीचड़ में रहकर दूसरे जानवरों के पीने के लिए किनारे पर पानी का इंतजाम करते हैं और सूखा नहीं पड़ने देते, सोचिए अगर ये न हों तो जंगल में प्यास, गर्मी और सूखे से क्या हाल होगा?

मांसाहारी पशु शाकाहारियों का शिकार करते हैं और उनकी आबादी को नियंत्रित करने का काम करते हैं। जो घास फूस खाते हैं, वे वनस्पतियों को जरूरत से ज्यादा नहीं बढ़ने देते और इस तरह जंगल में अनुशासन बना रहता है। इसका प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है और वह प्राकृतिक संतुलन होने से मौसम का मिजाज बिगड़ने से होने वाले नुकसान से बचा रहता है। यदि हम वन विनाश करते हैं, अंधाधुंध जंगलों को नष्ट करते हैं तो उसका सीधा असर हम पर पड़ता है।


निर्भरता

बहुत से पशु पक्षी ऐसे हैं जो न हों तो मनुष्य का जीना मुश्किल हो जाएगा। चमगादड़ जैसा जीव कुदरती कीटनाशक है। यह एक घंटे में खेतीबाड़ी के लिए हानिकारक एक हजार से अधिक कीड़े मकोड़े खा जाता है। मच्छरों को पनपने नहीं देता और इस तरह कृषि और उसमें इस्तेमाल होने वाले जानवरों और दुधारू पशुओं की बहुत सी बीमारियों से रक्षा करता है। उदाबिलाव जैसा जीव बांधों और तालाबों में जमीन की नमी और हरियाली बनाए रखता है। इससे सूखा पड़ने पर आग नहीं लग पाती। वेटलैंड का निर्माण भी करते हैं और जरूरी कार्बन डाइऑक्साइड का भंडार देते हैं।

मधुमक्खी, तितली और चिड़ियों की प्रजाति के पक्षी अन्न उगाने में किसान की भरपूर सहायता करते हैं। परागण में कितने मददगार हैं, यह किसान जानता है। पेस्ट कंट्रोल का काम करते हैं। गिलहरी को तो कुदरती माली कहा गया है। केंचुआ जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए कितना जरूरी है, यह किसान जानता है।

हमारे जितने भी पाले जा सकने योग्य जानवर और दूध देने वाले पशु हैं, उनकी उपयोगिता इतनी है कि अगर वे न हों या उनकी संख्या में भारी कमी हो जाए तो मनुष्य की क्या दशा होगी, इसकी कल्पना की जा सकती है। गाय, भैंस, गधे, घोड़े, बैल, सांड से  लेकर कुत्ते बिल्ली तक किसी न किसी रूप में मनुष्य के सहायक हैं। इसीलिए कहा जाता है कि पशु पक्षी आर्थिक संपन्नता के प्रतीक हैं।

हमारी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने वाले घटकों में पर्यावरण संतुलन, वन संरक्षण, जैव विविधता और मजबूत इकोसिस्टम आता है। हमारा औद्योगिक विकास इन्हीं पर निर्भर है। इसके साथ ही पर्यटन, मनोरंजन, खेलकूद और जीवन के लिए आवश्यक वस्तुएं जुटाने के लिए वन विकास और वन्य जीव संरक्षण जरूरी है। यह समझना सामान्य व्यक्ति के लिए आवश्यक है।

आज विश्व में इस बात की होड़ है कि गंभीर बीमारियों की चिकित्सा के लिए औषधियों की खोज और निर्माण के लिए भारतीय जड़ी बूटियों और पारंपरिक नुस्खों को प्राप्त किया जाए। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय षडयंत्र हो रहे हैं और इस बहुमूल्य संपदा की तस्करी करने वाले बढ़ रहे हैं। यह एक तरह से अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है क्योंकि लालच में आकर हम जो कर रहे हैं वह विनाश का निमंत्रण है।

इस स्थिति में सुधार तब ही संभव है जब सामान्य व्यक्ति यह समझ सके कि मनुष्य और पशु एक दूसरे पर न केवल निर्भर हैं बल्कि पूरक भी हैं। दोनों का अस्तित्व ही खुशहाली का प्रतीक है। यदि जंगल से एक जीव लुप्त हो जाता है तो उसका असर सम्पूर्ण पर्यावरण पर पड़ना स्वाभाविक है। चीता इसका उदाहरण है। इस लुप्त हो गए जीव को फिर से स्थापित करने का प्रयास यही बताता है कि किसी भी भारतीय पशु के लुप्त होने का क्या अर्थ है। इसलिए आवश्यक है कि यह समझा जाए कि इसके क्या कारण हैं?

यदि हम गैर कानूनी शिकार, जानवरों की बस्तियों में इंसान के दखल और थोड़े से पैसों के लाभ को छोड़ने का मन बना लें तो कोई कारण नहीं कि इनकी उपयोगिता समझ में न आए।

औद्योगिक विकास देश की अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है लेकिन यदि इससे जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक असंतुलन पैदा होता है तो दोबारा सोचना होगा। आधुनिक विज्ञान ने इतनी प्रगति कर ली है कि बिना वन विनाश किए उद्योग स्थापित किए जा सकते हैं। यह प्राकृतिक असंतुलन का ही परिणाम है कि हमें प्रति वर्ष अतिवृष्टि या अत्यधिक सूखे का सामना करना पड़ता है। इससे बचना है तो प्रकृति के साथ टकराव नहीं, सहयोग करने की आदत डालनी होगी।


शुक्रवार, 16 सितंबर 2022

प्रसन्न रहने की आदत या दुःख को स्वीकार करना अपने हाथ में है


इस बात का कोई निश्चित पैमाना नहीं है कि एक व्यक्ति क्यों खुश रहता है और लगभग वैसी ही परिस्थितियों में दूसरा क्यों दुःख का अनुभव करता है ? असल में हमारा दिमाग किसी भी घटना चाहे वह कैसी भी हो, उसके बारे में दो तरह से प्रतिक्रिया करता है। एक तो यह कि जो हुआ उस पर वश नहीं इसलिए उसे सहज भाव से स्वीकार कर लेने में ही भलाई है और दूसरा यह कि आखिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ जो यह दिन देखना पड़ा, इसे खु़द पर हावी होने देना।

सब कुछ वश में नहीं होता

अक्सर जीवन में ऐसा कुछ होता रहता है, ऐसे मोड़ आते हैं और इस तरह के हालात बन जाते हैं जिनसे  व्यक्ति स्वयं को किसी मुसीबत में घिरा हुआ और असहाय महसूस करता है। बाहर निकलने के लिए  कोई उपाय नहीं सूझता, उम्मीद लगाता है कि एक तिनके की तरह किसी का सहारा मिल जाए या अचानक कोई रास्ता निकल आए ।

दूसरा विकल्प यह रहता है कि निराशा के भंवर में डूबने के बजाए अपने को उस वक्त तक के लिए तैयार कर लिया जाए जब तक परिस्थितियां सामान्य न हो जाएं। कहने का अर्थ यह कि हर किसी को अपनी समस्या का हल स्वयं ही निकालने के लिए अपने को तैयार करना होता है और जो करना है उसकी भूमिका से लेकर अंतिम प्रयास तक की रूपरेखा बनाने और उस पर अमल करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेनी पड़ती है।

उदाहरण के लिए मान लीजिए कि आपके साथ कोई व्यक्तिगत या पारिवारिक त्रासदी हुई है, कुछ ऐसा हुआ है कि वह हर समय मन पर छाया रहता है, उस घटना ने मानसिक रूप से डावांडोल और विचलित कर दिया है, उसका असर शरीर यानी सेहत पर पड़ने लगा है,  अनमनेपन का भाव और अकेले रहने की आदत बनती जा रही हो तो समझिए कि मामला गंभीर है।

किसी दुर्घटना या जो हुआ उसे बदलना आम तौर से संभव नहीं होता, इसलिए इस तथ्य को स्वीकार करना ही पड़ता है कि जिस चीज के होने पर हमारा वश नहीं तो उसे लेकर हमारी दिनचर्या क्यों प्रभावित हो। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वह घटना हम पर हावी न हो और हम पहले की तरह अपना काम करते रहें। व्यवहार में बदलाव न आने दें और सहज भाव से जो हुआ या हो रहा है, स्वीकार करते हुए आगे जो होगा, उसे भी इसी रूप में लेने के लिए अपने को तैयार कर लें। ऐसा करने का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि शरीर और मन एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण करने के लिए स्वतंत्र होकर तत्पर हो जायेगा।

सुख या दुःख का हावी होना

दुःख हो या सुख, उसे अपने मन पर अधिकार कर लेने देने का कोई औचित्य नहीं क्योंकि दोनों ही हमेशा अपने साथ रहने वाली चीजें नहीं हैं । बेहतर तो यही है कि दोनों को ही कपड़ों पर पड़ी धूल की तरह छिटक देने का प्रयास ही उन्हें हावी न होने देने के लिए काफी है।

दुःख के बेअसर करने की प्रक्रिया यह है कि आप जो काम करते हैं, नौकरी या किसी व्यवसाय का संचालन करते हैं, उसमें पहले से ज्यादा जुट जाएं ताकि जिस चीज ने आपको विचलित किया हुआ है और जिसकी वजह से सुख चैन छिन गया लगता है, उसका ध्यान ही न रहे। अधिक श्रम चाहे मानसिक हो या शारीरिक, थकाने के लिए काफी है और इससे आप को आराम करने, सोने और जो हुआ, उसे याद न करने अर्थात भुलाने में मदद मिलेगी। इससे जल्दी ही वह क्षण आ सकता है जिसमें वह बात याद ही न रहे जिसने आपके खुश रहने में रुकावट डाली है।

यही प्रक्रिया तब भी अपनाई जा सकती है जब हमें कोई अपार सफलता प्राप्त हुई हो और जिसके परिणामस्वरूप प्रसन्नता स्वाभाविक रूप से मिल गई हो और आप उससे फूले न समा रहे हों। मान कर चलिए कि जिस तरह दुःख की सीमा तय है, उसी तरह सुख की अवधि भी सीमित है। इसलिए उसे भी अगर धूल समझकर छिटकना न चाहें तो कम से कम उसे अपने से लिप्त न होने दें क्योंकि न जाने कब वह आपसे दूर चली जाए और आप उसकी याद से ही बाहर न निकल सकने के कारण अपना वर्तमान स्वीकार न कर सकें और हमेशा उसकी याद से अपने भूतकाल से ही जूझते रहें।

एक बात और है और वह यह कि प्रसन्नता या खुशी और दुःख ऐसी वस्तुएं नहीं हैं जो बस हो जाएं या अचानक मिल जाएं। यह प्रत्येक व्यक्ति के अंतर में पहले से ही विद्यमान हैं। इसका मतलब यह कि उन्हें समझने के लिए अपने साथ दोस्ती करनी पड़ेगी, अपने मन को लेकर स्वार्थी बनना होगा। वास्तविकता यह है कि किसी अच्छी बुरी घटना का प्रभाव गरम तवे पर पड़े पानी के छीटों की तरह अधिक समय तक नहीं रहेगा।

यह कुछ ऐसा है जैसे कि अपनी कहानी आप स्वयं लिख रहे हैं, इससे किसी दूसरे का कोई लेना देना नहीं है।  आपकी भावनाओं पर केवल आपका अपना अधिकार है, इसमें किसी दूसरे की दखलंदाजी नहीं है। मतलब यह कि इस मानसिक कसरत के बाद यदि आपने इस बात के लिए अपने को तैयार कर लिया है कि कोई क्या कहता है, उसका असर अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया तो खुश रहने से वंचित नहीं रहा जा सकता। कैसे भी हालात हों, उनके अनुसार अपने मन को तैयार कर लेना ही किसी भी अच्छी बुरी घटना को स्वीकार करते हुए जीवन जीने की कला है।

इससे होगा यह कि किसी होनी या अनहोनी के लिए आप न तो स्वयं को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार मानेंगे और न ही बिना भली भांति विचार किए किसी अन्य को दोषी मानेंगे। इससे होगा यह कि मन बेकार में तनाव से ग्रस्त नहीं होगा और जो भी परिस्थिति है उस पर सकारात्मक सोच से निर्णय लेने में सक्षम होगा। नकारात्मक विचारों से प्रभावित न होकर किसी भी समस्या का हल निकालने में सक्षम हुआ जा सकता है। इसका एक सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि जीतना या हारना महत्वपूर्ण न होकर सही फैसला लेना ही उद्देश्य होगा और तब जो हासिल होगा, वही अपने को खुशी प्रदान करेगा।

तालमेल जरूरी है

वर्तमान समय कुछ ऐसा है कि बड़े शहरों की आपाधापी और दौड़भाग और सब कुछ जल्दी से जल्दी प्राप्त कर लेने की प्रवृत्ति ग्रामीण क्षेत्रों में भी बहुत तेजी से बढ़ रही है। देखा जाए तो यह समाज का एक स्वाभाविक स्वरूप है क्योंकि जब माह, सप्ताह, दिन और घंटों की दूरियां कुछ पलों में सिमट जाएं तो नगरों और गांवों को एक दूसरे के प्रभाव में आकर होने वाले बदलाव से रोकना संभव नहीं है।

जब व्यक्तिगत हो या पारिवारिक, खुश रहना अपनी आदत बन जाए तो फिर सकारात्मक परिणाम हों या नकारात्मक, कोई अंतर नहीं पड़ता। असल में होता यह है कि जब समाज को हर हाल में खुश रहने की आदत पड़ जाती है तो वह अधिक तेजी से आगे बढ़ता है क्योंकि उसकी प्रतियोगिता किसी दूसरे से नहीं बल्कि अपने आप से होती है। उसका कोई भी शत्रु उस पर विजयी नहीं हो पाता क्योंकि उसे प्रसन्न होकर अपना काम करना आता है।

निष्कर्ष यही है कि प्रसन्न रहना है तो स्वयं को केंद्र में रखकर व्यवहार करना सीखना होगा, इसे निजी स्वार्थ न कहकर प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीना कहना ठीक होगा।