शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

कोरोना बीमारी से निपटने के बाद के हालात पर सोचना जरूरी है।












जैसा कि कहते हैं कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, मतलब हम जो भी करते हैं, बदले में  कुछ न कुछ होना तय है। इसका अर्थ एक तरफ तो यह हुआ कि आज जो हम कर रहे हैं उसे करने से पहले भली भांति सोच विचार कर लें ताकि उसका परिणाम जब निकले तो उसका अफसोस न हो और दूसरी तरफ यह कि यदि परिणाम अपने अनुकूल न निकले तो अफसोस, चिंता या वाद विवाद न कर उसे नियति का उपहार समझ स्वीकार करें और फिर से अपना लक्ष्य पाने की कोशिश करते रहे।



खतरे की घंटी

अब हम आते हैं इस बात पर कि जब इस बीमारी का फैलाव शुरू हुआ तो सबसे पहले और सबसे बड़ी तादाद में वे देश थे जो विकसित, अमीर, साधन संपन्न और आर्थिक तथा सैन्य ताकत का प्रदर्शन करने में सबसे आगे रहते थे।

चीन से निकली बीमारी जब अमेरिका, यूरोप, एशिया के अमीर देशों में पहुंची तो उन्होंने अपने घमंड के कारण
चीन इस बीमारी के बारे में जानता था लेकिन उसके हाथ से भी जिन्न निकल चुका था, फिर भी समझदारी दिखाते हुए वुहान शहर की तालाबंदी कर दी जिसका संज्ञान जिन देशों ने लिया उन्होंने भी अपने यहां खतरे को महसूस
रते हुए जरूरी कदम उठाने शुरू कर दिए।

फरवरी में जब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन बार बार हाथ धोने, खांसते, छींकते रुमाल रखने और फिर मास्क पहनने की बात करने लगे तो लगा कि खतरा आसपास ही है। इस क्रिया की प्रतिक्रिया यह हुई कि लोग सावधान होने लगे।


सरकार क्या, हर कोई जानता है कि हमारी 75 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में है और शहरों की बड़ी आबादी उन लोगों की है जो गांव देहात से रोजगार, शिक्षा, नौकरी, व्यवसाय के लिए यहां बस गए हैं आम तौर से रिटायर होने या उससे पहले मौका मिलते ही अपने गांव या देस जाने के लिए उतावले रहते हैं।

अब जैसे ही लॉकडाउन हुआ, ये लोग शहरों में कोई इंतजाम न होने से बड़ी संख्या में पलायन करने लगे।

सरकारों की चूक, गलती या दंडनीय अपराध यह था कि तालाबंदी करते ही उसे लोगों को अपनी जगह पर ही रुकने या उन्हें जहां वे जाना चाहे, सुरक्षित पहुंचाने का इंतजाम नहीं हुआ। रुपए पैसे की सरकारी मदद की आधी अधूरी बात भी कई दिन बाद हुई। इस भूल का परिणाम दिखने लगा है और संक्रमित होने वालों की संख्या तेजी  से बढ़ रही है।



चुनौतियों का सामना



जो आया है वह जाएगा, इस के मुताबिक यह बीमारी भी देर सवेर खत्म हो ही जाएगी और इसका इलाज भी निकल आयेगा। लेकिन तब तक अगर हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे तो उसकी प्रतिक्रिया में गरीबी, बेरोजगारी से लेकर अकाल और भुखमरी तक का सामना करना पड़ सकता है।

इसे वरदान ही कह सकते हैं कि हमारे देश में परिवार नियोजन की असफलता का परिणाम देश की तीन चैथाई आबादी का युवा होना है और इस बीमारी से मरने वाले अधिकतर सभी देशों में वे हैं जो 50-60 की उम्र पार कर चुके हैं और क्योंकि उन देशों में आबादी को बढ़ने नहीं दिया गया तो वहां युवा आबादी कम होती गई।

इस महामारी का पहला दुष्परिणाम यह होने वाला है, अगर हम सावधान न रहे,  देश में युवा आबादी के लिए रोजगार पैदा करना सबसे बड़ी चुनौती होगी क्योंकि करोड़ों की संख्या में लोग, औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्रों में जबरदस्त मंदी के कारण बेरोजगार होने वाले हैं।
सरकार तो क्योंकि अपनी लेट लतीफी और वक्त पर सोते रहने के कारण सही समय पर उचित निर्णय न लेने के लिए मशहूर है, इसलिए यह नागरिकों को ही सोचना पड़ेगा कि आने वाले संकट का मुकाबला कैसे करें?




समय का इस्तेमाल

जरूरी है कि तालाबंदी के दौरान घर में बैठकर योजना बनाना  शुरू कर दें कि नौकरी छूट जाने, व्यापार और उद्योग में घाटा हो जाने और जो भी जमा पूंजी है, उसके समाप्त होते जाने की अवस्था में आप को क्या करना है। कोई नया काम धंधा या रोजगार करने के बारे में सोचना शुरू कर दीजिए जो आप अपनी शिक्षा और योग्यता के बल पर कर सकने का हौसला रखते हैं। यह इसलिए है कि कहीं ‘जब चिड़ियां चुग गई खेत तो पछताने से क्या लाभ, आप पर न लागू हो जाए। इसमें अपने परिवार से भी चर्चा करें क्योंकि सब घर में ही हैं।

दुनिया के जो विकसित और अमीर देश हैं, उनके यहां संसाधन तेजी से कम होने वाले हैं, ऐसे में उन देशों को अपने यहां बनी चीजों का निर्यात करने की अपार संभावनाएं होने वाली है। चीन ने यह काम इस बीमारी से पूरी तरह निजात पाने से पहले ही करना शुरू कर दिया है।

आने वाले दिनों में भारत को चीन से आगे निकलने की चुनौती को स्वीकार कर अपने लिए नए बाजार खोजने होंगे और विज्ञान तथा तकनीक के आधार पर आधुनिक व्यापारिक तरीकों को अपनाने के बारे मैं अभी से सोचना होगा।

एक बात और है और वह यह कि जो बड़ी संख्या में लोग देहात  चले गए हैं तो उन्हें वहीं रोककर उनके लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा कर दिए जाएं ताकि वे वहीं रहने लगें और शहरों में पलायन न करें। इस तरह उनके जाने से शहरों में खाली हुए रोजगार शहरी लोग अपना सकते हैं और शहरों में जो बेरोजगारी बढ़ने वाली है उसका मुकाबला कर सकते हैं।

सरकार और उद्योगपतियों के लिए यह एक अनूठा अवसर है कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में कल कारखाने स्थापित करने की योजना बनाकर उस पर अमल  कर सकते हैं। कच्चा माल, मजदूर, कामगार और पढ़े लिखे बेकार बैठे नौजवान उद्योगपति और एंटरप्रेन्योर के सपने साकार कर सकते हैं और यह अपने आप में क्रांतिकारी परिवर्तन होगा।

यह बात तथ्यों पर आधारित है। जिन देशों में आर्थिक मंदी होने वाली है, वहां ग्रामीण क्षेत्र 20 प्रतिशत से अधिक नहीं है जबकि हमारे यहां उसका उलट है, मतलब 80 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र है। कृषि कर्म को उद्योगों की स्थापना से जोड़कर यह सरकार किसानों की आमदनी दुगुना करने का वायदा पूरा कर सकती है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र में अद्योगिक क्रांति का फायदा किसान को ही होगा।



इसके बाद उन लोगों को सतर्क हो जाना चाहिए जिन्होंने अपना धन, जमापूंजी या वृद्धावस्था के लिए बैंकों में रखा है या फंड्स में लगा रखा है तो उन्हें अभी से सावधान होकर अपने इन्वेस्टमेंट सलाहकार से बात करना शुरू कर देना चाहिए। बाजार में लगातार गिरावट आगे भी जारी रहेगी और इससे उबरने में काफी समय लगने वाला है।


इसका अर्थ यह हुआ कि अपनी गांठ का पैसा मजबूती से पकड़ कर रखना है और उसे फिसल कर खो जाने से बचने के उपाय करने हैं।
यह कुछ ऐसी चुनौतियां हैं और इसके साथ ही अनमोल अवसर हैं जो देश का भाग्य बदल सकते हैं। तालाबंदी का इस्तेमाल अपनी आमदनी बढ़ाने के बारे में सोचने और योजना बनाने में सफलतापूर्वक किया जा सकता है।
म्उंपसरूचववतंदबींदकेंतपद/हउंपसण्बवउ

भारत



शुक्रवार, 27 मार्च 2020

स्वास्थ्य के अधिकार को मूलभूत अधिकार बनाने का यही समय है










दुनिया भर में फैली कोरोना वायरस की महामारी ने हमारे देश में कुछ मूल प्रश्नों को जन्म दिया है जिन पर विचार करना आवश्यक हो गया है और अब क्योंकि पूरा देश तालाबंदी में है इसलिए जनता अपने घर बैठकर इस बारे में सोच सकती है कि जब हम बीमारी मुक्त हो जाएंगे तो स्थाई रूप से क्या प्रावधान किए जाएं जिनसे भविष्य में ऐसी किसी आपदा का सुगमता से मुकाबला किया जा सके।

सेहतमंद रहने का मूलभूत अधिकार

हालांकि हमारे संविधान में स्वास्थ्य को लेकर अनेक अनुच्छेदों में इसका जिक्र है लेकिन मूलभूत अधिकार न होने से कोई भी अदालत इनमें कही गई बातों पर सख्ती से अमल नहीं करा सकती। यह वैसा ही है जैसे कि संविधान के मुताबिक बने कानूनों पर अमल करवा पाना इतना मुश्किल है कि दसियों वर्ष तक मुकदमें चलते रहते हैं। दो उदाहरण जो हाल ही के हैं, देने से इस मुश्किल को समझा जा सकता है। एक है संविधान संशोधन कानून का गैर कानूनी विरोध और दूसरा निर्भया के दोषियों को फांसी से बचाने के लिए कानूनी प्रावधानों में खोखलापन होने से लगातार उनका दुरुपयोग।


हमारे देश में ‘सेहत हजार नियामत है, पहला सुख निरोगी काया‘ जैसे मुहावरे प्रचलित हैं। जब हम सेहतमंद रहने के अधिकार को संविधान के मूलभूत अधिकारों में शामिल करने की वकालत करते हैं तो यह समझना जरूरी है कि हमारा प्रत्येक अधिकार हमारे कर्तव्य पालन से जुड़ा होता है जिसके बिना कोई भी अधिकार सफल नहीं हो सकता।


जब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 70 साल पहले इस पर चर्चा शुरू की थी और यह संगठन का शुरुआती दौर था तो इसे मानव अधिकारों से जोड़कर देखा गया था। मतलब यह कि जैसे हमारे मानवाधिकार होते हैं उसी तरह स्वस्थ रहने का अधिकार भी इससे जुड़ा है।


जरूरत क्यों है ?


भारत में इसे मूलभूत अधिकार बनाने की जरूरत इसलिए है क्योंकि जब भी कोई प्राकृतिक और मानवीय आपदा आती है तो सबसे पहले उसका असर औद्योगिक कामगारों और मजदूरों पर पड़ता है। उनकी बेरोजगारी का  मतलब है जीवन के लिए जरूरी भोजन का इंतजाम खत्म हो जाना अर्थात उनका शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होते जाना, सेहत का लगातार गिरते जाना और एक दिन रोजी रोटी के अभाव में बीमार होकर मर जाना।


इस वर्ग के साथ वे भी जुड़ जाते हैं जो सरकारी और निजी दफ्तरों में काम करते हैं और आपदा के समय काम धंधे से निकाले जाने की नौबत आने पर पैसों के आने का रास्ता बंद होने से सबसे पहले खाने पीने की चीजों की कटौती करते हैं और स्वस्थ न रहने से बीमारियों का शिकार होकर शमशान घाट की राह पर चल पड़ते हैं।


बीमारी और संक्रमण

जब पौष्टिक भोजन न मिले, गंदगी में रहना पड़े तो कई तरह के घातक विषाणु शरीर पर हमला कर देते हैं और वह व्यक्ति अपने साथ दूसरों की जिन्दगी के लिए भी खतरा बन जाता है जैसा कि अब हो रहा है क्योंकि अस्वस्थ मनुष्य की रोगों से लडने की ताकत कम होती जाती है जो  पूरे समाज के लिए हानिकारक है।
इन सब बातों को देखते हुए जैसे हमारा जीने का अधिकार है, उसी तरह स्वस्थ रहने का भी मूलभूत अधिकार होना चाहिए जिससे सरकार, संविधान, कानून और समाज की जिम्मेदारी तय हो जाए कि किसी भी मुसीबत के समय नागरिकों को सेहत के नुकसान का सामना न करना पड़े और उसे इतना पैसा और सुविधाएं मिलती रहे जिससे वह स्वस्थ रह सके। इसी के साथ यह गरीब हो या अमीर सब पर समानता के सिद्धांत की तरह लागू हो।



स्वास्थ्य अधिकार की रूपरेखा


इस अधिकार के संविधान का मूलभूत अधिकार बनाने से पहले उसकी रूपरेखा तय करना भी जरूरी है वरना यह भी दिखावटी कानूनों की तरह बेकार हो जाएगा।

कोई भी व्यक्ति स्वस्थ तब ही रह सकता है जब उसे पौष्टिक भोजन, शुद्ध पीने का पानी, प्रदूषण रहित पर्यावरण, शौचालय सुविधा मिलने और बीमार होने पर इलाज करवाने का इंतजाम हो।


यह सब करने के लिए एक विशेष संस्थान बनाना होगा जो यह सब सुविधाएं देने के लिए बनी विभिन्न इकाईयों की नोडल इकाई हो जो किसी भी कारण से किसी भी व्यक्ति को सेहतमंद न रहने की संभावना होते ही तुरंत सहायता करने की पहल करे ताकि उसे स्वस्थ रहने में कोई कमी न होने पाए।


आज हमारे देश में स्वस्थ रहने, बीमार होने पर चिकित्सा कराने के लिए सरकारी और प्राइवेट संसाधन हैं जिनमें डॉक्टर, अस्पताल, नर्सिंग होम, स्वास्थ्य केंद्र, डिस्पेंसरी आदि हैं और इनकी सुविधाएं हैसियत यानी आमदनी से जुड़ी हैं।


अब हुआ यह कि जो धनवान थे उनके  लिए फाइव स्टार अस्पताल बन गए और जो सामान्य आय वाले थे उनके लिए सरकारी अस्पताल रह गए जहां इतनी भीड़ हो गई कि सब का सही इलाज करना असम्भव सा हो गया।
आज जो हम निजी क्षेत्र के डॉक्टरों और अस्पतालों की फीस तथा खर्चे भुगतने में असमर्थ होते जा रहे हैं और बिना सही चिकित्सा के मर रहे हैं तो इसका सबसे बड़ा कारण इन सब पर सरकार का कोई नियंत्रण न होना है। आज किसी भी डॉक्टर की फीस एक बार में पांच सौ के आसपास  से शुरू होकर हजारों में पहुंच रही है। इसी तरह पैथोलॉजिकल लैब के खर्चे आम आदमी के लिए बहुत ज्यादा हो गए हैं।



इसी तरह जो चिकित्सा उपकरण सरकारी अस्पतालों में निशुल्क उपलब्ध हैं, वे प्राइवेट में इतने महंगे हैं कि उनके इस्तेमाल की हिम्मत नहीं होती। जहां एक तरफ एक अनार और सौ बीमार हैं तो दूसरी तरफ एक धनवान के लिए डॉक्टरों और उपकरणों की फौज है।



स्वस्थ रहने का मूलभूत अधिकार होने से ये सब सुविधाएं सब के लिए निशुल्क उपलब्ध कराई जानी होंगी जिसका खर्च सरकार को करना होगा  और सभी प्राइवेट तथा सरकारी सुविधाओं का एक पूल बनाकर इन्हें प्रत्येक के इस्तेमाल के लिए तैयार करना होगा।


इसी तरह दवाइयों, प्रत्यारोपण और दूसरी सुविधाएं भी प्रत्येक के लिए निशुल्क उपलब्ध होंगी।
आज निजी अस्पतालों की लूट खसोट किसी से छिपी नहीं है, उनमें इलाज कराने की हिम्मत बहुत कम लोगों में है, इसलिए जब इन अस्पतालों को मिलाकर एक श्रृंखला में बांध दिया जाएगा तो हर कोई इनमें बेहतर और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का लाभ उठा सकेगा और इस तरह अपने स्वास्थ्य की रक्षा कर सकेगा क्योंकि यह तब उसका मौलिक अधिकार होगा।

आज ऐम्स जैसे अस्पताल क्यों नहीं देश की जरूरत के मुताबिक खुल रहे तो कहीं इसका कारण यह तो नहीं है कि उनके खुलने से प्राइवेट अस्पतालों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा और यह अस्पताल के नाम पर जो व्यापार हो रहा है, वह बंद हो जाएगा ?


स्वास्थ्य सुरक्षा की गारंटी


स्वस्थ रहने का अधिकार मिलने पर प्रत्येक व्यक्ति के स्वस्थ रहने की गारंटी हो जाएगी। यदि कोई अपनी लापरवाही से स्वस्थ नहीं रह पाता या उसका परिवार इसमें कोई चूक करता है तो उसे दंडित किया जा सकता है क्योंकि स्वस्थ रहना एक स्वस्थ राष्ट्र का पैमाना बन जाएगा।
जरा सोचिए जब सरकार स्वस्थ रहने की गारंटी देगी, सभी को समान स्वास्थ्य सुविधाएं मिलेंगी तो ऐसे हालात बनने में कितनी देर लगेगी जिनसे किसी भी आपदा के समय पूरे देश को स्वस्थ रखा जा सकेगा? क्या इस अधिकार से देश की उत्पादन क्षमता नहीं बढ़ेगी? क्या स्वस्थ नागरिक राष्ट्रीय आय में वृद्धि नहीं करेंगे और देश शिक्षा, रोजगार, अनुसंधान के क्षेत्र में विकसित राष्ट्र बहुत कम समय में नहीं बन जाएगा ?


भारत

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

मिस्र के पिरामिड, नील नदी और पर्यटन








इजिप्ट या मिस्र अफ्रीका के उत्तर और मिडिल ईस्ट के बगल में है, मेडिटेरेनियन समुद्र से घिरा और इस क्षेत्र को जीवन देने वाली विश्व की सबसे लंबी नदियों में से एक नील नदी के आगोश में स्थित एक ऐसा देश है जिसकी सभ्यता 4500 वर्ष पुरानी है। अगर नील नदी न होती तो पूरा इलाका रेगिस्तान कहलाता।

मिस्र में गीजा के पिरामिड या स्तूप  दुनिया  के अजूबों में से एक हैं। इन्हें देखने की इच्छा रखने वाले जब इनके करीब होते हैं, तब ही उन्हें एहसास होता है कि वास्तव में ये एक अजूबे ही हैं, वरना ये पिरामिड पत्थरों को जोड़कर रख देने से बनी एक त्रिकोणात्मक आकृति ही लगती है।

यह पिरामिड बनाने में बीस साल लगे और पत्थरों की भारी शिलाओं को यहां तक लाने के लिए केवल मजदूर ही थे, उस समय कोई क्रेन या कोई और तकनीक या मशीनरी नहीं थी। पत्थरों को इतनी ऊंचाई तक ले जाना और उन्हें जोड़े रखना वास्तव में कमाल का काम है। आज तक वोह अपनी जगह से हिले नहीं और  कुछ आक्रमणकारियों ने इन्हे मिटाने की कोशिश की भी तो नाकामयाब ही रहे।

इन पिरामिडों में इन्हें बनवाने वाले राजाओं के शव आज भी ममी के रूप में रखे हैं, लेकिन उन्हें सुरक्षा कारणों से देख पाना संभव नहीं है।

हिन्दू धर्म की भांति इनका भी पुनर्जन्म में विश्वास है। हमारे यहां आत्मा विलीन होकर किसी योनि में दुबारा जन्म लेती है, इनके यहां शरीर के साथ ही फिर से जीवित होने की मान्यता है और इसीलिए उनके साथ जरूरी समान और धन दौलत भी रखी जाती रही है ताकि जब जीवित हो जाएं तो उसी शरीर और राजसी ठाठबाट के साथ जिन्दगी जी सकें।

मिस्र का भारत की प्राचीन सभ्यता के साथ मिलान करें तो कोई समानता तो नहीं है  लेकिन प्राचीन इमारतों और उनके  अवशेषों में जरूर यह बात है कि इनसे दोनों की सभ्यता या सिविलाइजेशन को समझा जा सकता है।


हमारे यहां जीवनदायिनी गंगा है तो मिस्र में नील नदी है। अगर दोनों ही देशों  में ये  नदियां न होती तो क्या हालत होती उसकी कल्पना करना भी भयावह है। गंगा अनेक स्थानों पर बहुत ही प्रदूषित और गंदगी से भरी है जबकि नील नदी की सफाई देखकर तसल्ली होती है। इसी तरह इजिप्ट में गाय को सबसे अधिक सम्मान दिया जाता है क्योंकि उसे एक उपयोगी पशु के रूप में मान्यता दी गई है जिस प्रकार हमारे यहां गाय को विशेष और लाभदायक पशु होने का गौरव प्राप्त है।

क्रूज में बैठकर नील नदी के आसपास लहलहाते खेतों को देखकर इसकी उपयोगिता समझ में आती है। बस से पूरा रेगिस्तान पार कर नील नदी को देखना सुखद अनुभव है।
मिस्र के शासक जमाल अब्दुल नासिर ने इस देश के आजाद होने के बाद एक तरह से यहां की कायापलट ही कर दी और उसे एक ट्राइबल देश की जगह आधुनिक रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

नील नदी पर बांध बनाने के लिए ताकि बिजली का उत्पादन हो सके, पहले अमेरिका और ब्रिटेन से मदद मांगी गई लेकिन उनकी शर्तें एक तरह से  उनकी गुलामी करने जैसी थीं, तब नासिर ने रूस का हाथ थामा और रूस इसलिए मदद को तैयार हुआ क्योंकि उसे इजिप्ट में अपने हथियारों के कारोबार की अपार संभावनाएं दिखाई दीं और दोनों ने हाथ मिला लिया और इस तरह अमेरिका को अंगूठा दिखा दिया।

जमाल नासिर और पंडित नेहरू की मित्रता भी इसी आधार पर हुई कि दोनों की आजादी बरकरार रखते हुए रूस ने मदद की जिसका परिणाम दोनों की खुशहाली और बेहतर रिश्तों के रूप में हुआ।

इजिप्ट का सबसे बड़ा टैम्पल कर्णक में है जो अपनी विशालता और पुरातत्व के लिए प्रसिद्ध है। यह मिस्र की पहली रानी का भी स्थान है जिसने देश की समृद्धि में अद्भुत योगदान दिया। इसमें विशाल आकार के 138 खंबे हैं जिन पर इतिहास की व्याख्या करती आकृतियां हैं जो बताती हैं कि कब किस राजा ने साम्राज्य विस्तार के इरादे से दूसरे देशों पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।

सूर्य को शक्ति का प्रतीक माना जाता है और इसीलिए पूर्व को जीवन और पश्चिम को मृत्यु का स्थान मानते हैं।

इजिप्ट में भारतीय मान्यता कि पिता ही सृष्टि का निर्माता है, की भांति उसे पिता ही कहा जाता है और वह अंधेरे में रहकर सृष्टि निर्माण करता रहता है।

यहां एक कुएं नुमा महल है जिसकी खोज कहते हैं कि संयोग से एक गधे ने की। उसमें 99 सीढ़ियां हैं और जैसे जैसे नीचे उतरते जाते हैं, इस महल का रहस्य खुलता जाता है। अंदर शवों को ममी के रूप में रखे जाने के लिए खाने बने हुए हैं ।

इजिप्ट में पपारायसस नामक पेड़ के बने पत्रों पर की गई लिखाई हमारे यहां के भोजपत्रों पर लिखी गई पांडुलिपियों की तरह आज भी सुरक्षित हैं। यह पत्र आज भी लिखने और आकृतियां गढ़ने के काम आते हैं और सजावटी सामग्री के रूप में पर्यटकों को लुभाते हैं। लेकिन इनके असली  और नकली होने में भेद कर पाना मुश्किल है, विशेषज्ञ ही फर्क बता सकता है।

इसी पेड़ के तने से बनी नावों पर ही पिरामिडों के लिए पत्थरों को लाने का काम किया जाता था।

इजिप्ट में शेर की आकृति और मनुष्य का चेहरा यहां का प्रतीक चिन्ह है।
यहां भी एक प्राचीन काल की कहानी के अनुसार दो भाइयों में एक भलाई और दूसरा बुराई का प्रतीक है। इससे अपने यहां बाली और सुग्रीव की कथा का स्मरण होता है।

भलाई के प्रतीक एक भाई को समाप्त करने के लिए बुराई के प्रतीक भाई ने सुलह करने का दिखावा करते हुए सभी सभासदों और अपने भाई को आमंत्रित किया। उसने एक खेल रचा जिसमें विभिन्न आकार के कॉफिन बनवाए और कहा कि जो भी अपने आकार के कॉफिन में फिट हो जाएगा, विजेता माना जाएगा। सभी कॉफिन या तो इतने बड़े या छोटे थे कि कोई फिट नहीं आया लेकिन एक कॉफिन बिल्कुल उस भाई के आकार का था जिसे समाप्त करने की चाल उसके ही भाई ने खेली थी।

इसी तरह की अनेक कथाएं इस देश में प्रचलित हैं जिनमें एक यह भी कि चारों ओर केवल पानी ही पानी था और घनघोर अंधेरा था। केवल  पिता ही था जिसने  सृष्टि निर्माण के लिए नमी और वायु की रचना की। फिर आदम की रचना की।  दोनो का संगम हुआ  जिससे दो शिशु जन्मे। उसके बाद यह सिलसिला आगे बढ़ता गया और पृथ्वी पर नर और मादा के  रूप में आबादी बनती गई।

एक और कथा है जिसमें रानी के शरीर को 14 अंगों में काट कर जगह जगह बिखेर दिया गया। 14 में से 13 अंग मिल गए और एक अंग समुद्र में मछली निगल गई। शेष अंग से गर्भ धारण हुआ और उसे प्रसव हुआ तो जिस शिशु ने जन्म लिया वह राजा बना।
इजिप्ट इतिहास और पुरातत्व का अद्भुत संगम है। यहां मीलों में फैले मंदिर और उनमें बनाई गई आकृतियां यहां की कहानी कहती हैं।

अंग्रेजों ने यहां भी शासन किया। जैसा कि उन्होंने अपने पूरे साम्राज्य से बेहतरीन वस्तुओं को अपने देश  ले जाकर संग्रह किया उसी तरह इजिप्ट से भी वे बहुत सी बहुमूल्य वस्तुएं ले गए जिनमें राजाओं के मुकुट, आभूषण या शिलाएं भी हैं।

अंग्रेजों की एक आदत और यहां देखी और वह यह कि जैसा कि उनकी प्रवृति है, अनेक दीवारों और खंबों पर ऊंचाई तक जो भी अंग्रेज पहुंच पाया उसने अपना नाम और सन इन पत्थरों पर खोद दिया।

कह सकते हैं कि इजिप्ट यात्रा का अनुभव रोमांचक और रहस्यमय कथाओं को जानने का रहा। जैसा कि कुछ लोगों की मान्यता है कि यहां का निर्माण करने में एलियंस का हाथ है लेकिन इसका कोई प्रमाण न होने से विश्वास नहीं होता।
अजूबे और अजब रीति रिवाजों के साथ साथ आधुनिक होने की दौड़ में भी यह देश अग्रणी है। पुराने मकानों और बेतरतीब गली मोहल्लों के साथ सरपट सड़कें और तेज गति से चलने वाले वाहन तथा आधुनिक तर्ज पर बने घर भी हैं।

कैरों, आस्वान, लुक्सर जैसे शहर यहां  की मिलीजुली संस्कृति, पहनावे और फैशन का प्रतीक हैं। लोग मिलनसार ज्यादा नहीं है, अपने काम से काम रखने वाले हैं। खानपान में मांसाहारी ही अधिकतर हैं लेकिन उसमें भी कोई अलग पहचान रखने वाला व्यंजन न के बराबर है। एक तरह से यात्रा सुखद ही रही। 

(भारत)


शनिवार, 7 मार्च 2020

डर जो जीने भी न दे और हैवान तक बना दे









सामान्य जीवन में व्यक्ति हर वक्त किसी न किसी अनहोनी, आशंका और जो कुछ उसके पास है उसके खो जाने से डरता रहता है जबकि यह सब उसकी अपनी काल्पनिक सोच होती  है। ज्यादातर मामलों में उसके डर का कोई कारण नहीं होता लेकिन उसका स्वभाव हर बात से डरने का हो जाता है। इसी डर के कारण व्यक्ति न सच कहने का साहस कर पाता है और न ही किसी अन्य से सच सुनने को तैयार होता है, बस अपने ही बनाए जाल में उलझकर रह जाता है। बचपन से लेकर युवा होने तक यदि परिवार में  भय व्याप्त रहता है तो बड़े  होकर व्यक्ति सच से दूर होकर  हरेक बात के लिए झूठे बहाने बनाने लगता है।




अगर कहीं बड़े होकर ऐसा व्यक्ति राजनीति के पेशे में आ गया और सत्ता पक्ष या विपक्ष का नेता  हो गया तब उसके लिए सच बोलना असंभव या बहुत साहस या दुस्साहस का काम होता है।



नागरिकता का सच और झूठ

एक ही उदाहरण से बात समझ में आ जाएगी कि नेता चाहे किसी भी पक्ष के हो, सच से दूर ही रहने में अपना भला समझते हैं।

यह जो नागरिकता कानून है उसे लेकर बराबर सरकार कह रही है कि किसी की नागरिकता नहीं छिनेगी बल्कि दी जाएगी।

इसका विरोध नहीं होना चाहिए लेकिन हो रहा है, इसका मतलब यह है कि दोनों ओर  से सच न बोलकर बहुत कुछ छिपाया जा रहा है।

अब जरा तथ्यों पर आते हैं। देश के बंटवारे के बाद जिस आबादी  की अदल बदल हुई, उनमें से अनेकों के भाई बहन, रिश्तेदार दोनों देशों में रह गए और उनमें धीरे धीरे  बातचीत, आना जाना और रिश्तेदारी  पनपती रही।

अनेकों गैर मुस्लिम धर्मों के लोग अपनी मर्जी से या धार्मिक आधार पर प्रताड़ित होकर या किसी और कारण जैसे कि व्यापार, रोजगार या कारोबार के लिए बिना वैध कागजात के भारत आ गए और बस गए। इसी तरह मुस्लिम धर्म के लोग भी यहां आ गए और बिना कागजात रहने लगे।

अब होता यह है कि सरकार कानून में संशोधन करती है कि गैर मुस्लिम धर्मों के लोगों को  नागरिकता दे दी जाएगी जिसका अर्थ यह कि जो मुस्लिम यहां बिना वैध कागजात के रह रहे हैं, उन्हें वापिस जाना होगा।

इस सच्चाई को सरकार और इस कानून का विरोध करने वाले दोनों ही समझते हैं लेकिन इसे कहने का साहस किसी में नहीं है। मिसाल के तौर पर जब ममता दीदी कहती हैं कि बांग्लादेश से आकर यहां बसे किसी भी मुसलमान को डरने की जरूरत नहीं है तो भाजपा वाले उन्हें घुसपैठिए मानकर यहां का नागरिक न बनाने पर अडे हुए हैं।

इसी तरह शाहीन बाग हो या देश में कहीं और, इस कानून का जहां भी विरोध हो रहा है, वहां मुस्लिम समुदाय की चिंता का कारण यही है कि जो लोग बिना कागजात यहां बरसों से रह रहे हैं और भारतीय मुसलमानों के परिवारों का हिस्सा भी बन गए हैं, उनका बोरिया बिस्तर इस कानून से बंधना निश्चित है जो उन्हें मंजूर नहीं है।

यह सच कहने या सुनने का साहस सरकार और विपक्ष में न होने के कारण असामाजिक तत्वों की पौ बारह हो गई जिसका नतीजा दिल्ली और दूसरी जगहों पर हिंसक दंगों के रूप में निकला।

शायद दंगों, आगजनी, हत्या और सांप्रदायिक मनमुटाव से बचा जा सकता था और अभी भी वक्त है कि आगे भविष्य में ऐसी किसी घटना को दोहराने से रोका जा सके, अगर सरकार यह सच कह दे कि इस कानून से उन गैर मुस्लिमों  को नागरिकता इसलिए दी जा रही है क्योंकि वे कहीं और नहीं जा सकते और इस प्रक्रिया में उन्हें सत्तारूढ़ दल अपना वोट बैंक भी  बनाना चाहता है ।


अगर सरकार यह भी कह दे कि उन मुस्लिमों को भी नागरिकता दी जा सकती है जिनका वापिस जाना मुमकिन नहीं है तो न केवल बात बन जाएगी बल्कि वे भी उसका वोट बैंक बन सकते हैं।

होना यह चाहिए कि जो असली घुसपैठिए, आतंकवादी और देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त हैं  उनकी पहचान करने की कार्यवाही शुरू कर गिरफ्तारी और सजा दी जाए  और कहा जाए कि  इसका आधार कोई धर्म विशेष नहीं होगा बल्कि ऐसे लोग किसी भी धर्म के हो, उन्हें बख्शा नहीं जाएगा।


वोट बैंक की राजनीति

इसी तरह विरोध करने वाले दल यह सच कह दें कि उन्होंने इन मुस्लिम देशों से आए लोगों को अपना वोट बैंक बना लिया है और उन्हें आधार, वोटिंग, राशन कार्ड दे दिया है, इसलिए वे इस कानून का विरोध कर रहे हैं क्योंकि इसके लागू होने से इन सब मुस्लिमों जिन्हें रोहिंग्या या कुछ और कहा जाता है, को वापिस अपने देशों में जाना होगा और उन दलों का वोट बैंक बिखर जाएगा।

जो लोग जनगणना तक के लिए कागज न दिखाने की बात कह रहे हैं, वे इसलिए है कि उनके पास जरूरी कागज है ही नहीं तो दिखाएंगे क्या, उनका भारत में रहना संभव नहीं है। जो नेता उन मुस्लिमों से भी कागज न दिखाने की बात कह रहे हैं , जिनके पास सभी वैध कागजात हैं, सिर्फ  अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। जो मुस्लिम उनकी चाल समझ रहे हैं, वे उनका साथ नहीं दे रहे, इसलिए ये लोग महिलाओं और बच्चों को आगे रखकर अपनी कुटिल चाल चल रहे हैं।

सामान्य जनता इस गहराई तक सोच नहीं पाती इसलिए वह इनके बहकावे में आकर धरना, आंदोलन और हिंसा तक कर रहे हैं।

हो सकता है कि अगर यह सत्य उन्हें समझाया जाए और वे अपनी बेबुनियाद जिद छोड़ने को मान जाएं तथा किसी के कहने में न आकर वास्तविकता समझें तो महीनों से चला आ रहा गतिरोध समाप्त हो जाए। पता नहीं किस आधार पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त पैरोकारों ने यह बात उनसे छिपाई और केवल सड़क खाली करने की बात कही। सच बता देते तो हो सकता है, कामयाब हो जाते।

सरकारी व्यापार का सच

एक और सच बताते हैं । भारत सरकार का कानून है और  जिसे बहुत से देशों ने अपने यहां से हटा दिया है कि किसी भी सौदे में कमिशन का लेनदेन नहीं हो सकता जबकि सत्य यह है कि कोई भी सौदा बिना कमीशन के तय नहीं होता, उसका नाम चाहे कुछ भी रख लें पर यह होता ही है।

सरकार अगर तय कर दे कि इतने प्रतिशत कमीशन का लेनदेन कानूनी है तो न सिर्फ सौदे सस्ते होने लगेंगे बल्कि माल भी अच्छा मिलेगा क्योंकि सब कुछ पारदर्शी रखने की मजबूरी होगी वरना व्यापार नहीं होगा। यही नहीं नेताओं और अधिकारियों को घोटाले, स्कैम या धांधली नहीं करनी पड़ेगी।

इसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि जब देश में आयकर 85 प्रतिशत और उससे भी ज्यादा हुआ करता था तो एक समानांतर अर्थव्यवस्था काले धन के रूप में स्थापित हो गई थी जो आजतक गले की हड्डी है। आज आयकर में सहूलियत है तो उन्हें छोड़कर जो  बेईमानी का पल्लू छोड़ने को तैयार नहीं हैं, शेष सब ईमानदारी से टैक्स देने लगे हैं।

इसी तरह समस्या कोई भी हो और उसके हल के लिए योजना या तरकीब कैसी भी हो, अगर सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा तो उसका सही समाधान निकलना निश्चित है। यह भी एक सच है चाहे सरकार हो या  परिवार के लोग, यदि सत्य के रास्ते पर चलें तो बहुत सी परेशानियां तो दूर से ही नमस्ते कर लेंगी और समाज शांति से रह सकेगा। 

(भारत)

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

हर्बल संपदा की चोरी और तस्करी से विनाश ।









हमारा देश कुछ इस प्रकार की भेगोलिक स्थिति से बना है कि हम अनेक मामलों में दुनिया के सभी देशों से भाग्यशाली कहे जा सकते हैं। हमारा प्रहरी हिमालय पर्वत है और इससे  जुड़ी  समस्त पर्वतमाला विशाल प्राकृतिक स्रोतों का भंडार है। हमारे वन इतने घने हैं कि उनमें प्रवेश करना बहुत खतरनाक और असंभव जैसा है। कदाचित प्रकृति ने हमारे वन्य प्रदेशों की रचना इतनी जटिल और कठिन इसलिए ही की है क्योंकि इनमें ऐसे खजाने छुपे है जो विश्व में और कहीं नहीं है।


अनमोल संपदा

हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू  कश्मीर, लद्दाख,  उत्तर पूर्व के  प्रदेश, महाराष्ट्र तथा दक्षिण राज्यों के वन्य प्रदेश ऐसी अनमोल संपदा अपने अंदर समाए हुए हैं जिनकी तुलना  दुनिया के किसी वन्य प्रदेश से नहीं की जा सकती। यही कारण है कि हमारी वन संपदा हमेशा से विदेशियों की नजर में खटकती रही है और वे किसी भी कानूनी और ज्यादातर गैर कानूनी तरीके से उस पर कब्जा करने में सफल होते जा रहे हैं।


जिन्हे हम जड़ी बूटी और वन्य उपज के नाम से जानते हैं, वह कितनी उपयोगी है इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि किसी भी भयानक रोग के इलाज में इनका इस्तेमाल दुनिया की बड़ी बड़ी फार्मेसी कंपनियां करती हैं और क्योंकि उनके लिए इन्हें सही रास्ते से पाना आसान नहीं है इसलिए वे ऐसे सभी हथकंडे अपनाती है जिससे उनकी चाल कामयाब हो जिसके लिए वे छल, बल और धन तीनों का इस्तेमाल करती हैं।


यदि आप वनों में घूमने के शौकीन हैं या आप कोई शोध करने के लिए इन स्थानों पर जाते हैं तो आपको वहां सैलानियों की तरह व्यवहार करते कुछ देशों, खास तौर से चीन, जापान, ब्रिटेन के लोग घूमते मिल जाएंगे। ये पर्यटक नहीं बल्कि इन देशों के वैज्ञानिक हो सकते हैं जो चोरी छिपे हमारे पेड़ पौधों और उनसे मिलने वाले फल, फूल, छाल और दूसरी सामग्री की पहचान कर उनकी चोरी और तस्करी करने के लिए यहां आते हैं।


वन्य प्रदेशों में रहने वाले अधिकतर आदिवासी होते हैं और वे स्वभाव से सीधे होते हैं। इसी के साथ जो आसपास के गांव है वहां सरपंच, स्थानीय विधायक और सांसद इस बात से पूरी तरह परिचित होते हैं कि उनका क्षेत्र कितना मूल्यवान है और इसकी कितनी कीमत वसूली जा सकती है। अब क्योंकि हमारे वनवासी गरीबी, अज्ञानता और साधनहीनता के कारण इनके प्रलोभन में आ जाते हैं तो वे अनजाने में तस्कर नेटवर्क का हिस्सा बन जाते हैं।


 उनका जबरदस्त शोषण होता है और इस तरह जीवनदायिनी वन्य संपदा उनसे छीन ली जाती है। अनेक पौधे लुप्त होते जा रहे हैं। इसके लिए तस्करों द्वारा जिस विधि का इस्तेमाल होता है उसे हत्या कहना सही होगा।


होता यह है कि तस्कर उन पौधों को जड़ से उखाड़ देते हैं और उस जगह को समतल कर देते हैं ताकि वे दोबारा पनप न सकें और वे अपने देश  ले जाकर उन्हें रोप दें और अपना कह  सकें और बड़े पैमाने पर उसकी  खेती कर मालामाल हो और अगर हमें या किसी और को उनका किसी दवाई बनाने में इस्तेमाल करना है तो मन मानी कीमत वसूल सकें।


जीवन रक्षक औषधियों से लेकर सौंदर्य प्रसाधनों के बाजार पर कुछ विदेशी कंपनियों का कब्जा है और विडंबना यह है कि इनके बनाने में जिन जड़ी बूटियों का इस्तेमाल होता है, वे भारत के अतिरिक्त कहीं और उग नहीं सकतीं। एक उदाहरण हैं। हिमाचल प्रदेश में एक ऐसा पौधा है जो वहां लगभग छह महीने बर्फ में दबा रहता है और जब बर्फ पिघलती ही तब ही बाहर किसी को दिखाई देता है।


अनेक देशों और हमारे वैज्ञानिकों ने यह कोशिश की कि उसे अपने यहां उगा लें, यहां तक कि फ्रिज में उगाने की भी कोशिश हुई लेकिन कामयाबी नहीं मिली। हिमालय की बर्फ में ही वह गुण है जो उसे अनोखा बनाता है। इसी तरह एक ही तरह के दिखने वाले  दो पौधे जो एक दूसरे के बराबर लगे हों, उनमें से एक नकली और दूसरा असली हो सकता है। इसकी पहचान केवल आदिवासी या वनवासी ही कर सकते हैं।



तस्करों का गिरोह अपने जाल में इन्हें फंसा कर इनसे वह सब कराने में कामयाब हो जाता है जो गैर कानूनी है और इस तरह इसका इल्जाम इनके सिर मढ़ दिया जाता है और पुलिस हो या प्रशासन इनका दोहन और हर प्रकार से शोषण करता है।


हर्बल संपदा का संरक्षण

औषधीय और सौंदर्य प्रसाधनों के लिए इस्तेमाल होने वाले पौधों और उनसे प्राप्त सामग्री को संरक्षण देने के लिए तथा इसके साथ ही विदेशियों द्वारा इनका कॉपीराइट अपने नाम पर कराने की चाल को रोके जाने के लिए करना यह होगा कि इनका व्यापक प्रचार हो और बड़े पैमाने पर इनकी खेती करने के लिए आवश्यक प्रबंध किए जाएं।


आदिवासी क्षेत्रों में रहने वालों को इनकी रक्षा करने और उन्हें लुप्त होने से रोकने के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाए और इनकी उपज में गुणात्मक सुधार करने के लिए आधुनिक तकनीकों को उन तक पहुंचाया जाए। इससे आदिवासी और वनवासी समुदाय की आमदनी भी बढ़ेगी और वे इनका महत्व समझेंगे।



हमारे वैज्ञानिक लुप्तप्राय प्रजातियों के क्लोन विकसित कर रहे हैं जो उनके संरक्षण और उनसे नई पौध बनाने का प्रयास है। अक्सर प्रोसेसिंग सुविधाओं के न होने से दवाई और कॉस्मेटिक कंपनियां बहुत ही सस्ते दाम पर इनकी खरीददारी करती है जिससे इनका उत्पादन करना आकर्षक नहीं रहता।



 यदि उत्पादन के स्थान पर ही स्थानीय लोगों को रोजगार देकर उन्हें प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की ओर आकर्षित किया जाए तो यह  कितना फायदेमंद हो सकता है इसका अनुमान यदि लगाया जाए तो यह हमारी ग्रामीण और आदिवासी अर्यव्यवस्था का स्वरूप ही बदल सकता है।



नब्बे प्रतिशत उत्पादक यह नहीं जानते इन जड़ी बूटियों को कहां बेचा जाए और उसी कारण वे तस्करों के जाल में फंसकर अपना और देश का नुकसान कर लेते हैं। अगर उनकी रक्षा करनी है और हर्बल उद्योग को विकसित करना है तो इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है कि सरकार उतपादक को प्रोत्साहित करे, प्रोसेसिंग की सुविधाओं का आदिवासी क्षेत्रों में विकास करे और बिक्री का पारदर्शी तरीके से इंतजाम करे।


हमारे वन्य क्षेत्रों में इतनी क्षमता है कि वे किसी भी बीमारी का इलाज करने की औषधि दे  सकते हैं, मनुष्य को लंबी आयु का वरदान दे  सकते हैं और उसे चिरकाल तक स्वस्थ और सुंदर बनाए रख सकते हैं।

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

धर्म, जाति, सम्प्रदाय को देशभक्ति और देश सेवा से दूर रखना ही बेहतर है।







संसार के महान नीतिज्ञों कौटिल्य, कंफ्यूशियस  और खलीफा हजरत अली ने अलग अलग शब्दों में एक ही बात कही है और जिसका निष्कर्ष यही है कि अगर धार्मिक, जातिगत और साम्प्रदायिक आधार पर किसी देश का शासन चलता है या चलाए जाने की कोशिश होती है तो वह कट्टारतावादी, आधुनिकता विरोधी और पूरी तरह से अवैज्ञानिक हो जाता है, जहाँ तर्क की कोई गुंजाईश नहीं होती, वैचारिक मतभेद का कोई स्थान नहीं होता और उसे तानाशाही के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता।


तरक्की का पैमाना 


जो देश आज दुनिया के सिरमौर यानी तरक्की का पैमाना कहे जाते हैं जैसे अमेरिका तो उन देशों में शासन करने को साइंटिफिक मैनेजमेंट का नाम दिया गया। उनका मानना है कि धर्म, जाति, सम्प्रदाय किसी भी व्यक्ति का निजी या अधिक से अधिक पारिवारिक मामला हो सकता है और वे मिलकर चाहे तो अपने अपने समाज बना सकते हैं और उसकी भलाई के लिए आपस में जुड़ सकते हैं। इससे आगे अगर वे जाते हैं तो वह विभिन्न धर्मों, जातियों और सम्प्रदायों के बीच टकराव और कभी कभी खूनी संघर्ष का भी कारण बन जाता है।


जो देश पूरी तरह धर्म आधारित हैं, विशेषकर इस्लाम तो वहाँ किसी दूसरे धर्म का पालन करने वालों को अपने धर्म से सम्बंधित कोई भी आयोजन, पूजा, अर्चना करने की केवल इजाजत ही नहीं दी जा सकती बल्कि ऐसा करने वालों को मौत की सजा भी दी जा सकती है जैसे कि साउदी अरेबिया जैसे कट्टर इस्लामिक देश में होता है वहाँ काम करने वाले किसी हिंदू को अगर हनुमान चालीसा का पाठ करना है तो वह मन में तो कर सकता है लेकिन उसकी कोई पुस्तक या हिंदू देवी देवता की मूर्ति रखने पर दण्ड मिल सकता हैे ।



जिन देशों में धर्म पहले नम्बर पर आता है उनकी हालत देखकर कहा जा सकता है कि वे आज भी दकियानूसी मान्यताओं, पिछड़ेपन और गरीबी के चंगुल में फँसे हुए हैं और जिन देशों ने धार्मिक आधार को शासन का जरिया नहीं बनाया, वे खुशहाली के अलंबरदार कहे जाते हैं। अपने पड़ौसियों पाकिस्तान और बांग्लादेश की ही तुलना कर लीजिए। पाकिस्तान पर इस्लामी आकाओं का कब्जा है, जो कट्टरपंथी हैं उनके हाथ में शासन की बागडोर है तो वहाँ विकास के नाम पर शोषण करने और दहशतगर्दों का बोलबाला है।



 इसके विपरीत बांग्लादेश के बढ़ते विदेशी मुद्रा कोष और प्रगति की दर आश्चर्य पैदा करती है।


आधुनिक युग की जरूरतों को समझते हुए जिन देशों ने धर्म को शासन से नहीं जोड़ा और वैज्ञानिक आधार को उन्नति करने का रास्ता बनाया, वे आज आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से सम्पन्न कहे जाते हैं और दुनिया की अधिकांश सम्पदा उनके हाथों में सिमट कर रह गयी है। उनके लिए किसी भी धार्मिक परम्पराओं को मानने वाले देश को आर्थिक और मानसिक रूप से गुलाम बनाना चुटकी बजाने भर का काम है, चाहे वह अमेरिका, रूस, चीन, जापान कोई भी देश हो जो सभी तरह से सम्पन्न हैं।



जहाँ तक हमारे देश का सम्बंध है, जब तक धर्म, जाति और सम्प्रदाय को प्रशासन पर हावी नहीं होने दिया गया, देश सभी क्षेत्रों में धीमी गति से ही सही, प्रगति करता रहा लेकिन जब कभी किसी भी प्रदेश या केंद्र में प्रशासन के लिए इन तीनों या किसी एक को भी शासन करने का साधन या जरिया बनाया गया, ऐसा करने वाले नेताओं और राजनीतिक दलों को मुँह की खानी पड़ी। जनता की मुसीबतें बढ़ीं, पतन को रफ्तार मिल गयी और प्रगति का रास्ता अवरुद्ध होता गया।


धर्म का तड़का 


एक उदाहरण से यह बात समझी जा सकती है। यह बात सब जानते हैं कि देश में नागरिकता कानून, हर दस वर्ष में जनगणना, आबादी के हिसाब से नीति बनाना, योजनाएँ लागू करना और नागरिकों को बेहतर जीवन देने की कोशिशें आजादी के बाद से लगातार होती रही हैं।


अब जरा यह बात समझिए कि जैसे ही संविधान संशोधन के जरिए नागरिकता कानून में धर्म का तड़का लगा, देश भर में इसके विरोध की बेबुनियाद ऐसी लहर उठी जो थमने का नाम नहीं ले रही। इस हकीकत को समझने और इस बात को मानने के लिए मुस्लिम समाज तैयार ही नहीं है कि इस कानून से किसी भी भारतीय की नागरिकता पर कोई संकट नहीं है।



धर्म की बात करते ही असामाजिक तत्वों और गुंडागर्दी करने वालों को, जिन्हें इन वर्षों में सरकार की सख्ती के कारण उभरने का कोई मौका नहीं मिला था, वे सब एकजुट ही गए और देश को अराजकता के मुहाने पर ला खड़ा किया। यहाँ तक कि देश का एक और विभाजन  धर्म के आधार पर करने की कुत्सित चाल चलने के सपने कुछ लोगों द्वारा देखे जाने लगे।



इस एक कार्यवाही ने पिछले वर्षों में किए गए सामाजिक और आर्थिक विकास के कामों पर धूल की परत चढ़ा दी और जिसका परिणाम दिल्ली के चुनावों में भाजपा को भारी हार के रूप मे मिला । धर्म, जाति, सम्प्रदाय को शासन के लिए इस्तेमाल करने वालों के लिए यह एक चेतावनी है।



महान दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने धर्म को अफीम की संज्ञा दी थी। धर्म दबे कुचले लोगों की आह है जो जुल्म करने वाले का विरोध करने के लिए इस प्रकार से निकलती है, ‘जा तुझे ईश्वर या खुदा देख लेगा, उसकी लाठी जब पड़ेगी तो तू कहीं का नहीं रहेगा‘ ।



धर्म का किसी भी व्यक्ति के जीवन में व्यावहारिक स्थान हो सकता है जैसे कि हम अक्सर बीमार, घायल, असहाय और पीड़ित व्यक्ति की मदद धर्म के नाम पर कर देते हैं । जिस तरह अफीम से किसी भी व्यक्ति को कुछ समय के लिए शिथिल किया जा सकता है और वह  अपने को भूलकर किसी दूसरी ही दुनिया में पहुँच जाता है, उसी तरह धर्म भी व्यक्ति को उसका दुःख भूलने में मदद करता है।



धर्म की यही सीमा है क्योंकि धर्म ने मनुष्य को नहीं बनाया बल्कि मनुष्य ने धर्मों को बनाया है। इसलिए धर्म भारत जैसे विशाल और बहुधर्मी देश के शासन का साधन नहीं हो सकता। जब हम सर्व धर्म सम्भाव या वसुधेव कुटुम्बकम कहते हैं तो इसका मतलब यही है कि भारत कभी भी हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई राष्ट्र नहीं बन सकता।

(भारत)

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

नैतिकता, सुलभ न्याय, सुशासन और मर्यादा पालन










आखिर वह घड़ी आ ही गई जिससे यह सुनिश्चित हो गया कि भगवान श्री राम का भव्य मंदिर उनके जन्मस्थान अयोध्या में शीघ्र बन जाएगा। इसी के साथ मन में यह प्रश्न आना स्वाभाविक है कि क्या केवल मंदिर बन जाने से ही श्री रान के प्रति हमारे विचार, सोच और उनके पदचिन्हों पर चलने की आकांक्षा भी पूरी हो जाएगी।


कुछ वर्ष पूर्व एक फिल्म बनाने के सिलसिले में अयोध्या जाना हुआ तो वहां मंदिरों के दर्शन भी किए। इस के साथ एक और चीज जो वहां देखी वह थी गंदगी, अशिक्षा और अव्यवस्था का बोलबाला। राम मंदिर का निर्माण करने वालों से उम्मीद है कि वे इसे पहले  समाप्त करेंगे क्योंकि तब ही मंदिर की उपयोगिता सिद्ध हो पाएगी।


बापू गांधी के राम

महात्मा गांधी के राम किसी एक धर्म, जाति या संप्रदाय  के नहीं थे बल्कि, पूरा संसार ही हमारा परिवार है, इस धारणा की पुष्टि करते थे। उनके अनुसार सत्य, अहिंसा, वीरता, क्षमा, धैर्य और मर्यादा पालन राम के प्रतीक थे और उनके काम करने की विधि ऐसी थी जिसमें निर्बल की रक्षा हो जैसे कि सुग्रीव को उसकी पत्नी उसके ही भाई के चंगुल से छुड़वाने में छिपकर बाली के  प्राण लेने का उदाहरण रखा जा सकता है।

कह सकते हैं कि बाली के वध में राम ने मर्यादा का पालन नहीं किया और न्याय प्रक्रिया का उल्लघंन किया।
अगर राम ऐसा करते तो क्या होता इसे  समझने के लिए वर्तमान काल का यह उदाहरण ही काफी है जिसमें निर्भया के गुनहगारों को सात साल बाद भी और फांसी की सजा सुनाए जाने के बावजूद न्याय न मिलना  है। इसी के विपरीत एक और महिला के गुनहगारों को क्या एनकाउंटर में मार दिया जाना न्याय की परिधि में आयेगा?  शायद राम होते तो यही करते और तुरंत न्याय देकर सुशासन का उदाहरण प्रस्तुत करते।



रामराज्य की व्यावहारिकता


श्री राम का एक और प्रसंग उनकी न्यायप्रियता को दर्शाता है, वह है रावण का वध। रावण बल, बुद्धि, वीरता और ज्ञान में अतुलनीय था। उसके पास धन, वैभव की कोई कमी नहीं थी और उसने दुर्लभ शक्तियों को पा लिया था। सीताहरण भी उसकी दृष्टि में उचित था क्योंकि वह उसने अपनी बहन के तथाकथित शील की रक्षा के लिए किया था। इसी के साथ वह अधर्मी, अत्याचारी भी था इसलिए उसके गुण अवगुण हो गए थे।


राम के लिए रावण का वध केवल इसलिए संभव हो पाया क्योंकि विभीषण ने शरीर के उस स्थान पर वाण मारने के लिए कहा जो केवल उसी को ज्ञात था।  रावण ने राम से मृत्यु के समय यही कहा कि राम के साथ उसका भाई खड़ा हो गया इसलिए वह उसे मारने में सफल हुए।


राम की न्यायप्रियता और न्याय करने की प्रक्रिया को साम, दाम, दण्ड, भेद के दायरे में रखा जा  सकता है। इसका अर्थ यह है कि अन्याय, अनाचार, अत्याचार का अंत करने के लिए इनमें से किसी को भी अपनाया जा सकता है।


आज कुछ लोग नैतिकता, मानवीय अधिकार के नाम पर अपराधियों को संरक्षण देने की बात करते हैं तो सही यही है कि अपराधी के साथ साथ उसका साथ देने वालों को भी दण्ड दिया जाए, यही रामराज्य होगा।


आज के संदर्भ में कहें तो पाकिस्तान के साथ दिखाई देने की कोशिश कर रहे कुछ भारतीय क्या देशद्रोही नहीं माने जाने चाहिएं ?


इसका अर्थ यह हुआ कि यदि रामराज्य लाना है तो राम के अनुसार न्याय में देरी को अन्याय की श्रेणी में माना जाएगा और जो इसके लिए जिम्मेदार हैं उन्हें सजा मिलनी चाहिए।


राम के अनुसार हालात के मुताबिक अपने को बदलना चाहिए और इसी कड़ी में दूसरों से  यह अपेक्षा रखने कि वे भी हमारे अनुसार बदलें, इसके स्थान पर उन्हें  अपने हिसाब से बदलने दीजिए।


आज के संदर्भ में सरकार और राजनीतिक दल स्वयं चाहे अपने को न बदलें पर जनता से यही चाहते हैं कि वह उनके मुताबिक बदल जाए। उदाहरण के लिए यदि सरकार भ्रष्टाचार में लिप्त है, भेदभाव करती है और अन्याय होने पर आंखें फेर लेती है तो रामराज्य में प्रजा क्या करती? प्रजा ऐसे शासन को उखाड़ फेंकती।


गांधी जी के रामराज्य में ग्राम स्वराज प्रमुख है। उन्होंने यह धारणा इसीलिए बनाई थी क्योंकि भारत ग्रामीण इकाइयों से बना देश है और कस्बे, नगर और महानगर उससे बनी इकाईयां हैं। इसका अर्थ यह है कि  ग्राम के  विकसित होने पर ही उससे बनी इकाईयां फल फूल सकती हैं। ऐसा न होने का नतीजा यह हुआ कि शासक, जमींदार और पूंजीपति का ऐसा गठजोड़ बना कि गांव खाली होने लगे, हमारी प्राकृतिक और वनीय संपदा को समाप्त किया जाने लगा और आर्थिक असमानता ने भीषण रूप ले लिया।


किसान को मजबूर ही नहीं किया बल्कि उसे एक भिखारी के स्तर पर ला खड़ा किया। रामराज्य में गाँव के स्तर पर ग्रामीण और कुटीर उद्योग खुलते और आसपास जो कच्चा माल होता उससे पक्का माल बनता और इस तरह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के मजबूत होने की नींव डाली जाती।


ऐसा न होने पर गांव देहात में बेरोजगार होने पर  शहरों में पलायन शुरू हुआ और उनमें आबादी बढ़ने से जो समस्याएं पैदा हुईं उनमें बेरोजगारी, बीमारी और गरीबी प्रमुख हैं।


रामराज्य में शिक्षा संस्थान और विज्ञान के केंद्र नगरों से दूर वन्य क्षेत्रों में होते थे जहां प्राकृतिक संसाधन होने से शिक्षण, प्रशिक्षण, अनुसंधान और प्रयोग करने की सुविधाएं होती थीं। हमारी वनस्पतियां और वनों से प्राप्त होने वाली वस्तुओं का वैज्ञानिक ढंग से विकास करने के साधन उपलब्ध होते थे। एकांत में अध्ययन और मनन तथा चिंतन करने की परिपाटी होती थी।


आज लगभग सभी शिक्षा संस्थान या वैज्ञानिक शोध केंद्र अधिकतर शहरों में स्थापित हैं और प्रकृति से संबंध टूट गया है। नतीजा यह हुआ कि जहां प्राकृतिक संपदा को और अधिक समृद्ध बनाने की और ध्यान दिया जाता, वहां उसका दोहन होने लगा और हमारे वन, पर्वत विनाश की ओर बढ़ने लगे।


इसका एक और परिणाम हुआ  और वह यह कि हमारी वन संपदा, वनस्पतियों और जैविक संसाधनों पर विदेशियों की नजर पड़ गई और वे क्योंकि  उनकी उपयोगिता जानते थे इसलिए इन सब की तस्करी का एक ऐसा अंतहीन सिलसिला  शुरू हुआ जो देश की दौलत विदेशियों तक पहुंचा रहा है और वे उससे न केवल मालामाल हो रहे हैं बल्कि दुनिया पर छा रहे हैं। मतलब यह कि पूंजी हमारी और धनवान कोई और  हुआ जा रहा है।


राम का दैवीय राज

रामराज्य की कल्पना करते समय हम उसे देवताओं का राज्य जैसा समझने लगते हैं जबकि राम का जीवन एक सामान्य मनुष्य की भांति था। वे सामान्य व्यक्ति की तरह सीता के वियोग में रोते हैं, विलाप करते हैं और क्रोध करते हैं। समुद्र द्वारा रास्ता न देने पर उसे सुखा देना चाहते हैं।  अपने भाई लक्ष्मण के समझाने पर शांत और स्थिर होते हैं।


राम के लिए किसी भी जीव की रक्षा करने के साथ साथ उसे मित्र बना लेना भी आवश्यक है। उनके लिए न कोई छोटा है न बड़ा, सब बराबर है।
जो लोग रामराज्य को हिन्दू राज्य से जोड़ते हैं उनके लिए यह समझना जरूरी है कि रामराज्य किसी एक धर्म या  जाति की बात नहीं करता बल्कि सभी को उसमें समाहित मानता है।


राम नीति के परिचायक है और कुटिलता को भी नीति से ही हराना चाहते हैं। कैकई के कुटिल व्यवहार से दुखी न होकर पिता की आज्ञा मानते हैं। परिणाम की चिंता किए बिना वनवास स्वीकार करते हैं। इसी का फल होता है कि कैकई का हृदय परिवर्तन  हो जाता है।


आशा है राम मंदिर के साथ साथ रामराज्य की कल्पना भी साकार होगी जिसमें असमानता, निर्धनता और अन्याय का कोई स्थान नहीं होगा।


(भारत)