शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

शिक्षा या साक्षरता में कमी होगी तो देश का पिछड़ना तय है

 

विश्व साक्षरता दिवस हर साल आठ सितंबर को मनाया जाता है। हमारे देश में भी इसकी खानापूर्ति की जाती है। इस साल तो अध्यापक दिवस पर यह घोषणा भी सुनी कि देश में साढ़े चैदह हजार स्कूलों का कायाकल्प किए जाने का इंतजाम किया गया है जो अगले पांच सात साल में पूरा होगा।

बेशक हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं लेकिन शिक्षा के मामले में इतने पीछे हैं कि हमारे देश की गिनती सबसे कम साक्षर देशों में नीचे से कुछ ही ऊपर है। साक्षरता दर लगभग सत्तर प्रतिशत है, मतलब यह कि बाकी आबादी पढ़ना लिखना नहीं जानती जिनमें महिलाएं तो आधी से ज्यादा अनपढ़ हंै। यह शर्म की बात तो है ही, साथ में सरकारी शिक्षा और साक्षर बनाने वाली नीतियों का खोखलापन भी है।

विज्ञान की अनदेखी

अगर उन कारणों पर गौर करें जिनकी वजह से पढ़ाई लिखाई और अक्षर ज्ञान को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई देती तो वह यह है कि अब तक शिक्षा देने का जो तरीका या ढांचा रहा है, उसमें बचपन से ही बेमतलब के विषयों को पढ़ना जरूरी बना दिया गया। जिन विषयों से जिंदगी जीने की राह निकलती हो, उनकी अनदेखी की जाती रही । पढ़ने वाले के मन में जब यह बात गहरी होने लगती है कि जो पढ़ाया जा रहा है, उससे व्यापार, रोजगार, नौकरी तो आसानी से मिलनी नहीं, केवल डिग्री मिलेगी तो वह पढ़ कर क्या करे? देहाती इलाकों में माता पिता भी सोचते हैं कि इससे तो अच्छा है कि बालक खेतीबाड़ी या घरेलू कामधंधा कर उनका सहारा बने तो वे भी स्कूल जाने पर जोर नहीं देते।

इसका कारण यह है कि विज्ञान की पढ़ाई को लेकर एक तरह का हौवा बना दिया गया कि यह बहुत खर्चीली है, इसमें पास होना मुश्किल है, हमारी औकात से बाहर है और यह पैसे वालों के लिए है या जिन्हें अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर बनाना है, जबकि ऐसा कतई नहीं है। यदि बचपन से यह शिक्षा दी जाए कि आसपास का वातावरण, पशु पक्षी का साथ, प्रकृति के साथ तालमेल और जीवन यापन के लिए आवश्यक वस्तुएं हमारे चारों ओर बिखरी हुई हैं तो चाहे लड़का हो या लड़की, पढ़ाई के प्रति उसकी रुचि न हो, तो यह हो नहीं सकता।  मां बाप भी ऐसी शिक्षा प्राप्त करने के बारे में उसे स्वयं ही प्रोत्साहित करेंगे क्योंकि ऐसा न करने का उनके पास कोई कारण नहीं होगा। वे अपने बच्चों को राजी खुशी या जबरदस्ती पढ़ने भेजेंगे।

जीवन से जुड़ी पढ़ाई

अगर यह समझाया जाए कि बुलेट ट्रेन के आगे का हिस्सा नुकीला होने की प्रेरणा किंगफिशर पक्षी से मिली, हवाई जहाज और हेलीकॉप्टर बाज की तर्ज पर बने हैं, एक प्रजाति के जंगली चूहे सौ मील दूर तक सूंघ सकते हैं या फिर मेढ़क के फुदकने को समझने से आरामदायक जूते बनाए जा सकते हैं तो फिर कौन इन सब बातों पर ध्यान देना नहीं चाहेगा?  इसी तरह कमल के फूल की पंखुड़ियों पर धूल या गंदगी का असर नहीं होता और उससे पहनने लायक कपड़े बनाए जा सकते हंै। नारियल के पेड़ों के तने और भिंडी जैसी सब्जी से वस्त्र बनाए जा सकते हैं तो विद्यार्थी में इसके बारे में जानने की उत्सुकता अवश्य होगी।

अगर उसे स्कूल में यह पढ़ाया जाए कि खेती में इस्तेमाल होने वाले हल, ट्रैक्टर ट्रॉली, अन्य औजार कैसे आधुनिक बनते हैं या फिर बताया जाए कि कचरे, वेस्ट डिस्पोजल से कैसे ऊर्जा बनती है, बरसाती पानी को बचा कर कैसे रखा जाए, बाढ़ और सूखे से कैसे निपटा जाए और प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल विभिन्न आपदाओं से बचाने में किस प्रकार मदद कर सकता है, साधारण बीमारियों को आदिवासी क्षेत्रों में मिलने वाली औषधियों से ठीक किया जा सकता है और इसी तरह की सामान्य जीवन से जुड़े विषयों को सिलेबस में रखा जाएगा तो किसे पढ़ने से ऐतराज होगा !


शिक्षा नीति और विज्ञान

नई शिक्षा नीति में विज्ञान की शिक्षा को लेकर बहुत कुछ कहा गया है। उस पर अमल हो जाए तो निरक्षरता दूर करने और शिक्षा को जन जन तक पहुंचने में मदद मिलेगी। इसमें स्कूलों का समूह बनाकर उन्हें विज्ञान शिक्षा के केंद्र तैयार करने की महत्वाकांक्षी योजना है। इसी तरह चलती फिरती प्रयोगशालाओं को बनाने का लक्ष्य है। ये सभी स्कूलों, शिक्षा संस्थानों से जुड़कर विद्यार्थियों को कुदरत की प्रक्रिया समझने में सहायक होंगी।

एक सीमित संख्या में विद्यालयों को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने, सीखने के नवीनतम तरीकों का इस्तेमाल करने से लेकर विद्यार्थियों में प्रदूषण नियंत्रण करने की विधि जानने, ऊर्जा स्रोतों, जल, जंगल जमीन से जुड़ी बातों को समझने, पौष्टिक भोजन, स्वस्थ रहने और खेलकूद को भी पढ़ाई जितना महत्व देने की बात कही गई है। इनमें प्रकृति से तालमेल रखना सिखाया जाएगा क्योंकि कुदरत की प्रक्रिया को समझना ही विज्ञान है।

यदि ये स्कूल स्थापित हो जाते हैं, लालफीताशाही और नेताओं की नेतागिरी का शिकार नहीं बनते तो शिक्षा के क्षेत्र में आमूल चूल परिवर्तन होने की उम्मीद की जा सकती है।

अशिक्षा और निरक्षरता का एक और बड़ा कारण  जनसंख्या का बेरोकटोक बढ़ते जाना है। विज्ञान की शिक्षा इस पर भी लगाम लगा सकती है। शिक्षित होने और साक्षर होने का अंतर यही है कि एक से हमें जीवन जीने के सही तरीके पता चलते हैं और दूसरे से अपना भला बुरा और नफा नुकसान समझने की तमीज आती है।

यूनेस्को ने जब अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाए जाने की घोषणा की तो तब मकसद यही था कि दुनिया भर के लोग इतना तो अक्षर ज्ञान हासिल कर ही लें कि अनपढ़ न कहलाएं ताकि कोई उन्हें मूर्ख न बना सके। दुर्भाग्य से भारत में लगभग एक तिहाई आबादी निरक्षर है, पढ़ लिख नहीं सकती और मामूली बातों के लिए दूसरों पर निर्भर रहती है।

यदि देश को शत प्रतिशत शिक्षित और साक्षर बनाना है तो सबसे पहले पढ़ने लिखने की सामग्री, विषयों का चयन करने में सावधानी और शिक्षा देने में आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल करना होगा। हमारे देश में शिक्षकों की भारी कमी है और उन्हें तैयार करने में वक्त भी बहुत लगता है। कोरोना महामारी ने इतना सबक तो सिखा ही दिया है कि बिना संपर्क में आए या आमने सामने न होने पर किस प्रकार पढ़ाई की जा सकती है। आज सैटेलाइट द्वार शिक्षा को दूर दराज के क्षेत्रों तक सुगमता से पहुंचाया जा सकता है। वर्चुअल क्लासरूम और मोबाईल टेक्नोलॉजी तथा रोबोट तकनीक का इस्तेमाल एक सामान्य बात है। जरूरत इस बात की है कि इसे सस्ता और सुलभ कर दिया जाए। इससे पूरे देश को एक ही समय में एक शिक्षक द्वारा अपनी बात समझाई जा सकती है।

किसी भी समाज के पतन के सबसे बड़े चार कारण गरीबी, निरक्षरता, जनसंख्या और बेरोजगारी हैं। इनसे मुकाबला करने का एक ही रामबाण उपाय है और वह है सही शिक्षा। क्या यह जरूरी है कि हम देशी, विदेशी शासकों की जीवनियां, प्राचीन इतिहास के विवरण, जो भूतकाल है उस की खोजबीन, यहां तक कि सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं के चलन जैसे विषयों को पढ़ने पढ़ाने पर जोर दें और जो जिंदगी को जीने लायक बनाने में मदद करें, उससे विद्यार्थियों को दूर रखें। ये विषय केवल वे पढ़ें जिनकी इनमें रुचि हो, उनके कैरियर की संभावना हो लेकिन हर कोई तारीखों को याद रखने, शासकों के कारनामों, युद्धों के विवरणों और अत्याचारों या सुशासन को लेकर पूछे जाने वाले सवालों के जवाब रटने में अपना समय और धन क्यों नष्ट करे ?

शिक्षा हो या साक्षरता, वही सही है जो जीवन की दशा और दिशा निर्धारित करने में सहायक हो। यह काम स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से ही शुरू हो जाना चाहिए था। अगर तब हो जाता तो हम आज यह नहीं सोच रहे होते कि पूरी आबादी शिक्षित या साक्षर क्यों नहीं हैं?

यहां एक बात और स्पष्ट करनी होगी कि शिक्षा नीति तब ही सफल हो सकती है जब वह बिना आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक भेदभाव के प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान रूप से सुलभ हो, उसमें स्वस्थ प्रतियोगिता करने की भावना हो और निराशा का कोई स्थान न हो। यह काम केवल विज्ञान, वैज्ञानिक ढंग से की गई पढ़ाई और आधुनिक सोच बनाने से ही हो सकता है, इसके अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं है जो हमारी एक बड़ी आबादी पर लगे अशिक्षित और निरक्षर होने का कलंक दूर कर सके। 


शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

साहित्य, विज्ञान तथा फिल्म सामाजिक बदलाव की कड़ियां हैं


यह हमेशा से विवाद का विषय रहा है कि साहित्य ने समाज पर असर डाला है या फिल्मों से सामाजिक परिवर्तन हुआ। इसी कड़ी में यह भी जोड़ा जा सकता है कि वैज्ञानिकों को कुछ नया अविष्कार करने में साहित्यिक लेखन ने प्रेरित किया या किसी गूढ़ रहस्य की कल्पना को साकार करने के लिए की गई खोज को वैज्ञानिक उपलब्धि का नाम दिया गया। 


साहित्य और विज्ञान का संबंध

एक उदाहरण है। मैरी शैली ने फ्रैंकेंस्टेन की रचना की जिसमें मनुष्य के अंग प्रत्यारोपण यानि ऑर्गन ट्रांसप्लांटेशन का जिक्र किया। वैज्ञानिकों द्वारा एक साहित्यकार की रचना से प्रेरित होकर ही यह संभव हुआ, इसे स्वीकार करना होगा। इसी प्रकार साहित्यिक रचनाओं में यह बात बहुत मजेदार और रहस्य की तरह से की गई कि हमारे सभी काम हमारी ही तरह कोई और बिना हाड़ मांस का पुतला कर रहा है। यह मानने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए कि इससे आधुनिक रोबोट का अविष्कार हुआ। जासूसी साहित्य में बहुत से ऐसे चरित्र मिलते हैं जो अपनी सूरत बदलते रहते हैं, ऐयारी से इस प्रकार अपना मेकअप करते हैं कि एकदम बदल जाते हैं तो इसे भी विज्ञान ने वास्तविकता बना दिया।

साहित्य में संचार साधनों की कल्पना बहुत पहले कर ली गई थी। तेज गति से चलने वाले आने जाने के संसाधनों के बारे में भी काल्पनिक उड़ान लेखक भर चुके थे।  धरती, समुद्र और आकाश में होने वाले परिवर्तनों को साहित्य में उकेरा जा चुका था। आज इन क्षेत्रों में जो अविष्कार हो रहे हैं, उन पर साहित्य के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता।

साहित्य लेखन चाहे किसी भी विधा में हो, कविता, कहानी, उपन्यास या कुछ भी हो सकता है, उनमें जो श्रेष्ठ और ऐसी रचनाएं हैं जिन पर समय भी अपना असर नहीं दिखा पाया और जिन्हें शाश्वत कहा गया, उनके हमेशा ही प्रासंगिक बने रहने का एकमात्र कारण यह है कि उनमें भविष्य में झांकने का प्रयास था। विज्ञान भी तो यही करता है, वह भी इसी आधार पर चलता है कि आगे क्या होगा या क्या ऐसा भी हो सकता है ?


यह एक सच्चाई है कि सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन की नींव साहित्य से ही पड़ती है। सामान्य व्यक्ति जो सोचता है, लेखक उसे शब्दों में व्यक्त करता है। आपने देखा होगा कि कैसा भी अवसर या मंच हो, वह चाहे राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या फिर खेल कूद का ही क्यों न हो, अक्सर उनकी शुरुआत किसी लेखक की लिखी हुई बात से की जाती है। इसका मतलब यही है कि अपनी बात को सिद्ध करने में भी साहित्यिक रचनाओं की शरण में जाना पड़ता है।

साहित्य केवल कल्पना नहीं है बल्कि ऐसा दर्पण है जिसमें झांका जाए तो पाठक को उसमें अपनी छवि दिखाई देने लगती है। यही कारण है कि कोई रचना पढ़ते समय मन में गुदगुदी, चेहरे पर हंसी या आंखों से आंसू निकल पड़ते हैं। लेखन की कसौटी भी यही है कि उससे आप अपने को अलग न कर पा रहे हों और उसका प्रभाव स्थाई रूप से मन में बैठ गया हो।


साहित्य और फिल्म

हमारे देश में साहित्यिक रचनाओं पर फिल्म बनाने का काम बहुत कम हुआ है लेकिन जितना भी हुआ, वह निर्माता के लिए घाटे का सौदा नहीं रहा। एक चादर मैली सी, पिंजर, तीसरी कसम, आंधी, ट्रेन टु पाकिस्तान तथा और भी बहुत से उदाहरण हैं। साहित्यकारों के जीवन पर फिल्म या बायोपिक बनाने का काम तो लगभग न के बराबर ही हुआ है।

इसका कारण यह है कि फिल्म बनाना और उससे कमाई करना मुहावरे की भाषा में कहा जाए तो बच्चों का खेल नहीं है। यह सब जानते हुए भी यदि कोई निर्माता निर्देशक किसी साहित्यिक रचना पर फिल्म बनाने के बारे में आगे आता भी है तो हमारे यहां लेखक चाहता है कि उसकी रचना के साथ न्याय हो, मतलब यह कि जो उसने लिखा वह वैसा ही पर्दे पर नजर आए। यह प्रैक्टिकल नहीं होता क्योंकि फिल्म बनाते समय सिनेमेटिक लिबर्टी लेना अनिवार्य है वरना दर्शक उसे देखने नहीं आयेंगे।

इसका एक ही उपाय है कि फिल्म बनाने की सहमति देने के बाद लेखक को यह मानकर अलग हो जाना चाहिए कि अब यह उसकी नहीं निर्माता की रचना होगी और इसमें उसकी दखलंदाजी नहीं हो सकती। जिस प्रकार उसकी कृति को पाठकों की प्रतिक्रिया मिली, उसी प्रकार फिल्म के दर्शकों की राय और नजरिया उसके निर्देशक के बारे में होगा न कि उस साहित्यकार के बारे में जिसकी पुस्तक पर उसका निर्माण हुआ है।

इसका कारण यह है कि पूरे उपन्यास या कहानी के सभी पात्रों और विवरणों को फिल्म में शामिल करना संभव नहीं है और केवल कुछेक पक्षों और किरदारों को लेकर ही फिल्म बनाई जाती है। इसलिए क्या छोड़ा, क्या शामिल किया, इसके पचड़े में न पड़कर फिल्म को एक नई रचना की तरह उसका आनंद लेने की मनस्थिति उसके लेखक को रखनी होगी। ऐसा होने पर ही हमारे देश में वह दौर आ सकता है जिसमें साहित्य पर बनने वाली फिल्म की कद्र उन फिल्मों से अधिक होने लगेगी जो बिना किसी थीम के, बस मनोरंजन और वक्त बिताने के लिए बनाई जाती हैं।

इसी प्रकार विज्ञान और उसकी उपलब्धियों तथा वैज्ञानिकों पर फिल्म निर्माण काफी चर्चित और सफल रहा है। रा वन, कोई मिल गया, कृष, मिस्टर इंडिया जैसी फिल्मों से लेकर मिशन मंगल और रॉकेट्री तक विज्ञान फिल्में अपना जलवा दिखा चुकी हैं।


विज्ञान प्रसार

यहां भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के संस्थान विज्ञान प्रसार का जिक्र करना आवश्यक है जो प्रति वर्ष देश के विभिन्न भागों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विज्ञान फिल्म महोत्सव आयोजित करता रहा है। इसी के साथ इंडिया साइंस चैनल एक ऐसी उपलब्धि है जो देश में ओटीटी प्लेटफॉर्म को एक नई दिशा देने में सफल रही है। इस फेस्टीवल में विज्ञान और तकनीक से संबंधित वे सभी फिल्म प्रदर्शित और पुरस्कृत की जाती हैं जिनका संबंध सामान्य नागरिक पर पड़ने वाले व्यापक प्रभाव से है। वैज्ञानिक उपलब्धियों को हासिल करने में जो समय, धन, परिश्रम और ऊर्जा लगी, अक्सर उसका जिक्र नहीं होता, इसलिए इस तरह की फिल्मों का प्रदर्शन जरूरी है जिनमें किसी ख़ोज या अनुसंधान का प्रोसेस विस्तार से बताया गया हो।

विज्ञान महोत्सव इस बात को दर्शकों तक ले जाने का प्रयास है जिससे साधारण व्यक्ति समझ सके कि उसके व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में जो बदलाव आ रहे हैं, उनका आधार विज्ञान और टेक्नोलॉजी है। ये सभी फिल्में इंडिया साइंस चैनल पर देखी जा सकती हैं। अंधविश्वास, दकियानूसी विचारों और सड़ी गली परंपराओं से मुक्ति पानी है तो उसके लिए अपनी सोच को बदलना ही होगा। इस चैनल पर दिखाई जाने वाली फिल्में दर्शक के सामने एक नई दुनिया का निर्माण करते हुए दिखाई देती हैं।

उम्मीद की जानी चाहिए कि साहित्य और विज्ञान का स्थान फिल्म निर्माण में महत्वपूर्ण समझा जायेगा। इसका कारण यह है कि अब पुस्तकों के पाठक हों या फिल्मों के दर्शक, उनकी रुचि तेजी से बदल रही है। उन्हें मनोरंजन के साथ कुछ ऐसा चाहिए जिसे वह पुस्तक पढ़ने या फिल्म देखने के बाद अपने मन के किसी कोने में संजो कर रख सकें।


शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

समुद्र मंथन से लेकर आजादी के अमृत महोत्सव तक

 

हमारी पौराणिक कथाओं में समुद्र या क्षीरसागर मंथन की महिमा सबसे सबसे अधिक है। देवताओं और असुरों के बीच निरंतर संघर्ष होते रहने के कारण यह उपाय निकाला गया कि समुद्र को मथा जाए और उससे जो कुछ निकले, आपस में बांटकर बिना एक दूसरे के साथ लड़ाई झगड़ा किए शांति से रहा जाए। देखा जाए तो यह मंथन तब की ही नहीं आज की भी सच्चाई है और आपसी द्वेष समाप्त करने का एक स्वयंसिद्ध उपाय है।


टीमवर्क की महिमा

समुद्र मंथन के लिए दोनों पक्षों के बीच बनी सहमति का संदर्भ लेकर यह कहा जाए कि अंग्रेजी दासता से मुक्ति पाने के लिए भारत के सभी धर्मों और वर्गों के लोग स्वतंत्रता रूपी अमृत प्राप्त करने के लिए एकजुट हुए और आजादी हासिल की।  जिस प्रकार तब देवताओं और असुरों ने अपना बलिदान दिया था, उसी प्रकार सभी धर्मों विशेषकर हिंदू और मुसलमान दोनों ने अपनी आहुतियां देकर सिद्ध कर दिया कि वे अपने लक्ष्य की प्राप्ति के प्रति समर्पित हैं। यहां तक कि इसके लिए देश का दो टुकड़ों में बांट दिया जाना भी स्वीकार करना पड़ा।

आजादी मिली, साथ में विभाजन की त्रासदी भी और समुद्र मंथन की तरह स्वतंत्रता संग्राम से निकला सांप्रदायिक विष दंगों के रूप में अपना असर दिखाने लगा। इसका पान करने के लिए शिव की भांति आचरण करने के प्रयत्न भी हुए लेकिन सफलता नहीं मिली।

समुद्र मंथन से महालक्ष्मी अर्थात धन, वैभव, सौभाग्य और संपन्नता प्राप्त हुई, उसी प्रकार आजादी के बाद सभी प्राकृतिक संसाधन हमारे लिए उपलब्ध थे। इन पर कब्जा करने की होड़ लगी और जो ताकतवर थे, इसमें सफल हुए और इसी के साथ हलाहल विष अपने दूसरे रूपों भ्रष्टाचार, शोषण, अनैतिकता, बेईमानी और रिश्वतखोरी के पांच फन लेकर प्रकट हुआ। इसका परिणाम गरीबी, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता और वर्ग संघर्ष के रूप में सामने आया।

समुद्र मंथन से जो मिला, उसमें कामधेनु, ऐरावत, सभी मनोकामनाएं पूरी करने वाला कल्पवृक्ष, परिजात वृक्ष अर्थात हमारी वन्य संपदा और साथ में धनवंतरी वैद्य जो जीवन को बीमारियों से बचा सकें तथा अन्य बहुत सी वस्तुएं मिलीं। यहां तक कि भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर अमृत को देवताओं यानी मानवीय मूल्यों पर चलने वालों के लिए सुगमता से प्राप्त किए जाने का प्रबंध भी कर दिया। दैत्य राहु द्वारा भेष बदलकर अमृत प्राप्त करने की कोशिश को भी उसके दो टुकड़े कर आंशिक रूप से विफल कर दिया। सम्पूर्ण नाश संभव न होने के कारण जब तब मनुष्य में आसुरी शक्तियों के रूप में धार्मिक, सांप्रदायिक और अन्य विनाशकारी रूपों में यह प्रकट होता ही रहता है।

इसके नाश के लिए संविधान और विधि विधान के अनुसार कार्यवाही होती है लेकिन फिर भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता क्योंकि कुछ लोग राहु की भांति अमृत पान कर चुके हैं। इसलिए लगता है कि देश को इन बुराईयों को साथ लेकर ही चलना होगा और इन पर नियंत्रण रख कर आगे बढ़ना होगा।


एक विवेचना

वर्तमान समय में समुद्र मंथन को समझना जरूरी है। समुद्र क्या है, और कुछ नहीं, मानवीय मूल्यों का महासागर है जिसमें लहरें और तरंगें उठती गिरती रहती हैं। यह हमारी पीड़ा, प्रसन्नता, भावुकता, स्नेह और सौहार्द का प्रतीक हैं। इसी प्रकार मंदारगिरी ऐसा पर्वत है जो जीवन को स्थिरता प्रदान करता है और समुद्र में उसके हिलने डुलने से होने वाली हलचल को रोकने के लिए कछुए को आधार बनाना मनुष्य की सूक्ष्म प्रवृत्तियों को मजबूत बनाने की भांति है। वासुकी नाग रस्सी अर्थात मथानी के रूप में यही तो प्रकट करते हैं कि मनुष्य का अपनी इच्छाओं पर काबू पाना बहुत कठिन है और केवल साधना अर्थात जन कल्याण के काम करने की इच्छा रखने से ही सफलता प्राप्त की जा सकती है। सर्पराज का मुंह पकड़ना है या उसकी दुम, यह निर्णय करने का काम हमारे अंदर विद्यमान विवेक और बुद्धि का है। गलती होने से विनाश और सही कदम उठाने से निर्माण होता है, यही इसका मतलब है।

यह देव और दानव क्या हैं, हमारे अंदर व्याप्त सत्य और असत्य की प्रवृत्तियां ही तो है जो प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान रहती हैं। यह हम और हमारे परिवेश, संस्कार और वातावरण पर निर्भर है कि हम किन्हें कम या अधिक के रूप में अपनाते हैं। सफलता प्राप्त करने के लिए सकारात्मक ऊर्जा और नकारात्मक सोच का संतुलन होना आवश्यक है। कोई भी व्यक्ति केवल अच्छा या बुरा नहीं हो सकता, वह दोनों का मिश्रण है, यह स्वयं पर है कि हम किसे अहमियत देते हैं क्योंकि सुर और असुर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

जीवन को एक झटके में समाप्त कर सकने वाला हलाहल विष और अमरता प्रदान करने वाला अमृत कलश, प्रत्येक क्षण होने वाले क्रियाकलाप, मनुष्य की दिनचर्या और सही या गलत निर्णय का परिणाम ही तो हैं। इसे अपने कर्मों का लेखा जोखा या जैसा करोगे, वैसा भरोगे कहा जा सकता है।

कथा है कि भगवान विष्णु ने देवताओं से कहा था कि वे समुद्र से निकलने वाले विभिन्न रत्नों को हासिल करने के स्थान पर अमृत कलश प्राप्त करने के लिए एकाग्रचित्त होकर प्रयत्न करें। इसका अर्थ यही है कि जीवन में आए विभिन्न प्रलोभनों और बेईमानी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार के अवसरों पर ध्यान न देकर अंतरात्मा की आवाज सुनकर निर्णय करना ही श्रेष्ठ है।


निष्कर्ष यही है

आजादी का अमृत महोत्सव मनाने का अर्थ है कि धर्म और संप्रदाय के आधार पर मनमुटाव, नफरत और हिंसा के स्थान पर मानवीय सरोकार और संवेदनाओं को अपनाया जाए वरना तो जो बिखराव की ताकतें हैं, वे हमारा सुखचैन छीनने को तैयार ही हैं। समुद्र मंथन की प्रक्रिया का इस्तेमाल आज शोध, प्रबंधन, प्रशिक्षण और अलग अलग मत या विचार रखने वाली टीमों द्वारा अपने लक्ष्य अर्थात अमृत प्राप्त करने की दिशा में किए जाने वाले प्रयत्न ही हैं।

आज हम कृषि उत्पादन में अभाव की सीमा पार कर आत्मनिर्भर हो गए हैं, विज्ञान और तकनीक में विश्व भर में नाम दर्ज कर चुके हैं, व्यापार और उद्योग में बहुत आगे हैं, अपनी जरूरतें स्वयं पूरा करने में सक्षम हैं, आधुनिक संचार साधनों का इस्तेमाल करने में अग्रणी हैं तो फिर सामाजिक और आर्थिक भेदभाव का क्या कारण है ? इस पर कोई सार्थक बहस इस अमृत महोत्सव में शुरू हो तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी।

अमृत महोत्सव में हमारे स्वतंत्रता संग्राम के भुला दिए गए नायक और नायिकाओं का स्मरण, आजादी के बाद अब तक विभिन्न क्षेत्रों में हुए परिवर्तन, प्रगति, विकास और संसाधनों के इस्तेमाल के बारे में जानना आवश्यक है। इसके साथ ही इस बात पर मंथन जरूरी है कि आज तक हर बच्चे को शिक्षा और हर हाथ को रोजगार देना क्यों संभव नहीं हो सका ? कुछ लोगों के पास अकूत धन कैसे पहुंच गया और आगे संपत्ति का सही बंटवारा कैसे हो ताकि हरेक को उसका हक मिल सके? यह कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर प्रत्येक भारतवासी को मिलना चाहिए।


शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

अभियान शुरू तब हों जब उनके पूरे होने का प्रबंध हो

 

कह सकते हैं कि हमारी सरकार घोषणाएं करने में महारथी और संकल्प लेने और तरह तरह के अभियान शुरू करने के मामले में सब से आगे है। अब यह और बात है कि इनके पूरे होने का जिम्मा कोई नहीं लेता, इसलिए ये सभी वक्त की धूल पड़ने से कुछ समय बाद दिखाई भी नहीं देते और न केवल भुला दिए जाते हैं बल्कि अगर कोई याद दिलाए तो एक नया अभियान आगे कर दिया जाता है।

हम अपनी आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं जो गर्व करने और राष्ट्र प्रेम की ज्वाला हृदय में धधकते रहने की भांति है। प्रत्येक देशवासी अपने घर में अपनी राष्ट्रीय पहचान स्वरूप राष्ट्र ध्वज तिरंगा फहराए, यह इस स्वतंत्रता दिवस का संकल्प है। याद आता है कि कभी केवल सरकारी भवनों और राष्ट्रीय समारोहों में अपना झंडा फहराने की परंपरा या इजाजत थी, भला हो कि अदालती कार्यवाही के बाद अब हर भारतवासी कभी भी कहीं भी तिरंगा फहरा सकता है। हालांकि इसके बनाने से लेकर इस्तेमाल, रखरखाव और सुरक्षित रखने के लिए नियम हैं लेकिन अधिकतर लोग जानकारी के अभाव में इसके उपयोग के बाद इसकी तरफ से लापरवाह हो जाते हैं। उम्मीद है कि इस बारे में भी हर घर तिरंगा अभियान में सरल भाषा में जो नियम हैं उनका बड़े पैमाने पर प्रचार प्रसार किया जाएगा।


अभियानों की बाढ़

चार फरवरी 1916 की बात है जब महात्मा गांधी वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर और उसके आसपास फैली गंदगी, कीचड़, पान की पीक देखकर बहुत विचलित हुए और वहां रहने वालों की जबरदस्त भर्त्सना की थी। विडंबना यह है कि लगभग एक सदी तक हम कमोबेश पूरे देश में इसी तरह रहते रहे , यद्यपि गाहे बगाहे सफाई व्यवस्था में सुधार के लिए कोशिशें चलती रहीं लेकिन देशव्यापी अभियान के रूप में भारत के गांवों, कस्बों और शहरों को स्वच्छता का पाठ पढ़ाने की शुरुआत 2014 में बापू के जन्मदिन से हुई।

इसमें कोई संदेह नहीं कि यह खुले में शौच करने के खिलाफ और हर घर में टॉयलेट के इस्तेमाल, रास्तों पर जन सुविधाओं के निर्माण और नागरिकों के मन में सफाई से रहने और इस बारे में अपनी सोच बदलने के बारे में एक ऐसा अभियान था जिसका पूरा होना देश के प्रत्येक नागरिक के भले के लिए आवश्यक था।

कह सकते हैं कि इस दिशा में काफी हद तक सफलता मिली है लेकिन पिछले कुछ समय से इस तरह की खबरें मिल रही हैं कि लोग अपने पुराने ढर्रे पर लौट रहे हैं। इसकी वजह यह नहीं कि सफाई से रहने के प्रति आकर्षण कम हो गया है बल्कि यह है कि सीवर लाईन बिछाने, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट न लगने और देहात हो या शहर, गंदगी भरे नालों से मुक्ति न मिलने तथा सबसे बड़ी बात यह कि वैज्ञानिक ढंग और देश में ही विकसित टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल में कोताही के कारण लोगों में निराशा बढ़ रही है।

हमारा मतलब व्यर्थ की आलोचना करना नहीं बल्कि यह है कि अटल जी की सरकार में जो निर्मल भारत अभियान शुरू हुआ था, उसकी खामियों और असफल रहने के कारणों को नजरंदाज न करते हुए स्वच्छ भारत अभियान चलाया जाता तो उसके नतीजे कुछ और ही होते। सीवेज डिस्पोजल की सही व्यवस्था न तब थी और न अब है। टॉयलेट में पानी की जरूरत के बारे में पहले भी ध्यान नहीं दिया गया और न अब, केवल शौचालय बनाना ही काफी नहीं, उसके लिए घर के बाहर गंदगी जमा न होने देने के लिए नालियों का इंतजाम और उनकी निरंतर सफाई होने और गंदगी का ट्रीटमेंट प्लांट तक पहुंचने की व्यवस्था भी आवश्यक है।

कुछ साल पहले बड़े जोरशोर से स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम शुरू किया गया था, उसकी नियति क्या हुई, किसी से छिपा नहीं और यह सरकार की विफलता का एक बदनुमा प्रमाण बन गया। अब तो इसकी कोई बात ही नहीं करता जबकि बेरोजगारी दूर करने में यह गेमचेंजर बन सकता था।

इसी तरह स्वस्थ भारत अभियान चलाया गया जो बिना इस बारे में कोई प्रबंध किए शुरू हो गया जिसमें हमारे देश में ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की खराब हालत को पहले सुधारना और व्यवस्थित करना आवश्यक था। अभी भी यहां डॉक्टर नहीं जाते, गर्भावस्था और प्रसव के बाद देखभाल नहीं होती, पौष्टिक खुराक का मिलना तो दूर, तुरंत मजदूरी करने जाने की मजबूरी है, बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर ही इन इलाकों में नहीं है तो ग्रामीण भारत कैसे स्वस्थ रह सकता है।

इसी कड़ी में जन आरोग्य और जन स्वास्थ्य अभियान चलाए गए जिनका कोई अतापता नहीं है। केवल मुफ्त इलाज की सुविधा से सेहतमंद नहीं रहा जा सकता, उसके लिए बड़े पैमाने पर अस्पताल, डिस्पेंसरी, डॉक्टर, नर्स और अन्य स्टाफ चाहिए जिसकी कितनी कमी है, यह बताने की न तो जरूरत है और न ही कोई आंकड़े देने की क्योंकि सरकारी खानापूर्ति के लिए जाली और भ्रामक दस्तावेज तैयार करने में सभी सरकारों को महारत हासिल है।

देश में शिक्षा को लेकर अक्सर चिंता प्रकट की जाती है लेकिन इसके लिए बजट में इजाफा करने के बजाय हर साल कटौती कर दी जाती है। स्कूलों की दशा सुधारने का काम शहरों में होता है, देहात में उनके बनने, खुलने और विद्यार्थियों के पढ़ने जाने का निर्णय सरपंच, मास्टर और दबंग नेता करते हैं। इसका प्रमाण यह है कि विषय कोई भी हो, विद्यार्थी के लिए उसकी जानकारी होना जरूरी न होकर केवल पास होकर अगली कक्षा में पढ़ने जाना है। अध्यापकों और पढ़ने वालों के ज्ञान के नमूने अक्सर सुर्खियों में रहते हैं।

अक्सर आपसी बातचीत और नेताओं के भाषणों में पर्यावरण संरक्षण मतलब प्राकृतिक साधनों जैसे वायु, जल, जंगल, जमीन, नदी, पर्वत, पशु, जीव जंतुओं और जीवन के लिए आवश्यक सामग्री को बचाए रखने के महत्व का जिक्र सुनने में आता रहता है। इसमें गंभीरता इसलिए नहीं होती क्योंकि यदि इन सभी चीजों के अनावश्यक इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई तो इससे सरकार, नेता और अधिकारियों के व्यक्तिगत स्वार्थ पूरे होने के रास्ते में रूकावट आ जायेगी।

प्रति वर्ष जो यह देश भर में नदियों में उफान, बाढ़ का तांडव और जन तथा धन की हानि होती है या फिर सूखे के कारण भयंकर बर्बादी होती है, रेगिस्तान का फैलाव होता है, तो क्या इसे रोकने के लिए सरकार के पास संसाधनों का अभाव है, नहीं ऐसा कतई नहीं है, बल्कि सच यह है कि यह सब जिन्हें हम अक्सर प्राकृतिक आपदा या कुदरत का कहर कह कर बचने की कोशिश करते हैं, यह एक साजिश की तरह है जिसमें अधिकारी, स्थानीय नेता से लेकर राज्य और केंद्र सरकार के मंत्री, सभी शामिल हैं।

अगर यह सब हर साल न हो तो फिर बाढ़, सूखा, अतिवृष्टि और संपत्ति के नष्ट होने के ऐवज में राहत के नाम पर धन की हेराफेरी करने पर अंकुश लग सकता है जो किसी को मंजूर नहीं है।

यह सब समझना कि ज्यादातर अभियान जनता के हित के लिए नहीं, कुछ मुठ्ठी भर लोगों की स्वार्थपूर्ति के लिए चलाए जाते हैं, कोई टेढ़ी खीर नहीं है बल्कि आसानी से समझ में आ जाने वाली साधारण सी बात है। इसलिए क्या यह जरूरी नहीं लगता कि जब भी कोई अभियान शुरू करने की घोषणा हो, जनता की तरफ से तर्क के आधार पर उसकी समीक्षा के बाद उसका समर्थन या विरोध करने की आदत डालना देशवासियों के लिए आवश्यक है?


शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

वैज्ञानिक सोच नास्तिक होना या धर्म को न मानना नहीं है

 

अक्सर यह बात सुनने को मिलती है कि हमारी सोचने समझने की योग्यता का आधार विज्ञान के अनुसार अर्थात वैज्ञानिक होना चाहिए। परंतु यह कोई नहीं जानता कि यह आधार क्या है? क्या यह कोई ऐसी वस्तु हैं जो कहीं बाजार में मिलती है, मोलभाव कर उसे हासिल किया जा सकता है या फिर इसका संबंध परंपराओं, धर्म के अनुसार की गई व्याख्याओं और पूर्वजों द्वारा निर्धारित कर दिए गए जीवन के मानदंडों से है ?


विज्ञान के सरोकार

विज्ञान का अर्थ यह लगाया जा सकता है कि ऐसा ज्ञान जो विशेष हो, उसे प्राप्त करने के लिए तथ्यों और तर्कों की कसौटियों से गुजरना पड़ा हो, वह इतना लचीला हो कि उसमें चर्चा, वादविवाद, शोध के जरिए परिवर्तन और संशोधन किया जा सके।

एक छोटा सा उदाहरण है। तेज़ हवा चलने से घर के खिड़की दरवाजे कई बार बजने, आवाज करने लगते हैं। कुछ लोग कह सकते हैं कि यह कोई भूत है जो खड़कड़ कर रहा है लेकिन दूसरा सोचता है कि कहीं इसकी चैखट तो ढीली नहीं पड़ गई और वह जाकर उसे कस देता है। आवाज़ आनी बंद हो जाती है।

यही वह ज्ञान है जो सामान्य से अलग है इसलिए यह विज्ञान कहा जाता है। हमारे संविधान में भी इस बात की व्यवस्था है जिसके अनुसार हमारे फंडामेंटल कर्तव्यों का पालन वैज्ञानिक ढंग से सोच विचार कर किया जाना चाहिए। इससे ही लोकतंत्र सुरक्षित और मानवीय गुणों का विकास हो सकता है।

जब हमें किसी बात पर उसके सही होने के बारे में संदेह होता है, उसे जांचने परखने के लिए उत्सुकता होती है तो यहीं से वैज्ञानिक सोच की शुरुआत होती है। इसके विपरीत जब किसी बात को केवल इसलिए माना जाए कि उसे पूर्वजों ने कहा है, उनकी परंपरा का निर्वाह कर्तव्य बन जाए, उसमें कतई बदलाव स्वीकार न हो तब यह कट्टरपन बन जाता है और यही लड़ाई झगडे, मनमुटाव और शत्रुता का कारण बन जाता है।

जो लोग यह कहते हैं कि विज्ञान में ईश्वर या परम सत्ता या किसी भी नाम से कहें, उसका कोई महत्व नहीं है तो यह अपने आप को भुलावे में रखने और वास्तविकता को स्वीकार न करने के बराबर है। हमारी सभी वैज्ञानिक प्रयोगशालायें और उनमें शोध और एक्सपेरिमेंट कर रहे सभी लोग चाहे सामने होकर यह न मानें कि परमेश्वर जैसी कोई चीज़ है लेकिन वे भी अपने अंतःकरण में मानते हैं कि कुछ तो है जो उनकी कल्पना से परे है, समय समय पर किसी अदृश्य शक्ति का नियंत्रण महसूस होता है।

कुछ लोग धर्म और धार्मिक विधि विधान को मानना अवैज्ञानिक कहते हैं और उनमें आस्था रखना और हवन, पूजन और कर्मकांड जैसी चीजों का उपहास करते हैं। इस बारे में केवल इतना कहा जा सकता है कि जब यह सब करने के लिए चढ़ावा, दिखावा धन की मांग और न देने पर ईश्वर का प्रकोप, दंड मिलने और अहित होने जैसी बातों के बल पर लूटखसोट, जबरदस्ती और शोषण किया जाए तो यह अपराध की श्रेणी में आता है। इसका विज्ञान से कोई संबंध नहीं है वरना तो इन सब चीजों के करने से वातावरण शुद्ध होता है, मानसिक और भावनात्मक तनाव कम होता है, मन केंद्रित होता है और शरीर में नवीन ऊर्जा का संचार होता है।

हमारे जीव, प्राणी और वन विज्ञान ने अनेक ऐसी संभावनाओं को हकीकत में बदला है जिन पर आश्चर्य हो सकता है। औषधियों के तैयार करने में जीवों से प्राप्त किए गए अनेक प्रकार के ठोस और तरल पदार्थ, जड़ी बूटियों के सत्व और प्राकृतिक तत्वों के मिश्रण का इस्तेमाल होता है और बाकायदा बने एक सिस्टम से गुजरने के बाद उनके प्रयोग की इज़ाजत दी जाती है। इसके स्थान पर यदि कोई व्यक्ति झाड़फूंक, गंडे ताबीज़, भभूत जैसी चीजों से ईलाज करने की बात करता है तो यह अपराध है क्योंकि विज्ञान इन्हें मान्यता नहीं देता। कोरोना जैसी महामारी से लेकर किसी भी दूसरे रोग की चिकित्सा दवाई, वैक्सीन, इंजेक्शन से होती है न कि किसी पाखंडी और झोलाछाप लोगों के इलाज़ से, इसलिए यह लोग भी अपराधी हैं।

विज्ञान का आधार हमेशा से तर्क यानी जो है उस पर शक या संदेह करना है। इसका मतलब यह है कि जो चाहे सदियों से चला आ रहा है लेकिन जिसकी सत्यता का कोई प्रमाण नहीं है और जो केवल परंपरा निबाहने के लिए होता रहा है, उसे न मानकर नई शुरुआत करना वैज्ञानिक है ।

यहां इस बात का ज़िक्र करना आवश्यक है कि जो लोग गणेश जी को प्लास्टिक सर्जरी का उदाहरण मानते हैं और इसी तरह की निराधार बातों का समर्थन करते हुए आधुनिक विज्ञान और टेक्नोलॉजी को चुनौती देते हैं, वे समाज का अहित कर रहे हैं और देश को आगे बढ़ाने के स्थान पर पीछे ले जाने का काम कर रहे हैं।


विज्ञान और धर्म

कोई भी धर्म किसी कुरीति या मानवता विरोधी काम का न तो समर्थन करता है और न ही मान्यता देता है, इसलिए धर्म अवैज्ञानिक नहीं है। इसी प्रकार चाहे कोई भी धर्म अपनी निष्ठा किसी भी अवतार, गुरु, पैगंबर, यीशु, तीर्थंकर, बुद्ध आदि महापुरुषों में रखे तो यह विज्ञानसम्मत है। इसलिए विज्ञान और धर्म का गठजोड़ तर्कसंगत है।

भारत तो अपनी प्राचीन संस्कृति, वैज्ञानिक उपलब्धियों और उनकी वर्तमान समय में उपयोगिता के बारे में विश्व भर में जाना जाता है जिसके कारण हम अनेक क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। तब फ़िर उन सब बुराइयों को ढोते हुए चलना कतई समझदारी नहीं है जो हमें दूसरों की नज़रों में हंसी का पात्र बनाती हैं।

वैज्ञानिक सोच और उसके आधार पर जब हमारे देश में सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक निर्णय लेने की शुरुआत एक अनिवार्य प्रक्रिया के रूप में हो जाएगी, तब ही हम गरीबी, बेरोज़गारी और विदेशों में प्रतिभा के पलायन को समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठा पाएंगे।  


शनिवार, 23 जुलाई 2022

आदिवासी राष्ट्रपति होने का अर्थ जनजातियों, वनवासियों की उन्नति है

 

राष्ट्रपति के रूप में आदिवासी महिला द्रौपदी मुर्मू का चुनाव क्या हमारे ट्राइबल क्षेत्रों की समस्याओं का समाधान कर पाएगा, निवासियों को शोषण से मुक्ति दिला पाएगा और उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ पाएगा ? यह एक ऐसा यक्ष प्रश्न है जिसका उत्तर केवल भविष्य के गर्भ में छिपा है।

इतिहास से सीख

ब्रिटिश शासन में आदिवासियों को जन्मजात गुनहगार और अपराधी मानकर सभी तरह के अत्याचार करने की खुली छूट का कानून बनाया गया था जिसका पालन आजादी के बहुत बाद तक होता रहा। जब यह बात बहुत अधिक जुल्म होने के बाद किसी तरह पहले प्रधानमंत्री नेहरू जी के पास पहुंची तो वे बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने आदिवासियों को विमुक्त जनजाति का नाम देकर और इस संबंध में कानून बनाकर इस काम की इतिश्री अपनी ओर से कर दी। परंतु स्थिति पहले जैसी ही रही।

जो लोग आदिवासी बहुल इलाकों में गए हैं या उन्हें वहां काम करने और व्यवसाय करने का मौका मिला है, वे इस बात को अगर सच्चे मन से स्वीकार करेंगे तो अवश्य ही यह कहेंगे कि चाहे कानून हो लेकिन वहां के मूल निवासियों का शोषण बंद नहीं हुआ है, वे स्वयं भी यह करते रहे हैं और पुलिस तथा प्रशासन द्वारा किए जाने पर भी चुप रहे हैं। नतीजा बाहरी लोगों द्वारा अपना मतलब निकलने तक का विकास, सरकारी योजनाओं की बंदरबांट और प्राकृतिक संसाधनों विशेषकर जल, जंगल और जमीन पर कब्जा कर स्थानीय लोगों को अपना गुलाम समझने के रूप में हुआ है।

व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कुछ उदाहरण इस कथन की पुष्टि के लिए काफी हैं। दूरदर्शन, पैरामिलिट्री फोर्स और कुछ अन्य संस्थानों के लिए नॉर्थ ईस्ट के इलाकों में फिल्में बनाते समय सरकारी नियमों और कानूनों की धज्जियां उड़ते देखकर समझ में आ गया कि जब तक स्थानीय स्तर पर लोग शिक्षित नहीं होंगे, बड़े शहरों में पढ़ने लिखने के बाद यहां वापिस नहीं आयेंगे और सरकारी नीतियों को लागू करने का काम स्वयं नहीं करेंगे तब तक इन इलाकों की तस्वीर बदल पाना संभव नहीं है।

विश्वास और भरोसा

ग्रामीण मंत्रालय के लिए रेडियो कार्यक्रम चलो गांव की ओर का प्रसारण उत्तर पूर्व की प्रमुख आठ भाषाओं या बोलियों में करने का आदेश मिला तो सबसे पहली समस्या दिल्ली में इन प्रदेशों से आकर रहने वालों में से ऐसे व्यक्तियों से संपर्क करने की थी जो हिंदी में बनने वाले मूल प्रोग्राम का अपनी भाषा में रूपांतर कर सकें। किसी तरह इन तक पहुंच बनाई तो पाया कि उन्हें हम पर तनिक भी विश्वास नहीं है। कारण यह था कि दिल्ली सहित सभी बड़े शहरों में रहने वाले लोगों ने उन्हें अपना नहीं माना, अनेक अपमानजनक शब्द उनके लिए इस्तेमाल किए, किराए पर घर देते समय ऐसी बंदिशें लगाईं कि वे अपने तीज त्यौहार भी न मना सकें, अपनी पसंद का खानपान भी न कर सकें और यही नहीं उनकी पोशाक, चलने फिरने और रहने सहने की आदतों पर भी अंकुश लगाने लगे।

बहुत समझाने पर वे यह प्रोग्राम करने को तैयार हुए, शुरू में हाथ के हाथ तय फीस मिलने पर राजी हुए। एक बार जब विश्वास हो गया कि उनका शोषण नहीं होगा, कोई उनसे अभद्र भाषा में बोलने या व्यवहार करने की हिम्मत नहीं करेगा और उनकी व्यक्तिगत और पारिवारिक उलझनों को सुलझाने का प्रयास होगा, तब कहीं जाकर उनका पूर्ण सहयोग मिल सका। भरोसे की यह कड़ी आज तक कायम है।

नॉर्थ ईस्ट के लगभग सभी प्रदेशों में जाने पर यह समझने में देर नहीं लगी कि आदिवासियों की जीवन शैली समझने और उनके रस्मों रिवाज को जानने तथा उन्हें उनके पारंपरिक तरीके अपनाने में कोई रुकावट न डालने से ही उनका भला हो सकता है।  उनकी अपनी न्याय और पंचायत व्यवस्था है, वन संरक्षण की अपनी विधियां हैं, खेतीबाड़ी के अपने तरीके हैं, रोजगार की अपनी अलग पहचान है, जरूरत केवल उन तक आधुनिक टेक्नोलॉजी और उसका इस्तेमाल करने के तरीके पहुंचाने की है।

एक दूसरा उदाहरण ओड़ीसा के झारसुगुड़ा जिले में दर्लीपली गांव का है जहां एनटीपीसी का प्लांट है। इस आदिवासी इलाके में गरीबी के कारण ये लोग अपने मृतकों का दाह संस्कार और उनकी अस्थियों का नदी में विसर्जन न कर पाने से शव को जमीन में गाड़ देते थे। वे अपनी जमीन समुचित मुआवजा मिलने पर भी नहीं दे रहे थे क्योंकि इससे उनके पूर्वज बिना विधिवत संस्कार के उखड़ जाते। अनेक प्रयासों के बाद अधिग्रहण करने वाले अधिकारी हकीकत समझ पाए और उन्हें  समझा पाए कि यह काम वे सरकारी अनुदान से अपनी इच्छानुसार कर सकते हैं और सभी पूजा पाठ, अस्थि विसर्जन में लगने वाली राशि उन्हें अलग से मिलेगी, तब कहीं जाकर वे अपनी जमीन देने पर सहमत हुए। अनुमान लगाएं कि यदि यह समझदारी न बरती जाती तो विद्रोह, मारपीट से लेकर खून खराबा तक हो सकता था और प्लांट कभी भी न लग पाता।

ओडिसा सहित अनेक आदिवासी क्षेत्रों के घने जंगलों, वनस्थलियों के पार, नदी, नालों के उफान और कुदरती कहर से त्रस्त तथा घोर समस्याओं से जूझ रहे आदिवासियों तक पहुंच कर अपनी आंखों से उनकी जरूरत समझने और पूरा करने का काम पिछले कुछ वर्षों में होते हुए देखा है। इसी प्रकार मध्य प्रदेश में पहली बार आदिवासी बहुल इलाकों में ग्राम पंचायतों में आदिवासी सदस्यों के बैठने के लिए सुविधाजनक कुर्सी मेज और कॉन्फ्रेंस रूम जैसी सुविधाएं देखकर लगा कि इनके प्रति सम्मान का भाव पैदा हो रहा है। वरना तो चाहे कितना भी समृद्ध आदिवासी हो, उसे जमीन पर झुक कर बैठ कर ही अपनी बात कहनी होती थी।

आदिवासी समाज और आत्मनिर्भरता

जब तक आदिवासी समाज और संस्कृति को गणतंत्र दिवस तथा अन्य आयोजनों में उन्हें एक दिखावटी वस्तु समझने की मानसिकता से ऊपर नहीं उठेंगे, उनका शोषण नहीं रुकेगा। वास्तविकता यह है कि यह समाज अपने भरण पोषण की जरूरतें पूरा करने और आत्मनिर्भर होने में शहर वालों से कहीं अधिक सक्षम है। उन्हें दिखावा करना नहीं आता, छल कपट से दूर रहते हैं, मानव धर्म का निर्वाह करने और वन्य जीवों के साथ तालमेल बिठा कर उनका संरक्षण और संवर्धन करने में उनका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। यही नहीं वे अपने पारंपरिक अस्त्र शस्त्रों से शत्रुओं का सामना करने में समर्थ हैं। उनकी मर्जी के बिना उनके इलाकों में प्रवेश कर पाना नामुमकिन है।

जब तक आदिवासियों, वनवासियों और जनजातियों के स्वाभाविक गुणों को समझकर उन्हें अपने साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए हमारी ओर से पहल नहीं होगी, उनका विश्वास अर्जित करने के प्रयत्न नहीं होंगे, उनकी सोच के अनुसार नीतियां और योजनाएं नहीं बनेंगी, तब तक उनका सहयोग मिलने की बात बेकार है।

हमारा हाल यह है कि उनकी संस्कृति, पहनावे, खानपान से लेकर लोक संगीत, नृत्य, कला में उनकी परंपराओं का सस्ते दामों में सौदा करने में निपुण हैं और इस सब को महंगे दामों में बेचकर मुनाफा कमाने में माहिर हैं। अगर कोई इंकार करे तो पुलिस और प्रशासन अपनी मनमानी से लेकर इन सीधे लोगों पर अमानुषिक अत्याचार करने से नहीं चूकता।

महामहिम राष्ट्रपति से उम्मीद की जा सकती है कि वे अपने कार्यकाल में आदिवासियों को राजनीतिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने में सफल होंगी। उनकी प्रकृति को बदले बिना उनके रक्षक प्राकृतिक स्रोतों के गैरजरूरी दोहन को रोकने में समर्थ होंगी। यह समाज आबादी के हिसाब से चाहे ग्यारह करोड़ के आसपास हो लेकिन इसकी क्षमता, ताकत और हिम्मत इतनी है कि समस्त भारत का गौरव बन सकता है। यह तब ही हो सकता है जब इनके साथ दुर्व्यवहार न हो, इनका शोषण न होने दिया जाए और इनके अधिकारों को किसी दूसरे के द्वारा हड़प लिए जाने की आशंका न हो।  


शनिवार, 2 जुलाई 2022

प्लास्टिक कानून व्यावहारिक न होने से उन्हें लागू करना अनुचित है

 

इसे परंपरा कहें या अपना बड़प्पन दिखाने की कोशिश या फिर अपनी धाक से लेकर धौंस जमाने की मानसिकता और हठधर्मी कि जो सरकार करे वही ठीक, चाहे वास्तविकता कुछ भी हो !

यही प्रवृत्ति सरकार के उस आदेश में दिखाई देती है जिसके अनुसार जुलाई से सिंगल यूज प्लास्टिक पर बैन लगा दिया गया है।


प्लास्टिक कथा

उन्नीसवीं सदी के मध्य में प्लास्टिक के रूप में एक ऐसी खोज हुई जिसने तेजी से पूरी दुनिया में अपनी धूम मचा दी। उसके बाद प्लास्टिक के इस्तेमाल से होने वाले नुकसान जैसे जैसे सामने आते गए, इस पदार्थ का विकल्प खोजा जाने लगा लेकिन अभी तक इसमें बहुत कम सफलता मिली है लेकिन भविष्य में कुछ भी हो सकता है।

प्लास्टिक के आने से पहले कागज से बनी चीजों का इस्तेमाल होता था जो महंगा भी था और उसके लिए पेड़ों को काटना पड़ता था। इसके साथ ही न तो यह वस्तुएं ज्यादा देर तक टिकती थीं और न ही इनमें रखकर लाई जाने वाली चीजें।  इसके अतिरिक्त  उनके निपटान यानी डिस्पोजल की समस्या भी थी।

यह दौर उद्योग धंधों के पनपने और उपभोक्ताओं के लिए प्रतिदिन नई चीजों के आने का था जिन्हें रखने के लिए प्लास्टिक से बनी टिकाऊ और सस्ती थैलियों का इस्तेमाल होने लगा। इसी तरह खाने पीने में प्लास्टिक के कप, ग्लास, प्लेट, नली, क्रॉकरी, कटलरी और बहुत सी दूसरी सामग्री ने घर घर में अपनी जगह बना ली। इस तरह प्लास्टिक हमारे जीवन का अनिवार्य अंग बन गया जिसके बिना कुछ भी करना संभव नहीं रहा।

अब इसी प्लास्टिक पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए हैं जिन्हें लागू करना न तो आसान है और न ही प्रैक्टिकल क्योंकि इसके विकल्प के रूप में केवल यही है कि हम कागज से बनी चीजों का इस्तेमाल फिर से शुरू कर दें।

कानून का पालन न करने और पकड़े जाने पर पांच साल की कैद और एक लाख तक का जुर्माना हो सकता है। कुछ राज्यों ने तो ऐसे दिशा निर्देश जारी किए हैं कि यदि कोई प्लास्टिक की थैली में घर का सामान लाते हुए पकड़ा गया तो उस पर कड़ी कार्यवाही होगी। ऐसे आदेशों से समाज में अफरातफरी और उसके बाद वसूली का धंधा ही बढ़ेगा।

सच यह भी है कि लगभग एक लाख छोटे, मध्यम उद्योग इस कारोबार में हैं और लाखों नहीं करोड़ों लोग इसके व्यापार से जुड़े हैं। प्लास्टिक बंदी से क्या अंधेर नगरी चैपट राजा की कहावत सिद्ध नहीं होती और समाज में अव्यवस्था फैलने का खतरा नहीं है ? यह भी हो सकता है कि इस कानूनन बंदी का कोई असर ही न हो और उद्योगपति, व्यापारी तथा उपभोक्ता कुछ ले दे कर इसके उल्लंघन होने पर बचने का रास्ता निकाल लें।


प्लास्टिक प्रदूषण

इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्लास्टिक के इस्तेमाल में अनेक दोष हैं, जैसे कि इसके डिस्पोजल का कोई सही प्रबंध न होने से यह बहुत घातक हो सकता है । मनुष्य से लेकर पशुओं तथा जलचरों के लिए नुकसानदायक है। अक्सर सड़कों, नदी के किनारों और समुद्र तट पर प्लास्टिक की बोतलें और कचरा बिखरा हुआ दिखाई देता है। अब क्योंकि इसके डिस्पोजल का कोई उचित प्रबंध सरकार से हुआ नहीं तो फिर इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने का कोई औचित्य नहीं बनता।

इसके विपरीत प्लास्टिक अपने गुणों के कारण, उसमें रखी वस्तुओं के देर तक तरोताजा रहने और पूरी तरह से कीटाणु रहित होने अर्थात हाइजीनिक होने से इसका इस्तेमाल न करना संभव नहीं है।

जब ऐसा है तो प्लास्टिक के दोषों का निराकरण करने का कानून बनाया जाता, उसका ऐसा विकल्प दिया जाता जो अपनी उपयोगिता में प्लास्टिक के बराबर होता और इसके साथ ही उसके निपटान के लिए वेस्ट मैनेजमेंट के जरिए उपकरण और प्लांट्स लगाए जाते, तब तो बात समझ में आती। 


टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल

ऐसा नहीं है कि इस दिशा में कोई काम नहीं हुआ। देश के कुछ राज्यों में प्लास्टिक प्रदूषण से बचने के लिए प्लांट्स लगे हैं लेकिन वे अपनी सीमित क्षमता के कारण बेअसर साबित हो रहे हैं। अपने देश के आकार और आबादी के सामने ये ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं। नतीजा यही है कि नदियों से लेकर समुद्र तक प्लास्टिक प्रदूषण फैलता जा रहा है।

ऐसा भी नहीं है कि यह समस्या केवल हमारे देश की हो, यह विश्वव्यापी है। जिन देशों ने इस समस्या के विकराल रूप लेने से पहले कदम उठा लिए, वे आज प्लास्टिक के फायदों का लाभ उठा रहे हैं और साथ ही उसके प्रदूषण से बच भी रहे हैं। प्रतिबंध लगाना तब ही सही हो सकता है कि जब उसका कोई समान विकल्प हो। सिंगल यूज प्लास्टिक जैसी कोई वस्तु जब तक खोज नहीं ली जाती, तब तक के लिए इस पर रोक लगाने के बारे में सरकार को व्यवहारिक दृष्टिकोण से विचार करना होगा। ऐसी नीति और कानून व्यवस्था लागू करनी होगी कि प्लास्टिक के लाभ मिलते रहें और स्वास्थ्य की रक्षा भी हो जाए।

एक बार इस्तेमाल कर फेंक दिए जाने वाले प्लास्टिक को रीसाइकल कर बहुत से उपयोगी पदार्थों में बदला जा सकता है। ऐसा नहीं है कि हमारा उद्योग जगत यह बात नहीं जानता लेकिन उसके सामने रीसाइक्लिंग प्लांट लगाने की पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं, इसकी लागत बहुत ज्यादा होने और मुनाफा कम होने और इसके साथ ही टैक्स और दूसरी सुविधाओं का आकर्षण न होने से इसमें बहुत कम निवेश हो रहा है।

ऐसा भी नहीं है कि हमारे देश में इस दिशा में अनुसंधान नहीं हो रहा या प्लास्टिक डिस्पोजल के लिए टेक्नोलॉजी का अभाव है। हमारी वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं, विशेषकर वे जो पर्यावरण प्रदूषण रोकने के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं, उन्होंने सस्ती और टिकाऊ टेक्नोलॉजी विकसित की हुई हैं। अफसोस की बात यह है कि जब सरकारी संस्थान ही उनका इस्तेमाल नहीं करते तो फिर प्राइवेट सेक्टर से इसकी उम्मीद रखना व्यर्थ है।

सिंगल यूज प्लास्टिक के इधर उधर फेंकने से हमारे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में नाले और नालियां भरे पड़े हैं जो गंदगी और बदबू के अतिरिक्त कुछ नहीं देते, स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हैं और अनेक बीमारियों का कारण हैं। यदि सरकार चाहे केंद्र की हो राज्य की, इन गंदे नालों से ही अपने देश में विकसित टेक्नोलॉजी से सफाई कराने की जिम्मेदारी ले ले तो फिर किसी तरह का प्रतिबंध लगाने की जरूरत नहीं रहेगी।

उदाहरण के लिए नागपुर स्थित नीरी प्रयोगशाला ने ऐसी टेक्नोलॉजी बहुत वर्ष पहले विकसित कर ली थी जिसके इस्तेमाल से इन नालों को प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्त किया जा सकता है। उसके पानी को साफ करके नाले के आसपास हरियाली के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी तरह निजी क्षेत्र में पीरामल समूह की वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं बहुत सराहनीय कार्य कर रही हैं।

एक उदाहरण अमेरिका का है। वहां एक ऐसा सिस्टम है कि प्रदूषण होते ही या उसकी संभावना होने पर तत्काल टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को अनिवार्य बना दिया गया है।


सरकार पुनर्विचार करे

यदि सरकार में इच्छाशक्ति है और वह वास्तव में प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्ति दिलाकर देशवासियों का भला करना चाहती है तो उसे अपने वर्तमान आदेश को रद्दी में डालकर नए सिरे से सोचना होगा। यहां यह बताना कि सरकार को इन सब अनुसंधानों और खोजपूर्ण तथ्यों की जानकारी नहीं है तो यह एक भ्रम है। सरकार सब कुछ जानती है लेकिन हो सकता है कि अपने राजनीतिक स्वार्थ या फिर किसी अन्य कारण से कम से कम इस मामले में तो सही कदम नहीं उठा रही।