शनिवार, 5 मार्च 2022

बाहर युद्ध हो तो अपनी सामथ्र्य का आकलन ज़रूरी है

 

रूस और यूक्रेन का युद्ध एक सबक तो यह सिखाता है कि, चाहे कोई देश तटस्थ होकर रहे, उसे अपनी सीमाओं की सुरक्षा के बारे में और अपनी तैयारियों को लेकर मंथन अवश्य करना चाहिए।

भारत ने अब तक चार बड़ी लड़ाईयां भुगती हैं और छोटी छोटी अनेक जब तब होती रही हैं। ये आंतरिक यानी अपने ही राज्यों में लड़ी जाती रहीं हों, उत्तर पूर्वी राज्यों में सैनिक कार्यवाही हो, कश्मीर में आतंकियों के साथ मुठभेड़ हो, अलगाववादियों और नक्सली इलाकों में संघर्ष हो या फ़िर सामान्य हालात में अपने नागरिकों की रक्षा के लिए उठाए गए कदम हों, कुछ भी हो सकता है।


वास्तविकता क्या है

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि हमारे सैनिकों ने अपने अदम्य साहस और वीरता से विदेशी हमलावरों को खदेड़कर देश की कीर्ति में चार चांद लगाए हैं। दूसरी वास्तविकता यह है कि युद्ध विराम  होने के बाद चाहे पाकिस्तान हो या चीन, दोनों पक्ष जब शांति कायम करने के लिए समझौते के लिए बैठते हैं तो अक्सर युद्ध में विजय हासिल करने के बावजूद हमारा पलड़ा कमज़ोर रहता है।

पाकिस्तान के साथ पहले युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद जिस बात पर अर्थात कश्मीर को लेकर जब हम लड़े तो यह समस्या हल हो जानी चाहिए थी लेकिन हुआ यह कि इसे संयुक्त राष्ट्र की दखलंदाजी के लिए छोड़ दिया गया जिसका परिणाम आज तक भुगत रहे हैं।  हमेशा पाकिस्तान के साथ युद्ध की संभावना बनी रहती है।

इसी प्रकार भारत चीन युद्ध के बाद हमें लद्दाख के बहुत बड़े भूभाग से हाथ धोना पड़ा। 1965 की लड़ाई में मिली जीत का लाभ उठाने से चूक गए और 1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े करने पर भी हम अधिक लाभ में नहीं रहे बल्कि बांग्लादेश के रूप में एक नया प्रतिद्वंदी खड़ा कर लिया।

जहां तक चीन का संबध है उसके साथ भारत के संबंधों को झटका तब लगा जब तिब्बत पर हमला कर उसने उसे अपने राज्य में मिला लिया और वह हमारा निकट पड़ोसी बन गया। चीन की विस्तारवादी नीति के कारण इसका परिणाम भारत चीन सीमा विवाद और 1962 में युद्ध के रूप में सामने आया।


दोस्त और दुश्मन

भारत और पाकिस्तान के बारे में कहा जा सकता है कि शायद ही दुनिया में ऐसे दो देश हों जो इतने समान हों लेकिन दोनों के बीच मैत्री न होकर शत्रुता हो। इसी तरह चीन ने दोस्ती की आड़ लेकर दुश्मनी निभाई। इस तरह दो विकट पड़ोसी मिल गए और दोनों ही मित्रता के आवरण में शत्रुओं की भूमिका निभाते रहते हैं। 

अक्सर कहा जाता है कि भारत को पाकिस्तान अथवा चीन में से किसी एक को अपना मित्र बना लेना चाहिए ताकि हर समय रहने वाले तनाव और युद्ध की आशंका को कुछ तो कम किया जा सके। मित्रता के लिए इन दोनों में से किसी एक को चुनना हो तो जहां तक सामथ्र्य की बात है चीन ने व्यापार हो या सामाजिक और आर्थिक विकास, अपना सिक्का दुनिया में जमा लिया है। पाकिस्तान इसमें कहीं नहीं ठहरता।  मेड इन चाइना की धूम का डंका सब ओर बज रहा है।  पाकिस्तान इसके मुकाबले कहीं नहीं है।

भारत की यदि प्रतियोगिता है तो वह चीन से है, इसलिए क्या यह समझदारी नहीं होगी कि भारत चीन से हाथ मिलाकर बराबरी का रिश्ता कायम करे ताकि दुश्मनी कुछ तो कम हो!


युद्ध की शिक्षा

रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए भारत के लिए ज़रूरी हो जाता है कि वह अपने नागरिकों के लिए ऐसी शिक्षा की व्यवस्था करे जिसमें स्कूल से ही सेना से संबंधित विषयों की जानकारी विद्यार्थियों को होती रहे। इसका मतलब यह नहीं कि सैनिक प्रशिक्षण दिया जाए बल्कि यह है कि सिलेबस में युद्ध और उससे संबंधित नीतियों की समझ शामिल हो और विद्यार्थी एक विषय की तरह इसका अध्ययन करें। 

भारत के इतिहास पर दृष्टि डालें तो वैदिक काल से, विशेषकर गुरुकुल परंपरा में और उसके बाद भी विद्यार्थियों को युद्ध करने, चक्रव्यूह की रचना और उसका विध्वंस करने, विभिन्न अस्त्र शस्त्रों के बारे में शिक्षित करने, लड़ाई में किस तरह के व्यवहार की अपेक्षा होती है जैसी बातों को एक विषय की तरह पढ़ाया जाता था।

इसमें यह भी शामिल होता था कि युद्ध के दौरान घायल सैनिकों की चिकित्सा और मृत्यु होने पर उनके शवों की अंतिम क्रिया किस प्रकार हो। इसी के साथ युद्ध में सैनिकों के लिए पर्याप्त भोजन, युद्ध बंदियों के रखने की व्यवस्था और यदि विजय होती न दिखाई दे तो शत्रु के हाथ लगने से बचने की विधि तथा उन सभी वस्तुओं का ज्ञान देना शामिल था  जिनकी सफल युद्ध संचालन में प्रमुख भूमिका रहती है।

जब युद्ध शिक्षा को व्यापार, वाणिज्य, विज्ञान, अर्थशास्त्र, इतिहास तथा अन्य विषयों की भांति एक अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाएगा तो विद्यार्थी के सामने एक और विकल्प होगा, वह भारतीय सेनाओं में भी अपना भविष्य देख सकता है ! सैनिक स्कूल उसके लिए उसी प्रकार उच्च शिक्षा के केंद्र होंगे जिस प्रकार अन्य विषयों की पढ़ाई के लिए वह उनसे संबंधित केंद्रों का चुनाव करता है और उनमें दाखिले के लिए कोचिंग और ट्रेनिंग हासिल करता है।

युद्ध को शिक्षा का विषय बनाने का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि लड़ाई होने पर कोई भी व्यक्ति अपने को असहाय महसूस नहीं करेगा बल्कि युद्ध क्षेत्र में न रहते हुए भी अपनी और अपने परिवार की रक्षा करने में समर्थ होगा। उसे पता होगा कि उसे क्या करना है जैसे कि शत्रु की चाल को समझना, उसके जासूसों की पहचान करना, युद्ध लड़ रहे सैनिकों की ज़रूरत के अनुसार जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति बनाए रखना आदि ।

परिवारों तथा सामान्य व्यक्तियों की रक्षा के लिए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने के प्रबंध करने जैसी बातों को जब एक विषय की तरह पढ़ाया जाएगा तब युद्ध काल में सरकार का पूरा ध्यान विजय प्राप्त करने में लगेगा क्योंकि तब उसे अपने नागरिकों की सुरक्षा की व्यवस्था करने में अपनी ऊर्जा कम से कम लगानी होगी।

विद्यार्थी जीवन में ही यह पता होगा कि हमारे देश की सैन्य क्षमता क्या है । हथियारों के निर्माण और उन्हें खरीदने की प्रक्रिया और उनकी सर्विसिंग जैसी बारीकियों का ज्ञान उसके पास होने से एक सामान्य व्यक्ति युद्ध में भाग न लेते हुए भी अपना महत्वपूर्ण योगदान कर सकता है।

युद्ध शिक्षा के पाठ्यक्रम में यह भी बताया जाए कि युद्ध विराम होने पर किस तरह से नेगोशिएशन करना है, उसकी प्रक्रिया शुरू करने से पहले किन बातों को ध्यान में रखते हुए बातचीत करनी है। गोपनीयता का क्या महत्व है और अपनी शर्तों पर कायम रहने के लिए वार्ता का रुख किस प्रकार अपने पक्ष में किया जा सकता है।

इसी प्रकार युद्ध नीति बनाते समय शत्रु को परास्त करने का लक्ष्य कैसे प्राप्त करना है, उसकी कमियों को उसके किस व्यवहार से जाना जा सकता है, उसकी ताकत का अंदाज़ लगाने और उसके अनुरूप कार्यवाही करने के लिए क्या जरूरी संसाधन हैं, इन सब बातों का आकलन करने की प्रक्रिया सिलेबस में शामिल हो।

युद्ध शिक्षा को हमारे स्कूल कालेजों और उच्च शिक्षा संस्थानों में एक विषय के रूप में शामिल करने और उसमें डिग्री हासिल करने से हमारी सेना के आर्थिक, प्रशासनिक और सामरिक महत्व के प्रतिष्ठानों के लिए योग्य व्यक्ति सुगमता से मिलने लगेंगे। इसी प्रकार डॉक्टर, इंजीनियर, आर्किटेक्ट तथा अन्य व्यवसायों से जुड़े विषयों में पारंगत व्यक्ति भी सेना की ओर जुड़ेंगे।

युद्ध शिक्षा को शिक्षण व्यवस्था का अंग बनाए जाने के बारे में गंभीरता से सोचने का यही समय है


शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2022

सब कुछ ठीक या कुछ भी सही नहीं का द्वंद सोच बदल सकता है

अक्सर स्वयं हम यह कहते सुनाई देते हैं और अपने आसपास के लोगों से भी अक्सर सुनने को मिलता है कि जीवन में कुछ नहीं हो पा रहा, जीने का कोई मतलब नहीं रहा, कैसा होगा कल, परेशानियां ख़त्म नहीं होतीं, समस्याएं बहुत हैं, उनका हल दिखता नहीं, क्या करें और क्या न करें ? इसी उधेड़बुन में दिन समाप्त हो जाता है और अगला दिन भी इन्हीं बातों में निकल जाता है।

इसके विपरीत कुछ लोग और हम स्वयं भी यह सोचते और कहते सुनाई देते हैं कि सब कुछ ठीक है, कोई दिक्कत है ही नहीं, किसी तरह की उलझन नहीं, जो हुआ, वह ठीक, जो हो रहा है, बेहतर है और जो होगा, सब से बढ़िया होगा।

 सरोकार

संसार में जितने भी ऐसे व्यक्ति हुए हैं जिनके काम याद आते रहते हैं, उनके अविष्कार, अनुसंधान, प्रयोग और उपलब्धियों से निरंतर लाभ उठाते रहते हैं, उनके प्रति आभार मानते हुए यह कहते नहीं थकते कि उन्होंने यह न किया होता तो हमारा जीवन कैसा होता !

इनमें वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यों से जुड़े लोग और राजनेता सभी शामिल हैं । यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। आज भी कुछ लोग बिना किसी बात से विचलित हुए अपनी धुन में लगे, कुछ न कुछ नया करने की कोशिश करते रहते हैं। 

उनके लिए सफल होने या अपने काम में कामयाब न होने का अर्थ एक जैसा ही है और उनकी सेहत पर, चाहे मानसिक हो या शारीरिक, सफलता या असफलता से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। असल में इन दोनों शब्दों का उनके लिए कोई अर्थ नहीं, उनका लक्ष्य या उद्देश्य ही प्रमुख है। ऐसा इसलिए है कि उनकी दुनिया केवल स्वयं से सरोकार रखने की है, बाहर की कोई चीज़ उन्हें प्रभावित नहीं कर पाती। इनमें नायक भी हो सकते हैं, खलनायक और अधिनायक भी जो अपने मिशन को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते है।

विचार का सिद्धांत

दुनिया की कोई भी चीज हो, उसकी शुरुआत एक विचार से होती है और जैसे जैसे वह वस्तु बढ़ने लगती है, दूसरे लोगों की सोच उसमें शामिल होती जाती है और एक दिन उसका आकार इतना बड़ा हो जाता है कि वह व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है। उसके बिना रहने की कल्पना से भी डर लगता है। ज़रा सोचिए कि अगर हम अपने मन से उस वस्तु को हटा देते, उस पर ध्यान नहीं देते तो क्या उसका ऐसा अस्तित्व होता कि जिसके बिना जीवन की कल्पना भी आसान नहीं होती ।

इसके पीछे और कुछ नहीं, बस एक छोटा सा सिद्धांत है कि जब हम किसी वस्तु, व्यक्ति या वातावरण के प्रति खिंचाव महसूस करते हैं तो उसके हमारे जीवन का अंग बन जाने से यह अनुभव होता है कि वह साथ में ही तो है, चिंता की क्या बात है, सब कुछ ठीक होगा, बस अपने काम से काम रखिए।

मान लीजिए कि आपको धन का आकर्षण है और धनी बनना चाहते हैं तो क्या मन में यह बात नहीं बस जाती कि धन दौलत जमा करने के लिए किसी भी उपाय का सहारा लेने में कोई हर्ज नहीं है । वह सही है या गलत, इसका विचार किए बिना सम्पत्ति, वैभव और उसका विस्तार करते जाना ही एकमात्र लक्ष्य होता है। यह सोच जितनी ताकतवर होती है उतना ही व्यक्ति अमीर होता जाता है।

यही कारण है कि केवल एक प्रतिशत लोगों का कब्ज़ा पूरी दुनिया के छियानवे प्रतिशत संसाधनों पर है जिसकी बदौलत उनके पास अकूत संपत्ति है। बाकी निन्यानवे प्रतिशत लोग उनसे ईष्र्या करते रहते हैं, नकारात्मक ढंग से सोचते रहने से हमेशा अपने लिए बुरे विचारों की कल्पना करते रहते हैं और उनकी यही सोच उनके अपने लिए सत्य होती दिखाई देती है।

आग में घी डालने की तरह संपन्न और ताकतवर लोग आपको गरीब होने, बेरोजगार रहने और कभी भी संपन्न न होने देने के लिए लगातार आपका मनोबल गिराते रहते हैं और वही बात मानने पर ज़ोर डालते रहते हैं जो असल में आप नहीं हैं। इस तरह वे हतोत्साहित करते रहते हैं और आपको स्वयं अपना और एक दूसरे का प्रतिद्वंदी बनाने से लेकर दुश्मन तक बना देते हैं।

हकीकत यह है कि न आप निर्धन हैं, न निकम्मे और प्रतिभाहीन हैं । आप सभी तरह से सक्षम हैं, बस आपकी सोच पर धनीमानी, अभिमानी और सत्ताधीशों का कब्ज़ा हो जाने से अपने को कमज़ोर और अयोग्य मान लेते हैं।

आभार और आकार

असल में होता यह है कि व्यक्ति आपनी परिस्थितियों के वश में आकर स्वयं के बारे में इस तरह का एक आकार या डिज़ाइन बना लेता है जिसमें वह अपने बारे में बुरा सोचता है, अपनी कमियों को हावी होने देता है और पूर्ण रूप से ईश्वर अर्थात भाग्य पर निर्भर हो जाता है।

इस स्थिति में उसके मन और विचार पर उसका अधिकार नहीं रहता तथा वह सरल शब्दों में कहें तो दूसरों के हाथों की कठपुतली बन जाता है।  उनके इशारों पर चलने लगता है और अपना स्वाभिमान तक खो बैठता है। होता यह है कि वह अपने प्रति आभार मानने और अपनी बुद्धि के अनुसार चलने को अहमियत न देते हुए दूसरों की कुटिलता का शिकार होता जाता है। वह जैसी स्थिति है उसी में रहने को ही अपनी किस्मत मान लेता है और पीछे रह जाता है।

इसे समझने के लिए क्या इतना ही काफ़ी नहीं है कि आज भी हमारे देश में एक बड़ी आबादी को अब से पचास साल पहले की स्थिति में रहना पड़ रहा है। इसका एक ही कारण है कि हम अपना धन्यवाद करने, अपने प्रति आभार मानने और अपने को समर्थ समझने के स्थान पर उन लोगों की बातों को पत्थर की लकीर मान लेते हैं जिनका उद्देश्य हमें कभी भी अपने बराबर न होने देना है।

अपने से सरोकार

जीवन में सफल होने, परिवार हो या समाज या फिर देश हो, अपनी जगह पाने तथा किसी भी कीमत पर स्वयं का निरादर न तो करने और न ही होने देने का एक ही मंत्र है कि आपके पास जो भी है, उसके प्रति आभार मानिए क्योंकि वही आपकी समृद्धि का बीज है। उसमें अंकुर फूटने दीजिए और फिर देखिए कि किस प्रकार यह एक मज़बूत पेड़ बनता है जिस पर किसी और का नहीं, केवल आपका अधिकार है।

आपके अपने पास जो है और जो आसपास है, वह अमूल्य है, उसकी प्रशंसा करने से उसका आशीर्वाद मिलेगा और तब व्यक्ति किसी अन्य पर निर्भर रहने के स्थान पर स्वयं अपने पर ही भरोसा करेगा। खुशहाली का मूल तत्व यही है। ऐसा होने पर  आसानी से समझा जा सकता है कि कोई दूसरा उस पर क्यों मेहरबान हो रहा है, मुफ्त में कुछ देने या मिलने का वायदा कर अपना कौन सा स्वार्थ पूरा कर रहा है ? क्या इसके बदले में वह आपका स्वाभिमान तथा स्वतंत्रता तो नहीं छीन रहा ?

आत्मविश्वास, आत्मनिर्भर, आत्मसम्मान जैसे भारी भरकम शब्दों के फेर में पड़ने से अच्छा है कि जैसे आप हैं, जो कुछ अपने पास है, उस पर भरोसा रखिए, उसके बाद कुछ भी करने की हिम्मत तो अपने आप आ ही जायेगी।


शनिवार, 19 फ़रवरी 2022

धार्मिक चिन्ह/पढ़ाई से बेहतर है ऐसी शिक्षा जो वैज्ञानिक सोच बढ़ाए

 

संसार में जितने भी धर्म हैं, प्रत्येक का एक न एक प्रतीक अवश्य है जिसके आधार पर उसके मानने वालों की पहचान से लेकर उनके जीवन जीने के तरीकों का ज्ञान होता है।


धर्म और जीवन शैली

धार्मिक प्रतीकों के अतिरिक्त सभी धर्मो में इस बात का वर्णन है कि जीवन जीने के लिए किन सिद्धांतों, मान्यताओं, परंपराओं, रीति रिवाजों और अन्य धर्मों के साथ तालमेल बिठाए रखने के लिए किन नियमों का पालन करना चाहिए। इसका उद्देश्य यही है कि धार्मिक आधार पर कोई लड़ाई झगड़ा, तनाव, संघर्ष और वैमनस्य न हो और सभी शांति और सद्भाव से एक दूसरे से प्रेमपूर्वक व्यवहार करते हुए मिलजुलकर रहें।

यहां तक तो ठीक था लेकिन जब इस धार्मिक समझदारी में अपने धर्म को दूसरों से श्रेष्ठ समझने की मानसिकता बढ़ने लगी तो उसमें एक तरह का जिद्दीपन शामिल होता गया।

इसका खतरनाक नतीज़ा यह निकला कि धार्मिकता का स्थान धर्मांध कट्टरता ने ले लिया और लोग इसे ही वास्तविक धर्म समझने लगे। यहीं से असहिष्णुता यानी टॉलरेंस न होने की शुरुआत हुई और समाज विरोधी तत्वों को मौका मिल गया कि वे धार्मिक आधार पर समाज को बांट सकें।

संयोग देखिए कि दुनिया के लगभग एक तिहाई देशों के राष्ट्रीय ध्वजों में धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल हुआ है और इनमें भारत का तिरंगा भी है।

जहां एक ओर धर्म का आधार मन और शरीर की पवित्रता, विचारों की पावनता, अध्यात्म की ओर ले जाने वाली मानसिकता, दैवीय शक्तियों की अनुकंपा है, वहां दूसरी ओर जीवन जीने की अपनी विशिष्ट शैली भी है। ज़िंदगी और मौत के बीच का सफर किस तरह से तय किया जाए, यह प्रत्येक धर्म में अलग अलग भले ही हो लेकिन उसका लक्ष्य केवल एक ही है कि धार्मिक भावनाओं को कभी भी आपसी मतभेद का आधार न बनने दिया जाए।


धर्म और शिक्षा

धर्म का काम है लोगों को जोड़कर रखना और शिक्षा का उद्देश्य है कि बिना धार्मिक भेदभाव किए व्यक्ति का बौद्धिक विकास कैसे हो, इसकी रूपरेखा बनाकर व्यक्ति को इतना सक्षम कर देना कि वह अपनी रोज़ी रोटी कमा सके और स्वतंत्र होकर जीवन यापन कर सकने योग्य हो जाए।

किसी भी शिक्षण संस्थान द्वारा धार्मिक प्रतीक चिन्हों का इस्तेमाल उचित तो नहीं है लेकिन यह किया जाता है। हो सकता है कि अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए ऐसा किया जाता हो लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वहां पढ़ने वालों के लिए यह ज़रूरी कर दिया जाए कि वे उस धर्म के अनुयायी भी बन जाएं।

शिक्षा का आधार किसी धर्म की मान्यताओं के अनुसार शिक्षा नहीं बल्कि आधुनिक और वैज्ञानिक सोच का विकास होना चाहिए। यही कारण है कि शिक्षण संस्थानों से यह उम्मीद की जाती है कि वे उनमें पढ़ने वाले विद्यार्थियों को धर्म का महत्व तो बताएं लेकिन किसी एक धर्म को बेहतर और दूसरों को कमतर न दिखाएं। इसके साथ एक ही धर्म क्यों, देश में प्रचलित सभी धर्मों के बारे में इस प्रकार बताया जाए कि उनमें आपस में तुलना, प्रतिस्पर्धा और प्रतियोगिता की भावना विद्यार्थियों में न पनपे।

अब हम इस बात पर आते हैं कि क्या धर्म के आधार पर विद्यार्थियों का पहनावा अर्थात उनकी ड्रेस को तय किया जा सकता है ? इस बारे में अनेक मत हो सकते हैं लेकिन व्यावहारिकता यही है कि इसमें धर्म, उसके प्रतीक चिन्ह और धार्मिक आधार पर तय किए गए लिबास का कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

एक दूसरा मत यह है कि जब विभिन्न धर्मों के विद्यार्थी अपनी धार्मिक पहचान दर्शाने वाले वस्त्र पहनकर स्कूलों में जायेंगे तो उनमें बचपन से ही एक दूसरे के धर्म को समझने और उसका आदर करने की भावना विकसित होगी। वे बड़े होकर अपने धर्म का पालन करते हुए अन्य धर्मों के मानने वालों का सम्मान करेंगे और इस तरह धार्मिक एकता की नींव पड़ना आसान होगा।

एक तीसरा मत यह भी है कि जिस प्रकार फ्रांस ने अपने यहां शिक्षा को धार्मिक प्रतीकों और धार्मिक आचरण से अलग रखा है और किसी भी प्रकार का दखल न होने देने की व्यवस्था की है, उसी प्रकार हमारे देश में भी किया जा सकता है !

यह व्यवस्था हमारे यहां लागू होना संभव नहीं लगती क्योंकि सिख धर्म के विद्यार्थियों द्वारा अपने केश बांधने के लिए पगड़ी धारण करने की परम्परा है और इसी आधार पर इस्लाम को मानने वाले मुस्लिम छात्राओं के लिए भी हिजाब और बुर्का पहनने की अपनी मांग को उचित बता रहे हैं।

विवाद का हल चाहे जो हो लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि विद्यार्थियों की शिक्षा किसी भी कीमत पर नहीं रुकनी चाहिए। इसके लिए  यदि उन्हें नियमों में कुछ ढील भी देनी पड़े तो यह ठीक होगा क्योंकि ज़िद्दी रुख अपनाने से अच्छा लचीला बर्ताव करना है।

इस संदर्भ में इकबाल का यह अमर गीत आज एक बार फिर गुनगुनाना जरूरी हो गया है।


तराना. ए. हिन्दी

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा,

हम बुलबुले हैं इसकी यह गुलिस्तां हमारा।

गुबर्त में हों अगर हम रहता है दिल वतन में,

समझो वहीं हमें भी दिल हो जहां हमारा।

पर्वत वह सबसे उंचा हमसाया आसमां का,

वह संतरी हमारा वह पासबां हमारा।

गोदी में खेलती हैं इसकी हजारों नदियां,

गुलशन है जिसके दम से रश्के-जिनां हमारा।

ऐ आबे-रूदे-गंगा वह दिन है तुझ को,

उतरा तिरे किनारे जब कारवां हमारा।

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,

हिंदी हैं  हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा।

यूनानो-मिस्त्रो-रोमा, सब मिट गए जहां से,

अब तक मगर है बाकी नामो--निशां हमारा।

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,

सदियों रहा दुश्मन दौरे-ज़मां हमारा।

इक़बाल, कोई महरम अपना नहीं जहां में।

मालूम क्या किसी को दर्दे-निहां हमारा।


शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

भोलापन, सादगी और भलमनसाहत कब बेईमान बना देती है ?


मानव का स्वभाव है कि वह जैसे वातावरण और जिन लोगों के बीच रहता है, उसी के अनुसार अपने को ढाल लेता है। अगर वह न भी ढलना चाहे तो उसके साथी, संघाती और परिवार के लोग दूसरों के उदाहरण देकर ढलने के लिए विवश कर देते हैं।

अगर कहीं इसमें सरकार के नियम, उसके कर्मचारी और ओहदेदार शामिल हों तब तो व्यक्ति के पास कोई विकल्प ही नहीं रहता कि वो अपने को यथा राजा तथा प्रजा की कहावत के अनुसार पूरी तरह से समय रहते न बदल ले।

गरीब से गरीबदास

हमारे देश के उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की  कहानी का एक पात्र है जिसका नाम उन्होंने गरीब रखा जो बाद में अपने सहयोगियों की कृपा से गरीबदास हो गया।

गरीब एक गांव से शहर आकर चपरासी की नौकरी कर लेता है। यहां उसके साथी उसके भोलेपन और सादगी तथा भलमनसाहत का पूरा फ़ायदा उठाते हैं। वह मेहनत से काम करता है और उसके साथी अपना काम भी किसी न किसी बहाने से उससे कराते रहते हैं और यह बिना किसी विरोध के उनके काम करता रहता है। इस सब के बावजूद उसके साथी उसका अपमान करते रहते हैं और तनिक सी भी भूल होने पर गाली देने से लेकर पिटाई तक कर देते हैं।

एक दिन बड़े बाबू की मेज साफ करते हुए दवात के उलट जाने से स्याही फैल गई और इस बात पर बहुत डांट पड़ी। एक व्यक्ति ने बीच बचाव करते हुए कहा कि इसे माफ कर दें लेकिन तब ही दूसरा साथी बोला कि इसके गांव में इसके खेतों में अनाज, सब्जी, फल खूब होते हैं, पशुधन भी है लेकिन क्या मजाल कि इसके मन में कभी विचार भी आया हो कि यहां अपने साथियों को कुछ लाकर दे, कंजूस ही नहीं मक्खीचूस है।

गरीब अब तक सोचता था कि उसके खेत में जो उगता है, पशु जो दूध देते हैं, वह सब इन शहर में रहने वालों को क्योंकर अच्छा लगेगा बल्कि उसे गंवार कहा जायेगा। उसके पास पुश्तैनी ज़मीन है जिस पर खेतीबाड़ी होती है, दुधारू पशु हैं जिनसे अच्छी खासी आमदनी होती है । गांव में उसके लिए करने को कुछ काम नहीं था तो वह शहर आ गया और यहां चपरासी की नौकरी कर ली ।

यहां तक तो ठीक था लेकिन वह अपने साथ अपनी सादगी और ईमानदारी को भी गांव से ले आया था जिसके कारण उसे हिकारत से देखा जाता था।  घर आते समय उसके ही गांव का एक व्यक्ति मिला और उसे अपनी परेशानी बताई।  उसने सलाह दी कि एक बार वह अपने घर से कुछ समान लाकर इन्हें देकर देख ले कि शायद फिर उसका अपमान न हो।

गरीब ने ऐसा ही किया । दूध, गन्ने का रस और मटर तथा कुछ दूसरी चीजें लेकर दफ्तर पहुंचा लेकिन अंदर जाकर किसी को देने की हिम्मत न हुई। इतने में बड़े बाबू आए और उन्होंने इन चीजों को देखकर डांटा कि यह सब क्या है ? गरीब ने कहा कि आपके लिए लाया हूं। बड़े बाबू ने नकली मुस्कान से उस पर एहसान करते हुए आधी चीजें अपने घर भिजवा दीं और बाकी अन्य साथियों में बांट दी।

इसके बाद उसका नाम गरीबदास हो गया, सब साथी खुश दिखाई दिए और उससे इज्जत से पेश आने लगे। उसे अपने प्रति व्यवहार में हुए बदलाव का मंत्र मिल गया था । वह अब अक्सर जो चीजें बेकार समझकर या उपयोग में न आने से फेंक दी जाती थीं, वह दफ्तर में अपने साथियों और अधिकारियों को देने लगा। जब मन करता छुट्टी कर लेता, देर से पहुंचता और बिना दफ्तर जाए हाज़िरी लगवा लेता।

ऊपरी कमाई का अवसर

एक दिन उसे रेलवे स्टेशन से कुछ पार्सल लाने का काम दिया गया। उसने ठेला किया और बारह आने मजदूरी तय की। दफ्तर पहुंचकर खजांची से पैसे लिए और ठेले वाले को देने से पहले अपने लिए चार  आने मांगे। मजदूरों ने मना किया तो धमकी दी कि अब एक भी पैसा नहीं देगा, जो चाहो कर लो। मज़बूरी में मज़दूरों ने आठ आने लेकर बारह आने की रसीद दी और चले गए।

यह कहानी बहुत साधारण है और आज़ादी के बाद अब से साठ साल पहले लिखी गई थी लेकिन सोच में डालने के लिए काफी है कि तब से लेकर आज तक हमारी सामाजिक व्यवस्था, सोच और कार्यप्रणाली में कोई फर्क ही नहीं पड़ा ।  मनुष्य काईयां, बेईमान, रिश्वतखोर क्यों बनता है और ऊपर की आमदनी को क्यों अपनी प्रमुख आय समझता है, इस सोच में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता । जमाखोरी, कालाबाजारी, मिलावट करने से लेकर टैक्स चोरी के नए तरीकों की खोज तथा कर्ज़ लेकर उसे न चुकाने की मानसिकता बनने और आर्थिक घोटालों पर जाकर भी नहीं थमता।

यह एक सच्चाई है कि जिस व्यवस्था में ईमानदारी को मूर्खता समझा जाए और दंड से अनैतिक आधार पर बच जाने को चतुराई तो वहां के निवासियों के सामने विकल्प ही नहीं रहता कि वह नियमों का उल्लंघन और कानून का निरादर न करें।

किसी भी देश, समाज या परिवार का आधार उसकी वर्तमान पीढ़ी होती है, अगर वह चाहे तो समय की विपरीत धारा को भी मोड़ सकती है और न चाहे तो बहती धारा में गोते लगाकर अपने स्वार्थ की पूर्ति कर सकती है।

आज जो आपाधापी और कोई भी मार्ग अपनाकर दूसरों से आगे निकलने की होड़ है, उसके सामने नैतिक मूल्यों, आदर्शों का कोई मोल नहीं है। गरीबी इतना बड़ा अभिशाप नहीं है जितना कि गरीबदास बनकर छल कपट से अपने लिए सुख साधन और संपत्ति अर्जित करना।


शनिवार, 29 जनवरी 2022

महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस और जवाहर लाल नेहरु की कल्पना का भारत कैसा था ?

 

जनवरी का तीसरा सप्ताह यानी तेईस से तीस तारीख का समय, देश भर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जन्मतिथि, गांधी जी की पुण्य स्मृति और गणतंत्र दिवस समारोह तथा अपनी सैनिक क्षमता पर गर्व करने का अवसर बन जाता है। इसी के साथ बापू के उपदेशों या उनके सिद्धांतों का उल्लेख करने और उन पर अपनी राय जाहिर करने का मौका भी मिल जाता है। इस बात पर बहुत कम लोगों का ध्यान जाता है कि इन दोनों महापुरुषों ने देश के स्वतंत्र होने के बाद उसका संचालन किस प्रकार हो, इसकी क्या रूपरेखा बनाई थी ?

गांधी बनाम बोस

इस पृष्ठभूमि में यह आकलन करना ज़रूरी हो जाता है कि उनमें से कौन सही या गलत था और यदि कोई अन्य विकल्प अपनाया जाता तो क्या देश का वही स्वरूप होता जो आज है ?

इन दोनों के संबंधों, सोच और कार्य प्रणाली पर विचार करते हुए तीसरे महानायक पंडित नेहरू का ध्यान आना स्वाभाविक है। कह सकते हैं कि ये भारत की त्रिमूर्ति थे और यदि सरदार पटेल को इसमें मिला दिया जाए तो चार मुख वाले साक्षात ब्रह्मा की आकृति बनकर उभरती है। ये चारों नायक देशभक्ति, कर्तव्य परायणता और समर्पण की अद्भुत शक्ति धारण किए हुए थे और इसी कारण जनता उन पर भरोसा करते हुए अपनी जान तक न्यौछावर करने के लिए तैयार रहती थी।

आज क्योंकि इंटरनेट और गूगल की कृपा से इतिहास की प्रकट और गोपनीय सामग्री उपलब्ध है इसलिए बहुत सी घटनाओं की सत्यता की पुष्टि कर लेने के बाद उन पर विचार और मंथन वर्तमान स्थिति को सामने रखकर किया जा सकता है। इससे यह निष्कर्ष निकालने में सुविधा है कि कौन सा मत या विचारधारा अधिक उपयुक्त थी।

क्या आज देश के संचालन में उनका महत्व स्वीकार कर भविष्य की योजनाएं बनाई जा सकती हैं ताकि देश अधिक गति से प्रगति कर सके ?

सबसे पहले सुभाष चंद्र बोस के उस भाषण को सामने रखते हैं जो उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में दिया था। उनका कहना था कि स्वतंत्र भारत की पहली प्राथमिकता गरीबी मिटाने, बेरोज़गारी दूर करने और देश को शिक्षित करने की है। इसके लिए उन्होंने प्लानिंग अर्थात योजना बनाकर काम करने की राह दिखाई। एक समिति बनाई जिसका अध्यक्ष पंडित नेहरू को बनाया ताकि वे स्पष्ट रूप से दिशा निर्धारण कर सकें। आज के योजना आयोग की यह नींव थी।

उनका मानना था कि देश में वर्ग हीन समाज का निर्माण समाजवाद को आधार बनाकर हो। इसकी पूर्ति के लिए औद्योगिकीकरण का विस्तार हो और  कृषि विकास दूसरे नंबर पर हो। वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आधुनिक मशीनरी का आयात तथा उसका अपने हिसाब से इस्तेमाल करने की दृष्टि हो।

शिक्षा सबके लिए एक समान हो और उस पर सबका अधिकार हो तथा यह सबके लिए एक जैसी और आसानी से सुलभ हो। उनका मानना था कि भेदभाव रहित शिक्षा से ही समाज से बेरोज़गारी और गरीबी को ख़त्म किया जा सकता है।

उन्होंने अपने विशाल अनुभव और अनेक देशों में इस्तेमाल की गई व्यवस्थाओं का अध्ययन करने के बाद ही यह बातें कही थीं। यहां यह ध्यान दिलाना ज़रूरी है कि सुभाष चन्द्र बोस के पास नगर निगम के प्रशासक के रूप में व्यावहारिक अनुभव था और वे जनता की समस्याओं को समझने और उनके समाधान निकालने के लिए प्रसिद्ध थे।

बोस बनाम गांधी

अब हम महात्मा गांधी की बात करते हैं जो वर्ग हीन समाज के स्थान पर पिछड़े, दलित, हरिजन और अनेक जातियों में बंटे समाज के विकास के लिए उनके अधिकारों को सुरक्षित रखने की बात करते हैं। इसके लिए वे उन्हें मिलाकर एक विशाल समाज तैयार करने के स्थान पर अलग अलग रखने को ही उनकी उन्नति का आधार बनाते हैं।

आज हमारा देश वर्ग संघर्ष, जातिवाद और अल्पसंख्यक समुदाय के उत्पीड़न और इसके साथ ही अपने स्वार्थों के कारण उनके तुष्टिकरण के जिस दौर से गुजर रहा है, उसकी नींव आज़ादी के तुरंत बाद पड़ गई थी। यदि हम बोस की वर्ग हीन समाज की नीति पर चलते तो क्या बेहतर नहीं होता ?

देश को कृषि प्रधान बनाने के प्रयास गांधी जी की देन हैं और उसमें भी परंपरागत साधनों जैसे कि हल बैल से खेती करने को ही प्राथमिकता देने और वैज्ञानिक तरीकों को न अपनाने का परिणाम क्या आज तक हम नहीं भुगत रहे हैं ?

गांधी जी मशीनों के इस्तेमाल और यहां तक कि रेल, अस्पताल की ज़रूरत नहीं समझते थे । अंग्रेजी दवाइयों का इस्तेमाल न करने पर ज़ोर देते थे और यहां तक कि परिवार नियोजन के लिए गर्भ निरोधक सामग्री के इस्तेमाल को बुरा समझते थे। इसके लिए आत्मसंयम रखने को प्रोत्साहित करते थे। उनके लिए नवीन टेक्नोलॉजी पर आधारित औद्योगिक भारत के स्थान पर ग्रामीण और कुटीर उद्योग का विकास प्राथमिकता थी।

गांधी जी आध्यात्मिक राजनीतिज्ञ थे जबकि सुभाष आधुनिक राजनेता थे। नेहरू भी चाहते थे कि हम स्वदेशी संसाधनों के बल पर ही विकास करें जबकि बोस विदेशों से अपनी आवश्यकतानुसार सभी चीजों का आयात करने के हिमायती थे। नेहरू द्वारा आयात और विदेशी पूंजी निवेश पर कड़े नियम बनाने से हम विदेशी तकनीक और पूंजी निवेश से वंचित हो गए। इस नीति को जब पूरी तरह से बदल दिया गया तब ही देश आत्मनिर्भर होना आरंभ हुआ, क्या यह गंभीरता से सोचने का विषय नहीं है ?

नेहरू और बोस दोनों गांधी जी को अपने पुत्रों की भांति प्रिय थे लेकिन जब उत्तराधिकारी की बात आई तो उन्होंने भारतीय सामंती व्यवस्था के अनुसार बड़े पुत्र को चुना, यदि योग्यता का आधार होता तो सुभाष हर प्रकार से अधिक काबिल थे और लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनकी दावेदारी प्रबल थी।

जहां तक नेहरू और बोस की शिक्षा का संबंध है, दोनों ही ने समृद्ध परिवारों से होने के कारण विदेशों में शिक्षा प्राप्त की। उन्हें दुनिया देखने और उनके तरक्की करने के उपायों को जानने समझने का अवसर मिला और वे अपने देश को अपने अनुभवों से समृद्ध करना चाहते थे। इसके लिए सबसे पहले ज़रूरी था कि आज़ादी और वह भी सम्पूर्ण रूप से हासिल की जाए।

सुभाष चंद्र बोस आज़ादी हासिल करने के लिए किसी भी साधन का इस्तेमाल करने और किसी की भी सहायता अपनी शर्तों पर लेने के लिए कोई भी हद पार कर सकते थे। इसके लिए वे विदेशी धरती पर भारत की आज़ादी की घोषणा कर सकते थे, अंग्रेजों की नाक में दम कर सकते थे। आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना, दिल्ली चलो का नारा और जय हिन्द का उदघोष उनकी राजनीतिक सूझबूझ का परिचायक है।

पता नहीं यह कितना सत्य है कि जब लॉर्ड ऐटली के भारत प्रवास के समय यह पूछा गया कि भारत को आजाद कराने में गांधी और सुभाष में से किसका योगदान अधिक है तो उनका जवाब था कि अंग्रेजी हुकूमत के लिए बोस अधिक खतरनाक थे और उनके कारण ही अंग्रेज भारत से अपना बोरिया बिस्तर समेटने के लिए मजबूर हुए। इसके विपरीत गांधी जी का भय उन्हें ज्यादा नहीं था और उन्होंने अपने जवाब में कहा कि स्वतंत्रता हासिल करने में उनका योगदान बहुत कम था।

उद्योग बनाम कृषि

वर्तमान भारत के संदर्भ में देखा जाए तो औद्योगिक भारत का निर्माण प्रथम स्थान पर और कृषि क्षेत्र को दूसरे स्थान पर रखने से ही देश समृद्ध राष्ट्रों की पंक्ति में आ सकता है। खेतीबाड़ी उतनी हो जिससे खाने पीने की जरूरतें पूरी हो जाएं और उसमें भी  आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल हो जिससे कम से कम लोगों की जरूरत हो। आज किसानों की बढ़ती संख्या और खेतीबाड़ी को लाभदायक व्यवसाय न बनने देने के लिए क्या कृषि को पहले स्थान पर रखना जिम्मेदार नहीं है ?

आज के हालात में वर्ग, जाति, वर्ण, समुदाय के बिना देश को एकसूत्र में बांधने की कल्पना करना असम्भव जैसा लगता है। काश यह संभव हो सके कि एक दिन ये सब निरर्थक हो जाएं ! क्या ऐसा हो सकता है, ज़रा सोचिए?


शुक्रवार, 17 दिसंबर 2021

प्रतिभा पलायन से होने वाले नुकसान को रोकने के उपाय करने ही होंगे

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित अनेक दिवसों में एक है; अंतरराष्ट्रीय प्रवासी दिवस जो प्रति वर्ष दस दिसंबर को मनाया जाता है। भारत के संदर्भ में इसका महत्व इसलिए है कि यह देश की प्रतिभा का दूसरे देशों को समृद्ध बनाने के लिए पलायन यानी ब्रेन ड्रेन पर गंभीरता से विचार करने का दिन है। कड़वा सच है कि हमें पिछड़ा, गरीब और याचक बनाए रखने के लिए यह अमीर देशों का षड्यंत्र है जिसकी नींव स्वतंत्रता हासिल करने के कुछ समय बाद ही पड़ गई थी।

पढ़ेगा इंडिया बढ़ेगा अमरीका

सोशल मीडिया पर एक संदेश देखा जा रहा है जो कुछ इस तरह से है: जब पढ़ेगा भारत, तब ही बढ़ेगा अमेरिका। यह एक प्रकार से सच या हकीकत को पूरी नग्नता के साथ बयान करना है जिसकी टीस प्रत्येक नागरिक के मन में उठना स्वाभाविक है। यह सोच गलत नहीं है कि अगर भारत से प्रतिभा पलायन न होता या न होने दिया जाता तो आज हम विकसित देश कहलाते ?

एक उदाहरण याद आ रहा है ; बात साठ के दशक की है जब पत्रकारिता और लेखन को अपना व्यवसाय बनाने का निश्चय कर इसे सीखना शुरू किया था। उस दौरान एक अमरीकन से मुलाकात हुई जो मित्रता में बदल गई।  आपस में एक दूसरे के बारे में बहुत सी बातें बातचीत में शामिल होने लगीं। एक दिन उसने कहा कि “ मुझे खर्च करने दिया करो क्योंकि तुम्हारे देश से मुझे इतना वेतन मिलता है कि मैं यहां पूरे ऐशो आराम से रह सकता हूं। “ उस समय उसका वेतन लगभग दस हजार होगा जो आज दस लाख से अधिक तो होगा ही।

एक झटका लगा जब एक दिन उसने कहा कि “ पता नहीं क्यूं इंडियन गवर्नमेंट ने मुझे नियुक्त किया जबकि मैं अपने अधीन जिनके साथ काम करता हूं, वे योग्यता में मुझसे तनिक भी कम नहीं, बल्कि सच तो यह है कि मुझसे अधिक योग्य हैं। “ कुछ समय बाद उसका सरकार के साथ एग्रीमेंट समाप्त हो गया। हालांकि भारत सरकार उसे बढ़ाना चाहती थी लेकिन वह इंकार कर वापिस अपने देश चला गया।

यह उदाहरण इस बात का सबूत है कि देश की सरकार ने अपने नागरिकों की योग्यता पर न केवल भरोसा ही नहीं किया बल्कि उन्हें यहां से किसी भी तरह विदेश में जाकर बसने के लिए विवश कर दिया। अब यह तो सब ही जानते हैं कि देश की योग्य पीढ़ी के सामने अपने सपनों को पंख लगाने के लिए विदेश की धरती हमेशा से लुभाती रही है। इसका परिणाम यह हुआ कि अमरीका जैसे देशों को बिना कुछ करे असीम योग्यता वाले भारतीय मिलने लगे।

यह कहते हुए कुछ लोगों को गर्व हो सकता है लेकिन वास्तविकता यह कि इससे अधिक शर्म की बात नहीं हो सकती कि आज अमरीका जैसे देशों में भारत के लोग सबसे ऊंचे ओहदों पर हैं। अगर इन्हें उस समय रोक कर रखा जा सकता तो इसकी कल्पना करना कोई रॉकेट साइंस नहीं है कि भारत विश्व में किस स्थान पर होता !

एक और उदाहरण है। रूस, चीन और जापान तथा अमरीका, इंग्लैंड, जर्मनी तक  ने अपने नागरिकों की प्रतिभा का पलायन रोकने के लिए इस तरह का वातावरण बनाया, ऐसी बंदिशें लगाईं तथा कानून बनाए और अपने देश में ही रहकर अपनी प्रतिभा दिखाने के इतने अवसर प्रदान किए कि कोई अपना देश छोड़कर नौकरी या रोज़गार के लिए कहीं और जाने की सोच को अपने अंदर आने ही नहीं देता था। क्या यही एकमात्र कारण नहीं है कि इन देशों का लोहा पूरी दुनिया मानती है। अभी भी इन देशों के नागरिक विदेशों में अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए जाते हैं, बाहर हमेशा के लिए रहने के लिए नहीं। हमारे यहां इसका नितांत उल्टा है कि भारतीय को तनिक भी अवसर मिले वह विदेश जा कर वहां बसने के लिए तैयार रहता है।

ऐतिहासिक तथ्य

विश्व प्रवास दिवस पर यह बात भी ध्यान में आती है कि भारत से तो हमेशा से ही प्रतिभा का पलायन होता रहा है। महात्मा गांधी को भी अपनी वकालत की योग्यता दिखाने का अवसर विदेश में ही मिला और वे वहां बस भी गए। यदि वे, किसी भी परिस्थिति के कारण हो, भारत  न लौटते तो क्या कभी राष्ट्रपिता बन सकते थे ?

इस दिन यह स्मरण होना स्वाभाविक है कि अपने देश में अवसर होते हुए भी विदेश में रहने और वहां खाने कमाने की अधिक संभावनाएं दिखाई देने का सबसे बड़ा कारण हमारे देश की सरकारों का विदेशियों को यहां आकर भारतीयों को मानसिक गुलाम बनाए रखने की सुविधाएं प्रदान करना है।

यह कहने और मान लेने में कोई हेठी नहीं है कि आज़ादी के बाद ऐसे हालात बनाए ही नहीं गए कि देश की प्रतिभा और उसके नागरिकों की योग्यता की सही परख हो पाती। यदि ऐसा होता तो चाहे कितने भी प्रलोभन होते, कोई भी भारतवासी देश से बाहर जाकर अपनी योग्यता दिखाने के बारे में सोचता तक नहीं ! 

चलिए मान लेते हैं कि जो हुआ उसे लौटाया नहीं जा सकता लेकिन आज भी सरकार यह समझने को तैयार नहीं है कि देश की प्रतिभा को बाहर न जाने दिया जाए, रोक कर रखने के लिए वे सब सुविधाएं उसे दी जाएं कि उसके मन में कहीं और जाकर अपनी योग्यता दिखाने की बात मन में ही न आने पाए।

यह सोचना कि जो भारतीय विदेशों में बस गए हैं, वे सब कुछ छोड़कर यहां वापिस आयेंगे, कोरी कल्पना और अपने को गलतफहमी में रखना है, इसलिए ऐसे उपाय करने होंगे  कि जो यहां रहकर अपनी प्रतिभा दिखाना चाहते हैं उन्हें कैसे रोक कर रखा जाए। यह कहना भी छलावा है कि राष्ट्र भक्ति और देश सेवा की भावना के कारण वे रुक सकते हैं ! मनुष्य अपनी प्रकृति से स्वार्थी होने के कारण जहां उसे अवसर मिलेगा, वह उसे पहले पाने के लिए कोशिश करेगा, बाकी सब बेकार है।

मर्ज़ी और मज़बूरी

कोई भी व्यक्ति अपनी मर्ज़ी से विदेश तब जाता है जब उसके सामने ऐसे अवसरों की कोई कमी न हो जिनके बल पर वह अपनी प्रतिभा के अनुसार वेतन और अन्य सुविधाएं हासिल कर सके। इसका मतलब यह है कि वह तुलना करता है कि देश में उसे यह सब कुछ मिल सकता है या नहीं, अगर नहीं तो वह किसी भी तरीके से वहां जायेगा जहां उसे यह सब आसानी से मिल जायेगा। इस श्रेणी में अधिकतर वे युवा आते हैं जो इतने काबिल हैं कि कोई भी संस्थान उन्हें अपने साथ जोड़ने और साथ ही जोड़े रखने के लिए उनकी सोच से भी अधिक वेतन और भत्ते देने की पेशकश करता है।  जब उसके सामने किसी एक को चुनने का अवसर आता है तो वह बेहिचक मल्टी नेशनल कंपनियों को चुनकर अपनी मातृभूमि को अलविदा कहने में कतई संकोच नहीं करता।

दूसरी स्थिति में कोई व्यक्ति विदेश तब जाता है जब उसके सामने कोई मजबूरी होती है जिसके कारण बाहर जाने में ही वह अपना भला समझता है। इन कारणों में देश में प्रशासनिक स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार, कोटा सिस्टम, योग्यता के स्थान पर आरक्षण को मान्यता और राजनीतिक स्तर पर भाई भतीजावाद प्रमुख हैं।

जो भी भारतीय विदेशों में रहने का सपना देखते हैं, उनमें दो प्रकार के लोग होते हैं ; एक तो वे जो पढ़ लिख कर सब कुछ समझते हुए अपनी दिशा निर्धारित करते हैं और दूसरे वे जो विदेश में जाकर ज्यादा कमाई करने और देश में अपने परिवार को सुखी जीवन देने के लिए कोई भी काम मिलते ही चले जाते हैं। इनमें मज़दूर, कारीगर और कम पढ़े लिखे लोग होते हैं।

इन दोनों ही श्रेणियों के लोगों को देश में ही रोके रखा जा सकता है बशर्ते कि सरकार की नीतियां इस प्रकार की हों जिनमें किसी के साथ भेदभाव या ज्यादती होने की संभावना न हो। यह नीतियां तब और भी अधिक तत्परता से बनाए जाने की ज़रूरत है जब सच यह हो कि एक बार विदेश में जाने, मज़दूरी, नौकरी, व्यवसाय और सुविधा संपन्न जीवन जीने की राह इतनी आसान है  तो वह किसी के रोके नहीं रुकता ।

जब समृद्ध और विकसित देशों के प्रतिभाशाली युवा अपने देश की नीतियों के कारण भारत में नहीं बसते तो फिर भारतीय युवाओं को क्यों नहीं देश में रहकर अपनी योग्यता के अनुसार अवसर देने की व्यवस्था की जा सकती, ज़रा सोचिए ? 


शुक्रवार, 10 दिसंबर 2021

विश्व मानवाधिकार दिवस पर क्या संदेश होना चाहिए ?

 


दस दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा समानता पर आधारित और भेदभाव रहित संसार की कल्पना को साकार करने के लिए विश्व मानवाधिकार दिवस मनाए जाने की परंपरा की शुरुआत की गई।

मनमानी का अधिकार नहीं

चीन में 2022 के ओलंपिक शीतकालीन खेलों का बहिष्कार दुनिया के बड़े और छोटे देशों द्वारा किया गया है। इसका अर्थ यह है कि चीन की नज़रों में मनुष्य के अधिकार का कोई मूल्य नहीं और इसका एहसास उसे कराया जाना चाहिए कि अगर उसने इसी तरह मानवाधिकारों का उल्लंघन किया तो उसे दुनिया की बिरादरी में बैठने लायक नहीं समझा जायेगा।

चीन अपनी ज़िद और हठधर्म का पालन करने से अपने इस बहिष्कार पर चाहे ध्यान न दे और अपने आचरण में कोई परिवर्तन न करे, फ़िर भी जगहंसाई और निंदा से तो वह बच नहीं सकता। क्या इसका मतलब यह नहीं कि आप चाहे कितने भी अपने घमंड में चूर होकर अपनी सोच को न बदलें पर अंदर से एक टीस तो उठेगी ही और दिल से आवाज़ भी आयेगी कि मैं जो कर रहा हूं या करने जा रहा हूं , वह गलत है।

अगर अपने देश में देखें तो किसान आंदोलन पर सरकार की माफी और उनकी बातों को सुनना और जो हुआ उस पर अफसोस ज़ाहिर कर मान लेना यही बताता है कि इस मामले में गलती तो हुई है और उसे मान लेने में कोई हानि नहीं बल्कि सरकार का बड़प्पन ही है कि उसने वास्तविकता को समझकर कदम उठाया और इस तरह अपनी गरिमा को कायम रखा तथा किसानों के मानवाधिकारों को भी समझा।

कठिनाइयों से सबक

जहां तक विश्व मानवाधिकार दिवस का संबंध है तो इसकी रूपरेखा उस समय बनाई गई जब दुनिया ने दूसरे विश्व युद्ध में हुए मनुष्यता के पतन को देख लिया था। पूरा संसार उसके परिणामों से उत्पन्न हालात से दुःखी था और भविष्य में कभी इस तरह के युद्ध न हों जिसकी चपेट में सभी देशों को अपनी मर्ज़ी या मजबूरन आना पड़े, इसके लिए विश्व स्तर पर कोई ऐसा संगठन बनाया जाए जो यह सुनिश्चित करे कि अगर किसी देश में मनुष्य के अधिकारों का उल्लंघन होता है तो उसके विरुद्ध जन मत तैयार किया जा सके ताकि समय रहते वह देश अपनी गलती समझे और जो वह कर रहा है, उसे रोकने की  व्यवस्था करे। हालांकि ऐसा करना उसकी कोई मज़बूरी नहीं, फ़िर भी अगर उसने दुनिया में सिर उठाकर जीना है और भाईचारे के साथ रहना है तो उसे अपने कदम पीछे हटाने ही होंगे और मानवाधिकारों का पालन करना होगा।

संयुक्त राष्ट्र ने जब विश्व मानवाधिकार संगठन बनाया तो शुरू में इसमें वे देश भी शामिल हो गए जो हत्या, बलात्कार और अन्य जघन्य अपराधों के लिए जाने जाते थे। हो सकता है कि वे अपने दुष्कर्मों पर पर्दा डालने के लिए इसमें सम्मिलित हुए हों लेकिन जब विश्व के शांतिप्रिय देश अधिक मात्रा में इसके उद्देश्यों को मानकर शामिल होने लगे तो उनकी एकता के सामने ऐसे सदस्यों को झटका लगना स्वाभाविक था। इसी का परिणाम आज पूरा विश्व देख रहा है।

मानवाधिकार असल में क्या हैं तो यह बिल्कुल सामान्य और साधारण हैं जिन्हें समझने के लिए दिमाग़ पर ज्यादा ज़ोर डालने की जरूरत नहीं है। संसार से गरीबी मिटाने, सब को समान अवसर देने, शिक्षा, स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए जीवन जीने के अधिकार को समझते हुए ऐसी स्थितियों का निर्माण करना ही तो है जिससे वसुधैव कुटुंबकम् की भावना का विकास हो और सभी प्रेम, शांति तथा सद्भावना के माहौल में रह सकें।

जन्म से ईश्वर ने किसी भी प्राणी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया, उसका धर्म, जाति तय नहीं की।  पुरुष तथा स्त्री केवल उसके जन्म के साधन मात्र हैं तो फ़िर किस आधार पर धार्मिक, जातिगत, लिंगभेद के कारण उसके साथ भेदभाव ही नहीं करते, बल्कि उसे यह सिखाते भी हैं कि वह भी इन सब बातों को मानते हुए ही बड़ा हो ?

हमारे मानवाधिकारों में नागरिक, राजनीतिक, आर्थिक,सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार ही तो आते हैं जिनका संरक्षण करने की जिम्मेदारी सरकार और संविधान के अंतर्गत उसके बनाए कानूनों द्वारा सुनिश्चित करने की है। इनका उल्लंघन करने पर कानून के मुताबिक न्याय देने की जिम्मेदारी तत्कालीन सरकार और उसके आधीन व्यवस्था की है कि वह एक निश्चित समय में निर्णय लेकर पीड़ित के साथ हुए अन्याय का निराकरण करे।

संघर्ष तब ही होता है जब कोई भी पक्ष मनमानी करने पर उतर आता है और तर्क, न्याय, कानून से लेकर संविधान तक को ताक पर रख देता है और धर्म, जाति, लिंग के आधार पर स्वयं फ़ैसला करने लगता है। यदि न्यायसंगत आधार पर निर्णय किया गया है तब संघर्ष की ज़रूरत नहीं है । यह आधार केवल संविधान के अनुसार बनाए गए कानून का ही हो सकता है। किसी भी अधिकार की मान्यता अथवा उसे अस्वीकार किया जाना न्यायप्रणाली का दायित्व हो जाता है कि वह धैर्य के साथ दोनों पक्षों को न्याय सुलभ कराने में सफल हो।

मानवाधिकारों का यह अर्थ नहीं है कि आप उसे अपने व्यक्तिगत और सामूहिक विरोध का आधार बनाकर अपनी मनमानी करें और कानून व्यवस्था को न मानें। उदाहरण के लिए बोलने की आजादी का मतलब यह नहीं कि जो मन में आया, वह कह दिया बिना इस बात पर ध्यान दिए कि उससे कानून के अंतर्गत मिले अधिकारों का अतिक्रमण तो नहीं हो रहा?  इसी तरह चलने फिरने, आने जाने की आज़ादी का अर्थ यह नहीं कि आप दूसरे के अधिकारों को नज़रंदाज़ कर रास्ते रोक दें, सड़कों पर जाम लगा दें और आवागमन के साधनों पर रुकावटें खड़ी कर दी जाएं।

कहीं भी रहने की आजादी का अर्थ यह नहीं कि दूसरों जीवों का जीना मुश्किल कर दिया जाए। कोई भी व्यवसाय या नौकरी करने का अर्थ यह नहीं कि अपराध, तस्करी करने लगें और देश की आर्थिक स्थिति को कमज़ोर कर दें। इसमें स्थानीय कानून का वर्चस्व किसी भी मानवाधिकार पर माना जायेगा।

मानवाधिकार दिवस पर यह संकल्प तो लिया ही जा सकता है कि जहां हम अपने अधिकारों की सुरक्षा चाहते हैं, वहां दूसरों के लिए मुसीबतें न खड़ी करें क्योंकि मनमुटाव से शुरू होकर यह धार्मिक और जातिगत दंगों की नींव को ही मज़बूत करता है।